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आग
नमो नमो निम्मलदसणस्स पूज्य आनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर-गुरुभ्यो नमः
भाग
सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि
37__
आगम ४३ "उत्तराध्ययनानि” मूलं एवं वृत्ति: [३]
मूल संशोधक :- पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब
अभिनव-संकलनकर्ता :- आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि
पूज्य शासनप्रभावक आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से।
'वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था' पालिताणा।
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ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता
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श्री आगम मंदिर
पालिताणा
AMARIHARASHTRAHATARAMBIRHA
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नमो नमो निम्मलदसणस्स
सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि
मूल संशोधक
अभिनव-संकलनकर्ता
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BansDINNERadiolional
पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महायज
आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि]
प्रत-प्राप्ति और पेज सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका
मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदाबाद Mo 9825598855 19825306275
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आगम वाचना शताब्दी वर्ष
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[भाग-३७] श्री उत्तराध्ययनानि (मूलसूत्रम्-४/३)
नमो नमो निम्मलदसणस्स पूज्य श्रीआनंद-क्षमा-ललित-सुशील-सुधर्मसागर गुरुभ्यो नम:
"उत्तराध्ययनानि" मूलं एवं वृत्ति: ।
मूलं + नियुक्ति: + शान्तिसूरि-रचिता वृत्तिः]"
[आद्य संपादकश्री] पूज्य आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागर सूरीश्वरजी म. सा.
(किञ्चित् वैशिष्ठ्यं समर्पितेन सह) पुन: संकलनकर्ता→ मुनि दीपरत्नसागर (M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि)
28/07/2017, शुक्रवार, २०७३ श्रावण शुक्ल ५
'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग-37
श्री आगमोद्धारक-वाचना-शताब्दी-वर्ष-निमित्त 'आगम-वृत्ति-मुद्रण-प्रोजेक्ट'
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सामाचारी-संरक्षक, ज्ञानधनी, आगम-संशोधक, तीव्र-मेधावी, समाधिमृत्यु-प्राप्त, बहुमुखीप्रतिभाधारक पज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसरीश्वरजी महाराज साहेब |
.जिन्होने शुद्ध-श्रद्धा, सम्यक्-श्रुत आराधना, यथाख्यातचारित्र के प्रति गति और अंत समय देह-ममत्व के त्याग के द्वारा कायोत्सर्ग नामक : | अभ्यंतर-तप कि मिशाल कायम कि है ऐसे बहुश्रुत आचार्य श्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराज का परिचय कराना मेरे लिए नामुमकिन है , फ़िर भी | गरुभक्ति बद्धि से श्रद्धांजली स्वरुप एक मामली सी झलक पैस करने का यह प्रयास मात्र है।
.चारित्र-ग्रहण के बाद अल्प कालमे जो अपने गुरुदेव की छत्रछाया से दूर हो गये , तो भी गुरुदेव के स्वर्ग-गमन को सिर्फ कर्मो का प्रभाव मानकर अपने संयम के लक्ष्य प्रति स्थिर रहते हुए अकेले ज्ञान-मार्ग कि साधना के पथ पर चले । पढाई के लिए ही कितने महिनो तक रोज :
एकासणा तप के साथ बारह किल्लोमिटर पैदल विहार भी किया | लेकिन अपने मंझिल पे डटे रहे, और परिणाम स्वरुप संस्कृत एवं प्राकृत भाषा का, | । प्राचीन लिपिओ का, व्याकरण-न्याय-साहित्य आदि का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया | जैन आगमशास्त्रो के समुद्र को भी पार कर गए।
. एक अकेला आदमी भी क्या नहीं कर शकता? इस प्रश्न का उत्तर हमें इस महापुरुष के जीवन और कवन से मिल गया, जब वे चल पड़े। देवर्द्धिगणी क्षमाश्रमण के स्थापित पथ पर. बिना किसी सहाय लिए हुए सिर्फ अकेले ही "जैन-आगम-शास्त्रो को दीर्घजीवी बनाने के लिए अनेक : हस्तप्रतो से शुद्ध-पाठ तैयार किये | दो वैकल्पिक आगम, कल्पसूत्र और नियुक्तिओ को जोड़कर ४५ आगम-शास्त्रो को संशोधित कर के संपादित किया || फिर पालीताणामें आगम मंदिर बनवाकर आरस-पत्थर के ऊपर ये सभी आगम-साहित्य को कंडारा , सूरतमें तामपत्र पर भी अंकित करवाए और । : "आगम मंजूषा" नाम से मुद्रण भी करवा के बड़ी बड़ी पेटीमें रखवा के गाँव गाँव भेज दिए | वर्तमानकालमे सर्व प्रथमबार ऐसा कार्य हुआ |
.सिर्फ मूल आगम के कार्य से ही उन के कदम रुके नही थे , उन्होंने आगमो की वृत्ति, चूर्णि, नियुक्ति, अवचूरी, संस्कृत-छाया आदि का भी संशोधन-सम्पादन किया | उपयोगी विषयो के लिए उन्होंने एक लाख श्लोक प्रमाण संस्कृत-प्राकत नए ग्रंथो की रचना भी की । कितने ही ग्रंथो : की प्रस्तावना भी लिखी | ये सम्यक्-श्रुत मुद्रित करवाने के लिए आगमोदय समिति, देवचंद लालभाई इत्यादि विभिन्न संस्था की स्थापना भी की |
.ज्ञानमार्ग के अलावा सम्मेतशिखर, अंतरीक्षजी, केशरियाजी आदि तीर्थरक्षा कर के सम्यक-दर्शन-आराधना का परिचय भी दिया | राजाओं . को प्रतिबोध कर के और वाचनाओ द्वारा अपनी प्रवचन-प्रभावकता भी उजागर करवाई । बालदिक्षा, देवद्रव्य-संरक्षण, तिथि-प्रश्न इत्यादि विषयोमे | सत्य-पक्षमें अंत तक दृढ़ रहे | जैनशासन के लिए जब जरुरत पड़ी तब अदालती कारवाईओ का सामना भी बड़ी निडरता से किया था |
.सागरानंदजी के नाम से मशहूर हो चुके पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजीने अपने परिवार स्वरुप ८७० साधू-साध्वीजी भी शासन को भेट किये | ...ये थे हमारे गुरुदेव “सागरजी"...
........मुनि दीपरत्नसागर... :
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संयमैकलक्षी, उपधान-तप-प्रेरक, चारित्र-मार्ग-रागी, प्रवचन-पटु, सुपरिवार-युक्त पूज्य गच्छाधिपतिआचार्यदेव श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब
:
... परमपूज्य आचार्यश्री आनंदसागरसूरीश्वरजी के पाट-परंपरामे हुए तिसरे गच्छाधिपति थे पूज्य आचार्य श्री देवेन्द्रसागरसूरीश्वरजी , जो एक | पून्यवान् आत्मा थे, दीक्षा ग्रहण के बाद अल्पकालमे ही एक शिष्य के गुरु बन गये | फ़िर क्या ! शिष्यो कि संख्या बढ़ती चली, बढ़ते हुए पुन्य के । • साथ-साथ वे आखिर 'गच्छाधिपति' पद पे आरूढ़ हो गए | इस महात्मा का पुन्य सिर्फ शिष्यों तक सिमित नही था, वे जहा कहीं भी 'उपधान-तप' की: प्रेरणा करते थे, तुरंत ही वहां 'उपधान' हो जाते थे | प्रवचनपटुता एवं पर्षदापुन्य के कारण उन के उपदेश-प्राप्त बहोत आत्माओने संयम-मार्ग का । स्वीकार किया | खुद भी संयमैकलक्षी होने के कारण चारित्रमार्ग के रागी तो थे ही, साथसाथ ज्ञानमार्ग का स्पर्श भी उन का निरंतर रहेता था | आप कभी भी दुपहर को चले जाइए, वे खुद अकेले या शिष्य-परिवार के साथ कोई भी ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापनमें रत दिखाई देंगे।
... ये तो हमने उनके जीवन के दो-तीन पहेल दिखाए । एक और भी अनसरणीय बात उन के जीवन में देखने को मिली थी- 'आराधना-प्रेम'. | कैसी भी शारीरिक स्थिति हो, मगर उन्होंने दोनों शाश्वती ओलीजी, [पोष दशमी, शुक्ल पंचमी, त्रिकाल देववंदन, पर्व या पर्वतिथि के देववंदन आदि : | आराधना कभी नहीं छोड़ी | आखरी सालोमें जब उन को एहसास हो गया की अब 'अंतिम-आराधना' का अवसर नजदीक है, तब उन के मुहमें एक ही |
रटण बारबार चालु हो गया- “अरिहंतनुं शरण, सिद्धनुं शरण, साधुनुं शरण, केवली भगवंते भाखेला धर्मनु शरण' इसी चार शरणो के रटण के साथ ही वे : | समाधि-मृत्यु-रूप सम्यक् निद्रा को प्राप्त हुए थे | ऐसे महान् सूरिवर को भावबरी वंदना |
... मुनि दीपरत्नसागर... | ... श्री वर्धमान जैन आगम मंदिर संस्था, पालिताणा ... पूज्यपाद आनंदसागर-सूरीश्वरजी की बौद्धिक-प्रतिभा का मूर्तिमंत स्वरुप ऐसी इस संस्था की स्थापना विक्रम संवत १९९९ मे महा-वद ५ को हुइ।। पूज्य आचार्य हर्षसागरसूरिजी की प्रेरणा से जिन की तरफ़ से इस सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि के लिए संपूर्ण द्रव्य-सहाय की प्राप्ति हुइ । शिल्प-स्थापत्य , शिलोत्कीर्ण आगम और समवसरण स्थित नयनरम्य ४५ चौमुख जिन-प्रतिमाजी से सुशोभित ऐसा ये 'आगममंदिर' है, जो शत्रुजय-गिरिराज कि तलेटीमे स्थित है | वर्तमान २४ जिनवर, २० विहरमान जिनवर और १ शाश्वत मिलाकर ४५ चौमुखजी यहा बिराजमान है | जहां : |४० समवसरण की रचना मेरु पर्वत के तिनो काण्ड के वर्षों के अनुसार चार अलग-अलग रंगो के आरस-पत्थर से बना है, देवो द्वारा रचित समवसरण | के शास्त्र वर्णन-अनुसार आगम-मंदिर कि समवसरण का स्थापत्य है । ऐसी अनेक विशेषता से युक्त ये आगममंदिर है।
- मुनि दीपरत्नसागर...
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____ 'सागर-समुदाय-एकता-संरक्षक, तीर्थ-उद्धार-कार्य-प्रवृत्त, गुणानुरागी' इस “सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' श्रेणि भाग १ से ४० के संपूर्ण अनुदान के प्रेरणादाता पूज्य शासनप्रभावक आचार्य श्री हर्षसागरसूरिजी महाराज साहेब
पूज्यपाद स्व. गच्छाधिपति देवेन्द्रसागर-सूरीश्वरजी के विनयी शिष्य एवं दो गच्छाधिपतिओ के मुख्य सहायक के रुपमे 'सागर समुदाय' के सुचारु संचालक पूज्य हर्षसागरसूरिजी, जिन की प्रेरणा से ये "सवृत्तिक-आगम-सत्ताणि" के मुद्रण के लिए संपूर्ण द्रव्यराशि प्राप्त हुई, उनका अत्यल्प परिचय यहां करेंगे| समुदाय-एकता के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हुए ये महात्मा समुदाय के साधु-साध्वीजी की आवश्यकताओकी पूर्ती के लिए भी प्रवृत्त रहेते है, प्राचीन-अर्वाचीन तीर्थो के जीर्णोद्धार एवं विकाश के लिए भी उत्साहित रहेते है, ज्ञान-क्षेत्र अछूता न रहे इसीलिए अनुमोदना, अनुदान एवं
समय मिलने पर शास्त्र-वांचनमें भी रूचि रखते है | समुदाय के जरूरतमंद साध्वीजी भगवंतो के आवास का विषय हो या साध्वीजी के विहारमें मजदूर : का वेतन चुकाना हो, ऐसे छोटे-छोटे कार्यों के प्रति भी उन का लक्ष्य रहेता है | दर्शन-शुद्धि के लिए जब उन्होंने समग्र भारतवर्ष के १०० साल तक के | पुराने जिनालयो में १८ अभिषेक की प्रेरणा की, उस वक्त लगभग सभी अभिषेक-सामग्री की द्रव्य-शुद्धि का ख़याल रखते हए अपनी मेधावी बुद्धि का : परिचय दिया था, साथमे अनुकंपा भाव से पुजारी या विधि करानेवाले को यत्किंचित् बहुमान प्रगट करते हुए कुछ धन-राशि प्रदान करवाई। ऐसे बहुगुण-संपन्न महात्मा पूज्य आचार्यश्री हर्षसागर-सूरिजी को हम भावभरी वंदना करते हुए इस श्रुतकार्य का प्रारंभ करने जा रहे है ।
... मुनि दीपरत्नसागर
[कात्रजपूना, कपडवंज, प्रभासपाटण आदि स्थानोमे आगममंदिर के प्रेरक, कर्मग्रंथ अभ्यास, निस्पृह महात्मा पूज्यपाद गच्छाधिपति आचार्य श्री दौलतसागर-सूरीश्वरजी महाराज साहेब
(एवं) अजातशत्रु, स्वाध्याय-रसिक, प्रशांतमूर्ती और अपने गुरु के प्रीतिपात्र
परम पूज्य आचार्य श्री नंदीवर्धनसागर-सूरिजी महाराज साहेब
इस पवित्र श्रुत-कार्यमे दोनो सूरिवरो का स्मरण करते हुए कोटि कोटि वंदना के साथ :-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..-..
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मूलाङ्का: १६४०+८८
उत्तराध्ययनानि मूल-सूत्रस्य विषयानुक्रम
दीप-अनुक्रमा: १७३१
मूलांक:
पृष्ठांक:
पृष्ठांक:
अध्ययन ०००१ | ०१ विनयसूत्तं ००४९ ०२ परिषह विभक्ति : ००९५ / ०३ चातरंगियं ०११५ ०४ असंस्कृतं ०१२८ | ०५ अकाममरणियं ०१६००६ क्षुल्लकनिन्थियं ०१७९ ०७ औरभियं ०२०९ ०८ कापिलियं ०२२८ | ०९ नमिप्रव्रज्या ०२९१ | १० द्रुमपत्रक ०३२८ | ११ बहुश्रुतपूजा ०३६० | १२ हरिकेशियं
| मूलांक: | अध्ययनं
०४०७ | १३ चित्रसंभूतियं ०४४२ | १४ इषकारियं ०४९५ | १५ सभिक्षुकं ०५११ | १६ ब्रह्मचर्यसमाधि. ०५३९ | १७ पापश्रमणियं ०५६० | १८ संयतियं ०६१४ | १९ मृगापुत्रिक ०७१३ २० महानिर्ग्रन्थियं ०७७३ २१ समुद्रपालितं ०७९७ २२ रथनेमियं ०८४७ २३ केशीगौतमियं ०९३६ | २४ प्रवचनमाता
मूलांक: | अध्ययनं
पृष्ठांक: ०९६३ | २५ यज्ञकियं
। ०७५ १००७ २६ सामाचारी
०९९ १०५९ २७ खलंकियं
१२९ १०७६ २८ मोक्षमार्गगति: १४२ | १११२ | २९ सम्यक्त्वपराक्रम १७३ १९८९ ३० तपोमार्गगति: २३० १२२६ | ३१ चरणविधिः
२५४ १२४७ ३२ प्रमादस्थानं
२७१ १३५८ | ३३ कर्मप्रकृत्ति : ३१३ १३८३ | ३४ लेश्या-अध्ययनं ३३१ १४४४ | ३५ अणगारमार्गगति: । ३५९ १४६५ ३६ जीवाजीव-विभक्तिः | ३७३
०११
०२९
०६०
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[उत्तराध्ययनानि- मूलं एवं वृत्ति:] इस प्रकाशन की विकास-गाथा यह प्रत सबसे पहले “उत्तराध्ययनानि सूत्र” के नामसे सन १९१६ (विक्रम संवत १९७२) में देवचन्द्र लालभाइ पुस्तकोद्धार संस्था द्वारा प्रकाशित हुई, इस के संपादक-महोदय थे पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्यदेव श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी (सागरानंदसूरिजी) महाराज साहेब |
इसी प्रत को फिर अपने नामसे 'जिनशासन आराधना ट्रस्ट' की तरफ से आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरिजीने छपवाई , जिसमे उन्होंने खुदने तो कुछ नहीं किया, मगर इसी प्रत को ऑफसेट करवा के , ऊपर अपना नाम एवं अपनी प्रकाशन संस्था का नाम छाप दिया. यह स्पष्ट रूपसे एक प्रकारसे अदत्तादान ही है, ऐसी अनेक प्रतो के अगले दो पेज पलटकर या नए डालकर उन्होंने अपने नामसे छपवाइ है , इस तरह वो अपने आपको बड़ा आगम संरक्षक साबित करनेकी अनुचित चेष्टा कर चुके है।
इसी उत्तराध्ययन--सूत्र की प्रत को ऑफसेट की मदद से दुसरोने भी प्रकाशित करवाई है , किसीने पूज्यश्री सागरानंदसूरीश्वरजी महाराजश्री का नाम बड़ी इज्जत के साथ अपनी जगह पे ही रखा है , और खुदका नाम पुन: संपादक रूप से पेश किया है तो किसीने अपना नाम आगे कर दिया है और पूज्य सागरानंदसूरीश्वरजीका नाम गौण कर दिया है या उड़ा दिया है।
हमारा ये प्रयास क्यों? आगम की सेवा करने के हमें तो बहोत अवसर मिले, ४५-आगम सटीक भी हमने ३० भागोमे १२५०० से ज्यादा पष्ठोमें प्रकाशित करवाए है, किन्तु लोगो की पूज्यश्री सागरानंदसूरीश्वरजी के प्रति श्रद्धा तथा प्रत स्वरुप प्राचीन प्रथा का आदर देखकर हमने इसी प्रत को स्केन करवाई, उसके बाद एक स्पेशियल फोरमेट बनवाया, जिसमे बीचमे पूज्यश्री संपादित प्रत ज्यों की त्यों रख दी,ऊपर शीर्षस्थानमे आगम का नाम, फिर अध्ययन-मूलसूत्र आदि के नंबर लिख दिए, ताँकि पढ़नेवाले को प्रत्येक पेज पर कौनसा अध्ययन, सूत्र, आदि चल रहे है उसका सरलतासे ज्ञान हो शके | बायीं तरफ आगम का क्रम और इसी प्रत का सूत्रक्रम दिया है, उसके साथ वहाँ 'दीप अनुक्रम' भी दिया है, जिससे हमारे प्राकृत, संस्कृत, हिंदी गुजराती, इंग्लिश आदि सभी आगम प्रकाशनोमें प्रवेश कर शके | हमारे अनुक्रम तो प्रत्येक प्रकाशनोमें एक सामान और क्रमशः आगे बढ़ते हुए ही है , इसीलिए सिर्फ क्रम नंबर दिए है, मगर प्रत में गाथा और सूत्रों के नंबर अलग-अलग होने से हमने जहां सूत्र है वहाँ कौंस ] दिए है और जहां गाथा है वहाँ ||-| ऐसी दो लाइन खींची या 'गाथा' शब्द लिखा है| हर पृष्ठ के नीचे विशिष्ठ फूटनोट दी है।
शासनप्रभावक पूज्य आचार्यश्री हर्षसागरसूरिजी म.सा. की प्रेरणासे और श्री वर्धमान जैन आगममंदिर, पालिताणा की संपूर्ण द्रव्य सहाय से ये 'सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि' भाग-३७ का मुद्रण हुआ है, हम उन के प्रति हमारा आभार व्यक्त करते है।
परत्नसागर.
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२२], मूलं [-1 / गाथा ||२४...|| नियुक्ति: [४३७-४३९]
(४३)
A
प्रत सूत्रांक ||२४||
उत्तराध्य. अथ द्वाविंशं रथनेमीयमध्ययनम् ।
रधनेमीबृहद्वृत्तिः
याध्य० व्याख्यातं समुद्रपालीयं नामैकविंशमध्ययनम् , अधुना द्वाविंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्त-13 ॥४८८॥
राध्ययने विविक्तचर्योक्ता, सा च चरणसहितेन धृतिमता चरण एव शक्यते कर्जुमतो रथनेमिवचरणं तत्र च कथ
श्चिदुत्पन्नविश्रोतसिकेनापि धृतिश्चाधेयेत्यनेनोच्यत इत्यमुना सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्यापि चतुरनुयोग-IN हद्वारचर्चा प्राग्वद्विधाय नामनिष्पन्ननिक्षेप एवाभिधेय इति चेतसि व्यवस्थाप्याह नियुक्तिकृत्६ रहनेमीनिक्खेवो चउक्कओ दुविह होइ दवमि। आग०॥३७॥ जाण॥३८॥ रहनेमिनामगोअं वेअंतो भावओ अ रहनेमी । तत्तो समुट्रियमिणं रहनेमिजंति अज्झयणं ॥ ४३९॥
प्राग्वद् व्याख्येयं, नवरं रथनेमिशब्दोचारणमिह विशेषः इत्यवसितो नामनिष्पन्न निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिप्पन्ननिक्षेपावसरः,स च सूत्रे सति भवत्यतः सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तवेदम्
४८८ १ कचित् इमे द्वे गाथे अधिक दृश्येते-सोरियपुरंमि नगरे, आसी राया समुद्दविजओत्ति । तस्ससि अगमहिसी सिवत्तीदेवी अणुजंगी ६॥१॥ तेसिं पुत्ता चउरो अरिटुनेमी तहेव रहनेमि । तइयो य सम्बनेमी चउत्यो होइ ढनेमी ॥ २ ॥ अन्यत्राये ते
दीप अनुक्रम [७९६]
SSACROSS -CA
Educatan inlimational
For PF
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -२२ "रथनेमीय" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२२], मूलं [-1 / गाथा ||१-१६|| नियुक्ति: [४३७-४३९]
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प्रत
सूत्रांक
||१-१६||
सोरियपुरंमि नयरे, आसि राया महहिए । वसुदेवत्तिनामेणं, रायलक्षणसंजुए ॥१॥ तस्स भज्जा 8/दुचे आसि, रोहिणी देवई तहा । तासिं दुहं पि दो पुत्ता,इट्टा (जे) रामकेसवा ॥२॥ सोरियपुरंमि नयरे, आसि हराया महहिए । समुहविजये नाम, रायलक्खणसंजुए ॥३॥ तस्स भजा सिवा नाम, तीसे पुत्तो महायसो।
भयवं अरिहनेमित्ति, लोगनाहे दमीसरे ॥ ४॥ सोऽरिहनेमिनामो अ, लक्खणस्सरसंजुओ । अट्ठसहस्सलक्खणधरो, गोयमो कालगच्छवि ॥५॥ वज्ञरिसहसंघयणो, समचउरंसो झसोदरो । तस्स राईमई कन्नं,
भज जायइ केसवो ॥६॥ अह सा रायवरकन्ना, सुसीला चारुपेहिणी । सब्बलक्खणसंपन्ना, विजुसोआ६ मणिप्पभा॥७॥ अहाह जणओ तीसे, वासुदेवं महड्डियं । इहागच्छउ कुमरो, जा से कन्नं ददामहं ॥ ८ ॥
सब्बोसहीहिं पहविओ, कयकोऊयमंगलो। विजुयलपरिहिओ, आभरणेहिं विभूसिओ ॥९॥ मत्तं च गंधहस्थि च, वासुदेवस्स जिट्टयं । आरूढो सोहई अहियं, सिरे चूडामणी जहा ॥ १०॥ अह ऊसिएण
छत्तेण, चामराहिय सोहिओ।दसारचकेण तओ, सब्बओ परिवारिए ॥११॥ चरंगिणीए सेणाए, रइयाए ४ जहकर्म । तुडियाणं सन्निनाएणं, दिव्वेणं गगणं फुसे ॥१२॥ एयारिसीइ इडीए, जुइए उत्तमाइ य । नियगाओ दभवणाओ, निजाओ वपिहपुंगवो ॥१३॥ अह सो तत्थ निजतो, दिस्स पाणे भयदुए । वाडेहिं पंजरेहिं च,
दीप
अनुक्रम [७९७-८१२]
ACCESCCASICK
JHEIDImam intimational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||१-१६|| नियुक्ति: [४३९...]
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बृहद्वृत्तिः
प्रत
याध्य
सूत्रांक
||१-१६||
उत्तराध्य. संनिरुद्ध सुदुखिए ॥१४ा जीवियतं तु संपत्ते, मंसहा भक्खियव्वए। पासित्ता से महापपणे, सारहिं इणमन्यवी
॥१५॥-कस्स(अ)हा इमे पाणा, एए सब्वे सुहेसिणो । वाडेहिं पंजरोहिं च, संनिरुद्धा य अच्छहि ॥१६॥
| सूत्रपोडशकं प्रायः प्रकटार्थमेव, नवरं राजेव राजा तस्य लक्षणानि-चक्रस्वस्तिकाकुशादीनि त्यागसत्यशौर्या- ॥४८९॥ दीनि (ग्रन्थानम् १२०००) वा तैः संयुतो-युक्तो राजलक्षणसंयुतोऽत एव राजेत्युक्तं, भज्जा दुवे आसित्ति भार्ये
वे अभूतां, 'तासिन्ति तयो रोहिणीदेवक्योडौं पुत्रौ 'इष्टौ' वल्लभी 'रामकेशवी' बलभद्रवासुदेवावभूतामितीहापि दयोज्यते, तत्र रोहिण्या रामो देवक्याश्च केशवः, इह च रथनेमिवक्तव्यतायां कस्यायं तीर्थ इति प्रसङ्गेन भगव
चरितेऽभिधित्सितेऽपि तद्विवाहादिषूपयोगिनः केशवस्य पूर्वोत्पन्नत्वेन प्रथममभिधानं, तत्सहचरितत्वाच रामस्वेति|भावनीयं, पुनः सौर्यपुराभिधानं च समुद्रविजयवसुदेवयोरेकत्रावस्थितिदर्शनार्थम् , इह च राजलक्षणसंयुत इत्यत्र राजलक्षणानि-छत्रचामरसिंहासनादीन्यपि गृह्यन्ते। दमिनः-उपशमिनस्तेपामीश्वरः-अत्यन्तोपशमवत्तया नायको दमीश्वरः, कौमार एव क्षतमारवीर्यत्वात्तस्य । 'लक्खणसरसंजुतो'त्ति प्राकृतत्वात्स्वरस्य यानि लक्षणानि-सौन्दर्यगाम्भीयोंदीनि तैः संयुतः खरलक्षणसंयुतः, लक्षणोपलक्षितो या खरो लक्षणखरः प्राग्यन्मध्यपदलोपी समासः, ६ तेन संयुतो लक्षणखरसंयुतः, पठन्ति च-बंजणस्सरसंजुओ'त्ति व्यजनानि-प्रशस्ततिलकादीनि खरो-गाम्भीर्यादिगुहैणोपेतस्तत्संयुतः 'अष्टसहस्रलक्षणधरः' अष्टोत्तरसहस्रसङ्गपशुभसूचककरादिरेखाद्यात्मकचक्रादिलक्षणधारकः 'गौतमः'
दीप
44
अनुक्रम [७९७-८१२]
*
॥४८९॥
For Pro
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||१-१६|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||१-१६||
गौतमसगोत्रः 'कालकच्छविः' कृष्णत्वक् । 'झसोदरो'त्ति झपो-मत्स्यस्तदुदरमिव तदाकारतयोदरं यस्यासौ । झपोदरो, मध्यपदलोपी समासः, इतश्च गतेषु द्वारकापुरी यदुपु निहते जरासिन्धनृपतावधिगतभरताईराज्यः केशवो यौवनस्थेऽरिष्टनेमिनि समुद्रविजयादेशतो यदचेष्टत तदाह-'तस्य' अरिष्टनेमिनो राजीमती भायाँ गन्तुमिति शेषः, याचते केशवस्त जनकमिति प्रक्रमः । सा च कीदृशीत्याह-'अथ' इत्युपन्यासे, राजवर इहोग्रसेनस्तस्य कन्या राज्ञो वा-तस्यैव वरकन्या राजवरकन्या सुष्टु शीलं-खभायो यस्याः सा |सुशीला चारु प्रेक्षितुं-अवलोकितुं शीलमस्याः चारुप्रेक्षिणी, नाधोरष्टितादिदोपदुष्टा, 'विजुसोयामणिप्पह'त्ति विशेषेण द्योतते-दीप्यत इति विद्युत् सा चासौ सौदामनी च विद्युत्सौदामनी, अथवा विद्युदग्निः सौदामिनी |च तडित् , अन्ये तु सौदामिनी प्रधानमणिरित्याहुः । 'अथ' इति याचाऽनन्तरमाह जनकस्तस्याः-राजी
मत्या उग्रसेन इत्युक्तं, 'जा से'त्ति सुव्यत्ययाद् येन तस्मै 'ददामि विवाहविधिनोपढौकयाम्यहम् । एवं च प्रतिसपनायामुग्रसेनेन राजीमत्यामासन्ने च कौष्ठिक्यादिष्टे विवाहलमे यदभूत्तदाह-सर्वाश्च ता औषधयश्च-जयाविजय
द्धिवृदयादयः सौंषधयस्ताभिः स्वपितः-अभिषिक्तः, कृतकौतुकमाल इत्यत्र कौतुकानि-ललाटस्य मुशलस्पर्श| नादीनि मङ्गलानि च-दध्यक्षतर्वाचन्दनादीनि 'दिवजुयलपरिहिय'त्ति प्राग्वत्परिहितं दिव्ययुगलमिति प्रस्तावाद् दूष्य युगलं येन स तथा, वासुदेवस्य सम्बन्धिनमिति गम्यते, ज्येष्ठमेव ज्येष्ठकम्-अतिशयप्रशस्यमतिवृद्धं वा गुणैः
दीप
अनुक्रम [७९७-८१२]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [२२], मूलं [-1 / गाथा ||१-१६|| नियुक्ति: [४३९...]
बृहद्वृत्तिः
प्रत
सूत्रांक
||१-१६||
उत्तराध्य पट्टहस्तिनमित्यर्थः, शोभत इति वर्तमान निर्देशः प्राग्वत्, 'चूडामणिः' शिरोऽलङ्काररत्नम् । अथ अनन्तरम् 'उच्छ्रितेनरथनेमी1६ उपरिधृतेन पाठान्तरतश्च-श्वेतोच्छ्रितेन 'चामराहि यत्ति चामराभ्यां च शोभितः 'दसारचकेणं ति दशाईचक्रेण
| याध्य. यदुसमूहेन 'चतुरङ्गिण्या' हस्त्यश्वरथपदातिरूपाङ्गचतुष्टयान्वितया 'रचितया' न्यस्तया 'यथाक्रम' यथापरिपाटी|| ॥४९॥ तूर्याणां-मृदङ्गपटहादीनां सन्निनादेनेति-संनद्यत इत्यादिपु समो भृशार्थस्यापि दर्शनादतिगाढध्वनिना 'दिव्येन'
इति प्रधानेन देवागमनस्यापि तदा सम्भवाद्देवलोकोद्भवेन वा 'गयणं फुसे'त्ति आर्पत्वाद् 'गगनस्पृशा' अतिप्रबल-४ तया नभोऽङ्गणव्यापिना, सर्वत्र च लक्षणे तृतीया, 'एतारश्या' अनन्तराभिहितरूपया 'ऋद्धया' विभूत्या 'धुत्सा दीप्त्या, उत्तरत्र चशब्दोऽभिन्नक्रमतो द्युत्या चोत्तमयोपलक्षितः सन्निजका वनात् 'निर्यातः' निष्क्रान्तः 'वृष्णिपुङ्गवः' यादवप्रधानो भगवानरिष्ठनेमिरितियावत् । ततश्चासौ क्रमेण गच्छन् प्राप्तो विवाहमण्डपासन्नदेशम् , 'अर्थ' अनन्तरं स तत्र 'निर्यन्' अधिकं गच्छन् 'दिस्स'त्ति दृष्ट्वा अवलोक्य 'प्राणान्' स 'प्राणिनः' मृगलावकादीन् 'भयद्रुतान्' भयत्रस्तान वाटैरिति-वाटकैः-वृत्तिवरण्डकादिपरिक्षिप्तप्रदेशरूपैः 'पञ्जरैश्च' बन्धनविशेपैः 'सन्निरुद्धान्'
४९०॥ गाढनियत्रितान् , पाठान्तरतस्तु-बद्धरुद्धान् , अत एव सुदुःखितान् , तथा जीवितस्यान्तो-जीवितान्तो मरणगि-2 इत्यर्थस्तं संप्राप्तानिय संप्रासान् , अतिप्रत्यासन्नत्वात्तस्य, यद्वा जीवितस्यान्तः-पर्यन्तवर्ती भागस्तमुक्तहेतोः संप्राप्तान्
मांसार्थ' मांसनिमित्तं च भक्षयितव्यान् मांसस्यैवातिगृद्धिहेतुत्वेन तद्भक्षणनिमित्तत्वादेवमुक्तं, यदिवा 'मांसेनेच
दीप
अनुक्रम [७९७-८१२]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||१-१६|| नियुक्ति: [४३९...]
प्रत
सूत्रांक
||१-१६||
मांसमुपचीयते' इति प्रवादतो मांसमुपचितं स्यादिति मांसाथै भक्षयितव्यानविवेकिमिरिति शेषः, 'पासित्त'त्ति दृष्ट्वा, ।। कोऽर्थः -उक्तविशेषणविशिष्टान् हदि निधाय 'सः' इति भगवानरिष्टनेमिमहती प्रज्ञा-प्रक्रमान्मतिश्रुतावधिज्ञान
यात्मिका यस्थासौ महाप्रज्ञः 'सारथि प्रवर्तयितारं प्रक्रमाद्गन्धहस्तिनो हस्तिपकमितियावत्, यद्वाऽत एव तदा रथारोहणमनुमीयत इति रथप्रवर्त्तयितारम् । 'कस्सट्टत्ति कस्य 'अर्थात् निमित्तादिमे प्राणाः, एते सर्वे 'इमे ६. इत्यनेनैव च गते एते इति पुनरभिधानमतिसाहृदयतया पुनः पुनस्त एवं भगवतो हृदि विपरिवर्तन्त इति
ख्यापनार्थ, यदिवा 'इमे' प्रत्यक्षाः 'एते' समीपतरवर्तिनः, उक्तं हि "इदमः प्रत्यक्षगतं समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्,” पठ्यते च-'बहुपाणेत्ति प्रतीतं, 'सुखैपिणः' साताभिलापिणः 'सन्निरुद्धे यत्ति सन्निरुद्धाः 'च' पूरणे 'अच्छिहित्ति आसत इति पोडशसूत्रार्थः ॥ एवं च भगवतोक्त___ अह सारही तओ भणह, एए भद्दा उ पाणिणो । तुझं विवाहकजंमि, भोआवेउं पहुं जणं ॥ १७॥ |
सुगममेव, नवरम् 'अर्थ' इति भगवद्वचनानन्तरं 'भद्दा उ'त्ति 'भद्रा एव' कल्याणा एव न तु श्वश्गालादय एव कुत्सिताः. अनपराधतया वा भद्रा इत्युक्तं भवति, तब विवाहकार्य' परिणयनरूपप्रयोजने 'भोयावेति भोजयितुम् , अनेन यदुक्तं 'कखार्थादिति तत्प्रत्युत्तरमुक्तमिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं सारथिनोक्ते यद्भगवान् पिहितांस्तदाह
सोऊण तस्स वयणं, बहुपाणिविणासणं । चितेइ से महापन्ने, साणुकोसे जिएहि उ॥१८॥ जइ मज्झ
दीप
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अनुक्रम [७९७-८१२]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||१८-२४|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
प्रत
याध्य
सूत्रांक
२२
||१८
-२४||
उत्तराध्य. कारणा एए, हम्मति सुबह जिया । न मे एयं तु निस्सेसं, परलोगे भविस्सई ॥१९॥ सो कुंडलाण जुयलं,मारपसी बृहद्धृत्तिः
सुत्तगं च महायसो । आभरणाणि य सब्वाणि, सारहिस्स पणामई ।। २०॥ मणपरिणामो अकओ, देवा यश
जहोइयं समोइन्ना । सब्बिड्डीइ सपरिसा, निक्खमणं तस्स काउंजे ॥२१॥ देवमणुस्सपरिवुडो, सिविया- ॥४९॥ कारयणं तओ समारूढो । निक्खमिय बारगाओ, रेवययंमि ठिओ भयवं ॥२२॥ उजाणे संपत्तो, ओइन्नो
उत्तमाउ सीयाओ। साहस्सीए परिवुडो अह निक्खमइ उ चित्ताहिं ॥ २३ ॥ अह सो सुगंधगंधिए तुरियं मउअकुंचिए । सयमेव लुचई केसे, पंचट्ठीहि समाहिओ॥२४॥
सुगममेव नवरं 'तस्य' इति सारथेः बहूनां-प्रभूतानां प्राणानां-प्राणिनां विनाशनं-हननमर्यादभिधेयं यस्मिंस्तद्वहुप्राणविनाशनं 'सः' भगवान् 'सानुक्रोशः' सकरुणः, केषु?-'जिएहि उति जीवेषु 'तु' पूरणे ॥ मम कारणादितितोमद्विवाहप्रयोजने भोजनार्थत्वादमीषामित्यभिप्रायः, 'हम्मंति'त्ति हन्यन्ते वर्तमानसामीप्ये लट्, ततो हनिष्यन्त इत्यर्थः, पाठान्तरतः 'हम्मिहति'त्ति स्पष्टं, 'सुबहवः' अतिप्रभूताः 'जिय'त्ति जीवाः, एतदिति जीवहननं 'तुः' एव-11 कारार्थों नेत्यनेन योज्यते, ततः 'न तु' नैव 'निस्सेसं'ति 'निःश्रेयसं' कल्याणं परलोके भविष्यति, पापहेतुत्वादस्वेति ॥४ भावः, भवान्तरेषु परलोकभीरुत्यस्यात्यन्तमभ्यस्ततयैवमभिधानमन्यथा चरमशरीरत्वादतिशयज्ञानित्वाच भगवतः
१ सवाणि
दीप अनुक्रम
SSC
[८१४
-८२०]
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||१८-२४|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
-
||१८-२४||
-
कुत एवंविधचिन्ताबसरः १, एवं च विदितभगवदाकूतेन सारथिना मोचितेषु सत्तेपु परितोषितोऽसौ यत्ततास्तदाह-'सो' इत्यादि 'सुत्तकं चेति कटीसूत्रम् , अर्पयतीति योगः, किमेतदवेत्साह-आभरणानि च सर्वाणि शेषा
पीति गम्यते. ततश्च मनःपरिणामश्च' अभिप्रायः कृतो निष्क्रमणं प्रतीति गम्यते, 'देवाः' चतुर्निकाया एवं 'यथो-131 दाचितम्' औचित्यानतिक्रमेण समवतीर्णाः, पाठान्तरतः समयपतिताः, चकाराभ्यां चेह समुच्चयार्थाभ्यामपि नल्य
कालताया ध्वन्यमानत्वात्तदैवेति गम्यते, 'सर्वज्यो' समस्तविभूत्या 'सपरिषदः' बाबमध्याभ्यन्तरपर्पयोपेताः 'निष्क्रमणम्' इति प्रक्रमान्निष्क्रमणमहिमानं 'तस्य' इति भगवतोऽरिष्टनेमिनः कत्तु 'जे' इति निपातः पूरणे। शिविकारलं' देवनिर्मितमुत्तरकुरुनामकमिति गम्यते, 'ततः' तदनन्तरं 'समारूढः' अध्यासीनः 'निष्क्रम्य' निर्गत्य 'द्वारकात' द्वारकापर्याः 'रैवतके' उजयन्ते 'स्थितः' गमनानिवृत्तः । तत्रापि कतर प्रदेश प्रासः स्थित इत्साह-'उद्यान'
सहस्राम्रवणनामकं संप्राप्तः, तत्र चावतीर्णः 'सीयातो'त्ति शिविकातः 'साहस्सीय'त्ति सहस्रेण प्रधानपुरुषाणामिति || शेषः परिवृतः' परिवेष्टितः 'अथे' त्यानन्तर्ये 'निष्कामति' श्रामण्यं प्रतिपद्यते 'तुः पूरणे 'चित्ताहिति चित्रास चित्रानानि नक्षत्रे । कथमित्याह-'सुगन्धिगन्धिकान्' स्वभावत एव सुरभिगन्धीन् 'त्वरित' शीभं 'मृदकत्वकचितान' कोमलकुटिलान् 'खयमेव' आत्मनैव 'लुञ्चति' अपनयति केशान् 'पञ्चाशभिः'-पञ्चमुष्टिभिः 'समाहितः समाधिमान्, सर्व सावा ममाकर्तव्यमिति प्रतिज्ञारोहणोपलक्षणमेतत् । इह तु बन्दिकाचार्यः सत्यमोचनसमये
दीप अनुक्रम
RSSKAROGRESS
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-८२०]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||२५-२७|| नियुक्ति: [४३९...
याध्य
सूत्रांक
२२
||२५-२७||
उत्तराध्य. सारखतादिप्रबोधनभवनगमनमहादानानन्तरं निष्क्रमणाय पुरीनिर्गममुपवर्णयांबभूवेति सूत्रसप्तकार्थः ॥ एवं च रथनेमीबृहद्वृत्तिः
प्रतिपन्नप्रव्रज्ये भगवति15वासुदेवो अणं भणई, लुत्तकेसं जिइंदियं । इच्छियमणोरहे तुरिपं, पावसू तं दमीसरा! ॥२५॥ नाणेणं ॥४९॥ इदसणेणं च, चरित्तेणं तवेण य । खंतीए मुत्तीए, बद्धमाणो भवाहि य ॥ २६॥ एवं ते रामकेसवा, दसारा य:
यह जणा। अरिट्टनेमि वंदित्ता, अइगया वारगाउरिं ॥२७॥ । सूत्रत्रयं स्पष्टं, नवरं वासुदेवश्चेति चशब्दावलभद्रसमुद्रविजयादयश्च 'लुप्तकेशम्' अपनीतशिरोरुहं ईप्सितः-अभि-10
लपितः स चासौ मनोरथश्च भगवन्मनोरथविषयत्वान्मुक्तिरूपोऽर्थ ईप्सितमनोरथस्तं 'तुरिय'ति त्वरितं 'पावसु'त्ति प्रामुहि, आशीर्वचनत्वादस्य आशिषि लिट्लोटा'वित्याशिपि लोट् । 'तम्' इति संवर्द्धमानः' इति वृद्धिभाक् 'भवाहि यत्ति भव, चशब्द आशीर्वादान्तरसमुचये । 'एवम्' उक्तप्रकारेण वन्दित्वा' स्तुत्वेति योगः, इह चैवंविधाशीर्वचनानामपि गुणोत्कर्पसूचकत्वेन सपनरूपत्वमविरुद्धमिति भावनीयं, 'दसारा यत्ति दशार्हाः, चशब्दो भिन्नक्रम
॥४९॥ दस्ततः 'बहु'त्ति बहवो जनाश्च 'अतिगताः' प्रविष्टा इति सूत्रत्रयार्थः ॥ तदा च कीरशी सती राजीमती किमचेएतेत्याह
सोऊण रापकना, पवन सा जिणस्स उ । पीहासा उ निराणंदा, सोगेण उ समुपिछया ॥ २८ ॥
दीप अनुक्रम
[८२१
-८२३]
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [--1 / गाथा ||२८-३०|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||२८-३०||
SCIENCE
राईमई विचिंतेइ, धिरत्थु मम जीवियं । जाऽहं तेणं परिचत्ता, सेयं पबह मम ॥ २९ ॥ अह सा भमरसनिभे, कुचफणगप्पसाहिए । सयमेव लुचई केसे, धिहमंती ववस्सिया ॥३०॥
सूत्रत्रयं स्पष्ट, नवरं निष्क्रान्ता हासान्निर्हासा, चशब्दो भिन्नक्रमस्ततो निरानन्दा च, 'समवसृता' अवष्टब्धा । दधिगस्तु मम जीवितमिति खजीवितनिन्दोद्भावकं खेदवचो, याऽहं तेन परित्यक्तेति खेदहेतूपदर्शनं, ततश्च 'श्रेयः'
अतिशयप्रशस्यं 'प्रत्रजितुं' प्रवज्यां प्रतिपत्तुं मम येनान्यजन्मन्यपि नैवं दुःखभागिनी भवेयमिति भावः । इत्थं चासौ ताबदबस्थिता यावदन्यत्र प्रविहत्य तत्रैय भगवानाजगाम, तत उत्पन्नकेवलस्य भगवतो निशम्य देशनांY विशेषत उत्पन्नवैराग्या किं कृतवतीत्साह-'अहे त्यादि, 'अर्थ' अनन्तरं 'सा' राजीमती 'भ्रमरसन्निभान्' कृष्णतया |आकुञ्चिततया च, कूर्ची-गूढकेशोन्मोचको वंशमयः फणकः-कङ्कतकस्ताभ्यां प्रसाधिताः-संस्कृता ये तान् । 'वयम्' आत्मनैव 'लुञ्चति' अपनयति, भगवदनुज्ञयेति गम्यते, 'केशान्' कचान् ‘धिइमंति'त्ति धृतिमती व्यवसि| तेति-अध्यवसिता सती, धर्म विधातुमिति शेष इति सूत्रत्रयार्थः । तत्प्रव्रज्याप्रतिपत्तौ च| वासुदेवो अणं भणइ, लुत्तकेसि जिइंदियं । संसारसागरं घोरं, तर कन्ने ! लहुं लहुं ॥३१॥
स्पष्टमेव, नवरं 'तर' इत्युलइय, आशीर्वचनत्वादयमप्याशिषि लोद, 'लघु लघु' त्वरितं त्वरितं, संभ्रमे द्विवचन8 मिति सूत्रार्थः । तदुत्तरवक्तन्यतामाह
दीप अनुक्रम
[८२४
-८२६]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||३१-३५|| नियुक्ति: [४३९...]
प्रत
२२
सूत्रांक
-३५||
RT सा पब्बईया संती, पवावेसी तहिं बहुं । सयणं परियणं चेव, सीलवंता बहुस्सुआ ॥३२॥ गिरिं रेवययं रथनेमी
जंती, वासेणोल्ला उ अंतरा । वासंते अंधयारंमि, अंतो लयणस्स सा ठिया ॥३३॥चीवराणि विसारंती. बृहद्वृत्तिः
भयाध्य ४ जहा जायत्ति पासिया । रहनेमी भग्गचित्तो, पच्छा दिट्टो अतीइवि ।। ३४ ।। भीया य सा तहिं दई, एगते ॥४९३॥ संजय तयं । चाहाहिं काउं संगुप्फं, वेवमाणी निसीयई ॥ ३५ ॥
है। सूत्रचतुष्टयं स्पष्टमेव, नवरं 'सा' इति राजीमती 'पवावेसित्ति प्राविव्रजत्-प्रत्राजितवती 'तहिंति तस्यां द्वारका
पुरि । 'रैवतकम्' उजयन्तं 'यान्ती' गच्छन्ती, भगवद्वन्दनार्थमिति गम्यते, 'वण' वृष्ट्या 'उल'त्ति आर्द्रा स्तिमित
सकलचीयरेतियावत् , 'अन्तरे' त्यन्तरालेऽर्द्धपथ इत्यर्थः, 'वासंति'त्ति वर्षति, नीरद इति गम्यते, 'अन्धकारे' अपदिगतप्रकाशे, कस्मिन् ?-'अन्तः' मध्ये, उक्तं हि, 'अन्तःशब्दोऽधिकरणप्रधानं मध्यमाह' लयनमिह गुहा तस्यां |
'सा' राजीमती 'स्थिता' इत्यासिता, असंयमभीरुतयेति गम्यते, तत्र च 'चीवराणि सङ्घाख्यादिवस्त्राणि 'विसारनयन्ती' विस्तारयन्ती अत एव 'यथाजाता' अनाच्छादितशरीरतया जन्मावस्थोपमा 'इती' सेवंरूपा 'पासिय'त्ति
दृष्ट्वा(टा), तद्दर्शनाच 'रथनेमिः' रथनेमिनामा मुनिः 'भग्नचित्तः भग्नपरिणामः सन् प्रक्रमात्संयम प्रति, स हि तामुदा-3॥४९३॥ ररूपामवलोक्य समुत्पन्नतदभिलाषातिरेकः परवशमनाः समजनि, पश्चादृष्टश्च 'तया' राजीमत्या 'अपि' पुनरर्थे, प्रथ-| दमप्रविष्टैर्हि नान्धकारप्रदेशे किञ्चिदवलोक्यते, अन्यथा हि वर्षणसम्भ्रमादन्यान्याश्रयगतासु शेषसाध्वीवेकाकिनी
SCOM MARA
दीप अनुक्रम [८२७-८३१]]
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||३६-३८|| नियुक्ति: [४३९...]
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प्रत सूत्रांक
||३६
-३८||
प्रविशेदपि न तत्रेयमिति भावः, भीता च मा कदाचिदसौ मम शीलभङ्गं विधास्यतीति, 'तस्मिन्' इति लयने ।। रवा 'एकान्ते' विविक्ते 'तकम्' इति रथनेमि, किं कृतवत्यसावित्याह-'बाहाहिति बाहुभ्यां कृत्वा 'संगोप' पर-13
स्परबाहुगुम्फनं स्तनोपरिमर्कटबन्धमितियावत्, 'वेपमाना' शीलभङ्गभयात्कम्पमाना 'निषीदति' उपविशति, तदा४ श्लेषादिपरिहारार्थमिति भाव इति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ अत्रान्तरे१॥ अह सोऽपि रायपुत्तो, समुद्दविजयंगओ। भीयं पवेविरं दई, इमं वकमुदाहरे ॥ ३६॥ रहनेमी अहं
भद्दे, सुरूवे ! चारुमासिणी! । ममं भयाहि सुअणु, न ते पीला भविस्सई॥३७॥ एहि ता भुजिमो |भोगे, माणुस्सं खु सुदुल्लह । भुत्तभोगा पुणो पच्छा, जिणमग्गं चरिस्सिमो ॥ ३८॥ | अथ च 'सोऽपी'ति स पुनः राजपुत्रः' रथनेमिः भीतां प्रवेपितां च प्रक्रमाद्राजीमतीम् 'उदाहरे'त्ति उदाहरत्-उक्तवान्, किं तदित्याह-रथनेमिरहमिति, अनेनात्मनि रूपवत्त्वाद्यभिमानतः स्वप्रकाशनं तस्याभिलापोत्पादनाथ विश्वासविशसनहेत्वन्यशङ्कानिरासार्थ वा खनामख्यापन, 'मम'ति मां 'भजख' सेवख सुतनु ! न 'ते' तव
पीडा' वाधा भविष्यति, सुखहेतुत्वाद्विषयसेवनखेति भावः, यद्वा तां ससम्भ्रमां दृष्ट्वैवमाह-'म म भयाहि'त्ति मा दिमा भैषीः सुतनु ! यतो न 'ते' तव पीडा भविष्यति, कस्यचिदिह पीडाहेतोरभावात् , पीडया शङ्कया च भयं स्यादि
त्येवमुक्तम् , 'एहि आगच्छ 'ता' इति तस्माचावद्दा मानुष्यं 'खुः' इति निश्चितं सुदुर्लभ, तदेतदवाप्साविदमपि
%
दीप अनुक्रम [८३२-८३४]
6%
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||३९-४५|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
याध्य०
प्रत सूत्रांक
२२
||३९
-४५||
उत्तराध्य
तावद्भोगलक्षणमस्य फलमुपभुञ्जमहे इत्याशयः, भुक्तभोगाः पुनः ‘पश्चाद्' इति वाक्ये 'जिनमार्ग' जिनोक्तमुक्ति- रथनेमी
पथं 'चरिस्सामो'त्ति चरिष्यामः, शेषं स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ ततो राजीमती किमचेष्टतेत्याहबृहद्वृत्तिः
| दङ्ण रहनेमि तं, भग्गुजोयपराइयं । राईमई असंभंता, अप्पाणं संवरे तहिं ॥ ३९ ॥ अह सा रायवर, ॥४९४॥ कन्ना, सुट्टिया नियमब्वए । जाई कुलं च सीलं च, रक्खमाणी तयं वदे ॥४०॥ जइऽसि रूवेण चेसमणो,
ललिएण नलकूबरो।तहावि ते न इच्छामि, जइऽसि सक्खं पुरंदरो॥४१॥ धिरत्धु ते जसो कामी, जो
तं जीवियकारणा। वंतं इच्छसि आवेडं, सेयं ते मरणं भवे ॥ ४२ ॥ अहं च भोगरायस्स, तं चऽसि अंधगवलहिणो । मा कुले गन्धणा होमो, संजमं निहुओ चर ॥ ४३ ॥ जइतं काहिसि भावं, जा जा दिच्छसि।
नारिओ। वायाविद्धव्व हडो, अट्टिअप्पा भविस्ससि ॥४४|| गोवालो भंडवालो वा, जहा तहबऽणिस्सरो। एवं अणीसरो तपि, सामन्नस्स भविस्ससि ॥४५॥ अत्र एका प्रक्षेपगाथा वर्तते, देखो हमारा “आगममुत्ताणि" । सूत्रसप्तकं पाठसिद्धं, नवरं 'भग्गुजोयपराइयंति भनोद्योगः-अपगतोत्साहः प्रस्तावासंयम स चासी पराजि
तश्च-अभिभूतः खीपरीपहेण भग्नोद्योगपराजितस्तम् 'असम्भ्रान्ता' नायं बलादकार्ये प्रवर्त्तयितेत्यभिप्रायेणात्रस्ता ॥४९॥ S'आत्मानं खं 'संबरे'त्ति समवारीत-आच्छादितवती चीवरैरिति गम्यते, 'तस्मिन' इति लयनमध्ये पीडया शङ्कया।
च भयं स्यादित्येवमुक्तं । 'मुस्थिता' निश्चला 'नियमनते' इतीन्द्रियनोइन्द्रियनियमने प्रव्रज्यायां च जाति कुलं शीलं
दीप अनुक्रम [८३५-८४१]
For PF
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||३९-४५|| नियुक्ति: [४३९...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||३९
-४५||
च रक्खमाणी'त्ति रक्षन्ती, शीलध्वंसे हि कदाचिदस्या एवंविधैव जातिः कुलं चेति सम्भावनातस्ते अपि विना
शिते स्यातामित्येवमुक्तं, यद्यपि 'असि' भयसि 'रूपेण' आकारसौन्दर्येण 'वैश्रमणः' धनदः 'ललितेन' सबिलासचे-4 ४टितेन 'नलकूबरः' देवविशेषः 'ते' इति त्वां साक्षात्' समक्षः 'पुरन्दरः' इन्द्रो रूपाद्यनेकगुणाश्रयो य इति भावः,
रूपाद्यभिमानी चायमित्येवमुक्तः ॥ अपरं च-धिगस्तु 'ते' तव पौरुषमिति गम्यते, अयशःकामिन्निव अयशःकामिन् !|अकीर्त्यभिलाषिन् !, दुराचारवान्छितया, यद्वा 'ते' तव यशो-महाकुलसंभवोद्भूतं धिगस्त्विति सम्बन्धः 'कामिन् !' | भोगाभिलाषिन् ! 'जीवितकारणात्' जीवितनिमित्तमाश्रित्य, तदनासेवने हि तथाविधदशावाप्तौ मरणमपि स्वादिहत्येवमभिधानं, 'वान्तम्' उद्गीर्ण यत् शृगालैरपि परिहृतं तदिच्छस्थापातुं, यथा हि कश्चिद्वान्तमापातुमिच्छ सेवं
भवानपि प्रव्रज्याग्रहणतस्त्यक्तान भोगान् पुनरापातुमिवापातुम्-उपभोक्तुमिच्छति अतः श्रेयः' कल्याणं 'ते' तव मरणं| द भवेत्, न तु वान्तापानं, ततो मरणस्यैवाल्पदोषत्वात्, अनूदितं चैतद्-"विज्ञाय वस्तु निन्धं त्यक्त्वा गृह्णन्ति किं| क्वचित्पुरुषाः ? । वान्तं पुनरपि भुङ्क्तेन च सर्वः सारमेयोऽपि ॥१॥" 'अहमि' त्यात्मनिर्देशे 'च' पूरणे 'भोजराजस्य' उग्रसेनस्य त्वं च 'असि' भवसि अन्धकवृष्णः, कुले जात इत्युभयत्र शेषः, अतश्च 'मा' इति निषेधे 'कुले अन्वये 'गंधणे'त्ति 'गन्धनानां सर्पविशेषाणां 'होमोत्ति भूव. तवेष्टितानुकारितयेति भावः, ते हि वान्तमपि विष
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दीप अनुक्रम [८३५-८४१]
4
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [--1 / गाथा ||३९-४५|| नियुक्ति: [४३९...]
प्रत
ACK
सूत्रांक ||३९
-४५||
उत्तराध्य.
ज्वलद्वह्निपातभीरतया पुनरपि पिबन्ति, तथा च बद्धाः-"सप्पाणं किल दो जाईओ-गंधणा य अगंधणा य, सत्वरथनेमीबृहद्वृत्तिः गंधणा णाम जे डसिए मंतेहिं आकड्डिया तं विसं षणमुहातो आवियंति, अगंधणा उण अवि मरणमझवसंति भय
याध्य चंतमाइयंति।" किं तर्हि कृत्यमित्याह-संयम निभृतः-स्थिरः 'चर' आसेवख, यदि त्वं 'भावं' प्रक्रमाद्भोगाभिला॥४९५॥
परूपं या याः 'दिच्छसित्ति द्रक्ष्यसि तासु ताखिति गम्यते, ततः किमित्याह-वातेनाविद्धः-समन्तात्ताडितो वाताविद्धो भ्रमित इतियावत् हठो-वनस्पतिविशेषः स इवास्थितात्मा-चञ्चलचित्ततयाऽस्थिरखभावः । 'गोपालः' यो गाः पालयति 'भाण्डपालो वा' यः परकीयानि भाण्डानि भाटकादिना पालयति, पठ्यते च-'दण्डपालो वा' नगररक्षको वा यथा 'तद्न्यस्य गवादेः सततरक्षणीयस्य 'अनीश्वरः' अप्रभुः, विशिष्टतत्फलोपभोगाभावात्, एवमनीश्वरस्त्वमपि श्रामण्यस्य भविष्यसि, भोगामिलापतस्तत्फलस्थापि विशिष्टस्वाभावादिति भाव इति सूत्रसप्तकार्थः ॥ एवं तयोक्तो रथनेमिः किं कृतवानित्याह
तीसे सो वपणं सुचा, संजईए सुभासियं । अंकुसेण जहा नागो, धम्मे संपडिवाइओ॥ ४६॥ मणगुत्तो वयगुत्तो, कायगुत्तो जिइंदिओ। सामन्नं निचलं फासे, जावजीवं दढण्यओ ॥ ४७ ।।
॥४९५॥ १ सणां किल व जाती-गन्धनाश्व अगन्धनाच, तत्र गन्धना नाम ये दष्टा मौराकृष्टास्तद्विषं त्रणमुखादापिबन्ति, अगन्धनाः पुनः अपि | * मरणमध्यवस्यन्ति न च वान्तमापिबन्ति
दीप अनुक्रम [८३५-८४१]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-] / गाथा ||४६-४७|| नियुक्ति: [४३९...]
प्रत
सूत्रांक ॥४६
-४७||
सूत्रद्वयम् 'तस्याः' राजीमत्याः 'सः' रथनेमिः 'वचनम्' अनन्तरोक्तानुशिष्टिरूपं श्रुत्वा' आकर्ण्य 'संयतायाः' प्रत्रजितायाः सुष्टु-संवेगजनकत्वेन भाषितम्-उक्तं सुभाषितम् ‘अङ्कशेन'प्रतीतेन यथा नागः' हस्ती पथीति शेषः, एवं 'धर्म' चारित्रधर्मे 'संपडिवाइओ'त्ति संप्रतियातितः' संस्थितः, तद्वचसैवेति गम्यते । अत्र च वृद्धसंप्रदायः-"णेउरपंडियाक्खाणययं भणिऊण जाव ततो रुटेण राइणा देवी मेंठो हत्थी य तिन्निवि छिन्नकडगे चडावियाणि, भणिओ य मेंठो-एत्थं वाहेहि हत्थिं, दोहि य पासेहिं येणुग्गहा टविया, जाब एगो पाओ आगासे ठविओ, जणो भणइ-किं एस तिरियो जाणइ ?, एयाणि मारेयवाणि, तहावि राया रोसं न मुञ्चति, ततो अतिन्नि पाया आयासे कया, एगेण ठितो, लोगेण| अक्कंदो कतो-किमयं हत्थिरयणं वायाइजति ?, रण्णा मिठो भणिओ-तरसि णियत्तेउं ?, भणइ-अप दुयग्गाणवि अभयं देसि, दिण्णं, ततो तेण अंकुसेण नियत्तिओ हस्थित्ति ।" इह चायमभिप्रायः-यथाऽयमीरगवस्थो द्विपोऽङ्कुशवशतः पथि संस्थित एवमयमप्युत्पन्नविश्रोतसिकस्तद्वचनेन अहितप्रवृत्तिनिवर्तकतयाऽशप्रायेण धर्म इति,
१नपुरपण्डिताख्यानक भणित्वा यायत्ततो रुष्टेन राज्ञा देवी हस्तिपकः हस्ती च त्रयोऽपि छिन्नकटके आरोहिताः, भणितश्च हस्तिपक:अत्र पातय हस्तिनं, द्वयोश्च पार्श्वयोः वंशग्राहाः स्थापिताः, यावदेकः पादः आकाशे स्थापितः, जनो भणति-किमेष तिर्य जानाति !, एते मारयितब्ये, तथापि राजा रोष न मुञ्चति, ततश्च त्रयः पादा आकाशे कृताः, एकेन खितः, लोकेनाकन्दः कृतः-किमेतत् हस्तिरनं व्यापाद्यते ?, राज्ञा मेण्ठो भणित:- शक्नोषि निवर्तयितुं , भणति-यदि द्वयोरप्यभयं ददासि, दत्तं, तत्तलेनाहशेन निवर्तितो हस्तीति ।
दीप अनुक्रम [८४३-८४४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [२२], मूलं [-1 / गाथा ||४८|| नियुक्ति: [४४३-४४७]
(४३)
उत्तराध्य.
RECG
बृहद्वृत्तिः
याध्य
॥४९६||
प्रत सूत्रांक ||४८||
ततश्च श्रामण्यं 'निश्चलं' स्थिरं 'फासे'त्ति अस्पाक्षीद-आसेवितवान् , शेषं स्पष्टमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ उभयोरप्युत्तर- रथनेमीवक्तव्यतामाह
उग्गं तवं चरित्ता णं, जाया दुन्निवि केवली । सव्वं कम्म खवित्ता णं, सिद्धिं पत्ता अणुत्तरं ॥४८॥ उग्रं कर्मरिपुदारणतया 'तपः' अनशनादि 'चरित्ता णति चरित्वा 'जातो' भूतौ 'द्वावपीति रथनेमिराजीमत्या |'केवली'ति केवलिनी 'सर्व' निरवशेषं 'कर्म' भयोपग्राहि 'खवित्ता णं'ति क्षपयित्वा सिद्धि प्राप्तावनुत्तरामिति सूत्रार्थः ।। सम्प्रति नियुक्तिरनुश्रियतेसोरियपुरंमि नयरे आसी राया समुदविजओत्ति। तस्सासि अग्गमहिसी सिवत्ति देवी अणुजंगी ४४३३ तेसिं पुत्ता चउरो अरिटुनेमी तहेव रहनेमी। तइओ अ सच्चनेमी चउत्थओ होइ दढनेमी ॥४४॥ जो सो अरिटुनेमी बावीसइमो अहेसि सो अरिहा । रहनेमि सच्चनेमी एए पत्तेयबुद्धा उ॥ ४४५॥ रहनेमिस्स भगवओ गिहत्थए चउर इंति वाससया।संवच्छर छउमत्थो पंचसए केवली हुंति ॥४४६४९६॥ नववाससए वासाहिए उ सवाउगस्स नायवं । एसो उ चेव कालो रायमईए उ नायवो ॥ ४४७॥
अत्र च प्रथमगाधया रचनेमेरन्वय उक्तः । तेर्सि'ति 'तयोः' समुद्रविजयशियादेव्योः, प्रसङ्गतश्चेह शेषपुत्राभिधा
दीप अनुक्रम [८४५]
SARKAR
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
मूल संपादने अस्य आगमे नियुक्ति क्रमांकन संबंधे अनेक स्थाने मुद्रण दोष: प्रवर्तते, अत्र ||४४०..|| स्थाने ||४४३..|| मुद्रितं
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२२], मूलं [-1 / गाथा ||४९|| नियुक्ति: [४४३-४४७]
(४३)
S
-54
प्रत सूत्रांक ||४९||
नम् , 'अहेसित्ति अभूत्, इह च यदरिष्टनेमेरहत्त्वं रथनेमेश्च प्रत्येकबुद्धत्वमुक्तं तदहझातृत्वेन खगुणप्रकर्षेण च रथनमेाहात्म्यख्यापनार्थम् । चतुर्थगाथया पर्यायपरिमाणाभिधानं, तत्र चत्वारि वर्षशतानि गृहस्थपर्यायः वर्ष छद्मस्थपर्यायः वर्षशतकपञ्चकं केवलिपर्याय इति मिलितानि नव वर्षशतानि वर्षाधिकानि सर्वायुरभिहितम्, एष 'चैवविति चतुशब्दी पूरणे, तत एष एव च वर्षाधिकवर्षशतनवकलक्षणः, शेषं स्पष्टमिति गाथापञ्चकार्थः ॥ सम्प्रति प्रतिभन्मपरिणामतया मा भूद्रथनेमौ कस्यचिदबजेति सूत्रकृदाहएवं करेंति संबुद्धा, पंडिया पविपक्षणा । विनियति भोगेसुं, जहा सो पुरुसोत्तमो॥४९॥ त्तिमि
॥ रहनेमिजं ॥ २२ ॥ 'एवम्' इति वक्ष्यमाणं 'कुर्वन्ति' विदधति 'संबुद्धाः' बोधिलाभतः पण्डिताः' बुद्धिमत्त्वेन 'प्रविचक्षणाः' प्रकर्षण शास्त्रज्ञतया न त्वनीदृशाः, किमित्याह-विशेषेण कथञ्चिद्विश्रोतसिकोत्पत्तावपि तन्निरोधलक्षणेन निवत्तन्ते, 'भोगेसुन्ति भोगेभ्यो यथा सः 'पुरुषोत्तमो' रथनेमिः, अनीशा झेकदा भग्नपरिणामा न पुनः संयमे प्रवर्तितुं क्षमाः, ततो भोगविनिवर्तनात् संबुद्धादिविशेषणान्वितत्वेन कथमयमवज्ञास्पदं भवेदिति भावः, उपदेशपरतया वा प्राग्वद्याख्येयमिति सूत्रार्थः ॥ 'इति' परिसमाप्तौ, ब्रवीमीति पूर्ववत्, उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां द्वाविंशतितममध्ययनं समासमिति ॥२२॥
CAMERAXX
-5
दीप अनुक्रम [८४६]]
For Pro
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- २२ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||४९...|| नियुक्ति: [४४८-४५०]
उत्तराध्य. बृहद्धृत्तिः
अथ त्रयोविंशं केशिगौतमीयमध्ययनम् ।
केशीगौस
मीयाध्य
॥४९७॥
प्रत सूत्रांक ||४९||
**
व्याख्यातं रथनेमीयनामकं द्वाविंशतितममध्ययनम् , अधुना त्रयोविंशतितममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-13 इहानन्तराध्ययने कथञ्चिदुत्पन्नविश्रोतसिकेनापि रथनेमिवद् धृतिश्चरणे विधेयेत्यभिहितम् , इह तु परेषामपि चित्त-| पिठतिमुपलभ्य केशिगौतमवत्तदपनयनाय यतितव्यमित्यभिप्रायेण यथा शिष्यसंशयोत्पत्ती केशिपृष्टेन गौतमेन| धर्मस्तदुपयोगि च लिङ्गादि वर्णितं तथाऽनेनाभिधीयत इत्यमुना सम्बन्धन प्राप्तस्यास्याध्यनस्य प्राग्वदुपक्रमादि | प्रतिपाद्यं यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे केशिगौतमीयमिति नाम, अतः केशिगौतमशब्दयोनिक्षेपोऽभिधेयः, तत्र च वर्तमानतीर्थाधिपप्रथमगणधरतयैतत्तीर्थापेक्षया गौतमस्य ज्येष्ठत्वादादौ तदभिधानस्य तदनु केशिशब्दस्य निक्षे४ापमाह नियुक्तिकृत्A निक्खेवो गोअमंमी चउक्कओ दुवि०॥ ४४८॥ जाण० ॥ ४४९ ॥
गोयमनामागोयं वेयंतो भावगोयमो होइ । एमेव य केसिस्सवि निक्खेवो चउक्कओ होइ ॥ ४५०॥
दीप अनुक्रम [८४६]]
*
॥४९७॥
*
JAINEducatan intainmalaima
For PF
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं - २३ "केशिगौतमीय" आरभ्यते
-~-29~
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [४५१]
(४३)
*
प्रत
सत्राक
4
||१||
गाथात्रयं प्राग्वन्नवरं गौतमामिलाप एव विशेषः, 'एवमेव' उक्तप्रकारेणैव 'केशेरपि' केशिशब्दस्यापि निक्षेप(:)चतुकको भवति, ज्ञातव्य इति शेषः, गाथात्रयार्थः॥ नामान्यर्धमाहगोअम केसीओ आ संवायसमुट्रियं तु जम्हेयं । तो केसिगोयमिज अज्झयणं होइ नायवं ॥ १५१॥ | गौतमात् केशिनश्च संवादः-परस्परभाषणं वचनक्यं वा यतस्तयोस्तात्पर्यत एकार्थाभिधायितय(ते)ततः संवादात्समुत्थितम्-उत्पन्नं संवादसमुत्थितम् , अनेन भावार्थ उक्तः, तुः अवधारणे, ततो गौतमारकेशिनश्च संवादसमुधितमेव यस्मादेतत्-प्रस्तुतं ततः केशिगीतमयोर्भवमित्यर्थे 'नामधेयेन नामधेयत्वेऽस्येति वृद्धसम्ज्ञत्वात् , 'वृद्धाच्छः' (पा०४-२-११४) इति छप्रत्यये केशिगौतमीयमध्ययनं 'भवति' ज्ञातव्यमिति गाथार्थः ॥ उक्तो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, इदानीं सूत्रालापकनिष्पन्ननिक्षेपावसरः, स च सूत्रे सति भवतीति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तवेदम्
जिणे पासित्ति नामेणं, अरहा लोगपूइए । संबुद्धप्पा य सम्वन्न, धम्मतित्थयरे जिणे ॥१॥ | 'जिनः' परीपहोपसर्गजेता पार्थ इति नामाऽभूदिति शेषः, स चान्योऽपि संभवत्यत आह-अर्हति देवेन्द्रादिविदहितानि बन्दननमस्करणादीन्यहन् तीर्थकृदित्यर्थः, अत एव लोकपूजितः संबुद्धः-तत्त्वावगमवानात्माऽस्येति संबु
द्वात्मा, 'चः पूरणे, स चानुत्पन्न केवलोऽपि स्यादित्याह-'सर्वज्ञः' सकलद्रव्यपर्यायवित् , तथा धर्म एव तीर्यते भवाम्भोधिरनेनेति तीर्थ धर्मतीर्थ तत्करणशीलो धर्मतीर्थकर 'जिनः' जितसकलकर्मा, भवोपग्राहिकर्मणामपि दग्धर
दीप अनुक्रम [८४७]
For PF
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||२-४|| नियुक्ति: [४५१...]
(४३)
उत्तराध्य. वृहद्भुत्तिः
प्रत
॥४९८॥
२३
सूत्रांक
||२-४||
जुसंस्थानतयैव तेन व्यवस्थापनात् , मुक्त्यवस्थाऽपेक्षया का, पठ्यते च-'अरिहा लोयविस्सुए। सचन्नू सपदंसी य, | केशीगीतधम्मतित्थस्स देसए ॥' स्पष्टमेवेति सूत्रार्थः ॥ ततः किमित्याहतस्स लोगपईवस्स, आसि सीसे महायसे । केसी कुमारसमणे, विजाचरणपारगे ॥२॥ ओहिनाणसुए बुद्धे,
मीयाध्य सीससंघसमाउले । गामाणुगाम रीयंते, सेऽवि सावत्थिमागए ॥३॥ तिदुयं नाम उजाणं, तंमि नघरमंडले । फासुएसिजसंधारे, तत्थ वासमुवागए ॥ ४॥
'तस्य' इति पार्थनानोऽहतो लोके प्रदीप इव प्रदीपस्तद्गतसकलवस्तुप्रकाशकतया लोकप्रदीपस्तस्यासीच्छिष्यो| महायशाः 'केशिः' केशिनामा कुमारश्चासावपरिणीततया श्रमणश्च तपखितया कुमारश्रमणो विद्याचरणे-ज्ञानचारित्रे तयोः पारगः-पर्यन्तगामी विद्याचरणपारगः, 'ओहिनाणसुए'त्ति सुव्यत्ययादवधिज्ञानश्रुताभ्यां "मइपुछ जेण सुयं”| इत्यागमात्मतिपूर्वकतया श्रुतस्य मत्या च 'बुद्धः' अवगतहेयोपादेयविभागो विशेषाभिधायित्वादस्थापुनरुक्तता, शिष्याणां सङ्का-समूहस्तेन समाकुल:-आकीर्णः परिहित इतियावत् शिष्यसङ्घसमाकुलो ग्रामानुग्रामं पूर्ववत् 'रीयंते'हात्ति 'रीयमाणः' विहरन् 'श्रावस्ती धावस्तीनाम्नी, 'तम्मिति तस्याः श्रावस्त्याः 'नगरमण्डले' पुरपरिक्षेपपरिसरे 'प्रासुके।
खाभाविकागन्तुकसत्वरहिते, केत्याह-शय्या-वसतिस्तस्यां संस्तारका-शिलाफलकादिः शय्यासंस्तारकस्तस्मिन् 'तत्रे'-* |ति तिन्दुकोद्याने वासम्-अवस्थानम् 'उपागतः' प्राप्तः, शेषं स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ अस्मिंश्चान्तरे यदभूत्तदाह
दीप अनुक्रम [८४८
-८५०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||५-८|| नियुक्ति : [४५१...]
प्रत सूत्रांक ||५-८||
अह तेणेव कालेणं, धम्मतित्थयरे जिणे । भयवं वद्धमाणुत्ति, सब्वलोगंमि विस्सुए॥५॥ तस्स लोगपईवस्स,
आसि सीसे महायसे । भयवं गोयमे नाम, विजाचरणपारगे ॥ ६॥ वारसंगविऊ बुद्धे, सीससंघसमाउले। दिगामाणुगाम रीयंते, सेऽवि सावस्थिमागए ॥ ७॥ कुट्टगं नाम उज्जाणं, तंमि नयरमंडले । फासुएसिजसं-15 थारे, तत्थ वासमुवागए ॥८॥
स्पष्टमेव, नवरम् 'अर्थ' इति वक्तव्यान्तरोपन्यासे 'तेणेव कालेणं'ति तस्मिन्नेव काले, सूत्रत्वात्सप्तम्यर्थे तृतीया, वर्द्धमानो नाम्नाऽभूदिति शेषः, 'विश्रुतः' विख्यातः, गौतमो नामेति गोत्रनामतोऽन्यथा हि इन्द्रभूत्यभिधान एवासौ, 'वारसंगबिउत्ति द्वादशाङ्गावित् 'सेऽविति सोऽपि गौतमनामा भगवान् 'तम्मि'न्ति इहापि तस्याः श्रावस्त्या इति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ ततः किमजनीत्याह
केसीकुमारसमणे, गोयमे अ महायसे । उभओवि तत्थ विहरिसु, अल्लीणा सुसमाहिया ॥९॥ उभओ ४ सीससंघाणं, संजयाणं तवस्सिणं । तत्थ चिंता समुप्पन्ना, गुणवंताण ताइणं ॥१०॥ केरिसो वा इमो साधम्मो, इमो धम्मो व केरिसो।। आयारधम्मप्पणिही, इमा वा सा व केरिसी॥११॥ चाउज्जामो अजो
धम्मो, जो इमो पंचसिक्खिओ। देसिओ वडमाणेणं, पासेण य महामुणी ॥ १२ ॥ अचेलगो अ जो धम्मो, जो इमो संतरुत्तरो। एगकजपवनाणं, विसेसे किं नु कारणं ॥१३॥
दीप अनुक्रम [८५१-८५४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||९-१३|| नियुक्ति : [४५१...]
