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________________ कर्म० ॥ ६७ ॥ बलवदिया, वीसा तीसेगतीस इग नामे ॥ बस्सरा तिबंधो, सेसे सुहाएमेकिकं ॥ २५ ॥ वीसयर को मि कोडी, नामे गोए य सत्तरी मोदे ॥ ती सयर सु उद्दी, निरय सुरामि तित्तीसा ॥ २६ ॥ मुत्तू कसाय इि, बार मुहुत्त जन्न वेयणिए ॥ अ नाम गोए, सु सेसएस मृहुत्तं तो ॥२७॥ वि घावरण असाए, तीसं अहार सुदुम विगल तिगे ॥ पढना गिइ संघयणे, द स सु चरिमेसु डुग बुढी ॥२८॥ चालीस कसाएसु, मिन लेहु निहुएह सुरहि सि महुरे | दसदो सङ्घ समहिया, ते दाखिदं बिलाईग ॥ २॥ दस सुह विद गर उच्चे, सुरडुग थिर बक्क पुरिस र दासे ॥ मिचे सत्तर मणु डुग, इबी सा सु पमरस ॥३०॥ जय कुछ पर सोए, विधि तिरि नरज निरय डुग नीए । ते पण अथर बक्के, तस चन यावर इग पदि ॥ ३१ ॥ नपु कुखगइ सा सचन, गुरु करकडरुरक सीय डुग्गंधे॥ वीसं कोडा कोडी, एन बाद वाससया Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ग्रंथ ॥ ६७ ॥ www.jainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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