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________________ माहिं ॥१७॥ नाणामणिमयदेदलि, कवाड परिघाइ दार सोदाहिं ॥ जगईहिं। ते सत्वे, दीवोददिणो परिस्कित्ता ॥ २७ ॥ वरतिण तोरण कयन,त्तवाविपासाय सेलसिलवटे ॥ वेश्वणे वरमंमव, गिहा सणेसू रमंति सुरा ॥१॥ इह अदिगा | रो जेसिं, सुराण देवीण ताण मुप्पत्ति ॥ नियदीवोददि नामे, अस्संखश्मे स| नयरीसु॥२०॥ जंबुद्दीवो गहि कुल,गिरीदि सत्तहिं तदेव वासेहिं । पुवावरदी || देहिं, परिबिन्नो ते श्मे कमसो॥२२॥ हिमवं सिहरी महदिम, रुप्पी निसढो य नीलवंतो य॥ बाहिरज ऽगिरिणो, नन्न विसवेश्या सवे ॥२॥नरदेव यत्ति उगं, उगं च देमवयरमवयरूवं ॥ हरिवासरम्मयउगं, मजि विदेहुत्ति सग । वासा॥२३॥दो दीदा चन वद्या, वेयट्ठा खित्तकमसंमि। मेरू विदेहमसे, पमाण |मित्तोकुलगिरीणं ॥२४॥ग दो चन सय जच्चा, कणगमया कणगरायया कम सो॥ तवणिज सुवेरुलिया, बहि ममग्निंतरा दो दो॥३५॥ उग अड उतीस Jain Educational For Personal and Private Use Only N nelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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