उत्तराध्य. बृहद्वत्तिः ॥४९९॥
प्रत
२३
सूत्रांक
||९-१३||
8 ततः 'उभयोवित्ति उभावपि केशिगौतमौ 'तत्र' इति श्रावस्त्यां 'विहरिसुत्ति वचनव्यत्ययाद् व्यहार्थी, विहत- केशिगीत:
वन्तावित्यर्थः, 'अल्लीण'त्ति 'आलीनौ' मनोवाकायगुतावाश्रितौ वा, प्रक्रमात्तस्यामेव पुरि, यद्वा 'अलीनौ' पृथगवस्थानेन परस्परमश्लिष्टौ 'सुसमाहिती' सुष्टु ज्ञानादिसमाधिमन्तौ, 'उभयोः' द्वयोः तयोरेव केशिगौतमयोः 'शिष्यसछानां' शिष्यसमूहानां 'संयतानां संयमिनां 'तपखिना विशिष्टतपोऽन्वितानां तत्रेति तस्यामेव श्रावस्तीपुरि 'चिन्ते'ति वक्ष्यमाणविकल्पा गुणाः-सम्यगदर्शनादयस्तद्वतां, 'ताइणं'ति प्राग्वत् तायिनां त्रायिणां वा, चिन्ताखरूपमाह-'कीदृशः?' किंखरूपः 'वा' विकल्पे पुनरर्थे वा 'इमोत्ति अयम्-अस्मत्सम्बन्धी 'धर्मः' महाव्रतात्मकः 'अय'मिति परिदृश्यमानगणभृच्छिष्यसम्बन्धी 'धम्मो बत्ति वाशब्दो भिन्नक्रमस्ततश्चार्य वा धर्मः कीदृशः?, |आचरणमाचारो-वेषधारणादिको बाह्यः क्रियाकलाप इत्यर्थः, स एव सुगतिधारणाद्धर्मः, प्राप्यते हि बाह्यक्रियामात्रादपि नवमवेयकमितिकृत्वा, तस्य प्रणिधिः-व्यवस्थापनमाचारधर्मप्रणिधिः, 'इमावि'त्ति प्राकृतत्वादयं वाऽस्म
सम्बन्धी 'सा वत्ति तत एव स वा द्वितीययतिसत्कः, अयं चाशयः-अस्माकममीषां च सर्वज्ञप्रणीत एव धर्मस्त-14 पाकिमस्यैतत्साधनानां च भेद इति तदेतदवबोडुमिच्छामो वयमिति । उक्तामेव चिन्तामभिव्यक्तीकर्तुमेवाह-'चाउ-
I ४९९॥ जामो यत्ति चातुर्यामः-महानतचतुष्टयात्मको यो धर्मः 'देशितः' कथितः पार्थेन' पार्श्वनाम्ना तीर्थकृतेति सम्बन्धः, "जो इमो'त्ति चकारस्य प्रश्लेषाद् यश्चार्य पञ्च शिक्षाः-प्राणातिपातादिविरमणोपदेशात्मिकाः संजाता
दीप अनुक्रम [८५५-८५९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||९-१३||
प्रत
सूत्रांक
||९-१३||
यस्मिन्नसौ पञ्चशिक्षितः, तारकादेराकृतिगणवादितच, यद्वा पञ्च शिक्षितानि-उक्तशिक्षारूपाणि यस्मिन्नसौ पश्चशि[क्षितो बर्द्धमानेन देशित इति योगः, 'महामुणि'त्ति सुव्यत्ययान्महामुनिनेत्युभयोरपि विशेषणं महामुनीना चा, अनयोर्विशेषे किं नु कारणमित्युत्तरेण सम्बन्धः, अनेन धर्मविषयः संशयो व्यक्तीकृतः । सम्प्रत्याचारधर्मप्रणिधिविषयं तमेवाभिव्यनक्ति-'अचेलकश्च' उक्तन्यायेनाविद्यमानचेलकः कुत्सितचेलको वा यो धर्मों वर्धमानेन देशित इत्यपेक्ष्यते, तथा 'जो इमोत्ति पूर्ववद् यश्चायं सान्तराणि-वर्द्धमानखामिसत्कयतिवस्त्रापेक्षया कस्यचित्कदाचिन्मानवर्णविशेषतो विशेषितानि उत्तराणि च-महाधनमूल्यतया प्रधानानि प्रक्रमाद्वस्त्राणि यस्मिन्नसौ सान्तरोत्तरो धर्मः पार्थेन देशित इतीहापेक्ष्यते, एकं कार्य-मुक्तिलक्षणं फलं तदर्थं प्रपन्नौ-प्रवृत्तावेककार्यप्रपन्नौ तयोः प्रक्रमात्पार्श्ववर्द्धमानयोः, उभावपि हि मुक्त्यर्थमेव प्रवृत्तावितिकृत्वा, 'विशेष' उक्तरूपे 'किमिति संशये 'नु' वितर्के ।
कारणं' हेतुः १, कारणभेदेन हि कार्यभेदसम्भव इति भावः, शेषं स्पष्टमिति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ एवं च विनेयचिन्तोप्रत्पत्तौ यत्केशिगौतमावकार्टी तदाह+ अह ते तत्थ सीसाणं, विण्णाय पवियक्कियं । समागमे कयमई, उभो केसिगोयमा ॥ १४ ॥ गोअमो
पडिरूवन्नु, सीससंघसमाउले । जि8 कुलमविक्खंतो, तिंदुयं वणमागओ ॥१५॥ केसी कुमारसमणे, गोअमं
दीप अनुक्रम [८५५-८५९]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||१४-१७|| नियुक्ति: [४५१...]
(४३)
उत्तराध्य.
केशिगीतमीयाध्य०
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥५०॥
२३
||१४
-१७||
दिस्समागयं । पहिरू पडिवत्ति, सम्म संपडिव जई ॥१३ ।। पलालं फासुअंतस्थ, पंचम कुंसंतणाणि य| गोयमस्स निसिज्जाए, खिप्पं संपणामए ॥ १७ ॥
'अथे' पनन्तरं 'ते' इति तो प्रक्रान्ती 'तो'ति श्रावस्त्यां प्रकरण वितर्कित-विकल्पितं प्रवितर्कितं 'समागमें' मीलके 'कृतमती विहिताभिप्रायावभूतामिति शेषः, 'केसिगोय'त्ति केशिगौतमी, ततश्च 'पडिरूवन्नु'त्ति प्रतिरूपविनयो-यथोचितप्रतिपत्तिरूपस्तं जानातीति प्रतिरूपज्ञः 'ज्येष्ठं प्रथमभावितया 'कुलं' पार्श्वनाथसन्तानम् 'अपेक्षमाणः' विगणयन् 'प्रतिरूपाम्' उचितां 'प्रतिपत्तिम्' अभ्यागतकर्तव्यरूपां 'सम्यम्' अवैपरीयेन समिति-सांमुख्येन प्रतिपद्यते-अङ्गीकरोति संग्रतिपद्यते । प्रतिपत्तिमेवाह-पलालं' प्रतीतं 'प्रासुकं' विगतजीवं 'तत्रेति तसिंस्तिन्दुकोद्याने 'पंचम'ति वचनव्यत्ययात् 'पञ्चमानि' पञ्चसङ्ख्यापूरणानि, कानीत्याह-कुशतृणानि, चशब्दादन्यान्यपि साधुयोग्यतृणानि, पञ्चमत्वं चेपां पलालभेदापेक्षया, तस्य हि शाल्यादिसम्बन्धिभेदापेक्षया चत्वारो भेदाः, यत उक्तम्-"तिणपणगं पुण भणियं, जिणेहिं कम्मट्टगंठिमहणेहिं । साली बीही कोदवरालगरपणे तिणाई च ॥१॥" गौतमस्य 'निषद्यायै निषद्यानिमित्तमुपवेशनार्थमित्यर्थः, 'संपणामए'ति समर्पयति, शेष सूत्रसिद्धमेवेति | सूत्रचतुष्टयार्थः । तौ च तत्रोपविष्टौ यथा प्रतिभातस्तथाऽऽह१ तृणपथक पुनर्भणितं जिनः कर्माष्टकपन्धिमथनैः । शालीः ब्रीहिः कोद्रवो राळक: भरण्यतॄणानि च ॥१॥
दीप अनुक्रम [८६०
॥५०॥
-८६३]
JAINEducatan instinational
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||१८-२०|| नियुक्ति: [४५१...]
(४३)
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%%-3
प्रत सूत्रांक ||१८-२०||
केसी कुमारसमणे, गोअमे य महायसे । उभओ निसन्ना सोहंति, चंदसूरसमप्पहा ॥१८॥ निगदसिद्ध, नवरं 'सोहंति'ति शोभेते चन्द्रसूर्यसमा प्रभा-छाया ययोतो तथा चन्द्रसूर्योपमापितियावदिति सूत्रार्थः ॥ तत्सङ्गमे च यदभूत्तदाह
समागया यह तत्थ, पासंडा कोउगासिया। गिहत्थाण अणेगाओ, साहस्सीओ समागया ॥१९॥
देवदाणवगंधब्बा, जक्खरक्खसकिनरा । अहिस्साण य भूआणं, आसि तत्थ समागमो ॥ २०॥ 'समागताः' मिलिताः पापण्डं-व्रतं तद्योगात् 'पापण्डाः' शेषत्रतिनः कौतुक-कुतूहलम् आश्रिताः-प्रतिपन्नाः कौतुकाश्रिताः, पठ्यते च-'कोउगामिग'त्ति, तत्र कौतुकात् मृगा इव मृगा अज्ञत्वात्प्राकृतत्वादमितकौतुका था, |'साहस्सीओ चि सूत्रत्वात्सहस्राणि । देवा-ज्योतिष्कवैमानिकाः दानवाः-भवनपतयो गन्धर्वयक्षादयो-ज्यन्तरवि-13 शेषाः, समागता इति पूर्वेण सम्बन्धः, एते चानन्तरमदृश्यविशेषणाद् रश्यरूपाः, अदृश्यानां च भूतानां केलीकिल-11 ब्यन्तरविशेषाणामासीत् 'समागमः' मीलकः, शेष सुगममिति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रति तयोर्जल्पमाह
पुच्छामि ते महाभाग !, केसी गोयममब्ववी । तओ केसिं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यवी ॥ २१ ॥ पुच्छ भंते ! जहिच्छ ते, केसिं गोयममम्ववी। तओ केसी अणुनाए, गोअम इणमब्बबी ॥ २२ ॥ 'पृच्छामि' प्रश्नयामि 'ते' इति त्वां 'महाभाग !' अतिशयाचिन्त्यशके! 'अनधीत्' उक्तवान् 'ततः तद्वचनानन्तरं
दीप अनुक्रम
[८६४
-८६६]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२३], मूलं [--1 / गाथा ||२१-२२|| नियुक्ति : [४५२-४५४]
(४३)
केशिगौत
बृहद्वृत्तिः कमेण या
प्रत सूत्रांक
॥५०॥
||२१
-२२||
केशि 'ब्रुवन्तम्' अभिदधतं 'तुः' पुनरर्थे भिन्नक्रमश्च केशिं पुनर्जुवन्तमिति योज्यते, 'जहिच्छंति इच्छाया अनति- कमेण यथेच्छं यदवभासत इत्यर्थोऽनुज्ञात इति-अनुमतो गौतमेनेति प्रक्रमः, शेष प्रतीतमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ | यच्चासौ गौतमं पृष्टवांस्तत्सङ्ग्राहकं नियुक्तिकृद् द्वारगाथात्रयमाह
सिक्खावए अ लिंगे अ, सत्तूणं च पराजए । पासावगत्तणे चेव, तंतूद्धरणबंधणे ॥ ४५२॥ अगणिणिवावणे चेव, तहा दुटुस्स निग्गहे । तहा पहपरिन्नाय, महासोअनिवारणे ॥ ४५३ ॥ संसारपारगमणे, तमस्स अ विघायणे। ठाणोवसंपया चेव, एवं बारससू कमो ॥ ४५४ ॥ एतच यथाऽवसरं सूत्रव्याख्यान एव व्याख्यास्यते, तत्र प्रथमं 'सिक्खावय'त्ति द्वारम् , अत्र च शिक्षा-अभ्यासस्तत्प्रधानानि व्रतानि प्रतिदिनं यतिभिरभ्यस्यमानतया शिक्षाप्रतानि शिक्षापदानि वा-प्राणिवधविरमणादीनि, | सत्सु हि तेषु शेषाऽपि शिक्षा शिष्योपदेशात्मिका संभवतीति । एतदधिकृत्याह सूत्रकृत्
चाउजामो अ जो धम्मो, जो इमो पंचसिक्खिओ। देसिओ बद्धमाणेणं, पासेण य महामुणी ॥ २३ ॥ एगकजपवन्नाणं, विसेसे किं नु कारणं । धम्मे दुविहे मेहाची, कहं विप्पचओ न ते ? ॥ २४ ॥
दीप
अनुक्रम [८६७-८६८]
५०१०
JAINEducatan intamanimal
v पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||२३-२४|| नियुक्ति: [४५२-४५४]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||२३.
-२४||
'चतुर्यामः' हिंसाऽनृतस्तेयपरिग्रहोपरमात्मकबतचतुष्टयरूपः 'पञ्चशिक्षितः स एव मैथुनविरमणात्मकपञ्चमत्रतसहितः । इत्थं च 'धर्म' साधुधर्म 'द्विविधे' द्विभेदे हे 'मेधाविन् ।' विशिष्टावधारणशक्त्यन्वित ! कथञ्चित् (कथं द विप्र ) प्रत्ययः' अनाश्वासो न 'ते' तव?, तुल्ये हि सर्वज्ञत्वे किंकृतोऽसौ मतभेद इत्यभिप्रायः, शेषं प्रकटार्थमेवेति
सूत्रद्वयार्थः ॥ एवं केशिनोक्ते| तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यवी । पन्ना समिक्खए धम्मतत्तं तत्तविणिच्छियं ॥ २५ ॥ पुरिमा उज्जुजड्डा उ, वक्वजड्डा य पच्छिमा । मज्झिमा उज्जुपन्ना उ, तेण धम्मे दुहा कए ॥२६॥ पुरिमाणं दुविसुज्झो
ज, चरिमाणं दुरणुपालओ । कप्पो मज्झिमगाणं तु, सुविसुज्झो सुपालओ ॥२७॥ MI 'ततः' तदनन्तरं केशिं त्रुवन्तं तुः पूरणेऽवधारणे वा ततो ब्रुवन्तमेव जल्पादनुपरतमेव, अनेनादरातिशयमासन्नल
धप्रतिभतां च गौतमस्याह । किं तदत्रवीदित्याह-'प्रज्ञा' बुद्धिः 'समीक्षते' सम्यक् पश्यति, किं तदित्याह-'धम्मतत्त'ति बिन्दुरलाक्षणिकस्ततः 'धर्मतत्त्वं' धर्मपरमार्थ तत्त्वानां-जीवादीनां विनिश्चयो-विशिष्टनिर्णयात्मको यस्मिंस्तत्तथा, इदमुक्तं भवति-न वाक्यश्रवणमात्रादेव वाक्यार्थनिर्णयो भवति, किन्तु प्रज्ञावशात् , ततः 'पुरिम'त्ति 'पूर्व' प्रथमतीर्थकत्साधवः 'उज्जुजडे'ति ऋजयश्च प्राञ्जलतया जडाथ तत एव दुष्प्रतिपाद्यतया ऋजुजडाः, तुरिति यस्मात् 'वकजड्डा यत्ति, वक्राश्च वक्रबोधतया जडाश्च तत एव खकानेककुविकल्पतो विवक्षितार्थन
दीप अनुक्रम [८६९-८७०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||२५-२७|| नियुक्ति : [४५४...]
(४३)
उत्तराध्य.
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
१५०२॥
२३
||२५-२७||
तिपत्त्यक्षमतया वक्रजडाः 'चः' समुच्चये 'पश्चिमाः' पश्चिमतीर्थकृद्यतयः 'मध्यमास्तु' मध्यमतीर्थकृत्सम्बन्धितप-18 केशिगौत खिनः, 'ऋजुप्रज्ञाः' ऋजयश्च ते प्रकर्षण जानन्तीति प्रज्ञाश्च सुखेनैव विवक्षितमर्थ ग्राहयितुं शक्यन्त इति ऋजुप्रज्ञाः,
मीयाध्या तेन हेतुना धर्मो द्विभेदः 'कृतः' विहितः, एककार्यप्रतिपन्नत्वेऽपीति प्रक्रमः । यदि नाम पूर्वादीनामेवंविधत्वं तथापि कथमेतद् द्वैविध्यमित्याह-'पुरिमाणं'ति पूर्वेषां दुःखेन विशोध्यो बिशोधयितुं-निर्मलतां नेतं शक्यो दुर्विशोध्यः, कल्प इति संबध्यते, ते ह्यतिऋजुतया गुरुभिरनुशिष्यमाणा अपि न तदनुशासनं खप्रज्ञाऽपराधाद्यथा*वत्प्रतिपत्तुं क्षमन्त इति तेपामसौदुर्षिशोध्य उच्यते, तुशब्द उत्तरेभ्यो विशेष द्योतयति, 'चरमाणा' चरमतीर्थकत्तप|खिनां दुःखेनानुपाल्यत इति दुरनुपालः स एव दुरनुपालकः 'कल्पः' यतिक्रियाकलापः, ते हि वक्रत्वेन कु विकल्पाकुलितचित्ततया कथञ्चिजानाना अपि न यथावदनुष्ठातुमीशते, मधमकानां तु सुखेन विशोध्यो-विशोधयितुं शक्यः सुविशोध्यः, 'सुपालउ'त्ति चशब्दस्य गम्यमानत्वात्सुपालकश्च, कोऽसौ ?-कल्पः इतीहापि योज्यते, ते हि ऋजुप्रज्ञा इति सम्यग्मागानुसारियोधतया सुखेनैव यथावदवगच्छन्ति पालयन्ति च, अतस्ते चतुर्यामोक्तावपि पञ्चममपि याममुक्तहेतोातुं पालयितुं च क्षमा इति तदपेक्षया पार्थण चतुर्याम उक्तः, पूर्वपश्चिमाश्चोक्तनीतितो नित्यमिति ऋषभवर्द्धमानाभ्यां पञ्चमं व्रतमुक्तम् , अधमर्थः-न यादृशाद्वाचकादेकस्य श्रोतुर्विवक्षितार्थप्रतिपत्तिस्तारशादेवाशेषाणामपि, खप्रज्ञापेक्षया हि कोऽपि कीरशादेव वाचकादेकमप्यर्थं प्रतिपद्यत इति विचित्रप्रज्ञविनेयानुग्रहा
दीप अनुक्रम [८७१-८७३]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||२८-३०|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत सूत्रांक ||२८-३०||
प्रायोपात्तीद्वाचकभेदादेव धर्मस्य वैविध्य, न तु वस्तुभेदात्, यद्वाचकभेदेऽपि वस्तुतो व्रतपञ्चकस्यैवात्र विवक्षितत्वात् , हा
प्रसातशेहायजिनाभिधानमिति सूत्रत्रयार्थः । इत्थं गौतमेनोक्ते केशिराह4 साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मझ, तं मे कहसु गोयमा! ॥२८॥
अचेलओ अ जो धम्मो, जो इमो संतरुत्तरो। देसिओ बद्धमाणेणं, पासेण य महामुणी ॥ २९ ॥ एगकप-2 विनाणं, विसेसे किं नु कारणं ? । लिंगे दुविहे मेहावी !, कहं विपञ्चओ न ते ? ॥ ३०॥ A 'साधु'त्ति साधुः-शोभना गौतम ! 'प्रज्ञा' बुद्धिः 'ते' तक, यतः 'छिन्नः' अपनीतस्त्वयेति गम्यते, मम 'संशयः
सन्देहः 'इमोत्ति अयम्-उक्तरूपः, पठन्ति च-'पण्णाए'त्ति, तत्र च साधु यथा भवत्येवं गौतम ! 'प्रज्ञया' बुद्धया । छिन्नो मे संशयोऽयं, त्वयेति व्याख्येयं, विनेयापेक्षं चेत्थमभिधानं, न तु तस्य मतिश्रुतावधिज्ञानत्रयसमन्वितस्यैवंविधद संशयसम्भव इति सर्वत्र भावनीयम् । 'अन्योऽपि' वक्ष्यमाणः संशयो मम तं मे कथय गौतम!, तद्विषयमप्यर्थे ।
यथावत्प्रतिपादयेति भावः । अत्र च द्वितीयं द्वारं 'लिंग'त्ति, लिङ्गयते-गम्यतेऽनेनायं व्रतीति लिङ्ग-वर्षाकल्पादिरूपो वेषः, तदधिकृत्याह-'अचेलओं' इत्यादि, पागू व्याख्यातमेव, नवरं 'महामुनि'त्ति महामुने !, पठन्ति च, महाजसति महायशाः, लिङ्गे द्विविधे-अचेलकतया विविधवस्त्रधारकतया च द्विभेद इति सूत्रत्रयार्थः ॥ एवं केशिनाऽभिहिते गौतमवचोऽभिधायकं सूत्रत्रयम्
दीप अनुक्रम [८७४-८७६]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||३१-३३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
॥५०॥
प्रत सूत्रांक ||३१-३३||
उत्तराध्य. केसि एवं बुवाणं तु, गोयमो इणमन्बधी । विन्नाणेण समागम्म, धम्मसाहणमिच्छियं ॥ ३१ ॥ पञ्चयत्वं केशिगौत
च लोगस्स, नाणाविहविकप्पणं । जत्तत्थं गहणत्थं च, लोगे लिंगपओअणं ॥३२॥ अह भवे पइन्ना उ, KIमुक्खसम्भूयसाहणा । नाणं च दंसर्ण चेव, चरितं चेव निच्छए ॥३३॥
मीयाध्य. | अन च विशिष्टं ज्ञानं विज्ञान-तच केवलमेव तेन समागम्य यद्यस्योचितं तत्तथैव ज्ञात्वा 'धर्मसाधनं' धर्मोपकरणं २३
वर्षाकल्पादिकम् 'इच्छिय'न्ति 'इष्टम्' अनुमतं पार्श्वनाथवर्द्धमानतीर्थकृयामिति प्रक्रमः, वर्द्धमानविनेयानां हि दा रक्तादिवस्त्रानुज्ञाने वकजडत्वेन वखरञ्जनादिषु प्रवृत्तिरतिदुर्निवारैव स्यादिति न तेन तदनुज्ञातं, पार्थशिष्यास्तु न तिथेति रक्तादीनामपि (धर्मोपकरणत्वं ) तेनानुज्ञातमिति भावः, किञ्च-प्रत्ययार्थं वा-अमी तिन इति प्रतीति
निमित्तं, कस्य-लोकस्य, अन्यथा हि यथाऽभिरुचितं वेषमादाय प्रजादिनिमित्त विडम्बकादयोऽपि वयं व्रतिन| इत्यभिदधीरन्, ततो बतिष्वपि न लोकस्य तिन इति प्रतीतिः स्यात् , किं तदेवमित्याह-'नानाविधविकल्पनं' प्रक्रमानानाप्रकारोपकरणपरिकल्पनं, नानाविधं हि वर्षाकल्पाद्युपकरणं यथावद्यतिवेव संभवतीति कथं न तत्प्र-111
५०३|| त्ययहेतुः स्यात् ?, तथा यात्रा-संयमनिर्वाहस्तदर्थे, विना हि वर्षाकल्पादिकं वृष्टयादौ संयमबाधैव स्यात् , ग्रहणंज्ञानं तदर्थं च, कथञ्चिचित्तविप्लवोत्पत्तावपि गृह्णातु-यथाऽहं व्रतीत्येतदर्थ, लोके लिङ्गस्य-वेषधारणस्य प्रयोजनमिति-प्रवर्त्तनं लिङ्गप्रयोजनम् । अथे' त्युपन्यासे 'भवे पइन्ना उत्ति तुशब्दस्यैवकारार्थत्वाद्भिन्नक्रमत्वाच भवे
दीप अनुक्रम [८७७-८७९]
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JAINEducatan intamanna
For PAHATEEPIVanupontv
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||३१-३३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||३१-३३||
देव प्रतिज्ञानं प्रतिज्ञा-अभ्युपगमः, प्रक्रमात्पार्थवर्द्धमानयोः, प्रतिज्ञाखरूपमाह-'मोक्खसम्भूयसाहण'त्ति मोक्षस्य | सद्भूतानि च तानि तात्त्विकत्वात्साधनानि च हेतुत्वान्मोक्षसद्भूतसाधनानि, कानीत्याह-'ज्ञानं च यथावदवबोधः 'दर्शनं च' तचरुचिः 'चारित्रं च सर्वसावधविरतिः 'एवे' त्यवधारणे, स च लिङ्गस्य मुक्तिसद्भूतसाधनता व्यवच्छि-2) नत्ति, ज्ञानायेव मुक्तिसाधनं न तु लिङ्गमिति, श्रूयते हि भरतादीनां लिङ्गं बिनाऽपि केवलज्ञानोत्पत्तिः, 'निश्चये। इति निश्चयनये विचार्ये, व्यवहारनये तु लिङ्गस्यापि कथञ्चिन्मुक्तिसद्भुतहेतुतेष्यत एव, तदयमभिप्रायः-निश्चय-14 स्तावलिझं प्रत्याद्रियत एवं न, व्यवहार एव तूक्तहेतुभिस्तदिच्छतीति तद्भेदस्य तत्त्वतोकिश्चित्करत्वान्न विदुषां । विप्रत्ययहेतुता, शेषं स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ ____ साहु गोयम ! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नोऽवि संसओ मज्झ, तं मे कहसु गोयमा ! ॥ ३४ ॥ प्राग्वत् । अत्र च तृतीयद्वारं शत्रूणां पराजय इति, एतदधिकृत्याह
अणेगाण सहस्साणं, मज्झे चिट्ठसि गोयमा !|ते अ ते अभिगच्छति, कहं ते निजिया तुमे ॥ ३५॥12 एगे जिए जिया पंच, पंच जिए जिया दस । दसहा उ जिणित्ता णं, सब्वसत्तू जिणामहं ॥३६॥ सत्तू अ इइ के वुत्ते, केसी गोयममब्बवी । तओ केसिं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बवी ॥ ३७॥ एगप्पो अजिए सत्तू, कसाया इंदियाणि य । ते जिणित्तू जहानाय, विहरामि अहं मुणी ॥ ३८ ॥
中中中中中中中中中1
दीप अनुक्रम [८७७-८७९]
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||३५-३८|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक ||३५
-३८||
उत्तराध्य. अविद्यमानमेक इति-भावप्रधानत्वान्निर्देशस्यैकत्वं येषु तेऽने कास्तेषाम् अनेकानां-बहूनां सहस्राणां प्रक्रमा- केशिगौतबृद्धृत्तिः दिच्छत्रुसम्बन्धिनां मध्ये त्वं तिष्ठसि' आस्से गौतम!, 'ते च' अनेकसहस्रसङ्ख्याः शत्रवः 'ते' इति सूत्रत्वाचामभिलक्षीकृत्य गच्छन्ति-धावन्ति, अर्थाजेतुम् , इत्थं चैतत् केवलानुत्पत्तिदर्शनात् , दृश्यते च तजयफलमपि तव प्रश
मीयाध्य ॥५०॥ मादि, तत् 'क' केन प्रकारेण 'ते' इत्युक्तरूपाः शत्रवः 'निर्जिताः' अभिभूतास्त्वया ?, भूयस्त्वादभियोक्तृत्वाच
ततेपामिति भावः । इत्थं केशिनो के गौतम आह-'एकस्मिन् सकलभावशत्रुप्रधाने आत्मनि 'जिते' अभिभूते जिताः पञ्च, कथम् , एकः स एवान्ये च चत्वारः कषायाः, तथा 'पंच जिए'त्ति सूत्रत्वात्पञ्चसु जितेषु जिता दश, अत्रापि पश्चोक्ता एवापराणि च पञ्चेन्द्रियाणि, ततः 'दशधा' दशप्रकारानुक्तरूपान् 'तुः' पुनरर्थे शत्रून् जित्वा ! 'ण'ति प्राग्वत् 'सर्वशत्रून्' नोकपायादीस्तदुत्तरोत्तरभेदांश्चानेक सहस्र सङ्खधान् ‘जयामि' अभिभवाम्यहं, तदनेन । प्रथमतः प्रधानजयो-जयनप्रकार उक्तः, ततश्च 'सत्तू य इइत्ति 'चा' पूरणे इति भिन्नक्रमो जाती चैकवचनं, ततः शत्रुः क उक्त इति केशिगौतममब्रवीत्, ननु यद्यती शत्रूनपि न वेत्ति कथं तन्मध्यगतस्त्वं तिष्ठसीत्यादिकमनेन 81प्रागुक्तम् ?, उच्यते, अज्ञजनप्रतिबोधार्थ सर्वा अपि ज्ञपृच्छा एताः, उक्तं हि प्राग् 'ज्ञानत्रयान्वितोऽसाविति कथमस्यैवंविधवस्त्वपरिज्ञानसम्भव' इति. उत्तरार्ध प्रावत् । एक आत्मेति-जीवचित्तं वाऽतति-गच्छति तांस्तान्। भावान् अर्थान्वेति व्युत्पत्तेः 'अजितः' अवशीकृतः अनेकानावाप्तिहेतुत्वाच्छयुरिव शत्रुस्तथोक्तहेतोरेव 'कपायाः'
दीप अनुक्रम [८८१-८८४]
५०४॥
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [--1 / गाथा ||३५-३८|| नियुक्ति: [४५४...]
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प्रत
सूत्रांक
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||३५-३८||
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क्रोधादयः 'इन्द्रियाणि' स्पर्शनादीनि, चशब्दानोकषायादयः कषायाधुत्तरोत्तरभेदाच, अजिताः शत्रब इति वचनविपरिणामेन योज्यते । इह च कषायाणां प्रथमत उपादानमिन्द्रियाणामपि कषायवशत एवानहेतुत्वख्याप
नाथ, सम्प्रत्युपसंहरच्याजेन तजये फलमाह-'तान्' उक्तरूपान् शत्रून् 'जित्वा' अभिभूय 'यथान्यायं' यथोक्तनीदत्यनतिक्रमेण ततो विहरामि-तन्मध्येऽपि तिष्ठन्नप्रतिवद्धविहारितयेति गम्यते, तेषामेव प्रतिबन्धहेतुत्वेन तद्विवVान्धकाभावादिति भावः, 'अहमित्यात्मनिर्देशः 'मुने' इति केश्यामश्रणमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ एवं गौतमेनाभिहिते
साहु गोयम ! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मझ, तं मे कहसु गोयमा ! ॥ ३९॥ प्राग्वत् । सम्प्रति 'पासावगत्त'ति चतुर्थद्वारमधिकृत्याहदीसंति बहवे लोए, पासबद्धा सरीरिणो । मुक्कपासो लहभूओ, कहं तं विहरसी मुणी! ॥४०॥ ते पासे । सब्वसो छित्ता, निहंतूण उवायओ । मुकपासो ल हुन्भूओ, विहरामि अहं मुणी ॥४१॥ पासा अ इइ के xवुत्ता, केसी गोयममव्यवी । केसि एवं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यबी ॥ ४२ ॥ रागहोसादओ तिव्वा, नह|
पासा भयंकरा । ते छिदित्तु जहानायं, विहरामि जहकम ॥ ४३ ।। 7 सूत्रचतुष्टयं स्पष्टमेव नवरं पाशैर्वद्धा-नियत्रिताः पाशबद्धाः शरीरिणः' प्राणिनः, 'मुक्तपाशः' त्यक्तपाशोऽत एव लघुभूतो-वायुः, ततो लघुभूत इव लघुभूतः सर्वत्राप्रतिवद्धत्वात् । गौतम आह-ते' इति तान्-लोकबन्धकान
MEACCORDAROGRAOR
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दीप अनुक्रम [८८१-८८४]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||४०-४३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
प्रत
सूत्रांक
||४०
-४३||
पाशान् ‘सघसो'त्ति सूत्रत्वात्सर्वान् ‘छित्त्वा' त्रोटयित्वा 'निहत्य' पुनर्वन्धाभावलक्षणेनातिशयेन विनाश्य, कथम् :- केशिगौत'उपायतः' सद्भूतभावनाऽभ्यासात् । ततः पाशाश्च-पाशशब्दवाच्याः के 'वुत्ते ति उक्ताः । रागद्वेषादयः, आदिश-01 ब्दान्मोहपरिग्रहः 'तीवाः' इति गाढाः, तथा 'णेह'त्ति स्नेहा:-पुत्रकलत्रादिसम्बन्धास्ते पाशा इव पारवश्यहेतुतया
मीयाध्य पाशा इत्युक्ता इति क्रमः,अतिगाढत्वाच रागान्तर्गतत्वेऽप्यमीषां पुनरुपादानं, भयङ्कराः' अनर्थहेतुतया त्रासोत्पादका 'यथाक्रमम्' इति क्रमो-यतिविहित आचारस्तदनतिक्रमेणेति सूत्रचतुष्टयार्थः ।
साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नोऽवि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा ! ॥४४॥ पूर्ववत् । सम्प्रति 'तन्तूद्धरणबंधणे'त्ति पञ्चमद्वाराबसरः, तत्र च तन्यते भवोऽनेनेति तन्तुः-भवतृष्णा स एव । बन्धहेतुत्वाद्वन्धनं तस्योद्धरणम्-उन्मूलनं तन्तुबन्धनोद्धरणं, प्राग्वत्परनिपातः ॥ तदधिकृत्याह| अंतो हिअयसंभूया, लया चिट्ठ गोयमा! । फलेइ विसभक्खीणं, साउ उद्धरिया कह ॥४५॥ तंश लयं सब्बसो छिसा, उद्धरित्ता समूलियं । विहरामि जहानायं, मुक्कोमि विसभक्खणं ॥४६॥ लया य इति ।
॥५०॥ का बुत्ता, केसी गोयममव्ययी। केसिमेवं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यवी ॥४७॥ भवतण्हा लया वुत्ता, भीमा 31 भीमफलोदया। तमुच्छित्तु जहानायं, विहरामि महामुणी !॥४८॥
दीप अनुक्रम [८८६-८८९]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||४५-४८|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
हृदयस्यान्तरन्तर्हृदयं-मन इत्यर्थस्तत्र संभूता-उत्पन्ना लता 'तिष्ठति' आस्ते हे गौतम !, 'फलेइ विसभक्खीण'ति | आर्षत्वात्फलति विषवद्भक्ष्यन्त इति विषभक्ष्याणि-पर्यन्तदारुणतया विषोपमानि फलानीति गम्यते, सा पुनः |'उद्धृता' उत्पाटिता त्वयेति गम्यते, 'कथं' केन प्रकारेण, इति केशिप्रश्नः । गौतम आह–'ताम्' इत्युक्तविशेषणां लता 'सघसो'त्ति सर्वतः 'छित्वा' खण्डीकृत्य 'उद्धृत्य' उत्पाट्य समूलामेव समूलिकां रागद्वेपलक्षणमूलनिर्मूलनेन यथान्यायं विहरामीति प्राग्वत् , अनेन सर्वच्छेदसमूलोद्धरणं चोद्धरणप्रकार उक्तः,तत्फलमाह-मुक्तोऽस्मि 'विसभक्खणं ति सुब्ब्यत्ययाद् विषभक्षणाद्-विषफलाभ्यवहारोपमात् क्लिष्टकर्मणः । 'लते'सादि स्पष्टं, भवः-संसारस्तस्मिन् तृष्णालोभात्मिका भवतृष्णा लतोक्ता 'भीमा' भयदा खरूपतः कार्यतश्च भीमो दुःखहेतुतया फलानामाक्लिष्टकर्मणामुदयः-परिपाको यस्याः सा तथा, न चेह प्राग् लतामात्रस्यैव प्रश्न इति विशेषणाभिधानमयुक्तं, सविशेषणाया एव तस्याः प्रक्रान्तत्वात्, प्रक्रमापेक्षत्वाच प्रश्नस्य, शेषमुपसंहाराभिधायीति सूत्रचतुष्टयार्थः॥
साहु गोयम ! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा ! ॥४९॥
गतार्थम् । 'अग्निनिर्वापणं चेव'त्ति षष्ठद्वारमङ्गीकृत्याह6 संपज्जलिया घोरा, अग्गी चिट्ठह गोयमा! जे डहंति सरीरत्या, कहं विज्झाविया तुमे ॥५०॥ महा-II INमेहपसूयाओ, गिज्म वारि जलुत्तमं । सिंचामि सययं ते उ, सित्तानो व उहंति मे ॥५१॥ अग्गी अइह
करवाकर
中长中长中*本******
||४५-४८||
दीप अनुक्रम [८९१-८९४]
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For PAHATEEPIVanupontv
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||५०-५३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
||५०
-५३||
के वुत्ते?, केसी गोयममब्बबी । तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बी ॥५२॥ कसाया अग्गिणो वुत्ता, शिगोत. उत्तराध्य. 18सुअसीलतयो जलं । सुयधाराभिहया संता, भिन्ना हुन डहंति मे ॥५३॥
मीयाध्य 4 सूत्रचतुष्टयम् । समन्तात्प्रकर्षण ज्वलिताः संप्रज्वलिता अत एव घोराः'रौद्राः अग्गी चिट्ठइत्ति आर्षत्वाद्वचनव्यत्य॥५०॥ यात्ततोऽनयस्तिष्ठन्ति हे गौतम! ये दहन्तीव दहन्ति परितापकारितया 'शरीरस्थाः' देहस्थाः, न बहिर्वर्त्तिन इत्यर्थः,
एते च यद्यप्यात्मस्थास्तथाऽपि शरीरात्मनोरन्योऽन्यानुगमख्यापनायेत्यमुक्ताः, कथं विध्यापिताः' निर्वापितास्त्वया? । गौतम आह-महामेघात् प्रसूतम्-उत्पन्नं महामेघप्रसूतं तस्मात् , महाश्रोतस इति गम्यते, गिज्झत्ति गृहीत्वा वारयति तृष्णादिदोषानिति वारि-पानीयं 'जलोत्तम शेषजलापेक्षया प्रधानं तेन 'सिञ्चामि' उक्षामि विध्यापयामीतियावत् ,
'सततम्' अनवरतं ते उत्ति तुशब्दस्य भिन्न(e)क्रमस्ततस्ताननीन्, प्रसङ्गतस्तत्सेचनफलमाह-सिक्तास्तु 'नो ४वति नैव दहन्ति 'मे'त्ति मां, पठ्यते च-'सययं देहि'त्ति, इह च देहस्थितत्वेनाग्नयोऽपि देहा उक्ताः, उक्तं हि 'तास्थ्यात्तद्वयपदेश'इति, अन्ये तु पूर्वसूत्रं पठन्ति-जा डहेति सरीरत्थेति, अत्र तु पठन्ति-सिंचामि सययं तं तु' इति, इह च 'त' मित्समिमन्यत् प्राबद्, एकवचनान्तत्वमेव तु सर्वत्र विशेषः। "अग्गी ये' त्यादि प्राग्वत् , नवरम-17
५०६॥ |मिप्रश्नो महामेघादिप्रश्नोपलक्षणं, 'कषायाः क्रोधादयः अग्नयः परितापकतया शोषकतया चोक्तास्तीर्थकृद्भिरिति गम्यते, श्रुतं चेहोपचारात्कषायोपशमहेतवः श्रुतान्तर्गतोपदेशाः शीलं च-महाप्रतानि तपश्च-अनशनप्रायश्चि
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दीप अनुक्रम [८९६-८९९]
SAIREDuratan intamation
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
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सूत्रांक
||५०
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-५३||
तादि श्रुतशीलतप इति समाहारः, तत्किमित्याह-जलं-पानीयमुपलक्षणत्वाचास्य महामेघस्त्रिजगदानन्दकतया शेषमेघातिशायित्वेन भगवांस्तीर्थकरो महाश्रोताश्च तत उत्पन्न आगमः, उक्तमेवार्थ सविशेषमुपसंहरन्नाह-श्रुतस्यआगमस्योषलक्षणत्वाच्छीलतपसोश्च धारा इव धारा-आक्रोशहननतर्जनधर्मभ्रंशेषूत्तरोत्तरभावस्यालामरूपतादिसततपरिभावनास्ताभिरभिहताः-ताडिताः श्रुतधाराभिहताः सन्तः प्रक्रमादुक्तरूपा अग्नयः 'भिन्नाः' विदारितास्तदभिघातेन लवमात्रीकृता इतियावत् 'हु।' पूरणे न दहन्ति मामिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥
साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नोऽवि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा !॥ ५४॥ प्राग्वत् । 'दुष्टाश्वनिग्रह' इति सप्तमद्वारमुररीकृत्याह
अयं साहस्सिओ भीमो, दुहस्सो परिधावई । जंसि गोयम ! आरूढो, कहं तेण न हीरसि? ॥५५॥ पहावंतं निगिपहामि, सुयरस्सीसमाहियं । न मे गच्छइ उम्मग्गं, मग्गं च पडिवजह ॥५६॥ अस्से अइइ का वुत्ते?, केसी गोयममब्बची । तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बवी ॥५७ ॥ मणो साहस्सिओ भीमो, दुहस्सो परिधावइ । तं सम्मं तु निगिण्हामि, धम्मसिक्खाइ कंधगं ॥ ५८॥ सूत्रचतुष्टयम् । 'अयं' प्रत्यक्षः सहसा-असमीक्ष्य प्रवर्तत इति साहसिको भीमः प्राग्वत् , दुष्टश्चासावकार्य
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दीप अनुक्रम [८९६-८९९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||५५-५८|| नियुक्ति: [४५४...]
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सूत्रांक
||५५-५८||
उत्तराध्य 15 प्रवृत्त्याऽश्वश्च दुष्टाश्वः 'परिधावति' समन्ताद्गच्छति, यः कीरगित्साह-यं दुष्टाश्वमभिभवसि, यदिवा 'यंसि'त्ति केशिगीतयस्मिन् हे गौतम ! 'आरूढः' चटितः, अनारूढस्य हि न वक्ष्यमाणापायहेतुरसौ स्यादित्येवमभिधानं, ततः कथमिति
मीयाध्या बृहद्वृत्तिः |प्रश्ने 'तेन' इति दुष्टाश्वेन 'न हियसे' प्रस्तावान्नोन्मार्ग नीयसे । गौतम आह-प्रधावन्तम्' उन्मार्गाभिमुखं ।
गच्छन्तं 'निगृह्णामि' निरुणध्मि, कीदृशं तमित्याह-श्रुतम्-आगमो नियन्त्रकतया रश्मिरिव रश्मि:-प्रग्रहः श्रुतरवृश्मिस्तेन समाहितो-बद्धः श्रुतरश्मिसमाहितस्तम् , अतो न 'मे' मम सम्बन्धी दुष्टाश्वः 'गच्छति' याति 'उन्मार्गम्'
उत्पथ, ततो न मम तेन हरणमिति भावः, ततश्च किमुदास्त एवेत्याह-'माग च' सत्पथं पुनः 'प्रतिपद्यते' अङ्गीकुरुते । SI'अस्से य' इत्यादि सुगम, नवरं 'मनः' चित्तम्, इह च साहसिक इत्याद्यभिधानं प्रक्रमानुस्मरणार्थ, विशेपमुपदर्श-12 | यन्नुपसंहारमाह-तं सम्यग निगृहामि धर्मविषया शिक्षा-उपदेशो धर्मशिक्षा तया, यद्वा शिक्षा-अभ्यासस्ततो 'धर्म-131 |शिक्षायै' धर्माभ्यासनिमित्तं कन्थको-जात्याश्वस्ततश्च कन्धकमिव कन्थकं, किमुक्तं भवति ?-दुष्टाथोऽपि निग्रहणयोग्यः कन्थकप्राय एवेति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ केशिराह
साहु गोयम ! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा !॥५९॥॥५०७॥ साहुसूत्रं तथैव । तथा 'पथपरिज्ञाते' त्यष्टमं द्वारमाश्रित्याहकुप्पहा बहवे लोए, जेसिं नासंति जंतवो । अहाणे कह वहतो, तं न नाससि गोयमा! ॥६॥जे अ|
दीप अनुक्रम [९०१-९०४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||६०-६३|| नियुक्ति: [४५४...]
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सूत्रांक ||६०
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-६३||
मग्गेण गच्छति, जे अ उम्मग्गपट्टिया । ते सव्वे विइया मज्झं, तो न नस्सामहं मुणी! ॥६१॥ मग्गे अ इति के वुत्ते, केसी गोयममब्बवी । तओ केसिं बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बवी ॥६२॥ कुप्पवयणपासंडी, सव्वे ४ उम्मग्गपविया । सम्मग्गं तु जिणक्खायं, एस मग्गे हि उत्तमे ॥ ६३ ॥ | सूत्राणि चत्वारि । कुत्सिताः पथाः कुपथाः-अशोभनमार्गाः 'बहवः' अनेके 'लोके' जगति 'यः' कुपथैः 'नश्यन्ति'
सन्मार्गाश्यन्ति 'जन्तवः' प्राणिनः, ततश्चाध्वनि प्रस्तावात्सन्मार्गे 'कहन्ति कथं वर्तमानस्त्वं न 'नश्यसि ? | सत्पथाश्यवसे ? हे गौतम ! । गौतम आह-'ये' केचित् 'मार्गेणे'ति सन्मार्गेण 'गच्छन्ति' यान्ति ये च 'उन्मार्गप्रस्थिताः' उत्पथप्रवृत्ताः, ते 'सर्वे' निरवशेषा विदिताः-प्रतीता मम, न चैते पथापथपरिज्ञामन्तरेण सम्यग् ज्ञायन्त इति सैवानेन भजयन्तरेणोक्ता, विचित्रत्वाच ऋषीणां सूत्रकृतेरेवमभिधानं, ततश्च तत' इति पथापथपरिज्ञातो न | नश्याम्यहं मुने !, ये हि खयं कुपथसत्पथस्वरूपानभिज्ञा भवन्ति ते बहुतरकुपथदर्शनातेष्वेव सुपथभ्रान्त्या नश्येयुः, | अहं तु न तथेति कथं बहुतरकुपथदर्शनेऽपि नश्येयमिति भावः । 'मग्गे'त्यादि [सूत्र] सुगम, नवरं मार्गः-सन्मार्गः |कः , उपलक्षणत्वात्कुमार्गाश्च के ?, कुप्रवचनेषु-कपिलादिप्ररूपितकुत्सितदर्शनेषु पापण्डिनो-प्रतिनः कुप्रयचनपापण्डिनः सर्वे उन्मार्गप्रस्थिताः, बहुविधापायभाजनत्वात्तेपामिति भावः, अनेनापि भङ्गया कुप्रवचनानि कुपथा इत्युक्तं भवति, 'सन्मार्ग तु' प्रशस्तमार्ग पुनर्विद्यादिति शेषः 'जिनाख्यातं' जिनप्रणीतं मार्गमिति प्रक्रमः, कुतः
दीप अनुक्रम [९०६-९०९]
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Education
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||६०-६३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
बृहद्वृत्तिः ॥५०८
सूत्रांक ॥६०
-६३||
उत्तराध्य.
इत्याह-एप मार्गों हीति यस्माद् 'उत्तमः' अन्यमार्गेभ्यः प्रधानः, तस्मादयमेव सन्मार्ग इत्यभिप्रायः, उत्तमत्वं केशिगौतचास्य प्रणेतृणां रागादिविकलत्वेनेति भावनीयमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥
मीयाध्य ___ साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नोऽवि संसओ मज्झं, तं मे कहसु गोयमा ! ॥१४॥ साधुसूत्रं प्राग्यत् । सम्प्रति 'महाश्रोतोनिवारणे'त्ति नवमद्वारमुररीकृत्याह
महाउदगवेगेणं, बुज्झमाणाण पाणिणं । सरणं गई पहूँच, दीव के मन्नसी मुणी! ॥६५॥ अस्थि एगो महादीवो, वारिमझे महालओ । महाउदगवेगस्स, गई तत्थ न विजई ॥६६॥ दीवे अइह के चुसे, केसी
गोयममव्यवी । तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यवी ॥६७ ॥ जरामरणवेगेणं, बुज्झमाणाण पाणिणं । ४ धम्मो दीवो पइट्टा य, गई सरणमुत्तमं ॥१८॥
| सूत्रचतुष्टयम् , महदुदकं यत्र तत् महोदकं प्रक्रमान्महाश्रोतस्तस्य वेगो-रयो महोदकवेगस्तेन 'उद्यमानानां' नीयINमानानां 'पाणिणं'ति प्राणिनां शरणं' तनिवारणक्षममत एव गम्यमानत्वा गतिं तत एव च प्रतीय-आश्रित्य तिष्ठ-12
न्यत्र दुःखाभिहताःप्राणिन इति प्रतिष्ठा, 'अन्यत्रापी'ति (वा०) वचनाद् तां च द्वीपं कं मन्यसे ? मुने!, नास्त्येव ॥५०८॥
कश्चन तादृशो द्वीप इति प्रश्नयितुराशयः । गौतम आह-अस्ति-विद्यते एको महांश्चासौ प्रशस्यतया द्वीपश्च महाद्वीपः, हैक-बारिमध्ये' जलस्यान्तः समुद्रान्तर्वय॑न्तरद्वीप इत्यर्थः । कीटक् ?-'महालओत्ति महान्-उच्चैस्त्वेन विस्तीर्णतया
दीप अनुक्रम [९०६-९०९]
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||६५-६८|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
सूत्रांक
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||६५-६८||
84
च अत एव महोदकवेगस्य-श्रुभितपातालकलशबातेरितप्रवृद्धजलमहाश्रोतोवेगस्य 'गतिः' गमनं 'तत्रे'ति महाद्वीपे । न विद्यते। 'दीवे' इत्यादि, गतार्थ । जरामरणे एव च निरन्तरप्रवाहप्रवृत्ततया वेगः प्रक्रमादुदकमहाश्रोतसो| |जरामरणवेगस्तेनोद्यमानानामपरापरपर्यायमयनेन 'प्राणिनां' जीवानां धर्मः' श्रुतधर्मादिः द्वीप इव द्वीप उक्त इति | प्रक्रमः, स हि भवोदधिमध्यवर्ती मुक्तिपदनिवन्धनतया न जरामरणवेगेन गन्तुं शक्यत इति, तत्र तथाविधजरा-12 मरणाभावाद्, अत एव विवेकिनस्तमाश्रित्य तिष्ठन्तीति प्रतिष्ठा, तथा गतिः शरणं चोत्तमं प्राग्वत् । इहापि द्वीपमात्रप्रश्नाभिधानेऽपि शेषाभिधानं प्रक्रमोपलक्षणत्वात्तत्प्रश्नस्येति भावनीयमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो। अन्नोऽवि संसओ मझ, तं मे कहसु गोयमा ! ॥ ६८ ॥ साहुसूत्रमुक्तार्थम् । इदानीं संसारपारगमनाख्यं दशमद्वारमाश्रित्याह
अन्नवंसि महोहंसि, नावा विपरिधावई । जंसि गोयममारूढो, कहं पारं गमिस्ससी॥ ६९ ॥ जा उ अस्साविणी नावा, न सा पारस्स गामिणी । जा निरस्साविणी नावा, सा उ पारस्स गामिणी ॥७० ।।। नावा अइइ का वुत्ता, केसी गोयममब्बवी । तओ केसि बुवंतंत, गोयमो इणमब्ववी ॥ ७१ ।। सरीर-४ *माहु नावत्ति, जीवो बुचइ नाविओ। संसारो अन्नवो वुत्तो, जंतरंति महेसिणो ॥७२॥
दीप अनुक्रम [९११-९१४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||६९-७२|| नियुक्ति: [४५४...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक
॥५०९॥
||६९
-७२||
SCSC
सूत्रचतुष्टयं, 'अण्णवंसि महोहंसित्ति, 'अर्णवे' समुद्रे 'महौघे बृहज्जलप्रवाहे 'नाचा विपरिधावइ'त्ति 'नौः' द्रोणी केशिगौत'विपरिधावति' विशेषेण समन्ताद्गच्छति,'या' नावम् 'असि' भवसि,यस्यां वा नावि हे गौतम ! 'आरूढः' चटितस्त्व
मीयाध्य मिति गम्यते, ततः ‘कथं' केन प्रकारेण 'पारं' पर्यन्तं प्रक्रमादर्णवस्य 'गमिष्यसि ?' यास्यसि ?, न कथञ्चिदिति प्र-141 ष्टुराशयः। गौतम आह-'जा उत्ति या 'तुः' पूरणे आश्राविणी-जलसंग्राहिणी पाठान्तरतः साश्राविणी वा-सहाश्राबिभिः-जलप्रवेशान्वितैः प्रक्रमात्सन्धिभिर्वर्त्तत इतिकृत्वा नौः' द्रोणी न सा 'पारस्य' प्रस्तावात्समुद्रपर्यन्तस्य । गामिनी' अवश्यंयायिनी, 'जा निरस्साविणित्ति उत्तरत्र तुशब्दस्य भिन्नक्रमत्वाद् या पुनर्निष्क्रान्ता आश्राविभ्यः । प्राग्वत् सन्धिभ्यो निराश्राविणी नौः सा 'पारस्य' उक्तरूपस्य 'गामिनी' अवश्यं पारप्रापिका, ततोऽहं निराश्राविणीमारूढ उपायतः पारगाम्येव भविष्यामीति भावः । 'ना'त्यादि प्रतीतार्थ, नवरं नावस्तरणत्वात्तरिता ताये |च पृष्टमेवात एवोत्तरमाह-शरीरम् 'आहुः' ब्रुवते नौरिति, तस्यैव सम्यग्दर्शनादित्रयानुष्ठानहेतुतया, भवोदधिनि
५०९|| स्तारकत्वाज्जीवः 'उच्यते' प्रतिपाद्यते तीर्थकृद्भिरिति शेषो नाविकः, स धुक्तरूपया नावा भवोदधि तरतीति, संसारः ।। |'अर्णवः' समुद्र उक्तः, तस्यैव तत्त्वतस्तार्यत्वात् , 'यं' संसारमर्णवप्राय तरन्ति 'महेसिणोति प्राग्वन्महदेषिणो महर्षयो वा, तदा च तथाविधमहषीणां प्रत्यक्षत्वात् श्रोतृप्रतीत्यर्थमेतदिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥
दीप अनुक्रम [९१६-९१९]
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [२३], मूलं [-] / गाथा ||७३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत सूत्रांक ||७३||
साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मझ, तं मे कहसु गोयमा । ॥७३॥ साहुसूत्रं प्राग्वत् । अधुना 'तमसश्च विघाटने सेकादशद्वारमधिकृत्याह४] अंधयारे तमे घोरे, चिट्ठति पाणिणो बहू । को करिस्सइ उज्जोय, सव्वलोगंमि पाणिणं ॥ ७४ ॥ उग्गओ विमलो भाणू, सबलोगपभंकरो । सो करिस्सइ उज्जोयं, सब्बलोगंमि पाणिणं ॥७५। भाणू अ इति
के वुत्ते, केसी गोयममब्यवी । तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्बवी ॥ ७६ ॥ उग्गओ वीणसंसारो, |सवण्णू जिणभक्खरो। सो करिस्सइ उज्जोयं, सबलोगंमि पाणिणं ।। ७७॥ 4 सूत्रचतुष्टयं, अन्धमिवान्धं चक्षुःप्रवृत्तिनिवर्तकत्वेनार्थात् जनं करोतीत्यन्धकारस्तस्मिन् 'तमसि' प्रतीते 'घोरे' भयानके तिष्ठन्ति प्राणिनो बहवः, कः करिष्यत्युयोतं 'सर्वलोके' समस्तजगति प्राणिनां न कश्चित्तादृशं निर्दो-IN रयाम इति भावः । गौतम आह-'उद्गतः' उदितः 'विमल' निर्मलः 'भानुः आदित्यः 'सबलोगपहंकरें'त्ति सर्वलोकप्रभाकरः-सकलजगत्प्रकाशविधाता, 'भाणू यत्ति भानुः क उक्तो य उद्योतं करिष्यतीतिप्रक्रमः, 'उद्गतः' उदयं प्राप्तः क्षीणसंसारः' अपगतभवभ्रमणः सर्वज्ञः 'जिनभास्करः' अहंदादित्यः 'उद्द्योत' समस्तवस्तुप्रकाशनं, तब तमोविघट्टनादेवेति तदेवानेन भङ्गयोक्तं, शेषं स्पष्टमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ ____ साहु गोयम! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । अन्नोऽवि संसओ मझं, तं मे कहसु गोयमा ! ॥८॥
दीप अनुक्रम [९२०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [--1 / गाथा ||७९-८३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
प्रत
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥५१०॥
२३
सूत्रांक ||७९
-८३||
साहुसूत्रं तथैव । स्थानमेवोपसंपद्यते-प्राप्यत इति स्थानोपसम्पत्-प्राप्यं स्थानमिति द्वादशं द्वारमङ्गीकृत्याह- | केशिगौतसारीरमाणसे दुक्खे, बज्झमाणाण पाणिणं । खेम सिवं अणावाह, ठाणं किं मन्नसी मुणी!॥७९॥ मीयाध्यक अस्थि एर्ग धुवं ठाणं, लोगग्गंमि दुरारुहं । जत्थ नस्थि जरा मजू, बाहिणो वेयणा तहा ।। ८० ॥ ठाणे अ
इइ के वुत्ते, केसी गोयममब्बवी । तओ केसि बुवंतं तु, गोयमो इणमब्यवी ॥ ८१ ॥ निव्वाणंति अवाहंति, 8 दासिद्धी लोगग्गमेव य । खेम सिर्व अणावाई, जं तरंति महेसिणो ॥ ८२ ॥ तं ठाणं सासर्यवासं, लोग-1
ग्गमि दुरारुहं । जं संपत्ता न सोयंति, भवोहंतकरा मुणी! ।। ८३ ॥ | सूत्राणि पञ्च प्रतीतान्येव, नवरं 'सारीरमाणसे दुक्खे'त्ति आर्पत्वाच्छारीरमानसैर्दुःखैः 'वज्झमाणाणं' वाध्यमानानां पीड्यमानानां, पठ्यते च–'पचमाणाणं ति पच्यमानानामिव पच्यमानानामत्याकुलीक्रियमाणतया 'प्राणिनां' जीवानां क्षेमं व्याधिरहिततया शिवं सर्वोपद्रवाभावतः अनावाधं खाभाविकबाधापगमतस्तिष्ठन्त्यस्मि-* निति स्थानम्-आश्रयस्तदेवंविधं किं मन्यसे?-प्रतिजानीपे ?, न किञ्चिदीरशमिदं निश्चिनुम इति भावः । गीतम
॥५१०॥ आह-अस्ति 'एकम्' अद्वितीयं दुरारहति दुःखेनारुह्यते-अध्यास्थत इति दुरारोह, दुरापेणैव सम्यग्दर्शनादित्रयेण तदवाप्यत इतिकृत्वा, वेदनाश्वेह शारीरमानसदुःसानुभवात्मिकाः, ततश्चास्य व्याध्यभावेन क्षेमत्वं जरामरणाभावेन शिवत्वं, बेदनाऽभावेनानावाधकत्वमुक्तमिति यथायोगं भावनीयं, स्थानं किमुक्तं ? -ध्रुवादिविशेषण
दीप अनुक्रम
[९२६
-९३०]
For
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२३], मूलं [--1 / गाथा ||७९-८३|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
SHEReck
प्रत
सूत्रांक
||७९-८३||
विशिष्टमिति प्रक्रमः, निर्वान्ति-कर्मानलविध्यापनाच्छीतीभवन्त्यस्मिन् जन्तव इति निर्वाणं, इतिशब्दः खरूप| परामर्शको, यत्रापि नास्ति तत्राप्यध्याहर्तव्यः, तत उच्यत इत्यध्याहृत्य निर्वाणमितिशब्देन यदुच्यत इत्यादिभावना विधेया, 'अबाहन्ति अविद्यमानशारीरमानसपीडमिति प्राग्वत् , सिद्धयन्ति-निष्ठितार्था भवन्त्यस्यां जन्तव इति | | सिद्धिः 'लोकाग्रं' सर्वजगदुपरिवर्ति एवेति पूरणे 'चः' समुच्चये क्षेमं शिवमनावाधमिति च प्राग्वत् , तथा
यत् 'तरन्ति' प्लवन्ते गच्छन्तीत्यर्थः, तत्स्थानमुक्तमिति प्रक्रमः, सविशेषणस्य पृष्टत्वात्तदेव विशिनष्टि-सासर्यवासंति | विन्दोरलाक्षणिकत्वात् 'शाश्वतवासं' नित्यावस्थिति ध्रुवमितियावत् , लोकाग्रे दुरारोहमुपलक्षणत्वाजराधभाववत्, प्रसङ्गतस्तन्माहात्म्यमाह-यत्संप्राप्ता न शोचन्ते, कीदृशाः सन्त इत्याह-भवा-नारकादयस्तेषामोघः-पुनः पुनर्भव-15 रूपप्रवाहस्तस्थान्तकरा:-पर्यन्तविधायिनो भवौघान्तकराः 'मुणि'त्ति मुनय इति सूत्रपञ्चकार्थः ॥
साहु गोयम ! पन्ना ते, छिन्नो मे संसओ इमो । नमो ते संसयाईय!, सव्वसुत्तमहोयही! ८४॥ नवरं नमोऽस्त्विति शेषः 'ते' तुभ्यमिति 'संशयातीत !" सन्देहातिक्रान्त ! सर्वसूत्राणां महोदधिरिव महोदधिः सामस्त्येन तदाधारतथा तत्संबोधनं सर्वसूत्रमहोदधे !, अनेनोपबृंहणागर्भ स्तवनमाह । प्रश्नोपसंहारमाह नियुक्तिकृत्'एवं वारससु कमोति, एवमित्युक्तरूपो द्वादशसु प्रतिपादितप्रश्नेषु 'प्रक्रमः' परिपाटी, किमुक्तं भवति ?-अनेनैव क्रमेणामी केशिना कृताः, तथाहि-धर्मार्थत्वात्सर्षानुष्ठानस्य शिक्षात्रतरूपत्वाचास्य प्रथमतस्तेषां प्रश्नः, ततो लिङ्ग
दीप अनुक्रम
[९२६
-९३०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||८४|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
शिगौत
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥५१॥
मीयाध्य
A
प्रत सूत्रांक ||८४||
56-4-574
पाल्यान्यतानीति लिङ्गस्य, सत्यपि च लिङ्गे नात्मादिशत्रुजय विनाऽसौ सुखेन पालयितुं शक्यत इति शत्रुजयस्य, तेष्वपि कषाया एवोत्कटास्तदात्मकौ च रागद्वेषाविति पाशावकर्तनस्य, तत्रापि लोभ एव दुरन्त इति लतोच्छेदस्य, तदुच्छेदोऽपि न कषायनिर्वापणं विनेत्यग्निनिर्वापणस्य, तद्विध्यापनमपि न मनस्यनिगृहीत इति दुष्टाश्चनिग्रहस्य तन्निग्रहेऽपि च न सम्यक्पथपरिज्ञानं विनाऽभिमतपदप्राप्तिरिति तस्य सम्यक्पथश्च जिनप्रणीतधर्म एवेति तस्यैव ८ सन्मार्गत्वख्यापनाय महाश्रोतोनिवारणस्य ततस्तत्रैव दायोत्पादनार्थ संसारपारगमनस्य अथ यद्ययमेव सन्मार्गस्तत्किमित्यन्येऽपि न वदन्तीत्याशझ्यान्येपामज्ञत्यख्यापनार्थ तमोविघटनस्य, एवमपि किमनेन सन्मार्गेण स्थानमवाप्यमित्याशङ्कासम्भवे स्थानोपसम्पद इति गाथापदतात्पर्यार्थः । पुनस्तद्वक्तव्यतामेव सूत्रकृदाह
एवं तु संसए छिन्ने, केसी घोरपरकमे । अभिवंदित्ता सिरसा, गोयमं तु महायसं ॥ ४५ ॥ पंचमहव्ययं धम्मं, पडिवज्जइ भावओ। पुरिमस्स पच्छिमंमी, मग्गे तत्थ सुहावहे ।।८६ ॥ 'एवं तु'त्ति अमुनेच प्रकारेण 'संशये' उक्तरूपे 'छिन्ने' अपनीते, उभयत्र जातावेकवचनं, शेषं स्पष्टं, नवरं 'भावतः' इत्यभिप्रायतः, पूर्व हि चतुर्याम एव धर्मः प्रतिपत्तव्य इत्यभिप्राय आसीत् , अधुना तु पञ्चयाम इति, क पुनरयं पञ्चयामो धर्म इत्याह-'पुरिमस्स'त्ति पूर्वस्व, कोऽर्थः -आद्यस्य सोपस्कारत्वात्सूत्रस्य तीर्थकृतोऽभिमते 'पश्चिमे' पश्चिमतीर्थक
दीप अनुक्रम
ACARESCRECCA
[९३१]
IN||५११॥
454
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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Page #58
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||८७|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
SECCAGAR
प्रत सूत्रांक ||८७||
हूत्सम्बन्धितया 'मार्ग' पथि 'तत्रे'ति प्रक्रान्ते तत्र वा तिन्दुकोद्याने 'शुभावहे' कल्याणप्रापके मार्गस्य विशेषणमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययनार्थोपसंहारव्याजेन महापुरुषसङ्गमफलमाह
केसीगोअमओ निच्चं, तंमि आसि समागमे । सुयसीलसमुक्करिसो, महत्थस्थविणिच्छओ ॥ ८७ ।। 'केसिगौतमत' इति केशिगौतमावाश्रित्य 'नित्यं सदा तत्पुर्यवस्थानापेक्षया 'तस्मिन्' प्रक्रान्तस्थाने आसीत् । 'समागमें मीलके, किमासीदित्याह-श्रुतं-श्रुतज्ञानं शीलं-चारित्रं तयोः समुत्कर्षः-प्रकर्षः श्रुतशीलसमुत्कर्षः, तथा 3 महा-महाप्रयोजना मुक्तिसाधकत्वेन येऽर्थाः-शिक्षात्रतादयस्तेषां विनिश्चयो-विशिष्टो निर्णयो महार्थार्थविनिश्चयः,
तच्छिष्याणामिति गम्यते, 'केसित्ति सुब्लोपारकेशेा गौतमतः गौतमगणधरापेक्षयाऽपकर्षवत् श्रुतादिमत्त्यादित्य४/मुक्तम् , इदं तु क्वचिद् दृष्टमिति व्याख्यातमिति सूत्रार्थः ॥ शेषपर्षदो यदभूत्तदाह
.. तोसिआ परिसा सब्बा, संमग्गं समुवद्विया। | 'तोषिता' परितोष नीता परिपत्' सदेवमनुजासुरा सभा 'सी' निरवशेषा 'सन्मार्ग' मुक्तिपथमनुष्ठातुमिति | दगम्यते, 'समुपस्थिता' पाठान्तरतः 'पर्युपस्थिता' वा उभयत्रोद्यता, अनेन काका पर्षदफलमाह ॥ इत्थं सद्भूतगुणग
र्भसचरित्रवर्णनद्वारेण तयोः स्तवनमुक्त्वा प्रणिधानमाह
दीप अनुक्रम [९३४]
For PATREPIVanupontv
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२३], मूलं [-1 / गाथा ||८८|| नियुक्ति: [४५४...]
(४३)
उत्तराध्य.
केशिगीत
बृहद्वृत्तिः
मीयाध्य.
॥५१२।
प्रत सूत्रांक ||८८||
मथुया ते पसीयंतु, भयवं केसी गोयम् ॥ ८८ ॥ तिमि ।
॥ केसिगोयमिजं ॥ २३ ॥ संथुएत्युत्तरार्द्ध । 'संस्तुती' सम्यगभिवन्दितौ 'तो' उक्तरूपी 'प्रसीदतां प्रसादपरौ भवतां भगवत्केशिगौतमाविति सूत्रार्थः । इति' परिसमाप्तौ, ब्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायां केशिगौतमीयं नाम त्रयोविंशमध्ययनं समाप्तमिति ॥
ROGROGREGORose
दीप अनुक्रम
इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायागुत्तराध्ययनटी त्रयोविंशमध्ययनं समासम् ।।
[९३५]
इति श्रेष्टि देवचन्द्र लालभाई-जैनपुस्तकोद्धारे-ग्रन्थाङ्कः ३६.
॥५१२
JAIMEducatan intamational
For PF
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययनं- २३ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [-] / गाथा ||८८...|| नियुक्ति: [४५५-४५८]
अथ चतुर्विंशतितममध्ययनं प्रवचनमात्राख्यम् ।
प्रत सूत्रांक ||८८||
व्याख्यातं प्रयोविंशमध्ययनं, सम्प्रति चतुर्विंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययनें परेषामपि चिचविष्ठतिमुपलभ्य तदपनयनाय केशिगौतमवद्यतितव्यमित्युक्तम् , इह तु तदपनयनं सम्यग्वाग्योगत एव, स च प्रवचनमातृखरूपपरिज्ञानत इति तत्खरूपमुच्यत इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्य चोपक्रमादिचतुरनुयोगद्वारचर्चा प्राग्वत्सुकरैव यावन्नामनिष्पन्न निक्षेपे प्रवचनमातृ प्रवचनमातमिति वा द्विपदं नाम, तत्र तावत्प्रवचननिक्षेपाभिधानायाह नियुक्तिकृत्निक्खेवु पवयणमि(य)चउविहो दुविहोय होइ दवमि।आगमनोआगमओ नोआगमओ असो तिविहो जाणगसरीरभविए तबइरित्ते कुतित्थिमाईसु । भावे दुवालसंगं गणिपिडगं होइ नायवं ॥ ४५६ ॥ 8 मायमि उ निक्लेवो चउविहो दुविहो ।
॥४५७ ॥ जाणगसरीरभविए तबइरिते अ भायणे दत्वं । भावंमि अ समिईओ मायं खलु पवयणं अस्थ ४५८/४
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दीप अनुक्रम [९३५]
Hinathaindianarmon
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -२४ “प्रवचनमात्रा" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२४], मूलं [-] / गाथा ||८८...|| नियुक्ति: [४५५-४५८]
२४
प्रत सूत्रांक ||८८||
उत्तराध्य. RI निक्खेवेत्यादि गाथाश्चतस्रः, निक्षेपः प्रवचने चतुर्विधो-नामादिः, तत्र नामस्थापने क्षुण्णे एवेत्सनाहल द्रव्य- प्रवचनमा
द निक्षेपमाह-द्विविधो भवति 'द्रव्ये' विचार्ये, निक्षेप इति गम्यते, द्वैविध्यमेवाह-आगमतो नोआगमतः, तत्रागमतो ४ बृहद्वृत्तिः
कात्राख्यम्. ज्ञाता तत्र चानुपयोगवान् , नोआगमतस्तु स त्रिविधः । कथमित्याह-जाणगसरीरभविए तबतिरित्ते य'त्ति, शरी॥५१३॥ हरभव्यशरीरे प्रक्रमात्प्रवचने तयतिरिक्तं 'कुतित्थिमाईसुति कुतीर्थ्यादिषु प्रवचनमादिशब्दात्सुतीर्थेषु च ऋषभादि-11
सम्बन्धिषु पुस्तकादिन्यतं भाष्यमाणं वा, भावे 'द्वादशाङ्गम्' आचारादिष्टिवादपर्यन्तं गणिनः-आचार्यातेषां पिटकमिव पिटकं-सर्वखाऽऽधारो गणिपिटकं भवति' ज्ञातन्यं प्रवचनं, नन्वेवं दृष्टिवादान्तर्गतत्वात्सकलकुदृष्टीनामपि भावप्रवचनतैव प्राप्ता ?, उच्यते, अस्त्येतत्, किन्त्वेकपक्षावधारणपरतयाऽसदष्टित्वाव्यप्रवचनतैवाऽऽसामिति नोक्तदोषापत्तिः ॥ मातशब्दं निक्षेप्नुमाह-'माते' मातशब्दे 'तुः' पूरणे निक्षेपश्चतुर्विधो-नामादिः, द्विविधो भवति द्रव्ये-आगमनोआगमतः, तत्रागमतस्तथैव, नोआगमतश्च स त्रिविधो-ज्ञशरीरभव्यशरीरे तयतिरिक्तं च 'भाजने | कांस्यपात्रादौ 'द्रव्यम्' मोदकादि, प्रस्तावाद्यत्र मातम्-अन्तः प्राप्तावस्थिति तद्दन्यं मातमुच्यते, भावे च 'समि-13
॥५१३॥ तयः' ईयासमित्यादयो माता अभिधीयन्ते 'मातम्' अन्तरवस्थितं 'खलु' निश्चितं 'प्रवचनं' द्वादशाङ्गं 'यत्र' इति यासु । तदेवं नियुक्तिकृता मातशब्दो निक्षिसः, यदा तु 'माय'त्ति पदस्य मातर इति संस्कारस्तदा द्रव्यमातरो
दीप अनुक्रम [९३५]
H
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२४], मूलं [-1 / गाथा ||१३|| नियुक्ति: [४५९]
**
प्रत सूत्रांक ||१३||
RAKES
जनन्यो भावमातरस्तु समितयः, एताभ्यः प्रवचनप्रसवात् , उक्तं हि-"ऐया पबयणमाया दुवालसंग पसूयातो"त्ति, || सुज्ञानत्वाच एतन्निक्षेप उपेक्षित इति गाथाचतुष्टयार्थः ॥ सम्प्रति नामान्वर्थमाहहै असुवि समिईसु अ दुवालसंग समोअरइ जम्हा । तम्हा पवयणमायाअज्झयणं होई नायवं ४५९ ।
'अष्टाखपि' अष्टसङ्ख्याखपि समिति' 'द्वादशाहं प्रवचनं समवतरति-संभवति यस्मात् , ताहाभिधीयन्त इति ग४ म्यते, तस्मात्प्रवचनमाता प्रवचनमातरो वोपचारत इदमध्ययनं 'भवति' ज्ञातव्यमिति गाथार्थः ॥ गतो नामनिष्पन्नो।
निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्न निक्षेपावसरः, स च सूत्रे सति भवतीति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तच्चेदम्-8 ___अट्टप्पवयणमायाओ, समिई गुत्ती तहेव य । पंचेच य समिईओ, तो गुत्ती आहिया ॥१॥इरियाभासेसणादाणे, खच्चारे समिई इय । मणगुत्ती वयगुत्ती, कायगुत्ती उ अट्ठमा ।।२॥ एयाओ अट्ठ समिईओ, || समासेण वियाहिया । दुवालसंगं जिणक्खायं, मायं जत्थ उपवयणं ॥३॥
सूत्रत्रयं प्रकटार्थमेच, नवरं 'समिति'त्ति समितयः 'गुत्ति'त्ति गुप्तयः, तत्र च समितिः-सम्यक्-सर्ववित्प्रवचनानुसारितया इतिः-आत्मनः चेष्टा समितिः तात्रिकी सफ़ाईयादिचेष्टामु पञ्चसु, गोपनं गुप्ति:-सम्बग्योगनिग्रहः तथैव चेति समुच्चये,उक्तं हि-'सम्यग्योगनिग्रहो गुप्ति'रिति(तत्त्वा०अ०९ सू०४), भवन्त्वेताः प्रवचनमाताः, अष्टसङ्ख्यत्वं १ एताः प्रवचनमातरो द्वादशाङ्गं प्रसूताः
दीप अनुक्रम [९३६-९३८]
*
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२४], मूलं [-1 / गाथा ||१३|| नियुक्ति: [४५९]
प्रत सूत्रांक ||१३||
उत्तराध्य. तु कथमासामिति संशये समितीना पञ्चत्वं गुप्तीना च त्रिकत्वमुक्तम् आहिया' इति आख्याता:-कथिताः,
तीर्थकृदादिभिरिति गम्यते, ता एव नामग्राहमाह-ईरणमीया-गतिपरिणामो भाषणं भाषा एषणमेपो-गवेबृहद्वृत्तिः
मात्राख्यम्. पणं तं करोतीति णिक ततः स्त्रीलिङ्गे भावे युटि एषणा आदान-ग्रहणं पात्रादेः निक्षेपोपलक्षणमेतत् तत एषां । ॥५१४॥ समाहारे ईर्याभाषेषणादानं तस्मिन् , 'उच्चारे समिई इय'ति चस्य भिन्नक्रमत्वादुचारशब्दस्य चोपलक्षणत्वादुचारा- २४
दिपरिष्ठापनायां च समितिः, अस्य च प्रत्येकमभिसम्बन्धादीर्यासमितिरित्यादिरमिलापो विधेयः, 'इति' परिसमाप्ती, द एतावत्य एव समितयः, तथा मनसो गुप्तिमनोगुप्तिरिति तत्पुरुषः, एवमुत्तरयोरपि, निगमनमाह-एताः' इत्यनन्त
रोक्ताभिधाना अष्ट समितयो, गुप्तीनामपि 'प्रवचन विधिना मार्गव्यवस्थापनमुन्मार्गगमननिवारणं गुप्ति'रिति वचनाकथश्चित्सचेष्टात्मकत्वात्समितिशब्दवाच्यत्वमस्तीत्येवमुपन्यासः, यत्तु भेदेनोपादानं तत्समितीनां प्रवीचाररूपत्वेन | गुप्तीनां प्रवीचाराप्रवीचारात्मकत्वेनान्योऽन्य कथश्चिद्भेदात् , तथा चागमः-"समिओ णियमा गुत्तो गुत्तो समियत्न-14 हामि भइयो । कुसलवइमुदीरतो जं वइगुत्तोऽपि समिओऽवि ॥१॥" 'समासेन' सकलागमसङ्करेण व्याख्याताः,
जिनाख्यातं मातम् उत्तरत्र तुशब्दस्वकारार्थस्य भिन्नक्रमत्वात् 'मातमेव' अन्तर्भूतमेव 'यत्र' इति यासु 'प्रवच४ नम्' आगमः, तथाहि-ईर्यासमिती प्राणातिपातविरमणप्रतमवतरति, तहत्तिकल्पानि च शेषत्रतानि तत्रैवान्त-18
१ समितो नियमागुतो गुप्तः समितत्वे भक्तव्यः । कुशलवच उदीरयम् यद्वचोगुमोऽपि समितोऽपि ॥ १॥
दीप अनुक्रम [९३६-९३८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२४], मूलं [-] / गाथा ||१-३|| नियुक्ति: [४५९]
प्रत सूत्रांक ||१३||
र्भावमुपयान्ति, तेषु च न तदस्ति यन्न समवतरति, यत उक्तम्-"पंढर्ममि सहजीवा बीए चरिमे य सघदवाई। सेसा महत्वया खलु तदेकदेसेण णायबा ॥ १ ॥" इत्यर्थतः सर्वमपि प्रवचनमिह मातमुच्यते, भाषासमितितु सावधवचनपरिहारतो निरवद्यवचोभाषणात्मिका तया च वचनपर्यायः सकलोऽप्याक्षिप्त एव,न च तद्वहिर्भूतं द्वादशाङ्गमस्ति, एवमेषणासमित्यादिष्वपि खघिया भावनीयं, यहा सर्वा अप्यमश्चारित्ररूपाः, ज्ञानदर्शनाविनाभाषि च चारित्रं, न चैतप्रयातिरिक्तमन्यदर्थतो द्वादशामिति सर्वास्वप्येतासु प्रवचनं मातमुच्यते, अन्यथा वाऽऽगमावि-1 रोधेनाभिधेयमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ तोर्यासमितिखरूपमाह
आलंबणेणं कालेणं, मग्गेण जयणाइ य । चउकारणपरिसुद्धं, संजए इरियं रिए ॥ ४॥ तत्थ आलंयणं नाणं, दंसर्ण चरणं तहा । काले य दिवसे बुत्ते, मग्गे उप्पहवजिए ॥५॥ दब्बओ खित्तो चेच, कालओ भावओ तहा । जयणा चउब्विहा वुत्ता, तं मे कित्तयओ सुण ॥६॥ दब्बओ चक्खुसा पेहे, जुगमित्तं च [खित्तओ। कालओ जाव रीइजा, उवउत्तो य भावओ॥७॥ इंदियत्थे विवजित्ता, सज्झायं चेष पंचहा । तम्मुत्ती तप्पुरकारे, उवउत्ते रियं रिए ॥८॥ ___ आलम्बनेन कालेन मार्गेण यतनया च चतुष्कारणैः-एभिरेवालम्बनादिभिः परिशुद्धा-निर्दोषा चतुष्कारणपरि
१ प्रथमे सर्वजीवा द्वितीये चरमे च सर्वद्रव्याणि । शेषाणि महाब्रतानि तदेकदेश एव ज्ञातव्यानि ।। १॥
दीप अनुक्रम [९३६-९३८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"-मलस
अध्ययनं [२४], मूलं [-1 / गाथा ||४-८||
नियुक्ति: [४५९...]
