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________________ श्र०ज० ॥ एए ॥ Jain Educationa! | देरासरने दीठे थके दशमनो एटले चार उपवासनो लाज थाय, देरासरने बारणे गया थकां डुवादसनो लान थाय, देरासरनी मांदे प्रवेश करे त्यारें पन्नर उपवासनो लाज थाय, जगवानने पूजतां मासखमणनो लाज थाय ॥ ३५ ॥ ॥ पीत्रणवार निसि ही कहीने पंडित होय ते देरासरमां प्रवेश करे, तिहां देरासरनी चिंता प्रत्यें करी ने पढी व्रजन् ॥ ३८ ॥ दृष्टे चैत्ये च दशमं द्वारे द्वादशकं लभेत् ॥ मध्ये पदोपवास | स्य, मासस्य च जिनार्चने ॥ ३ ॥ तिस्रो नैषेधिकीः कृत्वा, चैत्यं तत्प्रविशेत्सु धीः ॥ चैत्यचिंतां विधायाथ, पूजयेत्री जिनं मुदा ॥ ४० ॥ मूलनायकमन्यर्च्य प्रष्टात्प्रतिमाः पराः ॥ पूजयेच्चारुपुष्पौघैः शिष्टाचांतर्बहिः स्थिताः ॥ ४१ ॥ प्रवग्रदाइ हिर्गत्वा, वन्देतार्हन्तमादरात् ॥ विधिना पुरतः स्थित्वा, रचयेच्चैत्य दर्षे करी श्री जगवंतने पूजे ॥ ४० ॥ ॥ प्रथम या प्रकारें जला फूलना समूहें श्रीमूलनायकजीनी प्रतिमा पूजीने पढी अनुक्रमें बीजी श्राव बाहिरनी प्रतिमा प्रत्यें पूजे ॥ ४१ ॥ ॥ पढी अवग्रहश्री वाहेर जश्ने यादरथी श्री अरिहंतने वांदे, पठी For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ एए ॥ Wwwgainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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