________________ निश्चे सदा सुख होय, माटे दान, ध्यान, तप श्रने जण तेणे करी दिवसने वांजी न गमावे, एटले दिवसने वांजी न करे, परंतु दानादिक अवश्य प्रत्येक दिवसें करीने सफल दिवस करे॥२॥ // जीव पोताना आयुष्यना प्रायें त्रीजे जागे अथवा अंत समय शुज अने अशुल बेमांथी एक प्रकारनुं श्रागला नवनुं आयुष्य बांधे // 3 // त्यं भवेदिति // अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात्, दानध्यानतपःश्रुतैः // 2 // आयुस्ट तीयत्नागेच, जीवोंत्यसमयेऽथवा // आयुः शुनाशुनं प्रायो, बध्नाति परजन्मसु ॥३॥आयुस्तृतीयन्नागस्थः, पर्वश्रेणीषु पंचसु ॥श्रेयः समाचरन् जन्तुर्ब धात्यायुर्निजं ध्रुवम् // 4 // जन्तुराराधयेम, द्वितीयायां विधा स्थितम् // सृ श्राउखाने त्रीजे नागे रह्यो थको प्राणी बीज, पांचम, श्रावम, श्रगीपारस श्रने चौ दश ए पांच पर्वना दिवसें धर्म थाचरतो थको पोतार्नु निश्चे थकी श्राखुं बांधे // 4 // IN बीज पाल्याची प्राणी यतिधर्म अने श्रावकधर्म ए बे प्रकारना धर्म प्रत्ये श्राराधे, ते / Jain Education i nal For Personal and Private Use Only W hrjainelibrary.org