प्रवचनमा
प्रत सूत्रांक ||४-८||
२४
उत्तराध्य- शुद्धा ता 'संयतः' यतिः 'इयाँ' गति रियत्ति रीयेत अनुष्ठानविषयतया प्राप्नुयात् , यद्वा सुब्व्यत्ययाचतुष्कारणप
रिशुद्धया ईर्यया 'रीयेत' गच्छेत् । आलम्बनादीन्येव व्याख्यातुमाह-तत्र' तेष्वालम्बनादिषु मध्ये आलम्बनं । बृहद्धृत्तिः
त्राख्यम् यदालम्ब्य गमनमनुज्ञायते, निरालम्बनस्य हि नानुज्ञातमेव गमनं, तत्किमित्याह-ज्ञानं सूत्रार्थोभयात्म॥५१५॥ कागमरूपं 'दर्शन' दर्शनप्रयोजनं (शास्त्रं )'चरणं' चारित्रं, तथाशब्दोऽनुक्तसमुच्चयार्थः, तेन द्वित्रादिभङ्गसूचकः,
तितोऽयमर्थः-प्रत्येकं ज्ञानादीन्याश्रित्य द्विकादिसंयोगतो वा गमनमनुज्ञातम् , आलम्बनेनेति व्याख्यातं, कालेनेति ६व्याचष्टे-कालश्च प्रस्तावादीर्याया दिवस उक्तः, तीर्थकृदादिभिरिति गम्यते, रात्रौ वचक्षुर्विषयत्वेन पुष्टतरालसम्बनं विना नानुज्ञातमेव गमनं, मार्गेणेति द्वारं व्याख्यातुमाह-मार्ग इह सामान्येन पन्थाः स उत्पथेन-उन्मा
र्गेण पर्जितो-रहित उत्पथवर्जित उक्त इति सम्बन्धः, उत्पथे हि अजत आत्मसंयमविराधनादयो दोषाः । यत-1 नेति बुवूपराह-'दबतो' इत्यादि, सुगममेव, नवरं 'ताम्' इति चतुर्विधयतनां मे 'कीर्तयतः' सम्यक्खरूपाभिधानद्वारेण संशब्दयतः 'शृणु' आकर्णय शिष्येति गम्यते । यथाप्रतिज्ञातमेवाह-'द्रव्यत' इति जीवादिकं द्रव्यमाश्रियेयं यतना-यत् 'चक्षुषा' रष्ट्या प्रेक्षेत' अवलोकयेत्, प्रक्रमाजीवादिकं द्रव्यम् , अवलोक्य च संयमात्मवि- ५१५॥ राधनापरिहारेण गच्छेदिति भावः, 'युगमात्रं च' चतुर्हस्तप्रमाणं प्रस्तावात्क्षेत्रं प्रेक्षेत, इयं क्षेत्रतो यतना,कालतो यतना| 31 यावत् 'रीयिज'त्ति रीयते यावन्तं कालं पर्यटन्ति तावत्कालमानेति गम्यते, उपयुक्तश्च भावतो-दत्तावधानो यद्री-||
दीप अनुक्रम [९३९
C2446402
-९४३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२४], मूलं [-] / गाथा ||४-८|| नियुक्ति: [४५९...]
प्रत
सूत्रांक
||४-८||
यते, इयं भावमङ्गीकृत्य यतना। उपयुक्तत्वमेव स्पष्टयितुमाह-'इन्द्रियार्थान्' शब्दादीन् 'विवर्य' तदनध्यवसानतः परिहत्य, खाध्यायं चैव 'च' समुच्चये एवकारोऽपिशब्दार्थः, ततोऽयमर्थः-न केवलमिन्द्रियार्थान् विवज्य | किन्तु खाध्यायं चापि 'पञ्चधेति वाचनादिभेदतः पञ्चप्रकार, गत्युपयोगोपघातित्वात्, ततश्च तस्यामेवेर्यायां मूर्तिः-शरीरमाद्वयाप्रियमाणा यस्यासी तन्मूर्तिः, तथा तामेव पुरस्करोति-तत्रैवोपयुक्ततया प्राधान्येनाशीकुरुत इति तत्पुरस्कारः, अनेन कायमनसोस्तत्परतोक्का, बचसो हि तत्र व्यापार एव न समस्ति, एवमुपयुक्तः सन्नीयो रीयेत यतिरिति शेषः, सर्वत्र च संयमात्मविराधनैव विपक्षे दोष इति सूत्रपञ्चकार्थः । सम्प्रति भाषासमितिमाह
कोहे माणे य माया य, लोभे य जवउत्तया । हासे भय मोहरिए, विगहासु तहेव य॥९॥ एयाई अह ठाणाई, परिवज्जित्तु संजओ। असावलं मियं काले, भासं भासिज्ज पन्नवं ॥१०॥
क्रोधेमाने च मायायां लोभे च 'उपयुक्तता' क्रोधाधुपयोगपरता तदेका यतनेतियावत् , हासे 'भय'त्ति भये मौखदिये विकथासु तथैवोपयुक्ततेति सम्बन्धः, तत्र क्रोधे यथा कश्चिदतिकुपितः पिता प्राह-न त्वं मम पुत्रः,पाश्चैवर्तिनो।
वा प्रति प्राह-बन्नीत बनीतैनमित्यादि, माने यथा कश्चिदभिमानाध्मातचेता न कश्चिन्मम जात्यादिभिस्तुल्य इति वक्ति, मायायां यथा परव्यंसनार्थमपरिचितस्थानवत्ती सुतादौ भणति-नायं मम पुत्रो न चाहमस्य पितेत्यादि,लोभे यथा कश्चिद्वणिक् परकीयमपि भाण्डादिकमात्मीयमभिधत्ते, हास्ये यथा केलीकिलतया कञ्चन तथाविधं कुलीनम
दीप अनुक्रम [९३९
-९४३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [--] / गाथा ||९-१०|| नियुक्ति : [४५९...]
प्रवचन
बृत्तिः
SEX
प्रत
२४
सूत्रांक
||९-१०||
उत्तराध्य. 1 प्यकुलीनमित्युल्लपति, भये यथा तथाविधमकार्यमाचर्य स त्वं येन तत्तदाचरितमिति पृष्टः प्राह-नाहं तदाऽस्मिन्
देशे एवाभूवमित्यादि, मौखर्ये यथा मुखरतया यत्तत्परपरिवादादि वदन्नास्ते, 'विकथासु' ख्यादिकथासु-'अहो!
कटाक्षविक्षेपास्तस्याः' इत्यादिकमाह, पठ्यते च-"कोहे य माणे य माया य लोभे य तहेव य ! हासभयमोहरीए, ॥५१६॥ विकहा य तहेव य॥१॥" गतार्थमेव । 'एतानि' अनन्तरमुक्तरूपाण्यष्टौ स्थानानि 'परिवयं' परिहत्य संयतः
किमित्याह-'असावाँ निर्दोषां तामपि 'मिता स्तोकां यावत्युपयुज्यते तावतीमेव' 'काले' प्रस्तावे 'भाषां वाचं 'भाषेत' वदेत् प्रज्ञा-बुद्धिस्तद्वानिति सूत्रद्वयार्थः ॥ एषणासमितिमाह
गवेसणाए गहणे य, परिभोगेसणा य जा। आहारोवहिसिज्जाए, एए तिन्नि विसोहए ॥ ११ ॥
उग्गमुपायणं पढमे, बीए सोहिल एसणं । परिभोगभि चउर्फ, विसोहिज जयं जई ॥१२॥ 'गवेषणायाम्' अन्वेषणायां 'ग्रहणे च' खीकारे, उभयत्र प्राकृतत्वादेषणेति संबध्यते, ततो गवेषणायामेषणा ग्रहणे चैषणा, परिभोग-आसेवनं तद्विषयैषणा परिभोगैषणा च या, 'आहारोवहिसेज्जाए'त्ति वचनव्यत्ययाद् 'आहा
रोपधिशय्यासु' प्रतीतासु एताः' उक्तरूपा एषणाः सूत्रत्वाल्लिङ्गव्यत्ययात्तिस्रः 'विशोधयेत्' निर्दोषा विदध्यात्, वा पठ्यते च-"गवेसणाए गहणेणं, परिभोगेसणाणि य । आहरमुवहिं सेजं, एए तिनि विसोहिय ॥१॥"त्ति, अस्स*
च गवेषणादिभिराहारादीनि त्रीणि विशोधयेदिति सङ्केपार्थः । कथं विशोधयेदित्याह-उद्गमश्चोत्पादना चोद्मो
दीप अनुक्रम [९४४-९४५]
॥५१॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [--] / गाथा ||११-१२|| नियुक्ति : [४५९...]
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सूत्रांक
-१२||
त्पादनमिति समाहारः, तत्किमित्याह-विशोधयेदित्युत्तरेण सम्बन्धः, किमुक्तं भवति ?-आधाकर्मादिदोषपरिहारत 31 ४ उद्गम धात्र्यादिदोषपरित्यागतश्चोत्पादनां शुद्धामादधीत 'पढमत्ति प्रथमायां गवेषणैषणायां, 'बीय'त्ति द्वितीयायां & ग्रहणैषणायां शोधयेच्छङ्कितादिदोषत्यागतः 'एषणां' ग्रहणकालभाविग्राह्यगतदोषान्येषणात्मिका, 'परिभोग' इति ||
परिभोगैषणायां चतुष्क पिण्डशय्यावखपात्रात्मकम् , उक्तं हि-पिंड सेजं च पत्थं च, चउत्थं पायमेव य"त्ति. विशो-10 १ धयेत्, इह चनुष्कशब्देन तद्विषय उपभोग उपलक्षितः, ततस्तं विशोधयेदिति, कोऽर्थः ?-उद्गमादिदोषत्यागतः
शुद्धमेव चतुष्कं परिभुञ्जीत, यदिवोद्गमादीनां दोपोपलक्षणत्वात् 'उग्गम'त्ति उद्गमदोषान् 'उप्पायणं'ति उत्पादनादोपान् 'एसण'त्ति एषणादोषान् विशोधयेत् , 'चतुष्कं च' संयोजनाप्रमाणाङ्गारधूमकारणात्मकम् , अङ्गारधूमयोर्मोहनीयान्तर्गतत्वेनैकतया विवक्षितत्वात् विशोधयेत् उभयत्र शोधनमपनयनं, 'जय'ति यतमानः 'यतिः' तपखी, व्याख्याद्वयेऽपि च पुनस्तस्या एव क्रियाया अभिधानमतिशयख्यापनार्थमिति सूत्रद्वयार्थः । इदानीमादाननिक्षेपणसमितिमाह
ओहोवहोवग्गहियं, भंडयं दुविहं मुणी । गिण्हतो निक्खिचतो य, पउँजिज्ज इमं विहिं ॥ १३ ॥ चक्खुसा पडिलेहित्ता, पमजिज जयं जई । आदिए निक्विविजा वा, दुहओऽवि समिए सया ॥१४॥ १ पिण्डं शय्यां च वसं च पात्रमेव च चतुर्थम् ।
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दीप अनुक्रम [९४६-९४७]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||१३
-१४॥
दीप
अनुक्रम
[९४८
-९४९]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५१७॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१३-१४|| निर्युक्ति: [४५९...]
अध्ययनं [२४],
'ओहोहो गहिर्य'ति उपधिशब्दो मध्यनिर्दिष्टत्वात् डमरुकगुणग्रन्थिवदुभयत्र संबध्यते, तत ओघोपधिमौ--- पग्रहिकोपधिं च 'भाण्डकम्' उपकरणं रजोहरणदण्डकादि 'द्विविधम्' उक्तभेदतो द्विभेदं मुनिः 'गृह्णन्' आददानः 'निक्षिपंश्च' क्वचित्स्थापयन् 'प्रयुञ्जीत' व्यापारयेत् 'इमं' वक्ष्यमाणं 'विधि' न्यायं । तमेवाह- 'चक्षुषा' दृष्ट्या | 'पडिले हित्त' त्ति 'प्रत्युपेक्ष्य' अवलोक्य 'प्रमार्जयेत्' रजोहरणादिना विशोधयेत् यतमानो यतिस्ततः 'आदिए'त्ति 'आदद्दीत' गृह्णीयात् 'निक्षिपेक्षा' स्थापयेत् 'दुहतोऽवि'त्ति द्वावपि प्रक्रमा दौघिकोपग्राहिकोपधी, यदिवा 'द्विधाऽपि ' द्रव्यतो भावतश्च 'समितः' प्रक्रमादादाननिक्षेपणासमितिमान् सन् 'सदा' सर्वकालमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रति परिष्ठापनासमितिमाह----
उच्चारं पासवर्ण, खेलं सिंघाण जल्लियं । आहारं उबहिं देहं अन्नं वावि तहाविहं ।। १५ ।। अणावायमसंलोए अणवाए चैव होइ संलोए । आवायमसंलोए आवाए चेव संलोए ॥ १६ ॥ अणवायमसंलोए, परस्णुवधाइए । समे अज्झसिरे वावि, अचिरकालकमि य ॥ १७ ॥ विच्छिन्ने दूरमोगाढे, णासन्ने बिलबज्जिए । तसपाणवीयरहिए, उच्चाराईणि वोसिरे ॥ १८ ॥
'उच्चार' पुरीषं 'प्रश्रवणं' मूत्रं 'खेल' मुखविनिर्गतं श्लेष्माणं 'सिंघाणं'ति नासिकानिष्क्रान्तं तमेव 'जल्लियं' ति आर्यत्वात् जलो- मलस्तम् 'आहारम्' अशनादिकम् 'उपधिं' वर्षाकल्पादि 'देह' शरीरम् 'अन्यद्वा' कारणतो गृहीतं
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प्रवचनमा
त्राख्यम्. २४
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॥५१७॥
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
॥१५
-१८॥
दीप
अनुक्रम
[९५०
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१५-१८|| निर्युक्तिः [४५९...]
अध्ययनं [२४],
गोमयादि 'अपिः' पूरणे तथाविधं परिष्ठापनार्ह प्रक्रमात्स्थण्डिले व्युत्सृजेदित्युत्तरेण सम्बन्धः । स्थण्डिलं च दशविशेषणपदविशिष्टमिति मनस्याधाय तद्गताखिलभङ्गोपलक्षणार्थमाद्यविशेषणपदयोर्भङ्गरचनामाह-अविद्यमान आपातःखपरोभयपक्षसमीपागमनरूपोऽस्मिन्नित्यनापातं स्थण्डिलमिति गम्यते, 'असंलोए'त्ति सूत्रत्वादिहोत्तरत्र च लिङ्गव्यत्यये न विद्यते संलोको - दूरस्थितस्यापि खपक्षादेशलोको यस्मिंस्तत्तथेति प्रथमो भङ्गः १, 'अनापातं चैव भवति संलोक' यत्रापातो नास्ति संलोकश्चास्तीति द्वितीयो भङ्गः २, 'आपातमसंलोक' मिति यत्रापातोऽस्ति न च संलोक इति तृतीयः ३, 'आपातं चैव संलोकं यत्रोभयमपि संभवतीति चतुर्थः ४, इह चापातसंलोकमिति च अर्शआदराकृतिगणत्वान्मत्वर्थीयेऽचि द्रष्टव्यं काका दशविशेषणपदज्ञानार्थ, तानि याहशे स्थण्डिले व्युत्सृजेत्तदाह- अनापाते असंलोके, कस्य पुनरयमापातः संलोकश्चेत्याह-- 'परस्य' स्वपक्षादेः, गमकत्वाचोभयत्र सापेक्षत्वेऽपि समासः, उपघातः - संयमात्मप्रवचन वाधात्मको विद्यते यत्र तदुपघातिकं न तथाऽनुपघातिकं तस्मिन्, तथा 'समे' निम्नोन्नतत्ववर्जिते 'अशुपिरे वाऽपि' तृणपर्णाद्यनाकीर्णे 'अचिरकालकृते च' दाहादिना खल्पकालनिर्वर्त्तिते, चिरकालकृते हि पुनः संमूर्च्छन्त्येव पृथ्वीका यादयः, 'विस्तीर्णे' जघन्यतोऽपि हस्तप्रमाणे 'दूरमवगाढे' जघन्यतोऽप्यधस्ताच्चतुरङ्गुलमचित्तीभूते 'नासन्ने' ग्रामारामादेरवर्त्तिनि 'विठवर्जिते' मूषकादिरन्धरहिते त्रसप्राणाश्च द्वीन्द्रियादयो वीजानि च - शाल्यादीनि सकलैकेन्द्रियोपलक्षणमेतत्, तैस्तत्रस्थैरागन्तुकैश्च रहितं वर्जितं त्रसप्राणवीजरहितं तस्मिन्,
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [--1 / गाथा ||१५-१८|| नियुक्ति: [४५९...]
प्रवचनमा
त्राख्यम्.
२४
प्रत सूत्रांक ||१५-१८||
उत्तराध्य. | स्थण्डिल इति शेषः, 'उच्चारादीनि' उक्तरूपाणि 'व्युत्सृजेत्' परिष्ठापयेत् । इह चोचारं प्रश्रयणमित्यादाबुक्तेऽपि
पुनरुचारादीनीत्यभिधानं विस्मरणशीलस्मरणार्थमदुष्टमेवेति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ सम्प्रत्युक्तमुपसंहरन् यक्ष्यमाणार्थस
म्बन्धाभिधानायाह॥५१८॥
एयाओ पंच समिईओ, समासेण वियाहिया । इत्तो उतओ गुत्तीओ, वुच्छामि अणुपुब्बसो ॥१९॥ निगदसिद्धं, नवरम् ‘एत्तो'त्ति अतश्च समितिप्रतिपादनानन्तरं 'तो'त्ति तिस्रः 'अणुपुषसो ति आपत्वादानुपूर्व्या | क्रमेणेत्यर्थः । तत्राद्यां मनोगुप्तिमाह
सच्चा तहेव मोसा य, सचामोसा तहेव य । चउत्धी असचमोसा य, मणगुत्ती चउब्विहा ॥२०॥
संरंभसमारंभे, आरंभे य तहेव य । मणं पवमाणं तु, नियत्तिज जयं जई ॥२१॥ सभ्यः-अर्थात्पदार्थेम्यो हितो-यथावद्विकल्पनेनाप्तः सत्यो मनोयोगस्तद्विषया मनोगुसिरप्युपचारात्सत्या, तथैव | मृषा च-तद्विपरीतमनोयोगविषया, 'सत्यामृषा' उभयात्मकमनोयोगगोचरा, तथैव चेति समुचये, चतुर्थी 'असत्यामृषा' उभयखभावविकलमनोदलिकव्यापाररूपमनोयोगगोचरा मनोगुप्तिः, प्रक्रमाञ्च सर्वत्रैवं योजना, उपसंहारमाह-मनोगुप्तिः 'चतुर्विधा' उक्तभेदतश्चतुर्भेदा, अस्या एव स्वरूपं निरूपयन् काकोपदेष्टुमाह-संरम्भः-सङ्कल्पः सच मानसः; तथाऽहं ध्यास्यामि यथाऽसौ मरिष्यतीत्येवंविधः, समारम्भः-परपीडाकरोचाटनादिनिबन्धनं ध्यानम् ,
दीप अनुक्रम [९५०-९५३]]
५१८॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [-1 / गाथा ||२०-२१|| नियुक्ति: [४५९...]
प्रत
सूत्रांक
||२०
-२१||
अनयोः समाहारतस्मिन् , आरम्भ:-अत्यन्तक्लेशतः परप्राणापहारक्षममशुभध्यानमेव तस्मिन् 'चः' समुचये 'तथैय'। तेनैवागमप्रतीतेन तत्र मनसोऽसन्निवेशात्मकेन प्रकारेण 'चा' पूरणे 'मनः' चित्तं 'प्रवर्त्तमानं' व्याप्रियमाणं 'तुः' विशेषणे 'निवर्तयेत्' नियमयेत् 'जय'ति यतमानः 'यतिः' तपखी। विशेषश्चायमिह-शुभसङ्कल्पेषु मनः प्रवर्तयेत् , प्रवीचाराप्रवीचाररूपत्वाद्सेरिति सूत्रद्वयार्थः ॥ वागगुप्तिमाह
सचा तहेव मोसा य, सञ्चामोसा तहेव य । चउत्थी असचमोसा य, वयगुत्ती चउब्विहा ॥२२॥
संरंभसमारंभे, आरंभे य तहेव य । वयं पवत्तमाणं तु, नियत्तिज जयं जई ॥२३॥ सूत्रद्वयमनन्तरं व्याख्यातमेव, नवरं मनोगुप्तिस्थाने वागगुप्तिरुचारयितव्या, तथा सत्या वाक् जीवं जीवमिति प्ररूपयतः असत्या जीवमजीवमिति संत्यामृषा क्वचिद्विवक्षितसमये मनुष्यशतमुत्पन्नमुपरतं चेति असत्यामृषा तु विधेहि खाध्यायं नैतत्सदृशमन्यत्तपोऽस्तीत्यादि, तथा वाचिकः संरम्भ:-परल्यापादनक्षमक्षुद्रविद्यादिपरावर्तनास-1 कल्पसूचको ध्यनिरेवोपचारात्सङ्कल्पशब्दवाच्यः सन्, समारम्भः-परपरितापकरमन्त्रादिपरावर्त्तनम् 'आरम्भः' तथाविधसंक्लेशतः प्राणिनां प्राणव्यपरोपणक्षममन्त्रादिजपनमिति सूत्रद्वयार्थः । इदानी कायगुप्तिमभिधातुमाह
ठाणे निसीयणे चेव, तहेव य तुपदणे । उल्लंघण पल्लंघण, इंदियाण य जुजणे ॥ २४ ॥ संरंभसमारंभे, आरंभे य तहेव च । कार्य पवत्तमाणं तु, नियत्ति जयं जई ॥ २५ ॥
दीप अनुक्रम [९५६-९५७]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२४], मूलं [--1 / गाथा ||२४-२५|| नियुक्ति: [४५९...]
उत्तराध्य.
प्रत
बृहद्वृत्तिः ॥५१९॥
सूत्रांक ||२४
SASARY
-२५||
'स्थाने' ऊर्द्धस्थाने 'णिसीयणि'त्ति 'निषदने' उपवेशने, चः तयोरेव विचित्रभेदसमुच्चयार्थः, 'एवं' इति पूरणे, प्रवचनमातथैव च 'त्वग्वर्त्तने शयने 'उलइने तथाविधनिमित्तत ऊर्ध्वभूमिकाथुत्क्रमणे गघितिक्रमणे वा 'प्रलङ्घने' सामा-1
त्राख्यम्. न्येन गमने, उभयत्र सूत्रत्वात्सुपो लुक, 'इन्द्रियाणां च' स्पर्शनादीनां 'झुंजणे'त्ति योजन-शब्दादिविषयेषु व्यापारणं तस्मिन् , सर्वत्र च वर्चमान इति शेषः, ततः स्थानादिषु वर्तमानः संरम्भ:-अभिघातो यष्टिमुष्टयादिसंस्थानमेव सङ्कल्पसूचकमुपचारात्सङ्कल्पशब्दयाच्यं सत् समारम्भ:-परितापकरो मुष्टयाधभिघातः, ततः संरम्भश्च समारम्भश्च ||
संरम्भसमारम्भ तस्मिन्, 'आरम्भे' प्राणिवधात्मनि कार्य प्रवर्त्तमानं निवर्तयेत् , शेपं प्राग्वदिति सूत्रद्वयार्थः Mसम्प्रति समितिगुप्त्योः परस्परविशेष स्वयं सूत्रकृदाह
एयाओ पंच समिईओ, चरणस्स य पवत्तणे । गुत्ती नियत्तणेऽवुत्ता, असुभत्थेसु य सब्बसो॥ २६ ॥ 'एताः' अनन्तरोक्काः पञ्च समितयश्चरणं-चारित्रं सचेष्टेतियावत् तस्य प्रवर्तने पूर्वत्र चशब्दस्य भिन्नक्रमत्वादवधारणार्थत्वाच प्रवत्तेन एव, किमुक्तं भवति सचेष्टासु प्रवृत्तावेच समितयः, तथा 'गुत्ती'त्ति गुप्तयो निवर्त्तनेड-II प्युक्ताः 'अशुभार्थेभ्यः' अशोभनमनोयोगादिभ्यः, सूत्रे तु सुव्यत्ययेन पञ्चम्यर्थे सप्तमी, 'सघसो'त्ति सर्वेभ्योऽपि- ५१९॥ शब्दाचरणप्रवर्त्तने च, उपलक्षणं चैतत् शुभार्थेभ्योऽपि निवृत्तेः, वाकाययोनिर्व्यापारताया अपि गुप्तिरूपत्वात्, उक्तं हि गन्धहस्तिना-"सम्यगागमानुसारेणारक्तद्विष्टपरिणतिसहचरितमनोव्यापारः कायव्यापारी वाग्व्यापारश्च
दीप अनुक्रम [९५९-९६०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२४], मूलं [-] / गाथा ||२७|| नियुक्ति: [४५९...]
प्रत सूत्रांक ||२७||
RANCESS
निर्व्यापारता वा वाकाययोर्गुसि"रिति, तदनेन व्यापाराव्यापारात्मिका गुप्तिरुक्तेति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरन्नेतदाचरणफलमाहएया पवयणमाया, जे सम्म आयरे मुणी । सो खिप्पं सब्यसंसारा, विप्पमुच्चइ पंडिए ॥२७ ॥ तिमि ॥
॥ पचयणमायरं अज्झयणं ॥ स्पष्टमेव । नवरं, 'सम्यक् अवपरीत्येन न तु दम्भादिनेति सूत्रार्थः ॥ इति' परिसमासौ, प्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोअनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायां चतुर्विंशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ २४ ॥
a-STOTRAMERA-TATESTRARASTRA-STRE-EMATORESTMERESTMay श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटी० शिष्य. प्रवच० नाम चतुर्विंशतितममध्ययनं समाप्तम् ॥
दीप अनुक्रम [९६२]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- २४ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-1 / गाथा ||२७...|| नियुक्ति: [४६०-४६२]
उत्तराध्य
अथ यज्ञीयाख्यं पञ्चविंशतितममध्ययनम् ।
यज्ञीया
ध्यय.२५
बृहद्वृत्तिः ॥१२॥
प्रत सूत्रांक ||२७||
व्याख्यातं चतुर्विंशमध्ययनम् , अधुना पञ्चविंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने प्रवचनमातिरोऽभिहिताः, इह तु ता ब्रसगुणस्थितस्यैव तत्त्वतो भवन्तीति जयघोषचरितवर्णनाद्वारेण ब्रह्मगुणा उच्यन्त इत्य
नेनाभिसम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्य चानुयोगद्वारचतुष्टयचर्चा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्न निक्षेपे यज्ञीयमिति नामातो यज्ञनिक्षेपायाह नियुक्तिकृत्निक्लेवो जन्नंमि अचउक्कओ दुविहो य होइ दवंमि। आगमनोआगमओ नोआगमओ अ सो तिविहो जाणगसरीरभविए तबइरित्ते अमाहणाईसुं । तवसंजमेसु जयणा भावे जन्नो मुणेयवो॥ ४६१ ॥ जयघोसा अणगारा विजयघोसस्स जन्नकिच्चंमि । तत्तो समुट्टियमिणं अज्झयणं जन्नइजति ॥ ४६२॥
निक्षेपो यज्ञे चतुष्कको-नामादिः, द्विविधो भवति द्रव्ये---आगमनोआगमतः, तत्रागमतः प्राग्वत् , नोआगमतश्च 'स' इति यज्ञविविधः ज्ञशरीरभव्यशरीरे तद्वयतिरिक्तच, 'माहणाइसुन्ति माहनादीनां प्रक्रमाद् यज्ञ आदि-1
दीप अनुक्रम [९६२]
%25
॥५२०॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -२५ “यज्ञीय" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||२७...|| नियुक्ति: [४६०-४६२]
%
%97
प्रत सूत्रांक ||२७||
शब्दात्तथाविधनृपत्यादिपरिग्रहः, तैर्हि प्राणिहिंसोपलक्षित एवायं क्रियते, ततः स भावयज्ञफलाप्रसाधकत्वाद् द्रव्ययज्ञ उच्यते, भावयज्ञमाह-'तपःसंयमेषु' प्रसिद्धेष्वेव 'यतना' तदनुष्ठानादरकरणरूपा भाये यज्ञः 'मुणितव्यः' प्रतिज्ञातव्यः, अहोर्थे चायं कृत्यः, ततः खर्गादियज्ञफलप्रसाधकतयैष एव यज्ञः प्रतिज्ञातुमुचितो, न त्वन्यः, तस्य प्रत्युतानर्थहेतुत्वात् , जयघोषादनगाराद्विजयघोषस्य 'यज्ञकृत्ये यज्ञक्रियायामागतात् जातमिति शेषः, ततश्च यज्ञस्यैव प्राधान्यविवक्षया 'ततः' इति यज्ञात् समुत्थितमिदमध्ययनं यज्ञीयमिति, तस्मादुच्यत इति शेष इति गाथात्रयार्थः ॥ एवं तावन्निक्षेप उक्तः, सम्प्रत्यनुगमावसरः, तत्रोपोद्घातनिर्युक्त्यनुगमान्तर्गतं किश्चिदभिधित्सुराह- 3 |वाणारसिनयरीए दो विप्पा आसि कासवसगुत्ता । धणकणगविउलकोसा छक्कम्मरया चडवेया ४६३ दोवि अ जमला भाउअ संपीआ अन्नमन्नमणुरत्ता। जयघोसविजयघोसा आगमकुसला सदाररया ४६४|| अह अन्नया कयाई जयघोसो हाइडं गओ गंगं । अह पिच्छइ मंडूकं सप्पेण तहिं गसिजंतं ॥४६५॥ सप्पोऽवि अ कुललेणं उक्खित्तो पाडिओ य भूमीए। सोऽवि अकुललो सप्पं अकमिउं अच्छए तत्थ॥४६॥ सप्पोऽवि कुललवसगओ मडकं खाइ चिंचिआइय। सोऽवि अकुललो खायइ सप्पं चंडेहिं गासेहिं४६७)
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दीप अनुक्रम [९६२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||२७...|| नियुक्ति: [४६३-४७०]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५२१॥
प्रत सूत्रांक ||२७||
तं अन्नमन्नघायं जयघोसो पासिऊण पडिबुद्धो । गंगाओ उत्तरिउंसमणाणं आगओ वसहि ॥ ४६८॥ यज्ञीयासो समणो पवइओ निग्गंथो सवगंथउम्मुक्को । वोसिरिऊण असारे केसेहि समं परिक्केसे ॥ ४६९ ॥ पंचमहत्वयजुत्तो पंचिंदिअसंवुडो गुणसमिद्धो । घडणजयणप्पहाणो जाओ समणो समिअपावो ४७० |
आसामक्षरार्थः स्पष्ट एव, नवरं 'कासवसगोत्त'त्ति काश्यपकुलोत्पन्नाः काश्यपास्तैः समानं गोत्रं ययोस्तौ काश्य-18 पसगोत्री 'छक्कम्मरय'त्ति पट् कर्माणि-यजनयाजनाध्ययनाध्यापनदानप्रतिग्रहात्मकानि तेषु रतौ-आसक्ती षट्कर्मरतो, तथा द्वावपि 'यमलौ' युग्मी उत्पन्नौ 'भाउय'त्ति भ्रातरौ 'संप्रीती' विद्यमानसम्यग्वासप्रीती 'अन्यो-18 न्यमनुरक्ती' आन्तरप्रीतियोगतः परस्परस्नेहवन्ती, आगमः-श्रुतिस्मृत्यादिरूपस्तस्मिन् कुशलावागमकुशली, अत-15 एव खदाररती। 'पहाइ'ति खातुं । 'कुररेण' मार्जारनामा पक्षिविशेषेण 'उक्खित्तो'त्ति उत्क्षिप्तः, उत्क्षिप्य च कथं नामासी प्रियतामिति पातितश्च भूमौ 'अक्कमिउन्ति आक्रम्य-अवष्टभ्य । सर्पः कुररचशगतः-कुरराधीनतां प्राप्तः "चिंचियायंत ति चिंचिमिति कुर्वन्तं 'चण्डैः' बृहत्खण्डनात्रोटनतोऽत्यन्तरौद्रेः 'पास' प्रतीतैः। 'तम्' इत्युक्तरूपमन्यो|ऽन्यघातं-कुररसर्पमण्डूकगतं 'पासिऊणं'ति दृष्ट्वा 'प्रतिबुद्धः' अहो ! दुरन्तोऽयं संसार इत्यादिपरिभावनया अवगततत्त्वः 'सः' इति जयघोषः समनाः-सहृदयो विशिष्टाभोगयुक्त इत्यर्थः 'प्रनजितः' हेयधर्मेभ्यो 'निर्ग्रन्थः' ग्रन्थ
दीप अनुक्रम [९६२]
SERICA
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-1 / गाथा ||२७...|| नियुक्ति : [४६३-४७०]
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प्रत सूत्रांक ||२७||
CRACADASAX
रहितः, स च बाह्यग्रन्थरहितोऽपि स्यादत आह-सर्वो-बाह्य आन्तरश्च यो ग्रन्थस्तेनोन्मुक्तः सर्वग्रन्थोन्मुक्तः,वक्ष्यमाणश्रमणविशेषणान्येतानि, 'व्युत्सृज्य' त्यक्त्वा 'अ सारान्' परमार्थालोचनायामप्रधानान् ‘केशैः' शिरोरुहै: 'सम' सह | परिक्लेशयन्तीति परिक्लेशा:-प्रस्तावात्पुत्रकलत्रादिसम्बन्धास्तान्। घटनं-संयमयोगविषयं चेष्टनं यतनं-तत्रैवोपयुक्तत्वं || ताभ्यां प्रधानः-प्रवरो घटनयतनप्रधानः 'जातः' भूतः 'श्रमणः' तपखी शमितानि पापानि-मिथ्यात्वादिपापप्र-16
कृतिरूपाणि येनासौ शमितपापः । भावार्थस्त्वासां सम्प्रदायादवसेयः, स चायम्-वाणारसीए नयरीए दो विप्पभायरो यमला आसी जयघोसविजयघोसा, अन्नया जयघोसो व्हाइउं गओ गंगं, तत्थ पेच्छइ सप्पेण मंडूकं गसि-12 ज्जतं, सप्पोवि मज्जारेण उच्छितो, मज्जारो सप्पं अकमिउंठिओ, तथावि सप्पो मंडूकं चिंचियंत खायति, मज्जारोवि सप्पं चडप्फडंतं खायति, अन्नमन्नं घायं पासित्ता पडिबुद्धो गंगमुत्तरिऊण साहुसगासे समणो जातो ति । इति गाथाऽष्टकार्थः । इत्यभिहितं किञ्चिदुपोद्घातनिर्युक्त्यनुगमान्तर्गतं, सम्प्रति सूत्रस्पर्शिकनियुक्त्यनुगमावसरः, स च सूत्रे सति भवतीति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तचेदम्
१ वाराणस्यां नगर्या द्वौ विप्रभ्रातरौ यमलावास्ता जयघोषविजयघोषौ, अन्यदा जयघोषः स्नातुं गतो गङ्गा, तत्र प्रेक्षते सर्पण है मण्डूक अस्यमान, सर्पोऽपि मार्जारेणोत्क्षिप्तः, मार्जारः सर्पमाक्रम्य स्थितः, तथापि सो मण्डूकं किंचिकुर्वन्तं खादति, भाजारोऽपि सर्प | || कम्पमानं खादति, भन्योऽन्यघातं दृष्ट्वा प्रतिबुद्धो गङ्गामुत्तीर्य साधुसकाशे श्रमणो जात इति ॥
दीप अनुक्रम [९६२]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१-३|| नियुक्ति : [४६३-४७०]
उत्तराध्य.
यज्ञीया
ध्यय.
बृहदृत्तिः
प्रत सूत्रांक ||१-३||
॥५२॥
माहणकुलसंभूओ, आसि विप्पो महायसो। जायाई जमजम्नमि, जयघोसत्ति नामओ ॥१॥ इंदिय- ग्गामनिग्गाही, मग्गगामी महामुणी । गामाणुगाम रीयंते, पत्तो वाणारसिं पुरिं ॥२वाणारसीइ पहिया, उज्जाणंमि मणोरमे । फासुएसिज्जसंथारे, तत्थ वासमुवागए ॥३॥
सूत्रत्रयं प्रायः प्रतीतार्थमेव, नवरं ब्राह्मणकुलसंभूत इत्पन्वयाभिधानं, ब्राह्मणकुलसंभूतोऽपि जननीजात्यन्यथात्वे प्रामणो न स्यादत आह-विप्रः, 'जायाइ'त्ति अवश्यं यायजीति यायाजी, केत्याह-यमा:-प्राणातिपातविरत्यादिरूपाः पञ्च त एव यज्ञो-भावपूजात्मकत्वाद्विवक्षितपूजां प्रति यमयज्ञस्तस्मिन् , विषयसप्तमीयं, गार्हस्थ्यापेक्षया वैतव्याख्यायते, तत्र च विनो विप्राचारनिरतत्वेन, संभवति हि कश्चित्तत्कुलोत्पन्नोऽप्यन्यथेति विशेषणं, तथा यम इव प्राण्युपसंहारकारितया यमः स चासौ यज्ञश्च यमयज्ञः अर्थाद् द्रव्ययज्ञस्तस्मिन्। इन्द्रियग्राम-स्पर्शना|दिकसमूह निगृह्णाति-खखविषयविनिवर्त्तनेन नियमयतीत्येवंशील इन्द्रियग्रामनिग्राही, अत एव 'मागेंगामी' मुक्तिपथयायी 'रीयंति'त्ति रीयमाणो विहरन् । 'वाणारसीय बहिय'त्ति वाणारस्या बहिरिति-बहिर्भागे यदुद्यानम्उपवनं तस्मिन्निति सूत्रत्रयार्थः ।। तदा च तत्पुरि यतते यचासौ विधत्ते तदाह
अह तेणेव कालेणं, पुरीए तत्थ माहणे । विजयघोसत्ति नामेणं, जन्नं जयह वेयवी ॥४॥ अह से तस्थ अणगारे, मासक्खमणपारणे । विजयघोसस्स जन्नंमि, भिक्खमट्ठा उवहिए ॥५॥
दीप अनुक्रम [९६३-९६५]
५२२॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [२५], मूलं [-1 / गाथा ||४-५|| नियुक्ति : [४७०...]
प्रत सूत्रांक ||४-५||
'अथेति च वक्तव्यतान्तरोपन्यासे 'तेणेव कालेणं ति सुव्यत्ययात्तस्मिन्नेव काले यत्रासौ वाणारसीमाजगाम, 'वेयवी'ति वेदवित् । 'अथेति प्रस्तुतोपन्यासे 'स' जयघोषः 'तत्रेति यागे 'भिक्खमट्ठ'त्ति मकारोऽलाक्षणिकः | प्राकृतत्वाद् दीर्घा विन्द्वभावश्च ततो भिक्षार्थम् 'उपस्थितः' प्राप्तः, पठ्यते च-'भिक्खस्सऽट्टत्ति भैक्ष्यस्यार्थे
भैक्ष्यनिमित्तं, शेषं सुगममिति सूत्रद्वयावयवार्थः ॥ तत्र च भिक्षार्थमुपस्थिते यदसौ याजकः कृतवांस्तदाहदि समुवढियं तहिं संतं, जायगो पडिसेहए । नहु दाहामि ते भिक्खं, भिक्खू! जायाहि अन्नओ॥६॥जे सय वेयविक विप्पा, जन्नमहा य जे दिया। जोइसंगविऊ जे य, जे य धम्माण पारगा ॥७॥ जे समत्था टा
समुद्ध, परं अप्पाणमेव य । तेसिमन्नमिणं देयं, भो भिक्खू! सध्चकामियं ॥८॥ II 'समुपस्थितं' भिक्षार्थमागतं 'याजकः' यष्टा स एव विजयघोषनामा प्रामणः 'प्रतिषेधति' निराकुरुते यथा 'न
हु' नैव दास्यामि ते तुभ्यं भिक्षा 'जायाहि'त्ति याचख 'अन्यतः' अस्मयतिरिक्तात् । किमित्येवमत आह-जे विष्पा' इत्यादि, विप्रा जातितः 'जण्णट्ठा यत्ति 'यज्ञार्थी' यज्ञप्रयोजना ये तत्रैव व्याप्रियन्ते ये 'द्विजाः' संस्कारापेक्षया द्वितीयजन्मानो ज्योतिष-ज्योतिःशाखमकानि च विदन्ति ये ते ज्योतिषाविदः, अत्र च ज्योतिषस्योपादानं प्राधान्य-3 त ख्यापकम् , अन्यथा हि शिक्षा १ कल्पो २ व्याकरणं ३ निरुक्तं ४ छन्दोविचितिः ५ ज्योतिषमिति ६ षडङ्गानीत्यजनराहणेनैव तद्गृहीतमिति, धर्माणामुपलक्षणत्वाद् धर्मशास्त्राणां 'पारगाः' पर्यन्तगामिनः, अशेषविद्यास्थानोपलक्षणमे
दीप अनुक्रम [९६६-९६७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [२५], मूलं [-1 / गाथा ||६-८|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत
वृहदृत्तिः
सूत्रांक
||६-८||
उत्तराध्य. तत् , ततो ये चतुर्दशविद्यास्थानपारगताः, अत एव च ये 'समर्थाः' शक्तिमन्तः समुद्धर्तुं भवसमुद्रादिति गम्यते, यज्ञीया
'तेसिं'ति सुन्व्यत्ययात् 'तेभ्यः' अनन्तरमुक्तरूपेभ्यः द्विजेभ्यः 'सवकामिय'न्ति सर्वाणि कामानि-अभिलषणीयवस्तूनि | यमिंस्तत्सर्वकाम्यं, यद्वा सर्वकामनिवृत्तं तत्प्रयोजनं वा सर्वकामिक, षड्रसोपेतमित्यर्थः, शेषं स्पष्टमिति सूत्रत्र-18
ध्यय.२५ ॥५२॥
यार्थः ॥ एवमुक्तो मुनिः स कीदृग् जातः ? किं वा कृतवान् ? इत्याह
| सो तत्थ एव पडिसिद्धो, जायगेण महामुणी । नवि रुटो नवि तुट्ठो, उत्तमहगवेसओ ॥९॥ नण्णहूँ 18|पाणहे चा, नवि निव्वाहणाय वा। तेसिं विमुक्षणहाए, इमं चयणमब्बवी ॥ १०॥ नवि जाणसि वेय-
मुहुं, नवि जनाण जं मुहं । नक्खत्ताण मुहं जंच, जं च धम्माण वा मुहं ॥११॥ जे समत्वा समुद्धत्तुं, परंडा
अप्पाणमेव य । न ते तुम विजाणासि, अह जाणासि तो भण ॥१२॥ II 'सः' इति जयघोषनामा 'तने ति यज्ञे 'एवेति एवम्-उक्तप्रकारेण 'प्रतिषिद्धः' निराकृतः, केन ?-'याजकेन' यज्ञका विजयघोषत्रासणेन महामनिर्नापि 'रुष्टः' इति रोषं गतः “बहुं परघरे अस्थि विविहं खाइमसाइमं । न
५२३॥ तत्थ पंडिओ कुप्पे, इच्छा दिज परोण वा ॥१॥" इत्याद्यागमपरिभावनातो, नापि 'तुष्टः' परितोष प्राप्तः, किन्तु समतयैव स्थित इति भावः,किमित्येवं ?, यत उत्तमार्थो-मोक्षस्तमेव गयेषयते-अन्वेषयते इत्युत्तमार्थगवेषको,मुक्ति
१ बहु परगृहेऽस्ति विविधं खायं स्वायं । न तस्मै पण्डितः कुप्येत् इच्छया परो दद्यान्नवा ।। १ ।।
ASSASSACREAST
दीप अनुक्रम [९६८-९७०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||९-१२|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक ||९-१२||
*****
विनाऽन्यत्र निःस्पृह इतियावत् ,'न' नैवान्नम्-ओदनादि तदर्थ, पीयत इति 'कृत्यलुटोऽन्यत्रापी (पा०३-३-११३)
ति वचनात्कर्मणि ल्युटि पानम्-आचाम्लादि तद्धेतुंवा-तन्निमित्तं वा,नापि 'निर्वाहणाय वा' वस्त्राभ्यसैलादिना KI यापनार्थ सर्वत्रात्मन इति गम्यते, किमर्थं तर्हि ? इत्याह-'तेषां' याजकानां 'विमोक्षार्थ' यथा कथं नु नामामी
विमुक्तिमामयुरिति प्रयोजनार्थम् 'इदं वक्ष्यमाणं वचनमब्रवीत्, किं तदित्याह-नवित्ति नैव जानासि वेदानां मुखं वेदमुख-यत्तेपु प्रधानं नापि यज्ञानां यन्मुखम्-उपायो नक्षत्राणां मुखं-प्रधानं यच, यच्च धर्माणां वा मुखम्उपायस्तद्,अनेन तस्य वेदयज्ञज्योतिधमानभिज्ञत्वमुक्तं । सम्प्रति पात्राविज्ञतामाह-'जे' इत्यादि, व्याख्यातप्रायमेव,
नवरम्, अथ जानासि ततो भणेत्याक्षेपाभिधानमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ एवं च तत्राक्षिसवति भगवति स किं हैं कृतवानित्याह
तस्सक्खेवपमुक्खं च, अचयंतो तहिं दिओ। सपरिसो पंजलीहो, पुच्छई तं महामुणिं ॥१३॥ वेयाणं
च मुहं यूहि, बूहि जन्नाण जं मुहं । नक्खत्ताण मुहं बूहि, बूहि धम्माण या मुहं ॥ १४ ॥ जे समत्था समुपद्ध, परं अप्पाणमेव य । एयं मे संसयं सव्वं, साह! कहय पुच्छिओ ॥१५॥ ARI 'तस्येति मुनेराक्षेपः-प्रश्नस्तस्य प्रमोक्षः-प्रतिवचनं तं 'चः' पूरणे 'अचयंतो ति अशक्नुवन् दातुमिति गम्यते ।
तस्मिन्' इति यज्ञे 'द्विजः' प्रामणः 'सपर्षत्' सभाऽन्वितः प्रकृतोऽअलिः-उभयकरसंपुटात्मको येनासी प्राञ्जलि
दीप
अनुक्रम
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****525%
-९७४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||१३
-१५॥
दीप
अनुक्रम
[९७५
-९७७]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५२४॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा || १३-१५|| निर्युक्तिः [४७०...]
अध्ययनं [२५],
भूत्वा पृच्छति 'त' मिति प्रक्रान्तं महामुनिम् । कथं पृष्टवानित्याह- 'वेयाण' इत्यादि, गतार्थमेव, नवरं 'ब्रूहि' व्यक्त-मभिधेहि, पुनः पुनर्ब्रहीत्युच्चारणमत्यादरख्यापनार्थे 'एतद्' उक्तरूपं 'मे' मम संशेतेऽस्मिन् मन इति संशयस्तं - संशयविषयं वेदमुखादि साधो ! कथय पृष्ट इत्युपसंहारवचनमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ इत्थं पृष्टो मुनिराह
मुहा वेया, जन्नट्टी वेयसा मुहं । नक्खत्ताण मुहं चंदो, धम्माणं कासवो मुहं ||१६|| जहा चंद गहाइया, चिते पंजलीउडा । वंदमाणा नर्मसंता, उत्तमं मणहारिणो ॥ १७॥ अजाणगा जन्नवाई, विज्लामाहणसंपया। मूढा सज्झायतवसा, भासच्छन्ना इवग्गिणो ॥ १८॥ जो लोए बंभणो वुत्सो, अग्गी वा महिओ जहा। सदा कुसलसंदिनं तं वयं बूम माहणं ॥ १९ ॥ जो न सज्जइ आगंतुं, फव्वयंतो न सोअई। रमए अज्जवयणंमि, तं वयं बूम माहणं ॥ २० ॥ जायरूवं जहामहं निद्धंतमलपावगं । रागद्दोस भयाईयं तं वयं बूम माहणं ॥ २१ ॥ [ तवस्सियं किसं दंतं, अवचियमंससोणिअं । सुव्वयं पत्तनिव्वाणं तं वयं बूम माहणं ॥ १ ॥ ] तसे पाणे | वियाणित्ता, संगहेण य थावरे । जो न हिंसइ तिविहेणं, तं वयं बूम माहणं ॥ २२ ॥ कोहा वा जइबा हासा, लोहा वा जइवा भया । मुसं न वयई जो उ, तं वयं बूम माहणं ॥ २३ ॥ चित्तमंतमचित्तं वा, अप्पं वा जहवा बहुं । न गिन्हह अदत्तं जो, तं वयं बूम माहणं ॥ २४ ॥ दिव्यमाणुस्सतेरिच्छं, जो न १ इतः प्रागू अधिकेयं गाथा पुस्तकान्तरे
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यज्ञीया
ध्यय. २५
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॥५२४||
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक
5-5-
%
-३३||
सेवेइ मेहुणं । मणसा कायवकेणं, तं वयं चूम माहणं ॥ २५ ॥ जहा पोम्म जले जायं, नोवलिप्पद वारिणा । एवं अलितं कामेहि, तं वयं बूम माहणं ॥ २६ ।। अलोलुयं मुहाजीविं, अणगारं अकिंचणं । असंसत्तं गिहत्थेहि, तं वयं बूम माहणं ॥२७॥ पसुबंधा सव्ववेया, जटुं च पावकम्मुणा । न तं तापंति दुस्सील,
कम्माणि बलवंतिह ॥ २८ ॥ नवि मुंडिएण समणो, न ॐकारेण बंभणो । न मुणी रपणवासेणं, कुसचीरण Xन तावसो ॥ २९ ॥ समयाए समणो होइ, वंभचेरेण बंभणो। नाणेण य मुणी होह, तवेर्ण होइ ताचसो G/॥३०॥ कम्मुणा भणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिओ। वइस्सो कम्मुणा होइ, मुद्दो हवइ कम्मुणा ॥ ३१॥
एए पाउकरे बुद्धे. जेहिं होह सिणायओ। सब्बकम्मविणिम्मुकं तं वयं बूम माहणं ॥३२॥ एवं गुणसमाउत्ता, जे हवंति दिउत्तमा । ते समत्था उ उद्धत्तुं, परं अप्पाणमेव य ॥३३॥ | अग्गिहोचेत्यादिसूत्राण्यष्टादश प्रायः स्पष्टान्येव, नवरम् , अग्निहोत्रम्-अग्निकारिका, सा चेह-“कर्मेन्धनं समाश्रित्य, दृढा सद्भावनाहुतिः । धर्मध्यानामिना कार्या, दीक्षितेनाग्निकारिका ॥१॥” इत्यादिरूपा परिगृखते, तदेव मुख-प्रधानं येषां तेऽग्निहोत्रमुखा वेदाः, वेदानां हि दध्यादेवि नवनीतादि आरण्यकमेव प्रधानम्, उक्तं हि-"नवनीतं यथा दनश्चन्दनं मलयादिव । औषधिभ्योऽमृतं यद्वेदेवारण्यकं तथा ॥१॥" तत्र च दशप्रकार एव
१ प्रत्यन्तरे गायेहाधिकेक्ष्यते
%*5
दीप
%A
अनुक्रम
A
[९७८
%
-९९५]]
,
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
उत्तराध्य
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक ||१६
॥५२५॥
-३३||
धर्म उक्तः, तथा च तद्वचः-"सत्यं तपः सन्तोषः संयमश्चारित्रमार्जवं क्षमा धृतिः श्रद्धा हिंसेत्येतद्दश विधमिह यज्ञीयाधामे"ति, तत्र च धामशब्देन धर्म एव विवक्षितः, एतदनुवायुक्तरूपमेवाग्निहोत्रमिति, तथा यज्ञः प्रस्तावाद्भाव
|ध्यय.२५ यज्ञस्तदर्थी 'वेयसि'त्ति वेदेन हेतुनाऽस्थति-अशुभानि कर्माणि क्षिपतीति निरुक्तविधिना वेदसो-यागः, उक्तं च-11 | निर्घण्टे-"अध्वरो वेपो वेषो मखो वेदा वितथः" इत्यादि, तेषां मुखम्-उपायः, ते हि सत्येव यज्ञार्थिनि प्रवर्त्तन्त इति । नक्षत्राणां 'मुखं' प्रधानं चन्द्रः, तस्यैव तदधिपतित्वात् । धर्माणां 'काश्यपः' भगवानृषभदेवः 'मुखम्' उपायः कारणात्मकः, तस्यैवादितत्प्ररूपकत्वात् , तथा चारण्यकम्-"ऋषभ एव भगवान् ब्रह्मा, तेन भगवता ब्रह्मणा । खयमेव चीर्णानि प्रमाणि, यदा च तपसा प्राप्तः पदं यद् ब्रह्मकेवलं तदा च ब्रह्मर्षिणा प्रणीतानि, कानि पुनस्तानि ब्रमाणि?" इत्यादि,किञ्च-भवतां ब्रमाण्डपुराणमेव सर्गादिपुराणलक्षणोपेतत्वात्सकलपुराणज्येष्ठम् , उक्तश्च-"नवनीतं || | यथा दनचन्दनं मलयादिव । ब्रह्माण्ड वै पुराणेभ्यस्तथा प्राहुर्मनीषिणः ॥१॥" तद्वचस्त्विदम्-"इह हि इक्ष्वाकुकुलवंशोद्भवेन नाभिसुतेन मरुदेव्या नन्दनेन महादेवेन ऋषभेण दशप्रकारो धर्मः खयमेव चीर्णः, केवलज्ञानलम्भाच महर्षिणो ये परमेष्ठिनो वीतरागाः स्नातका निर्ग्रन्था नैष्ठिकास्तेषां प्रवर्तित आख्यातः प्रणीतस्त्रेतायामादा"वित्यादि, ५२५॥ काश्यपस्यैव माहात्म्यख्यापनतो धर्ममुखत्वं समर्थयितुमाह-यथा चन्द्र ग्रहादिकाः, आदिशब्दान्नक्षत्रादिपरिग्रहः, 'पंजलीउड'त्ति प्राग्वत्कृतप्राजलयस्तु 'वन्दमानाः' स्तुवन्तो 'नमस्सन्तो' नमस्कुर्वन्तः 'उत्तम प्रधानं 'मनोहारिणः'
दीप
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-९९५]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक
-%
-३३||
अतिविनीततया प्रभुचित्ताक्षेपकारिणस्तिष्ठन्तीति सम्बन्धः, तथैनमपि भगवन्तं देवेन्द्रप्रमुखाः समस्तसुरासुरमनुज-PT
समूहा इत्युपस्कारः, पठ्यते च-जहा चंदे गहाईए, चिटुंती पंजलीउडा। णमंसमाणा वंदंती, उद्धत्तमणहारिणो IN||१॥"त्ति, अत्र यथा 'चन्द्रे' चन्द्रविषये ग्रहादिकास्तिष्ठन्तीति (न्ति) प्राअलिपुटाः, कोऽर्थः-तदायर(ताए)वासते,
अन्यच्च-नमस्यन्तः प्रक्रमात्तमेव 'वन्दन्ते' स्तुवन्ति, अनेन तेषां भक्तियुक्तितामाह, 'वंदंतीउद्धत्त'त्ति सन्धिप्रयोगेण है इतिशब्दान्तर्भावादितीत्येवं प्रक्रमात्काश्यपं तिष्ठन्ति प्राअलिपुटातं च नमस्यन्तो वन्दन्ते, के इत्याह-'उद्धत्तमणहा-12 |रिणो'त्ति औद्धत्यम्-अहङ्कारस्तप्रधान मन औद्धत्यमनस्तद्धरणशीलाः औद्धत्यमनोहारिणः-अत्यन्तशान्तचित्तवृत्तियो, यतय इत्यर्थः, पूर्वापरनिपातस्यात्रातन्त्रत्वेन वा मनऔद्धत्यहारिणः, औद्धत्यग्रहणं चास्यैव सकलदोषमूलत्वात् , पठन्ति च–'उद्धत्तुमणगारिणो'त्ति अत्र चोद्ध म्-उत्क्षेप्तुं भवपङ्कमग्नमात्मानमिति गम्यते, अगारिणोगृहिणस्तद्विपरीता अनगारिणो-यतयः, क्रियाकारकयोजना प्राग्वत् , इह च धर्मार्थिनामेव अभ्यर्हितत्वात् काश्यपो धर्ममुखमित्यभिप्रायः । अनेन प्रश्नचतुष्टयप्रतिवचनमुक्तं, सम्प्रति पञ्चमं प्रश्नमधिकृत्याह-'अजाणग'त्ति अज्ञा न तत्ववेदिन इत्युक्तं भवति, के ते ?-यज्ञवादिनो ये भवतः पात्रत्वेनाभिमताः, कासामित्याह-विजामाहणसंपय'त्ति सूत्रत्वात्सुव्यत्ययः 'विद्याब्रामणसम्पदा' तत्र च विद्यते-ज्ञायत आभिस्तत्त्वमिति विद्या-आरण्यकब्रह्माण्डपुराणात्मिकास्ता एव ब्राह्मणसम्पदो विद्याब्राह्मणसम्पदः, तात्त्विकब्राह्मणानां हि निष्किञ्चनत्वेन विद्या एव सम्पदः, तद्वि
दीप
अनुक्रम
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%A8-5453
-९९५]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक
उत्तराध्य वृहद्धृत्तिः १५२६॥
||१६
-३३||
त्वे च कथमेते बृहदारण्यकायुक्तदशविधधर्मवेदिनो यागमेवं कुर्युः ?, तथा 'मूढाः' मोहवन्तः 'सज्झायत- यज्ञीया
वस्स'त्ति सुव्यत्ययात्खाध्यायतपःसु तत्त्वतस्तत्खरूपापरिज्ञानाद, अत एव 'भासच्छन्ना इवऽग्गिणों'त्ति इवशब्दस्य द भिन्नक्रमत्वाद्भस्मच्छन्ना अग्नय इव,ते हि बहिरुपशममाज आभान्ति, अथ चान्तः कषायवत्तया ज्वलिताः, पठ्यते च
ध्यय. २५ VI'गूढा सज्झायतबस्सति तत्र च 'गूढाः' बहिः संवृतिमन्तः, केन हेतुना?-स्वाध्यायतपसा' वेदाध्ययनोपवासादिना-12 ऽन्तश्च भस्मच्छन्नाग्नितुल्याः, एवं च न तत्त्वतो भवदभिमतत्राझणानां ब्राह्मण्यं, तदभावाचात्मनः परस्य चोद्धरणेन पात्रत्वं दुरापास्तमेवेति भावः । कस्तर्हि भवदभिप्रायेण ब्राह्मणो ? यः पात्रमित्याह-'यः' इत्यनिर्दिष्टखरूपः 'लोके' जगति ब्राह्मणः 'उक्तः' प्रतिपादितः कुशलैरिति गम्यते, 'अग्गी वा महितो जह'त्ति वेति पूरणे यथेत्यौपम्ये भिन्नक्रमश्च, ततो यथाऽग्निवेत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धात्तथा 'महितः पूजितः सन् 'सदा' सर्यकालम् , उपसंहारमाह
कुशलैः-तत्वाभिज्ञैः संदिष्ट:-कथितः कुशलसन्दिष्टस्तं 'तम्' इत्युक्तरूपं वयं चूमो ब्राह्मणं, यदेव हि लोके विज्ञोदापदिष्टं तदेव वस्त्वभ्युपगमाहे मिति भावः । इत उत्तरसूत्रोदशोऽसौ कुशलसन्दिष्टस्तत्खरूपमेव कचित्कथञ्चिदनुव
दन् खाभिमतं ब्रामणमाह-यो न खजनेनाभिष्वहं करोति 'आगन्तुं' प्राप्तुं खजनादिस्थानमिति गम्यते, आगतो वा, ततः 'प्रत्रजन्' स्थानान्तरं गच्छन्न शोचते, यथा-कथमहममुना विना भविष्यामीति, तत एव रमते आर्याणांतीर्थकृतां वचनमार्यवचनम्-आगमस्तस्मिन् , किमुक्तं भवति ?-सर्वत्र निःस्पृहत्वेनागमार्थानुष्ठानपरतया तत्र रति
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अनुक्रम
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-९९५]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक
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मान् भवति, यद्वा यो न सजत्यागन्तुं प्रव्रज्यापर्यायागार्हस्थ्यपर्यायमिति गम्यते, तथा 'प्रव्रजन्' प्रत्रज्यां गृहन् न शोचते-न खिद्यते, किन्त्विदमेव मनुजजन्मफलमिति मन्यमानः स रभसैवाभिनिष्क्रामति. शेषं तथैव, व्याख्या-1 द्वयेऽपि च निःस्पृहतैवोच्यते । तथा 'जातरूपं' वर्ण ततो जातरूपमिव जातरूपं, यः कीदृशः सन् ?-महामह'ति मकारस्थालाक्षणिकत्वान्महानर्थः-प्रयोजनं मुक्तिरूपमस्येति महार्थों, जातरूपस्य त्वर्थो विषघातादिः, तथा निद्धंतमलपावकं' निर्मातं-भस्मीकृतं ततो नितिमिष निर्मातं मल इवात्मनो विशुद्धखरूपघातितया पापमेव पापकं येनासौ निर्मातमलपापको, जातरूपं तु प्राकृतत्वात् पावकेन-अमिना निर्मातो मलः-किट्टाVात्मकोऽस्येति पावकनिर्मातमलम् , अन्यच-रागव-प्रतिबन्धात्मको ट्रेपश्च-अप्रीतिरूपो भयं च-इहलोकभयादि ।
रागद्वेषभयानि तान्यतीतो-निष्कान्तो रागद्वेषभयातीतो रागादिरहित इत्यर्थः, सर्वत्र लिङ्गव्यत्ययः प्राग्वत्, पठ्यते च-'जायरूवं जहामटुंति 'यथे' त्यौपम्ये आमृष्टं-तेजप्रकर्षारोपणाय मनःशिलादिना समन्तात्परामृष्टम् , अनेन जातरूपस्य बाझो गुण उक्तः, पावकनितिमलमिति चान्तरः, ततो जातरूपवद्वाह्यान्तरगुणान्धितः, अत एव रागाद्यतीतश्च यस्तं वयं ब्रूमो ब्राह्मणम् । किञ्च-त्रसप्राणिनो विज्ञाय 'सङ्ग्रहेण' सङ्केपेण चशब्दाद्विस्तरेण च, तथा 'स्थावरान्' पृथिव्यादीन् , यदिवा संगृह्यत इति सङ्ग्रहो-वर्याकल्पादिस्तेन हेतुना, जीवरक्षार्थत्वात्तस्य, चशब्दो भिन्नक्रमः, तत एव स्थावरांश्च, पठ्यते च-'संगहेण सथावरे'त्ति 'सस्थावरान् स्थावरसहितान् यो 'न हिनस्ति'
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ENGALASAX
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक ||१६
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उत्तराध्य./न व्यपरोपयति 'एतान्' अनन्तरमुक्तरूपान् 'तुः पूरणे, पठ्यते च-विविधेन' मनोवाकायरूपतया योगेनेति गम्यते, यज्ञीया
तं वयं ब्रूमो ब्राह्मण, तथा चारण्यकेऽप्युक्तम्-'यदा न कुरुते पापं, सर्वभूतेषु दारुणम् । कर्मणा मनसा वाचा, ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१॥" तथा क्रोधादिभ्यो मृषा न वदति यस्तु तं वयं बेमो ब्राह्मणम् , इह च मानस क्रोधो|
ध्यय. २५ ॥५२७॥ मायायाश्च लोभ उपलक्षणं, प्रायस्तत्सहचरितत्वात्तयोः, तथा च तत्राप्यवाचि-“यदा सर्वानृतं त्यक्तं, मिथ्याभाषा
विवर्जिता । अनवद्यं च भाषेत, ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१॥" किञ्च-"अश्वमेधसहस्रं च, सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि, सत्यमेव विशिष्यते ॥१॥” इति 'चित्तवत्' द्विपदादि 'अचित्तं च' वर्णादि 'अल्पं वा' सङ्ख्यया प्रमाणेन च स्तोकं यदिवा 'बहुं ताभ्यामेव प्रचुरं न गृह्णाति 'अदत्तम्' अनिसृष्टं यस्तं वयं घूमो ब्राह्मणं, तथा च तत्राप्युक्तम्-"परद्रव्यं यदा रष्ट्वा, आकुले अथवा रहे। धर्मकामो न गृह्णाति, ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१॥"अन्यच्चदिव्यविषयत्वादिव्यं मानुषविषयत्वान्मानुपं.तिर्यक्षु भवं तैरश्चमेषां समाहारो दिव्यमानुषतरचं यो न सेवते मैथुनं ४
'मनसा' चित्तेन कायश्च-शरीरै वाक्यं च-वचनं कायवाक्यं तेन तं वयं ब्रूमो ब्राह्मणं, तथा च तत्राप्युक्तम्-"देव18|मानुपतिक्ष, मैथुनं वर्जयेद्यदा। कामरागविरक्तश्च, ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१॥"। अपि च-यथा 'पञ कमलं| D५२७॥ दाजले उपलक्षणत्वाजलमध्ये 'जातम्' उत्पन्न तत्परित्यागत उपरि व्यवस्थानतः 'नोपलिप्यते' न श्लिप्यते 'वारिणा'
जलेन, 'एवं मिति पद्मवत् 'अलित्त'त्ति अलिप्सः-अश्लिष्टः काम्यमानत्वात् कामैः-मनोज्ञैः शब्दादिभिरावाल्यात्
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
प्रत सूत्रांक
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सातैरेव वृद्धिं नीयमानतया तन्मध्योत्पन्नोऽपि यस्तं वयं ब्रूमो ब्राह्मणं, तथा च तत्राप्यभिधायि-"यदा सर्व परित्यज्य, निस्सको निष्परिग्रहः । निश्चिन्तश्च चरेद्धर्म, अब सम्पद्यते तदा ॥१॥" इति । इत्थं मूलगुणयोगाचात्त्विकं ब्राह्मणमभिधायोत्तरगुणयोगतस्तमेवाह-(ग्रन्थानम् १३०००) 'अलोलुपम्' आहारादिष्यलम्पर्ट 'मुहाजीवित्ति सुब्व्यत्ययात् 'मुधाजीविनम्' अज्ञातोञ्छमात्रवृत्ति, पठ्यते च-'मुहाजीवित्ति अनगारमकिञ्चनं प्राग्वत् 'असंसक्तम्' असंबद्धं, कैः-गृहस्थैः, तृतीयार्थे सप्तमी विषयसप्तमी वा, अनेन काका पिण्डविशुद्धिरूपोत्तरगुणयुक्तत्वमुक्तं, 'तम्' उक्तगुणयुक्तमप्येवंविधं सन्तं वयं ब्रूमो ब्राह्मणं, कचित् पठ्यते च-'जहित्ता पुवसंजोगं, पाइसंगे य बंधवे । जो न सजइ भोएहि, तं वयं बूम बंभणं ॥' अत्र 'पूर्वसंयोग' मात्रादिसम्बन्धं 'ज्ञातिसंयोगान्' खस्रादिसम्बन्धान, चशब्दो भिन्नक्रमस्ततः 'बान्धवांश्च' भ्रात्रादीन् , शेषं स्पष्टम् , अनेन चातिनिःस्पृहताभिधानेनोत्तरगुणा अप्याक्षिप्ता भवन्ति । स्यादेतद्-वेदाध्ययनं यजनं च भवात्राय कमिति तद्योगादेव पात्रभूतो ब्राह्मणो न तु यथा त्वयोक्त इत्याशल्याह-पशूनां-छागानां बन्धो-विनाशाय नियमनं यैहेतुभिस्तेऽमी पशुबन्धाः श्वेतं छागमालभेत वायव्यां दिशि भूतिकाम' इत्यादिवाक्योपलक्षिताः, पाठान्तरतः पशवो बद्धा यैस्ते आहिताग्न्यादेराकृतिगणत्वात् क्तान्तस्य परनिपाते पशुवद्धाः, न तु ये.'आत्मा वारे ज्ञातव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादिवाक्योपलक्षिताः सर्ववेदाः ऋग्वेदादयः 'जट्ट'ति इष्टं यजनं 'वा' समुच्चये 'पापकर्मणा' पापहेतुभूतपशुबन्धाद्यनुष्ठानेन तु हरिकेशीयाध्ययनोक्त
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आगम
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उत्तराध्य.
बृहद्वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१६-३३|| निर्युक्ति: [४७०...]
अध्ययनं [२५],
विधिनेतिभावः किमित्याह - 'न' नैव 'त' मिति प्रक्रमाद्वेदाध्येतारं यष्टारं वा 'त्रायन्ते' रक्षन्ति भवादिति गम्यते, किंविशिष्टं ?- 'दुःशीलं ' ताभ्यामेव हिंसादिप्रवर्त्तनेन दुराचारं किमिति १-यतः 'कर्माणि' ज्ञानावरणादीनि 'बलचन्ति' दुर्गतिनयनं प्रति समर्थानि 'इहे 'ति भवदवगमविषये वेदाध्ययने यजने च भवन्तीति गम्यते, पशुवन्धादि - प्रवर्त्तनेन तयोस्तद्बलाध्यकत्वादिति भावः अनेन दुर्गतिहेतुत्वात्खर्गहेतुत्वमप्यनयोः प्रत्युक्तम् उक्तं हि - "यूपं हित्वा पशु हत्या, कृत्वा रुधिरकर्दमम् । यद्येवं प्राप्यते स्वर्गे, नरके केन गम्यते १ ||१||" अतो नैतद्योगाद्राह्मणः पात्रभूतो भवति, किन्त्वनन्तराभिहितगुण एवेति भावः । अन्यच्च-नेति निषेधे 'अपिः' पूरणे 'मुण्डितेन' केशापनयनात्मकेन समं मनोऽस्येति निरुक्तविधिना श्रमणः-निर्ग्रन्थः, 'न' नैव ॐकारो (रेणोपलक्षणत्वाद् 'ॐ भूर्भुवःख'रित्याद्युचारणरूपेण ब्राह्मणः, तथा न मुनिररण्यवासेन, कुशो-दर्भविशेषस्तन्मयं चीवरं कुशचीवरं, बल्कलोपलक्षणमेतत्, तेन तापसः, अनूदितं चैतद्वाचकैः- “मुण्डनात् श्रमणो नैव, संस्काराद्वाह्मणो न वा । मुनिर्नारण्यवासित्वाइल्कलान्न च तापसो ॥ १ ॥” भवतीति सर्वत्र शेषः । कथममी तर्हि संभवन्तीत्याह- 'समतया' रागद्वेषाभावरूपया श्रमणो भवति, ब्रह्मणश्चरणं ब्रह्मचर्य, त्रह्म च द्विधा, यत उक्तम्- "द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये, शब्दब्रह्मपरं च यत् 1 शब्दत्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ १ ॥ एतानि च पराणि ब्रह्माणि वरिष्ठानि यानि प्रागहिंसादीन्युक्तानीति, एतद्रूपमेवेह ब्रह्मोच्यते, तेन ब्राह्मणो भवति, 'ज्ञानेन' हिताहितावगमरूपेण मुनिर्भवति 'तपसा'
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यज्ञीया
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||१६-३३|| नियुक्ति: [४७०...]
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ॐॐॐ
-३३||
बाबाभ्यन्तरभेदभिन्नेन भवति तापसः, सर्वत्राभिधानान्यथाऽनुपपत्तिरिह हेतुः, ननु चान्वर्थवत्वेऽभिधानस्यैष हेतुः,। तच्चान्यथाऽपि डित्यादिवत्स्यादत आह-'कर्मणा' क्रियया ब्राह्मणो भवति, उक्तं हि-"क्षमा दानं दमो ध्यानं, सत्सं शौचं धृति (दया घू)णा। ज्ञानविज्ञानमास्तिक्यमेतद्रामणलक्षणम् ॥१॥" तथा 'कर्मणा' क्षतत्राणलक्षणेन भवति क्षत्रियः, वैश्यः 'कर्मणा' कृषिपाशुपाल्यादिना भवति, शूद्रो भवति तु 'कर्मणा' शोचनादिहेतुप्रैपादिसंपादनरूपेण, कर्माभावे हि त्रासणादिव्यपदेशा नाऽऽसन्नेवेति, ब्राह्मणप्रक्रमेऽपि यच्छेषाभिधानं तन्मा भूनिरनुक्रोशतेति ब्यासिदर्शनार्थ, किच-भवन्मतेऽप्युक्तम्-"एकवर्णमिदं सर्व, पूर्वमासीयुधिष्ठिर! । क्रियाकर्मविभागेन, चातये | व्यवस्थितम् ॥ १॥" किमिदं खमनीषिकयैवोच्यते इत्याह-'एतान्' अनन्तरोक्तानहिंसाद्यर्थान् 'प्रादुरकात्'ि प्रकटितवान् 'बुद्धः' अवगततत्त्वः, पठ्यते च-'एए पाउकरा धम्मा' 'एते' उक्तरूपाः 'प्रादुष्कराः' नेमल्यकारितयाऽऽत्मनः प्रकाशहेतवः 'धर्माः' अहिंसादयो, यैर्भवति 'स्नातकः केवली सर्वकर्मभिर्विनिर्मुक्तः, इह च प्रत्यास
नमुक्तितया सर्वकर्मविनिर्मुक्तः,सुब्ब्यत्ययात्प्रथमार्थे द्वितीया,'त'मित्यभिहितगुणं तत्त्वतः स्नातकं वा वयं ब्रूमो ब्रासठाणम् । सम्प्रत्युपसंहर्जुमाह-एवम्' उक्तप्रकारेण गुणैः-अहिंसादिभिः समायुक्ताः-समन्विता गुणसमायुक्ता ये भवन्ति |
'द्विजोत्तमाः' ब्रामणप्रधानास्ते 'समर्थाः' शक्ताः 'तुः पूरणे उद्धर्नु संसारादिति गम्यते अर्थान्मुक्तिपदे व्यवस्थापयितुं 'परम्' आत्मव्यतिरिक्तमात्मानमेव वेत्यष्टादशसूत्रगर्भार्थः ॥ अभिधाय चेदमवस्थितो भगवान् , ततश्च
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-1 / गाथा ||३४-३७|| नियुक्ति: [४७०...]
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||३४.
-३७
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उत्तराध्य.
एवं तु संसए छिन्ने, विजयघोसे य बंभणे । समुदाय तओ तंतु, जयघोसं महामुणिं ॥ ३४॥ तुढे य
४ विजयघोसे, इणमुद्दाहु कयंजली। माहणत्तं जहाभूयं, सुहु मे उवदंसियं ॥ ३५ ॥ तुम्भे जइया जन्नाणं, तुन्भे बृहद्वृत्तिः वेयविदो विऊ । जोइसंगविऊ तुम्भे, तुम्भे धम्माण पारगा ।। ३६ ।। तुम्भे समत्था उद्धर्नु, परं अप्पाणमेव | ॥५२९॥
य। तमणुग्गहं करेहऽम्हं, भिक्खू णं भिक्खुउत्तमा ॥ ३७॥
सूत्रचतुष्टयं प्रतीतार्थम् , 'एवम्' उक्तप्रकारेण 'तुः' वाक्यान्तरोपन्यासे 'संशये प्रागभिहितरूपे 'छिन्ने' अपनीते 'विजयघोषः' विजयघोषनामा 'चः' पूरणे 'बामणः' माहणः पठ्यते च-'माहने 'समुदाय'त्ति आपत्वात् 'समादाय' सम्यग् गृहीत्वाऽवधार्येति योऽर्थः 'तयं ति तकां प्रक्रमाजयघोषवाचं, 'तं तु'त्ति तं च जयघोषं महामुनि, यथेष मम भ्राता एष एव च महामुनिरिति, किं कृतवानित्याह-'तुडे' इत्यादि, केचित्त्वनन्तरसूत्रे तृतीयपादमेवं पठन्ति-संजाणतो तओ तं तु' अत्र च 'संजानन्' स एवायं मम सौदर्य इति प्रत्यभिजानन् , युक्तं चैतद्, | यतो वक्ष्यति सूत्रस्पर्शिकनियुक्ती-'संजाणंतो भणई जयघोसं जायगो विजय घोसो ति, तथा 'तुष्टः' परितोषितः 'चः' पूरणे विजयघोषः 'इदं वक्ष्यमाणम् 'उदाहुत्ति 'उदाह' ब्रूते, तत्कालापेक्षया वर्तमानता, कृताञ्जलिः प्राग्वत्, यदाह तद्दर्शयति-बामणत्वं 'यथाभूतं' यथाऽवस्थितं सु इति-शोभनं यथा भवत्येवं तिष्ठन्तीति सुष्टु, औणादिका कुप्रत्ययः, 'मे' मम 'उपदर्शितम्' इति प्रकटितम् । किञ्च-यूयं 'जइयत्ति यष्टारो यज्ञाना, यूयं 'वेदविदः' वेदनाः
दीप
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अनुक्रम [९९६-९९९]
५२९॥
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||३४-३७|| नियुक्ति: [४७०...]
