Book Title: Agam Sagar Kosh Part 04
Author(s): Deepratnasagar, Dipratnasagar
Publisher: Deepratnasagar
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आगम-सागर-कोषः (भागः-४)
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मन्न- मतिः, मननं-मतिः
स्खलत्प्रजल्पितम्। ज्ञाता०८१। मन्मनंकञ्चिदर्थपरिच्छित्तावपिसूक्ष्मध-र्मालोचनरूपा अव्यक्तमीषल्ललितम्। निर० ३० मन्मनं-यस्य बुद्धिरितियावत्, अथवा 'मन्ता' मन्नियव्वं (मनितव्यं) जल्पतः स्खलति वाणी। प्रश्न. २५। मन्मनःअभ्युपगमः। स्था० २११
अव्यक्तवान्। प्रश्न०४११ मम्मणः-अर्थसिद्धो मन्नक्खो - महद्दौर्मनस्यम्। बृह. २६० आ।
मनुष्यविशेषः। आव०४१३। मन्नसी- मन्यसे-प्रतिजानीये। उत्त०५१०
मम्मणवाणिओ-मम्मणवणिग्-अनिर्वेदेन सञ्चयेन मन्नामि- मन्यसे। प्रज्ञा० २४७)
चार्थोपार्ज-नकारकवणिग। दशवै० १०७ मन्ने- मन्ये निपातो वितर्कार्थः। स्था० २४७ मन्यसे। मम्मुही- मृन्मुखी-जन्तोर्नवमीदशा। दशवै०८1 उत्त० ३२३। मन्ये-मन्यन्ते। दशवै. १९८१ मन्ये- मयंगतीर- मृतेव मृता विवक्षितभूदेशे तत्कालाप्रवाहिणी वितर्कयामि। ज्ञाता०८३।
सा चासौ गङ्गा च मृतगङ्गा तस्यास्तीरं मन्य-क्रोधः। नन्दी. १५०
मृतगङ्गातीरम्। उत्त० ३५४। मृतगङ्गातीरम्। उत्त. मन्युभर- क्रोधभरः। उत्त०६३
३८३ मम- ममोपरि। ज्ञाता०१९०| माम्। सूत्र० ३०८१
मयंगतीरदह- मृतगङ्गातीरहृदः-मृतङ्गा यत्र देशे ममच्चं-मामकीनम्। आव० ५६५
गङ्गाजलं व्यूढमासीद। ज्ञाता०९१| ममज्जमाण- ममत्वमाचरन्। उत्त०४२
मय- मदः-कामोद्रेकः। उत्त० ४२८। मृतं-जीवविमुक्तमाममहुत्त- ममायत्तः। आव०८४८।
त्रम्। ज्ञाता० १२९। मतं-समान एवागमे आचार्याणामभि ममाइ-ममत्ववान्। सूत्र. १९४१
प्रायः। भग०६२। मृतः-परासुतां गतः। ज्ञाता० ११, ११५ ममाइय- ममत्वम्-आत्मीयाभिधानम्। दशवै० १९६। | मयग- मृतकं-मृतं-जीवविमुक्तमात्रम्। ज्ञाता० १७३। ममा-यितं-मामकम्। आव०१४२। ममायितं-स्वीकृतं मयगहण- मतग्रहणं-अभिप्रायग्रहणम्। ओघ०७१। परिग्रहम्। आव० १४२। मामकम्। आचा. १४२
मयट्ठाणं-मदस्थान-मानस्थानम्। आव०६४६) ममाइयमइ-ममायितं-मामकं तत्र मतिर्ममायितमतिस्तां | मयण-मदन-कलविशेषः। आव०४२४। मदनः चित्रो यः परिग्रहविपाकज्ञः। आचा० १४२
मोहोदयः। दशवै०८५ मदनः। दशवै.८६| ममायए- ममायते-ममेति प्रतिपदयते। पिण्ड० ४३। मयणकाम- मदनकामः-मदयतीति मदनः-चित्रो ममायच्चो- ममाधीनः। निशी०४४ अ।
मोहोदयः स एव कामः-मदनकामः। दशवै० ८५ ममायति-परिगेपति। द० ९९। ममेत्येवं कुर्वन्ति ममा- | मयणगिज्जे- मदनीयं-मदनोदयकारि। स्था० ३७५१ यते-स्वीकुर्वति। प्रश्न. ९४। ममायति
मयणफल- मदनफलम्। दशवै. ९६। परिगृह्णन्ति(ति)। दशवै. २०३।
मयणमिज्जा- मदनबीजम्। आव० ८१३। ममि-मामकम्। सूत्र० ३०८५
मयणसलागा- मदनशलाका-पक्षिविशेषः। आव०४२८१ ममेयंति- ममीकृते। निशी० ३१३ अ।
मदनशलाका-सारिका। जम्बू. ३०| मदनशाका-लोममम्म- मर्म-प्रछन्नपारदोर्यादिदुश्चेष्टितम्। प्रश्न० १२१| पक्षिविशेषः। जीवा०४१। शारिका। जीवा. १८८1
मर्म-परापभ्राजेनाकारि कुत्सितं जात्यादि। उत्त० ३४५ लोमपक्षिविशेषः। प्रज्ञा०४९। मम्मण- द्रव्यप्रधानो वणिग्विशेषः। सूत्र० १०२॥ मयणसाला- मदनशाला-शारिका। प्रश्न. ३७। आतध्यायी धनवान्। वणिम्। सूत्र० १९४। अर्थार्जनपरो मदनसारिका। ज्ञाता० १०० व्यक्तिविशेषः। आव० ७७। साकाक्षो वणिग्विशेषः। मयणा- शक्रेन्द्रस्य तृतीयऽग्रमहिषी। स्था० २०४। उत्त० ३१६। मन्मनं-मन्मनमिव मन्मनं चास्फुटत्वात्, | मयणिज्ज-मदनीयं-मन्मथवर्द्धनम्। औप०६५। मदनीयं अधर्मदवारस्यैकविंशतितमं नाम। प्रश्न. २७ मन्मनः मन्मथजननात्। जीवा. २७८ मदनीयंयस्य वाचःस्खलन्ति। आव०६२८ मन्मन
मन्मथजनकत्वात्। जम्ब०११९| मदनीया
मुनि दीपरत्नसागरजी रचित
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"आगम-सागर-कोषः" [४]

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