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सूत्रांक
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-३७
'विदु'त्ति विद्वांसः, यद्वा हे 'क्दिः' यथाऽवस्थितवस्तुवेदिनो!, ज्योतिषाविदो यूयं, यूयं 'धर्माणां' सदाचाराणां पारगाः, भवतामेव तत्त्ववेत्तृत्वेन सर्वशास्त्रवारिधिपारदर्शित्वान्निहितसदाचारत्वाचेत्यभिप्रायः, तथा यूयं समर्था उद्धर्तु परमात्मानमेव च, युष्माकमेव तात्त्विकगुणसमन्वितत्वात् , 'तत् तस्माद् 'अनुग्रह भिक्षाग्रहणेनोपकार 'कुरुत' विधत्तास्माकं 'भिक्षो! तपखिन् ! णमिति बाक्यालङ्कारे 'भिक्षुत्तम' यतिप्रधान !, यदिवा भिषणामुत्त|मेति सम्बन्धः 'भिक्षुति भिक्षो! इति सूत्रचतुष्टयार्थः ।। एवं ब्राह्मणेनोक्ते मुनिराह॥ न कजं मज्झ भिक्खेणं, खिप्पं निक्खमसू दिया। मां भमिहिसि भयावत्ते, घोरे संसारसागरे ॥ ३८ ॥ उवलेवो होह भोगेसु, अभोगी नोवलिप्पई । भोगी भमइ संसारे, अभोगी विष्पमुच्चई ॥ ३९ ॥ उल्लो सुक्को य दो छुढा, गोलया मट्टियामया । दो वि आवडिया कुड्डे, जो उल्लो सोऽथ लग्गई ॥४०॥ एवं लग्गति दुम्मेहा, जे नरा कामलालसा । विरत्ता उ न लग्गति, जहा से सुकगोलए ॥४१॥
'ने'स्यादि सूत्रचतुष्टयम् , 'न कार्य' न प्रयोजनं मम 'भिक्खेणं'ति भिक्षया समुदानेन, किन्तु 'क्षिप्रं' शीघ्रं 'निष्काम' प्रव्रज 'द्विज !' ब्राह्मण!, भवन्निष्क्रमणेनैव मम कार्यमिति भावः, किमेवमुपदिश्यते इत्याह-'मा भ्रमी' मा पर्यटी, आषत्वाच सूत्रे लुटः प्रयोगः, यदिवा मा भ्रमीष्यसीत्यपि न दुष्ट, यतो माडि लुङक्तोऽयं तु मा, भयानिइहलोकभयादीनि आवर्ता इव आवर्ता यस्मिन्नसौ भयावतस्तत्र 'घोरे' रौद्रे, पठ्यते च-भवावचे दीहे'त्ति, अत्र च
दीप
अनुक्रम [९९६-९९९]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||३८-४१|| नियुक्ति: [४७०...]
उत्तराध्य.
यज्ञीया
बृहद्वृत्तिः
Kध्यय, २५
प्रत सूत्रांक ||३८
-४१||
भवा-मनुष्यभवादयः, अन्यत्प्राग्वत् , 'दीर्घ आयते 'संसारसागरें भवसमुद्रे, अनेन च विपर्ययदोष उक्तः । एत- देव समर्थयितुमाह-'उपलेपः' कर्मोपचयरूपो भवति 'भोगेसु' शब्दादिषु भुज्यमानेष्विति गम्यते, भोगी-शब्दादिभोगवान्न तथाऽभोगी 'न' नैव 'उपलिप्यते' कर्मणोपदिश्यते, ततश्च भोगी भ्रमति संसारे अभोगी विप्रमुच्यते, मुक्तो भवतीत्यर्थः, इह च गृहस्थभावे भोगित्वं निष्क्रमणे तु तदभाव इति गृहिभावस्य सदोषत्वान्निष्क्रमणमेव युक्तमित्युक्तं भवति । यथा भोगेषूपलेपस्तदभावे चान्यथात्वं तथा दृष्टान्तद्वारेण दर्शयितुमाह-'उल्लो'त्ति आर्द्रः शुष्कश्चअनार्दो द्वावुभौ 'छूढ'त्ति क्षिप्तौ 'गोलको पिण्डको मृत्तिकामयौ, द्वावपि 'आपतितो' प्राप्तौ 'कुड्ये भित्तौ, ततः किमित्याह-य आर्द्रः सो 'अत्रे'सनयोर्मध्ये 'लगति' रिष्यति प्रक्रमाकुड्ये । दान्तिकयोजनामाह-एवं लगन्ति प्रस्तावात्कर्मणा 'दुर्मेधसः' दुर्बुद्धयो ये नराः 'कामलालसाः विषयलम्पटाः, विरक्तास्तुशब्दस्य पुनरर्थत्वाकामभोगपराङ्मुखाः पुनर्न लगन्ति, उत्तरत्र तुशब्दस्य भिन्नक्रमत्वेनैवकारार्थतया च नैव कर्मणा संश्लिष्यन्ते यथा
शुष्को गोलकः, इह चान्वयानन्तरं व्यतिरेकः सुखेनैव बुध्यत इति तमुक्त्वा प्रथममुरिक्षतस्यापि दृष्टान्तस्य पश्चाद-1 || भिधानमिति सूत्रचतुष्टयार्थः । यदित्यं प्रज्ञापितोऽसौ कृतवांस्तदाह| एवं से विजयघोसे, जयघोसस्स अंतिए । अणगारस्स निक्खतो, धम्म सुचा अणुत्तरं ॥ ४२ ॥
'एवम्' उक्तप्रकारेण स विजयघोषो ब्राह्मणो जयघोषस्य 'अन्तिके' समीपे 'अनगारस्य' यतेः 'निष्क्रान्तः' प्रत्र
.
दीप
अनुक्रम [१०००-१००३]
SHKA4%9
॥५३०॥
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||४३|| नियुक्ति: [४७१-४७९]
*
प्रत
*
सूत्रांक
||४३||
जितः 'धर्मम्' अहिंसादि श्रुत्वा' आकर्ण्य 'अनुत्तर' प्रधान, पठ्यते च-सोचा ण केवल ति, तत्र च 'केवल || विशुद्धमिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरन्ननयोर्निष्क्रमणफलमाहखवित्ता पुवकम्माई, संजमेण तवेण य । जयघोसविजयघोसा, सिद्धि पत्ता अणुत्तरं ॥४३॥ तिबेमि ॥
॥जन्नइज ॥२५॥ सुगममेव ॥ सकलाध्ययनतात्पर्यार्थमुपदर्शयन् सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिमाह नियुक्तिकृत्अह एगराइआए पडिमाए सो मुणी विहरमाणो। वसुहं दूइज्जतो पत्तो वाणारसिं नयरिं ॥ ४७१ ॥ सो उजाण निसन्नो मासक्खमणेण खेइयसरीरो। भिक्खट्र बंभणिजे उवढिओ जन्नवाडंमि॥४७२ ॥ अह भणई जयघोसं कीस तुम आगओ ? इहं भंते!।नहु ते दाहामि इओ जायाहि हु अन्नओ भिक्खं ॥ सो एवं पडिसिद्धो जन्नवाडंमि जायगेण तहिं । परमत्यदिटुसारो नेव य तुट्रो नवि अ रुटो ॥४७॥ अह भणई अणगारोजं जायग! आउसो निसामेह । वयचरिय भिक्खचरिआ दिट्ठा साहूण चरणमि ॥3 रजाणि उ अवहाया रायसिरिंअ(त)णुचरंति भिक्खाए।समणस्सउ मुक्कस्सा भिक्खा चरणं च करणं च ॥ संजाणंतो भणई जयघोसं जायगो विजयघोसो। अस्थि उ पभूअमन्नं भुंजउ भयवं ! पगामाए ॥४७७॥
**
दीप
अनुक्रम [१००६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२५], मूलं [--] / गाथा ||४३|| नियुक्ति: [४७१-४७९]
प्रत
॥५३॥
सूत्रांक
||४३||
उत्तराध्य. भिक्खेण न मे कर्ज मज्झ करणं तु धम्मचरणेणं । पडिवज्ज धम्मचरणं मा संसारंमि हिंडिहिसि ४७८ यज्ञीयाबृहद्धत्तिः सो समणो पचडओ धम्मं सोऊण तस्स समणस्स। जयघोसविजयघोसा सिद्धि गया खीणसंसारा ४७९
ध्यय.२५ | गाथानवकं व्याख्यातप्रायमेव, नवरम् , 'एगराइयाए'त्ति एकरात्रिक्या 'प्रतिमया' तथाविधाभिग्रहविशेषरूपया न तु द्वादश्या भिक्षुप्रतिमया, तत्र मासक्षपणासम्भवात् , तथा च तत्खरूपम्-“एगराईयं भिक्खुपडिम पडिवण्णस्स अणगारस्स णिचं पोसटकाए (यस्स) जाव अहियासे० कप्पति से अट्टमेणं भत्तेणं अपाणएणं पहिया गामस्स जाव ४॥ रायहाणीए वा ईसिं दोवि पाए साहटु बग्धारियपाणिस्स एगपोग्गलदिहिस्स अणिमिसनयणस्स ईसिपम्भारगएणं काएण अहापणिहिएहिं गत्तेहिं सविंदिएहिं गुत्तेहिं ठाणं ठाइत्तए" इत्यादि, तत्राष्टममेवोक्तमत्र तु वक्ष्यति-'मासक्ष
पणेन खेदितशरीर' इति । 'विहरन्' अप्रतिबद्धविहारमाचरन् , अयं च भावत एकस्थानस्थितस्यापि संभवत्यत: दउच्यते-'वसुधा' पृथ्वी 'दूइजंतो'त्ति परिभ्रमन् तथा 'उद्याननिषण्णः' उद्यानाश्रितः सन् मासक्षपणेन खेदितं
श्रममानीतं शरीरं न पुनर्मनोऽस्येति मासक्षपणखेदितशरीरः 'बंभणिज्जेत्ति ब्राह्मणानामिज्या-पूजा यस्मिन् स | १ एकरात्रिकी भिक्षुप्रतिभा प्रतिपन्नस्यानगारस्य नित्यं व्युत्सृष्टकायस्थ यावद्ध्यासयतः कल्पते तस्याष्टमेन भक्तनापानकेन बहिर्मामात् । ॥५३॥ यावद्राजधान्या वा ईषत् द्वावपि पादौ सहत्य (वर्नुलाकारेण भूमावलमतया वा स्थापयित्वा) लम्बमानपाणेरेकपुद्गलदृष्टिकस्यानिमिषनयनस्वेपत्याग्भारगतेन कायेन यथाप्रणिहितैः गात्रैः सर्वैरिन्द्रिगुप्तैः स्थानं खातुं (कायोत्सर्ग विधातुम्)
दीप
अनुक्रम [१००६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२५], मूलं [-] / गाथा ||४३|| नियुक्ति: [४७१-४७९]
प्रत सूत्रांक
||४३||
ब्राह्मणेज्यस्तस्मिन् 'इओत्ति 'इतः' ब्राह्मणार्थमुपस्कृतादाहारात् 'जायाहि'त्ति याचख, 'हुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, ततश्च 'अन्यत एवं' अस्पयतिरिक्तात् भिक्षा याचखेति सम्बन्धः । 'परमहदिवसारो'ति प्राकृतत्वाद् दृष्टः-उप-13/ लब्धः परमार्थाय-मोक्षाय सारः-प्रस्तावात्क्षान्त्यादिरूपः प्रधानोपायः परमाथानां वा ज्ञानादीनां सारः-प्रधान येनासौ.दृष्टपरमार्थसार, त्वं याजक! आउसो ति आयुष्मन् ! कोमलामन्त्रणमेततू, 'वयचरिय'त्ति इशब्दस्य 2 गम्यमानत्वाद् प्रतचर्येव भिक्षायै चयों-पर्यटन भिक्षाचयो दृष्टा' विहितत्वेनोपलब्धातीर्थंकरादिभिरिति गम्यते,साधूनां -
चर्यत इति चरणम्-आचारस्तस्मिन् । किञ्च-'राज्यानि' सप्ताहानि 'तुः समुचये भिन्नक्रमश्च 'अपहाय' त्यक्त्वा का'राज्यश्रियं तु छत्रचामराद्यलकाररूपां किमित्याह-'अनुचरन्ति' पर्यटन्ति साधव इति प्रक्रमः 'भिक्षायै भिक्षार्थ, किमि-15 हाति-श्रमणस्य तुरिति यस्मात् 'मुक्तस्य'निःसङ्गस्य,अकारोऽलाक्षणिकः,भिक्षेत्युपलक्षणत्याद्भिक्षाचों 'चरणं च' प्रतादि|
चरणहेतुत्वेन 'करणं च पिण्डविशुद्ध्यादिहेतुत्वेन, ततो विहितानुष्ठानरूपत्वाद्राजर्षिभिरपि सेवितत्वाच भिक्षा
चयोयास्त द्विधानामहमिहायातो, भवास्तु ददातु मा वा भिक्षामिति भावः । 'संजानन्' प्रत्यभिजानानः 'पकामा-13 Cीए'त्ति आपत्वात्प्रकामम्-अत्यर्थ । 'धर्मचरणेन' धर्मानुष्ठानेन भवेति गम्यते । 'सः' इति विजयघोषः सह मनसा-18
चित्तेन वर्तत इति समनाः, किमुक्तं भवति ?-भावतो न तु बहिवृत्त्यैव, तस्य श्रामणस्यान्तिक इति गम्यत इति नियुक्तिगाथानवकार्थः ॥ इति' परिसमाप्ती, अवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वदेव ॥ दाइत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां पञ्चविंशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ २५॥
दीप
अनुक्रम [१००६]
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययनं- २५ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [--1 / गाथा ||४३...|| नियुक्ति: [४८०-४८५]
सामाचाध्ययनं.
बृहदृत्तिः
प्रत
२६
सूत्रांक
||४३||
उत्तराध्या
अथ षड्विंशतितममध्ययनम् । व्याख्यातं यज्ञीयाभिधानं पञ्चविंशमध्ययनम् , अधुना पड्विंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्य॥५३२॥ यने ब्रह्मगुणा उक्ताः, तद्वांश्च यतिरेव भवति, तेन चावश्यं सामाचारी विधेयेति साऽस्मिन्नभिधीयते इत्यभिसम्ब
धागतस्यास्योपक्रमादि प्राग्वत्प्ररूप्यं यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेप सामाचारीति नाम, अतः साम आचार इति च निक्षेप्तव्यमित्यभिप्रायेणाह नियुक्तिकृत्निक्खेवो सामंमि(य)चउबिहो दुविहो होइ दवंमि।आगमनोआगमओ नोआगमओय सो तिविहो४८० जाणगसरीरभविए तबइरित्ते अ सकराईसुं । भावंमि दसविहं खलु इच्छामिच्छाइअं होइ ॥ ४८१ ॥2
इच्छो मिच्छा तहकारो, आवस्सिआ अ निसीहिआ।आपुच्छणा य पडिपुच्छा, छंदणा य निमंतणा॥ 8 उवसंपया य काले सामायारी भवे दसविहा उ। एएसिं तु पयाणं पत्तेय परूवणं वुच्छं ॥ ४८३॥ आयारे निक्खेवो चउक्कओ दुवि०
॥१८४॥ जाणगसरीरभविए तबइरित्ते य नामणाईसुं । भावंमि दसविहाए सामायारीइ आयरणा ॥ ४८५॥
दीप अनुक्रम [१००६]
॥५३२॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -२६ “सामाचारी" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [--] / गाथा ||४३...|| नियुक्ति : [४८०-४८५]
प्रत सूत्रांक
||४३||
COCCASCCCCC
णिक्खेयोइत्यादि गाथाः पटू प्रायः प्रतीतार्थाः, सूत्रव्याख्याने च काश्चिद्याख्यास्यन्ते, नवरं 'तयतिरिक्तंच ज्ञशरीरभन्यशरीरव्यतिरिक्तं च द्रव्यसाम शर्करादिषु, आदिशब्दात्क्षीरादिपरिग्रहः, ततश्च शर्कराक्षीरदधिगुडादीनां यत्परस्परमविरोधेन व्यवस्थानं, भावे साम दशविध 'खलुः' अवधारणे दशविधमेवेच्छामिथ्यादिकं सामाचारीखरूपमिति गम्यते, भावसामत्वं चास्य तात्त्विकस्स क्षायोपशमिकादिभावरूपत्वात् परस्परमविरोधेन चावस्थानात्, तथा प्रत्येकप्ररूपणां वक्ष्ये इति प्रतिज्ञामभिधाय यत् प्ररूपणानभिधानं तदावश्यकनियुक्ती कृतत्वात्तगाथयोरेव चैक|कर्तृकत्वेनेह लिखितत्वान्न दुष्टमिति भावनीयं, सूत्रक्रमोलङ्घनं तु यथाविषयं सर्वेषां सदाकृत्यत्वेन पूर्वापरभावस्थाभावप्रदर्शनार्थ, तथा तबइरित्ते य णामणाईसुन्ति सोपस्कारत्वान्नामनधावनादिषु सुकराणि यानि द्रव्याणि तानि तयतिरिक्तो द्रव्याचार उच्यते, यत उक्तम्-"णामणधोवणवासणसिक्खावणसुकरणाविरोहीणि । दवाणि जाणि लोए दवा-3 यारं वियाणाहि ॥ १॥" भावे दशविधाया इच्छादिभेदेन सामाचार्या आचरणा, अत्र बहुलग्रहणात्त्रियां युद, एवमाप्रच्छनादिष्यपि, भावत्वं तु जीवद्रव्यपर्यायत्वादस्खेति गाथाषट्कार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययननामान्वर्थमाहइच्छाइसाममेसुं आयरणं वषिणअं तु जम्हेत्थ । तम्हा सामायारी अज्झयणं होइ नायवं ॥ ४८६ ॥ १ नामनधावनवासनशिक्षणमुकरणाविरोधीनि । द्रव्याणि यानि लोके द्रव्याचारं विजानीहि ॥ १॥
दीप
अनुक्रम
[१००६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [४८६]
प्रत
सुत्राक
||१||
उत्तराध्य. 'इच्छादिसाम'त्ति सुख्ख्यत्ययाद् इच्छादिसामसु 'ए'' अनन्तराभिहितेषु 'आचरणम् एतद्विषयमनुष्ठानं 'वर्णित सामाचाबृहद्वृत्तिः ४/प्ररूपितं 'तुः' पूरणे यस्मादत्राध्ययने तस्मात्सामाचारीति-सामाचारीनामकमिदमिति प्रक्रमे अध्ययनं भवति ||
TAध्ययनं. है। ज्ञातव्यम् , अयमाशयः-समाचारोऽत्र वर्ण्यते ततः समाचारे भवमिति विवक्षायां शैषिकोऽण् रूढितश्च स्त्रीलिङ्गता, ॥५३३॥ तथा च 'टिड्डाण (पा०४-१-१५) इत्यादिना डीपि सामाचारीति भवतीति गाथार्थः । गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, २६
सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुञ्चारणीयं, तचेदम्
सामायारिं पवक्खाभि, सब्वदुक्खविमुक्खणि । जं चरित्ता ण निग्गन्धा, तिण्णा संसारसागरं ॥१॥ समाचरण-समाचारस्तस भावो 'गुणवचनब्रामणादिभ्य' इति (पा०५-१-१२४) प्य , तस्य च पित्करणसामर्थात् खियामपि वृत्तिरिति 'षिद्गौरादिभ्यश्चे'(पा०४-१-४१)ति कीपि सामाचारी तां-यतिजनेतिकर्तव्यतारूपामहं प्रवक्ष्यामि 'सर्वदुःखविमोक्षणीम्' अशेषशारीरमानसासातविमुक्तिहेतुम् अत एव यां सामाचारी 'चरित्वा'
आसेव्य 'ण'इति वाक्यालङ्कारे 'निर्ग्रन्थाः' यतयस्तीर्णाः संसारसागरं, मुक्ति प्राप्ता इति भावः, उपलक्षणत्वाच तरन्ति त तरिष्यन्ति चेति सूत्रार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमाह
५३३॥ पढमा आवस्सिया नाम, विइया य निसीहिया । आपुच्छणा य तइया, चउत्थी पडिपुच्छणा ॥२॥ पंचमा
दीप
अनुक्रम [१००७]
AMA
Swlanmiorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||२-४|| नियुक्ति: [४८६...]
CAGRA
प्रत सूत्रांक ||२-४||
चंदणा नाम, इच्छाकारो अछट्ठओ। सत्तमो मिच्छकारो य, तहक्कारो य अट्ठमो ॥३॥ अब्भुट्ठाणं नवमा, दसमा उवसंपया। एसा दसंगा साहूर्ण, सामायारी पवेइया ॥४॥
सूत्रत्रयं स्पष्टमेव, नवरं व्रतग्रहणादप्यारभ्य कारणं विना गुर्ववग्रहे आशातनादोषसम्भवान्न स्थेयं, किन्तु ततो निर्गन्तव्यं, न च निर्गमनमावश्यकी विनेति प्रथममावश्यकी, निर्गस च यत्रास्पदे स्थेयं तत्र नैषेधिकीपूर्वकमेव प्रवेष्टव्यमिति तदनु नैषेधिकी, तत्रापि तिष्ठतो भिक्षाटनादिविषयाभिप्रायोत्पत्ती गुरुपृच्छापूर्वकमेव तत्साधनमित्पनन्तरमाप्रच्छना, आप्रच्छनायामपि गुरुनियुक्तेन पुनः प्रवृत्तिकाले कचित्प्रष्टव्या एव गुरव इति तत्पृष्ठतः प्रति-IA प्रच्छना, कृत्याऽपि गुर्वनुज्ञया भिक्षाटनादिकं नात्मम्भरिणव भवितव्यमिति तदनु छन्दना प्राग्गृहीतद्रव्यजातेन शेषयतिनिमन्त्रणात्मिका, तस्यामपि प्रयोक्तव्य एवेच्छाकार इति तदनु तस्याभिधानम् , अयं चासन्तमवद्यभीरुणवी तत्वतो विधीयते, तेन च कथञ्चिदतिचारसम्भवे आत्मा निन्दितव्य इति तदनु मिथ्याकारः, कृतेऽपि च तस्मिन् बृहत्तरदोषसम्भवे गुरूणामालोचना दातव्या, तत्र च यदादिशन्ति गुरवस्तत्तथेति मन्तव्यं इति तथाकारः, तथेति ४ प्रतिपद्य च सर्वकृत्येषूद्यमवता भाव्यमिति तदनु तद्रूपमभ्युत्थानम् , उद्यमवता च ज्ञानादिनिमित्तं गच्छान्तरसङ्क्रमोऽपि विधेयः तत्र चोपसम्पद् गृहीतव्येत्यनन्तरमुपसम्पदुक्ता, उपसंहारमाह-एषा' अनन्तरोक्ता 'दशाका'
25****5525-26*6*
E
दीप अनुक्रम [१००८-] -१०१०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२-४|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत
सूत्रांक
||२-४||
उत्तराध्य इच्छादिदशावयवा 'साधूनां' यतीनां सामाचारी 'प्रयेदिता' तीर्थकरादिभिरुक्तेति सूत्रत्रयगर्भार्थः ॥ एतामेव ४ सामाचा
प्रत्सवयवं विषयप्रदर्शनपूर्वकं विधेयतयाऽभिधातुमाहबृहद्वृत्तिः
यध्ययनं. गमणे आवस्सियं कुजा, ठाणे कुजा निसीहिय। आपुच्छणा सयंकरणे, परकरणे पडिपुच्छणा ॥५॥ ५५३४॥ छंदणा द्वजाएणं, इच्छकारो असारणे । मिच्छाकारो अनिदाए, तहकारो पडिस्सुए ॥ ६ ॥ अम्भुट्ठाणं । २६
गुरुपूया, अच्छणे उवसंपया । एवं दुपंचसंजुत्ता, सामायारी पवेइया ॥७॥ | 'गमने' तथाविधालम्बनतो बहिनिःसरणे आवश्यकेषु-अशेषावश्यकर्त्तव्यब्यापारेषु सत्सु भवाऽऽवश्यकी, उक्तंभ हि-"आवस्सिया उ आवस्सएहिं सवेहिं जुत्तजोगस्से"त्यादि, तां 'कुर्याद्' विदध्यात्, स्थीयतेऽस्मिन्निति स्थानम्उपाश्रयस्तस्मिन् प्रविशन्निति शेषः, कुर्यात् , कां ?-'नषेधिकी' निषेधनं निषेधः-पापानुष्ठानेभ्य आत्मनो ब्यावर्त्तनं तस्मिन् भया नैपेधिकी, निपिद्धात्मन एतत्सम्भवात् , उक्तं हि-"जो होइ निसिद्धप्पा निसीहिया तस्स भावओ होइ" इत्यादि, आङिति-सकलकृत्याभिव्याया प्रच्छना आप्रच्छना-इदमहं कुर्या न वेत्येवंरूपा तां खयमित्यात्मनः करणं-कस्यचिद्विवक्षितकार्यस्य निर्वर्तनं स्वयंकरणं तस्मिन् ,तथा 'परकरणे' अन्यप्रयोजनविधाने प्रतिप्रच्छना,गुरुनियु
भा५३४॥ है तोऽपि हि पुनः प्रवृत्तिकाले प्रतिपृच्छत्येष गुरुं, स हि कार्यान्तरमप्यादिशेत् सिद्धं वा तदन्यतः स्यादिति, उभयत्र
१ आवश्यिफी तु आवश्यकेषु सर्वेषु योगयुक्तस्य । २ यो भवति निषिद्धात्मा नैपेधिकी तस्य भावतो भवति । ।
दीप अनुक्रम [१००८-] -१०१०]
CASSESAXCY
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||५-७|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत सूत्रांक ||५-७||
-%
वा खकरणपरकरणे उपलक्षणमिति-उच्छासनिःश्वासौ विहाय सर्वकार्येष्वपि खपरसम्बन्धिषु गुरवः प्रष्टव्या अतः। सर्वविषयमपि प्रथमतः प्रच्छनमापृच्छेत्युच्यते, तथा च नियुक्तिकृता सामान्येनैवावाचि-"आपुच्छणा तु कजे"त्ति, तथा स्वपरसम्बधिनि सर्वत्रापि कृत्ये गुरुनियुक्तेन पुनः प्रवृत्तिकाले यद्गुरुप्रच्छनं सा प्रतिपृच्छा, तथा च"पुचनिउत्तेण होइ पडिपुच्छ'त्यविशेषेणैवोक्तं, 'छन्दना' उक्तरूपा विधेयेति शेषः, एवमुत्तरत्रापि, 'द्रव्यजातेन | तथाविधाशनादिद्रव्यविशेषेण प्रारगृहीतेनेति गम्यते, सूचकत्वात्सूत्रस्य, तथा चाह-"पुषगहिएण छंदणं'ति, इच्छाखकीयोऽभिप्रायस्तया करणं-तत्कार्यनिर्वर्तनमिच्छाकारः, 'सारणे' इत्यौचित्यत आत्मनः परस्य या कृत्यं प्रति प्रय
र्तने, तत्रात्मसारणे यथेच्छाकारेण युष्मचिकीर्षित कार्यमिदमहं करोमीति, अन्याह च-"अहंगं तुन्भं एवं करेमि 8 कजंतु इच्छाकारेणं"ति, अन्यसारणे च मम पात्रलेपनादि सूत्रदानादि वा इच्छाकारेण कुरुतेति, तथा चान्वाह६|"जेइ अम्भत्थिज्ज परं कारणजाए करेज से कोइ । तत्थवि इच्छाकारोण कप्पा बलाभिओगो उ॥१॥" तथा।
मिथ्येत्यलीकं मिथ्याकरणं मिथ्याकार:-मिथ्येदमिति प्रतिपत्तिः, सा चात्मनो निन्दा-जुगुप्सा तस्या, वितथाच-1 भारणे हि धिगिदं मिथ्या मया कृतमिति निन्द्यत एवात्मा विदितजिनवचनैः, तथाकरणं तथाकारः-इदमित्थं चैबे
१ आमच्छना तु कार्ये । २ पूर्वनियुक्तेन भवति प्रतिपृच्छा । ३ पूर्वगृहीवेन छन्दना । ४ अहं युष्माकमेतत् करोमि कार्य विच्छाकारेण ५ यद्यभ्यर्थयति परं कारणजाते कुर्यात्तस्य कश्चित् । चत्रापि इच्छाकारो न कल्पते एव बलाभियोगः ॥१॥
दीप अनुक्रम [१०११-] -१०१३]
64G-950-582
SACRESS
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||५-७|| नियुक्ति: [४८६...]
Re-
सामाचाध्ययन
प्रत सूत्रांक ||५-७||
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सभ्युपगमः, स च फिविषयः इत्याह-प्रतिश्रवणं प्रतिश्रुतं-गुरी वाचनादिकं यच्छत्येवमेतदित्यभ्युपगमतस्मिन् , छत्तराध्य.
तथा चान्वाह-"वायणपडिसुणणाए उवएसे सुत्तअत्थकहणाए । अवितहमेयंति तहा अविकप्पेणं तहकारो॥१॥" बृहद्वृत्तिः
द अभीत्याभिमुख्येनोत्थानम्-उद्यमनमभ्युत्थानं तच 'गुरुपूय'त्ति सूत्रत्वाद् गुरुपूजायां, सा च गौरवाहाणाम्-आचार्य-14 ॥५३५॥
ग्लानबालादीनां यथोचिताहारभेषजादिसम्पादनम् , इह च सामान्याभिधानेऽप्यभ्युत्थानं निमवणारूपमेव परि-1 गृह्यते, अत एव नियुक्तिकृतैतत्स्थाने निमन्त्रणैवाभिहिता "छंदणा य निमंतणे"ति, तथा 'अच्छणे'त्ति आसने प्रक्रमादाचार्यान्तरादिसन्निधौ अवस्थाने उप-सामीप्येन सम्पादनं-गमनं सम्पदादित्वात्विपि उपसंपद्-इयन्तं कालं भवदन्तिके मयाऽऽसितव्यमित्येवरूपा, इयं च ज्ञानार्थतादिभेदेन त्रिधा, तथा चोक्तम्-"उवसंपया यतिविहा णाणे तह दसणे चरित्ते य"त्ति 'एवम्' इत्युक्तप्रकारेण 'दुपंचसंजुत्तत्ति आर्षत्वात् द्विपञ्चकसंयुक्ता दशसंख्यायुक्तामित्यर्थः, सामाचारी 'प्रवेदयेत्' कथयेत् आपत्वाद गुरुः शिष्यायेति शेषः, अनेन च गुरुणा सदा तदुपदेशपरेणैव भवितव्य-16 मित्यर्थत उक्तं, पठ्यते च-'एसा दसंगा साहूणं, सामायारी पवेइय'त्ति, एतच स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ एतावता दशविधसामाचारीमभिधायौघसामाचारी विवक्षुरिदमाह
M १ वाचनाप्रतिश्रवणे उपदेशे तथा सूत्रार्थकधनायाम् । अवितथमेतदिति तथा अविकल्पेन तथाकारः ॥ १ ॥२ उपसंपञ्च त्रिविधा ज्ञाने | तथा दर्शने चारित्रेच
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दीप अनुक्रम [१०११-१०१३]
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५३५॥
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||८-१०|| नियुक्ति : [४८६...]
प्रत सूत्रांक ||८-१०||
पुग्विालंमि चजन्भागे, आइचंमि समुट्टिए । भंडयं पडिलेहिता, वंदित्ता य तओ गुरूं ॥८॥ पुच्छिता पंजलिउडो, किं कायव्वं मए इहं । इच्छं निओइ भंते !, वेयावचे व सज्झाए ॥९॥ वेयायचे निउत्तेणं, कायय्वमगिलायओ । सज्झाए वा निउत्तेणं, सव्वदुक्खविमुक्खणे ॥१०॥ | 'पुबिलंमि'त्ति पूर्वमिंश्चतुर्भागे आदित्ये 'समुत्थिते' समुद्गते, इह च यथा दशाविकलोऽपि पटः पट एवोच्यते, एवं किञ्चिदूनोऽपि चतुर्भागश्चतुर्भाग उक्तः, ततोऽयमर्थः-बुवा नभश्चतुर्धा विभज्यते, तत्र पूर्वदिक्संबद्धे किञ्चिदूननभश्चतुर्भागे यदादित्यः समुदेति तदा, पादोनपौरुष्यामित्युक्तं भवति, 'भाण्डक' पतद्हाद्युपकरणं 'प्रतिलेख्य सामयिकपरिभाषया चक्षुषा निरीक्ष्योपलक्षणत्वात्प्रमृज्य च 'वन्दित्वा च' नमस्कृत्य 'ततः' इति प्रतिलेखनानन्तरं 'गुरुम्ही आचार्यादिकं, किमित्याह-'पृच्छेत्' पर्यनुयुञ्जीत प्रक्रमाद्गुरुमेव 'पंजलिउड'त्ति प्राग्वत्कृतप्राञ्जलिः, यथा-किं 'कर्तव्यम्' अनुष्ठेयं 'मये यात्मनिर्देशः 'इह' अस्मिन् समये इति गम्यते, कदाचिद्गुरवो मन्येरन्-खाध्यायवैया
तयोरन्यतरस्मिन्नेवास्य नियोगे वाञ्छेत्यतो ब्रूयात्-'इच्छामि णियोइउति अन्तर्भावितण्यर्थत्वान्नियोजयितुं युष्मा-12 k| भिरात्मानमिति शेषः ‘भंतेत्ति भदन्त ! 'चेयावयेत्ति वैयावृत्त्ये-ग्लानादिव्यापारे वाशब्दो भिन्नक्रमस्ततः 'सज्झा
पति आपत्वात्स्वाध्याये वा, इह च पात्रप्रतिलेखनानन्तरं गुरुं पृच्छेदिति यदुक्तं तत्प्रायस्तदैव बहुतरवैयावृत्त्य-12 | विधानसम्भवात् , यद्वा पूर्वस्मिन्नभश्चतुर्भागे आदित्ये समुत्थिते इव समुत्थिते, बहुतरप्रकाशीभवनात्तस्य, भाण्ड
दीप अनुक्रम [१०१४-] -१०१६]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||८-१०|| नियुक्ति : [४८६...]
उत्तराध्य.
बृहद्धत्तिः
॥५३६॥
प्रत सूत्रांक ||८-१०||
मेव भाण्डकं ततस्तदिव धर्मद्रविणोपार्जनाहेतुत्वेन मुखवस्त्रिकावर्षाकल्पादीह भाण्डकमुच्यते, तत्प्रतिलेख्य वन्दित्वा सामाचा|च ततो गुरुं पृच्छेत् , शेष प्राग्वत् , उपलक्षणं चैतद्-यतः सकलमपि कृत्यं विधाय पुनरभिवन्दनापूर्वकं प्रष्टव्या एव |गुरव इति, एवं च पृष्ट्वा यत्कर्तव्यं तदाह-वैयावृत्त्ये 'नियुक्तेन' व्यापारितेन कर्त्तव्यं प्रक्रमात् वैयावृत्त्यम् , 'अगिलायउत्ति अग्लान्यैव शरीरश्रममविचिन्त्यैवेतियावत्, खाध्याये वा नियुक्तेन सर्वदुःखविमोक्षणे, सकलतपःकर्म-18| २६ प्रधानत्वादस्य, खाध्यायोऽग्लान्यैव कर्त्तव्य इति प्रक्रम इति सूत्रत्रयार्थः ॥ इत्थं सकलौघसामाचारीमूलत्वात्प्रतिलेखनायास्तत्कालं सदाविधेयत्वाद्गुरुपारतत्र्यस्य तच्चाभिधायौत्सर्गिकं दिनकृत्यमाहदिवसस्स चउरो भागे, कुज्जा भिक्खू वियक्खणो। तओ उत्तरगुणे कुज्जा, दिणभागेसु चउमुवि ॥११॥ पढमं पोरिसिं सज्झाय, वीर्य झाणं शियायई । तइयाए भिक्खायरियं, पुणो चउत्थीइ सज्झायं ॥१२॥ । सूत्रद्वयं स्पष्टमेव, नवरं चतुरो भागान् कुर्याद् बुद्ध्येत्युपस्कारः, 'तत' इति चतुर्भागकरणादनन्तरमिति गम्यते उत्तरगुणान् मूलगुणापेक्षया स्वाध्यायादींस्तत्कालोचितान् 'कुर्याद्' विदध्यात् , क दिनभागे कमुत्तरगुणं कुर्यादित्याह-17 प्रथमां पौरुषी 'स्वाध्यायं' वाचनादिकं, सूत्रपौरुषीत्वादस्याः, कुर्यादितीहोत्तरत्र च क्रियान्तराभावेऽनुवयेते, द्वितीयां प्रक्रमात्पौरुषी ध्यानं 'झियायइति ध्यायेत् , ध्यानं चेहार्थपौरुषीत्वादस्या अर्थविषय एव मानसादि-14 व्यापारणमुच्यते, ध्यायेदिति वाऽनेकार्थत्वाद्धातूनां कुर्यात्, इह च प्रतिलेखनाकालखाल्पत्वेनाविवक्षितत्वादुभयत्र
दीप
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अनुक्रम [१०१४-] -१०१६]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||११-१२|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत
सूत्रांक
-१२||
कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे (पा०२-३-५)इति द्वितीया, तृतीयायां भिक्षाचर्या, पुनश्चतुथ्यां खाध्यायम् , उपलक्षणत्वातृतीयायां भोजनवहिर्गमनादीनि, इतरत्र तु प्रतिलेखनास्थण्डिलप्रत्युपेक्षणादीनि गृह्यन्ते, इत्थमभिधानं च कालापे
क्षयैव कृष्यादेरिव सकलानुष्ठानस्य सफलत्वादिति सूत्रद्वयार्थः॥ यदुक्तं प्रथमपौरुषी स्वाध्यायं कुर्यात्तत्परिज्ञानार्थमाह८ आसाढे मासे दुपया, पोसे मासे चउप्पया। चित्तासोएसु मासेसु, तिपया हवह पोरसी ॥१३॥ अंगुलं
सत्तरत्तेणं, पक्वर्ण तु दुअंगुलं । बहुए हायए वावि, मासेणं चउरंगुलं ॥ १४ ॥ आसाढबहुलपक्खे, भद्दवए कत्तिए य पोसे य । फग्गुणवइसाहेसु य नायब्वा ओमरत्ता उ ॥१५॥ l तत्र प्रथम प्रतीतमेव, द्वितीयमपि तथैव, नवरं ससरात्रेणेति दिनाविनाभाविवादात्रीणां सप्ताहोरात्रेण वर्द्धते । दक्षिणायने हीयत उत्तरायणे, इह च सप्तरात्रेणेत्यत्र सार्द्धनेति विशेषो द्रष्टव्यः, पक्षण बङ्गुलवृद्ध्यभिधानात् , अन्यच केषुचिन्मासेषु दिनचतुर्दशकेनापि पक्षः संभवति, तत्र च सप्ताहोरात्रेणाप्यनुलवृद्धिहान्या न कश्चिद्दोषः ॥ केषु । पुनर्मासेषु दिनचतुर्दशकेनापि पक्षसम्भव इत्याह- आसाढे'त्यादि, इदमपि सुगममेव, नवरं बहुलपक्ष इति भाद्रपदादिष्यपि प्रत्येकमभिसम्बध्यते, ततः 'आसाढे'त्ति आषाढे बहुलपक्षे भाद्रपदादिषु च बहुलपक्षे 'ओम'त्ति 'अवमा | |न्यूना एकेनेति शेषः, 'रत्त'त्ति पदैकदेशेऽपि पदप्रयोगदर्शनादहोरात्राः, एवं चैकदिनापहारे दिनचतुर्दशकेनैव कृष्णपक्ष एतेष्विति भावः, इदं च व्यवहारतः पौरुषीमानं,निश्चयतस्तु, "अयणाईयदिनगणे अट्टगुणेगविभाइए लडुं
दीप
अनुक्रम [१०१७-१०१८]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||१३-१५|| नियुक्ति: [४८६...]
उत्तराध्य.
वृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक
॥५३७॥
-१५||
उत्तरदाहिणमाई उत्तरपयसोज्झपक्खेषो॥१॥" अत्र चायनम्-उत्तरायणं दक्षिणायनं च तस्यातीतदिनानि-अति-1 सामाचा क्रान्तदिषसास्तेषां गणः-समूहोऽयनातीतदिनगणः, स चोत्कृष्टतख्यशीतं शतं, तचाष्टगुणं जातानि चतुर्दश शतानियध्ययनं. | चतुःषष्टयधिकानि,तत्र चैकषष्टया भागे हृते लब्धानि चतुर्विशतिरङ्गुलानि,तत्रापि द्वादशभिरनुलैः पदमिति जाते द्वे पदे, एतयोश्च 'उत्तरदाहिणमाईत्ति उत्तरायणादौ दक्षिणायनादौ च 'उत्तरपद'तिउत्तरपदयोः 'सोज्झ'त्ति शुद्धिः प्रक्षेपश्च, तत्र हि उत्तरायणप्रथमदिने चत्वारि पदान्यासन् ततस्तन्मध्यात्पदद्वयोत्सारणे जाते कर्कटसंक्रान्त्यदिने द्वे पदे, दक्षिणायनाधदिने तु वे पदे अभूतां,तन्मध्ये च द्वयोः क्षिप्सयोर्जातानि मकरसतान्ती चत्वारि पदानि, इदं चोत्कृष्टजघन्यदिनयोः पौरुषीमानं, मध्यमदिनेष्यप्यभिहितनीतितः सुधिया भावनीयमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ इह प्रथमपौरुष्यामुपल
क्षणद्वारेण प्रतिलेखनाया अपि विधेयत्वमुक्तं, पादोनैव चासौ तत्कालत्येन प्राक् प्रदर्शितेति तत्परिज्ञानोपायमाह|जिट्ठामूले आसाढसावणे छहि अंगुलेहि पडिलेहा । अट्ठहि बिइयतियंमी तइए दस अट्ठहि चउत्थे ॥ १६ ॥
जिट्ठासूत्रम् । ज्येष्ठामूल इति ज्येष्ठे, आषाढश्च श्रावणश्चापाढश्रावणं तत्र, कोऽर्थः ?-ज्येष्ठे आपाढे श्रावणे च ॥५३७॥ पडिरङ्गुलैः प्रत्यहं प्रागुपदिष्टपौरुषीमाने प्रक्षिप्तैरिति चेहोत्तरत्र(च) गम्यते, प्रतिलेखेति प्रक्रमात्प्रतिलेखनाकालः, एवं तावदेकसिंचिके, तथाऽष्टभिरनुलैरिति सर्वत्रानुवर्तते द्वितीयत्रिके भाद्रपदाश्वयुकार्तिकलक्षणे प्रतिलेखनाकालः, तथा
%
%
दीप अनुक्रम [१०१९-] -१०२१]
2-%
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [--1 / गाथा ||१६|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत सूत्रांक ||१६||
तृतीये प्रक्रमात्रिके मार्गशीर्षपौषमाघात्मनि दशभिः प्रतिलेखनाकालः, तथाऽष्टभिश्चतुर्थे प्राग्वत्रिके फाल्गुन|चैत्रवैशाखखरूपे प्रतिलेखनाकालः, स्थापना चेयम्
ज्येष्ठे पदे २-३।६ भावपदे पदे २-८ मार्गशीर्षे पदानि ३-८ फागुने पदानि ३-४ अल. २-० अकुल.43-8. भल०१022-६ अङ्गुल०८-४ आषादे पदे २ अश्विने पदानि ३ पौषे पदानि ४ ।
चैत्रे पदानि ३ अबुल.८३-८
अगुल०१०-४-10 अङ्गुका ८-३-८ श्रावण पदे २-४ कार्तिके पदानि ३-४ माघे पदानि ३-४ वैशाखे पदे २-८
अकुल ६२-१० अङ्गल -४ अगुल १०-41 अङ्गुल०८३-४ इति सूत्रार्थः । इत्थं दिनकृत्यमभिघाय रात्रौ यद्विधेयं तदाह
रतिपि चउरो भाए, भिक्खू कुज्जा वियक्खणो। तओ उत्तरगुणे कुज्जा राईभो(भा)गेसु चउसुवि॥१७॥ पढम पोरिसि सज्झायं वीर्य झाणं झियाई । तझ्याए निद्दमुक्खं तु चउत्थी भुजोचि सज्झायं ॥१८॥ सूत्रद्वयं स्पष्टमेव, नवरं रात्रिमपि न केवलं दिनमित्यपिशब्दार्थः । द्वितीयां पौरुषी 'ध्यायति ध्यानं' सूक्ष्मसूत्रालक्षणं क्षितिवलयद्वीपसागरभवनादि वा 'झियाए त्ति 'ध्यायेत्' चिन्तयेत् , तृतीयायां निद्राया मोक्षः-पूर्वनि
दीप अनुक्रम [१०२२]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||१७-१८|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत सूत्रांक
OCAPSARGAON
-१८||
ताहे संधारभूमि पमज्वति, ताहे संथारयं अच्छुरंति सउत्तरपट्टयं, तत्थ (य) लग्गा मुहपोत्तियाए उवरिमं कार्य पमजंतित्ति हिटिल रयहरणेणं, कप्पे य वामपासे ठवेंति, पुणो संधारयं चडेता भणंति-जेडजाईण पुरओ चिटुंताणं-अणुजाणेजह, पुणो सामाईयं तिन्नि चारे कहिऊण सुयंति त्ति । सुप्तानां चायं विधिः-"अणुजाणह संथारं बाहुबहाणेण वामपासेणं । पायपसारणि कुकडि अतरंतो पमजए भूमि ॥१॥ संकोए संडासं उच्चत्तंती य कायपडिलेहा । दवादीउवओगं उस्सासनिरंभणालोयं ॥२॥ इति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रति रात्रिभागचतुष्टयपरिज्ञानोपायमुपदर्शयन् समस्तयतिकृत्यमाह
जं नेइ जया रति नक्षत्तं तंमि नहचउभाए । संपत्ते विरमिज्जा सज्झाय पओसकालंमि ॥१९॥ तम्मेव य नक्खत्ते गयणं चउभागसाबसेसंमि । धेरत्तियपि कालं पडिलेहित्ता मुणी कुजा ॥ २०॥ यत् 'नयति' प्रापयति परिसमाप्तिमिति गम्यते यदा रात्रि नक्षत्रं तस्मिन्नभश्चतुर्भागे संप्राप्ते 'विरमेत्' निवर्त्तत सझाय'त्ति खाध्यायात, 'प्रदोषकाले' रजनीमुखसमये प्रारब्धादिति शेषः, तस्मिन्नेव नक्षत्रे प्रक्रमात्प्रासे, के-III त्याह-'गगण'त्ति गगने, कीरशि-चतुर्भागेन गम्येन सावशेष-सोद्धरितं चतुर्भागसावशेष तस्मिन् 'वैरात्रिक'
१ अनुजानीत संस्तारकं बाहूपधानेन वामपार्चेण । पादप्रसारणं कुर्कुटी(वत) अशजवन प्रमार्जयेत् भूमिम् ॥ १ ॥ संकोचे संदंशदोकान (प्रमार्जयेत् ) सार्त्तने च कायप्रतिलेखना । द्रब्याापयोग (जागरणे कुर्यात् ) एकवासनिरोधमालोकं ॥२॥
दीप अनुक्रम [१०२३-] -१०२४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||१९-२०|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत
सूत्रांक ||१९-२०||
उत्तराध्या तृतीयम् , अपिशब्दान्निजनिजसमये प्रादोषिकादिकं च कालं 'पडिलेहित्तति प्रत्युपेक्ष्य प्रतिजागर्य मुनिः 'कुर्यात्, सामाचाकरोतेः सर्वधात्वर्थत्वाद् गृह्णीयात् , इह च काकोपलक्षणद्वारेण प्रथमादिषु नभश्चतुर्थभागेषु संप्राप्ते नेतरि नक्षत्रे
र्यध्ययनं. रात्रेः प्रथमादयः प्रहरा इत्युक्तं भवतीति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थं सामान्येन दिनरजनिकृत्यमुपदर्य पुनर्षिशेषतस्तदेव, ॥५३९॥ दर्शयंस्तावदिनकृत्यमाह
२६ पुब्विलंमि चउभागे, पडिले हित्ता ण भंडयं । गुरुं वंदित्तु समायं, कुजा दुक्खविमुक्खणिं ॥२१॥ पोरिसीए चउभाए, वंदित्ता ण तओ गुरूं। अपडिकमित्तु कालस्स, भायणं पडिलेहिए ॥ २२॥ मुहपत्ति | पडिलेहित्ता, पडिलेहिज गुच्छयं । गुच्छगलइयंगुलिओ, वत्थाई पडिलेहए ॥ २३ ॥ उहूं थिरं अतुरियं पुब्धि ता वत्थमेव पडिलेहे । तो बिइयं पप्फोडे तइयं च पुणो पमजिज्जा ॥ २४ ॥ अणचावियं अबलियं अणाणुबंधि अमोसलिं चेव । छप्पुरिमा नव खोडा पाणीपाणिविसोहणं ॥२५॥ आरभडा सम्मदा बजेपब्बा य मोसली तइया । पकोडणा चउत्थी विक्खित्ता वेइया छट्ठा ॥ २६॥ पसिढिलपलंबलोला एगामोसा अणेगरूवधुणा । कुणति पमाणि पमायं संकिय गणणोवगं कुज्जा ॥२७॥ अणुणाइरित्तपडिलेहा अविवचासा||५३९॥
तहेव य । पढमं पयं पसत्थं सेसाणि उ अप्पसत्याणि ॥ २८ ॥ पडिलेहणं कुणतो मिहो कहं कुणइ जणव-: देयकहं वा । देह व पचक्खाणं वाएह सयं पडिच्छइ वा ॥२९॥ पुढवी आउकाए तेऊ वाऊ वणस्सइ तसाणं ।
दीप अनुक्रम [१०२५-] -१०२६]
E-RESIC
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत सूत्रांक
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-३७||
पडिलेहणापमत्सो छण्हपि विराहओ होइ ॥ ३० ॥ तइयाए पोरिसीए, भत्तं पाणं गवेसए । छहं अण्णयपारागंमि, कारणमि समुट्टिए ॥ ३१॥ वेयणवेयावच्चे इरियडाए य संजमट्ठाए । तह पाणवत्तियाए छ8 पुण|3
धम्मचिंताए ॥ ३२ ॥ निग्गंथो धिइमंतो निग्गंधीवि न करिज छहि चेव । ठाणेहिं तु इमेहिं अणइक्कमणा य से होइ ॥ ३३ ॥ आर्यके उवसग्गे तितिक्खया बंभचेरगुत्तीसुं । पाणिदयातवहेउ सरीरबुच्छेयणढाए ॥३४॥ अवसेसं भंडगं गिज्झा, चक्खुसा पडिलेहए । परमद्धजोअणाओ, विहार विहरे मुणी ॥ ३५॥ चउत्थीए पोरिसीए निक्खिवित्ता ण भायणं । सज्झायं च तओ कुजा, सव्वभावविभावणं ॥ ३६॥ पोरिसीए चउभाए, वंदित्ता ण तओ गुरूं । पडिकमित्ता कालस्स, सिजं तु पडिलेहए ॥३७॥ पासवणुच्चारभूमि च, पडिलेहिज जयं जई। | पुविल्लेत्यादिसूत्राणि सप्तदश सार्द्धानि, तत्र सूत्रद्वयं व्याख्यातप्रायमेव, नवरं 'पूर्वस्मिंश्चतुर्भागे प्रथमपौ|रुषीलक्षणे प्रक्रमाद् दिनस्य प्रत्युपेक्ष्य 'भाण्डकं प्राग्वद्वर्षाकल्पादि उपधिमादित्योदयसमय इति शेषः, द्वितीयसूत्रे च पौरुष्याश्चतुर्थभागेऽवशिष्यमाण इति गम्यते, ततोऽयमर्थः-पादोनपौरुष्यां भाजनं प्रतिलेखयेदिति सम्बन्धः, खाध्यायादुपरतश्चेकालस्य प्रतिक्रम्यैव कृत्यान्तरमारब्धयमित्याशङ्कयेतात आह-अप्रतिक्रम्य कालस्य, तत्प्रतिक्रमार्थ कायोत्सर्गमविधाय, चतुर्थपौरुष्यामपि खाध्यायस्य विधास्थमानत्वात् । प्रतिलेखनाविधिमेवाह
दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
उत्तराध्य.
सामाचा
प्रत
बृहद्वृत्तिः
येध्ययन
सूत्रांक
॥५४॥
||२१-३७||
मुखपत्रिका' प्रतीतामेव 'प्रतिलेख्य' प्रतिलेखयेत् 'गोच्छक' पात्रकोपरिव[पकरणं, ततश्च 'गोच्छगलइअंगुलिउति प्राकृतत्वादलिभिर्लातो-गृहीतो गोच्छको येन सोऽयमङ्गुलिलातगोच्छकः 'वस्त्राणि' पटलकरूपाणि 'प्रतिलेखयेत्' प्रस्तावात्प्रमार्जयेदित्यर्थः । इत्थं तथाऽवस्थितान्येव पटलानि गोच्छकेन प्रमृज्य पुनर्यकुर्यात्तदाह-'ऊर्च' कायतो वस्त्रतश्च, तत्र कायत उत्कुटुकत्वेन स्थितत्वात् , वस्त्रतश्च तिर्यक्प्रसारितयत्रत्वात् , उक्तं हि-'उकुडुतो तिरियं पेहे जह विलित्तो' 'स्थिरं' दृढग्रहणेन 'अत्वरितम्' अद्भुतं सिमितं यथाभवत्येवं पूर्व प्रथम 'ता' इति तावद 'वस्त्रं' पटलकरूपं, जातायेकवचनं, पटलकप्रक्रमेऽपि सामान्यवाचकवस्त्रशब्दाभिधानं वर्षाकल्पादिप्रत्युपेक्षणायामप्ययमेव विधिरिति ख्यापनार्थम् , एक्शब्दो भिन्नक्रमस्ततः 'पडिलेहि'त्ति 'प्रत्युपेक्षेतैव' आरतः परतश्च निरीक्षेतैव न तु प्रस्फोटयेत् , अथवा विन्दुलोपाद् 'एवम्' अमुना ऊर्ध्वादिप्रकारेण प्रत्युपेक्षेत न त्वन्यथेति भावः, तत्र च यदि जन्तून् पश्यति ततो यतनयाऽन्यत्र सङ्गमयति, तददर्शने च 'तो' इति 'ततः' प्रत्युपेक्षणादनन्तरं द्वितीयमिदं कुर्यात् यदुत परिशुद्धं सत् प्रस्फोटयेत्-तत्प्रस्फोटनां कुर्यादित्यर्थः, तृतीयं च पुनरिदं कुर्यात्-यदुत प्रमृज्यात् , कोऽर्थः-प्रत्युपेक्ष्य || प्रस्फोय्य च हस्तगतान् प्राणिनः प्रमृज्यादित्यर्थः, कथं पुनः प्रस्फोटयेत्प्रमृज्याद्वेत्याह-'अनर्तितं' प्रस्फोटनं प्रमा१ उत्कटुकस्तिर्यकू प्रेक्षेत यथा विलिप्तः
दीप
॥५४०॥
अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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C3C0
||२१
-३७||
-2564397-%
जनं वा कुर्वतो वखं वपुर्वा यथा नर्तितं न भवति 'अवलितं यथाऽऽत्मनो वखस्य च वलितमिति मोटनं न भवति 'अणाणुबंधिन्ति 'अननुबन्धि' अनुबन्धेन-नैरन्तर्यलक्षणेन युक्तमनुबन्धि न तथा, कोऽर्थः १-अलक्ष्यमाणविभाग यथा न भवति, 'आमोसलिन्ति सूत्रत्वादामर्शवत्तिर्यगूलमधो या कुड्यादिपरामर्शवद्यथा न भवति, उक्तं हि"तिरिउहहघट्टणाऽऽमुसलि"ति, तथा किमित्याह-'छप्पुरिमत्ति षट्र पूर्वाः पूर्व क्रियमाणतया तिर्यकृतवस्त्रप्रस्फोटनात्मका क्रियाविशेषा येषु ते पहपूर्वाः, 'नवखोड'त्ति खोटकाः समयप्रसिद्धाः स्फोटचात्मकाः कर्तव्या इति शेषः 'पाणी' पाणितले 'प्राणिनां' कुन्थ्वादिसत्त्वानां विशोधनं पाठान्तरतश्च-'प्रमार्जनं' प्रस्फोटनं त्रिकत्रिकोत्तरकालं त्रिकत्रिकसङ्ख्यं पाणिप्राणिविशोधनं पाणिप्राणिप्रमार्जनं वा कर्तव्यं । प्रतिलेखनादोषपरिहारार्थमाहआरभटा विपरीतकरणमुच्यते त्वरितं वाऽन्यान्यवस्खग्रहणेनासौ भवति, उक्तं हि-"वितहकरणमारभडा तुरियं वा अन्नमनगहणेणं" संमर्दनं समर्दा रूढित्वात्स्त्रीलिङ्गता वस्त्रान्तःकोणसंचलनमुपधेर्वा उपरि निषदनम् , उक्तश्च"अंतो व होज कोणा णिसियण तत्थेव सम्महा" वर्जयितव्येति सर्वत्र संबध्यते, 'चः' पूरणे 'मोसलितिर तिर्यगूर्ध्वमधो वा घट्टना तृतीया, 'प्रस्फोटना' प्रकर्षण रेणुगुण्डितस्येव वस्त्रस्य झाटना चतुर्थी, विक्षेपणं विक्षिसा
१ तिर्यगूलमधी घटनाऽमोसलिरिति २ वितयकरणं आरभटा त्वरितं था अन्याऽन्यग्रहणेन ३ अन्तर्वा भवेयुः कोणा निषीदनं तत्रैव संमर्दा
दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
प्रत
बृहदृत्तिः
सूत्रांक ||२१
उत्तराध्यापञ्चमीति गम्यते, रूढित्वाच स्त्रीलिङ्गता, उक्तं हि 'लिङ्गमशिष्यं लोकाश्रयत्वात्', सा च प्रत्युपेक्षितवस्त्रस्यान्य- सामाचात्राप्रत्युपेक्षिते क्षेपणं, प्रत्युपेक्षमाणो वा वस्त्राञ्चलं यदूर्व क्षिपति, वेदिका 'छट्टत्ति षष्ठी, अत्र सम्प्रदायः
यध्ययन. "वेतिया पंचविहा पन्नत्ता, तंजहा-उहवेतिया अहोवेतिया तिरियवेतिया दुहतोवेतिया एगतोवेतिया' तत्व ॥५४॥ उड्डवेतिया उचरि जुषणगाणं हत्थे काऊण पडिलेहेइ, अहोवेइया अहो जुण्णगाणं हत्थे काऊण पडिलेहेइ, तिरि
यवेड्या संडासयाण मज्झेण हत्थेण चित्तूण पडिलेहेइ, दुहतोबेइया वाहाणं अंतरे दोवि जुण्णगा काऊण पडि-13 लेहेति, एगतो वेश्या एगं जुण्णगं वाहाणमंतरे काउण पडिलेहेति ।" एवमेते पडू दोषाः प्रतिलेखनायां परि-18 हर्त्तव्याः। तथा प्रशिथिलं नाम दोषो यददृढमनिरायन्तं वा वस्खं गृह्यते, प्रलम्बो-यद्विषमग्रहणेन प्रत्युपेक्ष्यमाणवस्त्रकोणानां लम्बनं लोलो-यद्भूमौ करे वा प्रत्युपेक्ष्यमाणवस्त्रस्य लोलनममीषां द्वन्द्वः, एकामर्शनं एकामर्शा प्राग्वत् स्त्रीलिङ्गता, मध्ये गृहीत्वा ग्रहणदेशं यावदुभयतो वस्त्रस्य यदेककालं संघर्षणमाकर्षणम् , उक्तश्च"पसिंढिलमघणं
वेदिकाः पञ्चविधाः प्रज्ञप्ताः,तद्यथा ऊर्ध्ववेदिका अधोवेदिका तिर्यग्वेदिका द्विधातो वेदिका एकतो वेदिका, तत्रो+वेदिका उपरि जानु-13 नोहस्तौ कृत्वा प्रतिलेखयति, अधोवेदिका अधो जान्बोईसौ कृत्वा प्रतिलेखयति, तिर्यवेदिका संदंशकयोर्मध्ये हस्तेन गृहीत्वा प्रतिलेख- ॥५४२|| यति, द्विधातो बेदिका बाहोरन्तरे द्वे अपि जानुनी कृत्वा प्रतिलेखयति एकतो वेदिका एक जानु बाह्योरन्तरे कृत्वा प्रतिलेखयति २ प्रशिथिलमपनं अनिरायन्तं च (प्रलम्बम् ) विषममहणं कोणानां । भूमौ करे वा लोलनं आकर्षमहणमेकामर्शा ॥१॥
55- ॐन्नर
-३७||
दीप
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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||२१
-३७||
अणिराइयं च विसमगहणं च कोणे वा। भूमीकरलोलणयाऽऽकहणगणेगआमोसा ॥१॥" 'अणेगरूवधुणे'त्ति अनेकरूपा चासौ सङ्खयात्रयातिक्रमणतो युगपदनेकवस्त्रग्रहणतो का धूनना च प्रकम्पनात्मिका अनेकरूपधूनना, पठ्यते च-'अणेगरूवधूयत्ति तत्र च धुतं-कम्पनमन्यत्प्राग्वत् ,तथा यत्करोति प्रमाणे-प्रस्फोटादिसञ्जयालक्षणे प्रमा| दम्-अनवधानं यच शङ्किते-प्रमादतः प्रमाणे प्रति शङ्कोत्पत्तौ गणनां कराङ्गुलिरेखास्पर्शनादिनैकद्वित्रिसङ्गयात्मि|कामुपगच्छति-उपयाति गणनोपगं यथाभवत्येवं गम्यमानत्वात्प्रस्फोटनादि कुर्यात् , सम्भावने लिट्, सोऽपि दोषः, सर्वत्र पूर्वसूत्रादनुवर्त्य वर्जनक्रिया योजनीया, उक्तञ्च-"धुणेणा तिण्ह परेणं बहूणि वा घेत्तु एकओ धुणति। खोडणपमजणासु य संकिय गणणे करे पमादी॥१॥" एवं चानन्तरोक्तदोपरन्विता सदोषा प्रत्युपेक्षणा, चियुक्ताही तु निर्दोषेत्यर्थत उक्तम् । साम्प्रतं त्वेनामेव भङ्गकनिदर्शनद्वारेण साक्षात्सदोषां निर्दोषां च किश्चिद्विशेषतो वक्तुमाह'अणूणाइरित्त'त्ति ऊना चासावतिरिक्ता ऊनातिरिक्ता न तथा अनूनातिरिक्ता प्रतिलेखा,इह च न्यूनताधिक्ये स्फोट-13 नाप्रमार्जने वेलां चाश्रित्य वाच्ये, यत उक्तम्-"खोडणपमजवेलासु चेव ऊणाहिया मुणेयवा" 'अविवच्चासत्ति |विविधो व्यत्यासो-विपर्यासो यस्यां सा विव्यत्यासा न तथा अविव्यत्यासा-पुरुषोपधिविपर्यासरहिता कर्त्तव्येति
१ धूनना तिसृभ्यः परतो वहूनि वा गृहीत्वैकतो धुनाति । स्फोटनप्रमार्जनासु च शङ्कित गणनां कुर्यात्प्रमादी ॥ १॥ २ स्फोटनाप्रमार्जनावेलासु चैवोनाधिका मुणितव्या ।
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||२१
-३७||
दीप
अनुक्रम
[१०२७-]
-१०४३]
उत्तराध्य.
वृहद्वृत्तिः
॥५४२॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२१-३७|| निर्युक्ति: [४८६...]
अध्ययनं [२६],
IIS SIS
शेषः, अत्र च त्रिभिर्विशेषणपदैरष्टौ भङ्गाः सूचिता भवन्ति, स्थापना चेयम् ॥ ७॥ एतेषु च कः शुद्धः को वा शुद्धः इत्याह-'प्रथमपदम्' इहैवोपदर्शिताद्यभङ्गरूपं 'प्रशस्तं' निर्दोषतया छाप्यं डt SSI शुद्धमितियावत्, शेषाणि तु प्रक्रमात्पदानि द्वितीयादिभङ्गात्मकान्यप्रशस्तानि तेषु न्यूनताद्यन्यतमदो sssss पसम्भवात्, ततः प्रथमभङ्गानुपातिन्येव प्रतिलेखना विधेयेत्युक्तं भवति । एवंविधामध्येनां कुर्वता यत्परिहर्त्तव्यं तत् काकोपदेष्टुमाह-प्रतिलेखनां कुर्वन् 'मिथःकथा' परस्परसंभाषणात्मिकां करोति, जनपदकथां वा, ख्यादिकथोपलक्षणमेतत् ददाति वा प्रत्याख्यानमन्यस्मै, वाचयति - अपरं पाठयति, स्वयं प्रतीच्छति या आलापादिकं गृह्णाति, य इति गम्यते, स किमित्याह, 'पुढवी'ति स्पष्टं, नवरं 'पुढवी आउकाय'त्ति पृथिव्यप्काययोः 'प्रतिलेखनाप्रमत्तो' मिथः कथादिना तत्रानवहितः सन् पण्णामपि, आस्तामेवैकादीनामित्यपिशब्दार्थः, विराधकश्चैवं प्रमत्तो हि कुम्भकारशालादौ स्थितो जलभृतघटादिकमपि प्रलोठयेत्, ततस्तज्जलेन मृदग्निबीजकुन्थ्वादयः प्लाव्यन्ते, प्लावनातश्च विराध्यन्ते, यत्र चाग्निस्तत्रावश्यं वायुरिति पण्णामपि द्रव्यतो विराधकत्वं, भावतस्तु प्रमत्ततयाऽन्यथाऽपि विराधकत्वमेव, उक्तं हि"ईय दवओ उ छण्हं विराहतो भावतो इहरहावि । उवउत्तो पुण साहू संपत्तीए वडवहओ उ ॥ १ ॥” तदनेन १ एवं द्रव्यतः षण्णां विराधको भावत इतरथाऽपि । उपयुक्तः पुनः साधुः संपत्तावप्यवधक एव ॥ १ ॥
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र्यध्ययनं.
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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जीवरक्षार्थत्वात्प्रतिलेखनायास्तत्काले च प्रमादजनकत्वेन हिंसाहेतुत्वान्मिथः कथादीनां परिहार्यत्वमुक्तम् । इत्थं प्रथमपौरुषीकृत्यमुक्तं, तदनन्तरं द्वितीयपौरुषीकृत्याभिधानावसरः,तच "बीए झाणं झियायई" इति वचनेन ध्यानमुक्तम् ,उभयं चैतदवश्यकर्त्तव्यमतस्तृतीयपौरुषीकृत्यमप्येवमुत कारण एवोत्पन्ने ? इत्याशङ्कयाह-'तइए'इत्यादि सुगम, नवरमौत्सर्गिकमेतत् , अन्यथा हि स्थविरकल्पिकानां यथाकालमेव भक्तादिगवेषण, तथा चाह-'सइकाले चरे भिक्खू'ति, पण्णां कारणानाम् 'अन्नयरायमि'त्ति अन्यतरस्मिन् कारणे 'समुत्थिते' संजाते, न तु कारणोत्पत्ति विनेति भावः, भोजनोपलक्षणं चेह भक्तपानगवेषणं, गुरुग्लानाद्यर्थमन्यथाऽपि तस्य सम्भवात्, तथा चान्यत्र भोजन एवैतानि कारणान्युक्तानि, तान्येव षट् कारणान्याह-'वेयण वेयावचे ति,सुव्यत्ययाद् वेदनाशब्दस्य चोपलक्ष-2 णत्वात्क्षुत्पिपासाजनितवेदनोपशमनाय,तथा क्षुत्पिपासाभ्यां(परिगतो)न गुर्वादिवयावृत्त्यकरणक्षम इति वैयावृत्त्याय, तथा 'ईय'ति ईर्यासमितिः सैव निर्जरार्थिभिरर्यमानतयाऽर्थस्तस्मै, 'चः' समुच्चये, कथं नामासौ भवत्विति , इतरथा हि क्षुत्पिपासाभ्यां पीडितस्य चक्षुामपश्यतः कथमिवासी स्वादिति ?, तथा संयमार्थाय कथं नामासौ पालयितुं शक्यतामिति ?,आकुलितस्य हिताभ्यां सचित्ताहारे तद्विधात एव स्यात् ,तथा 'पाणवत्तियाए'त्ति प्राणप्रत्ययं
१ स्मृतिकाले चरेद् भिक्षुः.४ प्रयोजनोप०
दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
A%A%ARSANA
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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उत्तराध्य. जीवितनिमित्तम्, अविधिना खात्मनोऽपि प्राणोपक्रमणे हिंसा स्थान , अत एवोक्तम्-"भावियजिणवयणाणं ममत्त-12 सामाचा
रहियाण नस्थि हविसेसो । अप्पाणमि परंमि य तो बजे पीडमुभओऽवि ॥१॥" षष्ठं पुनरिदं कारणम्-यदुत ध-IX बृहद्वृत्तिः
चिन्तायै च, भक्तपानं गवेषयेदिति सर्वत्रानुवर्तते, अत्र च धर्मचिन्ता-धर्मध्यानचिन्ता श्रुतधर्मचिन्ता था,इयं बुभ॥५४॥ 18| यरूपाऽपि तदाकुलितचेतसो न स्यात् ,आर्तध्यानसम्भवात् ,इह च यद्यपि वेदनोपशमनादीनां शाच्या वृत्त्या तदुपल
|क्षितभोजनफलत्वेन प्रतीतिस्तथाऽपि तैर्विना तनिषेधसूचनादा• वृत्त्या कारणत्वमेवैषामुपदर्शितं भवति, अत एच षष्ठमित्यत्र कारणमेव सम्बन्धितम्, आह-एतत्कारणोत्पत्तौ किमवश्यं भक्तपानगवेषणं कर्त्तव्यमुतान्यथेत्याह'निग्रन्थः' यतिः धृतिमान् धर्मचरणं प्रति 'निर्ग्रन्था' तपखिनी साऽपि न कुर्याद्भक्तपानगवेषणमिति प्रक्रमः, षडिश्चैव स्थानः 'तुः पुनरर्थे 'एभिः' अनन्तरं वक्ष्यमाणैः, किमित्येवमत आह-'अणइक्कमणाइ'त्ति सूत्रत्वाद् 'अनतिक्रमण |संयमयोगानामनुलचनं, चशब्दो यस्मादर्थे, यस्मात् 'से'त्ति तस्य निर्ग्रन्थस्य तस्या वा निम्रन्थत्तायाः (न्थ्याः) 'भवति जायते,अन्यथा तदतिक्रमणसम्भवात्। पद स्थानान्येवाह-आतङ्को-ज्वरादिरोगस्तस्मिन् , 'उपसर्ग'मिति खजनादिः कश्चिदुपसर्गमुन्निष्क्रमणार्थ करोति, विमर्शादिहेतोर्वा देवादिः, ततस्तस्मिन् सति, उभयत्र तन्निवारणार्थमिति गम्यते, ॥५४३॥ |तथा तितिक्षा-सहनं तया हेतुभूतया, क विषये इत्याह-ब्रह्मचर्यगुप्तिषु, ता हि नान्यथा सोढुं शक्याः , तथा
१ भावितजिनवचनामां ममतारहितानां नास्त्येव विशेषः । आत्मनि परस्मिंश्च ततो वर्जयेत्पीडामुभयोरपि ॥१॥
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दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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पाणिदयातवहे'ति 'प्राणिदयाहेतोः' वर्षादौ निपतत्यप्कायादिजीवरक्षायै तपः-चतुर्थादिरूपं तद्धेतोच, तथा शरीरस्य व्यवच्छेदः-परिहारस्तदर्धं च उचितकाले संलेखनामनशनं वा कुर्वन् , भक्तपानगवेषणं न कुर्यादिति सर्वत्र योज्यं, कारणत्वभावना चामीषां प्राग्वत्, तद्गवेषणां च कुर्वन् केन विधिना कियत्क्षेत्र पर्यटेदित्याह-अवशेष' भिक्षाप्रक्रमात्पानियोगोद्धरितं, चशब्दस्य गम्यमानत्वादवशेष च पात्रनिर्योगमेव, यद्वाऽपगतं शेषमपशेष, कोऽर्थः-समस्तं, 'भाण्डकम्' उपकरणं 'गिज्झत्ति गृहीत्वा चक्षुषा प्रत्युपेक्षेत, उपलक्षणत्वात्प्रतिलेखयेच, इह च विशेषत इति गम्यते, सामान्यतो प्रत्युपेक्षितस्य ग्रहणमपि न युज्यत एव यतीनाम् , उपलक्षणत्वाचास तदाजादाय 'परम्' उत्कृष्टम् 'अर्धयोजनात्' अर्धयोजनमाश्रित्य, ल्यच्लोपे पञ्चमी, परतो हि क्षेत्रातीतमशनादि भवेत् , विहरन्त्यस्मिन् प्रदेश इति विहारस्तं 'विहरए'त्ति विहरेत-विचरेन्मुनिः । इत्थं वित्योपाश्रयं चागत्य गुर्वालोचनादिपुरस्सरं भोजनादि कृत्वा यत्कुर्यात्तदाह-चतुर्थ्यां पौरुष्यां निक्षिप्य प्रत्युपेक्षणापूर्वकं बवा 'भाजनं' पात्रं खाध्यायं ततः कुर्यात् सर्वभावा-जीवादयस्तेषां विभावनं (क)-प्रकाशकं सर्वभावविभावक, पठ्यते च-'सबदुक्खविमोक्खणं'ति प्राग्वत् , पौरुष्याः प्रक्रमाचतुर्थ्याः चतुर्भागे-चतुर्थाशे शेष इति गम्यते, वन्दित्वा 'ततः' इति | खाध्यायकरणादनन्तरं 'गुरुम्' आचार्यादि प्रतिक्रम्य कालस्य 'शय्यां' वसतिं 'तुः' पूरणे प्रतिलेखयेत् , ततश्च 'पासवणुचारभूमि चत्ति, भूमिशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धात् प्रश्रवणभूमि उच्चारभूमि च प्रत्येकं द्वादशस्थण्डिलात्मिका
दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२६], मूलं [-] / गाथा ||२१-३७|| नियुक्ति: [४८६...]
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सूत्रांक ||२१
-३७||
उत्तराध्य. चशब्दात्कालभूमिं च स्थण्डिलत्रयात्मिकां प्रतिलेखयेत् 'जय'ति 'यतम्' आरम्भादुपरतं यथा भवति यतमानों वा सामाचा
यतिः, एवं च सप्तविंशतिस्थण्डिलप्रत्युपेक्षणानन्तरमादित्योऽस्तमेति, तथा चोक्तम्-"चउभागावसेसाए चरिमाए बृहद्वृत्तिः
यध्ययनं. पडिकमित्तु कालस्स । उच्चारे पासवणे थंडिलचउवीसई पेहे ॥१॥ अहियासिया उ अंतो आसन्ने मज्झि दूरि तिन्नि ॥५४४॥ तिन्नि भवे। तिण्णेव अणहियासी अंतो छच्छच्च बाहिरतो॥२॥ एमेव य पासवणे वारस चउवीसई तु पेहेत्ता। कालस्स
य तिन्नि भवे अह सूरो अस्थमुवयाइ ॥३॥” इति सार्द्धसप्तदशसूत्रार्थः । इत्थं विशेषतो दिनकृत्यमभिधाय सम्प्रति तथैव रात्रिकर्त्तव्यमाह
काउस्सर्ग तओ कुज्जा, सव्वदुक्खविमुक्खणं ॥३८॥ देसियं च अईयारं, चिंतिज अणुपुब्वसो । नाणमि दसणे चेव, चरितंमि तहेव य ॥ ३९ ॥ पारियकाउस्सग्गो, वंदित्ता य तओ गुरूं। देसियं तु अईयारं,
आलोइज जहकमं ॥४०॥ पडिकमित्ताण निस्सल्लो, वंदित्ताण तओ गुरूं। काउस्सग्गं तओ कुजा, सम्बदुदिक्खविमुक्खणं ॥४१॥ सिद्धाणं संधवं किचा, वंदित्ताण तओ गुरूं। धुइमंगलं च काऊणं, कालं संपडि-II
१ चतुर्भागावशेषायां घरमायां प्रतिक्रम्य कालस्य । उचारस्य प्रश्रवणस्य स्थण्डिलानि चतुर्विशिति प्रेक्षेत ॥ १॥ अध्यासनीयानि तुर अन्तरासन्ने मध्ये दूरे श्रीणि त्रीणि भवेयुः। त्रीण्येव अनध्यासनीयानि अन्तः पद् पट् च बाह्यतः ॥२।। एवमेव च प्रश्रवणे द्वादश चतुर्विशति | तु प्रेक्ष्य । कालस्य च त्रीणि भवेयुरथ सूर्योऽस्तमुपयाति ॥ ३ ॥
दीप अनुक्रम [१०२७-] -१०४३]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
॥३८
-५१॥
दीप
अनुक्रम [१०४४-]
-१०५७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२६], मूलं [--] / गाथा ||३८-५१ || निर्युक्ति: [४८६...]
| लेहए ॥ ४२ ॥ पढमं पोरिसिं सज्झायं, बीयं झाणं झियायई । तईयाए निदमुक्खं तु चत्थी भुजोवि सज्झायं ॥ ४३ ॥ पोरिसीए चउत्थीए, कालं तु पडिलेहए। सज्झायं तु तओ कुना, अबोहंतो असंजए ॥ ४४ ॥ पोरिसीए चउभाए, वंदिताण ततो गुरुं । पडिकभित्तु कालस्स, कालं तु पडिलेहए ॥ ४५ ॥ आगए कायवसग्गे, सब्वदुक्ख विमुक्खणे । काउस्सग्गं तओ कुज्जा, सम्बदुक्खविमुक्खणं ॥ ४६ ॥ राईयं च अईयारं, चिंतिज अणुपुत्रवसो । नाणंमि दंसणंमि, चरित्तंमि तवंमि य ॥ ४७ ॥ पारिपकाउस्सग्गो, बंदिताण तओ गुरुं । राईयं तु अईयारं, आलोइज जहकर्म ॥४८॥ पडिकमित निस्सल्लो, वंदित्ता ण तओ गुरुं । काउरसग्गं तओ कुज्जा, सब्वदुक्खविमुक्खणं ॥ ४९ ॥ किं तवं पडिवज्जामि ?, एवं तत्थ विचितए । काउस्सग्गं तु पारिता, करिजा जिणसंधवं ॥ ५० ॥ पारियकाउस्सग्गो, वंदिताण तओ गुरुं । तवं संपडिवजित्ता, करिज सिद्धाण संघवं ॥ ५१ ॥
कागमित्यादि सार्द्धानि त्रयोदश सूत्राणि । कायोत्सर्ग 'ततः' प्रश्रवणादिभूमिप्रतिलेखनादनन्तरं कुर्यात्सवैदुःखविमोक्षणं, तथात्वं चास्य कर्मापचयहेतुत्वात् उक्तं हि - 'काउस्सग्गे जह सुट्टियस्स भजंति अंगमंगाई तह मिंदंति सुविहिआ अट्टविहं कम्मसंघायं ॥ १ ॥ "ति तत्र च स्थितो यत्कुर्यात्तदाह – 'देसियं' ति प्राकृतत्वाद्वका१ कायोत्सर्गे यथा सुस्थितस्य भज्यन्तेऽङ्गोपाङ्गानि । तथा भिन्दन्ति सुविहिता अष्टविधं कर्मसङ्घातम् ॥ १॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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-५१॥
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-१०५७]
उत्तराध्य.
बृहद्वतिः
॥५४५॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा || ३८-५१ || निर्युक्ति: [४८६...]
अध्ययनं [२६],
रस्य लोपे देवसिकं 'घः' पूरणे 'अतिचारम्' अतिक्रमं 'चिन्तयेत्' ध्यायेत् 'अणुपुचसो ति आनुपूर्व्या - क्रमेण, प्रभातमुखव स्त्रिकाप्रत्युपेक्षणातो यावदयमेव कायोत्सर्गः उक्तं हि "गोस मुहणंतगाई आलोइय देसिए य अइयारे । सवे समाणयित्ता हियए दोसे टविज्जाह ॥ १ ॥" किंविपयमतीचारं चिन्तयेदित्याह - 'ज्ञाने' ज्ञानविषयमेवं दर्शने चैव चारित्रे तथैव च । पारितः समापितः कायोत्सर्गो येन स तथा वन्दित्वा प्रस्तावाद् द्वादशावर्त्तवन्दनेन 'तत' इत्यतीचारचिन्तनादनन्तरं 'गुरुम्' आचार्यादि 'देसियं'ति प्राग्वद् देवसिकं 'तुः' पूरणेऽतीचारम् 'आलोचयेत्' प्रकाशयेद् गुरुणामेव 'यथाक्रमम्' आलोचनसेवनान्यतरानुलोम्यक्रमानतिक्रमेण 'प्रतिक्रम्य' प्रतीपमपराधस्थानेभ्यो निवृत्य, प्रतिक्रमणं च मनसा भावशुद्धितो वाचा तत्सूत्रपाठतः कायेनोत्तमाङ्गनमनादितः, 'निःशल्यः' मायादिशल्यरहितः, सूचकत्वात्सूत्रस्य बन्दनकपूर्व क्षमयित्वा च वन्दित्वा द्वादशावर्त्तवन्दनेन 'ततः' इत्युक्तविधेरनन्तरं 'गुरुम्' आचार्यादिकं 'कायोत्सर्गे' चारित्रदर्शनश्रुतज्ञानशुद्धिनिमित्तन्युत्सर्गत्रयलक्षणं, जातावेकवचनं, 'ततः' गुरुषन्दनादनन्तरं कुर्यात्सर्वदुःखविमोक्षणम् । 'पारिये' त्यादि पूर्वार्द्ध व्याख्यातमेव, स्तुतिमङ्गलं च सिद्धस्तवरूपं कृत्वा पाठान्तरं वा- 'सिद्धाणं संथवं किच'त्ति सुगमं, 'कालम्' आगमप्रतीतं 'संपडिलेहए'त्ति संप्रत्युपेक्षते, कोऽर्थः १प्रतिजागर्त्ति, उपलक्षणत्वाद् गृहाति च एतद्गतश्च विधिरागमादवसेयः । 'पढम' मित्यादि प्राग्वद्, व्याख्यातमेव, १ प्राभातिकमुखवस्त्रिकादिप्रत्युपेक्षणाया आलोच्य दैयसिकांचातिचारान् । सर्वे संमान्य हृदये दोषान् स्थापयेत् ॥ १ ॥
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र्यध्ययनं. २६
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॥५४५५॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
||३८
-५१॥
दीप
अनुक्रम
[१०४४-]
-१०५७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [२६], मूलं [--] / गाथा ||३८-५१ || निर्युक्तिः [४८६...]
नवरं पुनरभिधानमस्य पुनः पुनरुपदेष्टव्यमेव गुरुभिर्न प्रयासो मन्तव्य इति ख्यापनार्थम् । कथं पुनश्चतुर्थपौरुष्यां स्वाध्यायं कुर्यादित्याह - पौरुण्यां चतुर्थ्यां 'काल' वैरात्रिकं 'तुः' पूरणे 'पडिलेहिय'त्ति प्रत्युपेक्ष्य - प्रतिजागर्य्यं प्राग्वद् गृहीत्वा च स्वाध्यायं ततः कुर्यात् 'अबोधयन्' अनुत्थापयन् 'असंयतान्' अगारिणः, तदुत्थापने तत्पापस्थानेषु तेषां प्रवर्त्तनसम्भवात् । पौरुष्याः प्रक्रमाच्चतुर्थ्याश्चतुर्भागेऽवशिष्यमाण इति शेषः, तत्र हि कालवेलायाः सम्भव | इति न कालस्य ग्रहणं, वन्दित्वा ततो गुरुं प्रतिक्रम्य 'कालस्य' वैरात्रिकस्य 'काल' प्राभातिकं, तुशब्दो वक्ष्यमाणविशेषद्योतकः, 'पडिलेहए' ति प्रत्युपेक्षेत प्राग्वद् गृह्णीयाच, इह च साक्षात्प्रत्युपेक्षणस्यैव पुनः पुनरभिधानं बहुतरविषयत्वात्, अत्र च सम्प्रदायः- “ताहे गुरू उट्ठित्ता गुणंति जाब चरिमो जामो पत्तो, चरिमे जामे सधे उद्वित्ता वेरत्तियं घेत्तुं सज्ज्ञायं करेंति, ताहे गुरु सुवंति, पत्ते पाभाइए काले जो पाभाइयकालं घेच्छति सो कालस्स पडि| कमिउं पाभाइयं कालं गिण्हद, सेसा कालवेलाए कालस्स पडिक्कर्मति, तओ आवस्तयं कुणंति " मध्यमप्रक्रमापेक्षं च कालत्रयग्रहणमुक्तम्, अन्यथा द्युत्सर्गत उत्कर्षेण चत्वारो जघन्येन त्रयः काला अपवादतश्चोत्कर्षेण द्वौ
१ तदा गुरव उत्थाय गुणयन्ति यावचरमो यामः प्राप्तः, चरमे यामे सर्वे उत्थाय वैरात्रिकं गृहीत्वा स्वाध्यायं कुर्वन्ति, तदा गुरवः स्वपन्ति प्राप्ते प्राभातिके काले यः प्राभातिककालं ग्रहीष्यति स कालस्य प्रतिक्रम्य प्राभातिकं काढं गृह्णाति, शेषाः कालवेलायां कालस्य प्रतिक्राम्यन्ति तत आवश्यकं कुर्वन्ति ।
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
॥३८
-५१॥
दीप
अनुक्रम
[१०४४-]
-१०५७]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
।।५४६॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा || ३८-५१ || निर्युक्ति: [४८६...]
अध्ययनं [२६],
जघन्येनकोऽप्यनुज्ञात एव, यत उक्तम्- "कालचकं उक्कोसएण जघण्णओ तिण्णि हुंति बोद्धवा । वीयपमि दुर्गं तु मायामयविप्पमुक्काणं ॥ १ ॥” अत्र च तुशब्दादेकस्याप्यनुज्ञा, तथा चूर्णिकार एव-"अमायाविणो तिष्णि वा अगेव्हंतस्स एको भवति" पठन्ति च 'पढमा पोरसि सज्झायं, बीए झाणं झियायति । ततियाए निदमोक्खं च, चउभाए चउत्थए ॥ १ ॥ कालं तु पडिलेहित्ता, अबोहिंतो असंजए । कुज्जा मुणीय सज्झायं, सबदुक्खविमोक्खणं ॥ २ ॥ पोरसीए चउभाए, सेसे वंदितु तो गुरुं । पडिकमित्तु कालस्स, कालं तु पडिलेहए ||३||" अत्रापि व्याख्या तथैव, पाठद्वयेऽपि चतुर्थप्रहरविशेषकृत्याभिधानप्रसङ्गेन पुनः प्रहरत्रयकृत्याभिधानमिति मन्तव्यम् । 'आगते' प्राप्ते 'कायभ्युत्सर्गे' इत्युपचारात् कायग्युत्सर्गसमये सर्वदुःखानां विमोक्षणमर्थात् कायोत्सर्गद्वारेण यस्मिन् स तथा तस्मिन् शेषं प्राग्वत्, यथेह सर्वदुःखविमोक्षणविशेषणं पुनः पुनरुच्यते तदस्यात्यन्तनिर्जरा हेतुत्वख्यापनार्थ, तथेह कायोत्सर्गग्रहणेन चारित्रदर्शनश्रुतज्ञान विशुद्ध्यर्थं कायोत्सर्गत्रयं गृह्यते, तत्र च तृतीये रात्रिकोऽतीचारश्चिन्त्यते, यत उक्तम्- "तत्थ पढमो चरित्ते, दंसणसुद्धीय बीयओ होइ । सुयणाणस्स य ततितो णवरं
१ काकं उत्कृष्टेन जघन्यतः त्रयो भवन्ति योद्धव्याः । द्वितीयपदे द्विकं तु मायामदविप्रमुक्तानाम् ॥ १ ॥ २ अमायाविनखीन् वा अगृह्नत एको भवति । ३ तत्र प्रथमधारित्रे दर्शनशुद्ध द्वितीयो भवति । श्रुतज्ञानस्य च तृतीयो नवरं चिन्तयति तत्रेदम् ॥ २ ॥ तृतीये निशातिचारान् ।
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र्यध्ययनं.
२६
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॥५४६॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||३८
-५१॥
दीप
अनुक्रम
[१०४४-]
-१०५७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा || ३८-५१ || निर्युक्ति: [४८६...]
अध्ययनं [२६],
चिंतेइ तत्थ इमं ॥ १ ॥ तइए निसाइयारं" ति रात्रिकोऽतिचारश्च यथा यद्विषयश्च चिन्तनीयस्तथाऽऽह-रात्रौ भवं रात्रिकं 'चः' पूरणे अती चारं चिन्तयेत् 'अणुपुवसो'त्ति आनुपूर्व्या क्रमेण ज्ञाने दर्शने चारित्रे तपसि चशब्दाद्वीर्ये च, शेषकायोत्सर्गेषु चतुर्विंशतिस्तवः प्रतीतश्चिन्त्यतया साधारणश्चेति नोक्तः । ततश्च पारितेत्यादिसूत्रद्वयं व्याख्यातमेव, कायोत्सर्गस्थितश्च किं कुर्यादित्याह - 'कि' मिति किंरूपं 'तपो' नमस्कारसहितादि प्रतिपद्येऽहम्, एवं तत्र विचिन्तयेत् वर्द्धमानो हि भगवान् षण्मासं यावन्निरशनो विहृतवान्, तत्किमहमपि निरशनः शक्नोम्ये| तावत्कालं स्थातुमुत नेति ?, एवं पञ्चमासाद्यपि यावन्नमस्कारसहितं तावत्परिभावयेद, उक्तं हि "चिंते चरमे उ | किं तवं काई ? | छम्मासामेकदिणादिहाणि जा पोरिसि नमो वा ॥ २ ॥” उत्तरार्द्ध स्पष्टम् एतदुक्तार्थानुवादतः सामाचारीशेषमाह-'पारिए'त्यादि प्राग्वत्, नवरं 'तपः' यथाशक्ति चिन्तितमुपवासादि 'संप्रतिपद्य' अङ्गीकृत्य कुर्यात् सिद्धानां 'संस्तर्व' स्तुतित्रयरूपं, तदनु च यत्र चैत्यानि सन्ति तत्र तद्वन्दनं विधेयं, तथा चाह भाष्यकारः"वंदितु निवेयंती कालं तो चेइयाइ यदि अस्थि । तो बंदती कालं जह य तुलेउं पडिकमणं ॥ १॥” इति सार्द्धत्रयोदशसूत्रार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरन्नाह
१ चिन्तयेत् चरमे तु किं तपः करिष्यामि ? | षण्मास्या एकदिनादिहानिः यावत् पौरुषी नमस्कारसहितं वा ॥१॥ २ वन्दित्वा निवेदयन्ति कालं ततश्चैत्यानि यदि सन्ति । तदा वन्दन्ते कालं यथा च तोलयित्वा प्रतिक्रमणम् ॥ १ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२६], मूलं [-1 / गाथा ||१२|| नियुक्ति: [४८६...]
बृहद्वृत्तिः
॥५४७॥
प्रत सूत्रांक ||२||
एसा सामायारी, समासेण वियाहिया । जं चरित्ता बहू जीवा, तिना संसारसागरं ॥५२॥ तिबेमि सामाचा
॥सामायारीयं ॥ २६ ॥ _ 'एषा' अनन्तरोक्ता सामाचारी दशविधा, ओघरूपा [च] पदविभागात्मिका चेह नोक्ता, धर्मकथाऽनुयोगत्वा-
Aध्ययन,
यध्ययन, दस्य, छेदसूत्रान्तर्गतत्वाच तस्याः, 'समासेन' सङ्केपेण 'वियाहिय'त्ति व्याख्याता, अत्रैवादरख्यापनार्थमस्थाः फलमाह-'या' सामाचारी 'चरित्वा' आसेव्य 'बहवः' अनेके जीवास्तीर्णाः संसारसागरं प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ इति परिसमासी, अवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इत्युत्तराध्ययनटीकायां श्रीशान्याचार्यविरचितायां सामाचारीनामकं षड्विंशमध्ययनं समाप्तम् ॥ २६ ॥
TERESTAESTRA-TaskEATRA-STREESRA T RATRATRA श्रीशान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटी शिष्य सामाचारीनामकं पड्रिंशमध्ययनं समाप्तम् ॥
A५४७॥
*29*%251-5
दीप अनुक्रम [१०५८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- २६ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२७], मूलं [--1 / गाथा ||१२...|| नियुक्ति: [४८७-४८८]
अथ सप्तविंशं खल्लुकीयमध्ययनम् ।
प्रत सूत्रांक ||२||
व्याख्यातं षडिशमध्ययनं, सम्प्रति ससविंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने सामाचारी , प्रतिपादिता, सा चाशठतयैव पालयितुं शक्या, तद्विपक्षभूतशठताज्ञान एव च तद्विवेकेनासौ ज्ञायत इत्याशयेन दादृष्टान्ततः शठताखरूपनिरूपणद्वारेणाशठतैवानेनाभिधीयत इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम्, अस्स चतुरनु-IX
योगद्वारप्ररूपणा प्राग्यद्यावन्नामनिष्पन्ने निक्षेपे खलुकीयमिति नाम, अतः खलुक [नामतः खल्लुक] निक्षेपायाह नियुक्तिकृत्
निक्लेवो खलुकमि चउविहो ॥४८७ ॥ हजाणगसरीरभविए तवइरित्ते बइल्लमाईसुं । पडिलोमो सवत्थेसु भावओ होइ उ खलुको ॥ ४८८॥ है 'निक्लेवोगाथाद्वयं ब्याख्यातप्रायमेव, नवरं वलीवर्दादिष्वित्यादिशब्देनाश्वादिपरिग्रहः, निर्धारणे चेयं सप्तमी,
ततो बलीवादिषु यो गल्यादिरिति गम्यते स द्रव्यतः खलुक इति, 'प्रतिलोमः' प्रतिकूलः सर्वार्थेषु, पाठान्तरतः 5/I 'सर्वस्थानेषु' ज्ञानादिषु भावतो भवति खलुक इति गाथाद्वपार्थः। तद्वयतिरिक्तद्रव्यखलुखरूपमाह
दीप अनुक्रम [१०५८]
wwsaneiorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं - २७ “खलंकीय" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||५२...|| नियुक्ति : [४८९-४९१]
%
वृद्धृत्तिः
5
प्रत सूत्रांक ||२||
उत्तराध्य. अवदाली उत्तसओ जोत्तजुगभंज तुत्तभंजो अ। उप्पहविप्पहगामी एय खलंका भवें गोणा ॥४८९013 खलुक्की
जं किर दवं खुजं कक्कडगुरुयं तहा दुरवणामं । तं दवेसु खलुंकं वंककुडिलवेढमाइद्धं ॥ ४९०॥ याध्य.२७
सुचिरंपि वंकडाई होहिंति अणुजइजमाणाई । करमंदिदारुआई गयंकुसा इव विंटाइं ॥ ४९१ ॥ પ૪૮
'अवदालि'त्ति अवदारयति शकटं स्वखामिनं वा विनाशयतीत्येवंशीलोऽवदारी, उनसको यो यत्किञ्चनावलोक्योजाप्रस्थति, 'जुत्तजुगभंजत्ति योत्रं-तथाविधसंयमनं युग-प्रतीतमेव ते भनक्ति-विनाशयति योत्रयुगभञ्जः, तथा तोत्रं
प्राजनकस्तद्भनक्ति तोत्रभञ्जकच, उभयत्र 'कर्मण्यण'(पा०३-२-१इत्यण), 'उत्पथविपथगामी' उत्पथ:-उन्मार्गो विपथो-विरूपमार्गस्ताभ्यां गमनशीलः, एते' अवदार्यादयः खलुकाः भवन्ति' भवेयुः 'गोणाः' बलीवर्दाः, उपलक्षणत्वादश्वादयश्च । अमुमेव प्रकारान्तरेणाह-'यदिति सामान्यनिर्देशे 'किले'ति परोक्षासवादसूचकः 'द्रव्यं दादि कुजमिष कुजं मध्यस्थूलतया कर्कशं च तत्कठिनतया गुरुकं चातिनिचितपुद्गलतया कर्कशगुरुकं,तथाऽत एव दुःखेनाव|नामयितुं शक्यत इति दुरवनाम, करीरकाष्ठवत्, तहव्येषु खलुकं वक्रमनृजुत्वात् कुटिलं विशिष्ट कौटिल्ययोगात् | ५४८॥ | 'वेढमाइद्धं'ति मकारोऽलाक्षणिकस्ततश्च वेष्टे:-प्रन्थिभिराबिधू-व्यासं वेष्टाविद्धम् , तेषां विशेषणसमासः । इहैव दृष्टान्तमाह-'सुचिरमपि' प्रभूतकालमपि 'बंकडाईन्ति वक्राणि, अवधारणाफलत्वाच वाक्यस्य वक्राण्येव भवि
%25
%
दीप अनुक्रम [१०५८]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||५२...|| नियुक्ति : [४८९-४९१]
प्रत सूत्रांक ||२||
प्यन्ति न कदाचिरजुभावमनुभविष्यन्ति, 'अणुज्जइज्जमाणाईति एकं खरूपतोऽनृजूनि अपरं च तेषां क्वचित्कार्य:नुपयोगारकेनचिदनृजूक्रियमाणानि, कान्येवंविधानीसाह-करमर्दी-गुल्मभेदस्तद्दारकानि, तथा 'गयंकुसा इव विंटा
इति चस्स गम्यमानत्वाद् गजाङ्कशानीव वक्रतया वृन्तानि च-फलबन्धनानि, प्रक्रमाकरम- एवोक्तरूपाणि । द अनेकधा द्रव्यखलुङ्काभिधानं च काकाऽनेकविधकुशिष्यदृष्टान्तप्रदर्शनार्थमिति गाथात्रयार्थः॥ सम्प्रति यदुक्तं 'प्रति
लोमः सर्वार्थेषु भावतो भवति खलुङ्क' इति तदभिव्यक्तीकर्तुमाहदंसमसगस्समाणा जलुयकविच्छ्यसमा यजे हुंति। ते किरहोंति खलुका तिक्खम्मिउचंडमदविआ४९२ |जे किर गुरुपडिणीआ सबला असमाहिकारगा पावा। अहिगरणकारगऽप्पा जिणवयणे ते किर खलंका॥ पिसुणा परोवतावी भिन्नरहस्सा परं परिभवंति। निविअणिजा य सढा जिणवयणे ते किर खलंका॥४९४॥
दंशमशकैः ‘समाण त्ति समानाः-तुल्या दंशमशकसमानाः, ते हि जात्यादिभिस्तद्वत्तुदन्तीति, तथा जलौकाकपि- च्छुकसमानाश्च प्रस्तावाच्छिष्या ये भवन्ति, दोषग्राहितयाऽप्रस्तुतपृच्छादिनोद्वेजकतया च, पठन्ति च-जलूकविच्छुगसमा यत्ति यथा दृश्चिकोऽवष्टन्धो विध्यत्येव कण्टकेन एवं ये शिष्यमाणा गुरुं वचनकण्टकैविध्यन्ति 'ते' एवंविधाः किल भवन्ति खलुङ्का भावत इति गम्यते, तीक्ष्णा-असहिष्णवो मृदवः-अलसतया कार्यकारणं प्रत्यद
दीप अनुक्रम [१०५८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२७], मूलं [-1 / गाथा ||५२...|| नियुक्ति: [४९२-४९४]
खलकी
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक ||२||
उत्तराध्य. राध्यक्षावण्डा:-कोपनतया मार्दवेन चरन्ति मार्दविकाः-शतकृत्वोऽपि गुरुप्रेरिता न सम्यगनुष्ठानं प्रति प्रवर्त्तन्ते किन्त्व-
लसा एव, अमीषा द्वन्द्वः । अन्यच्च-ये किल 'गुरुप्रत्यनीकाः' आचार्यादिप्रतिकूलाः कूलवालकवत् 'शबलाः' शब
| लचारित्रयोगात् 'असमाधिकारकाः गुवोंदीनामसमाधानजनकाः, अत एवं पापाः 'अधिकरणकारकात्मानः' ॥५४९॥ कलहकर्तृखभाषाः सदनुष्ठानं प्रति प्रेर्यमाणा युद्धायैवोपतिष्ठन्ते, 'जिनवचने' सर्वज्ञशासने ते किल खलुक्का इत्युच्यन्त
इति शेषः । तथा 'पिशुनाः' सूचकाः, अत एव 'परोवयावि'त्ति परोपतापिनः 'भिन्नरहस्याः' विश्वस्तजनकथितर-3 हस्यभेदिनः तथा 'परम्' अन्यं 'परिभवन्ति' येन केनचित्प्रकारेणाभिभवन्ति 'णिवेयणिज्जत्ति निदनीया निर्वेद प्राप्य प्रक्रमाद्यतिकृत्येन, पाठान्तरतो निर्गता वचनीयाद्-उपदेशवाक्यात्मका ये ते निर्वचनीयाः, चः समुचये [भिन्नक्रमच, ततः 'शठाश्च' मायापिनः, पठ्यते च-णिवया णिस्सीलसढ'त्ति, सुगममेष, 'जिनवचने' श्रीसर्वज्ञशा-1 सने भणिता ये इति शेषः, ते प्रागभिहितस्वरूपाः किल खलुङ्का इति गाथात्रयार्थः ॥ ततः किमित्याहतम्हा खलंकभावं चइऊणं पंडिएण पुरिसेणं । कायदा होइ मई उजुसभावमि भावेणं ॥ ४९५॥
तस्मादित्थं दोषवन्तं खलुङ्कभावं त्यक्त्वा 'पण्डितेन' बुद्धिमता पुरुषेण उपलक्षणत्वात् ख्यादिना च कर्त्तव्या भवति मतिः' बुद्धिः, क?-'ऋजुखभावे' आर्जवे भावे 'भावेन' परमार्थेन न तु बहिर्वृत्त्यैवेति गाथार्थः।। अवसितो नामनिष्पन्न निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तचेदम्
दीप अनुक्रम [१०५८]
-
॥५४९॥
-
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [४९५...]
प्रत
सत्राक
||१||
धेरे गणहरे गग्गे, मुणी आसि विसारए । आइन्ने गणिभावम्मि, समाहिं पडिसंधए ॥१॥ धर्मेऽस्थिरान् स्थिरीकरोतीति स्थविरः, उक्तं हि-"घिरकरणा पुण थेरो" गणं-गुणसमूहं धारयति-आत्मन्यवस्थापयतीति गणधरः 'गार्यः' गर्गसगोत्रः तथा मुणिति-प्रतिजानीते सर्वसावद्यविरतिमिति मुनिः 'आसीत्, अभूत् 'विशारदः' कुशलः सर्वशास्त्रेषु सङ्ग्रहोपग्रहयो, 'आकीर्णः' आचार्यगुणैराचारश्रुतसम्पदादिभिर्व्याप्तः। परिपूर्ण इतियावत् , 'गणिभावे' आचार्यत्वे स्थित इति गम्यते, 'समाहिं पडिसंधए'त्ति समाधानं समाधिः, सच |द्विधा-द्रव्यतो भावतश्च, तत्र द्रव्यसमाधिर्यदुपयोगात्खास्थ्यं भवति, यथा(वा) पयःशर्करादिद्रव्याणां परस्परमविरोधः, भावसमाधिस्तु ज्ञानादीनि, तदुपयोगादेवानुपमखास्थ्ययोगात्, तह भावसमाधिभ्यते, ततः समाधि 'प्रतिसंधत्ते' कर्मोदयात् त्रुटितमपि संघट्टयति, तथाविधशिष्याणामिति गम्यते इति सूत्रार्थः॥ समाधि च प्रतिसंदघद्यथाऽसौ शिष्येभ्य उपदिशति तथाऽऽह
घहणे वहमाणस्स, कंतारं अइवत्तए । जोए वहमाणस्स, संसारो अइवत्तए ॥२॥ उद्यतेऽनेन वोढव्यमिति वहनं-शकटादिस्तस्मिन् योजितस्येति गम्यते, 'वहमानस' सम्यक्प्रवर्त्तमानस्योत्तरत्र खलुङ्कग्रहणादिह विनीतगवादेरिति गम्यते, अतिक्रम्यातिक्रमणसम्बन्धे षष्ठी, वाहकाविनाभूतत्वाचास वाहकस्य १ खिरकरणात्पुनः स्थविरः
दीप अनुक्रम [१०५९]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [४९५...]
प्रत
सुत्रांक
||२||
उत्तराध्य.
च पामरकादेः 'कान्तारम्' अरण्यम् 'अतिवर्त्तते' सुखातिवर्तितया खयमेवातिकमतीति रष्टान्तः, उपनयमाह- खल्लुङ्कीयोगे' संयमव्यापारे 'वहतः' तथैव प्रवर्त्तमानस्य इहापि प्राग्वत्प्रवर्तकस्य चाचार्यादेः 'संसारः' भवः अतिवर्त्तते ।
याध्य.२७ बृहद्धृत्तिः
प्राग्वत् खयमेवातिक्रामति, इह च योगवहनमशठतेति सैव प्रागध्ययनार्थत्वेनोपवर्णिता फलोपदर्शनद्वारेणानेनो॥५५ ॥
तेति भावनीयमिति सूत्रार्थः ॥ तदेवं कथममी अशठतामासेव्य पुनर्ज्ञानादिसमाधिमन्तः शिष्याः स्युरिति तस्या गुणमभिधाय तद्गुणज्ञानमिव तद्विपक्षदोषावधारणमपि तदासेवनाङ्गमिति तद्विपक्षभूतशठतादोषा अपि वाच्याः,
ते च कुशिष्यस्वरूपाभिधानत एवाभिधातुं शक्यन्ते इति निर्वेदकत्वं खयं दोषदुष्टत्वं च तत्खरूपमवगमयितुं दृष्टा-2 है न्तोपवर्णनायाह2 खलुंके जो उ जोएइ, विहमाणे किलिस्सई । असमाहिं च वेएइ, तुत्तओ य से भजई ॥ ३॥ एगं डसह । छापुच्छंमि, एगं विधाऽभिक्खणं । एगो भंजह समिल, एगो उप्पहपडिओ ॥ ४ ॥ एगो पडइ पासेणं, निचेसह
निविजई । उकुदइ उफ्फिडई, सदे बालगवी वए ॥५॥ माई मुद्धेण पडई, कुढे गच्छह पडिवहं । मयलक्खेण ॥५०॥
चिट्ठाई, पेगेण य पहावई॥६॥ छिन्नाले छिंदई सिलिं, दुईते मंजई जुगं । सेविय सुस्सुयाइत्ता, उज्जु15 हित्ता पलायई ॥७॥
यद्वा धर्मकथाऽनुयोगत्वादस्य प्रथमसूत्रे गर्गनामाऽऽचार्यः कथञ्चित्कुशिष्यग्नसमाधिरात्मनः समाधि प्रति
दीप
अनुक्रम [१०६०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [२७], मूलं [-1 / गाथा ||३-७|| नियुक्ति: [४९५...]
प्रत सूत्रांक ||३-७||
संधत्त इति ब्याख्यायते, द्वितीयसूत्रे तु वहने 'वहमाणस्सति अन्तर्भावितण्यर्थतया चाहयमानस्य विनीतगवादीन यथा कान्तारमतिवर्त्तते तथा योग्यान् शिष्यान् वाहयमानस्य-कृत्येषु प्रवर्त्तयतः संसारोऽतिवर्त्तते, तद्विनीततादर्शनादात्मनो विशेषतः समाधिसम्भवादितिभाव इति सोपस्कारतया व्याख्यायते, इत्थमात्मनः समाधिप्रतिसन्धानाय विनीतखरूपं परिभाब्य स एवाविनीतखरूपं यथा परिभाषयति तथाऽऽह-खलुंकेत्यादिसूत्रद्वादशकस् । खलुकान योऽनिर्दिष्टखरूपः 'तुः विशेषणे योजयति-योक्रयति वहन इति प्रक्रमः, स किमित्याह-विहंमाणो'त्ति सूत्रत्वाद् विशेषेण 'नन्' ताडयन् 'क्लाम्यति' श्रमं याति, पाठान्तरतः क्लिश्यति, अत एव 'असमाधि' चिचोदेगरूपं 'वेदयते' | अनुभवति 'तोत्रकः' प्राजनकः, स च 'से' इति तस्य खलुङ्कयोजयितुः 'भज्यते' अतिताडनाद्भङ्गं याति । ततश्चा|तिरुष्टः सन् यत् कुरुते तदाह-एक 'दशति दशनैर्भक्षयति 'पुच्छे' वालधौ, 'एकम्' अन्यं गलिं 'विध्यति'
प्राजनकारया तुदति, उपलक्षणं चैतदश्लीलभाषणादीनाम् , 'अभीक्ष्णं' पुनः पुनः, अथ किमेते कुर्वन्ति ? येन योजहै यितुरेवं निर्वेदहेतव इत्याह-'एकः कश्चित् खलुको गौः 'भनक्ति' आमर्दयति, कां ?-'समिला' युगरन्धकीलिकाम् ,
एकः' अन्यस्तामभङ्क्त्वाऽपि उत्पथम्-उन्मार्ग प्रस्थित उत्पथप्रस्थितो भवतीति गम्यते । तथा 'एकः' अपरः पतति 'पार्थेन' एकगात्रविभागेन, गम्यमानत्वाद् भूमी, अन्यस्तु 'निवेसइ'त्ति निविशति-उपविशति, अपरश्च |'णिविजए'त्ति शेते, परः 'उत्कूदते' ऊर्दू गच्छति 'उप्फिडइ'त्ति मण्डूकवलयते, अन्यः 'शठः' शाठ्यपान , अन्यः
RE
दीप अनुक्रम [१०६१-१०६५]
SAROKAR
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||3-6||
दीप
अनुक्रम
[१०६१
-१०६५]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्ति:
॥५५१॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||३-७|| निर्युक्तिः [४९५...]
अध्ययनं [२७],
कश्चिद्र 'बालगवी वए'सि 'बालगवीम्' अवृद्धां गां 'ब्रजेत् तदभिमुखं धावेदित्यर्थः, यदिवाऽऽर्पत्वाद्वालगवीति व्यालगवो- दुष्टबलीवर्दः 'व्रजेत्' गच्छेद् अन्यत इति शेषः । अन्यश्च 'मायी' मायावान् 'मूर्ध्ना' मस्तकेन पतति, कोऽर्थः ? - अतिनिस्सहमिवात्मानमादर्शयन् भुवि शिरसा लुठति, अपरः 'क्रुद्धः कुपितः सन् 'गच्छति प्रतिषथं' पश्चाद्वलति, अपरः 'मृतलक्ष्येण' मृतव्याजेन 'तिष्ठति' आस्ते, पठ्यते च-'पलयं (यलं) ते ण चिट्ठिय'त्ति प्रव (च) छन्५ प्रकर्षेण कम्पमानस्तिष्ठति, कम्पान्न निवर्त्तत इत्यर्थः, कथञ्चित्प्रवणीकृतः 'वेगेन च प्रधावति' यथा द्वितीयो गन्तुं न | शक्नोति तथा गच्छतीति योऽर्थः । 'छिन्नालः ' तथाविधदुष्टजातिः कश्चित् 'छिनत्ति' खण्डयति 'सि [ख]लिं'ति रश्मि संयमन रज्जुमितियावत्, अपरस्तु दुर्दान्तो भनक्ति युगं, सोऽपि च युगं भङ्क्त्वा 'सुस्सुयाइत्त'ति सूत्कारान् कृत्वा, तथा 'उज्जुहित्त'त्ति प्रेर्य खामिनं शकटं चेति गम्यते ' पलायते' अन्यतो घावतीति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ इत्थं दृष्टान्तमभिधाय दार्शन्तिकयोजनामाह-
खलुंका जारिसा जुजा, दुस्सीसाविहु तारिसा । जोइया धम्मजाणंमि, भजंता धिइदुम्बला ॥ ८ ॥ 'खलुका:' इहोक्तरूपा गावो यादृशाः 'योज्याः' घट्टनीयाः, दुःशिष्या अपि 'हुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च ततस्तादृशा एव, यथा हि खलुङ्कगवाः खखामिनं क्र (क्ल) मयन्त्यसमाधिं च प्रापयन्ति यथा च समिलाभङ्गादिना दुष्टत्वमादर्शयन्त्येवमेतेऽपि किमिति १-यतो 'योजिताः' व्यापारिता धर्मो यानमिव मुक्तिपुरप्रापकतया धर्मयानं तस्मिन्
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खलुङ्की
याध्य. २७
~ 136~
॥५५१॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||९-१४||
दीप
अनुक्रम
[१०६७
-१०७२]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [४९५...]
अध्ययनं [२७],
मूलं [ - ] / गाथा ||९-१४||
'भज्यन्ते' न सम्यक् प्रवर्त्तन्ते 'धिइदुच्चल' ति प्राकृतत्वाद् दुर्बलधृतयो धर्मानुष्ठानं प्रतीति गम्यत इति सूत्रार्थः ॥ श्रुतिदुर्बलत्वमेव तेषां भावयितुमाह
इहीगारचिए एगे, एगित्थ रसगारवे । सायागारविए एगे, एगे सुचिरकोहणे ॥ ९ ॥ भिक्खालसिए एगे, एगे ओमाण भीरुए थद्धे । एगं च अणुसासंमी, हेऊहिं कारणेहि य ॥ १० ॥ सोऽवि अंतरभासिलो, दोसमेव पकुब्बई । आयरियाणं तं वयणं, पडिकूलेइ अभिक्खणं ॥ ११ ॥ न सा मम वियाणाइ, नवि सा मज्झ दाहिई । निग्या होहिई मन्ने, साहू अन्नोऽत्थ वच्च ॥ १२ ॥ पेसिया पलियंचति, ते परियंति समंतओ रायविट्ठि व मन्नंता, करिति भिउर्डि मुहे ॥ १३ ॥ वाइया संगहिया चेव, भत्तपाणेहिं पोसिया । जायपक्खा जहा हंसा, पक्कमंति दिसोदिसिं ॥ १४ ॥
'गारवित्ति या गौरवं श्राद्धा ऋद्धिमन्तो मम वश्याः संपद्यते च यथाचिन्तितमुपकरणमित्याद्यात्मवहुमानरूपमृद्धिगौरवं तदस्यास्तीति ऋद्धिगौरविको न गुरुनियोगे प्रवर्त्तते किमेतैर्ममेति एकः कश्चन, 'एकः' अन्योऽत्रेति दुःशिष्याधिकारे 'रसगारवे 'ति रसेषु-मधुरादिषु गौरवं -गार्ज यस्यासौ रसगौरवो वालग्लानादिसमुचिताहारदानतपोऽनुष्ठानादौ न प्रवर्त्तते, 'सायागारविए'त्ति साते-सुखे गौरवं प्रतिबन्धः सातगौरवं तदस्यास्तीति सातगौरविक एकः, सुखप्रतिबद्धो हि नाप्रतिबद्धविहारादौ प्रवर्त्तितुं क्षमः, एकः 'सुचिरक्रोधनः' प्रभूतकालको पनशीलः,
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||९-१४|| नियुक्ति: [४९५...]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक ||९-१४||
॥५५२॥
एकदा कुपितः कुपित एवास्ते, न कृत्येषु प्रवर्तते । भिक्षायामालस्यक:-आलस्यवान् भिक्षाऽऽलस्थिक एको न खलुङ्गीद विहर्तुमिच्छति, एकोऽपमानभीरुः-भिक्षा भ्रमन्नपि न यस्य तस्यैव वेश्मनि प्रवेष्टुमिच्छति, यदिवा 'ओमाण ति। प्रवेशः स च खपक्षपरपक्षयोस्तभीरुहिप्रतिवन्धेन मा मां प्रविशन्तमवलोक्यान्ये साधवः सौगतादयो वाऽत्र से प्रवेश्यन्तीति, 'थद्धो'त्ति स्तब्धोऽहकारवान् , न निजकुग्रहान्नमयितुं शक्य इति प्रक्रमः, एकं च दुःशिष्यम् 'अणुसासमिति आर्षत्वादनुशास्ति गुरुरिति गम्यते, यदा त्वाचार्य आत्मनः समाधि प्रतिसंधत्ते इति व्याख्या तदाऽनुशास्त्रीति व्याख्येय, हेतुभिः कारणेमोक्तरूपैः । स चानुशिष्यमाणः किं कुरुते ? इत्याह-सोऽपि दुःशिष्यः 'अंतरभासिल्ल'त्ति अन्तरभाषावान् , गुरुवचनापान्तराल एव वाभिमतभाषक इत्यर्थः, 'दोषमेव' अपराधमेव 'प्रादुष्क(प्रक)-12 रोति' प्रकर्षण विधत्ते, न तु शिष्यमाणोऽपि तद्विच्छेदमिति भावः, पाठान्तरतश्च दोषमेव प्रभाषते, गुरूणामिति गम्यते, न चैतापता तिष्ठति, किन्त्वाचार्याणामुपलक्षणत्यादुपाध्यायादीनां द्वितीयपक्षे त्वाचार्याणां सतामस्माकमिति गम्यते, तदित्यनुशिष्टयभिधायकं वचनं वचः 'प्रतिकूलयति' विपरीतं करोति युक्त्युपन्यासेन विपरीतचेष्टया या 'अभीक्ष्णं' पुनः पुनः, न त्वेकदैवेत्यभिप्रायः । यथा प्रतिकूलयति तथाऽह-न सा 'मम'ति मां विजानाति, किमुक्तं भवति -गुरुभिः कदाचित्प्रज्ञापितो यथा-आयुष्मन् ! ग्लानप्रतिजागरणं महनिर्जरास्थानमित्यमुकस्या अपि श्राविकायाः सकाशादमुकमौषधमाहारजातं वाऽऽनीयतां, ततः स तया ज्ञायमानोऽपि प्रतिकूलतया प्राह
दीप
अनुक्रम [१०६७-१०७
॥५५२॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||९-१४|| नियुक्ति: [४९५...]
प्रत सूत्रांक ||९-१४||
न सा-श्राविका मा प्रत्यभिजानाति, अप्रत्यभिज्ञानाच न वेत्ति, नैव सा मह्यं दास्यति विवक्षितमौषधादीति गम्यते इति हेतुहेतुमद्भावेन व्याख्येयं, स्वतत्रतया वा न सा मां विजानाति, नापि सा मयं दास्यतीत्साह, यदिवा निर्गता
गृहादिदानी सा भविष्यतीति मन्ये इति वक्ति, अथवा साधुः 'अन्यः' मद्यतिरिक्तः 'अत्र' विवक्षितप्रयोजने मानजतु, किमहमेपैकः साधुरस्मीसभिधत्ते । अन्यच 'प्रेषिताः क्वचित्तथाविधप्रयोजने प्रस्थापिताः 'पलिउंचंति'त्ति तत्प्रयोजनानिष्पादने पृष्टाः सन्तोऽपहुवते-क वयमुक्ताः?,गता वा तत्र वयं, न त्वसौ रष्टेति, पठ्यते च-पोसिया पलिउंचंति' पोषिताः-आहारोपकरणादिना श्रुतादिना च पुष्टिं नीता अपहुंचते-यथा किमस्माकं गुरुभिः कृतमित्यपलपन्ति | |'ते' दुःशिष्याः 'परियंति' पर्यटन्ति 'समन्ततः' सर्वासु दिक्षु, न गुरुसन्निधौ कदाचिदासते, मा कदाचिदेषां किञ्चित्कृत्यं भविष्यतीति, कथञ्चित्संनिधाने वा कर्तुं प्रवृत्ती 'राजवेटिमिय' नृपतिहठप्रवर्त्तितकृत्यमिव 'मन्यमानाः' मन-2 स्यवधारयन्तः कुर्वन्ति 'भ्रकुटीम्' आवेशवशकृतभूत्क्षेपरूपां 'मुखे' वक्के, अत्यन्तदुष्टताख्यापकमेतत् तदन्यवपुर्चिकारोपलक्षणं च । अपरञ्च-'वाचिताः' शास्त्राणि पाठिताः, उपलक्षणत्वात्तदर्थं च प्राहिताः, किमाचार्यान्तरसत्का एव सन्त उतान्यथेत्याह-संगृहीताः' परिगृहीताश्चशब्दाद् दीक्षिता उपस्थिताश्च खयमिति गम्यते, एवेति पूरणे, 'भक्त-४ पानेन' च सुलिग्धमधुरादिना, सूत्रे च सुब्व्यत्ययात्तृतीयार्थे सप्तमी, पोषिताः' उपचितीकृताः, तथापि 'जातपक्षा' | उत्पनपतत्रा यथा हंसाः प्रकर्षण-अतिविप्रकृष्टदेशान्तरगमनलक्षणेन कामन्ति-गच्छन्ति प्रक्रामन्ति 'दिसोदिसिं'ति
दीप अनुक्रम [१०६७-१०७
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
~139~
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२७], मूलं [-1 / गाथा ||१५-१६|| नियुक्ति: [४९५...]
खिलकी
प्रत सूत्रांक ॥१५
-१६||
उत्तराध्य. दिशि दिशि यदृच्छाविहारिणो भवन्तीत्यर्थः । पूर्वौकस्थानस्थितानामेव पर्यटनमुक्तम् , इह तु देशान्तरगमन इति न बृहद्वृत्तिः
पौनरुक्त्य, प्रागेकप्रक्रमेऽपि यदिह बह्वभिधानं तदीदृशां भूयस्त्वख्यापनार्थमिति सूत्रषट्कार्थः । इत्थं खलुङ्करस्येव समिलाभकादिना दुःशिष्यस्य धृतिदुर्वलत्वादिना दुष्टत्वम् , अत एव वखामिक्लमासमाधिजनकत्वं चोक्तम् , इदानी [४]
याध्य.२७ ॥५५॥ तैरेव प्रापितलमासमाधिर्यदसावचेष्टत तदाह
| अह सारही विचितेइ, खलुंके हि समागए। किं मझ दुट्टसीसेहिं १, अप्पा मे अवसीआई ॥१५॥ | जारिसा मम सीसा उ, तारिसा गलिगद्दहा । गलिगद्दहे चइत्ताण, दढं पगिहई तवं ॥१६॥ & 'अर्थ'ति क्लमासमाधिसम्भवानन्तरं सारथिरिव सारथिः स्खलितप्रवर्तकतयाऽऽचार्यादिः 'विचिन्तयति' ध्यायति,
आचार्यसमाधिप्रतिसन्धानपक्षे तु 'अत्यनन्तरोक्तचिन्तानन्तरं 'सारथिः स एव गर्गाचार्यः खलुकैरिव खलुकैः-दुः|शिष्यैः, हेतौ तृतीया, श्रम-खेदमागतः-प्राप्तः श्रमागतः, ते हि दुष्टगववदनेकधा प्रेर्यमाणा अपि सन्मार्गमगच्छन्तो
गुरुश्रमहेतव एव भवन्ति, यदिवा समागतः खलुकैरिति च.सहार्थे तृतीया, यद्विचिन्तयति तदाह-किं , न किञ्चि|दित्यर्थः, ममैहिकमामुष्मिकं वा प्रयोजनं सिध्यतीति गम्यते, कैः ?-दुष्टशिष्यैः प्रक्रमात्प्रेरितैः, किमेवमुच्यते इलाह
॥५५॥ आत्या 'मे' ममावसीदति, एतत्प्रेरणादिव्यग्रतया तथाविधखखकृत्याकरणेन, तत एतत्यागतो वरमुद्यतविहारेणैव 2 विद्दतमिति भावः। अथैतत्प्रेरणान्तराले खकृत्यमपि किंन क्रियते ? इत्याह-याशा मम शिष्याः, 'तुः' पूरणे, तादृशा
ARMS*******MARIA CAIG
दीप अनुक्रम [१०७३-१०४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२७], मूलं [-] / गाथा ||१७|| नियुक्ति: [४९५...]
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प्रत सूत्रांक ||१७||
गलिगर्दभाः, यदि परमित्युपस्कारः, गर्दभग्रहणमतिकुत्साख्यापकं, ते हि खरूपतोऽप्यतिप्रेरणयैव प्रवर्त्तन्ते, ततस्तत्प्रेरणयैव कालोऽतिकामति, न तु तदन्तरालसम्भव इति भावः, यतश्चैवं ततो गलिगर्दभानिव गलिगर्दभान्-दुःशिष्यां|स्त्यक्त्वा रढं' चार्ट'प्रगृहामि पाठान्तरतः परिगृह्णाति वा अङ्गीकुरुते,तदनुशासनरूपपलिमन्थत्यागतः,एकत्र सामान्येन गुरुरन्यत्र तु गर्गनामा, किन्तु 'तपः' अनशनादीति सूत्रद्वयार्थः ॥ ततः कीदृशः सन् किमसौ कुरुते ? इत्याहमिउमद्दवसंपन्ने, गंभीरे सुसमाहिए । विहरइ महिं महप्पा, सीईभूएण अप्पण ॥ १७॥ त्तिवेमि ।।
॥खलुकिजं ॥ २७॥ 'मृदुः' बहिर्वृत्त्या विनयवान् 'मार्दवसंपन्नः' अन्तःकरणतोऽपि ताडगेव, कुशिष्यसन्निधौ हि मृदुरपि खरूपतो. मृदुरेवासीत् , उक्तं हि प्राकू-"अणासवा थूलवया कुसीला, मिउंपि चंडं पकरति सीसा" इति, अत एव 'गम्भीरः' अलब्धमध्यः 'सुसमाहितः' सुष्टु चित्तसमाधानवान् विहरति' अप्रतिबद्धविहारेण पर्यटति 'महीं' पृथ्वी महात्मा शील-चारित्रं भूतः-प्राप्तः शीलभूतस्तेनात्मना उपलक्षितः, यतश्चैवं गुरोरपि खलुङ्कत्यागत एव मार्दवादिगुणसंपन्नतेति खलुइताया इहैवात्मनो गुरूणां च दोपहेतुत्वेन तत्त्यागतोऽशठतैव सेवितव्येत्यध्ययनतात्पयोंथेः ॥ 'इति' परिसमाप्ती, अधीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयास्तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां शिष्यहितायां श्रीशान्त्याचार्यकृतायां खलुकीयं नाम सप्तविंशमध्ययनं समाप्तम् ॥ २७॥
*
दीप अनुक्रम [१०७५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- २७ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||१७...|| नियुक्ति: [४९६-५०१]
बृहदत्तिः
प्रत सूत्रांक ||१७||
अथ मोक्षमार्गगत्याख्यमष्टाविंशमध्ययनम् । उत्तराध्य.
मोक्षमार्गव्याख्यातं सप्तविंशमध्ययनम् अधुनाऽष्टाविंशमारभ्यते, अस्स चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययनेऽशठतयैव गत्य०२८ दिसामाचारी परिपालयितुं शक्यत इति तामभिहितवान् , इह तु तद्यवस्थितस्य न्यायप्राप्तैव मोक्षमार्गगतिप्राप्तिरिति र ॥५५४॥
तदभिधायकमिदमध्ययनमारभ्यते, अस्स चानुयोगद्वारचतुष्टयं प्राग्वत्प्ररूप्यं यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे अस्य मोक्षमार्गगतिरिति नाम अतो मोक्षस्य मार्गस्य गतेश्च निक्षेपमभिधातुमाह नियुक्तिकृत्निक्खेवो मुक्खंमि(य)चउबिहो
॥४९६ ॥ जाणगसरीरभविए तबइरित्ते अनियलमाईसु । अट्रविहकम्ममुको नायवो भावओ मुक्खो ॥४९७॥ निक्खेवो मग्गंमि(वि)चउवि० .
॥४९८॥ जाणगसरीरभविए तबइरिते अ जलथलाईसुं । भावंमि नाणदंसणतवचरणगुणा मुणेयवा ॥४९९॥
५५४ा निक्खेवो उ गईए चउक्कओ दुवि०
॥५००॥ जाणगसरीरभविए तबइरित्ते अ पुग्गलाईसुं । भावे पंचविहा खलु मुक्खगईए अहीगारो ॥ ५०१
दीप अनुक्रम [१०७५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं - २८ "मोक्षमार्गगति" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [--] / गाथा ||१७...|| नियुक्ति : [४९६-५०१]
प्रत सूत्रांक ||१७||
णिक्खवेत्यादि गाथाः षट्र प्रतीतार्था एव, नवरं 'तवइरित्ते य नियलमाईसु'त्ति तद्यतिरिक्तश्च निगडादिभ्यः, आ-|| 2 दिशब्दात्कारागृहादिपरिग्रहः, सूत्रत्वाच पञ्चम्यर्थे सप्तमी, इह च निगडादीनां द्रव्यत्वात्तन्मोक्षोऽपि द्रव्यमोक्ष उक्तः अष्टविधकर्मणा-ज्ञानावरणादिना मुक्तः-त्यक्त आत्मेति गम्यते ज्ञातव्यो भावतो मोक्षः, कथश्चिद्रव्यपर्याययोरनन्यत्वख्यापनार्थमित्थमुक्तम् , अन्यथा हि क्षायिकभाव एवात्मनो मुक्तत्वलक्षणो मोक्ष इत्युच्यते, आह-कर्मणोऽपि द्रव्यत्वात्कर्मक्षयलक्षणत्वाचास्य कथं न द्रव्यमोक्षता ?, उच्यते, इह द्रव्यस्याविवक्षितत्वात्क्षायिकभावरूपस्यैव चास्या-12 |श्रितत्वान्न दोषः, अथवा भावशब्दोऽत्र परमार्थवचनः, तथा च वक्तारो भवन्ति-अयमत्र भावः-अयमत्र परमार्थ | | इत्यर्थः, ततश्चास्यैवैकान्तिकात्यन्तिकत्वेन तात्त्विकत्वाद्भावमोक्षत्वम् , इतरस्य तु तद्विपरीतत्वाद् द्रव्यमोक्षत्वमित्य-IX नवकाश एवं प्रेरणायाः, 'तचइरिते य जलथलाईसुन्ति जलस्थले-प्रतीते आदिशब्दादुभयपरिग्रहस्तेषु प्रक्रमाद्यो मार्गः || स तव्यतिरिक्तो द्रव्ये मुणितव्य इति संटङ्कः, भावे ज्ञानदर्शनतपश्चरणगुणा जीवपर्यायत्वान्मुक्तिपदावाप्तिनिमित्ततया ।
च मुणितव्यो मार्ग इति प्रक्रमः । 'तपइरित्ते य पोग्गलाईसु'न्ति सूत्रत्वात्तयतिरिक्ता च प्रक्रमा व्यगतिः पुद्गला|5|| दिपु, आदिशब्दाजीवपरिग्रहः, व्यक्तिभेदविवक्षया च बहुवचननिर्देशः, द्रव्यत्वं चास्था द्रव्यप्राधान्यविवक्षया,
अन्यथा हि पुद्गलादिपर्यायत्वादतर्भावरूपतैव, यदिवा द्रव्यस्य गतिः द्रव्यगतिरिति षष्ठीसमासाश्रयणान्न दोषः, भावे ।
दीप अनुक्रम [१०७५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५०२]
प्रत
सूत्रांक ||१||
उत्तराध्य. पञ्चविधा' पञ्चप्रकारा प्रस्तावाद्गतिारकतिर्यडरामरमस्याख्यगम्यभेदेन, मोक्षगत्या-सिद्धिगया त्वधिकारः, तस्या मोक्षमार्गबृहद्धतिः। एवेहाभिधेयत्वादिति गाथाषट्कार्थः ॥ सम्प्रति यथाऽस्य मोक्षमार्गगतिरिति नाम तथा दर्शयितुमाह
गत्य०२८ मुक्खो मग्गो अ गई वणिजइ जम्ह इत्थ अज्झयणे । तं एअं अज्झयणं नायवं मुक्खमग्गगई ५०२ ॥५५५॥ IPL मोक्षः प्राप्यतया मार्गस्तत्प्रापणोपायतया चशब्दो भिन्नक्रमः ततः 'गतिश्च' सिद्धिगमनरूपा तदुभयफलतया
'वण्येतं' प्ररूप्यते यहाद् 'अत्रे'ति प्रस्तुतेऽध्ययने 'तत् तस्मादेतदध्ययनं ज्ञातव्यं 'मोक्षमार्गगतिः' इति मोक्षमा-115 गेंगतिनामकम्, अभिधेयेऽभिधानोपचारादिति भाव इति गाथार्थः ॥ उक्तो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तचेदम्
. मुक्खमग्गगई तञ्च (स्थ), सुणेह जिणभासियं । चउकारणसंजुत्तं, नाणदसणलक्खणं ॥१॥ ती मोक्षणं मोक्षः-अष्टविधकर्मोच्छेदस्तस्य मार्ग:-उक्तरूपस्तेन गतिः-अनन्तरोक्ता मोक्षमार्गगतिस्तां, कथ्यमाना
मिति गम्यते, 'तचंति 'तथ्याम्' अविता 'शृणुत' आकर्णयत 'जिनभाषिता' तीर्थकृदभिहितां, चत्वारि कार|णानि वक्ष्यमाणलक्षणानि तैः संयुक्ता-समन्विता चतुष्कारणसंयुक्ता तां, नन्वमूनि चत्वारि कारणानि कर्मक्षयल-||
क्षणस्य मोक्षस्य, गतेस्तु तदनन्तरभावित्वात्स एचे (व ने)ति कथं चतुष्कारणवतीत्वमस्या न विरुध्यते , उच्यते, मान्यवहारतः कारणकारणस्यापि कारणत्वाभिधानाददोषः, अत एव चानन्तरकारणस्यैव कारणत्वमित्याशङ्काऽपोहा2-13
दीप
अनुक्रम [१०७६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सत्राक
||२||
मस्स विशेषणस्योपन्यासः, अन्यथा हि मोक्षमार्गेण गतिरिति विग्रह गति प्रति मार्गस्य कारणत्वं प्रतीयत एव,
तद्रूपाणि चामूनि चत्वारि कारणानीति, तथा ज्ञानदर्शने लक्षणं-चिहं यस्याः सा ज्ञानदर्शनलक्षणा, यस्य हि दातत्सत्ता तस्यावश्यंभाविनी मुक्तिरिति निश्चीयते, अत एव चानयोमूलकारणतां दर्शयितुमित्थमुपन्यासः, यद्वार
मोक्षे-उक्तलक्षणे मार्गः-शुद्धो 'मृजू शुद्धा विति धातुपाठात्तस्य गतिः-प्राप्तिस्तां ज्ञानदर्शने-विशेषसामान्योपयोगनीरूपे लक्षणम्-असाधारणं खरूपं यस्याः सा तथा तां, न चेह नियुक्तिकृता मार्गगस्योरन्यथान्याख्यानातद्विरोधः,
अनन्तगमपर्यायत्वात्सूत्रस्य, शिष्यासंमोहाय कस्यचिदेवार्थस तेनाभिधानात्, शेषं प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ यदुक्तं 'मोक्षमार्गगतिं शृणुते ति, तत्र मोक्षमार्ग तावदाह
नाणं च दसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा । एस मग्गुत्ति पन्नत्तो, जिणेहिं वरदंसिहि ॥२॥ ज्ञायते-अवबुध्यतेऽनेन वस्तुतचमिति ज्ञानं, तच्च सम्यगज्ञानमेव ज्ञानावरणक्षयक्षयोपशमसमुत्थं मत्यादिभेद, दृश्यते तत्त्वमस्मिन्निति दर्शनम्, इदमपि सम्यगरूपमेव, दर्शनमोहनीयक्षयक्षयोपशमोपशमसमुत्पादितमहंदभिहितजीवादितत्त्वरुचिलक्षणात्मशुभभावरूपम्, 'एच' अवधारणे भिन्नक्रमश्चोत्तरत्र योक्ष्यते, चरन्ति-गच्छन्त्यनेन मुक्तिमिति चरित्रम्, एतदपि सम्यग्रूपमेव चारित्रमोहनीयक्षयादित्रयप्रादुर्भूतसामायिकादिभेदं सदसत्क्रियाप्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणं, तपति पुरोपातकर्माणि क्षपणेनेति तपो-बाह्याभ्यन्तरभेदभिन्नं यदहद्वचनानुसारि तदेव समीची-12
दीप अनुक्रम [१०७७]
4991
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति : [५०२...]
उत्तराध्य.
वृहद्वृत्तिः ॥५५६॥
प्रत
सुत्रांक
||२||
नमुपादीयते, इत्थं चैतत् , सर्वत्र मोक्षमार्गगतिप्रस्तावाद्विपर्यस्तज्ञानादीनां तत्कारणताऽनुपपत्तेरन्यथाऽतिप्रसङ्गा-18 मोक्षमार्गतथेति, सर्वत्र चशब्दः समुच्चये, सर्वत्र समुच्चयाभिधानं समुदितानामेव मुक्तिमार्गवख्यापकम् , एष एव 'मार्ग' इति मार्गशब्दवाच्यः, अस्यैव मुक्तिप्रापकत्वात् 'प्रज्ञप्सः' प्रज्ञापितः 'जिनः' तीर्थकृद्भिः वरं-समस्तवस्तुव्यापि
गत्य०२८ तयाऽव्यभिचारितया च द्रष्टुं-प्रेक्षितुं शीलमेषां ते वरदर्शिनस्तैः, इह च चारित्रभेदत्वेऽपि तपसः पृथगुपादानमस्यैव क्षपणं प्रत्यसाधारणहेतुत्वमुपदर्शयितुं, तथा च वक्ष्यति-"तवसा (उ) विसुज्झइ"त्ति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रत्येतस्यैषानुवादद्वारेण फलमुपदर्शयितुमाह
नाणं च दसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा । एयं मग्गमणुप्पत्ता, जीवा गच्छंति सुग्गई ॥३॥ पूर्वाद्ध व्याख्यातमेव, 'एनम्' इत्यनन्तरमुक्तरूपं 'मार्ग' पन्धानम् 'अनुप्रासाः' आश्रिता जीवाः 'गच्छन्ति' यान्ति 'सोग्गइ'न्ति सुगति-शोभनगति, प्रक्रमान्मुक्तिमिति सूत्रार्थः ॥ ज्ञानादीनि मुक्तिमार्ग इत्युक्तमतस्तत्खरूपमिहाभिधेयं, तच तद्भेदाभिधानेऽभिहितमेव भवतीतिमत्वा 'यथोद्देशस्तथा निर्देश' इति न्यायतो ज्ञानभेदानाहतत्थ पंचविहं नाणं, सुअं आभिणियोहियं । ओहियनाणं तइयं, मणनाणं च केवलं ॥ ४ ॥
॥५५६॥ 'तत्र' इति तेषु ज्ञानादिषु मध्ये 'पञ्चविध पञ्चप्रकारं, किं तत्-ज्ञानं, क एते पञ्च प्रकारा इत्याह-श्रूयते तदिति श्रुतं-शब्दमात्रं, तश्च द्रव्यश्रुतमेव, यत्पुनः शब्दमाकर्णयतः खयं वा वदतः पुस्तकादिन्यस्तानि वा चक्षुरा
दीप अनुक्रम [१०७७]
44645
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||४|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सूत्रांक
|दिभिरक्षराण्युपलभमानस्य शेषेन्द्रियगृहीतं वाऽर्थ विकल्पयतोऽक्षरारूपितं विज्ञानमुपजायते तदिह भावश्रुतं श्रुतशब्देदानोक्तं, तथाऽभिमुखो योग्यदेशावस्थितवस्त्वपेक्षया नियतः स्वखविषयपरिच्छेदकतयाऽवबोधः-अवगमोऽभिनिवोधः।
स एवाभिनिबोधिक,विनयादित्वात्खार्थिकष्ठक, ओहि'त्ति अवशब्दोऽधःशब्दार्थः, ततश्चाध इत्यधस्ताद्धावति अधोऽधा विस्तृतविषयवेदकतयेत्यवधिः, औणादिको डिः, यद्वा 'अवे'त्यध एव धानं धातूनामनेकार्थत्वात्परिच्छेदोऽवधिः, 'उपसर्ग घोः कि'रिति (पा०३-३-९२)किः,अथवाऽवधिः-मर्यादा रूपियेव द्रव्येषुपरिच्छेदकतया प्रवृत्तिरित्येवंरूपा, तदुपलक्षितं ज्ञानमण्यवधिः,ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञातिर्वा ज्ञानं,ततोऽवधिश्चासौ ज्ञानं चावधिज्ञानं,तृतीयं तृतीयस्थानवर्तित्वात् , 'मणणाणं'तिमनःशब्देन द्रव्यपर्याययोः कथञ्चिदभेदात् मनोद्रव्यपर्याया गृह्यन्ते,तेषु तत्तत्सज्ञिविकल्पहेतुषु ज्ञानं मनोज्ञानं, तानेव हि मनःपर्यायज्ञानी साक्षादेव बुध्यते,न तु बाह्यान् ,अनुमानगम्यमानत्वात्तेषाम् ,उक्तं हि-"जाणति वज्झेऽणुमाणाओ"ति, 'चः' समुञ्चये भिन्नक्रमस्ततः केवलं च, तत्र केवलम्-एकमकलुपं सफलमसाधारणमनन्तं |च ज्ञानमिति प्रक्रमः, उक्तं हि-"केवलंमेगं सुद्धं सकलमसाधारण अणंतं च ।" आह-नन्यादिषु मतिज्ञानानन्तरं
श्रुतज्ञानमुक्तं तदिह किमर्थमादित एव श्रुतोपादानम् , उच्यते, शेषज्ञानानामपि खरूपज्ञानस्य प्रायस्तदधीनत्वेन दप्राधान्यख्यापनार्थमिति सूत्रार्थः । साम्प्रतं ज्ञानशब्दस्य सम्बन्धिशब्दत्वाद्येषां तज्ज्ञानं तान्यभिधातुमाह
१ जानाति बाह्याननुमानात् २ केवलमेकं शुद्धं सकलमसाधारणमनन्तं च ।
दीप अनुक्रम [१०७९]
JABERatinintamational
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||५|| नियुक्ति: [५०२...]
उत्तराध्य
बृद्धृत्तिः
प्रत
सुत्रांक
-64
||५||
एवं पंचविहं नाणं, दव्याण य गुणाण य । पञ्जवाणं च सव्वेसिं, नाणं नाणीहिं देसियं ॥५॥
मोक्षमार्ग'एतद् अनन्तरोक्तं पञ्चविधं ज्ञानं द्रवन्ति-गच्छन्ति तांस्तान् पर्यायानिति द्रव्याणि-वक्ष्यमाणलक्षणानि तेषां,
गत्य०२० 'चः तद्वतानेकमेदख्यापको, गुणानां-रूपादीनां चःप्राग्वत्, परीति-सर्वतः, कोऽर्थः -द्रव्येषु गुणेषु सर्वेष्यव-11 ॥५५७॥
|न्ति-गच्छन्तीति पर्यवास्तेषां च, 'सर्वेषाम्' अशेषाणां, केवलापेक्षया चायं द्रव्यकास्न्ये सर्वशब्दः शेषज्ञानापे-18
क्षया तु प्रकारकास्ये, प्रतिनियतपर्यायग्राहित्वात्तेषां, 'ज्ञानम् अवबोधकं 'ज्ञानिभिः' अतिशयज्ञानोपेतैः केव-12 |लिभिरितियावत् 'देशितं' कथितम् । अनेन च यदाहुः-ज्ञानं ज्ञानखरूपस्यैव ग्राहकं, बाह्याभिमतस्य वस्तुनो ज्ञाना||तिरिक्तस्यासत्त्वाद् , अत एवोक्तं-'खरूपस्य खतो गति रिति, तन्निरस्तम् , अन्तः सुखादिप्रतिभासवदहिः स्थूलप्रति
भासस्यापि खसंविदितत्वात्, न च युगपद्वेद्यमानयोरेकस्य तात्त्विकत्वमितरस्य त्वन्यथात्वमिति निमित्तं विना कल्पयितुं शक्यम् , अथैकत्राविद्योपदर्शितत्वं तत्कल्पननिमित्तं, न, यतस्तदितरत्रापि किं न कल्प्यते', निमित्तं | विना कल्पनाया उभयत्राविशेषात् , तथा च ज्ञानस्याप्यभावेन सर्वशून्यतापत्तिरित्यलं प्रसङ्गेनेति सूत्रार्थः ॥ अनेन |
५५७|| द्रव्यादिविषयत्वं ज्ञानस्योक्तं, तत्र च द्रव्यादीनि किंलक्षणानीत्यत आह
गुणाणं आसओ दवं, एगदध्वस्सिया गुणा । लक्खणं पत्रवाणं तु, उभओ अस्सिया भवे ॥६॥ 'गुणानां वक्ष्यमाणानाम् 'आश्रयः' आधारो यत्रस्थास्त उत्पद्यन्ते उत्पद्य चावतिष्ठन्ते प्रलीयन्ते च तद् द्रव्यम् ,
दीप अनुक्रम [१०८०]
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||६|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सुत्रांक
||६||
अनेन रूपादय एव वस्तु न तद्यतिरिक्तमन्यदिति तथागतमतमपास्तं, तथाहि-यदुत्पादविनाशयोन यस्योत्पादविनाशी Kान तत्ततोऽभिन्नं, यथा घटापटो, न भवतश्च पयोयोत्पाद विनाशयोव्यस्योत्पादविनाशी, न चायमसिद्धो हेतुः, ट्र स्थासकोशकुशूलाद्यवस्थासु मृदादिद्रव्यस्यानुगामित्वेन दर्शनात् , न चास्य मिथ्यात्वं, कदाचिदन्यथादर्शनासिद्धेः,
उक्तं हि-"यो ह्यन्यरूपसंवेद्यः, संवेद्येतान्यथा पुनः । स मिथ्या न तु तेनैव, यो नित्यमवगम्यते ॥१॥” तथैकस्मिन् द्रव्ये स्वाधारभृते आश्रिताः-स्थिता एकद्रव्याश्रिताः, के ते?-'गुणाः' रूपादयः, एतेन च ये द्रव्यमेवेच्छन्ति तब-11 तिरिक्तांश्च रूपादीनविद्योपदर्शितानाहुस्तम्मतनिषेधः कृतः, संविनिष्ठा हि विषयव्यवस्थितयो, न च रूपाद्युत्कलितरूपं कदाचित्केनचिद् द्रव्यमवगतमवगम्यते वा, अथ तद्विवर्त एव रूपादयो न तु तात्त्विकाः केचन तद्भेदेन | सन्ति, नन्येवं रूपादिविषत्तों द्रव्यमित्यपि किंन कल्प्यते ?, अथ तथैव प्रतीतेः, एवं सति प्रतीतिरभयत्र साधारणे-14 त्युभयमुभयात्मकमस्तु, लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणं 'पर्यवाणां' वक्ष्यमाणरूपाणां 'तुः' विशेषणे 'उभयोः' द्वयोः प्राकृत-1 त्वाद् द्रव्यगुणयोराश्रिताः भवेत्ति 'भवेयुः' स्युः । अनेन च य एवमाहुः-यदाद्यन्तयोरसत् मध्येऽपि तत्तथैव, यथा : मरीचिकादौ जलादि, न सन्ति च कुशूलकपालाद्यवस्थयोर्घटादिपर्यायाः, ततोद्रव्यमेवादिमध्यान्तेषु सत्, पर्यायाः पुनरसत्यैराकाशकेशादिभिः सदृशा अपि भ्रान्तः सत्यतया लक्ष्यन्ते, यथोक्तम्-"आदावन्ते च यन्नास्ति, मध्येऽपि हि न तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः॥१॥" तेऽपाकृताः, तथाहि-आद्यन्तयोरसत्त्वेन में
दीप अनुक्रम [१०८१]
का wwjandiarary.om
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||६|| नियुक्ति: [५०२...]
**
मोक्षमार्ग
बृहद्वृत्तिः
गत्य०२८
प्रत
सुत्राक
||६||
उत्तराध्यामध्येऽप्यसत्त्वं साधयतामिदमाकूतं यत्कचिदसत्तत्सर्वस्मिन्नसदिति, ततश्च मृद्रव्येऽप्यद्रव्यस्यासत्वात्सर्वस्मिन्नप्यस
वप्रसङ्गः, अथेष्टमेवैतत् , सत्तामात्रस्यैव तत्त्वत इष्टत्वात् , उक्तं हि-"सर्वमेकं सदविशेषात्" नन्वेवमभावे भावा
भावाद्भावस्थापि सर्वत्राभावप्रसङ्गः, तस्माद्वाधकप्रत्ययोदय एवासत्त्वे निवन्धनमिति न कचिदसरवे तस्यावश्यंभावः, १५५८॥ ततो द्रव्यवत्पर्यायाणामप्यबाधितबोधविषयत्वे सत्त्वमस्तु, तथा गुणेष्वपि नवपुराणादिपर्यायाः प्रत्यक्षप्रतीता एव
कियत्कालभाविनः,प्रतिसमयभाविनस्तु पुराणत्वाद्यन्यथानुपपत्तेरनुमानतोऽवसीयन्ते,ततश्च द्रव्यगुणपर्यायात्मकमेकं शबलमणिवचित्रपतकादिवद्वा चस्त्विति स्थितमिति सूत्रार्थः ॥ आह-गृह्णीमो 'गुणानामाश्रयो द्रव्य'मिति द्रव्यलक्षणं, तचैवलक्षणं द्रव्यं किमेकमेवोत तस्य भेदा अपि सन्तीत्याह
धम्मो अधम्मो आगासं, कालो पुग्गलजंतवो। एस लोगुत्ति पन्नत्तो. जिणेहिं वरदंसिर्हि ॥७॥ ___ 'धर्म' इति धर्मास्तिकायः 'अधर्म' इत्यधर्मास्तिकायः 'आकाश'मित्याकाशास्तिकायः 'कालः' अद्धासमयात्मकः | 'पुद्गलजन्तव'इति पुद्गलास्तिकायः जीवास्तिकायः, एतानि द्रव्याणीति शेषः, प्रसङ्गतो लोकखरूपमप्याहएप इत्यादि, सुगममेव, नवरमेप इति-सामान्यतः प्रतीतो लोक इतीरोपंखरूपः, कोऽथेः अनन्तरोक्त-I द्रव्यषट्कात्मकः, उक्तं हि-“धर्मादीनां वृत्तिव्याणां भवति यत्र तत्क्षेत्रम् । तैर्द्रव्यैः सह लोकस्तद्विपरीतं बलोकाख्यम् ॥१॥” इति सूत्रार्थः ॥ आह-किमेतेऽपि धर्मादयो भेदवन्त उतान्यथा ?, उभयथाऽपीति ब्रूमः, तथा चाह
दीप अनुक्रम [१०८१]
॥५५८॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||८|| नियुक्ति : [५०२...]
CASS
प्रत
सुत्रांक
||८||
धम्मो अधम्मो आगासं, दव्वं इकिकमाहियं । अणंताणि य वाणि, कालो पुग्गलजंतवो ॥८॥ धर्मोऽधर्म आकाशं द्रव्यमिति धर्मादिभिः प्रत्येकं योज्यते 'एकैक' एकसङ्ख्याया एवैतेषु भावान् आख्यातं तीर्थकृद्भिरिति गम्यते, तरि कालादिद्रव्याण्यप्येवमेवेत्याह-'अनन्तानि' अनन्तसङ्ख्यानि खगतभेदानन्त्यात्, 'च' पुनरर्थे उत्तरत्र योक्ष्यते, कानि', द्रव्याणि, कतमानि-कालः पुगलजन्तवश्वोक्तरूपाः, कालस्य चानन्त्यमतीता-1 नागतापेक्षयेति सूत्रार्थः ॥ एषां परस्परभेदनिवन्धनं लक्षणभेदमाह| गइलक्षणो उ धम्मो, अहम्मो ठाणलक्खणो । भायर्ण सव्वदब्वाणं, नहं ओगाहलक्खणं ॥९॥ वत्तणालक्खणो कालो, जीवो उवओगलक्खणो। नाणेणं दसणेणं च, सुहेण य दुहेण य॥१०॥ नाणं च दंसणं चेव, चरितं च तवो तहा। वीरियं उवओगे य, एवं जीवस्स लक्खणं ॥११॥ सधयारउजोओ, पभा छाया तवुत्ति वा । वण्णरसगंधफासा, पुग्गलाणं तु लक्खणं ॥१२॥
गमनं गतिः-देशान्तरप्राप्तिः लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणं, गतिर्लक्षणमस्येति गतिलक्षणः, 'तुः' पूरणे, कोऽसौ ?धर्मास्तिकायः, आह-सिद्धे सति वस्तुनोऽस्तित्वे इदमनेन लक्ष्यत इति वक्तुं युक्तम् , अस्य तु सत्त्वमेवासिद्धम् , अत्रोच्यते, यद्यच्छुद्धपदवाच्यं तत्तदस्ति, यथा स्तम्भादिः, शुद्धपदवाच्यश्च धर्मनामास्तिकायो, न चायमसिद्धो हेतुः, धर्म इत्यस्यैतद्वाचकस्यासमस्तपदत्वेन तथाऽभिधेयार्थबाधकप्रमाणाभावात् प्रमाणान्तरवाधितविषयत्वाख्यदोषरहि
दीप अनुक्रम [१०८३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], ____मूलं [-1 / गाथा ||९-१२|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सूत्रांक
||९-१२||
उत्तराध्य तत्वेन च सिद्धत्वात्, न च खपुष्पादिषु सङ्केतितैर्दुःखादिशुद्धपदैरनेकान्तो, वृद्धपरम्परायातसतविषयाणामेव मोक्षमार्गबृहद्वृत्तिः शुद्धपदाना वाच्यत्वस्येह हेतुत्वेनेष्टत्वात् , निपुणेन प्रतिपत्रा भाव्यम् , अन्यथा धूमादेरपि गोपालघटादिग्वन्यथा
मारवागत्य०२८ भावदर्शनादेष प्रसङ्गो दुर्निवारः स्यात् , उकंच-"अथिति निवियप्पो जीयो नियमा उ सद्दतो सिद्धी। कम्हा? ॥५५९||
सुद्धपयत्ता घडखरसिंगाणुमाणाओ॥१॥" इत्यायलं प्रसङ्गेन, तथा 'अधर्मः' अधर्मास्तिकायः स्थितिः स्थानं गतिनिवृत्तिरित्यर्थः, तलक्षणमस्येति स्थानलक्षणः, स हि स्थितिपरिणतानां जीवपुद्गलानां स्थितिलक्षणकार्य प्रत्यपेक्षाकाकारणत्वेन व्याप्रियत इति तेनैव लक्ष्यत इत्युच्यते, अनेनाप्यनुमानमेव सूचितं, तवेदम्-यद्यत्कार्य तत्तदपेक्षाकारण
बद्, यथा घटादि, कार्य चासौ स्थितिः, यच तदपेक्षाकारणं तदधर्मास्तिकाय इति, अत्र च नैयायिकादिः सौगतो* वा वदेत्-नास्ति अधर्मास्तिकायः,अनुपलभ्यमानत्वात् , शशविपाणवत्, तत्र यदि नैयायिकादिस्तदाऽसौ वाच्यः-कथं भवतोऽपि दिगादयः सन्ति ?, अथ दिगादिप्रत्ययलक्षणकार्यदर्शनाद , भवति हि कार्यात्कारणानुमानम् , एवं सति || स्थितिलक्षणकार्यदर्शनादयमप्यस्तीति किन गम्यते ?, अथ तत्र दिगादिप्रत्ययकार्यस्पान्यतोऽसम्भवात्कारणभूतान् |दिगादीननुमिमीमह इति मतिः,इहाप्याकाशादीनामवगाहदानादिस्खखकार्यव्यापृतत्वेन ततोऽसम्भवादधर्मास्तिकायस्यैव स्थितिलक्षणं कार्यमिति किं नानुमीयते ?, अथासौ न कदाचिद् दृष्टः, एतहिगादिष्वपि समानम् । अथ सौगतः १ असीति निर्विकल्पो जीवो नियमात् शब्दत एव सिद्धिः । कस्मात् ? शुद्धपदत्वात् घट खरशङ्गानुमानात् ।। १ ।।
दीप
अनुक्रम [१०८४-१०८७
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||९-१२|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक ||९-१२||
सोऽप्येवं वक्तव्यः यथा-भवतः कथं बाधासंसिद्धिः, न हि कदाचिदसौ प्रत्यक्षगोचरः, साकारज्ञानवादिनः सदा तदाकारस्यैव संबेदनात् , तथा च तस्याप्यनुपलभ्यमानत्वादभाव एव, अथाकारसंवेदनेऽपि तत्कारणमर्थः परिकरूप्यते, धूमज्ञान इवामिः, एवं सति स्थितिदर्शनेऽपि किं न तत्कारणस्थाधर्मास्तिकायस्य निश्चयः१, अथायमप्यमिदधीत-न कदाचिदसौ तत्कारणत्वेनेक्षित इति, ननु बाह्यार्थेऽपि तुल्यमेतत्, न हि सोऽपि तदाकारकारितया कदाचिदवलोकितः,अथ मनस्कारस्य चिद्रूपतायामेव व्यापारो न तु नियता(त)कारणत्वे,अतस्तत्रार्थः कारणं कल्प्यते, एवं तर्हि जीवपुगलौ परिणाममात्र एव कारणं, स्थितिपरिणती पुनरधर्मास्तिकायोऽपेक्षाकारणत्वेन व्याप्रियत इति किंन कल्प्यते ?, अथासौ सर्वदा सर्वस्य सन्निहित इत्यनियमेन स्थितिकारणं भवेत् , नन्वेवमर्धोऽपि किं सन्निहित इत्येव खाकारमर्पयति !, अथ चक्षुरादिव्यापारमयमपेक्षते, अधर्मास्तिकायोऽपि तर्हि खपरगती विश्रसाप्रयोगावपेक्षत इति नानयोर्विशेषमुत्पश्यामः, तथा 'भाजनम्' आधारः 'सर्वद्रव्याणां' जीवादीनां नमः' आकाशम् , अब
गाहः-अवकाशस्तलक्षणमस्येत्यवगाहलक्षणं तयवगाढुं प्रवृत्तानामालम्बनीभवति, अनेनावगाहकारणत्वमाकाशदस्योक्त, न चास्य तत्कारणत्वमसिद्ध, यतो यद्यदन्वयन्यतिरेकानुविधायि तत्तत्कार्य, यथा चक्षुराद्यन्वयव्यतिरेकानु
विधायि रूपादिविज्ञानम् , आकाशान्वयन्यतिरेकानुविधायी चावगाहः, तथाहि-शुषिररूपमाकाशं, तत्रैव चावगाहो.॥ न तु तद्विपरीते पुद्गलादौ, अथैवमलोकाकाशेऽपि कथं नावगाहः, उच्यते, स्वादेवं यदि कश्चिदवगाहिता भवेत्,
दीप
अनुक्रम [१०८४-१०८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||९-१२|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
||९-१२||
उत्तराध्य. तत्र तु धर्मास्तिकायस्य जीवादीनां चासत्त्वेन तस्यैवाभाव इति कस्यासी समस्तु , नन्वेवमपि न तसिद्धिा, देतो-15 मोक्षमार्ग
रसिद्धत्वात् , तदसिद्धिश्चान्वयाभावात् , सति हि तस्मिन् भवनमन्वयो, न च तत्सत्त्वसिद्धिरस्ति, अन्वयाभावे ।
च व्यतिरेकस्याप्यसिद्धिरिति, ननु कथं न तत्सत्त्वसिद्धिः?, अथ भित्त्याद्यभाव एवाकाशमिति, एवं सत्याकाशा-5 ॥५६॥|8|भाव एव भित्त्यादय इत्यपि किं न भवति ?, अथ तेषां प्रमाणप्रतीतत्वादू, इहापि किं न प्रमाणप्रतीतिः, तथा
हि-वियति विहग इत्यादि प्रतीत्यन्यथानुपपत्त्याऽनुमानतस्तत्सिद्धिः, न चेयं प्रतीतिरन्यथाऽपि संभवतीति । न ततस्तत्सिद्विरिति (वक्तुं) युक्तम् , एवं हि भित्त्यादिप्रतीतेरपि भिच्याद्यभावेऽपि भावकल्पनया तेषामप्यभा
वप्रसक्तिः, अथ तत्प्रतीतेः प्रामाण्य निश्चय इति नान्यथात्वकल्पना, एवं तर्हि वक्तव्यं-कुतोऽस्याः प्रमाणनिदाश्चयः, किं प्रमाणान्तरानुग्रहाद्वाधकाभावाद्वा, यदि प्रमाणान्तरानुग्रहात् किं तत्प्रमाणान्तरं, य इहावाधि-13
तप्रत्ययः स सर्वःप्रमाणं, यथा सुखादिप्रत्ययः, बाधितप्रत्ययाश्चामी भित्यादिप्रत्यया इत्यनुमानमिति चेयद्येवमिहापि यो य इहप्रत्ययः स सर्वः सालम्बनो यह कुण्डे दधीति प्रत्ययः, इहप्रत्ययश्चायम् इह विहग इति प्रत्ययः इत्यनुमानमस्त्येव, अर्थवमाधारमात्रस्यैष सिद्धिर्नत्वाकाशस्य, कथं न तसिद्धिः, यदेव साधारमात्रं तदेवाकाश-11॥५५॥ |मिति वयं ब्रूमः, अथ वाधकाभावात्, ननु वाधकमपि विपरीतप्रत्ययोत्पत्तिरूपं, तदभावक्षोभयत्र समान इति न काभित्याद्यभाव एवाकाशं किन्तु शुषिररूपमन्यदेव,ततस्तद्भावमाविवादवगाहस कथं न तत्कारणत्वसिद्धिराकाशस्य ?,
दीप
अनुक्रम [१०८४-१०८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||९-१२||
दीप
अनुक्रम
[१०८४
-१०८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||९-१२ || निर्युक्ति: [५०२...]
अध्ययनं [२८],
| एवं च स्थितमेतद्- अवगाहेन कार्यरूपेण लक्ष्यमाणत्वादवगाहलक्षणं नमः, तथा वर्त्तन्ते भवन्ति भावास्तेन तेन रूपेण तान् प्रति प्रयोजकत्वं वर्त्तना सा लक्षणं-लिङ्गमस्येति वर्त्तनालक्षणः, कोऽसौ ? - कालः, इदमुक्तं भवति-यदमी शीतवातातपादयः ऋतुविभागेन भवन्ति यच केचिच्छंशधरकर निकरानुकारिपारतीप्रसवाः अन्ये तु तुहिनशिलाशकलविशदकुन्दमालतीकुसुमवासवाहिनः अपरे च केशरतिलकुरुन कशिरीषाकोलप्रसूनजृम्भमाणपरागभाजः तदितरे च करिदशनसकलधवलमल्लिकापहलपरिमलहारिणः परे च कदम्बकेतकरजःपूरपूरिताम्बराः अपरे तु सप्तच्छदकुसुमरजोधूलिधूसरितविश्वविश्वम्मराः अविशिष्टविशिष्टवस्तवः प्रकाशन्ते क्रमेणैव भुवनभागांस्तदवश्यममीषां नैयत्यहेतुना केनापि भवितव्यं स च काल इत्यलं प्रसङ्गेन, सर्वथा वर्त्तनया लक्ष्यमाणत्वादस्ति काल इति स्थितं तथा 'जीवः' जन्तुरुपयोगो-मतिज्ञानादि लक्षणं - रूपं यस्यासौ उपयोगलक्षणो, मतिज्ञानादिको छुपयोगस्तद्धर्मः, स च स्वसंविदित एवेति, तदनुभवतो रूपाद्यनुभवादिव घटादिर्जीवो लक्ष्यत इति तलक्षणमुच्यते, प्रपञ्चितं चैतदिहैव प्रागन्यत्र चेति न पुनः प्रतन्यते, अत एव 'ज्ञानेन' विशेषप्राहिणा 'दर्शनेन च' सामान्यविषयेण 'सुखेन च' आहादरूपेण दुःखेन च तद्विपरीतेन प्रक्रमाल्लक्ष्यत इति गम्यते, न हि ज्ञानादीन्यजीवेषु कदाचिदुपलभ्यन्त इतिकृत्वा । | सम्प्रति विनेयानां दृढतरसंस्काराधानाय उक्तलक्षणमनूध लक्षणान्तरमाह-'ज्ञानं च' उक्तरूपमेवं दर्शनं चैव चरित्रं च तपस्तथा 'वीर्य' वीर्यान्तरायक्षयोपशमसमुत्थं सामर्थ्यलक्षणम् 'उपयोगच' अवहितत्वं किमित्याह-'एतत्' ज्ञानादि
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||९-१२|| नियुक्ति: [५०२...]
ब्रहद्वृत्तिः
प्रत
सूत्रांक
||९-१२||
उत्तराध्य. जीवस्य लक्षणम्, एतेन हि जीवोऽनन्यसाधारणतया लक्ष्यत इति । इत्थं जीवलक्षणमभिधाय पुद्गलानां लक्षण- मोक्षमार्ग
माह-शब्दः' ध्वनिः 'अन्धकारः' तिमिरम् , उभयत्र सूत्रत्वात्सुपो लुक्, 'उद्योतः' रत्नादिप्रकाशः 'प्रभा' चन्द्रा-||४|| दिदीधितिः 'छाया' शैत्यगुणाः 'आतपः' रविविम्बजनित उष्णप्रकाशः, इतिशब्द आद्यर्थः, ततश्च सम्बन्धभेदा
गत्य०२८ ॥५६॥४॥ दीनां परिग्रहः,वा समुच्चये,वर्णश्च-नीलादिः रसश्च-तिक्तादिः गन्धश्च-सुरभ्यादिः स्पर्शश्च-शीतादिरेषां द्वन्द्वः,
इतिशब्देन चाद्यार्थेनैषां ग्रहणेऽपि पुनरुपादानं सर्वत्रानुयायिताख्यापनार्थ, "पुद्गलानां' स्कन्धादीनां 'तुः पुनरर्थः लक्षणम्, एतैरेव तेषां लक्ष्यत्वात् ,आह-पौगलिकत्वे शब्दादीनां पुद्गल लक्षणत्वं युक्तं तय कथम् ?, उच्यते,शब्दस्तावन्मूर्चत्वात्पौद्गलिको, मूर्तिमायोऽस्य प्रतिघातविधायित्वादिभ्यः,उक्तं हि-"प्रतिघातविधायित्वालोष्टवन्मूर्तता ध्वनेः। द्वारवातानुपाताच, धूमवच परिस्फुटम् ॥१॥" अन्धकारोद्योतप्रमाणां तु पौद्गलिकत्वं चक्षुर्विज्ञानविषयत्वात्, प्रयोगश्चात्र-यत्पौगलिक न भवति तच्चक्षुर्विज्ञानविषयमपि न भवति, यथाऽऽत्मादयः, चक्षुर्विज्ञानविषयाश्चान्धकारादयः, अथालोकामावोऽन्धकारं, तथा च निरुपाख्यत्वेन तस्यासत्यमुच्यते, न, सतः सर्वथा निरन्वयाभावस्थाभावेनाभावरूपत्वेऽपि निरूपाख्यत्वासिद्धेः, तथाहि-घटस्य कपालाख्यपर्यायान्तरोत्पत्तिरेवाभावो न पुनरु-14
॥५६॥ च्छेदमात्रम्, एवमलोकस्याप्यन्धकाराख्यपर्यायान्तरोत्पत्तिरेवाभावो न तु तथाविधपरमाणुरूपतयाऽप्यभाव एव, इत्थं चेतत्, परिणामित्वाद्वस्तुनः, परिणामस्य च सत एव बस्तुनः पूर्वरूपपरित्यागेन रूपान्तरोत्पत्तिरूपत्वात् ,
GANACKSOCCCCAX
दीप
अनुक्रम [१०८४-१०८७]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१३|| नियुक्ति: [५०२...]
उक्तं हि-"परिणामो बर्थान्तरगमनं न च सर्वथा व्यवस्थानम्। न च सर्वथा विनाशः परिणामस्तद्विदामिष्टः ॥१॥"
एवं छायाऽऽतपयोरपि पौगलिकत्वं वस्तुत्वं च भावनीयं, तथा स्पर्शनाखत्वाचानयोः पौगलिकत्वं, तथाहि* छायायाः शैत्यमातपस्य चोष्णत्वं प्रतिपाणि प्रतीतमेवेति, अतश्च यत्कैश्चिदुच्यते-शब्दोऽम्बरगुण इत्यादि, तदपास्त
भवति, उक्तश्च-"अणवः सर्वशक्तित्वाञदसंसर्गवृत्तयः। छायाऽऽतपस्तमः शब्दभावेन परिणामिनः ॥१॥" इत्यादि, ट्रावर्णादीनां च पौगलिकत्वं सुप्रसिद्धमेवेति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ अनेन द्रव्यलक्षणमुक्तं. पर्यायलक्षणमाह
एगत्तं च पुत्तं च, संखा संठाणमेव य । संजोगा य विभागा य, पजवाणं तु लक्वर्ण ॥ १३ ॥ एकस्य भावः एकत्वं-भिन्नेष्वपि परमाण्वादिषु यदेकोऽयं घटादिरिति प्रतीतिहेतुः सामान्यपरिणतिरूपं, चशब्द उत्तरापेक्षया समुच्चये,पृथग्भावः पृथक्त्वम्-अयमस्मात्पृथगिति प्रत्ययोपनिबन्धनं, 'चः' सर्वत्र प्राग्वत् ,संख्यानं ट्र सङ्ख्या-यत एको द्वौ त्रय इत्यादिका प्रतीतिरुपजायते, संतिष्ठतेऽनेनाकारविशेषेण वस्त्विति संस्थानं-परिमण्ड
लोऽयमित्यादिबुद्धिनिबन्धनम् , एवेति पूरणे, 'संयोगाः' अयमङ्गुल्योः संयोग इत्यादिव्यपदेशहेतवः, 'विभागाश्च' अयमितो विभक्त इति बुद्धिहेतवः, उभयत्र सम्बन्धिभेदेन भेदमाश्रित्य बहुवचननिर्देशः, चशब्दोऽनुक्तनवपुराणत्वादिपोयोपलक्षका, 'पर्यवाणाम्' उक्तनिरुक्तानां, 'तुः पूरणे 'लक्षणम्' असाधारणरूपम्, अयमभिप्राय:-यः[ कश्चिदस्खलितप्रत्ययः स सर्वः सनिवन्धनो, यथा घटादिप्रत्ययः, अस्खलितप्रत्ययाश्चामी एकोऽयमित्यादिप्रत्ययाः,
******
प्रत सूत्रांक ||१३||
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दीप अनुक्रम [१०८८]
*
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||१४-१५|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक
||१४
-१५||
उत्तराध्य. ततोऽवश्यममीषां निवन्धनेन भवितव्यं, तच्च न द्रव्यमेव, तस्य सदाऽवस्थितत्वेन प्रतिनियतकालैकत्यादिप्रत्यया-1 मोक्षमार्गनुत्पत्तिप्रसङ्गात्, ततश्च यदमीषां कालनियमेनोत्पत्तिनिवन्धनं न तत्पर्यवेभ्यस्तत्तत्परिणतिविशेषरूपेभ्योऽन्यत्,
BIPगत्य०२८ गुणानां तु लक्षणानभिधानं रूपादिरूपाणां तेषामतिप्रतीतत्वात् प्रायो विप्रतिपत्त्यविषयत्वाचेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं ॥५२॥ खरूपतो विषयतश्च ज्ञानमभिधाय दर्शनमुपदर्शयितुमाह
जीवा जीवा य बंधो य, पुण्णं पावाऽऽसवो तहा । संवरो निचरा मुक्खो , संतेए तहिया नव ॥१४॥
तहियाणं तु भावाणं, सम्भावे उवएसणं । भावेण सहस्तस्स, सम्मत्तं ति वियाहियं ॥ १५॥ 'जीवाः' उक्तलक्षणाः 'अजीवाश्च' धर्मास्तिकायादय उक्तरूपा एवं 'बन्धच' जीवकर्मणोरत्यन्तसंश्लेषः पुण्य-शुभप्रकृतिरूपं पापम्-अशुभं मिथ्यात्वादि आश्रवति-आगच्छत्यनेन कर्मेत्याश्रवः-कर्मोपादानहेतुहि||सादिः, पुण्यादीनां च कृतद्वन्द्वानामिह निर्देशः, 'तथेति समुच्चये, संवरणं संवरः-गुत्यादिभिराश्रयनिरोधः
निर्जरणं निर्जरा-विपाकात्तपसो वा कर्मपरिसाटः, 'मोक्षः कृत्स्नकर्मक्षयात्वात्मन्यवस्थानं, 'सन्ति' विद्यन्ते 'एते' ॥५६॥ अनन्तरोक्ताः 'तथ्याः' अवितथा निरुपचरितवृत्तयो, न तु सुगतसालयोलूकादिकल्पितपदार्थवद्विचाराक्षमाः, यथा चैतदेवं तथा सूत्रकृन्नानि द्वितीयाङ्गे अपश्चितमिति तत एवावधार्यम् , इह तु ग्रन्थगौरवभयानोच्यते, 'नवे'ति नवसङ्ख्याः, मध्यमप्रस्थानापेक्षया चैतद्, अन्यथा स पापेक्षया जीवाजीवयोरेव बन्धादीनामन्तर्भावसम्भवात् द्वित्व
दीप अनुक्रम [१०८९-१०९०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१४-१५|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सूत्रांक
||१४-१५||
सङ्ख्यैचाभिधेया स्यात् , तथा च वक्ष्यति-"जीवा चेव अजीवा य, एस लोगे बियाहिए"त्ति, विस्तरतस्तु तदुत्तरो
त्तरभेदविवक्षयाऽनन्तमेव स्यात् । यद्यमी नव तथ्यास्ततः किमित्याह-'तथ्यानां तु भावानाम्' अनन्तरोदितजीवाददिखरूपाणां 'सद्भावे' सद्भावविषयं, किमुक्तं भवति ?-एतदवितथसत्ताभिधायकम् 'उपदेशनं' गादिसम्बन्धिनम
पदेशं 'भावेन' अन्तःकरणेन 'श्रद्दधतः' तथेति प्रतिपद्यमानस्य सम्यग्भावः सम्यक्त्वं दर्शनमितियावत् 'तदिति भाषश्रद्धानं विशेषेणाख्यातं तीर्घकदादिभिरिति गम्यते,पठन्ति च-'सम्भावो(वेणो)वएसणे। भावेण उ सद्दहणा सम्मत्तं होति आहि' 'सद्दहणे ति सूत्रत्वात् श्रद्धानं सम्यक्त्वं भवत्याख्यातं, तच श्रधात्यनेन जीवादितत्त्वमिति श्रद्धानंसम्यक्त्यमोहनीयकर्माणुक्षयक्षयोप(शमोप) शमसमुत्थात्मपरिणामरूपम् , उक्तं हि-"से य समत्ते पसत्थसम्मत्तमोहणीयकम्माणुवेयणोवसमखयसमुत्थे पसमसंवेगाइलिंगे सुहे आयपरिणामे पण्णत्ति"त्ति, अवश्यं हि स कश्चिदात्मनः परिणामोऽस्ति येन सत्यपि जीवादिखरूपावबोधे कस्यचिदेव सम्यक् प्रतिपत्तिर्भवति न पुनः सर्वस्य, यथा हिं सत्यपि दर्शने कश्चित् शङ्के वेतिमानं प्रतिपद्यते अन्यस्त्वन्यथाभावमिति तत्र कारणविशेषोऽनुमीयते, एवमिहापि, ततश्च जीवादिखरूपपरिज्ञानख सम्यग्भावहेतुरात्मपरिणामविशेषः सम्यक्त्वं, न तु ज्ञानखरूपमेव, अत एव हि ज्ञानादावरणभेदो विषयभेदः कारणभेदो ज्ञानकारणत्वं च सम्यक्त्वस्य श्रुतकेवलिनोकं, यत्तु 'तत्त्वार्थश्रद्धानं
१ तश्च सम्यक्त्वं प्रशस्तसम्यक्त्वमोहनीयकर्माणुवेदनोपशमश्यसमुत्थः प्रशमसंवेगादिलिङ्गः शुभ आत्मपरिणामः प्राप्तः ।
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दीप अनुक्रम [१०८९-१०९०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१६|| नियुक्ति: [५०२...]
......
गत्य०२८
प्रत सूत्रांक ||१६||
उत्तराध्य. सम्यग्दर्शनमपायसद्रव्यतया सम्यग्दर्शनमपायो मतिज्ञानतृतीयांश' इत्यादि तत्कारणे कार्योपचारं कृत्वाऽऽयुर्घत-12 मोक्षमार्गबृहद्वृत्तिः
मित्यादिवदिति गुरवो व्याचक्षत इति सूत्रद्वयार्थः ॥ इत्थं सम्यक्त्वखरूपमभिधाय तद्भेदानाह
निस्सग्गुवएसई आणारुइ सुत्तबीयरुइमेव । अभिगमवित्थारई किरिया संखेषधम्मई ॥१६॥ ॥५६३॥ "निसग्गुवएसरुति'त्ति रुचिशब्दः प्रत्येकं योज्यते, ततो निसर्गः-खभावस्तेन रुचिः-तत्त्वाभिलाषरूपाउखेति
|निसर्गरुचिः, उपदेशो-गुदिना कथनं तेन रुचिर्यस्वेत्युपदेशरुचिः, आज्ञा-सर्वज्ञवचनात्मिका तया रुचिर्यस्य सः मातथा, 'सुत्तबीयरुइमेव'त्ति इहापि रुचिशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धात् सूत्रेण-आगमेन रुचिर्यस्य स सूत्ररुचिः, बीज-II मिव बीज-यदेकमप्यनेकार्थप्रबोधोत्पादकं वचस्तेन रुचिर्यस्य स बीजरुचिः, अनयोः समाहारद्वन्द्वः, एवेति । समुच्चये, अभिगमो-ज्ञानं विस्तारो-व्यासस्ताभ्यां, प्रत्येकं रुचिशब्दो योज्यते, ततोऽभिगमरुचिविस्ताररुची इति, तथा क्रिया-अनुष्ठानं सङ्केपा-सङ्ग्रहो धर्म:-श्रुतधर्मादिस्तेषु रुचिर्यस्येति, प्रत्येकं रुचिशब्दसम्बन्धात् क्रियारुचिधर्मरुचिः सङ्केपरुचिश्च भवति विज्ञेय इति शेषः, यच्चेह सम्यक्त्वस्थ जीवानन्यत्वेनाभिधानं तद्गुणगुणिनोः कथचिदनन्यत्वख्यापनार्थमिति सूत्रसङ्केपार्थः ॥ व्यासार्थ तु खत एवाह सूत्रकृत्
P ॥५६॥ भूअत्थेणाहिगया जीवाऽजीवा य पुण्ण पावं च । सहसंमुइआ आसवसंवरु रोएइ उ निसग्गो ॥१७॥ जो जिणदिढे भावे चउब्विहे सद्दहाइ सयमेव । एमेव नन्न हत्ति य निस्सग्गरुइत्ति नायब्वो ॥१८ ।। एए चेव
दीप अनुक्रम [१०९१]
Siwanmorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१७-२७|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक ||१७
SAX
-२७||
उभाये उवा जो परेण सहा । छउमत्येण जिणे व उवएसरुइत्ति नायब्यो॥१९॥ रागो दोसो मोहो अन्नाणं
जस्स अवगर्य होइ । आणाए रोयंतो सो खलु आणारुईनाम ।। २०॥ जो सुत्तमहिजंतो सुएण ओगाहई Cउ संमत्तं । अंगण बाहिरेण व सो सुत्तरुइसि नायब्वो ॥ २१ ॥ एगेण अणेगाई पयाई जो पसरई जा
सम्मत् । उदयव्य तिल्लविंदू सो बीयरुइत्ति नायब्चो ॥२२॥ सो होइ अभिगमई सुअनाणं जस्स अत्यओ | दिह । इकारस अंगाई पइण्णगं दिडिवाओ य ।। २३ ॥ ब्वाण सव्वभावा सव्वपमाणेहिं जस्स उवलद्धा । दिसम्बाई नपविहीहि य विधाररुइसि नायब्वो ॥ २४ ॥ दंसणनाणचरिते तवविणए सच्चसमिइगुत्तीसु || IIजो किरियाभावई सो खल किरियाई नाम ॥ २५॥ अणभिग्गहियकुदिही संखेवरुइत्ति होइ नायब्वो। 18 अविसारओ पवयणे अणभिग्गहिओ अ सेसेसु ॥२६॥ जो अधिकायधम्म सुपधम्म खलु चरित्तधम्म
च । सद्दहइ जिणाभिहियं सो धम्मरुइत्ति नायब्वो ॥ २७ ॥ है भूतः सद्भूतोऽवितथ इतियावत् तथाविधोऽर्थो-विषयो यस्य तद्भूतार्थ ज्ञानमिति गम्यते तेन, भावप्रधानत्वाद्वा निर्देशः(स्य), भूतार्थत्वेन-सद्भूता अमी अर्था इत्येवंरूपेणाभिगता अधिगता बापरिच्छिन्ना येनेति गम्यते, जीवाजीवाश्चोक्तरूपाः पुण्यं पापं च, कथममी अधिगता इत्याह-'सहसंमुइओत्ति सोपस्कारत्वात्सूत्रत्वाच सहात्मना या संगता मतिः सं(सहसं)मतिः, कोऽर्थः ?-परोपदेशनिरपेक्षतया जातिस्मरणप्रतिभादिरूपया, 'आसवसंबरे यत्ति
दीप अनुक्रम [१०९२ -११०२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-1 / गाथा ||१७-२७|| नियुक्ति: [५०२...]
मोक्षमार्ग
-
प्रत सूत्रांक
||१७
-२७||
उत्तराध्य. आश्रवसंवरौ, चशब्दोऽनुक्तवन्धादिसमुचये, ततो बन्धादयश्च, तथा 'रोचते'श्रद्धत्ते, तुशब्दस्यैवकारार्थत्वाद्रोचत एव | बृहद्वृत्तिः योऽन्यस्याश्रुतत्वादनन्तरन्यायेनाधिगतान् जीवाजीवादीनेव 'निसर्ग'इति निसर्गरुचिर्विज्ञेयः, स इति शेषः । अमुमे
गत्य०२८ वार्थ पुनः स्पष्टतरमेवाह-यः 'जिनदृष्टान् तीर्थकरोपलब्धान् 'भावान् जीवादिपदार्थान् 'चतुर्विधान' द्रव्यक्षेत्रकाल॥५६॥||भावभेदतो नामादिभेदतो वा चतुष्प्रकारान् श्रद्दधाति' तथेति प्रतिपद्यते 'खयमेव' परोपदेशं विना,श्रद्धानोलेखमाह
एमेय'त्ति एवमेतद्यथा जिनदृष्टं जीवादि, 'नान्यथेति' नैतविपरीतं,'चः' समुच्चये,स ईनिसर्गरुचिरिति ज्ञातव्यः,निसर्गेण रुचिरस्पेतिकृत्वा,उपदेशरुचिमाह-एतांश्चैवानन्तरोक्तान (तुः पूरणे) भावान्' जीवादीन् पदार्थान् 'उपदिष्टान्' कथितान् ‘परेण' अन्येन श्रद्दधाति, कीरशा परेण ?-छादयतीति छद्म-घातिकर्मचतुष्टयं तत्र तिष्ठति छबस्था-12 |अनुत्पन्न केवलस्तेन, जयति रागादीनिति जिनः,औणादिको नक् तेन चोत्पन्नकेवलज्ञानेन तीर्थकदादिना, छद्मस्थस्य तु प्रागुपन्यासस्तत्पूर्वकत्वाजिनस्य प्राचुर्येण वा तथाविधोपदेष्टुणां, स ईक किमित्याह-उपदेशरुचिरिति ज्ञातव्यः उपदेशेन रुचिरस्येति हेतोः । आज्ञारुचिमाह-रागः' अभिष्वङ्गः 'द्वेषः' अप्रीतिः 'मोह' शेषमोहनीयप्रकृतयः 'अज्ञानं मिथ्याज्ञानरूपं यस्य 'अपगतं' नष्टं भवति, सर्वथा चास्यैतदपगमासम्भवाद्देशत इति गम्यते, अपगतशब्दश्च लिम-18॥५९४॥ विपरिणामतो रागादिभिः प्रत्येकमभिसंबध्यते. एतदपगमाच 'आणाए'त्ति अवधारणफलत्वाद्वाक्यस्य आज्ञयेव आचार्यादिसम्बन्धिन्या रोचमानः' क्वचित्कुग्रहाभावाज्जीवादि तथेति प्रतिपद्यमानो माषतुषादिवत् सः 'खलु'|
दीप अनुक्रम [१०९२ -११०२]
%ALA
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१७-२७|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक ||१७
-२७||
निश्चितमाज्ञारुचिर्नामेत्यभ्युपगमे, ततश्चाज्ञारुचिरित्यभ्युपगन्तव्यः, आज्ञया रुचिरस्य यतः। सूत्ररुचिमाह-यः ट्रा 'सूत्रम्' आगमम् 'अधीयानः' पठन् 'श्रुतेन' इति सूत्रेणाधीयमानेन 'अवगाहते' प्राप्नोति 'तुः' पूरणे सम्यक्त्वं,||
कीशा श्रुतेन ?-'अङ्गेन' आचारादिना 'वाटेन' अनप्रविष्टेनोत्तराध्ययनादिना वा, या विकल्पे, 'सः' उक्तका लक्षणो गोविन्दवाचकवत् सूत्ररुचिरिति ज्ञातव्यः, सूत्रहेतुकत्वादस रुचेः। बीजरुचिमाह-'एकेन' प्रक्रमात्पदेन
जीवादिना 'अणेगाइं पयाईति सुव्यत्ययाद् ‘अनेकेषु' बहुषु 'पदेषु' जीवादिषु यः 'प्रसरति' व्यापितया गच्छति |x/ 'तुः' एवकारार्थः, प्रसरत्येव, सम्यक्त्वमित्यनेन रुचिरत्रोपलक्षिता, तदभेदोपचारादात्माऽपि सम्यक्त्वमुच्यते, &
उपचारनिमित्तं च रुचिरूपेणैवात्मना प्रसरणं, केव कः प्रसरति ?-उदक इव तैलबिन्दुः, यथोदकैकदेशगतोऽपि तिलविन्दुः समस्तमुदकमाक्रामति (प्रन्धानम् १४०००) तथा तत्त्वैकदेशोत्पन्नरुचिरप्यात्मा तथाविधक्षयोपशम-|| वशादशेषतत्वेषु रुचिमान् भवति, स एवंविधो वीजरुचितिव्यः, यथा हि बीजं क्रमेणानेकवीजानां जनकमेवमस्यापि रुचिर्विषयभेदतो भिन्नानां रुच्यन्तराणामिति । अभिगमरुचिमाह-स भवत्स भिगमरुचिः श्रुतज्ञानं येना
र्थ्यत इत्यर्थः-अभिधेयस्तमाश्रित्य 'दृष्टम्' उपलब्ध, किमुक्तं भवति ?-येन श्रुतज्ञानस्वार्थोऽधिगतो भवति, किं (पुनस्तत् श्रुतज्ञानमित्याह-एकादशाङ्गानि आचारादीनि, प्रकीर्णकमिति जातावेकवचनं, ततः 'प्रकीर्णकानि' उत्त
राध्ययनादीनि 'दृष्टिवादः' परिकर्मसूत्रादि, अङ्गत्वेऽपि पृथगुपादानमस्य प्राधान्यख्यापनार्थ, चशब्दादुपाङ्गान्यो-It
दीप अनुक्रम [१०९२ -११०२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
॥१७
-२७||
दीप
अनुक्रम
[१०९२
-११०२]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५६५॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१७-२७|| निर्युक्तिः [५०२...]
अध्ययनं [२८],
पपातिकादीनि, अभिगमान्वितत्वादस्य रुचेः । विस्ताररुचिमाह-'द्रव्याणां' धर्मास्तिकायादीनां 'सर्वभावाः एकत्वपृथक्त्वाद्यशेषपर्यायाः 'सर्वप्रमाणैः' अशेषैः प्रत्यक्षादिभिर्यस्योपलब्धा-यस्य यत्र व्यापारस्तेनैव प्रमाणेन प्रतीताः 'सङ्घाहिं' ति 'सर्वैः' समस्तैः 'नयविधिभिः' नैगमादिभेदैरमुं भावमयममुं वाऽयं नयभेद इच्छतीति, 'चः' समुच्चये |स ईटग् विस्ताररुचिरिति ज्ञातव्यो, विस्तारविषयत्वेन ज्ञानस्य रुचेरपि तद्विपयत्वादस्य ज्ञानपूर्विका हि रुचिः, यत उक्तम्- " सहहह जाणति जतो" । क्रियारुचिमाह - दर्शनं च ज्ञानं च चरित्रं च दर्शनज्ञानचरित्रं तस्मिन् प्रागुतरूपे तथा तपोविनये सत्या: - निरुपचरितास्ताश्च ताः समितिगुप्तयश्च, यदिवा सत्यं च- अविसंवाद्नयोगाद्यात्मकं समितिगुप्तयश्च सत्यसमितिगुप्तयस्तासु यः क्रियाभावरुचिः, किमुक्तं भवति ? – दर्शनाद्याचारानुष्ठाने यस्य भावतो रुचिरस्ति सः 'खलु' निश्चितं क्रियारुचिः, नामेति प्रकाशं, भण्यत इति शेषः, इह च चारित्रान्तर्गतत्वेऽपि तपःप्रभृतीनां पुनरुपादानं विशेषत एषां मुक्त्यङ्गत्वख्यापनार्थम् । सङ्क्षेपरुचिमाह--अनभिगृहीता - अनङ्गीकृता कुदृष्टिःसौगतमतादिरूपा येन स तथा सङ्क्षेपरुचिरिति भवति ज्ञातव्यः, 'अविशारदः' अकुशलः प्रवचने' सर्वज्ञशासने 'अणमिग्गहिओ य सेसेसुति अविद्यमानमभीति- आभिमुख्येन गृहीतं ग्रहणं-ज्ञानमस्येत्यनभिगृहीतः अनभिज्ञ इत्यर्थः, 'चः' समुच्चये, अनभिगृहीतश्च क्के त्याह- 'शेषेषु' कपिलादिप्रणीतप्रवचनेषु संभवति हि जिनप्रवचनानभिज्ञेोऽपि शेषप्रवचनानभिज्ञ इति तयवच्छेदार्थमेतत् अयमाशयः-य उक्तविशेषणः सङ्क्षेपेणैव चिलातीपुत्रवत्प्रशमादिपदत्रयेण
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मोक्षमार्ग
गत्य० २८
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॥५६५॥
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||१७-२७|| नियुक्ति: [५०२...]
*5
प्रत सूत्रांक ||१७-२७||
तत्त्वरुचिमवाप्नोति स स परुचिरुच्यते । धर्मरुचिमाह-योऽस्तिकायानां-धर्मादीनां धर्मो-गत्युपष्टम्भादिरस्तिकाय-
II धर्मस्तं जातावेकवचनं, 'श्रुतधर्मम्' अङ्गप्रविष्टाद्यागमखरूपं 'खलुः' वाक्यालङ्कारे 'चरित्रधर्म वा सामायिकादि, वस्स चार्थत्वात् , 'श्रद्दधाति तथेति प्रतिपद्यते 'जिनाभिहित तीर्थकृदुक्तं स धर्मरुचिरिति ज्ञातव्यो, धर्मेषु-पर्या
येषु धर्मे वा-श्रुतधर्मादौ रुचिरस्येतिकृत्वा, शिष्यमतिव्युत्पादनार्थं चेत्थमुपाधिभेदेन सम्यक्त्वभेदाभिधानम् , * अन्यथा हि निसर्गोपदेशयोरधिगमादौ वा कचित्केषांचिदन्तर्भाव इति भावनीयमिति सूत्रैकादशकार्थः । कैः पुनजालि रिदं दशविधमपि सम्यक्त्वमुत्पन्नमस्तीति श्रद्धेयमित्याह
परमत्थसंथवो वा सुदिपरमत्थसेवणा वावि । बावनकुदसणवजणा य संमत्तसदहणा ॥२८॥ परमाश्च ते तात्त्विकत्वेनार्थाश्चार्यमाणत्वेन परमार्थाः-जीवादयस्तेषु संस्तवो-गुणकीर्तनं तत्खरूपं पुनः पुनः परिभावनाजनितः परिचयो वा परमार्थसंस्तवो, वाशब्द उत्तरापेक्षः समुच्चये, तथा सुष्टु-यथावद्दर्शितया रष्टा-उप-10
लब्धाः परमार्था-जीवादयो यस्ते सुदृष्टपरमार्था-आचार्यादयस्तेषां सेवनं-पर्युपासनम् , इहोत्तरत्र च (प्राकृतत्वात्। है सूत्रत्वाच स्त्रीलिङ्गनिर्देशः, अत्यनुक्तसमुच्चये,ततो यथाशक्ति तद्वैयावृत्यप्रवृत्तिश्च, अपिः' पूर्वापेक्षः समुच्चये, 'बावण्णकुदं
सण'त्ति दर्शनशब्दः प्रत्येकमभिसंबध्यते ततो व्यापन्नं-विनष्टं दर्शनं येषां ते व्यापनदर्शना:-बैरवाप्यापि सम्यक्त्वं तथाविधकर्मोदयाद्वान्तं, तथा कुत्सितं दर्शनं येषां ते कुदर्शनाः-शाक्यादयस्तेषां च वर्जन-परिहारो ब्यापन्नकु
दीप अनुक्रम [१०९२ -११०२]
*13*5*3543
9425%
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||२८|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक ||२८||
उत्तराध्यदर्शनवर्जन, मा भूदेतदपरिहारतः सम्यक्त्वमालिन्यमिति, 'च' समुच्चये, सम्यक्त्वं श्रद्धीयतेऽस्तीति प्रतिपयते- मोक्षमार्ग
Isनेनेति सम्यक्त्वश्रद्धानं, प्रत्येकं च परमार्थसंस्तवादिभिरस्य सम्बन्धादेकवचनं, न चाकारमर्दकादेरपि परमार्थ- गया। वृहद्वाचनसंस्तवादीनां संभवायभिचारिता, तात्त्विकानामेवैषामिहाधिकृतत्वात् , तस्य च तथाविधानामेषामसंभवादिति | ॥५६॥ सूत्रार्थः । इत्थं सम्यक्त्वस्य लिङ्गान्यभिधाय सम्प्रति तस्यैव माहात्म्यमुपदर्शयन्निदमाह
नथि चरितं संमत्तविहणं दसणे उ भइयव्वं । संमत्तचरित्ताई जुगवं पुर्व व संमत्तं ॥ २९॥
णादंसणिस्स नाणं नाणेण विणा नहुँति चरणगुणा।
अगुणिस्स नत्थि मुक्खो नत्थि अमुक्खस्स निव्वाणं ॥३०॥ 'नास्ति' न विद्यते उपलक्षणत्वान्नासीन च भविष्यति, किं तत् १-चारित्रं, कीडक !-'सम्यक्त्वविहीन' दर्शनेन विरहितं, किमुक्तं भवति ?-यावन्न सम्यक्त्वोत्पादो न तावचारित्रं, किमेवं दर्शनमपि चारित्रे नियतमित्याह'दर्शने तु' सम्यक्त्वे पुनः सति भक्तव्यं भवति वा न वा, प्रक्रमाच्चारित्रम् , अतो न तत्तत्र नियतं, किमित्येवमत 2 आह-सम्यक्त्वचारित्रे 'युगपद्' एककालमुत्पयेते इति शेषः। 'पुवं वत्ति पर्व चारित्रोत्पादात् सम्यक्त्वमुत्पद्यते||१५॥ ततो यदा युगपदुत्पादस्तदा तयोः सहभावः, यदा तु तथाविधक्षयोपशमाभावतो न तथोत्पादस्तदा सत्यपि सम्यत्वेन चारित्रमिति तदर्शने भाज्यमुच्यते । अन्यच 'नादर्शनिनः' दर्शनविरहितस्य 'ज्ञान'मिति सम्यग्ज्ञानं 'ज्ञानेन
दीप अनुक्रम [११०३]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||२९
-३०||
दीप
अनुक्रम
[११०४
-११०५]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२९-३०|| निर्युक्तिः [५०२...]
अध्ययनं [२८],
विना' ज्ञानविरहिताः 'न भवन्ति' न जायन्ते, के ते?-चरणगुणाः, तत्र च चरणं-त्रतादि गुणाः- पिण्डविशुद्ध्यादयः, 'अगुणिनः' अविद्यमानगुणस्य चरणाविनाभावित्याद्यथोक्त गुणानामविद्यमान चरणस्य च यदिवा प्राक् चरणान्तर्गता गुणाश्चरणगुणा इति व्याख्यातास्तत इहापि त एव गृथन्ते, नास्ति 'मोक्षः' सकलकर्मक्षयलक्षणो, नास्त्यमुक्तस्य कर्मणेति गम्यते 'निर्वाण' निर्वृतिर्मुक्तिपदप्राप्तिरितियावत्, तदत्र पूर्वसूत्रेण मुक्त्यनन्तरहेतोरपि चारित्रस्य सम्यक्त्वभाव एव भवनं तम्माहात्म्यमुक्तम्, अनन्तरसूत्रेण तूत्तरोत्तरव्यतिरेकदर्शनिना शेषगुणानां व्यतिरेकस्यान्वयाक्षेपकत्वादिति सूत्रद्वयार्थः ॥ अस्य चाष्टविधाचारसहितस्यैवोत्तरोत्तरगुणप्राप्तिहेतुतेति तानादर्शयितुमाह
frrier निखिय निव्वितिगच्छं अमूढदिट्ठी य । उवहथिरीकरणं वच्छल भावणेद्वेते ॥ ३१ ॥ शङ्कनं शङ्कितं - देशसर्वशङ्कात्मकं तस्याभावो निःशङ्कितं, एवं काङ्क्षणं काङ्क्षितं युक्तियुक्तत्वादहिंसाद्यभिधायित्वाच्च शाक्योलूकादिदर्शनान्यपि सुन्दराण्येवेत्यन्यान्यदर्शनग्रहात्मकं तदभावो निष्काङ्क्षितं प्राग्वदुभयत्र विन्दुलोपः, विचि |कित्सा-फलं प्रति सन्देहो यथा - किमियतः क्लेशस्य फलं स्यादुत नेति १, तन्त्रन्यायेन 'विदः' विज्ञाः ते च तत्त्वतः साधव एव तज्जुगुप्सा वा यथा-किममी यतयो मलदिग्धदेहाः ?, प्रासुकजलस्राने हि क इव दोषः स्यादित्यादिका निन्दा तदभावो निर्विचिकित्सं निर्विजुगुप्सं वा, आर्पत्वाच्च सूत्र एवं पाठः, 'अमूढा' ऋद्धिमत्कुतीर्थिक दर्शनेऽप्यनवगीतमेवास्मद्दर्शनमिति मोहविरहिता सा चासौ दृष्टिश्च बुद्धिरूपा अमूढदृष्टिः, स चायं चतुर्विधोऽप्यान्तर आचारः,
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
~ 167 ~
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||३१|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत सूत्रांक ||३१||
उत्तराध्य. वाय त्याह-'उवयूह'त्ति, उपबृंहणमुपबृंहा-दर्शनादिगुणान्वितानां सुलब्धजन्मानो यूयं युक्तं च भवारशामिदमित्या
मोक्षमार्गबृहद्वृत्तिः
|दिवचोभिस्तत्तद्गुणपरिवर्द्धनं सा च स्थिरीकरणं च-अभ्युपगम(त)धर्मानुष्ठानं प्रति विषीदतां स्थैर्यापादनमुपबृंहास्थि- गल्य०२८
|रीकरणे, वत्सलभावो वात्सल्य-साधर्मिकजनस्य भक्तपानादिनोचितप्रतिपत्तिकरणं तच प्रभावना च-तथा तथा ॥५६७॥
खतीर्थोन्नतिहेतुचेष्टासु प्रवर्तनात्मिका वात्सल्यप्रभावने, उपसंहारमाह-अष्टैते दर्शनाचारा भवन्तीतिशेषः, एभिरे-1
वाष्टभिराचार्यमाणस्वास्योक्तफलसम्पादकतेति भावः, एतच ज्ञानाचाराद्युपलक्षकं, यद्वा दर्शनस्यैव यदाचाराभिधानं | मतदस्यैवोक्तन्यायेन मुक्तिमार्गमूलत्वसमर्थनार्थमिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं ज्ञानदर्शनाख्यं मुक्तिमार्गमभिधाय पुनस्तमेव |चारित्ररूपमुपदिदर्शयिषुर्भेदकथनत एव तत्खरूपमुपदर्शितं भवतीति मन्वान इदमाह
सामाइयऽत्य पढमं छेदोवट्ठावणं भवे वितियं । परिहारविसुद्धीयं सहम तह संपरायं च ॥३२॥
अकसाय अहक्खायं, छउमस्थस्स जिणस्स वा । एयं चयरित्तकर, चारितं होद आहियं ॥ ३३॥ समिति-साङ्गत्वेनैकीभावेन वा आयो-गमनं, कोऽर्थः ?-प्रवर्त्तनं, समायः स प्रयोजनमस्य सामायिक, तदस्य प्रयो
४५६७॥ जन"मिति (पा०५-१-१०९) ठक्, तच्च सकलसावद्यपरिहार एव, तत्रैव सति साङ्गत्वेन खपरविभागाभावेन च सर्वत्र प्रवृत्तिसम्भवात् , यद्वा समो-रागद्वेषविरहितः स चेह प्रस्तावाचितपरिणामस्तस्मिन्नायो-गमनं समायः स एव सामायिकं, विनयादेराकृतिगणत्वात्वार्थिकः ठक्, इदमपि सर्वसावद्यविरतिरूपमेव, चेति पूरणे, 'प्रथमम्' आद्यम् ,
दीप अनुक्रम [११०६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||३२-३३|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सूत्रांक
||३२-३३||
एतच द्विधा-इत्वरं यावत्कधिकं च, तत्रत्वरं भरतरावतयोः प्रथमचरमतीर्थकरतीर्थयोरुपस्थापनायां छेदोपस्थापनी
यचारित्रभावेन तत्र तद्यपदेशाभावात् , यावत्कथिकं च तयोरेव मध्यमतीर्थकरतीर्थेषु महाविदेहेषु चोपस्थापनाया k|अभावेन तद्यपदेशस्य यावज्जीवमपि सम्भवात् , तथा छेदः-सातिचारस्य यतेनिरतिचारस्य वा शिक्षकस्य तीर्थान्त
रसम्बन्धिनो वा तीर्थान्तरं प्रतिपद्यमानस्य पूर्वेपयोयव्यवच्छेदरूपस्तधुक्तोपस्थापना महावतारोपणरूपा यसिंस्तच्छेदोपस्थापनं भवेद्वितीयम् , तथा परिहरणं परिहारो विशिष्टतपोरूपस्तेन विशुद्धिरस्मिन्निति परिहारविशुद्धिकं, तचैत-12 गाथाभ्योऽयसेयम्-"परिहारियाण उ तवो जहन्न मज्झो तहेव उक्कोसो। सीउण्हवासकाले भणिओ धीरेहिं पत्तेयं ॥ १॥ तत्थ जहण्णो गिम्हे चउत्थ छद्रं तु होइ मज्झमओ। अठ्ठममिहमुकोसो इत्तो सिसिरे पवक्खामि ॥२॥ सिसिरे उ जहन्नाई छहाई दसमचरमगो होई । वासासु अट्ठमाई बारसपज्जंतगो णेओ ॥३॥ पारणए आयाम पापंचसु पगहो दोसऽभिग्गहो भिक्खे । कप्पट्ठिया य पइदिण करेंति एमेव आयाम ॥४॥ एवं छम्मासतवं चरिउर
१ पारिहारिकाणां तु तपो जघन्य मध्यम तथैवोत्कृष्टम् । शीतोष्णवर्षाकालेषु भणितो धीरैः प्रत्येकम् ॥ १॥ तत्र जघन्यमपि ग्रीष्मे चतुर्थ षष्ठं तु भवति मध्यमतः । अष्टम इद उत्कृष्टमतः शिशिरे प्रवक्ष्यामि ।। २॥ शिशिरे तु जघन्यादि षष्ठादि दशमचरमकं भवति । वर्षास्वष्टमादि द्वादशपर्यन्तं शेयं ॥ ३ ॥ पारणके आचामान्लं पञ्चानां प्रग्रहः द्वयोरभिग्रहो भिक्षायाम् । कल्पस्थिताश्च प्रतिदिनं कुर्वन्येवमेवाचामाम्लम् ॥ ४ ॥ एवं पण्मासतपश्चरित्वा परिहारिका अनुचरन्ति । अनुचरकेषु परिहारपदस्थितेषु यावत् पण्मासाः ॥ ५॥
दीप अनुक्रम [११०७-११०८]
*
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||३२
-३३॥
दीप
अनुक्रम
[११०७
-११०८]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५६८ ।।
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा || ३२-३३|| निर्युक्तिः [५०२...]
अध्ययनं [२८],
परिहारिया अणुचरंति । अणुचरगे परिहारगपर्यट्ठिए जाव छम्मासा ॥५॥ केप्पट्ठिओऽवि एवं छम्मासतवं करेइ सेसा उ । अणुपरिहारगभावं चरंति कप्पट्ठियत्तं च ॥ ६ ॥ एवेसो अट्ठारसमासपमाणो उ यण्णिओ कप्पो । संखेवओ विसेसो विसेसमुत्ताउ नेयवो ॥ ७ ॥ कप्पसमत्तीय तयं जिणकप्पं वा उवैति गच्छं वा । पडिवजमाणगा पुण जिणस्सगासे पवज्र्ज्जति ॥८॥ तित्थयरसमीवासेवगस्स पासे णो य अण्णस्स । एएसिं जं चरणं परिहारविसुद्धिगं तं तु ॥ ९॥" "सुदुमं तह संपरायं च'त्ति, 'तथे' त्यानन्तर्ये, छन्दोभङ्गतया चै(भयाचैवमुपन्यस्तः, सूक्ष्मः -किट्टीकरणतः संपर्येति- पर्यटति अनेन संसारमिति संपरायो - लोभाख्यः कषायो यस्मिंस्तत्सूक्ष्मसम्परायम् एतचोपशम श्रेणिक्षपक श्रेण्योर्लो भाणुवेदनसमये संभवति, यत उक्तम्- " लोभाणुं वेदंतो जो खलु उवसामओ व खमओ व । सो सुहुमसंपरायो अहखया ऊणओ किंचि ॥ १ ॥” तथा 'अकषायम्' अविद्यमानकषायं क्षपितोपशमितकषायावस्थाभावि इह चोपशमितकपायावस्थायाम कषायत्वं कपायकार्याभावात्, 'यथाख्यातम्' अर्हत्कथितस्वरूपानतिक्रमवत्, 'छद्मस्थस्य'
१ कल्पस्थितोऽपि एवं षण्मासतपः करोति शेषास्तु । अनुपरिहारिकभावं चरन्ति कल्पस्थितत्वं च ॥ ६ ॥ एवमेषोऽष्टादशमासप्रमाणस्तु वर्णितः कल्पः । संक्षेपतो विशेषो विशेषसूत्रात् ज्ञातव्यः ॥ ७ ॥ कल्पसमाप्तौ तकं जिनकल्पं बोपैति गच्छे वा । प्रतिपद्यमानकाः पुनजिनसकाशे प्रपद्यन्ते ॥ ८ ॥ तीर्थकरसमीपासेवकस्य पार्श्वे वा नैवान्यस्य । एतेषां यच्चरणं परिहारविशुद्धिकं तु तत् ॥ ९ ॥ २ लोभाणुं | वेदयन् यः खलुपशमको वा क्षपको वा । स सूक्ष्मसंपरायो यथाख्यातादूनकः किञ्चित् ॥ १ ॥
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मोक्षमार्ग
~ 170 ~
गत्य० २८
॥५६८॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२८], मूलं [-] / गाथा ||३२-३३|| नियुक्ति: [५०२...]
प्रत
सूत्रांक
ACANCIES
||३२-३३||
उपशान्तक्षीणमोहाख्यगुणस्थानध्यवर्तिनः 'जिनस्य वा' केवलिनः सयोग्ययोगिगुणस्थानद्वयस्थायिनः, वा समुच्चये, यथैतत्पञ्चविधमपि चारित्रशब्दवाच्यं तथाऽन्वर्थत आह-'एतद् अनन्तरोक्तं सामायिकादि चयस्य-राशेः प्रस्तावात्कर्मणां रिक्त-विरेकोऽभाव इतियावत् तत्करोतीयेवंशीलं चयरिक्तकर चारित्रमिति नरुक्तो विधिः, आह-यश्यति"चरितेण णिगिण्हाति तवेण य वि(परि)सुज्झति'त्ति' कथं न तेनास विरोधः?, उच्यते, तपसोऽपि तत्त्वतश्चारित्रान्तर्गतत्वात् , भवति 'आख्यातं' कथितमहदादिभिरिति गम्यत इति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रति तपश्चतुर्थं कारणमाह| तवो असुविहो वुत्तो, बाहिरऽभतरो तहा । बाहिरो छब्विहो बुत्तो, एवमभितरो तवो ॥ ३४ ॥
तपश्च द्विविधमुक्त, 'बाहिर'त्ति बाह्यमाभ्यन्तरं, तथा तत्र वाह्यं षड्विधमुक्तमेवमिति-पड्विधमाभ्यन्तरंतप उक्तमिति | | सूत्रार्थः, भावार्थस्तु तपोऽध्ययन एवाभिधास्यते ॥ आह-एषां मुक्तिमार्गत्वे कस्य कतरो व्यापारः, उच्यते
नाणेण जाणई भावे, संमत्तेण य सरहे । चरित्तेण निगिण्हाद, तवेण परिसुजाई ॥३॥ 'ज्ञानेन' मत्यादिना जानाति' अवबुध्यते 'भावान्' जीवादीन् 'दर्शनेन च' उक्तरूपेण 'सद्दहि'त्ति श्रद्धत्ते चारित्रेण-अनन्तराभिहितेन 'निगिण्हाति'त्ति निराश्रवो भवति, पठ्यते च-न गिण्हति'त्ति, तत्र 'न गृह्णाति' नादत्ते। कर्मेति गम्यते 'तपसा परिशुद्धति' पुरोपचितकर्मक्षपणतः शुद्धो भवति, उक्तं हि-"संजमे अणण्हयफले तवे बोदाणफले"त्ति, इति सूत्रार्थः । अनेन मार्गस्य फलं मोक्ष उक्तः, सम्प्रति तत्फलभूतां गतिमाह- .
दीप अनुक्रम [११०७-११०८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
||३६||
दीप
अनुक्रम
[११११]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५६९॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) निर्युक्ति: [५०२...]
अध्ययनं [२८],
मूलं [--] / गाथा ||३६||
खविता पुव्वकम्माई, संजमेण तवेण य । सञ्चदुक्खप्पहीणट्ठा, पक्कमति महेसिणो ॥ ३६ ॥ तिमि ॥ सुखमग्गगईयं ॥ २८ ॥
'क्षपयित्वा' क्षयं नीत्वा 'पूर्वकर्माणि' पूर्वोपचितज्ञानावरणादीनि संयमः - सम्यक् पापेभ्य उपरमणं चारित्र - मित्यर्थस्तेन 'तपसा' उक्तरूपेण चशब्दाज्ज्ञानदर्शनाभ्यां च नन्वेवमनन्तरं तपस एव कर्मक्षपणहेतुत्वमुक्तम् इह तु ज्ञानादीनामपीति कथं न विरोध ?, उच्यते, तपसोऽप्येतत्पूर्वकस्यैव क्षपणहेतुत्वमिति ज्ञापनार्थमित्थमभिधानम्, अत एव मोक्षमार्गत्वमपि चतुर्णामप्युपपन्नं भवति, ततश्च 'सचदुक्खप्पहीण'त्ति प्राकृतत्वात्प्रकर्षेण हीनानि - हानिं गतानि प्रक्षीणानि वा सर्वदुःखानि यस्मिन् यद्वा सर्वदुःखानां प्रहीणं प्रक्षीणं वा यस्मिंस्तत्तथा तच सिद्धिक्षेत्रमेव तदर्थयन्त इवार्थयन्ते सर्वार्थेच्छोपरमेऽपि तद्वामितया ये ते तथाविधाः 'प्रक्रामन्ति' भृशं गच्छन्ति अथवा प्रहीणानि वा सर्वदुःखान्यर्थाश्च प्रयोजनानि येषां ते तथाविधाः प्रक्रामन्ति सिद्धिमिति शेषः, 'महेसिणो'त्ति महर्षयो महैषिणो वा प्राग्वन्महामुनय इति सूत्रार्थः ॥ 'इति' परिसमाप्तौ ब्रवीमीति पूर्ववत्, उक्तोऽनुगमः सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इत्युत्तराध्ययनटीकायां शिष्यहितायां श्रीशान्त्याचार्य कृतायां मुक्तिमार्गगतिनामकमष्टाविंशमध्ययनं समाप्तमिति २८ श्री शान्त्याचार्यकृतायामुत्तराध्ययनटी० शिष्य ० मुक्तिमार्गगतिनामकमष्टाविंशमध्ययनं समाप्तम् ॥
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Fürsten
मोक्षमार्ग
गत्य० २८
~ 172 ~
॥५६९॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं २८ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [-] / गाथा ||३६...|| नियुक्ति: [५०३]
अथ एकोनत्रिंशं सम्यक्त्वपराक्रमाध्ययनम् ।
प्रत सूत्रांक ||३६||
ROSSARSAGAR
व्याख्यातमष्टाविंशमध्ययनमेकोनत्रिंशमारभ्यते,अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने ज्ञानादीनि मुक्तिमार्गत्वेनोक्तानि, तानि च संवेगादिमूलान्यकर्मताऽवसानानि च तथा भवन्तीति तानीहोच्यन्ते, यद्वाऽनन्तराध्ययने मोक्ष|मार्गगतिरुक्ता इह पुनरप्रमाद एव तत्प्रधानोपायो, ज्ञानादीनामपि तत्पूर्वकत्वादिति, स एव वर्ण्यते, अथवाड-13 नन्तराध्ययने मुक्तिमार्गगतिरुक्ता, सा च वीतरागत्वपूर्विकेति यथा तद्भवति तथाऽनेनाभिधीयते, इत्यनेन सम्बन्धत्रयेणायातमिदमध्ययनम् , अस्य च महापुरस्येव चत्वार्यनुयोगद्वाराणि व्यावर्ण्य नामनिष्पन्ननिक्षेपोऽभिधेयः, स च नामपूर्वक इत्येतनामनिर्देशायाह नियुक्तिकृत्आयाणपएणेयं सम्मत्तपरक्कमति अज्झयणं । गुण्णं तु अप्पमायं एगे पुण वीयरागसुयं ॥ ५०३ ॥
आदीयत इसादानम्-आदिः प्रथममित्यर्थः, तच तत्पदं च-निराकाङ्क्षतयाऽर्थगमकत्वेन वाक्यमेवादानपदं तेन, उपचारतश्चेह तदभिहितमपि तथोक्तं, तत आदानपदाभिहितेन प्रक्रमान्नाना 'इद'मिति प्रस्तुतं सम्यक्त्वपराक्रममितिः-उपप्रदर्शने, उच्यत इति शेषः 'अध्ययनं' प्रागुक्तनिरुक्तं, वक्ष्यति हि-"इह खलु सम्मत्तपरकमे णामऽज्झ-18
दीप अनुक्रम [११११]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -२९ “सम्यक्त्व" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [-] / गाथा ||३६...|| नियुक्ति: [५०३]
सम्यक्त्व
पराक्रमा.
प्रत सूत्रांक ||३६||
उत्तराध्य
रायणे पण्णत्ते"त्ति, गुणैर्हि निर्वृत्तं गौण 'तुः' अवधारणे गौणमेव, अप्रमाद इत्युपलक्षणत्वाद् अप्रमादश्रुतम् , एके
त पुनर्वीतरागश्रुतं, कोऽर्थः ?-संवेगादयोऽत्र वर्ण्यन्ते, तद्रूप एव च तत्त्वतोऽप्रमाद इति तदभिधायिश्रुतरूपत्वादप्रबृहद्वृत्तिः
मादश्रुतमिति ब्रुवते, अन्ये त्वामादोऽपि वीतरागताफल इति तत्प्राधान्याश्रयणतो वीतरागश्रुतमिति गाथार्थः ॥ ॥५७०॥ अत्र चादानपदनानः सूत्रान्तर्गतत्वात्सूत्रस्पर्शिकनियुक्तरेव तत्र व्यापार इति तदुपेक्ष्य वीतरागश्रुतनाम च तस्य
| केषाञ्चिदेवाभिमतत्वात् 'मध्यग्रहणे आद्यन्तौ गृहीतायेव भवत' इति न्यायतो या द्वयमप्यनादृत्याप्रमादश्रुतनिक्षे-|
पमभिधातुमाहनिक्खेवो अपमाए चउवि० ।
॥ ५०४॥ जाणगभवियसरीरे तबइरित्ते अमित्तमाईसु । भावे अन्नाणअसंवराईसु होइ नायवो ॥ ५०५ ॥ निक्खेवो अ सुअंमि चउक्कओ दुवि०
॥५०६ ॥ Pजाणगभवियसरीरे तबइरिते अ सो उ पंचविहो । अंडयबोंडयवालय वागय तह कीडए चेव ॥५०७॥
भावसुअंपुण दुविहं सम्मसुअंचेव होइ मिच्छसुयं । अहियारोसम्मसुए इहमज्झयणमि नायवो ॥५०॥
दीप अनुक्रम [११११]
सा॥५७०॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
~174.
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [-] / गाथा ||३६...|| नियुक्ति : [५०४-५०८]
प्रत सूत्रांक ||३६||
गाथापञ्चकं प्रायः प्रतीतार्थमेव, नवरम् 'अमित्तमाईसुत्ति अमित्राः-शत्रवः आदिशब्दाबालादिपरिग्रहस्तेषु योऽन-181 मादः स तव्यतिरिक्तोऽप्रमाद उच्यते, द्रव्यत्वं चास्य तथाविधाप्रमादकार्याप्रसाधकत्वात् द्रव्यविषयत्वाद्वा, 'भाव' इति भावे विचार्य अज्ञानं-मिथ्याज्ञानमसंवरः-अनिरुद्धाश्रवता, आदिशब्दात्कषायपरिग्रहः, एतेषु प्रक्रमादप्रमादःएतजयं प्रति सदा सावधानतारूपो भवति ज्ञातव्यः । तथा 'सो उ पंचविधोति, स इति तत्-तयतिरिक्तसूत्रं ॥ |'तुः पुनरर्थे 'पञ्चविध' पञ्चप्रकारं, पञ्चविधत्वमेवाह-'अण्डजं' हंसाद्यण्डकेभ्यो यजायते यथा क्वचित्पट्टसूत्र,
पौण्डकं (बोण्डज) यमनितिन्दुकोद्भवं यथा कर्पाससूत्रं, वालजं यदूरणकादिकेशोत्पन्नं यथोर्णासूत्र, याकजं४सनातस्यादिवाकेभ्यो यज्जायते यथा सनसूत्रं, कीटजं च यत्तथाविधकीटेभ्यो लालात्मकं प्रभवति यथा पट्टसूत्र,
तथा 'सम्यकश्रुतम्' अङ्गप्रविष्टादि 'मिथ्याश्रुतं' कनकसप्सत्यादि, अधिकारः-प्रकृतं सम्यकथुतेन, सुब्व्यत्ययावृती-2 यार्थे सप्तमी, 'इह' अध्ययने 'ज्ञातव्यः' अवबोद्धव्यः, तद्रूपत्वादखेति गाथापञ्चकार्थः ॥ सम्प्रति गौणतामेवास्य नानो वक्तुमाहसम्मत्तमप्पमाओ इहमज्झयणमि वपिणओ जेणं । तम्हेयं अज्झयणं णायवं अप्पमायसुअं॥ ५०९॥ 'सम्मत्त ति सुब्ब्यत्ययात्सम्यक्त्वे उपलक्षणत्वाज्ञानादिषु चाप्रमाद उक्तन्यायेन संवेगादिफलोपदर्शनतः काका
दीप अनुक्रम
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [१] / गाथा ||--|| नियुक्ति : [५०९]
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बृहदत्तिः
प्रत
उत्तराध्य. तदनुष्ठानं प्रत्युद्यमदर्शनेन वा 'इहमज्झयणमि'त्ति इहाध्ययने वर्णितो येन तस्मादेतदध्ययनं ज्ञातव्यम् 'अप्रमादश्रुतं' सम्यक्त्व| अप्रमादश्रुतनामकमिति गाथार्थः ॥ गतो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तच्चेदम्-
पराक्रमा. | सुअं मे आउसंतेणं भगवया एवमक्खाय-इह खलु सम्मत्तपरकमे नामजायणे समणेणं भगवया महा- ॥५७१॥
र वीरेणं कासवेणं पवेइए जं सम्मं सद्दहइत्ता पत्तियाइत्ता रोयइत्ता फास इत्ता पालइत्ता तीरइत्ता किइत्ता
सोहइत्ता आराहइत्ता आणाए अणुपालइत्ता घहवे जीवा सिझंति बुझंति मुचंति परिनिच्चायति सब्ब-12 दुक्खाणमंतं करेंति ॥१॥ ___ 'श्रुतम्' आकर्णितं 'मे' मया आयुष्मन्निति शिष्यामन्त्रणम् , एतच सुधर्मखामी जम्बूखामिनं प्रत्याह, 'तेने ति यः सर्वजगत्प्रतीतः, तेनापि कीदृशेत्याह-भगवता' समग्रेश्चर्यादिमता प्रक्रमान्महावीरेण एवं मिति वक्ष्यमाणप्रकारेण आख्यातं' कथितं, तमेव प्रकारमाह-'इह' अस्मिन् जगति जिनप्रवचने वा 'खलु' निश्चितं सम्यक्त्वमिति गुणगुणिनोरनन्यत्वात्सम्यक्त्वगुणान्वितो जीवस्तस्य सम्यक्त्वे वोक्तरूपे सति पराक्रमः-उत्तरोत्तरगुणप्रतिपत्त्या कर्मा-13 रिजयसामर्थ्यलक्षणो वर्ण्यतेऽस्मिन्निति सम्यक्त्वपराक्रम नामाध्ययनमस्तीति गम्यते, नन्वेवमिदमपि गौणमेव ॥५७१॥ नाम तत्किमिति नियुक्तिकृताऽऽदानपदेनैतदुक्तम् ?, इतरे तु गौणे इति, सत्यमेतत्, किन्तु नानोऽनेकविधत्वसूचनार्थ नियुक्तिकृतेत्यमुक्तं न त्वस्य गौणत्वव्यवच्छेदार्थ, तच केन प्रणीतमित्याह-'श्रमणेन' श्रामण्यमनुचरता
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [१] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
धर्मकायावस्थामास्थितेनेत्यर्थः, भगवता महावीरेण काश्यपेन 'प्रवेदित' खतः प्रवेदितमेव भगयता ममेदमाख्या-13 तमित्युक्तं भवति, अनेन वक्तृद्वारेण प्रस्तुताध्ययनस्य माहात्म्यमाह । ननु सुधर्मखामिनोऽपि श्रुतकेवलित्वात्तद्वारेणाप्यस्य प्रामाण्यं सिध्यत्येव तरिकमेवमुपन्यासः', उच्यते, लब्धप्रतिष्ठरपि गुरूपदिष्टं गुरुमाहात्म्यं च ख्यापयद्भिः |सूत्रमर्थश्चाख्येय इति ख्यापनार्थमेवमुपन्यासः, इत्थं वक्तृद्वारेणास्थ माहात्म्यमभिधाय संपति फलद्वारेणाह-'यदिति प्रस्तुताध्ययनं 'सम्यम्' अवैपरीत्येन 'श्रद्धाय' शब्दार्थोभयरूपं सामान्येन प्रतिपद्य 'प्रतीत्य' उक्तरूपमेव विशेषत इत्थमेवेति निश्चित्य, यद्वा संवेगादिजनितफलानुभवलक्षणेन प्रत्ययेन प्रतीतिपथमवतार्य, रोचयित्वा' तदभिहिता
नुष्ठानविषयं तदध्ययनादिविषयं वाऽभिलाषमात्मन उत्पाद्य, संभवति हि कचिद्गुणवत्तयाऽवधारितेऽपि कदाचिदरुचिरित्येवमभिधानं, 'फासित्त'त्ति तदुक्तानुष्ठानतः स्पृष्ट्वा 'पालयित्वा' तद्विहितानुष्ठानस्यातीचाररक्षणेन 'तीर-1 यित्वा' तदुक्तानुष्ठानं पारं नीत्वा 'कीर्तयित्वा' खाध्यायविधानतः संशुम 'शोधयित्वा' तदुक्तानुष्ठानस्य तत्तद्गुणस्थानावाप्तित उत्तरोत्तरशुद्धिप्रापणेन 'आराध्य' यथावदुत्सर्गापवादकुशलतया यावजीवं तदर्थासेवनेन, एतत् सर्व खमनीषिकातोऽपि स्यादत आह-आज्ञया' गुरुनियोगात्मिकया 'अनुपाल्य' सततमासेव्य, यद्वा 'स्पृष्ट्वा' योगत्रिकेण मनोवाकायलक्षणेन, तत्र मनसा-सूत्रार्थोभयचिन्तनेन वचसा-वचनादिना कायेन-भङ्गकरचनादिना, एवं पालनाराधनयोरपि योगत्रयं वाच्यं, 'पालयित्वा' परावर्त्तनादिनाऽभिरक्ष्य 'तीरयित्वा' अध्ययनादिना परि
दीप अनुक्रम [१११२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [१] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
उत्तराध्य. बृहद्धत्तिः
प्रत
।।५७२॥
स
समाप्य 'कीर्तयित्वा' गुरोविनयपूर्वकमिदमित्यं मयाऽधीतमिति निवेद्य 'शोधयित्वा' गुरुवदनुभाषणादिभिः शुद्ध सम्यक्त्वविधाय 'आराध्य' उत्सूत्रप्ररूपणादिपरिहारेणावाधयित्वा शेषं प्राग्यन्नवरम् आज्ञयेति जिनाज्ञया, उक्तं हि-"फासिय |
पराक्रमा. जोगतिएणं पालियमविराहियं च एमेव । तीरियमंतं पाविय किट्टिय गुरुकहण जिणमाणा ॥१॥" एवं च कृत्वा || किमित्याह-बहवः' अनेक एव 'जीवाः' प्राणिनः 'सिद्ध्यन्ति' इहैवागमसिद्धत्वादिना, 'बुध्यन्ते' पातिकर्मक्षयेण, 'विमुच्यन्ते' भवोपग्राहिकर्मचतुष्टयेन, ततश्च 'परिनिर्वान्ति' कर्मदावानलोपशमेन अत एव 'सर्वदुःखानां शारीरमानसानाम् 'अन्तं' पर्यन्तं कुर्वन्ति मुक्तिपदावास्येति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति विनेयानुग्रहार्थं सम्बन्धाभिधानपुरस्सरं प्रस्तुताध्ययनार्थमाह
तस्स णं अयमहे एवमाहिजइ, तंजहा-संवेगे १ निब्बेए २ धम्मसहा ३ गुरुसाहम्मियमुस्सूसणया ४ आलोयणया ५ निंदणया ६ गरिहणया ७ सामाइए ८ चउवीसत्थए ९बंदणए १० पटिकमणे ११ काउस्सग्गे १२| पञ्चक्खाणे १३ धयधुइमंगले १४ कालपडिलेहणया १५ पायच्छित्तकरणे १६ खमावणया १७ सझाए १८ वा-IP५७२॥ यणया १९ परिपुच्छणया २० परियट्टणया २१ अणुप्पेहा २२ धम्मकहा २३ सुयस्स राहणया २४ एगग्गमणसंनिवेसणया २५ संजमे २६ तवे २७ चोदाणे २८ सुहसाए २९ अप्पडिवळ्या ३० विवित्तसपणासणसेवणया |३१ विणियट्ठणया ३२ संभोगपञ्चक्खाणे ३३ उवहिपच्चक्खाणे ३४ आहारपबक्खाणे ३५ कसायपचक्खाणे|
दीप अनुक्रम [१११२]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [२] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
|३६ जोगपञ्चक्खाणे ३७ सरीरपच्चक्खाणे ३८ सहायपञ्चक्खाणे ३१ भत्तपञ्चक्खाणे ४० सम्भावपञ्चक्खाणे ॥४१ पडिरूवया ४२ वेयावचे ४३ सब्वगुणसंपुषणया ४४ वीयरागया ४५ खंती ४६ मुत्ती ४७ मद्दवे ४८ अजये ४९ भावसचे ५० करणसच्चे ५१ जोगसच्चे ५२ मणगुसया ५३ वयगुत्तया ५४ कायगुत्तया ५५ मणसमाधारणया ५६ वयसमाधारणया ५७ कायसमाधारणया ५८ नाणसंपन्नया ५९दसणसंपन्नया ६० चरित्तसंपन्नया ६१ सोइंदियनिग्गहे ६२ चक्खिदियनिग्गहे ६३ घाणिदियनिग्गहे ६४ जिभिदियनिग्गहे ६५ फासिंदियनि-6 गहे ६६ कोहविजए ६७ माणविजए ६८ मायाविजए ६९ लोभविजए ७० पिज्जदोसमिच्छादसणविजए ७१ सेलेसी ७२ अकम्मया ७३ (दाराणि)॥
'तस्येति सम्यक्त्वपराक्रमाध्ययनस्य णमिति सर्वत्र वाक्यालङ्कारे 'अय'मित्यनन्तरमेव वक्ष्यमाणः 'अर्थः' अभिधेयः एवम्' अमुना वक्ष्यमाणप्रकारेण 'आख्यायते' कथ्यते महावीरेणेति गम्यते, तद्यथेति वक्ष्यमाणतदर्थोपन्यासार्थः, संवेगो १ निर्वेदो २ धर्मश्रद्धा ३ 'गुरुसाहम्मियसुस्सूसण'त्ति साधर्मिकगुरुशुश्रूषणम् आपत्वाचेहोत्तरत्र च सूत्रेवन्यथा पाठः ४ आलोचना ५ निन्दा ६ गहरे ७ सामायिक ८ चतुर्विंशतिस्तयो ९ वन्दनं १० प्रतिक्रमणं ११ कायोत्सर्गः १२ प्रत्याख्यानं १३ स्तवस्तुतिमङ्गलं १४ कालप्रत्युपेक्षणा १५ प्रायश्चित्तकरणं १६ क्षमणा १७ 8 खाध्यायो १८ वाचना १९ प्रतिप्रच्छना २० परावर्चना २१ अनुप्रेक्षा २२ धर्मकथा २३ श्रुतस्याराधना २४ एका-ह
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [२] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
पराक्रमा.
प्रत
उत्तराध्य.
अमनःसंनिवेशना २५ संयम २६ स्तपो २७ व्यवदानं २८ सुखशायो २९ ऽप्रतिबन्धता ३० विविक्तशयनासन- सम्यक्त्व
सेवना ३१ विनिवर्त्तना ३२ सम्भोगप्रत्याख्यानम् ३३ उपधिप्रत्याख्यानम् ३४ आहारप्रत्याख्यानं ३५ कषायप्रसावृहद्वृत्तिः
ख्यानं ३६ योगप्रत्याख्यानं ३७ शरीरप्रत्याख्यानं ३८ सहायप्रत्याख्यानं ३९ भक्तप्रत्याख्यानं ४० सद्भावप्रत्याख्यानं ॥५७२018|४१ प्रतिरूपता ४२ वैयावृत्त्यं ४३ सर्वगुणसंपूर्णता ४४ वीतरागता ४५क्षान्तिः४६ मुक्तिः ४७ मार्दवं ४८ आर्जवं २९
K४९ भावसत्यं ५० करणसत्यं ५१ योगसत्यं ५२ मनोगुप्तता ५३ वाग्गुप्तता ५४ कायगुप्तता ५५ मनःसमाधारणा N५६ वाक्समाधारणा ५७ कायसमाधारणा ५८ ज्ञानसंपन्नता ५९ दर्शनसंपन्नता ६० चारित्रसंपन्नता ६१ श्रोत्रेन्द्रिय-1 हा निग्रहः ६२ चक्षुरिन्द्रियनिग्रहो ६३ बाणेन्द्रियनिग्रहो ६४ जिह्वेन्द्रियनिग्रहः ६५ स्पर्शनेन्द्रियनिग्रहः ६६ क्रोधविजयो ६७ मानविजयो ६८ मायाविजयो ६९ लोभविजयः ७० प्रेमद्वेषमिथ्यादर्शनविजयः ७१ शैलेशी ७२ अकमतेति ७३, इत्यक्षरसंस्कारः ॥ साम्प्रतमिदमेव प्रतिपदफलोपदर्शनद्वारेण व्याचिख्यासुराह सूत्रकारः
संवेगेण भंते ! जीवे कि जणयाइ,संवेगेणं अणुत्तरं धम्मसद्धं जणयइ,अणुत्तराए धम्भसद्धाए संवेगं हब्वमा-141 गच्छह, अर्णताणुवंधिकोहमाणमायालोमे खचेइ, कम्मं न बंधह, तप्पचहयं च मिच्छत्तविसोहि काऊण दसणाराहए भयह दसणविसोहीएणं विसुद्धाए अत्यगाया तेणेवणं भवग्गहणणं सिझंति बुझंति विमुचंति परिनि-1 व्वायंति सव्वदुक्खाणमंतं करेंति, सोहीए यणं विसुद्धाए तचं पुणो भवग्गहणं नाइकर्मति १॥ निव्वेएणं भंते !
दीप अनुक्रम [१११३]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: मूल संपादने अत्र सूत्रक्रमांक १ तथा २ द्वीवारान् लिखितं तस्मात् मया १R २R, 3, ...इति क्रमांक दत्त
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- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) मूलं [१-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
जीवे किं जणय ?, निव्वेएणं दिव्यमाणुस्सतिरिच्छिएस कामभोएस निव्वेयं हव्वमागच्छइ सव्वविसएस विरजइ, सब्बविसएस विरज्जमाणे आरंभपरिचायं करेइ, आरंभपरिचायं करेमाणे संसारमग्गं बुच्छिंदर सिद्धिमग्ग| पडिवन्ने य हवइ २॥ धम्मसद्धाए णं भंते! जीवे किं जणयइ १,२ सायासुक्खेसु रज्जमाणे विरजइ अगारधम्मं च णं चयइ, अणगारिए णं जीवे सारीरमाणसाणं दुक्खाणं छेयण भेयणसंजोगाईणं बुच्छेयं करेह अच्वावाहं चणं सुहं निव्व ते ३ || गुरुसाहम्मिय सुस्तुसणयाए णं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ विणयपडिवन्तिं जणे, विणयपडिवनेणं जीवे अणच्चासायणसीले नेरइयतिरिक्खजोणियमणुस्सदेवदुग्गईओ निरंभइ, वण्णसंजलणभत्तिबहुमाणयाए माणुस्सदेव सुग्गइओ निबंध सिद्धिसुगई च विसोहेइ पसत्थाई च णं विषयमूलाई सव्वकज्जाई साहइ, अन्ने य बहवे जीवे विणइत्ता हवइ ४॥ आलोयणाए णं भंते! जीवे किं जणेइ ?, २ मायानियाणमिच्छादरिसणसल्लाणं मुक्खमग्गविग्धाणं अनंत संसारबद्धणाणं उद्धरणं करेह उज्जुभावं च जणेइ, उज्जुभावं पडिवन्ने य णं जीवे अमाई इत्थीवेयं नपुंसगवेयं च न बन्धइ, पुव्वबद्धं च णं निज्जरइ ५ ॥ निंदणयाए णं भंते जीवे किं जणेइ १, २ पच्छाणुतावं जगह, पच्छा णुतावेणं विरज्जमाणे करणगुणसेटिं पडिवज्जद, करणगुणसेढिपडिवन्नेय अणगारे मोहणिज्जं कम्मं उग्धाए ६ ।। गरिहणाए णं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ अपुरकारं जणेइ, अपु| रक्कारगए णं जीवे अप्पसत्थेहिंतो जोगेहिंतो नियत्तइ पसत्थेहि य पडिवज्जद, पसत्थजोग पडिबन्ने य णं अणगारे अनंतधाई पज्जवे खबेइ ७ ॥ सामाइएणं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ सावळजोगविरहं जणयइ ८ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
उत्तराध्य.
चडवीसत्थएणं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ दंसणविसोहिं जगह ९ ॥ बंदणएणं भंते! जीवे किं जणेह १, २ नीयागोयं कम्मं खवेइ उच्चागोयं निबंधह सोहग्गं च णं अप्पडिहयं आणाफलं निवसेर दाहिणभावं च बृहद्वृत्तिः * णं जणेड़ १० ॥ पडिकमणं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ वयछिद्दाई पिछे, पिहियवयछिदे पुण जीवे निरु||५७४॥ द्वासवे असबलचरिते असु पवयणमायासु उबउसे अपहृत्ते सुप्पणिहिए विहरइ ११ ॥ कास्सग्गेणं 6 भंते! जीवे किं जणे १, २ तीमपपन्नं पायच्छितं विसोहेर, विसुद्धपायच्छित्ते य जीवे निव्यहियए ओहरियभरुच भारवहे धम्मज्झाणोवगए सुहं सुहेणं विहरइ १२ ॥ पचक्खाणेणं भंते! जीवे किंजणेइ ?, २ आसवदाराई निरुभइ १३ ॥ धयधुमंगलेणं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ नाणदंसणचरित्तषोहिलाभ संजणइ, माणदंसणचरित्तवोहिलाभसंपन्ने णं जीवे अंतकिरियं कप्पविमाणोववत्तियं आराहणं आराहेइ १४|| कालपडिलेहणाए णं भंते! जीवे किं जणेइ ?, नाणावरणिज्जं कम्मं खवेद १५ ॥ पायच्छित्तकरणेणं भंते! जीवे किं जणेह ?, २ पावकम्मविसोहिं जणेड़ निरइयारे आविभवह सम्मं च णं पायच्छित्तं पडियज्यमाणे मग्गं च मग्गफलं च विसोहेइ आयारं आयारफलं च आराहेइ १६ ॥ खमावणधाए णं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ पल्हायणभावं जणेइ, पल्हायणभावमुबगए य सव्वपाणभूयजीवसत्तेसु मित्तीभावं उप्पाएर, |मित्तीभावमुबगए य जीवे भावविसोहिं काऊण निभए भवइ १७ ॥ सज्झाएणं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ नाणावरणिजं कम्मं खवेइ १८ ॥ वाघणयाए णं भंते! जीवे किं जणेह १, २
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
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निखरं जणेह सुअस्स य अणुसज्जणाए अणासायणाए वह, सुपस्स य अणुसज्जणार अणासायणाए वहमाणे तिस्थधम्मं अवलंब, तित्थधम्ममवलंयमाणे महानिजराए महापज्जवसाणे हवइ १९ ॥ पडिपुच्छणाए णं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ सुतत्थतदुभयाई विसोहेर, कंखामोहणिजं कम्मं बुच्छिदेइ २० ॥ परियहणपाए णं भंते! जीवे किं जणेह १, २ वंजणारं जणेह वंजणलद्धिं च उप्पाद २१ ।। अणुप्पेहाए णं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ आउयवज्जाओ सत्त कम्मपयडीओ धणियबंधणयडाओ सिढिलबंधणबद्धाओ पकरेइ, दीहकालट्ठियाओ हस्सकालट्ठिईयाओ पकरेह, तिब्बाणुभावाओ मंदाणुभावाओ पकरेह, बहुप्पएसग्गाओ अप्पपएसग्गाओ पकरेह, आउंच णं कम्मं सिय बंधइ सिय नोबंध, अस्सापावेयणिज्जं चणं कम्मं नो भुज्जो भुजो उबचिणह, अणाइयं च णं अणवयग्गं दीहमद्धं चाउरंतसंसारकंतारं विप्पामेव वीहवग्रह २२ ॥ धम्मकहाए णं भंते! जीवे किं जणेह ?, २ निज्जरं जणेइ, धम्मकहाए णं पवयणं पभावेइ, पवयणपभावएर्ण जीवे आगमिसस्समद्दत्ताए कम्मं निबंधइ | २३ || सुयस्स आराहणयाए णं भंते! किं जणेइ १, २ अन्नाणं खवेह, न य संकिलस्सइ २४ ॥ एगग्गमणसंनिवेसणाए णं भंते! जीवे किं जणेह १, २ चित्तनिरोह करेइ २५ ॥ संजमेणं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ अणण्हयन्तं जणेइ २६ ॥ तवेणं भंते ! जीवे किं जणेह १, २ वोयाणं जणेइ २७ ।। वोयाणं भंते । जीवे किं जणेइ १, २ अकिरियं जणे, अकिरियाए भवित्ता तओ पच्छा सिञ्झइ ५, २८ ॥ सुहसाएणं
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अनुक्रम [१११४
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--||
अध्ययनं [२९],
निर्युक्ति: [५०९...]
उत्तराध्य ४ भंते! जीवे किं जणेह १, २ अणुस्सुयत्तं जणेइ, अणुस्सुए णं जीवे अणुकंपए अणुब्भडे विगयसोगे चरित्तमोहणिज्जं कम्मं खवेइ २९ ॥ अपडिबद्धयाए णं भंते । जीवे किं जणेह १, २ निस्संगतं जणेह, निस्संगतेणं जीवे बृहद्वृत्तिः एगे एगग्गचित्ते दिया य राओ य असजमाणे अप्पडिबद्धे आवि विहरइ ३० ॥ विवित्तसयणासण्याए ॥५७५ ॥ ४णं भंते! जीवे किं जणेइ १, २ चरितगुसिं जणेह, चरितगुत्ते णं जीये विवित्ताहारे दढचरिते एतर
मुक्खभावपडिवने अट्ठविहं कम्मगंठिं निजरे ३१ ॥ विणिवट्टणयाए णं भंते ! जीवे किं जणेह १, २ पावकसम्माणं अकरणयाए अन्मुट्ठे पुव्वषद्वाण य निज्जरणयाए पावं नियन्तेह, तओ पच्छा चाउरंत संसारकंतारं ( वीईवय ३२ ॥ संभोगपचक्खाणं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ आलंबणाई खवेह, निरालंबणस्स य आययट्टिया जोगा भवन्ति, सएणं लाभेणं संतूसह परस्स लाभं नो आसाएड नो तक्केइ नो पीहे नो पत्थेइ नो अभिलसह, परस्स लाभं अणासाएमाणे अतकेमाणे अपीहेमाणे अपत्येमाणे अणभिलसेमाणे दुखं सुहसितं उवसंपचित्ता णं विहरह ३३॥ उवहिपचक्खाणं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ अपलिमंथं जणेइ, निरुवहिए णं जीवे निकले उवहिमंतरेण य न संकिलिस्सह ३४ ॥ आहारपञ्चक्खाणेणं भंते ! जीवे किं जणेइ १, २ जीवियासंसप्पओगं बुच्छिदइ, जीवियासंसप्पओगं बुच्छिदित्ता जीवे आहारमंतरेण न संकिलिस्सा ३५ ।। कसायपञ्चक्खाणं भंते ? जीवे किं जणेह १, २ वीयराय भावं जणेह बीयराय भावं पडिवन्नेऽविय णं जीवे समसुहदुक्खे भवइ ३६ || जोगपञ्चक्खाणेणं भंते !, २ अजोगयं जणेइ, अजोगी णं जीवे नवं कम्मं न बन्धइ पुव्वबद्धं
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम [१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--||
अध्ययनं [२९],
निर्युक्ति: [५०९...]
निज्जरे ३७ ॥ सरीरपचक्खाणं भंते०, २ सिद्धाइसयगुणत्तणं निव्वत्तेर, सिद्धाइसयगुणसंपन्ने य णं जीवे लोगग्गभावमुषगए परमसुही भवइ ३८ ॥ सहायपचक्खाणं भंते०, २ एगी भावं जणेइ, एगी भावभूए य जीवे एगग्गं भावेमाणे अप्पसद्दे अप्पझंझे अप्पकलहे अप्पकसाए अप्पतुमतुमे संजमबहुले संवरेषहुले | समाहिए आविभव ३९ ॥ भत्तपचक्खाणं भंते० १, २ अणेगाई भवसयाई निभइ ४० ॥ सम्भावपञ्चक्खाणं भंते० १, २ अणियहिं जणयह, अनियहिं पडिवन्ने य अणगारे चत्तारि केवलिकंमंसे खवेइ, तंजहावैयणिजं आउयं नामं गोयं, तओ पच्छा सिज्झइ ५, ४१ ॥ पडिवयाए णं भंते० १, २ लाघवियं जणेइ, लहभूए णं जीवे अप्पमत्ते पागडलिंगे पसत्थलिंगे विद्धमत्ते सत्तसमिइसमते सव्वपाणयजीव सत्तेसु वीससणिज्वरूये अप्पडिले जिइंदिए विपुलतवसमिसमन्नागए आवि भवइ ४२ ॥ वेयावच्चेणं मंते० १, २ तित्थपरनामगुत्तं कम्मं निबंध ४३ ॥ सव्वगुणसंपन्नयाए णं भंते ०१, २ अपुणरावतिं जणेइ, अपुणरावति पत्तए णं जीवे सारीरमाणसाणं दुक्खाणं नो भागी भवइ ४४ ॥ बीयरागयाए णं भंते० १, २ नेहाणुबंधणाणि तण्हाणुबंधणाणि य बुच्छिदइ मणुष्णामणुण्णेसु सद्दरूवरसफरिसगंधेसु सच्चित्ताचित्तमीसएस चैव विरजइ ४५ ॥ खंतीए णं भंते० १, २ परीसहे जिणेह ४६ ॥ मुत्तीए णं भंते १, २ अकिंचनं जणे, अकिंचणे य जीवे अत्थलोलाणं पुरिसाणं अपत्थणिज्जे भवद्द ४७ ॥ अज्जवयाए णं भंते, २ काउज्जययं भावुज्जययं भासुज्जुययं अविसंवायणं जणेइ, अविसंवायणसंपन्नयाए णं जीवे धम्मस्त आराहए भवइ ४८|| महवयाए णं भंते ?,
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
बृहद्धत्तिः
सूत्रांक
२९
[१R-७३]
जताय.४२ अणुस्सियत्तं जणेह, अणुस्सियत्ते ण जीवे मिउमदवसंपन्ने अट्ठ मयहाणाई निवेह ४९॥ भावसचेणं भंते सम्यक्त्वदि.२ भावविसोहिंजणेइ, भावचिसोहीए वहमाणे अरहंतपन्नत्तस्स धम्मस्स आराहणयाए अन्भुट्टेह, अरहतपन्न |
पराक्रमा. त्तस्स धम्मस्स आराहणपाए अन्भुद्वित्ता परलोगधम्मस्स आराहए भवइ ५०॥ करणसच्चेणं भंते,२ करण18 सतिं जणेइ, करणसच्चे वट्टमाणो जहावाई तहाकारी भवइ ५१ ।। जोगसच्चेण भंते ! णं जीवे०१, २जोगे
विसोहेइ ५२ ।। मणगुत्तयाए णं भंते,२ एगग्गं जणेइ, एगग्गचित्तेणं मणगुस्से संजमाराहए भवइ ५३ ॥ षयगुत्तयाए णं भंते०१,२ निविकारत्तं जणेइ, निम्विकारेणं जीवे वइगुते जोगे अज्झप्पजोगसाहणजुत्ते
यावि भवइ ५४ ॥ कायगुत्तधाए भंते०, संवर जणयह, संवरेणं कायगुते णं पुणो पावासवनिरोहं करेडर ४/५५॥ मणसमाधारणयाए णं भंते०१, २ एगग्गं जणेइ, एगग्गं जणइत्ता नाणपज्जवे जणयइ, नाणपज्जवे
जणइत्ता सम्मत्तं विसोहेइ, मिच्छत्तं च निजरेइ ५६ ॥ वयसमाहारणयाए णं भंते०१, २ वयसाहारणं इदिसणपज्जवे विसोहेइ, वइसाहारणं दसणपज्जवे विसोहित्ता सुलहबोहियत्तं च निव्वत्तेइ दुल्लहबोहियत्तं निजरेइ ५७॥ कायसमाधारणयाए णं भंते १,२ चरित्तपज्जवे विसोहेइ, चरित्तपज्जवे विसोहित्ता अहक्खायचरित्तं विसोहेइ २त्सा चत्तारि केवलिकम्मंसे खवेइ, तओ पच्छा सिझइ ५,५८॥ नाणसंपन्नयाए णं भंते.१४॥५७६॥ २ सव्वभावाभिगमं जणेइ, नाणसंपन्ने णं जीवे चाउरते संसारकंतारे न विणस्सई-'जहा सूई ससुत्ता, पडिया न विणस्सई । तहा जीवे समुत्ते, संसारे न विणस्सई ॥१॥ नाणविणयतवचरित्तजोगे संपाउणइ, ससमय
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [१०९...]
+84-5
प्रत
सूत्रांक [१R
RSC
-७३]
परसमयचिसारए य असंघायणिजे भवइ ५९ ॥ दसणसंपन्नयाए णं भंते ?, २ भवमिच्छत्सछेयणं! करेइ परं न विज्झायह, अणुत्तरेण नाणदसणेणं अप्पाणं संजोएमाणे सम्म भावेमाणे विहरह ६. चरित्तसंपन्नयाए णं भंते०१, २ सेलेसीभावं जणेइ, सेलेसिं पडिचन्ने अणगारे चत्तारि कम्मंसे खवेइ, तो पच्छा सिज्मइ ५, ६१ ॥ सोइंदियनिग्गहेणं भंते १, २ मणुन्नामणुन्नेमु सद्देसु रागहोसणिग्गहं जणे तप्पश्चाइयं च णं कम्मं न बंधड पुचवद्धं च निजरेइ ६२॥ एवं चखिदिय०६३ ॥ पाणिदिय०६४ ॥ जिन्भि-IA दिय० ६५॥ फासिंदिय० ६६॥ कोहविजएणं भंते !०१, २ खंतिं जणेइ कोहवेयणिज कम्मं न बंधद पुब्बनिवद्धं च निजरेइ ६७।। एवं माणविज० मद्दवं ६८॥ माया० अज्जवं ६९॥ लोभ० संतोसं ७०|| पिजदोसमिच्छादसणविजएणं भंते०१, २ नाणदसणचरित्ताराहणयाए अन्भुट्टेइ अट्ठविहस्स कम्मरस कम्मगंठिविमोयणयाए, तप्पढमयाए जहाणुपुवि अट्ठावीसइविहं मोहणिज्ज कम्मं उग्घाएइ, पंचविहं नाणावरणिज नवविहं दंसणावरणिज्जं पंचविहं अंतराय, एए तिनि कम्मसे जुगवं खवेइ, तओ पच्छा अणुत्तरं अणतं कसिणं पडि| पुन्नं निरावणं वितिमिरं विमुद्धं लोगालोगप्पभासगं केवलवरनाणदंसणं समुप्पाडेर जाय सजोगी हवह ताव य इरियावहियं कम निबंधइ-सुहफरिसं दुसमयडिईय, तं पढमसमए घळू बिइयसमए बेइयं तइयसमए निजिन्न, तं बद्धं पुढे उदीरियं वेइयं निजिन्नं, सेयाले अकम्मं चावि भवइ ७१॥ अहाउयं पालइत्ता अंतोमुहुत्तद्धावसेसाए जोगनिरोहं करेभाणो सुहुमकिरियं अप्पडिवाई सुकाणं झायमाणे तप्पामयाए
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
BA%
84
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
सम्यक्त्व
पराक्रमा.
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
उत्तराध्य-मणजोगं निरंभइ वयजोगं निरंभइ आणापाणनिरोहं करेइ, ईसिपंचहस्सक्खरुचारणद्वाए य णं अणगारे बृहद्वृत्तिः । समुच्छिन्नति
समुच्छिन्नकिरियं अणियहिसुकज्झाणं शियायमाणो वेयणिज्ज आउयं नामं गुत्तं च एए चत्तारिवि कम्मंसे.
जुगवं खवेइ ७॥ तओ ओरालियं कम्माई च सव्वाहि विप्पजहणाहिं विप्पजहित्ता उज्जुसेढीपत्ते अफुसमा॥५७७॥ णगई उहुं एगसमएणं अविग्गहेणं तत्थ गंता सागारोवउत्ते सिज्झइ जाव अंतंकरेइ ।।७३ ॥
___ सर्वस्य चास्य प्रयासस्य मुक्तिरेव फलं तत्र च प्रवृत्तिरभिलाषपूर्विका तद्रूपश्च संवेग इत्यादितस्तमाह-संवेगो8 मुक्त्यभिलाषस्तेन भदन्त ! इति पूज्याभिमवणं 'जीवः किं जनयति' जन्तुः कतरं गुणमुत्पादयतीति योऽर्थ ?, इति शिध्यप्रश्नः, अत्र प्रज्ञापकः प्रतिवचनमाह-संवेगेन'अनुत्तरां प्रधानां धर्म:-श्रुतधर्मादिस्तत्र श्रद्धा-तत्करणाभिलाषरूपा धर्मश्रद्धा तां जनयति, सदभावे हि न तत्सम्भवो, भावेऽपि वा देवलोकादिफलैवासाविति नानुत्तरत्वमस्याः, तयाऽपि किमित्याह-अनुत्तरया धर्मश्रद्धया संवेगं तमेवार्थाद्विशिष्टतरं 'हत्वंति शीघ्रमागच्छति, तद्यतिरेकेण हि विषयाघभिलाषतो न तथाऽस्मिन्नागमनम् , अनुत्तरधर्मश्रद्धायां त्वन्यत्र निरभिष्वङ्गतया नान्यथात्वसम्भवः, ततोऽपि किमित्याह-'अनन्तानुवन्धिक्रोधमानमायालोभान्' वक्ष्यमाणलक्षणान् क्षपयति, तथा 'कमें प्रस्तावादशुभ- ५७७|| प्रकृतिरूपं 'नवभाति' न श्लेषयति, एवमपि को गुणः ? इत्याह-स-कपायक्षयः प्रत्ययो-निमित्तं यस्याः सा तत्प्र| त्वया सैव तत्प्रत्ययिका खार्थ कन् प्रत्ययस्तां, चः' कर्माबन्धकत्वापेक्षया समुच्चये, मिथ्यात्वस्य 'विसोहि'त्ति विशोधनं
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम [१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१-७३] / गाथा || -- || निर्युक्तिः [५०९...]
अध्ययनं [२९],
विशुद्धिः सर्वथा क्षयो मिथ्यात्वविशुद्धिस्तां कृत्वा दर्शनस्य - प्रस्तावात्क्षायिकसम्यक्त्वस्थाराधको निरतिचारपालनाकृद्दर्शनाराधको भवति, तथाऽपि किमित्याह- दर्शनविशुद्ध्या च 'विशुद्ध्या' अत्यन्तनिर्मलया 'अस्ति' विद्यते 'एगय'त्ति एककः कश्चित्तथाविधो भवस्तेनैव 'भवग्रहणेन' जन्मोपादानेन सिद्ध्यति, किमुक्तं भवति ? - यस्मिन्नेव जन्मनि दर्शनस्य तथाविधा शुद्धिस्तत्रैव मुक्तिं गच्छति, यथा मरुदेवी स्वामिनी, यस्तु न तेनैव सिद्ध्यति स किमित्याह-शुद्ध्या-प्रक्रमादर्शनस्य विशुद्ध्या 'तचं 'ति तृतीयं पुनर्भवग्रहणम् - अन्यजन्मोपादानात्मकं 'नातिक्रामति' नातिवर्त्तते, अवश्यं तृतीयभवग्रहणे सिद्ध्यतीत्यर्थः, उत्कृष्टदर्शनाराधकापेक्षयैतत् यत उक्तम् - "उक्कोसदंसणे णं भंते! जीवे कहहिं भवग्गहणेहिं सिज्झिज्जा १, गोयमा ! उक्कोसेणं तेणेव ततो मुक्के तइयं णाइकमति” १ ॥ संवेगाचावश्यम्भावी निर्वेद इति तमाह-इतः प्रभृति सर्वत्र सुगमत्वान्न प्रश्नव्याख्या, 'निवेदेन' सामान्यतः संसारविषयेण कदाऽसौ त्यक्ष्यामीत्येवंरूपेण दिव्यमानुषतैरश्रेषु, सूत्रत्वात्कप्रत्ययः, यथासम्भवं देवादिसम्बन्धिषु कामभोगेषूतरूपेण निर्वेदं हवमागच्छति यथा-अलमेतैरनर्थहेतुभिरिति तथा च 'सर्वविषयेषु विरज्यते' अशेषशब्दादिविषयं विरागमाप्नोति, विरज्यमानस्तेषु आरम्भः - प्राण्युपमर्दको व्यापारस्तत्त्यागं करोति, विषयार्थत्वात्सर्वारम्भाणां तत्परित्यागं कुर्वन् 'संसारमार्ग ' मिथ्यात्वाविरत्यादिरूपं व्यवच्छिनत्ति, तत्त्यागयत एव तच्वत आरम्भपरित्यागसम्भवात् तद्यवच्छित्तौ च सुप्राप एव १ उत्कृष्टदर्शनेन भदन्त ! जीवः कतिभिर्भवग्रहणैः सिध्येत् ?, गौतम ! उत्कर्षेण तेनैव ततो मुक्तस्तृतीयं नातिक्राम्यति ।
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
सम्यक्त्व
प्रत
-%
सूत्रांक
[१R-७३]
सिद्धिमार्गः-सम्यग्दर्शनादिरिति सिद्धिमार्गप्रतिपन्नश्च भवति २॥ सत्यपि निवेदे धर्मश्रद्धैव सकलकल्याणनिवन्धनमिति ।
तामाह-'धर्मश्रद्धया उक्तरूपया सात-सातवेदनीयं तज्जनितानि सौख्यानि सातसौख्यानि प्राग्वन्मध्यपदलोपी समाबृहद्वृत्तिः
पराक्रमा. सस्तेषु वैषयिकसुखेष्वितियावत् 'रज्यमानः' पूर्व रागं कुर्वन् 'विरज्यते' विरक्तिं गच्छति, 'अगारधर्म च' गृहाचारं गार्ह॥५७८॥ स्थ्यमितियावत् ,चशब्दश्वेह वाक्यालङ्कारे, 'त्यजति' परिहरति, तदत्यागस्य विषयकसुखानुरागनिबन्धनत्वात् , ततश्च
'अणगार'त्ति प्राकृतत्वाद् 'अनगारी' यतिः सन् जीवः शारीरमानसानां दुःखानां किंरूपाणामित्याह-'छेदनभेदन
संयोगादीनामिति, छेदन-खड्गादिना द्विधाकरणं भेदन-कुन्तादिना विदारणम् , आदिशब्दस्वेहापि सम्बन्धाता-IR Kडनादयश्च गृधन्ते, ततश्छेदनभेदनादीनां शारीरदुःखानां संयोगः-प्रस्तावादनिष्टसम्बन्धः, आदिशब्दादिष्ट
वियोगादिपरिग्रहः, ततश्च संयोगादीनां मानसदुःखानां विशेषेण-पुनरसम्भवलक्षणेनोच्छेदः-अभावो व्युच्छेदस्तं करोति, तन्निवन्धनकर्मोच्छेदेनेति भावः, अत एव अव्यावाधम्' उपरतसकलपीडं मौक्तमितियावत् , 'चः' पुनरर्थे । |भिन्नकमस्ततः सुखं पुनः 'निर्वर्त्तयति' जनयति, पूर्व संवेगफलाभिधानप्रसङ्गेन धर्मश्रद्धायाः फलनिरूपणमिह तु दखातन्येणेत्यपीनरुक्त्यमिति भावनीयम् ३॥ धर्मश्रद्धायां चावश्यं गुरवः शुश्रूषितव्या इति गुरुशुश्रूषणमाह- ५७८॥
गुरूणां शुश्रूषणं-पर्युपासनं तेन 'विनयप्रतिपत्तिम्' उचितकर्त्तव्यकरणाझीकाररूपां जनयति 'विणयपडिवण्णे यत्ति प्राग्वत् प्रतिपन्नः-अङ्गीकृतो विनयो येन स तथा 'चः' पुनरर्थे जीवः 'अणचासायणासीले'त्ति अतीवाऽऽयं-सम्य
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५०९...]
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प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
क्वादिलाभं शातयति-विनाशयतीत्यत्याशातना तस्यां शीलं-तत्करणखभावात्मकमस्येत्यत्याशातनाशीलो न तथाऽ-| नत्याशातनाशीलः, कोऽर्थः -गुरुपरिवादादिपरिहारकृत, एवंविधश्च नैरयिकतिर्यग्योनिकमनुष्यदेवदुर्गतीरिति-नैरयिकाश्च तिर्यश्चय नैरयिकतिर्यश्चस्तेषां योनिः खार्थिक के नैरयिकतिर्यग्योनिके-प्रतीते 'मनुष्यदेवदुर्गती च' म्लेच्छकिल्बिषिकत्वादिलक्षणे 'निरुणद्धि' निषेधति, तद्धेतोरत्याशातनाया अभावेन तत्रागमनात्, तथा वर्णः-श्लाघा तेन सज्वलनं-गुणोद्भासनं वर्णसज्वलनं भक्तिः-अञ्जलिप्रग्रहादिका बहुमानम्-आन्तरप्रीतिविशेष एषां द्वन्द्वे भावप्रत्यये । |च वर्णसध्वलनभक्तिबहुमानता तया-प्रक्रमाद्गुरूणां विनयप्रतिपत्तिरूपया 'माणुस्सदेवसोग्गइओ'त्ति मानुष्यदेवसुगतीः विशिष्टकुलैश्चर्येन्द्रत्वाद्युपलक्षिता निवनाति तत्प्रायोग्यकर्मवन्धनेनेति भावः, 'सिद्धिसोम्मई'ति सिद्धिसुगति च विशोधयति, तन्मार्गभूतसम्यग्दर्शनादिविशोधनेन, 'प्रशस्तानि च प्रशंसास्पदानि 'विनयमूलानि' विनयहेतुकानि सवेकायांणीह श्रुतज्ञानादीनि परत्र च मुक्ति 'साधयति' निष्पादयति, तक्किमेव खार्थसाधक एवासावित्याहअन्यांश्च बहून् जीयान् ‘विनेता' विनयं ग्राहिता, स्वयं सुस्थितस्योपादेयवचनात् , उक्तं हि-"ठिओ उ ठावए परं"ति, तथा च विनयमूलत्वादशेषश्रेयसां तत्प्रापणेन परार्थसाधकोऽप्यसो भवत्येवेति भावः। गुरुशुश्रूषां कुवेतोऽप्य-18 तीचारसम्भवे आलोचनात एच विवक्षितफलप्राप्तिरिति तामाह-आङिति-सकलखदोषाभिव्यात्या लोचनाआत्मदोषाणां गुरुपुरतः प्रकाशनाऽऽलोचना तया माया-शाठ्यं निदान-ममातस्तपःप्रभृत्यादेरिदं स्यादिति प्रार्थनात्मकं मिथ्यादर्शनं-सांशयिकादि एतानि शल्यानीव शल्यानि ततः कर्मधारये मायानिदानमिथ्यादर्शनशल्यानि,
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अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक
[१R-७३]
उत्तराध्य.
यथा हि तोमरादिशल्यानि तत्कालदुःखदानेऽप्यायती दुःखदायीनि एवं मायादीन्यपीत्येवमुच्यते तेषां मोक्षवितानां'। सम्यक्त्वबृहद्वृत्तिः पापानुबन्धकर्मबन्धनिबन्धनत्वेन मुत्तयन्तरायाणां, तथाऽनन्तसंसारं बर्द्धयन्ति-वृद्धिं नयन्तीत्यनन्तसंसारवर्द्धनानि
| पराक्रमा. तेषाम् 'उद्धरणम्' अपनयनं करोति, तदुद्धरणतश्च 'ऋजुभावं च' आर्जवं जनयति 'उज्जुभावपडिवण्णे यति प्रति॥५७९||
पनर्जुभावश्च जीवः 'अमायी' मायारहितस्ततः पुंस्त्वनिबन्धनत्वादमायित्वस्य 'इथिवेय'त्ति प्राग्वद्विन्दुलोपे स्त्रीवेदं नपुंसकवेदं च न बनाति, पूर्वबद्धं च तदेव द्वयं यद्वा सकलमपि कर्म 'निर्जरयति' क्षपयति, तथा च मुक्तिपदमामोती
त्यभिप्रायः, उक्तं हि-"उद्धियदंडो साहू अचिरेण उवेइ सासयं ठाणं । सोवि अणुद्धियदंडो संसारपवहओ होति Sum" ति ५। आलोचना च दुष्कृतनिन्दावत एव सफला भवतीति तामाह-'र्णिदणयाए'त्ति, आषेत्वान्निन्दनम्
आत्मनैवात्मदोषपरिभावनं तेन 'पश्चादनुतापं' हा ! दुष्टमनुष्ठितमिदं मयेत्यादिरूपं जनयति, ततः पश्चादनुतापेन 'विरज्यमानः' वैराग्यं गच्छन् करणेन-अपूर्वकरणेन गुणहेतुका श्रेणिः करणगुणश्रेणिः सर्वोपरितनस्थितेर्मोहनीयादिकर्मदलिकान्युपादायोदयसमयात्प्रभृति द्वितीयादिसमयेष्वसङ्खचातगुणपुद्गलप्रक्षेपरूपाऽऽन्तर्मोहूर्तिकी, यत उक्तम्-18 "उंवरिमठिईइ दलियं हेट्ठिमठाणेसु कुणइ गुणसेढी । गुणसंकमकरणं पुण असुहाओं सुहृमि पक्खिवइ ॥१॥"
॥५७९|| १ उद्धृतदण्डः साधुरचिरेणैवोपैति शाश्वतं खानम् । सोऽपि चानुद्भुतण्डः संसारप्रवर्धको भवति ॥१॥२ उपरितनस्थितेदेलिकमधरसनस्थानेषु करोति गुणश्रेणिः । गुणसंक्रमकरणं पुनरशुभाः शुभे प्रक्षिपति ॥ २ ॥
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दीप अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
उपलक्षणत्वात्स्थितिघातरसघातगुणसङ्क्रमबन्धाश्च विशिष्टाः, अथवा करणगुणेन-अपूर्वकरणादिमाहात्म्येन श्रेणिः | करणगुणश्रेणिः प्रक्रमात्क्षपकश्रेणिरेव गृह्यते, यद्वा करणं-पिण्डविशुद्धादि तदुपलक्षितगुणाना ज्ञानादीना श्रेणिउत्तरोत्तरगुणपरम्पराखरूपा तां प्रतिपद्यते 'करणगुणसेढीपडिवणे यत्ति प्राग्वत्प्रतिपन्नकरणगुणश्रेणिकश्चानगारः 'मोहनीय दर्शनमोहनीयादि कर्म 'उद्घातयति' क्षपयति, तत्क्षपणे च मुक्तिप्राप्तिरित्यर्थत उक्तैव भवति ६ ॥ हा कश्चिदात्मनोऽत्यन्तदुष्टतां परिभावयन् न निन्दामात्रेण तिष्ठेत किन्तु गहामपि कर्यादिति तामाह-'गरिहणयाए'त्ति
गर्हणेन-परसमक्षमात्मनो दोषोद्भावनेन 'अपुरकारंति पुरस्करणं पुरस्कारो-गुणवानयमिति गौरवाध्यारोपो न तथाऽपुरस्कारः-अवज्ञास्पदत्वं तं जनयत्यात्मन इति गम्यते, तथा चापुरस्कारं गतः-प्राप्तः अपुरस्कारगतःसर्वत्रावज्ञास्पदीभूतो जीवः कदाचित्कदध्यवसायोत्पत्तावपि तद्भीतित एव 'अप्रशस्तेभ्यः' कर्मबन्धहेतुभ्यो योगेभ्यः 'निवर्त्तते' तान् न प्रतिपद्यते, प्रशस्तयोगांस्तु प्रतिपद्यत इति गम्यते, 'पसत्थजोगपडिवन्ने यत्ति प्रतिपन्नप्रशस्तयोगोऽनगारोऽनन्तविपयतयाऽनन्ते ज्ञानदर्शने हन्तुं शीलं येषां तेऽनन्तघातिनस्तान् 'पर्यवान्' प्रस्तावात् ज्ञानाव-11 रणादिकर्मणस्तद्घातित्वलक्षणान् परिणतिविशेषान् 'क्षपयति' क्षयं नयति, पर्यवाभिधानं च तद्रूपतयैव द्रव्यस्य विनाश इति ख्यापनार्थम् , उपलक्षणं चैतन्मुक्तिप्राप्तेः, तदर्थत्वात्सर्वप्रयासस्य, एवमनुक्ताऽपि सर्वत्र मुक्तिप्राप्तिरेवर फलत्वेन द्रष्टव्या ७ । आलोचनादीनि च सामायिकवत एव तत्त्वतो भवन्तीति तदुच्यते-सामायिकेन' उक्तरू
दीप
अनुक्रम [१११४
-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५०९...]
ॐ
प्रत
सूत्रांक
२९
5
[१R-७३]
उत्तराध्य. पेण सहापद्येन वर्तन्त इति सावद्या-कर्मवन्धहेतवो योगा-व्यापारास्तेभ्यो विरतिः-उपरमः सावद्ययोगविरतिस्तां
जनयति, तद्विरतिसहितस्यैव सामायिकसम्भवात्, न चैवं तुल्यकालत्वेनानयोः कार्यकारणभावासम्भव इति । बृहद्वृत्तिः बृहद्धत्तिःजत ताहरातसाहतस्वक
पराक्रमा. वाच्यं, केषुचित्तुल्यकालेष्वपि वृक्षच्छायादिवत्कार्यकारणभावदर्शनाद्, एवं सर्वत्र भावनीयम् ८ । सामायिकं चल ॥५८ प्रतिपचकामेन तत्प्रणेतारः स्तोतव्याः, ते च तत्त्वतस्तीर्थकृत एवेति तत्सूत्रमाह-'चतुर्विशतिस्तयेन' एतदवसर्पिणी
प्रभवतीर्थकृदुत्कीर्तनात्मकेन दर्शन-सम्यक्त्वं तस्य विशुद्धिः-तदुपघातिकर्मापगमतो निर्मलीभवनं दर्शनविशुद्धिस्तां जनयति ९ । स्तुत्वाऽपि तीर्थकरान् गुरुवन्दनपूर्विकैव तत्प्रतिपत्तिरिति तदाह-वन्दनकेन' आचार्याधुचितप्रतिप-16 |त्तिरूपेण 'नीचेोत्रम्' अधमकुलोत्पत्तिनिवन्धनं कर्म क्षपयति, 'उचैर्गोत्र' तद्विपरीतरूपं निवनाति, 'सौभाग्यं ।
च' सर्वजनस्पृहणीयतारूपम् 'अप्रतिहतं' सर्वत्राप्रतिस्खलितमत एवाज्ञा-जनेन यथोदितवचनप्रतिपत्तिरूपा |फलं 'निर्वर्त्तयति' जनयति, तद्वतो हि प्राय आदेयकर्मणोऽप्युदयसम्भवादादेयवाक्यताऽपि संभवतीति, 'दक्षि-1||
णभावं च' अनुकूलभावं जनयति लोकस्येति गम्यते, तन्माहात्म्यतोऽपि सर्वः सर्वावस्थाखनुकूल एव भवति १०॥ * एतद्गुणस्थितेनापि मध्यमतीर्थकृतां तीर्थेषु स्खलितसम्भवे पूर्वपश्चिमयोस्तु तदभावेऽपि प्रतिक्रमितव्यमिति प्रति- ५८०॥ क्रमणमाह-'प्रतिक्रमणेन' अपराधेभ्यः प्रतीपनिवर्तनात्मकेन व्रतानां-प्राणातिपातनिवृत्त्यादीनां छिद्राणि-1X अतिचाररूपाणि पिवराणि प्रतच्छिद्राणि 'पिदधाति' स्थगयति अपनयतीतियावत् , तथाविश्व के गुणमवाप्नोती
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
त्याह-पिहितव्रतच्छिद्रः पुनर्जीवः 'निरुद्धाश्रवः' सर्वधा हिंसाद्याश्रवाणां निरुद्धत्वात् , अत एवासबल-सबलस्थानरकखुरीकृतं चरित्रं यस्य स तथा, 'अष्टसु प्रवचनमातृषु' उक्तरूपासु 'उपयुक्त' अवधानवान् तत एवाविद्यमानं पृथक्त्वंप्रस्तावात्संयमोद्योगेभ्यो वियुक्तखरूपं यस्यासौ अपृथक्त्वः-सदा संयमयोगवान् , (अ) प्रमत्तो वा पाठान्तरात्, तथा 'सुप्रणिहितः' सुष्ठ संयमे प्रणिधानवान्, पाठान्तरतो वा सुष्ठु प्रणिहितानि-असन्मार्गात् प्रच्याव्य सन्मार्गे व्यवस्थापितानीन्द्रियाण्यनेनेति सुप्रणिहितेन्द्रियः विहरति' संयमाध्वनि याति ११ । अत्र चातीचारशुद्धिनिमित्त कायोत्सर्गः कर्तव्य इति तमाह-काय:-शरीरं तस्योत्सर्ग:-आगमोक्तनीत्या परित्यागः कायोत्सर्गस्तेन, अतीतं चेह चिरकालभावित्वेन प्रत्युत्पन्नमिव प्रत्युत्पन्नं चासनकालभावितयाऽतीतप्रत्युत्पन्नं 'प्रायश्चित्तम्' उपचारात्प्रायश्चित्ताईमतीचारं 'विशोधयति' तदुपार्जितपापापनयतोऽपनयति, विशुद्धप्रायश्चित्तश्च जीवो निर्वृत्तं-स्वस्थीभूतं हृदयम्अन्तःकरणमस्येति निवृत्तहृदयः, क इव ?-'ओहरिय'त्ति अपहृतः-अपसारितो भर इति-भारो यस्मात्स तथा, इवेति भिन्नक्रमः, ततो भारं वहतीति मूलविभुजादेराकृतिगणत्वात्कप्रत्यये भारवहो-वाहीकादिः स इव, भारप्राया खतीचारास्ततस्तदपनयनेऽपहतभरभारवाह इव निवृत्तहृदयो भवतीति भावार्थः, स च ध्यान-धर्माधुपगतःप्रासो ध्यानोपगतः पाठान्तरतः प्रशस्तध्यानध्यायी 'सुखसुखेन' सुखपरम्परावास्या 'विहरति' इहपरलोकयोरवतिष्ठते, इहैव जीवन् मुक्त्यवातेरिति भावः १२ । एवमप्यशुद्ध्यमाने प्रत्याख्यानं विधेयमिति तदाह-प्रत्याख्या
CCCCCCCCC++
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अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
५८१॥
२९
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
नेन' मूलगुणोत्तरगुणप्रत्याख्यानरूपेणाश्रवद्वाराणि निरुणद्धि, तन्निरोधहेतुत्वात्तस्य, उपलक्षणं चैतत् , पुरोपचितकर्म-10 सम्यक्त्वक्षये मुक्त्यङ्गत्वेनास्यान्यत्रोक्तत्वात् , तथा चाह-पचक्खाणमिणं सेविऊण भावेण जिणवरुद्दिई । पत्ताऽणंता जीवा
पराक्रमा. सासयसोक्खं लहुं मोक्खं ॥१॥"१३ । अत्र चोत्तरगुणप्रत्याख्यानान्तर्भूतं नमस्कारसहितादि, तहणानन्तरं च*
यत्र सन्निहितानि चैत्यानि(तत्र)तद्वन्दनं विधेयमित्युक्तं प्राक्, तब न स्तुतिस्तवमङ्गलं विनेति तदाह-तत्र स्तवाहै देवेन्द्रस्तवादयः स्तुतय-एकादिसप्तश्लोकान्ताः, यत उक्तम्-"एगदुगतिसिलोगा [धुइओ] अन्नेसिं जाव हुंति सत्तेव।
देविदत्वमाई तेण परं धुत्तया होंति ॥१॥"त्ति, ततश्च स्तुतयश्च स्तवाश्च स्तुतिस्तवाः, स्तुतिशब्दस्य क्यन्तत्वात्पू-II वेनिपातः, सूत्रे तु प्राकृतत्वाद्यत्ययनिर्देशः, स्तुतिस्तंवा एव मङ्गलं-भावमङ्गलरूपं स्तुतिस्तवमङ्गलं तेन ज्ञानदर्शनचारित्रात्मिका बोधिनिदर्शनचारित्रबोधिस्तस्य लाभो ज्ञानदर्शनचारित्रबोधिलाभः, परिपूर्णजिनधर्मावाप्तिरित्यर्थः, तं जनयति, उक्तञ्च-"भत्तीए जिणवराणं परमाए खीणपिजदोसाणं । आरोगबोहिलाभं समाहिमरणं च पार्वति ॥१॥" ज्ञानदर्शनचारित्रलाभबोधिसंपन्नश्च जीवोऽन्तः-पर्यन्तो भवस्य कर्मणां वा तस्य क्रिया-अभिनिवेत्तेन- मन्तक्रिया, मुक्तिरित्यर्थः, ततश्चान्तक्रियाहेतुत्वादन्तक्रिया ताम्, अन्तक्रियाहेतुत्वं च तद्भवेऽपि स्यादत आह
५८॥ १प्रत्याख्यानमिदं सेवित्वा भावेन जिनबरोदिष्टम् । प्राप्ता अनन्ता जीवाः शाश्वतसौख्यं लघु मोक्षम् ॥१॥ २ एकद्वित्रिश्लोकाः | स्तुतयोऽन्येषां यावद्भवन्ति सप्तव । देवेन्द्रस्तवाचास्ततः परं सवा भवन्ति ॥१॥ ३ भत्त्या जिनवराणां परमया क्षीणप्रेमद्वेषाणाम् ।। * आरोग्यबोधिलाभं समाधिमरणं च प्राप्नुवन्ति ॥ १॥
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अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
कल्पा-देवलोका विमानानि-अवेयकानुत्तरविमानरूपाणि तेषूपपत्तिर्यस्यां सा कल्पविमानोपपत्तिका तां, किमुक्तं भवति ?-अनन्तरजन्मनि कल्पादिपु विशिष्टदेवत्वावाप्तिफलां परम्परया तु मुक्तिप्रापिकाम् 'आराधना' ज्ञानाधारा-1 धनात्मिकाम् 'आराधयति' साधयति, इयं चैवंविधाऽऽराधना तपखितायामपि तथाविधगुरुकर्माणं तथाविध
कर्मवेदनाऽभाववन्तं च जीवमपेक्ष्योक्ता, अन्तक्रियाभाजनं च जीववस्तु चतुर्धा भवति, तथाहि-कश्चित्प्रतिपद्यापि ६ श्रामण्यं पालयन्नपि संयम तथाविधगुरुकर्मतया तथाविधविशिष्टाध्यवसायासम्भवेन तथाविधकर्मवेदनाया अभावान्नी
तद्भव एव मुक्तिभाग भवति, किन्तु भवान्तरे दीर्घपर्यायावाप्त्या, यथा सनत्कुमारचक्री, तथा च स्थानानम्"तत्थ खलु.इसे पढमे अंतकिरियावत्थू-महाकम्मे पञ्चायाए यावि भवति, समणाउसो। से णं समणे भवेत्ता अगाराओ अणगारं पवइओ उपट्टिए नेयाउयस्स मग्गस्स संजमबहुले समाहिबहुले (संवरबहुले) लूहे तीरहीओ उवहाणवं दुक्खंखवे तवस्सी, तस्स णं तहप्पगारे तवे भवति णो तहप्पगारा वेयणा भवति, से णं तहप्पगारे पुरिसजाए दीहदीहणं परियाएणं सिज्झइ बुज्झइ मुच्चइ परिणिवाति सवदुक्खाणमंतं करेइ, जहा से सणंकुमारे राया चाउरंतचकवट्टी
१ तत्र खलु इदं प्रथममन्तक्रियावस्तु-महाकर्मा प्रत्याजातश्चापि भवति, अमणायुष्मन् ! स श्रमणो भूत्वाऽगारात् अनंगारितां प्रत्रजितः | उपस्थिती नैयायिकाय मार्गाय संयमबहलः समाधिवाहुलः (संवरबहुल:) रूक्षस्तीरार्थी उपधानवान् दुःखक्षपका तपखी, तस्य तथाप्रकार तपो भवति ग तथाप्रकारा वेदना भवति, स तथाप्रकारः पुरुषजातो दीर्घदीर्पण पर्यायेण सिध्यति बुध्यति मुच्यते परिनिर्वाति सर्वदुःखानामत करोति, यथा स सनत्कुमारो राजा चातुरन्तचक्रवर्ती,
दीप
26LGROCESCk
अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
उत्तराध्य. पढमा अंतकिरियावत्थू १ । अहावरे दोचे अंतकिरियावत्थू महाकम्मा पञ्चायाए आविभवति समणाउसो ! सेणं मुंडे I भवित्ता अगारातो अणमारियं पचयाइ, उबट्टिए णेयाउयस्स जाव उवहाणवं दुक्खं खवेइ तबस्सी, तस्स णं तहप्पगारे
पराक्रमा. तवे भवति, तहप्पगारा वेयणा भवति, सेणं तहप्पगारे पुरिसजाए भवति, निरुद्धणं परियारणं सिझति जाव सब५८२॥ दुक्खाणमंतं करेति जहा से गयसुकुमाले अणगारे २।" अपरः पुनरल्पकर्मा श्रामण्यमवाप्य तथाविधतपसस्तथा
द्र वेदनायाश्चाभावात्तद्भवभाविना दीपयर्यायेण निर्वाणमानोति, यथा भरतश्चक्रवर्ती, यथोक्तम्-"अहावरे तचे अंतकिरि
यावत्थू अप्पकम्मे पचायाए यावि भवति, समणाउसो! से णं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पवएत्ति, उव-| ट्ठिए णेआउयस्स मग्गस्स संजमबहुले जाव सघदुक्खंखवे तवस्सी, तस्स णं णो तहप्पगारे तवे भवति नो तह-४ दाप्पगारा वेयणा भवति, से णं तहप्पगारे पुरिसज्जाए दीहेणं परियारणं सिज्झति, जहा से भरहे राया चाउरंतच-1
१ प्रथमाऽन्तक्रियास्थानं ? अथापरं द्वितीयमन्तक्रियास्थानं महाकर्मा प्रत्याजातश्चापि भवति श्रमणायुष्मन् ! स मुण्डो भूत्वाऽगारात् अनगारितां अन्नजति, उपस्थितो नैयायिकाय मार्गाय यावदुपधानवान् दुःखं क्षपयति, तस्य तथाप्रकारं तपो भवति तथाप्रकारा वेदना भवति । स तथापकारः पुरुषजातो भवति, (येन) निरुद्धेन पर्यायेण सिध्यति यावत् सर्वदुःखानामन्तं करोति यथा स गजसुकुमालोऽनगारः
२ अथापरं तृतीयमन्तक्रियावस्तु अल्पकर्मा प्रत्याजातश्चापि भवति, श्रमणायुष्मन्! स मुण्डों भूत्वाऽगारादनगारितां प्रनजति, उपस्थितो५८२॥ ४ नैयायिकाय मार्गाय संयमबहुलो यावत् सर्वदुःखक्षपकः तपस्वी, तस्य तथाप्रकारं न तपो भवति न तथाप्रकारा वेदना भवति, स तथाप्रकारः
पुरुषजातो दीर्पण पर्यायेण सिध्यति, यथा स भरतो राजा चातुरन्तचक्रवर्ती,
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अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
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सूत्रांक [१R
-७३]
पट्ठी ३॥" तदन्यस्त्वल्पकर्मा विरतिमवाप्य तथाविधविशुद्धाध्यवसायवशात्तथाविधतपस्तथाविधवेदना च लब्ध्वा
झगित्येव मुक्तिमधिगच्छति, यथा मरुदेवी स्वामिनी, तथा च तत्रैवोक्तम्-"अहावरे चउत्थे अंतकिरियावत्थू अप्पकम्मे / कापञ्चायाते यावि भवति, समणाउसो! से णं मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं परतिए उवहिए णेयाउयस्स मग्गस्स संजमबहुले जाव सचदुक्खंखवे तवस्सी, तस्स णं तहप्पगारे तवे भवति तहप्पगारा चेव यणा भवति, से णं तहप्प-20 गारे पुरिसजाए णिरुद्धणं परियाएणं सिज्झइ जाव सचदुक्खाणं अंतं करेति, जहा से मरुदेवी भगवतित्ति" पठन्ति च
अणंतकिरियं आराहणं आराहेति'त्ति" अत्र चाविद्यमानाऽन्तक्रिया-कर्मक्षयलक्षणा तद्भव एव यस्यां साऽनन्त-16 क्रिया तां परम्परामुक्तिफलामित्यर्थः १४ । अर्हद्वन्दनानन्तरं खाध्यायो विधेयः, स च काल एव, तत्परिज्ञानं च कालप्रत्युपेक्षणापूर्वकमिति तामाह-कालः-प्रादोषिकादिस्तस्य प्रत्युपेक्षणा-आगमविधिना यथावन्निरूपणा ग्रहणप्रतिजागरणरूपा कालप्रत्युपेक्षणा तया, ज्ञानावरणीयं कर्म क्षपयति, यथावत्प्रवृत्त्या तथाविधशुभभावसम्भवेनेतिर
१ अथापरं चतुर्थमन्तक्रियावस्तु अल्पकर्मा प्रत्यायातश्चापि भवति, श्रमणायुष्मन् ! स मुण्डो भूत्वाऽगारात् अनगारितां प्रबजितः, उपस्थितो नैयायिकाय मार्गाय संयमबहुलो यावत्सर्वदुःखक्षपकस्तपस्वी, तस्य तथाप्रकारं तपो भवति तथाप्रकारैव वेदना भवति, स तथाप्रकारः पुरुषजातो निरुद्धेन पर्यायेण सिध्यति यावत् सर्वदुःखानामन्तं करोति यथा सा मरुदेवी भगवतीति
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अनुक्रम [१११४
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
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सूत्रांक
५८३॥
[१R-७३]
भावः १५ । कथञ्चिदकालपाठे च प्रायश्चित्तं प्रतिपत्तव्यमिति प्रक्रमायातं तत्करणमाह-तत्र पापं छिनत्ति प्राय- सम्यक्त्व|श्चित्तं वा पिशोधयतीति नैरुक्तविधिना प्रायश्चित्तम्, उक्तं हि-"पावं छिदति जम्हा पायच्छित्तंति भण्णए तेणं ।
अपराक्रमा. पाएण वाऽवि चित्तं विसोहए तेण पच्छित्तं ॥१॥"ति, तचालोचनादि तस्य करणं-विधानं प्रायश्चित्तकरणं तेन | पापकर्मणां विशुद्धिः-अभावः पापकर्मविशुद्धिस्तां जनयति निरतिचारश्चापि भवति, तेनैव ज्ञानाचाराद्यतीचारविशोधनात् , सम्यक् च प्रायश्चित्तं प्रतिपद्यमानो मार्गः-इह ज्ञानप्राप्तिहेतुः सम्यक्त्वं तं च तत्फलं च ज्ञानं 'विशोध| यति' निर्मलीकुरुते, ततश्चाचर्यत इत्याचार:-चारित्रं तच तत्फलं च-मुक्तिलक्षणमाराधयति, न च ज्ञानदर्शनयोर्युगपद्भावभावित्वा तुफलभावाभाव इति वाच्यं, यत आगम:-"कारणकजविभागो दीवपगासाण जुगवजम्मेवि । जुगवुष्पन्नपि तहा हेऊ णाणस्स संमत्तं ॥१॥" यद्वा मार्ग-चारित्रप्राप्तिनिबन्धनतया दर्शनज्ञानाख्यं तत्फलं च चारित्रं तत आचारं च-ज्ञानाचारादि तत्फलं-मोक्षमाराधयति, अथवा 'मार्ग च' मुक्तिमार्ग क्षायोप-13 शमिकदर्शनादि तत्फलं च-तमेव प्रकर्षावस्थं क्षायिकदर्शनादि, शेष प्राग्वत्, विशोधनाऽऽराधनयोग सर्वत्र निर-13 तिचारतयैव हेतुरिति भावनीयम् १६ । प्रायश्चित्तकरणं च क्षमणावत एव भवत्यतस्तामाह-क्षमणा-दुष्कृतान- ५८॥
१ पापं छिनत्ति यस्मात् प्रायश्चित्तमिति भण्यते तस्मात् । प्रायेण वापि चित्तं विशोधयवि तेन प्रायश्चित्तम् ॥ १॥ २ कारणकार्यविभागो दीपप्रकाशयोर्चुगपजन्मन्यपि । युगपदुत्पन्नमपि तथा हेतु नस्य सम्यक्त्वम् ॥ २ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
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सूत्रांक [१R
-७३]
तरं क्षमितव्यमिदं मयेत्यादिरूपा तया 'पल्हाएणंतभावं जणयइत्ति प्रहादेन-आत्मनो मनःप्रसत्त्यात्मकेनान्तर्भा-11 (भा)वं-विनाशं प्रक्रमादनुशयस्य तजनितचित्तसंक्लेशस्य च 'जनयति' उत्पादयति प्रहादेनान्तर्भावमुपगतश्च, पठन्ति च-'पल्हायणभावं जणयति, पल्हायणभावमुवगए यत्ति, इह च प्रहादनभावः-चित्तप्रसत्तिरूपोऽभिप्रायः, सर्वे च ते प्राणाचेह द्वित्रिचतुरिन्द्रिया भूताश्च-तरवो जीवाश्च-पञ्चेन्द्रियाः सत्त्वाच-शेषजन्तवः सर्वप्राणभूतजीवसत्त्वाः, उक्तं हि-"प्राणा द्वित्रिचतुष्प्रोक्का, भूताश्च तरवः स्मृताः । जीवाः पञ्चेन्द्रिया ज्ञेयाः, शेषाः सत्वा इतीरिताः॥१॥" तेषु 'मित्रीभावं' परहितचिन्तालक्षणमुत्पादयति, ततो मैत्रीभावमुपगतश्चापि जीवः 'भावविशुद्धि' रागद्वेषविगमरूपां कृत्वा 'निर्भयः' इहलोकादिभयविकलो भवति, अशेषभयहेत्वभावादिति भावः १७ । एवंविधगुणावस्थितेन स्वाध्याये यतितव्यमिति तमाह-वाध्यायेन ज्ञानावरणीयमुपलक्षणत्वात् शेष |च कर्म क्षपयति, यत आह-"कम्ममसंखेजभवं खवेइ अणुसमयमेव आउत्तो । अन्नयरम्मिवि जोए सज्झायमि य Kाविससेणं ॥१॥"१८ । अत्र च प्रथम वाचनव विधयेति तामाह-वक्ति शिष्यतं प्रति गुराः प्रयोजकभावो वाचना *पाठनमित्यर्थस्तया 'निर्जरां' कर्मपरिशाटनं जनयति, तथा 'श्रुतस्य' आगमस्य चस्य भिन्नक्रमत्वादनाशातनायां च वर्तते, तदकरणे एवज्ञातः श्रुतमाशातितं भवेत् न तु तत्करण इति, पठन्ति च-'अणुसजणाए वट्टई तत्रानुपङ्ग(अ)
१ कर्मासंख्येयभविक क्षपयति अनुसगयमेवाऽऽयुक्तः । अन्यतरस्मिन् योगेऽपि स्वाध्याये च विशेषेण ॥ १॥
दीप
अनुक्रम [१११४
-११८७]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
उत्तराध्य.
नमनुवर्त्तनं तत्र वर्त्तते, कोऽर्थः ?-अव्ययच्छेदं करोति, ततः श्रुतस्यानाशातनायामनुषअने वा वर्तमानः तीर्थमिह सम्यक्त्व गणधरस्तस्य धर्म:-आचारः श्रुतधर्मप्रदानलक्षणस्तीर्थधर्मः यदिवा तीर्थ-प्रवचनं श्रुतमित्यर्थस्तद्धर्म:-स्वाध्यायस्त
पराक्रमा. बृहद्वृत्तिः
मवलम्बमानः-आश्रयन् महती बहुतरकर्मविषयत्वान्निर्जराऽस्येति महानिर्जरो महत्-महाप्रमाणपर्यवसितत्वेन ॥५८६ प्रशस्वं वा मुक्त्यवाप्त्या पर्यवसानम्-अन्तः कर्मणो भवस्य वा यस्य, चस्य गम्यमानत्वान्महापर्यवसानश्च भवति
मुक्तिभाग् भवतीति हृदयम् १९ । गृहीतवाचनेनापि संशयायुत्पत्तौ मुदा प्रष्टव्यमिति प्रतिप्रच्छनावसर इति तामाह-तत्र प्रथमं कथितस्य सूत्रादेः पुनः प्रच्छन्नं प्रतिप्रच्छन्नं तेन सूत्रार्थतदुभयानि विशोधयति, संशयादिमा-IM लिन्यापनयनेन विशुद्धानि कुरुते, तथा काङ्क्षा-इदमित्थमित्थं च ममाध्येतुमुचितमित्यादिका वान्छा सैव मोहयति 'अन्यत्रापी'ति वचनादनीयरि काङ्खामोहनीय कर्म अनभिग्रहिकमिथ्यात्वरूपं 'व्युच्छिनत्ति' विशेषेणापनयति २० । इत्थं विशोधितस्यापि सूत्रस्य मा भूद्विस्मरणमिति परावर्तनाऽवसरः, तत्र च 'परियट्टणाए'त्ति सूत्र|त्वात्परावर्तना-गुणनं तया व्यज्यते एभिरर्थ इति व्यञ्जनानि-अक्षराणि 'जनयति' उत्पादयति, तानि हि विगलितान्यपि गुणयतो शगित्युत्पतन्तीत्युत्पादितान्युच्यन्ते, तथा तथाविधकर्मक्षयोपशमतो व्यजनलम्धि, चशब्दाद् व्यजनसमुदायात्मकत्वाद्वा पदस्य तल्लब्धि च पदानुसारितालक्षणामुत्पादयति २१। सूत्रवदर्थेऽपि संभवति विस्मरणमतः सोऽपि परिभाषनीय इत्यनुप्रेक्षा प्रस्तावात्सूत्रानुप्रेक्षा-चिन्तनिका तया प्रकृष्टशुभभावोत्पत्तिनिवन्धन
GESCRG
दीप
॥५८४॥
अनुक्रम [१११४-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
तयाऽऽयुष्कवर्जाः सप्त कर्मप्रकृतीः 'धणिय'ति बाढं बन्धन-श्लेपणं तेन बद्धा निकाचिता इत्यर्थः 'शिथिलबन्धनबद्धाः' किश्चिन्मुत्कलाः, कोऽर्थः ?-अपवर्त्तनादिकरणयोग्याः प्रकरोति, तपोरूपत्वादस्याः, तपसश्च निकाचितकर्मक्षपणेऽपि क्षमत्वात् , उक्तं हि-"तवसा उ निकाइयाणंपि"त्ति, दीर्घकालस्थितिका हखकालस्थितिकाः प्रक-13 रोतीति, शुभाध्यवसायवशास्थितिख(क)ण्डकापहारेणेति भावः, एतचैवं, सर्वकर्मणामपि स्थितेरशुभत्वात् , यत | उक्तम्-"सेबासिपि ठितीओ सुभासुभाणपि होति असुभाओ । माणुसतिरिच्छदेवाउयं च मोत्तूण सेसाणं ॥१॥" तीब्रानुभावाश्चतुःस्थानिकरसत्वेन मन्दानुभावाः त्रिस्थानिकरसत्वाद्यापादनेन प्रकरोति, इह चाशुभप्रकृतय एव गृह्यन्ते, शुभभावस्य शुभाशुभतीप्रा(प्रमन्दा)नुभावहेतुत्वात् , उक्तं हि-"सुभपयडीण विसोही[ए]तिवमसुभाण संकिलेसेणं । अन्नं हिऽविसोहीए"त्ति, शुभभावेन तीब्रमित्यनुभागं वनातीति प्रक्रमः, कचिदिदमपि दृश्यते-"बहु
पएसग्गाओ अप्पपएसम्गातो करेति" ननु केनाभिप्रायेणायुष्कवर्जाः सप्तेत्यभिधानं ?, शभायुप एव संयतस्य सम्भ-18 ६ वात्, तस्यैव चानुप्रेक्षा तात्विकी, न च शुभभावेन शुभप्रकृतीनां शिथिलतादिकरणं, संक्लेशहेतुकत्वात्तस्य, आहशुभायुर्वन्धोऽप्यस्याः किं न फलमुक्तम् ?, उच्यते, आयुष्कं च कर्म स्वाभाति, तस्स त्रिभागादिशेषायुष्कताया-1
१ तपसा तु निकाचितानामपि २ सासामपि खितयः शुभाशुभानामपि भवन्त्यशुभाः। मनुष्यतिर्यग्देवायूंषि च मुक्त्वा शेषाणाम् ॥२॥ ३ शुभप्रकृतीनां विशुममा तीनमशुभाना संछेशेन । अन्य हि अविशुङमा ।। ४ बहुप्रदेशापा अस्पप्रदेशामाः करोति
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५०९...]
प्रत
सूत्रांक
[१R-७३]
उत्तराध्य.
मेव वन्धसम्भयात्, उक्तं हि-"सिय तिभागे सिय तिभागतिभागे" इत्यादि, ततस्तस्य कादाचित्कत्वेन विवक्षि-18 सम्यक्त्व
तत्वात्तद्वतच कस्यचिन्मुक्तिप्रास्तद्वन्धानभिधानमिति भावः, अपरं च 'असातवेदनीयं शारीरादिदुःखहेतुं कर्म वृहद्वृत्तिः
पराक्रमा. चशब्दादन्याश्चाशुभप्रकृतीः 'नो' नैव भूयोभूयः 'उपचिनोति' वनाति, भूयोभूयोग्रहणं त्वन्यतमप्रमादतः प्रमत्त॥५८५॥
संयतगुणस्थानवर्त्तितायां तद्वन्धस्यापि सम्भवात् , अन्ये वेवं पठन्ति-सायावेयणिजं च णं कम्मं भुजो भुज्जो उप- २९ । है चिणाति' इह च शुभप्रकृतिसमुच्चयार्थश्चशब्दः, शेषं स्पष्टम् , 'अनादिकम् आदेरसम्भवात् , 'च' समुच्चयार्थों
योक्ष्यते 'अणवयग्ग'न्ति अनवदत्-अनपगच्छत् 'अगं' परिमाणं यस्य सदाऽवस्थितानन्तपरिमाणत्न सोऽयमनव|दनोऽनन्त इत्यर्थस्तं, प्रवाहापेक्षं चैतत् , अत एव 'दीहमद्धं ति मकारोऽलाक्षणिकः दीर्घाद्ध' दीर्घकालं दी? |वाऽध्या-तत्परिभ्रमणहेतुः कर्मरूपो मार्गों यस्मिंस्तत्तथा,चत्वारः-चतुर्गतिलक्षणा अन्ताः-अवयवा यमिंस्तचतुरन्तं संसारकान्तारं क्षिप्रमेव-शीघ्रमेव 'बीतीवयति'त्ति 'व्यतिब्रजति' विशेषेणातिकामति, किमुक्तं भवति ?-मुक्तिमवाप्नोति ।
२२ । एवमभ्यस्तश्रुतेन च धर्मकथाऽपि विधेयेति तामाह-'धर्मकथया' व्याख्यानरूपया निर्जरां जनयति, पाठादन्तरतच प्रवचनं 'प्रभावयति' प्रकाशयति, उक्तं च-"पावयणी धम्मकही चादी मित्तिओ तबस्सी य। विजा सिद्धो|४|१५८५॥ य कवी अटेव पभावगा भणिया ॥१॥" 'आगमिसस्समद्दत्ताए'ति सूत्रत्वादागमिष्यदिति-आगामिकालभावि १ साविभागे स्यात्रिभागत्रिभागे २ प्रावधनी धर्मकथिको वादी नैमित्तिकस्तपस्वी च । विद्या सिद्धश्च कविरदैव प्रभावका भणिताः ॥११॥
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अनुक्रम [१११४-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
भद्र-कल्याणं यस्मिंस्तथा तस्य भावस्तत्ता तया,यदिवाऽऽगमिष्यतीत्यागमः-आगामी कालस्तस्मिन् शश्वद्भद्रतया-अन-14 वरतकल्याणतयोपलक्षितं कर्म निवभाति, शुभानुबन्धि शुभमुपार्जयतीति भावः २३ । इत्थं च पञ्चविधवाध्यायर-1 तेन श्रुतमाराधितं भवतीति तदाराधनोच्यते-श्रुतस्य 'आराधनया' सम्यगासेवनया 'अज्ञानम्' अनवबोधं 'क्षपयति' अपनयति, विशिष्टतत्त्वावबोधावाः, 'न च संक्लिश्यते' नैव रागादिजनितसंक्लेशभाग भवति, तद्वशतो नव
नवसंवेगावाः , उक्तं हि-"जह जह सुयमो(मव)गाहइ अइसयरसपसरसंजुयमपुत्र । तह तह पल्हाइ मुणी णवराणवसंवेगसद्धाए ॥१॥"त्ति २४ । श्रुताराधना चैकाग्रमनःसंनिवेशनात एव भवत्यतस्तामाह-एकमग्रं-प्रस्तावाला च्छुभमालम्बनमस्येत्येकाग्रं तच तन्मनश्च तस्य संनिवेशना-स्थापना, एकाग्रे वा मनःसंनिवेशना तया चित्तस्खेतखत उन्मार्गप्रस्थितस्य निरोधो-नियत्रणा चित्तनिरोधस्तं करोति २५। एवंविधस्यापि संयमादेवेष्टफलावाप्तिरिति तमाह-संयमेन' पञ्चाश्रवविरमणादिना 'अणण्यत्त'ति अनंहस्कत्वम्' अविद्यमानकर्मत्वं जनयति, आश्रवविर-2 मणात्मकत्वादस्य २६ । संयमवतोऽपि न तपो विना कर्मक्षय इति तदाह-तपसा' वक्ष्यमाणेन 'चोदाणं'ति 'व्यवदानं' पूर्ववद्धकर्मापगमतो विशिष्टां शुद्धिं जनयति २७। इत्थं व्यवदानस्य तपोऽनन्तरफलत्वात्त(स्य तदाह-व्यवदानेन 'अक्रियम्' अविद्यमानक्रिय, कोऽर्थः-व्युपरतक्रियाख्यं शुक्लध्यानचतुर्थ भेदं जनयति, 'अक्रियाका' ब्युपरतक्रिया
१ यथा यथा श्रुतमवगाहते अतिशयरसग्रसरसंयुतमपूर्वम् । तथा तथा प्रहादयति मुनिर्नवनवसंवेगश्रद्धया ॥१॥
दीप
अनुक्रम [१११४
-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
सम्यक्त्व.
प्रत
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥५८६॥
पराक्रमा.
सूत्रांक
[ER
-७३]
ख्यशुक्लध्यानवर्ती भूत्वा ततः पश्चात् तदनन्तरं 'सिध्यति' निष्ठितार्थों भवति 'बुध्यते' ज्ञानदर्शनोपयोगाभ्या च वस्तुतत्त्वमवगच्छति, न तु नवात्मगुणात्यन्तोच्छेदात्मकमुक्तिवादिनामियाबुद्धिमान् भवति, मुच्यते संसारान्न तु 'दग्धेन्धनः पुनरुपैति भव'मित्यादिवादिपरिकल्पितमुक्तवत्पुनरिहागमनवान् अत एव परिनिर्वातीत्यादि प्राग्वत. आह-अनन्तरं तपसो व्यवदानं फलमुक्तं, तच मुक्त्याख्यफलोपलक्षकमित्यतिदेशेनोक्तमिति किं पुनस्तत्फलत्वेन । साक्षादस्वाभिधानम् , उच्यते, सूत्रकृतां वैचित्र्यख्यापनार्थ. ते हि परार्थीयतचेतसः परेषां प्रज्ञाप्रकर्षापकर्षावपेक्ष्य कचित्साक्षादभिधानोचितानप्यानस्पष्टतया निर्दिष्टवन्तः कचित्तु गम्यानपि च साक्षादन्यत्र तूभयथेति २८ ।। व्यवदानं च सत्सपि संयमादिषु सुखशायितायामेव भवतीति तामेवाह, तत्र च सुखं शेते, कोऽभिप्रायः ?प्रवचनशङ्कादीनां परलाभकामभोगशरीरसंवाधनादिमदनस्पृहादीनां च क्रमेणाभावरूपासु चतसषु सुखशय्यासु स्थितत्वेन मनोविघाताभावान्निराकुलतयाऽऽस्त इति सुखशायि तस्य भायः सुखशायिता, प्राकृतत्वात्सूत्रे यलोपः, तयाऽनुत्सुकत्यं कोऽर्थः ?-परलाभदिव्यमानुषकामभोगेषु सर्वदा निःस्पृहत्वं, यदिवा 'सुहसायार'त्ति प्राकृतत्वात्सुखं-वैषयिक शातयति-तद्गमनस्पृहानिवारणेनापनयतीति सुखशातस्तस्य भावः सुखशातता तया, पठन्ति च- 'सुहसाएणं ति, तत्र च सुखशायः-सुखेन शयनं तेन, यदिवा सुखशातः-सुखस्य शातनं तेन जीवः 'अनुत्सुकत्वं'। विषयसुखं प्रति निःस्पृहत्वं 'जनयति' उत्पादयति, संयमादिष्वेव निष्पन्नमानसत्वात् , अनुत्सुकश्च जीवोऽनु
दीप
CROACHECC
अनुक्रम [१११४
५८६॥
-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
ACT
-७३]
सह कम्पत इत्यनुकम्पका, सुखोत्सुको हि म्रियमाणमपि प्राणिनमवलोकयन् खसुखरसिक एवासीत् अयं तु तद्विपरीत इति दुःखेन कम्पमानमवलोक्य तदुःखदुःखितया स्वयमपि तत्काल एवं कम्पत इति, तथा 'अनुटः | अनुल्वणः 'विगतशोकः' नैहिकार्थभ्रंशेऽपि शोचते, मुक्तिपदवद्धस्पृहत्वात्, एवंविधश्च प्रकृष्टशुभाध्यवसायतश्चारि
त्रमोहनीयं कर्म क्षपयति २९ । सुखशय्यास्थितस्य चाप्रतिवद्धता भवतीति तामभिधातुमाह-'अप्रतिवद्धतया' मनसि ४. निरभिष्वङ्गतया 'निःसत्वं' बहिःसाभावं जनयति, निःसङ्गत्वेन जीव एको रागादिविकलतया तत एव 'एका-16 ग्रचित्तः' धर्मकतानमना एकाग्रताविवन्धकहेत्वभावात्, ततश्च दिवा वा रात्री वाऽसजन्, कोऽर्थः -सदा बहिः-15 सहं त्यजन्नप्रतिवद्धश्चापि विहरति, कोऽभिप्रायः ?-विशेषतः प्रतिबन्धविकलो मासकल्पादिनोवतविहारेण पर्यरति ३० । अप्रतिबद्धता च विविक्तशयनासनतायां संभवत्सतस्तामाह-विविक्तानि-ख्याद्यसंसक्तानि शयनासनान्युपलक्षणत्वादुपाश्रयश्च यस्यासौ विविक्तशयनासनस्तद्भावस्वत्ता तया 'चारित्रगुप्ति' चरणरक्षां जनयति 'चरित्तगु
'त्ति प्राग्वद, गुप्तचरित्रश्च जीवो विविक्तो-विकृत्यादिरहित आहारो यस्य स तथा, गुप्तचारित्रो हि सर्वत्र । निःस्पृह एव भवति, तथा दृढं-निश्चल चरित्रमस्येति दृढचरित्रस्तत एवैकान्तेन-निश्चयेन रतः-अभिरति|मानेकान्तरतः संयम इति गम्यते, तथा मोक्षे-मुक्तौ भावेन-अन्तःकरणेन प्रतिपन्न-आश्रितः मोक्षभावप्रतिपन्नः मोक्ष एव मया साधयितव्य इत्यभिप्राययान् अष्टविधकर्मग्रन्थिरिव प्रन्धिर्दु दतयाऽष्टविधकर्मप्रन्धिस्तं 'निर्ज
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
ROCOM
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
॥५८७॥
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
ॐ-रहकरल
२९
उत्तराध्य. रयति' क्षपकश्रेणिप्रतिपत्त्या क्षपयति ३१ । विविक्तशयनासनतायां च विनिवर्त्तना भवतीति तामाह-विनिवर्त्त- सम्यक्त्व
नया' विषयेभ्य आत्मनः पराङ्मुखीकरणरूपया 'पापकर्मणां' सावद्यानुष्ठानानाम् 'अकरणतया' न मया पापानि । बृहद्वृत्तिः
पराक्रमा. व कर्तव्यानीत्येवंरूपया 'अभ्युत्तिष्ठते' धर्म प्रत्युत्सहते, पूर्ववद्धानां पापकर्मणामिति प्रक्रमः, चशब्दो निर्जरणान
न्तरं द्रष्टव्यः ततः पूर्वबद्धानां निर्जरणया चशब्दादभिनवानुपादानेन च तदिति कर्म 'निवर्त्तयति' विनाशयति,
यदिवा पापकर्मणां-ज्ञानावरणादीनाम् 'अकरणयाइ'त्ति आर्षत्वाद् 'अकरणेन' अपूर्वानुपार्जनेनाभ्युत्तिष्ठते मोक्षा६ येति शेषः, पूर्ववद्धानां च कर्मणां निर्जरणया, अन्यत्प्राग्वत् ४० । विषयनिवृत्तश्च कश्चित्सम्भोगप्रत्याख्यानवान्ट्र
संभवत्यतस्तदाह-समिति-संकरेण-खपरलाभमीलनात्मकेन भोगः सम्भोगः,एकमण्डलीकभोक्तृत्वमिति योऽर्थः तस्य प्रत्याख्यान-गीतार्थावस्थायां जिनकल्पाद्यभ्युद्यतविहारप्रतिपच्या परिहारः सम्भोगप्रत्याख्यानं तेन 'आलम्बनानि |ग्लानादीनि 'क्षपयति' तिरस्कुरुते, सदोद्यतत्वेन वीर्याचारमेवावलम्बते, निरालम्बनस्य चायतो-मोक्षः संयमो वा स एवार्थ:-प्रयोजनं विद्यते येषामित्यायतार्थिकाः 'योगा' व्यापारा भवन्ति प्रपञ्चतश्च प्रवर्तन्ते, तथा 'खकीयेन' आत्मीयेन लाभेन 'सन्तुष्यति' निरभिलापो भवति, परस्य लाभ नो तर्कयति नो स्पृहयति नो प्रार्थयति नो ५८७॥ अभिलपति, तत्र तर्कणं-मनसा यदि मह्यमसौ ददातीति विकल्पनं, स्पृहणं-तच्छद्धालुतयाऽऽत्मन आविष्करणं, प्रार्थनं-बाचा मह्यं देहीति याचनम् , अभिलषणं-तलालसतया वाञ्छनम् , एकार्थिकानि वैतानि नानादेशजविनेयानु
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अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
हायोपात्तानि, एवंविधश्च यं गुणमवाप्नोति तमेवोक्तानुवादेनाह-'परस्स लाभ आणासाएमाणे'त्ति, 'अनाशयमानः |आशाविषयमकुर्याणोऽनाखादयन् वाऽभुजानोऽतर्कयन्नस्पृहयन्नप्रार्थयमानोऽनभिलषन् 'दोचंति द्वितीयां सुखशय्याम
'उपसंपद्य' प्राप्य विहरति, एवंविधरूपत्वात्तस्याः, तथा च स्थानाङ्गम्-"अहावरा दोचा सुहसेज्जा से णं मुंडे भवित्ता है अगाराओ अणगारियं पञ्चइए समाणे सएणं लाभेणं सन्तुसति परस्स लाभं नो आसाएति णो तकेइ णो पीहेइ णो
पत्थेइ नो अभिलसेति, से णं परस्स लाभं अणासाएमाणे अतकेमाणे अपीहेमाणे अपत्थेमाणे अणभिलसमाणे णों मणं । उच्चावयं नियच्छति णो विणिघायमावजइत्ति इह च 'अणासाएमाणे' इत्युत्तरत्र वचनात् स्थानाङ्गे च दर्शनात् , पूर्व-I त्रापि 'णो आसाएई' इति [बहुवचनमनुमीयते, तच गम्यतया न निर्दिष्टं लेखकदोपेण वा न दृश्यत इति न विद्मः ३३॥ सम्भोगप्रत्याख्यानवतश्चोपधिप्रत्याख्यानमपि संभवतीति तदाह, तत्रोपधिः-उपकरणं तस्य.रजोहरणमुखवस्त्रिकाव्य-14 तिरिक्तस्य प्रत्याख्यानं न मयाऽसौ ग्रहीतव्य इत्येवंरूपा निवृत्तिरुपधिप्रत्याख्यानं तेन परिमन्धः-खाध्यायादिक्षति| १ अथापरा द्वितीया सुखशय्या स मुण्डो भूत्वाऽगारादनगारिता प्रबजितः सन् खकेन लाभेन संतुष्यति परस्य लाभं नास्वादयति न तर्कयत्ति न स्पृहयति न प्रार्थयति नाभिलष्यति, स परस्य लाभमनासादयन् अतर्कयन् अस्पृहयन अप्रार्थयमानोऽनभिलष्यन् नो मनः | उसावचं नियच्छति नो विनिधातमापद्यते
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
बृहद्वृत्तिः
२९
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
द
उत्तराध्य.
सदभावोऽपरिमन्थस्तं जनयति, तथा निष्क्रान्त उपधेर्निरुपधिको जीवः 'निष्कासः' वस्त्राथभिलापरहितः सन् , सम्यक्त्वएतच पदं कचिदेव दृश्यते, उपधिमन्तरेण चस्य भिन्नक्रमत्वान्न संक्लिश्यति-न च मानसं शारीरं वा क्लेशमामोति, उक्तं
पराक्रमा. हि-"तस्स णं भिक्खुस्स णो एवं भवति-परिजुन्ने मे वत्थे सूई जाइस्सामि संधिस्सामि उकंसिस्सामि तुण्णिस्सामिल ॥५८८॥वोकसिस्सामि" इत्यादि ३४। उपधिप्रत्याख्याता चाहारमपि प्रत्याचष्टे, यतो जिनकल्पिकादिरेषणीयालामे बहून्यपिका
|दिनान्युपोषित एवास्तेऽत आहारप्रत्याख्यानमाह-'आहारप्रत्याख्यानेन' अनेषणीयभक्तपाननिराकरणरूपेण जीवितेप्राणधारणरूपे आशंसा-अभिलापो जीविताशंसा तस्याः प्रयोगो-व्यापारणं करणं जीविताशंसाप्रयोगस्तं व्यवच्छिनत्ति, आहाराधीनं हि मनुजानां जीवितमतस्तत्प्रत्याख्याने तदाशंसासु व्यवच्छेदो भवति, पठन्ति च-'जीवियास-11 विप्पओगं योछिदिय'त्ति, तत्र जीविताशया विप्रयोगो-विविधव्यापारस्तं व्यवच्छिनत्ति, जीविताशया साहार एव मुख्यो व्यापारस्ततस्तत्प्रत्याख्याने शेषव्यापारन्यवच्छेदः सुकर एव भवतीति, ततश्च जीविताशंसाप्रयोगं जीविताशा-| विप्रयोग वा विच्छिद्य जीवः 'आहारम्' अशनादिकम् 'अन्तरेण विना न संक्लिश्यति, कोऽर्थः-विकृष्टतपोऽनुष्ठान-112 वानपि न वाधामनुभवति ३५ । एतच प्रत्याख्यानत्रयमपि कपायाभाव एव फलवदिति तत्प्रत्याख्यानमुच्यते- ॥५८८॥ कषायप्रत्याख्यानेन-क्रोधादिविनिवारणेन वीतो-विगतो रागो द्वेषविगमाविनामावित्वात्तद्विगमस्य द्वेषश्चास्येति । १ तस्य भिक्षोनवं भवति-परिजीण मे वस्त्रं सूचि याचयिष्यामि संधास्ये उत्कर्षयिष्यामि तूणयिष्यामि (व्येष्यामि ) व्युत्कर्षयिष्यामि |
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
%
प्रत
सूत्रांक [१R
.
-७३]
वीतरागस्तद्भावं जनयति, 'वीतरागभावपडिबन्ने यत्ति, अपिचेत्यस्य पुनरर्थत्वात्प्रतिपन्नवीतरागभावः पुनर्जीवः
समे-रागद्वेषाभावतस्तुल्ये सुखदुःखे यस्य स तथाविधो भवति, रागद्वेपाभ्यां हि तत्र वैषम्यसम्भवः, तदभावे तु *समतैवावशिष्यते ३६ । निष्कषायोऽपि योगप्रत्याख्यानादेव मुक्तिसाधक इति तदुच्यते, तत्र योगा-मनोवाकायव्यापारास्तत्प्रत्याख्यानेन-तन्निरोधलक्षणेन 'अयोगत्वं' वक्ष्यमाणन्यायेनायोगिभावं जनयति, अयोगी जीवः ('नवं'। प्रत्यग्रं 'कर्म' सातवेदनीयायपि न बनाति तत्कारणयोगाभावात्,) पूर्वबद्धम्' इति भवोपग्राहिकर्मचतुष्टयमन्यस्य तदाऽसंभवात् 'निर्जरयति' क्षपयति ३७। योगप्रत्याख्यानतः शरीरमपि प्रत्याख्यातमेव भवति, तथाऽपि तदाधारत्वान्मनोयाग्योगयोस्तत्प्राधान्यख्यापनार्थ तत्प्रत्याख्यानमेवाह, तत्र शरीरम्-औदारिकादि तत्प्रत्याख्यानेन ४ सिद्धानामतिशयगुणा न कृष्णा न नीला इत्यादयो यस्य स सिद्धातिशयगुणो गमकत्वाददुव्रीहितद्भावस्तत्त्वम् ,उक्तं हिहै "से ण किण्हे ण नीले ण हालिद्दे" इत्यादि 'निर्वर्तयति' जनयति, सिद्धातिशयगुणसंपन्नश्च, जीयो लोकाप्रभवत्वात्
लोकाग्रं-मुक्तिपदम् 'उपगतः'प्राप्तः 'परमसुखी' अतिशयसुखवान् भवति ३८ । सम्भोगादिप्रत्याख्यानानि च प्रायः सहायप्रत्याख्यान एव सुकराणि भवन्तीति तदुच्यते-सहायाः-साहाय्यकारिणो यतयस्तत्प्रत्याख्यानेन-तथाविधयोग्य-21 ताभाविनाऽभिग्रहविशेषरूपेण 'एकभावस्' एकत्वं जनयति 'एकीभावभूतश्च एकत्वप्राप्तश्च जीवः एकालम्बनत्वं 'भावयन्' अभ्यस्यन् 'अप्पझंझ'त्ति अल्पशब्दोऽभाववचनः, ततथाल्पझञ्झः-अविद्यमानवाकलहस्तथाऽल्पकपायः-अविद्य
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
%25
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
सम्यक्त्य
ME%
प्रत
उत्तराध्य. बृहदृत्तिः ॥५८९॥
पराक्रमा
सूत्रांक
[१R-७३]
मानक्रोधादिः 'अप्पतुमंतुमि त्ति अल्पम्-अविद्यमानं त्वं त्वमिति स्वल्पापराधिन्यपि त्वमेवं पुराऽपि कृतवान् त्वमेवं | सदा करोषीत्यादि पुनः पुनः प्रलपनं यस्य स तथा,संयमबहुलः संवरबहुल इति प्राग्वद्, अत एव 'समाहीए यावित्ति 'समाहितः' ज्ञानादिसमाधिमांश्चापि भवति ३९ । एवंविधश्चान्ते भक्तप्रत्याख्याता भवतीति तत्प्रत्याख्यानमाह'भक्तप्रत्याख्यानेन आहारपरित्यागरूपेण भक्तपरिज्ञादिना अनेकानि भवशतानि निरुणद्धि, तथाविधढाध्यवसायतया संसाराल्पत्वापादनादिति भावः४० । साम्प्रतं सकलप्रत्याख्यानप्रधानं सद्भावप्रत्याख्यानमाह-तत्र सद्भावेन-सर्वथा पुनःकरणासंभवात्परमार्थेन प्रत्याख्यानं सद्भावप्रत्याख्यानं सर्वसंवररूपा शैलेशीतियावत् तेन, न विद्यते निवृत्तिःमुक्तिमप्राप्य निवर्तनं यस्मिंस्तद् अनिवृत्ति शुक्लध्यानं चतुर्थभेदरूपं जनयति, पाठान्तरतश्च निवृत्ति' द्विसमयस्थिति
कस्यापि वेद्यकर्मणो बन्धव्यावृत्तिं जनयति, 'अणियहि पडिवण्णे यत्ति प्रतिपन्नानिवृत्तिः पाठान्तरतः प्रतिपन्ननि६ वृत्तिश्चानगारः 'चत्वारि' चतुःसञ्जयानि केवलिनः 'कम्मंसति कार्मप्रन्धिकपरिभाषयाउँशशब्दस्य सत्पर्यायत्वात्
सत्कर्माणि केवलिसत्कर्माणि-मयोपग्राहीणि क्षपयति, शेषं स्पष्टम् ४१ । एतच प्रत्याख्यानं प्रायः प्रतिरूपताया-13 मेव भवतीति तामाह-पडिरूवयाए'त्ति, प्रतिः-सादृश्ये, ततः प्रतीति-स्थविरकल्पिकादिसदृशं रूपं-वेषो यस्य स तथा तद्भावस्तत्ता तया-अधिकोपकरणपरिहाररूपया लाघवमस्यास्तीति लाघवी तद्भायो लाघविता तां द्रव्यतः खल्पोपकरणत्वेन भावतस्त्वप्रतिबद्धतया जनयति,लघुभूतश्च जीवः 'अप्रमत्तः' प्रमादहेतूनां परिहारत इतरेषां चांझी
ACCC
KARAN
दीप
1५८९॥
अनुक्रम [१११४-११८७]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक
[१R-७३]
करणतः, तथा 'प्रकटलिङ्गः' स्थविरादिकल्परूपेण व्रतीति विज्ञायमानत्वात् 'प्रशस्तलिक' जीवरक्षणहेतुरजोहरणादिधारकत्वाद् 'विशुद्धसम्यक्त्वः' तथाप्रतिपत्त्या सम्यक्त्वविशोधनात् , तथा सत्त्वं च-आपत्खवैकल्यकरमध्यवसानकर च समितयश्च-उक्तरूपाः समाप्ताः-परिपूर्णा यस्य स समाससत्त्वसमितिः, सूत्रे निष्टान्तस्य प्राकृतत्वात्परनिपातः, |तत एव सर्वप्राणभूतजीवसत्त्वेषु विश्वसनीयरूपः, तत्पीडापरिहरित्वात्, 'अपडिलेह'त्ति अल्पार्थे नत्र, ततोऽप्रत्युपेक्षित इत्यल्पोपकरणवादल्पप्रत्युपेक्षः, पठ्यते च-'अप्पपडिलेहित्ति, जितानि-बशीकतानि यतिरहमितिप्र-18 त्ययात्कथञ्चित्परिणामान्यथात्वेऽपीन्द्रियाणि येन स तथा, विपुलेन-अनेकभेदतया विस्तीर्णन तपसा समितिभिश्च सर्व विषयानुगतत्वेन विपुलाभिरेव समन्वागतो-युक्तो विपुलतपःसमितिसमन्वागतश्चापि भवति, पूर्वत्र समितीनां | परिपूर्णत्वाभिधानेन सामस्त्यमुक्तम् , इह तु तासां सार्वत्रिकत्वमिति न पौनरुत्यम् ४२ । प्रतिरूपतायामपि वैयावृत्त्यादेव विशिष्टफलावासिरित्येतदनन्तरं वैयावृत्त्यं, तत्र व्यावृतः-कुलादिकार्येषु व्यापारवांस्तद्भावो वैयावृत्त्यं तेन तीर्थकरनामगोत्रं कर्म निवनाति, उक्तं हि तद्धेतुकीतनावसरे-"वेयावचे समाही य"ति ४३ । वैयावृत्यवांच | सर्वगुणभाजनं भवतीति सर्वगुणसंपन्नतामाह-सर्वगुणा-ज्ञानादयस्तैः संपन्नो-युक्तस्तद्भावः सर्वगुणसंपन्नता तया 'अपुनरावृर्ति' पुनरिहागमनाभावो मुक्तिरितियावत्तां जनयति, अपुनरावृत्तिं प्राप्त एव प्राप्तको जीवः शारीरमानसानां दुःखानां 'नो' नैव भागी' भाजनं भवति, तन्निवन्धनयोहमनसोरभावात् , सिद्धिसुखभाजनमेव भवतीति
दीप
अनुक्रम [१११४
ROCKGROG
-११८७]]
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम [१११४
- ११८७]
उत्तराध्य. ॐ भावः ४४ । सर्वगुणसंपन्नता च रागद्वेषपरित्यागतो जायत इति वीतरागतामाह - ' वीतरागतया' रागद्वेषापगमरूपया बन्धनानि - रागद्वेषपरिणामात्मकानि तृष्णा-लोभस्तद्रूपाणि बन्धनानि तानि च व्यवच्छिनत्ति, पाठान्तरतश्व 'स्नेहानुवन्धानि तृष्णानुबन्धानि च तत्र स्नेहः- पुत्रादिविषयः तृष्णा-द्रव्यादिविषया तद्रूपाण्यनुबन्धनानि तुअनुगतान्यनुकूलानि वा बन्धनानि, अतिदुरन्तत्वख्यापनार्थं च रागान्तर्गतत्वेऽपि पृथक् तृष्णास्त्रेहयोरुपादानं, ततश्च मनोज्ञेषु शब्दरसरूपगन्धेषु (सचित्ताचित्तमिश्रेषु - ख्यादिद्रव्येषु चैव विरज्यते, तृष्णास्त्रेहयोरेव रागहेतुत्वात्, आह| कषाय प्रत्याख्यानफलेन वीतरागतोक्चैव तत्किमर्थमस्याः पृथगुपादानम् ?, उच्यते, रागस्यैव सकलानर्थमूलत्यख्यापना[ ४५ । रागद्वेषाभावे च तात्त्विकाः श्रमणगुणाः, तेषु च प्रथमत्रतपरिपालनोपायत्वात्क्षान्तिरेव प्रथमेति तामाह, तत्र क्षान्तिः - क्रोधजयस्तथा 'परपहान्' अर्थाद्वधादीन् 'जयति' परीषहाध्ययनोक्तन्यायतोऽभिभवति ४६ । क्षान्तिस्थितेनापि न मुक्तिं विनाऽशेष प्रतपरिपालनं कर्त्तुं शक्यमिति तामाह- मुक्तिः-निर्दोभिता तथा किञ्चनाभावोऽकिञ्चनं, कोऽर्थः ? - निष्परिग्रहत्वं जनयति, अकिञ्चनश्च जीवोऽर्थे लोला- लम्पटा अर्धलोलाधौरादयस्तेषां न प्रार्थनीयः - प्रस्ता| वाद्वाधितुमनभिलपणीयो भवति ४७ । ठोभाविनाभाविनी च मायेति तदभावेऽवश्यंभाव्यार्जवमतस्तदाह- 'अजवया- ४ ॥५९०॥ ए'ति सूत्रत्वाद् ऋजुः - अवक्रस्तद्भाव आर्जवं तेन - मायापरिहाररूपेण कायेन ऋजुरेव ऋजुकः कायर्जुकस्तद्भावस्तत्ताकुब्जादिवेप भूविकाराद्यकरणतः प्राञ्जलता तां तथा भावः - अभिप्रायस्तस्मिंस्तेन वा ऋजुकता भावर्जुकता - यदन्य
बृहद्वृत्तिः
॥५९०॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१-७३] / गाथा ||--||
अध्ययनं [२९],
निर्युक्ति: [५०९...]
Education into
Fürsten
सम्यक्त्व
~ 214~
पराक्रमा.
२९
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
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प्रत
%
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सूत्रांक [१R
%
-७३]
A4
द्विचिन्तयन् लोकपतपादिनिमित्तम् अन्यद्वाचा कायेन वा समाचरति तत्परिहाररूपा, एवं भाषायामृजुकता भाषPIर्जुकता-यदुपहासादिहेतोरन्यदेशभाषया भाषणं तत्परित्यागात्मिका, तथा-'अविसंबादनं' पराविप्रतारणं जनयति,
तथाविधश्चाविसंवादनसंपन्नतयोपलक्षणत्वात्कायर्जुकतादिसंपन्नतया च जीयो धर्मस्थाराधको भवति, विशुद्धाध्यवसायत्वेनान्यजन्मन्यपि तदवाः ४८ । एवंगुणस्यापि न विनयं विना समग्रफलावाप्तिः, स च मार्दवादेवेति तदाह-'मद्दवयाए'त्ति मार्दवेन गम्यमानत्वाभ्यस्यमानेन 'मिउमद्दवसंपन्नेत्ति मृदुः-द्रव्यतो भावतश्चावनमनशीलस्तस्य (भावः कर्म वा) मार्दवं यत्सदा मार्दवोपेतस्यैव भवति तेन संपन्न:-तदभ्यासात्सदा मृदुखभावो मृदुमादयसंपन्नः सन् 'अष्टौ मदस्थानानि' जातिकुलबलरूपतपऐश्वर्यश्रुतलाभावलेपरूपाणि,उक्तं हि-"जातीकुलबलरूवे तबईसरिएसुएलाभे"ति, 'निष्ठापयति' विनाशयति, पठन्ति च-'मद्दवयाए णं जीवे अणुस्सियतं जणेति, अणुस्सिए णं जीवे मिउमद्दवसंपन्ने अट्ठ मयट्ठाणाणि णिट्ठवेति' अत्र चानुत्सिक्तत्वम्-अनुद्धतत्वमन्यत्प्राग्वत् ४९। एतदपि तत्त्वतः सत्यव्यवस्थितस्यैव भवति,15 तत्रापि च भावसत्यं प्रधानमिति तदाह-भावसत्येन' शुद्धान्तरात्मतारूपेण पारमार्थिकावितधत्वेन भावविशुदि' वि-Ix शुद्धाध्यवसायात्मिकां जनयति, भावविशुद्धौ वर्तमानो जीयोऽहत्प्रज्ञप्तस्य धर्मस्य 'आराहणयाए'त्ति 'आराधनया' अनुष्ठानेन 'अभ्युत्तिष्ठते' मुक्त्यर्थमुत्सहते, यदियाऽऽराधनायै-आवर्जनार्थमभ्युत्तिष्ठति, अर्हत्प्रज्ञप्तस्य धर्मसाराधनयाऽऽराधनायै वाऽभ्युत्थाय परलोके-भवान्तररूपे धर्मः परलोकधर्मस्तस्य, पाठान्तरतः परलोके वाऽऽराधको भवति,
%
A
दीप
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अनुक्रम [१११४
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
पराकमा
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
उत्तराध्य. प्रेत्य जिनधर्मावात्या विशिष्टभवान्तरप्राप्त्या वेति भावः ५० भावसत्येन करणसत्यं संभवतीति तदाह करणे - सम्यक्त्व बदतिः सत्सं करणसत्यं यत्प्रतिलेखनादिक्रियां यथोक्तां सम्बगुपयुक्तः कुरुते तेन करणशक्तिं तन्माहात्म्यात् पुराऽनध्यव
सितक्रियासामर्थ्यरूपां जनयति, तथा करणसत्ये वर्तमानो जीवो यथावादी तथाकारी चापि भवति, स हि सूत्रम३५९॥ धीयानो यथैव क्रियाकलापबदनशीलः करणशीलोऽपि तथैवेति ५१ । एवंविधस्यैव योगसत्यमपि भवतीति तदाह
योगा-मनोवाकायास्तेषां सत्यम्-अचितथत्वं योगसत्यं तेन योगान् 'विशोधयति' क्लिष्टकर्मवन्धकत्याभावतो
निर्दोषान् करोति ५२ । एतच सत्यं गुस्यन्वितस्यैव भवत्यतो यथाक्रमं तदभिधानं, तत्र च 'मनोगुसतया' मनोद्रगुसिरूपया जीवः ऐकाय' प्रस्तावाद्धमैंकतानिचित्तत्वं जनयति, तथा चैकाग्रचित्तो जीयो गुप्तम्-अशुभाध्यवसा
येषु गच्छद्रक्षितुं मनो येनासौ गुप्तमनाः सन् , निष्टान्तस्य परनिपातः प्राग्वत्, संयमाराधको भवति, तत्र मनो-|
निरोधस्य प्रधानत्वादिति भावः ५३ । वाग्गुप्ततया' कुशलवागुदीरणरूपया 'निर्विकारं विकथाद्यात्मकवाग्विकापराभावं जनयति, ततश्च निर्विकारो जीवो वाग्गुप्त इति, प्रवीचाराप्रवीचाररूपत्वेन द्विविधत्वात्तगप्तेः सर्वथा वाणि-II रोधलक्षणवाग्गुप्तिसमन्वितः सन्नध्यात्म-मनस्तस्य योगा-व्यापारा धर्मध्यानादयस्तेषां साधनानि-एकाग्रतादीनि
५९|| |तेयुक्तोऽध्यात्मयोगसाधनयुक्तो भवति, विशिष्टवाग्गुप्सिरहितो हि न चित्तैकाग्रतादिभाग् भवेदिति भावः, अन्ये तु| 'निषियारे णं जीवे वयगुत्तयं जणयति' इत्येतावदेव पठन्ति, तच स्पष्टमेव ५४ । 'कायगुसः' शुभयोगप्रवृत्त्यात्मकका
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अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
यगुप्तिमान् 'संवरम्' अशुभयोगनिरोधरूपं जनयति, संवरेण गम्यमानत्वादभ्यस्थमानेन कायगुप्तः पुनः सर्वथा। || निरुद्धकायिकव्यापारः पापस्य-'पावे कम्मे वेरे' इत्यादिवचनात्कर्मण आश्रवा-उपादानहेतवो हिंसादयः पापा-15
अवास्तनिरोधं करोति, तात्त्विक्या अस्सा एतत्फलत्वेन सुप्रतीतत्वात् ५५ । इतश्च गुप्तित्रयाद्यथाक्रमं मनःसमाधारणादिसम्भव इति तदाह-तत्र 'मणसमाहारणयाए ति मनसः समिति-सम्यग् आङिति-मर्यादयाऽऽगमाभिहि-151 तभावाभिव्याप्त्याऽवधारणा-व्यवस्थापनं मनःसमाधारणा तया 'एकात्र्यम्' उक्तरूपं जनयति, एकाग्र्यं जनयित्वा 'ज्ञानपयेवान्' विशिष्टतरवस्तुतत्त्वावबोधरूपान् जनयति, ज्ञानपर्यवान् जनयित्वा सम्यक्त्वं विशोषयति, विशुद्धत्वं
चास्य वस्तुतत्त्वावगमे तद्विषया रुचिरपि शुद्धतरेव संभवतीतिकृत्वा, अत एव च मिथ्यात्वं च निर्जरयति ५६ । | 'वइसमाहारणयाए'त्ति 'वाकसमाधारणया' स्वाध्याय एवं वाग्निवेशनात्मिकया, वाचा सधारणा वाक्समाधारणा, येन ते वचसोऽपि विषयाः, प्रज्ञापनीया इत्यर्थः, तेषामेवान्यथात्वसम्भवेन विशेषणसाफल्यात्, इह च तद्विषया दर्शनपर्यवा अप्युपचारतस्तथोक्तास्ततश्च वाक्साधारणाश्च ते दर्शनपर्यवाश्च-सम्यक्त्वभेदरूपा वाक्साधारणदर्शनपर्यवास्तान् विशोधयति, 'देविए दंसणसोधी' इति वचनाद्रव्यानुयोगाभ्यासतस्तद्विषयाशङ्कादिमालिन्यापनयनेन विशुद्धान् करोति, वाक्साधारणदर्शनपर्यवान् विशोध्य सुलभबोधिकत्वं नियति, तत एव दुर्लभवोधि
१ द्रव्यानुयोगादर्शनशुद्धिः
E
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५०९...]
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[१R-७३]
उत्तराध्य.
कत्वं निर्जरयति ५७ । 'कायसमाहारणयाए'त्ति 'कायसमाधारणया' संयमयोगेषु शरीरस्य सम्यग्व्यवस्थापनरूपया सम्यक्त्व
'चरित्रपर्यवान्' चारित्रभेदान् क्षायोपशमिकानिति गम्यते विशोधयति, तदुन्मार्गप्रवृत्तित एव प्रायस्तेषामतीचार-18 बृहद्वृत्तिः कालुष्यसम्भवात् , चरित्रपर्यवान् विशोध्य यथाख्यातचारित्रं विशोधयति, सर्वथा बसत उत्पत्यसम्भव इति पूर्वमपि ।
पराक्रमा. ॥५९२२॥
कश्चित्सदेव यथाण्यातचारित्रं चारित्रमोहोदयमलिनितं तन्निर्जरणेन निर्मलीकुरुते, यथाख्यातचारित्रं विशोध्य | चत्वारीत्यादि सर्वं प्राग्वत् ५८ । एवं समाधारणात्रयाद्यथाक्रम ज्ञानादित्रयस्ख शुद्धिरुक्ता, फलं पुनरस्य किमि-3|| साशङ्कायां यथाक्रममेतत्फलमाह-ज्ञानमिह प्रस्तावात् श्रुतज्ञानं तत्संपन्नतया जीवः सर्वभावानाम्-अशेफ्जीवादि-18 पदार्थानामभिगमो-ज्ञानं सर्वभावाभिगमस्तं जनयति, तथा सं(तत्सं)पन्नो जीवः 'चाउरते'त्ति उक्तनीतितश्चतुर
न्तसंसारकान्तारे नैव 'विनश्यति' इतस्ततः पर्यटनेन मुक्तिमार्गाद्विशेषेण दूरीभवति, अमुमेयार्थ दृष्टान्तद्वारेण स्पष्ट४|तरमाह-यथा 'सूची' प्रतीता ससूत्रा सुप्रापतया 'न विनश्यति' कचवरादिपतिताऽपि न विशेषेण दूरीभवति तथा दाजीवः सह सूत्रेण-श्रुतेन वर्तत इति ससूत्रः संसारे न विनश्यति, उक्तं च-"सूई जहा समुत्ता ण णस्सई कयवरमि*
पडियावि । जीवो तहा ससुत्तो ण णस्सइ गओवि संसारे ॥१॥” तत एव ज्ञानं च-अवध्यादि विनयश्च-ज्ञानविनयादिः तपश्च-वक्ष्यमाणं चारित्रयोगाः-चारित्रप्रधाना व्यापारा ज्ञानविनयतपश्चारित्रयोगास्तान् प्राप्नोति,
१सूचियथा ससूत्रा न नश्यति कचवरे पतिताऽपि । जीवस्तथा सश्रुतो न नश्यति गतोऽपि संसारे ॥१॥
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अनुक्रम [१११४
R५९२॥
-११८७]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम
[१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
तथा खसमयपरसमययोः संघातनीयः - प्रमाणपुरुषतया मीलनीयः खसमयपरसमयसंघातनीयो भवति, इह च स्वसमय परसमयशब्दाभ्यां तद्वेदिनः पुरुषा उच्यन्ते तेष्वेव संशयादिव्यवच्छेदाय मीलनसंभवात् ५९ । 'दर्शनसंपन्नतया' क्षायोपशमिकसम्यक्त्वसमन्वितया भवहेतुभूतं मिध्यात्वं भवमिध्यात्वं तस्य छेदनं-क्षपणं भवमिध्यात्वच्छेदनं करोति, कोऽर्थः १- क्षायिक सम्यक्त्वमवामोति, ततश्च पर्मिति-उत्तरकालमुत्कृष्टतस्तस्मिन्नेव भवे मध्यमजघन्यापेक्षया तृतीये तुर्ये वा जन्मन्युत्तर श्रेण्यारोहणेन केवलज्ञानावासौ 'न विध्यायति' न ज्ञानदर्शनप्रकाशाभावरूपं विध्यानमवाप्रोति, किन्तु 'अनुत्तरेण' क्षायिकत्वात्प्रधानेन ज्ञानं च दर्शनं च ज्ञानदर्शनं तेन 'आत्मानं' खं 'संयोजयन्' प्रतिसमयमपरापरेणोपयोगरूपतयोत्पद्यमानेन् घटयन्, संयोजनं च भेदेऽपि स्यादत आह- (सम्मं सम्यक् ) 'भावयन्' तेनात्मानमात्मसान्नयन् 'विहरति' भवस्थकेवलितया मुक्ततया वाऽऽस्ते, पठन्ति च- 'अणुत्तरेणं णाणदंसणेणं विहरइ' त्ति' अत्र च लक्षणे तृतीया ६० । चरित्रसंपन्नतया 'शैलेशी भाव' ति शिलानामिमे शैलाः- पर्वतास्तेषामीशः शैलेशो - मेरुः स इव शैलेशो- मुनिर्निरुद्धयोग तयाऽत्यन्तस्थैर्येण तस्येयमवस्था - शैलेशी तस्या भावः अशैलेशस्य वा शैलेशी भवनं शैलेशीभावः, इत्यादिरनेकधा व्युत्पत्तिः, उक्तं हि – “सेलेंसो किर मेरू सेलेसी होइ तहाऽचलया। होउं व असेलेसो सेलीसी होइ थिरयाए ॥ १ ॥ अहवा सेलोब इसी सेलेसी होइ सो हु थिरयाते । सेव असेली होई सेलीसी
१ शैलेशः किल मेरुः शशी भवति या तथाऽचलता । भूत्वा वाऽशैलेशः शैलेशी भवति स्थिरतया ॥ १ ॥ अथवा शैल इव ऋषिः शैलर्षिः (सेलेसी) भवति स एव स्थिरतया । स एव अशैलीभवति शैलेशी
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम [१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
॥५९॥
उत्तराध्य. ५ होअलोबाओ ॥ २ ॥ सीलं व समाहाणं णिच्छयतो सबसंवरो सो य। तस्सेसो सीलेसो सेलेसी होइ तयवस्था ॥३॥” बृहद्वत्ति: तमेवंविधं शैलेशीभावं जनयति, तजननाच शैलेशीप्रतिपन्नो 'विहरति' आस्तेऽन्तर्मुहूर्त्तमिति शेषः, पठन्ति च - 'सेलेसी पडिवन्ने अणगारे चत्तारि केवलिकम्मंसे खचेति, ततो पच्छा सिज्झति बुज्झइ' इत्यादि प्राग्वत् ६१ । चरित्रं चेन्द्रियनिग्रहादेव जायत इति प्रत्येकं तन्निग्रह माह — श्रोत्रेन्द्रियस्य निग्रहः स्वविषयाभिमुखमनुधावतो नियमनं श्रोत्रेन्द्रियनिग्रहस्तेन 'मनोज्ञामनोज्ञेषु' अभिमतेतरेषु शब्देषु यथाक्रमं रागद्वेषयोर्निग्रहो रागद्वेषनिग्रहस्तं जनयति, तथा च तत्प्रत्ययिकं रागद्वेषनिमित्तं कर्म न बनाति पूर्वबद्धं च निर्जरयति, तन्निग्रहे शुभाध्यवसायप्रवृत्तेरिति भावः । एवं चक्षुरिन्द्रियनिग्रहेण ६३ प्राणेन्द्रियनिग्रहेण ६४ जिह्वेन्द्रियनिग्रहेण ६५ स्पर्शनेन्द्रियनिग्रहेण च इदमेव वाच्यं, नवरं चक्षुरिन्द्रियेष्वित्युपचाराच्चक्षुरिन्द्रियग्राह्येषु रूपेष्विति योऽर्थः यथाप्रधानं चात्रेन्द्रियनिर्देशः, प्राधान्यं च पाटवाद्यपेक्षमिति भावनीयम् ६६ । एतन्निग्रहोऽपि कषायविजयाद्भवत्यतः क्रमेण तद्विजयमाह-तत्र क्रोधस्य विजयो| दुरन्तादिपरिभावनेनोदयनिरोधः क्रोधविजयस्तेन क्रोधेन - कोपाध्यवसायेन वेद्यत इति क्रोधवेदनीयं तद्धेतुभूतपुद्गलरूपं कर्म न बनाति "जं वेद तं बंधइ"त्ति वचनात् तथा पूर्ववद्धं प्रक्रमान्तदेव निर्जरयति, तत एव विशिष्टजीववीयल्लासात् ६७ । एवं मानविजयेन ६८ मायाविजयेन ६९ लोभविजयेन ७० चाभिधेयम् । एतज्जयश्च न प्रेमद्वेषमि१ भवत्यलोपात् ॥ २ ॥ शीलं वा समाधानं निश्चयतः सर्वसंवरः स च । तस्वेशः शैलेशः शैलेशी भवति तदवस्था ॥ ३ ॥
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सम्यक्त्व
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पराक्रमा.
२९
॥५९३ ॥
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
RCM
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
थ्यादर्शनविजयं विनाऽतः स उच्यते-'पिज्जत्ति प्रेम राग इत्यर्थः स च द्वेषश्च-अप्रीतिरूपो मिथ्यादर्शनं च-सांशयि४ कादि प्रेमपमिथ्यादर्शनानि तद्विजयेन 'णाणदंसणचरित्ताराहणयाएं त्ति ज्ञानदर्शनचारित्राराधनायाम् 'अभ्युत्तिष्ठते'
उद्यच्छति प्रेमादिनिमित्तत्वातद्विराधनायाः, ततश्चाष्टविधस्य कर्मणो मध्य इति गम्यते, 'कम्मगंठिविमोयणयाए'न्ति
कर्मप्रन्थि:-अतिदुर्भेदधातिकर्मरूपस्तस्य विमोचना-क्षपणा कर्मग्रन्थिविमोचना तस्यै च, चस्य गम्यमानत्वात्तदर्थ || चाभ्युत्तिष्ठते इत्यनुवर्त्य योज्यते, पठन्ति च-'अट्ठविहकम्मविमोयणाए'त्ति स्पष्टम् , अभ्युत्थाय च किं करोतीत्या
ह-तत्प्रथमतया' तत्पूर्वतया, न हि तेन तत्पुरा क्षपितमासीदिति, आनुपूर्ध्या अनतिक्रमेण यथानुपूर्वीम(विअ)टाविंशतिविधं मोहनीय कर्म 'उद्घातयति' क्षपयति, अत्र चेयं क्षपणानुपूर्वी-प्रथममनन्तानुबन्धिनः क्रोधादीन युगपदन्तर्मुहूर्तेन क्षपयति, तदनन्तभागं च मिथ्यात्वे प्रक्षिपति, ततस्तेन सहैव मिथ्यात्वं क्षपयति, प्रवर्द्धमाना-12 तितीव्रशुभपरिणामत्वात् , अतिसंभृतदवानल इवार्द्धदग्धेन्धन इन्धनान्तरं, ततो मिथ्यात्वांशं सम्यमिथ्यात्वे प्रक्षिप्य तत्क्षपयति, ततोऽपि तदंशसहितं सम्यक्त्वं, तदनु सम्यक्त्वावशिष्टदलिकसहितमप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणकषायाष्टकं युगपदेव क्षपितुमारभते, तत्क्षपणं च कुर्वनेताः प्रकृतीः क्षपयति, तद्यथा-"गइआणुपुधि दो दो। जाईणामं च जाव चरिंदी । आयावं उज्जोवं थावरनामं च सुहुमं च ॥१॥ साहारमपज्जत्तं णिहाणि च | १गत्यानुपूज्यों द्वे द्वे जातिनाम च यावञ्चतुरिन्द्रियम् । आतपमुद्योतं स्थावरनाम च सूक्ष्मं च ॥१॥ साधारणमपर्याप्त निद्रानिद्रां च
%25654585256
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
सम्यक्त्व
प्रत
पराक्रमा.
सूत्रांक
२९
[१R-७३]
उत्तराध्य. |पयलपयलं च । थीणं खवेह ताहे अवसेसं जंच अट्ठण्हं ॥२॥" ततोऽपि किश्चित्सावशेष नपुंसकवेदमध्ये प्रक्षिप्य || बृहद्वृत्तिः
तत्समन्वितं क्षपयति, एवं तदुद्धरितसहितं स्त्रीवेदं, तदवशिष्टान्वितं च हास्यादिपई, तदंशसहितं च पुरुषवेदख
ण्डद्वयं यदि पुरुषः प्रतिपत्ता, अथ खी नपुंसकं वा ततः स्वस्ववेदखण्डद्वयं, ततः क्षिप्यमाणवेदतृतीयखण्डसहितं ॥५९४॥ संज्वलनकोपं क्षपयति, एवं पूर्वपूर्वाशसहितमुत्तरोत्तरं क्षपयति यावत् संज्वलनलोभः, तत्तृतीयखण्डं तु सङ्खयेयानि
खण्डानि कृत्वा पृथकालभेदेन क्षपयति, तत्र च तत्क्षपणाकालः प्रत्येकं सर्वत्र चान्तर्मुहूर्तमेव, इत्थं चेतदन्तर्मुहूत्तेस्था सङ्ख्यभेदत्वात् , ततस्तचरमखण्डमपि पुनरसङ्ख्येयसूक्ष्मखण्डानि करोति, तानि च प्रतिसमयमेकैकतया क्षपयति, |तचरमखण्डमपि पुनरसङ्खयेयसूक्ष्मखण्डानि कृत्वा तथैव क्षपयति, एवं च मोहनीय क्षपयित्वाऽन्तर्मुहूर्त यथाख्यात
चारित्रमनुभवंश्छद्मस्थवीतरागताद्विचरमसमययोः प्रथमसमये निद्राप्रचले नाम प्रकृतीश्च देवगत्याद्याः क्षपयति, यत दिउक्तम्-"चीसमिऊण नियंठो दोहि उ समएहि केवले सेसे । पढमे णिहं पयलं णामस्स इमाओं पयडीओ॥१॥
देवगति आणुपुबी विउवि संघयण पढमवज्जाई। अन्नयरं संठाणं तित्थयराहारणामं च ॥२॥" चरमसमये तु यत्क्ष
१ प्रचलाप्रचलां च । स्त्यानचि झपयति तदा अवशेषं यचाष्टानाम् ॥ २॥ २ विश्रम्यनिर्ग्रन्थो द्वाभ्यां तु समयाभ्यां केवले शेर्षे ॥ प्रथमे निद्रां प्रचलां नाम्न इमाः प्रकृतीः ॥ १॥ देवगत्यानुपूव्यौँ वैक्रियं सहनानि प्रथमवर्जानि । अन्यतर संस्थानं तीर्थकरमाहारकनाम ||
दीप
अनुक्रम [१११४-११८७]
॥५९४॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम
[१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
पयति तत्सूत्रकृदाह- पञ्चविधं ज्ञानावरणीयं नवविधं दर्शनावरणीयं पञ्चविधमन्तरायम्, 'एए'ति लिङ्गव्यत्ययादे -- तानि 'श्रीण्यपि' वक्ष्यमाणरूपाणि 'कम्मंसे'त्ति सत्कर्माणि 'युगपत्' एककालं क्षपयति, स्थापना चेयम् ॥ 'ततः' इति क्षपणातः 'पश्चाद्' अनन्तरं नास्योत्तरं प्रधानमन्यत् ज्ञानमस्तीत्यनुत्तरम्, 'अनन्तम्' अविनाशितया विषयानन्ततया च ' कृत्स्नं' कृत्स्रवस्तुविषयत्वात् 'परिपूर्ण' सकलखपरपर्यायपरिपूर्णवस्तुप्रकाशकत्वात् 'निरावरणम्' अशेपावरण विगमात् 'वितिमिरं' तत्र सति कचिदप्यज्ञानतिमिराभावात् 'विशुद्ध' सकलदोषविगमात् 'लोकालोकप्रभाव कं तत्स्वरूपप्रकाशकत्वात्, पाठान्तरतश्च - 'लोकालोकस्वभावं' संक्रान्तलोकालोकसकलवरूपत्वात् केवलम् - असहायं वरं शेषज्ञानापेक्षया ज्ञानं च दर्शनं च ज्ञानदर्शनं ततः केवलवरशब्दाभ्यां विशेषणसमासे केवलवरज्ञानदर्शनं 'समुत्पादयति' जनयत्यात्मन इति गम्यते, स च यावत् 'सयोगी' मनोवाक्कायव्यापारवान् भवति तावच किमित्याह - ईरणमीर्यागतिस्तस्याः पन्था यदाश्रिता सा भवति तस्मिन् भवमध्यात्मादित्वाद्भुकि ऐर्यापथिकम् उपलक्षणं च पथिग्रहणं, तिष्ठतोऽपि सयोगस्येर्यासम्भवात्, संभवन्ति हि सयोगितायां केवलिनोऽपि सूक्ष्मा गात्रसञ्चाराः, यत आह- "केवली णं भंते ! अस्सि समयंसि जेसु आगासपएसेसु हृत्थं वा पायं वा ओगाहित्ताणं साहरिजा पभू णं भंते! केवली १ केवली भदन्त ! अस्मिन् समये येष्वाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा पादं वाऽवगाह्य संहरेत् प्रभुर्भवन्त ! केवल्ये—
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
5-%
सम्यक्त्व
कापराक्रमा.
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
%*5
उत्तराध्य. तेसु चेवागासपएसेसु पडिसाहरित्तए ? णो इणमट्टे समढे, केवलिस्स णं चलाई सरीरोवगरणाई हवंति, चलो
वगरणत्ताए केवली णो संचाएति तेसु चेवागासपएसेसु हत्थं वा पायं वा पडिसाहरित्तए" तदेवं पथिबृहद्वृत्तिः
स्थस्तिष्ठवीर्यापथिकं कर्म बभाति, तथ कीरगित्याह-सुखयतीति सुखः स्पर्श:-आत्मप्रदेशैः सह संश्लेषो यस्य तत्सुख॥५९५॥ स्पर्श द्वौ समयौ यस्याः सा द्विसमया तथाविधा स्थितिरस्येति द्विसमयस्थितिकं, द्विसमयस्थितिकत्वमेव भावयितु
माह-तत् प्रथमसमये बद्धम्-आत्मसात्कृतं स्पर्शाविनाभावित्वाचाख स्पृष्टं च, द्वितीयसमये वेदितम्-अनुभूतमुदयान्यथानुपपत्त्या चासोदितं च, तृतीयसमये निर्जीर्ण-परिशटितं, तदुत्तरकालस्थितेः कषायहेतुत्वात्, उक्तं हि"जोगा पयडिपएसं ठितिअणुभागं कसायओ कुणति"त्ति, द्विसमयस्थितिकबन्धस्य तु योगसम्भवेऽवश्यम्भावित्वा
दिहाभिधानं, तदवश्यम्भाविता तु णो कम्मेहि विवरीयं जोगदवेहिं भवति जीवस्स । तस्सावत्थाणे णणु सिद्धो |४|दुसमयंठितिबंधो॥१॥ इति युक्तितोऽवसेया, अतश्च तद्वद्धं-जीवप्रदेशैः श्लिष्टमाकाशेन घटबत् तथा स्पृष्टं। द मसूणमणिकुड्यापतितस्थूलशिलाशकलचूर्णवत् , अनेन विशेषणद्वयेन तस्स निधत्तनिकाचितावस्थयोरभावमाह, 'उदी
१ तेष्वेवाकाशप्रदेशेषु प्रतिसंहर्तु !, नैषोऽर्थः समर्थः, केवलिनश्चलानि शरीरोपकरणानि भवन्ति, चलोपकरणतया केवली न शक्नोति |तेष्वेवाकाशप्रदेशेषु हस्तं वा पादं या प्रतिसंहम् ॥ २ योगात् प्रकृतिप्रदेशबन्धं स्थित्यनुभागबन्ध कपायतः करोति । ३ न कर्मद्रव्याणि | दिविपरीतानि योगद्रव्येभ्यो भवन्ति जीवस्य । तस्यावस्थाने ननु सिद्धो द्विसमयस्थितिबन्धः ॥ १॥
दीप
-2551-5
॥५९५॥
अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
प्रत
सूत्रांक [१R
-७३]
रितम्' उदयप्राप्तम् उदीरणायास्तत्रासम्भवात् 'वेदितं' तत्फलसुखानुभवनेन 'निर्माण' क्षयमुपागतं 'सेयाले यत्ति| सूत्रत्वाद् एष्यत्काले चतुर्थसमयादावकर्म चापि भवति, तज्जीवापेक्षया पुनस्तस्य तथाविधपरिणामाभावात्, एत
चैवंविधविशेषणान्वितं सातकमैवासी वनाति, यत उक्तम्-"अप्पं वायर मउयं बहुंच रुक्खं च सुक्किलं चेव । लमदं महत्वयंति य सायाबहुलं च तं कम्मं ॥१॥"७१ । अयं च देशोनपूर्वकोटीमन्तर्मुहूर्तादिप्रमाणं वा कालं विहृत्य सायथा शैलेशीमवाप्याकर्मतां लभते तथा दर्शयन् शैलेश्यकर्मताद्वारमर्थतो व्याचिख्यासुराह-'अथेति केवलावा
यनन्तरम् 'आयुष्कं' जीवितमन्तर्मुहूर्त्तादिपरिमाणं पालयित्वा, अन्तर्मुहर्तपरिमाणाऽद्धा-कालोऽन्तर्मुहूर्ताद्धा साऽ|वशेषम्-उद्धरितं यस्मिंस्तदन्तर्मुहूर्ताद्धावशेषं तथाविधमायुरखेत्यन्तर्मुहूर्ताद्धावशेषायुष्कः सन् , पाठान्तरतश्चान्तर्मुहूर्तावशेषायुष्का, पठन्ति च-'अंतोमुहुत्तअद्धावसेसाए'त्ति प्राकृतत्वादन्तर्मुहूर्तावशेषाद्धायां योगनिरोहं करेमाणे ति योगनिरोधं करिष्यमाणः सूक्ष्मा क्रिया-व्यापारो यसिंस्तत्सूक्ष्मक्रियमप्रतिपतनशीलमप्रतिपाति अधःपतनाभावात् , शुक्लं ध्यानं 'समुदायेषु हि वृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्त' इति शुक्लध्यानतृतीयभेदं ध्यायन् 'तत्त्रथमतया' तदाद्यतया मनसो योगो मनोयोग:-मनोद्रव्यसाचिन्यजनितो व्यापारसं निरुणद्धि, तत्र च पर्याप्समात्रस्य सचिनो जघन्ययोगिनो यावन्ति मनोद्रव्याणि तज्जनितश्च यावद्यापारस्तदसङ्ख्यगुणविहीनानि मनोद्रव्याणि १ अल्पं बादरं मृदु बहु च रूक्षं च शुछ चैव । मन्द महाव्यवमिति च सातबहुलं च सत्कर्म ॥१॥
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अनुक्रम [१११४-११८७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [२९], मूलं [१R-७३] / गाथा ||--|| नियुक्ति: [५०९...]
पराक्रमा.
प्रत सूत्रांक [१R-७३]
तद्यापार च प्रतिसमयं निरुन्धनसंख्येयसमयैस्तत्सर्वनिरोधं करोति, यत उक्तम्-"पज्जत्तमित्तसणिणस्स जत्तियाई सम्यक्त्वउत्तराध्य.
• जहण्णजोगिस्स । होन्ति मणोदवाई तच्चावारो य जम्मेत्तो ॥१॥ तयसंखगुणविहीणे समए समए निरंभमाणो है हद्वृत्तिः
सो।मणसो सषणिरोहं कुणइ असंखेजसमएहिं ॥२॥" तदनन्तरं च वाचो वाचि वा योगो भाषाद्रव्यसाचिव्यजनितो ॥५९६॥
जीवव्यापारस्तन्निरुणद्धि, तत्र च पर्याप्तमात्रद्वीन्द्रियजघन्यवाग्योगपर्यायेभ्योऽसंख्येयगुणविहीनांस्तत्पर्यायान् समये || समये निरन्धनसंख्येयसमयैः सर्ववाग्योगं निरुणद्धि,यत उक्तम्-"पजत्तमित्तबिंदिय जहन्नवइजोगपजवा जे उ। तद-1|| संखगुणविहीणं समए समए निरंभंतो ॥३॥ सब्बवइजोगरोहं संखाईएहि कुणइ समरहिं ।" 'आणापाणुणिरोहंति आनापानौ-उच्चासनिःश्वासौ तन्निरोधं करोति, सकलकाययोगनिरोधोपलक्षणं चैतत् , तं च कुर्वन् प्रथमसमयोत्पन्नसूक्ष्मपनकजघन्यकाययोगतोऽसङ्खयेयगुणहीनं काययोगेनैकैकसमये निरुन्धन् देहविभागं च मुञ्चन्नसङ्खयेयसमयैरेव सर्व निरुणद्धि, यत उक्तं च-"तत्तो य सुहुमपणयस्स पढमसमओववष्णस्स ॥४॥जो किर जहण्णजोओ तयसंखेज्जगुणहीणमेकेके । समए निरंभमाणो देहतिभागं च मुंचंतो ॥५॥ रुंभइ स कायजोगं संखाईएहिं चेव समएहिं । तो कयजोगनिरोहो सेलेसीभावणामेति ॥६॥” इत्थं योगत्रयनिरोधं विधाय ईषदिति-स्वल्पः प्रयत्नापे- ५९६० क्षया पञ्चाना इखाक्षराणास् अइउल इत्येवंरूपाणामुच्चरणमुच्चारो-भणनं तस्थाद्धा-कालो यावता त उच्चार्यन्त ईषत्पञ्चाक्षरोचारणाद्धा तस्यां च णमिति प्राग्वत् अनगारः समुच्छिन्ना-उपरता क्रिया-मनोव्यापारादिरूपा यस्मिं
दीप अनुक्रम [१११४-११८७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
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अनुक्रम [१११४
- ११८७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१२-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
स्तत्समुच्छिन्नक्रियं न निवर्त्तते कर्मक्षयात्प्रागित्येवंशीलम् अनिवर्त्ति शुक्लध्यान चतुर्थभेदरूपं 'ध्यायन्' शैलेश्यवस्थामनुभवन्निति भावः, हखाक्षरोचारणं च न विलम्बितं द्रुतं वा किन्तु मध्यममेव गृह्यते, यत आह - "हस्सक्खराई | मज्झेण जेण कालेन पंच भण्णंति । अच्छइ सेलेसिगतो तत्तियमित्तं तओ कालं ॥१॥" एवंविधश्व यत्कुरुते तदाह'वेदनीयं' सातादि 'आयुष्कं' मनुष्यायुः 'नाम' मनुजगत्यादि 'गोत्रं च' उचैर्गोत्रम् 'एए'ति एतानि चत्वार्यपि 'कम्मंसि'त्ति सत्कर्माणि युगपत्क्षपयति, एतत्क्षपणान्यायश्च भाष्यगाथाभ्योऽवसेयः, ताश्चेमा :- "तयसंखेज्जगुणाए गुणसेढीऍ रइयं पुराकम्मं । समए समए खवयं कम्मं सेलेसिकालेणं ॥ १ ॥ सर्व्वं खवेति तं पुण गिलेवं किंचि दुचरिमे समए । किंचिच होइ चरिमे सेलेसीए तयं वोच्छं ॥ २ ॥ मणुयगइजाइतसवायरं च पज्जत्तसुभगमाएजं अण्णयरवेय णिज्जं णराउमुखं जसो णामं ॥ ३ ॥ संभवतो जिणणामं णराणुपुत्री य चरिमसमयम्मि । सेसा जिणसंतातो दुचरिमसमयंमि णिठ्ठेति ॥ ४॥” 'ततः' इति वेदनीयादिक्षयानन्तरम् 'ओरालियकम्माई च'त्ति औदारिककार्मणे शरीरे उपलक्षणत्वात्तैजसं च 'सच्चाहिं विष्पजहणाहि 'न्ति 'सर्वाभिः' अशेषाभिर्विशेषेण विविधं वा प्रकर्षतो हानयः
१ तदसंख्यगुणया गुणश्रेण्या रचितं पुराकर्म । समये २ क्षपयन् कर्म शैलेशीकालेन ॥ १ ॥ सर्वं क्षपयति तत्पुनर्निर्लेपं किञ्चिद्दिचरमे समये । | किञ्चिञ्च भवति चरमे शैलेश्यास्तद्वक्ष्ये ||२|| मनुजगतिजातित्रसवादरं च पर्याप्तसुभगमादेयम् । अन्यतरवेदनीयं नरायुरुचैर्यशोनाम ||३|| संभवतो जिननाम नरानुपूर्वी च चरमे समये । शेषा जिनसत्का द्विचरमसमये निस्तिष्ठन्ति ॥ ४ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[R
-693]
दीप
अनुक्रम [१११४
- ११८७]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
||५९७॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [१-७३] / गाथा ||--|| निर्युक्ति: [५०९...]
अध्ययनं [२९],
त्यागा विप्रहाणयो, व्यक्त्यपेक्षं बहुवचनं, ताभिः किमुक्तं भवति ? - सर्वथा परिशाटेन, न तु यथा पूर्व सङ्घातपरिशाटाभ्यां देशत्यागतः, 'विष्पजहित्ता' विशेषेण प्रहाय-परिशाय्य, उक्तं हि - " ओरालियाहिं सच्चाहिं चयइ विष्पजहण्णाहि जं भणियं । णिस्सेसतया ण जधा देसचाएण सो पुवं ॥ १ ॥" चशब्दोऽत्रैौदयिकादिभावनिवृत्तिमस्वानुक्तामपि समुचिनोति, यत उक्तम्- "तस्सोदइयाभावा भवन्तं च विणियत्तए जुगवं । सम्मत्तनाणदंसणसुहसिद्धत्ताणि मोत्तृणं ॥ १ ॥ ऋजुः - अवक्रा श्रेणिः - आकाशप्रदेशपतिस्तां प्राप्त ऋजुश्रेणिप्राप्तः अनुश्रेणिगत इतियावत्, 'अफुसमाणगइ'त्ति अस्पृशद्गतिरिति, नायमर्थो यथा नायमाकाशप्रदेशान्न स्पृशति अपि तु यावत्सु जीवोऽवगाढस्तावत एव स्पृशति न तु ततोऽतिरिक्तमेकमपि प्रदेशम् 'ऊर्द्धम्' उपरि 'एकसमयेन' द्वितीयादिसमयान्तरास्पर्शन 'अविग्रहेण' वक्रगतिरूपविग्रहाभावेन, अन्वयव्यतिरेकाभ्यामुक्तोऽर्थः स्पष्टतरो भवतीति अनुश्रेणिप्राप्त इत्यनेन गतार्थत्वेऽपि पुनरभिधानं, 'तत्र' इति विवक्षिते मुक्तिपद इतियावत् 'गंत'त्ति गत्वा 'साकारोपयुक्तः' ज्ञानोउपयोगवान् सिद्ध्यतीत्यादि यावदन्तं करोतीत्यादि प्राग्वत्, उक्तं च- "उजुसेटिं पडिवण्णो समयपएसंतरं अफुंसमाणो । एगसमएण सिज्झइ अह सागारोव उत्तरे सो ॥१॥” इति द्वासप्ततिसूत्रार्थः । इह च चूर्णिकृता- "सेलेसी
१ चत्तारि कम्मंसे खबेइत्यतः सूत्रपार्थक्यं ज्ञेयमत एवादौ त्रिसप्ततिप्रभाङ्काः त्रिसप्ततिसूत्राणीत्युपक्रमच, सूत्रसंख्या तु द्वासप्ततिरिति अतो द्वासप्ततिसूत्रार्थः इत्युपसंहारः, मन्ये चात एवाकमैताफलदर्शकं चूर्णिकृन्मतं सूत्रविषयं मतान्तरमुपादर्शि सूरिणा ।
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सम्यक्त्व
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पराक्रमा.
२९
॥५९७॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [२९], मूलं [७४] / गाथा ||-|| नियुक्ति: [५०९...]
**
*
प्रत सूत्रांक [७४]
*
एणं भंते ! जीवे किंजणइ १, अकम्मयं जणति, अकम्मयाए जीवा सिज्झन्ति" इति पाठः, पूर्वत्र च कचिकि|श्चित्पाठभेदेनाल्पा एवं प्रभा आश्रिताः,अस्माभिस्तु भूयसीपु प्रतिषु यथाव्याख्यातपाठदर्शनादित्थमुन्नीतमिति ७२ 11 | सम्प्रत्युपसंहर्तुमाह
एसो खल सम्मत्तपरकमस्स अज्झयणस्स अट्ठे समणेणं भगवया महावीरेणं आधविए पनविए परूविए। देसिए निदंसिए उवदंसिए सियेमि ॥ ॥ संमत्तपरकम ॥ २९ ॥
'एषः' अनन्तरोक्तः 'खलु' निश्चये सम्यक्त्वपराक्रमसाध्ययनस्य 'अर्थः' अभिधेयः श्रमणेन भगवता महावीरेण 'आधविए'त्ति आर्षवाद आख्यातः' सामान्यविशेषपर्यायामिव्याप्तिकथनेन 'प्रज्ञापितः' हेतफलादिप्रकाशनात्मक-16
प्रकर्षज्ञापनेन 'प्ररूपितः' खरूपकथनेन दर्शितः' नानाविधभेददर्शनेन 'निदर्शितः' दृष्टान्तोपन्यासेन 'उपदर्शित ४ उपसंहारद्वारेण, इदमपि चूर्णिमाश्रितमेव । 'इति' परिसमाप्ती, प्रवीमीति पूर्ववत् , गतोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि तथैव ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायां सम्यक्त्वपराक्रम नाम एकोनत्रिंशमध्ययनं समाप्तम्
इत्युत्तराध्ययनटीकायां शिष्य श्रीशान्तिसूरिकृतायां सम्यक्त्वपराक्रमाभिधमेकोनत्रिंशमध्ययनम् ॥
***
दीप
*
अनुक्रम [११८८]
*
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययनं- २९ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [७३...] / गाथा ||-|| नियुक्ति : [५१०-५१३]
455
प्रत
सुत्रांक
[७४]
अथ त्रिंशं तपोमार्गगत्यध्ययनम् । उत्तराध्य.
| तपोमार्ग बृहद्वृत्तिः व्याख्यातमेकोनत्रिंशमध्ययनम् , अधुना त्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययनेऽप्रमाद ।
गय०३० ॥५९Nउक्तः, इह तु तद्वता तपो विधेयमिति तत्खरूपमुच्यते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्य चतुर
नुयोगद्वारप्ररूपणा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे तपोमार्गगतिरिति त्रिपदं नाम, अत एव तत्पदत्रयनिक्षेपायाह नियुक्तिकृत्निक्लेवो (उ) तवंमि चउवि०
॥५१ ॥ जाणगभवियसरीरे तबइरित्ते अपंचतवमाई । भावमि होइ दुविहो बज्झो अभितरो चेव ॥५११॥ मग्गगईणं दुण्हवि पुव्वुविट्ठो चउक्कनिक्खेवो । पगयं तु भावमग्गे सिद्धिगईए उ नायवं ॥ ५१२ ॥ दुविहतवोमग्गगई वन्निजइ जम्ह इत्थ अज्झयणे । तम्हा एअज्झयणं तवमग्गगइत्ति नायत्वं ॥ ५१३ ॥ गाथाचतुष्टयं प्राग्वत् , नवरं 'पंचतवमाइ'त्ति पञ्चतपः-पञ्चाग्मिलपः, यत्र चतसृष्वपि दिक्षु चत्वारोऽनयः पञ्चमश्च
IN५९८॥ तपनस्तल्लोके प्रसिद्धम् , आदिशब्दालोकप्रतीतमन्यदपि बृहत्तपःप्रभृति तपो गृखते, द्रव्यत्वं चास्याज्ञानमलमलिनत्वेन
+-42-964-
SSRUSSSOCIAL
दीप
+-
अनुक्रम [११८८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -३० "तपोमार्गगति" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [--1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५१०-५१३]
प्रत
तथाविधशुद्धनगत्वात् , तथा भाव प्रक्रमात्तपो वाद्यमभ्यन्तरं चात्रैव वक्ष्यमाणखरूपं ॥तथा 'पुष्वुद्दिष्ठो'त्ति पूर्वत्र६ मोक्षमार्गगतिनामकेऽध्ययने उद्दिष्टः-कथितः पूर्वोद्दिष्टः 'भावमग्गो'त्ति सुब्ब्यत्ययाद् 'भावमार्गेण' मुक्तिपथेन तपोरूपेण ज्ञानदर्शनचारित्राविनामायित्वाद् भावतपसः॥ नामनिरुक्तिमाह-द्विविधं तपो-बाह्यमभ्यन्तरं च तदेव मार्गा| भावमार्गस्तत्फलभूता च गतिः-सिद्धिगतिर्द्विविधतपोमार्गगतिर्भण्यते यस्मादत्र-अध्ययने तस्मादेतदध्ययनं तपोमार्गगतिरिति ज्ञातव्यम् , अभिधेयेऽभिधानोपचारादिति भावः, इति नियुक्तिगाथाचतुष्टयार्थः॥गतो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रालापकनिष्पन्ननिक्षेपावसरः, तस्य च सूत्रानुगमाविनाभावित्वात सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तच्चेदम्
जहा उ पावर्ग कम्म, रागद्दोससमज्जियं । खवेइ तवसा भिक्खू, तमेगग्गमणो मुणे ॥१॥ 'यथा' येन प्रकारेण 'तुः' अवधारणे भिन्नक्रमो योक्ष्यते, 'पापकं कर्म ज्ञानावरणादि रागद्वेषाभ्यां समितिदभृशमर्जितम्-उपात्तं रागद्वेषसमर्जितं क्षपयत्येव 'तपसा वक्ष्यमाणलक्षणेन भिक्षुः 'तदेकानमनाः' अवहितचित्तः || शुण्विति शिष्यमभिमुखीकरोति, मा भूदनभिमुखोपदेशनेनैतद्वैफल्यमिति सूत्रार्थः ॥ इह चानाश्रवेणैव सर्वथा कर्म| क्षप्यत इति यथाऽसौ भवति तथाऽऽहपाणिवहमुसावाया अदत्तमेहुणपरिग्गहा विरओ। राईभोयणविरओ, जीवो भवह अणासवो ॥२॥ पंचसमिओ तिगुत्तो, अकसाओ जिइंदिओ । अगारवो अ निस्सल्लो, जीवो भव: अणासवो ॥३॥
दीप अनुक्रम [११८९]]
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rajaniorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२-३]
दीप
अनुक्रम [११९०
-११९१]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥५९९ ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२-३|| निर्युक्ति: [५१३...]
अध्ययनं [३०],
सूत्रद्वयं प्रायः प्रतीतार्थमेव, नवरं विरत इति प्राणवधादिभिः प्रत्येकमभिसम्बध्यते, तथा भवत्यनाश्रव इति श्रविद्य मानकर्मोपादानहेतुः । द्वितीयसूत्रेऽप्यनाश्रवः – समित्यादिविपर्ययाणा कर्मोपादानहेतुत्वेनाश्रयरूपत्वात्तेषां चाविद्यमानत्वादिति सूत्रद्वयार्थः ॥ एवंविधश्च यादृशं कर्म यथा च क्षपयति आदराधानाय पुनः शिष्याभिमुखीकरणपूर्वकं दृष्टान्तद्वारेण तदाह
एएसिं तु विवज्जासे, रागद्दोससमज्जियं । खबेइ तं जहा भिक्खू, तं मे एगमणा सुण || ४ || जहा महातलागस्स, संनिरुद्धे जलागमे । उस्सिचणाए तबणाए, कमेणं सोसणा भवे ॥ ५ ॥ एवं तु संजयस्सावि, पावकम्मनिरासवे । भवकोडीसंचियं कम्मं, तवसा निज्जरिजई ॥ ६ ॥
'एतेषां तु' प्राणिबधविरत्यादीनामना श्रवहेतूनां 'विवज्जासे'ति विपर्यासे प्राणिवधादावसमितत्वादौ च रागद्वेषाभ्यां समर्जितम् - उपार्जितं रागद्वेषसमर्जितं कर्मेति गम्यते तद्यथा क्षपयति तन्मे कथयत इति शेषः, एकम् - एकत्र प्रस्तुते वस्तुन्यभिनिविष्टत्वेन मनो यस्यासावेकमनाः श्रण्विति शिष्याभिमुखीकरणम् || 'संनिरुद्धे' पाल्यादिना निषिद्धे 'जलागमे' जलप्रवेशे 'उस्सिंचणाए'ति सूत्रत्वाद 'उत्सेचनेन' अरघट्टघटीनिवहादिभिरुदञ्चनेन 'तव - |गाए'ति प्राग्वत् 'तपनेन' रविकरनिकरसन्तापरूपेण 'क्रमेण' परिपाट्या 'शोषणा' जलाभावरूपा भवेत् ॥ 'पाप|| कर्मनिराश्रये' पापकर्मणामाश्रवाभावे 'भवकोटीसञ्चितम्' इत्यत्र कोटीग्रहणमतिबहुत्वोपलक्षणं, कोटीनियमास
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Forsy
तपोमार्ग -
गत्य० ३०
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॥५९९||
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[४-६]
दीप
अनुक्रम
[११९२
-११९४]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||४-६||
अध्ययनं [३०],
निर्युक्ति: [५१३...]
म्भवात् कर्म तपसा 'निर्जीर्यते' आधिक्येन क्षयं नीयते, शेषं स्पष्टमिति सूत्रत्रयार्थः ॥ तपसा कर्म निर्जीर्यत इत्युक्तं, तत्र किं तत्तपः १ इति संशये भेदाभिधानं विनाऽशक्यत्वात्तत्स्वरूपाभिधानस्य तद्भेदानाहहरभंतरो तहा। बाहिरो छव्विहो बुत्तो, एवमभितरी तवो ॥ ७ ॥
'तद्' अनन्तरप्रक्रान्तं तपो द्विविधमुक्तं 'बाहिरऽन्यंतरी 'ति 'बा' बाराद्रव्यापेक्षत्वात् प्रायो मुक्तत्यवाप्तिवहिरङ्गत्वाच 'अभ्यतरं' तद्विपरीतं यदिधा लोकप्रतीतत्वात्कुतीर्थिकैश्व स्वाभिप्रायेणासेव्यमानत्वाद्वाह्यं तदितरत्वाभ्यन्तरम्, उक्तञ्च - "लोके परसमयेषु च यत्प्रथितं तत्तपो भवति बाह्यम् । आभ्यन्तरमप्रथितं कुशलजनेनैव तु ग्राह्यम् ॥ १ ॥" अन्ये त्वाहुः - "प्रायेणान्तः करणव्यापाररूपमेवाभ्यन्तरं, बाझं त्वन्यथे” ति, तथेति समुचये, वा 'षडिधं' षड्भेदमुक्तमेवमिति पडिधमभ्यन्तरं तप उक्तमिति सम्बन्धः, सर्वत्र सूत्रत्वालिङ्गव्यत्यय इति सूत्रार्थः ॥ तत्र यथा वाद्यं षड्विधं तथाऽऽहअणसणमृणोअरिया भिक्खायरिया व रसपरिचाओ । कायकिलेसो संलीणया य बज्झो तवो होइ ॥ ८ ॥ अक्षरार्थः स्पष्ट एव ॥ भावार्थं तु प्रतिभेदं सूत्रकार एवाभिधित्सुस्तावदनशनमाह
इस्तरियमरणकाला य, अणसणा दुबिहा भवे । इत्तरिया सावकखा, निरवकखा उ बिहजिया ॥ ९ ॥ जो सो इत्तरियतवो, सो समासेण छच्चिहो । सेदितवो पयरतवो, घणो अ तह होइ वग्गो य ॥ १० ॥ तसो
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[९-१३]
दीप
अनुक्रम [११९५
-१२०१]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥ ६००॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||९-१३ || निर्युक्ति: [ ५१३...]
अध्ययनं [३०],
य वग्गवरगोड पंचमो छडओ पन्नतवो । मणइच्छियचित्तत्थो नायव्वो होहू इतरिओ ॥ ११ ॥ जा सा अणसणा मरणे, दुविहा सा वियाहिया । सवीपारमवीपारा, कायचि पई भवे ॥ १२ ॥ अहवा सपरिकम्मा अपरिकम्मा य आहिया । नीहारिमणीहारी आहारच्छेअओ दुमुवि ॥ १३ ॥
'इत्तरिय'त्ति इत्वरमेवेत्वरकं - खल्पकालं नियतकालावधिकमिति योऽर्थः, मरणावसानः कालो यस्य तन्मरणकालं प्राग्वन्मध्यपदलोपी समासः, यावज्जीवमित्यर्थः, तथा मरणं कालः अवसरो यस्य तन्मरणकालं 'चः' समुच्चये, अश्यते — भुज्यत इत्यशनमशेषाहाराभिधानमेतत् उक्तं हि "सवोऽवि य आहारो असणं सवोऽवि बुचर पाणं । सवोऽवि खाइपि य सव्वोऽविय साइमं होइ ॥ १ ॥” ततश्चाविद्यमानं देशतः सर्वतो वाऽशनमस्मिन्नित्यनशनं 'द्विविधं' द्विप्रकारं भवेत्, तत्र 'इत्तरिय'त्ति इत्वरकं सहाबकाङ्क्षया - घटिकाद्वयाद्युत्तरकालं भोजनाभिलाषरूपया वर्त्तत इति सावकाङ्क्ष निष्क्रान्तमाकाङ्क्षातो निराकाङ्क्ष, तज्जन्मनि भोजनाशंसाभावात् तुशब्दस्य भिन्नक्रम - त्वाद् द्वितीयं पुनर्मरणकालं, पाठान्तरतश्च निरखका द्वितीयम् । 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायत इत्वरकानशनस्य भेदानाह - यत्तदित्वरकं तपः - इत्वरकानशनरूपमनन्तरमुक्तं तत् 'समासेन' सङ्क्षेपेण षड्विधं विस्तरेण तु बहुत|रभेदमिति भावः ॥ षड्विधत्वमेवाह - 'सेढितवो' इत्यादि, अत्र च श्रेणिः --- पतिस्तदुपलक्षितं तपः श्रेणितपः, १ सर्वोऽपि चाहारोऽशनं सर्वमप्युच्यते पानम् । सर्वमपि खाद्यमेव स्वायं सर्वमपि च ॥ १ ॥
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तपोमार्ग -
गत्य० ३०
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||६००||
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-1 / गाथा ||९-१३|| नियुक्ति: [५१३...]
-
-
प्रत सूत्रांक [९-१३]
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तचतुर्थादिक्रमेण क्रियमाणमिह षण्मासान्तं परिराखते, तथा श्रेणिरेव श्रेण्या गुणिता प्रतर उच्यते, तदुपलक्षित तपः प्रतरतपः, इह चाव्यामोहाथै चतुर्थषष्ठाष्टमदशमाख्यपदचतुष्टयात्मिका श्रेणिर्विवक्ष्यते, सा च चतुर्भिर्गुणिता पोडशपदात्मकः प्रतरो भवति, अयं चायामतो विस्तरतश्च तुल्य इत्यस्य स्थापनोपाय उच्यते-"एकाद्याद्या व्यवस्थाप्याः, पक्लयोऽत्र यथाक्रमम् । एकादींश्च निवेश्यान्ते, मात्पतिं प्रपूरयेत् ॥१॥" अस्थार्थः-एक आदिउँपां ते एकादयः-एककद्विकत्रिकचतुष्कास्ते आया यासु ता एकाद्याद्याः 'व्यवस्थाप्याः' न्यसनीयाः 'पतयः' श्रेणयः|४ 'यथाक्रम क्रमानतिक्रमेण, कोऽर्थः १-प्रथमा एकाद्या एककादारभ्य, द्वितीया द्विकाद्या द्विकादारभ्य, तृतीयात्रिकाद्या त्रिकादारभ्य, चतुर्थी-चतुष्काचा चतुष्कादारभ्य, आह-एवं सति प्रथमपक्तिरेव परिपूर्णा भवति द्वितीयाद्यास्तु न पूर्यन्त एव, तत्कथं पूरणीयाः १, उच्यते, एकादींश्च निवेश्य व्यवस्थाप्याः 'अन्ते' इत्यने । 'क्रमात्' इति क्रममाश्रित्य 'पतिम्' अपूर्यमाणा श्रेणि 'पूरयेत्' परिपूर्णी कुर्यात् , तत्र च द्वितीयपक्ती विकत्रिक-। चतुष्कानामग्रे एककः, तृतीयपतौ त्रिकचतुष्कयोः पर्यन्ते एकको द्विकः, चतुर्थपौ चतुष्कावसान एककद्विकत्रिकाः स्थाप्यन्ते, स्थापना चेयम्-२३|| चतुर्थषष्ठाष्टमदशमप्रक्रमः, 'घन' इति घनतपः 'च' पूरणे तथेति समुचये भवतीति च क्रिया प्रतितपोभेदं योजनीया, अत्र च षोडशपदात्मकः प्रतरः पदचतुष्टयात्मिकया श्रेण्या |
%+15+%AE%ARRAISAX**
दीप
अनुक्रम [११९५
-१२०१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||९-१३|| नियुक्ति: [५१३...]
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[९-१३]
उत्तराध्य.
गुणितो घनो भवति, आगतं चतुःषष्टिः ६४, स्थापना तु पूर्विकैव नवरं वाहल्यतोऽपि पदचतुष्टयात्मकत्वं तपोमार्गबृहद्वृत्तिः विशेषः, एतदुपलक्षितं तपो घनतप उच्यते, 'चः' समुच्चये, 'तथा भवति वर्गथे'तीहापि प्रक्रमावर्ग इति वर्गतपः।
गत्य०३० तत्र च पन एव घनेन गुणितो वर्गों भवति, ततश्चतुःषष्टिश्चतुःषष्टयैव गुणिता जातानि पण्णवत्यधिकानि चत्वारिश ॥६०शा
सहस्राणि, एतदुपलक्षितं तपो वर्गतपः । ततश्च' वर्गतपसोऽनन्तरं 'वर्गवर्ग' इति वर्गवर्गतपः 'तुः' समुचये 'पञ्चलाम' पञ्चसयापूरणम् , अत्र च वर्ग एव यदा वर्गेण गुण्यते तदा वर्गवर्गो भवति, तथा च चत्वारि सहस्राणि पिण्णवत्यधिकानि तावतैव गुणितानि जातका कोटिः सप्तपष्टिलक्षाः ससससतिसहस्राणि द्वे शते पोडशाधिके, अङ्कतोऽपि १६७७७२१६, एतदुपलक्षितं तपो वर्गवर्गतप इत्युच्यते, एवं पदचतुष्टयमाश्रित्य श्रेण्यादितपो दर्शितम् , एतदनुसारेण पञ्चादिपदेवप्येतत्परिभावना कार्या, षष्ठकं 'प्रकीर्णतपः' यच्छ्रेण्यादिनियतरचनाविरहितं खशक्त्यपेक्षं यथाकथञ्चिद्विधीयते, तच नमस्कारसहितादि पूर्वपुरुषाचरितं यवमध्यवज्रमध्यचन्द्रप्रतिमादि च, इत्थं भेदानभिधायोपसंहारमाह-'मणइच्छियचित्तत्थोत्ति मनसः-चित्तस्य ईप्सित-इष्टश्चित्र:-अनेकप्रकारोऽर्थः खर्गापवर्गादिस्तेजोलेश्यादि यस्मात्तन्मनईप्सितचित्रार्थ ज्ञातव्यं भवति 'इत्वरक' प्रक्रमादनशनाख्यं तपः। सम्प्रति मरणकालमनशनं वक्तुमाह-'जा सा अणसणा'इति यत्तदनशनं 'मरणे' मरणावसरे द्विविधं तद्विशेषेणाख्यातंकथितं व्याख्यातं तीर्थकदादिभिरिति गम्यते, तद्वैविध्यमेवाह-सह विचारेण-चेष्टात्मकेन वर्तते यसत्सविचार
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दीप
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अनुक्रम [११९५-१२०१]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
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प्रत
सूत्रांक
[९-१३]
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अनुक्रम [११९५
-१२०१]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||९-१३ || निर्युक्ति: [५१३...]
अध्ययनं [३०],
तद्विपरीतमविचारं, विचारश्च कायवाङ्मनोभेदात्रिविध इति तद्विशेषपरिज्ञानार्थमाह- 'कायचेष्टाम्' उद्वर्त्तनपरिवर्त्तनादिक कायप्रवीचारं 'प्रती' ति आश्रित्य 'भवेत्' स्यात्, तत्र सविचारं भक्तप्रत्याख्यानमिङ्गिनीमरणं च, तथाहि भक्तप्रत्याख्याने गच्छमध्यवर्ती गुरुदत्तालोचनो मरणायोद्यतो विधिना संलेखनां विधाय ततस्त्रिविधं चतुर्विधं वाऽऽहारं प्रत्याचष्टे, स च समाश्रितमृदुसंस्तारं कः समुत्सृष्टशरीराद्युपकरणममत्वः स्वयमेवोद्राहितनमस्कारः समीपवर्त्तिसाधुदत्तनमस्कारो वा सत्यां शक्ती खयमुद्वर्त्तते, शक्तिविकलतायां चापरैरपि किञ्चित्कारयति, यत उक्तम्- "विडणमभुट्टाणं उचियं संलेहणं च काऊणं । पञ्चक्खति आहारं तिविहं च चउविहं वाबि ॥ १ ॥ उब्वत्तति परियन्तति सयमण्णेणावि कारए किंचि । जत्थ समत्थो नवरं समाहिजणयं अपडिबद्धो ॥ २ ॥” इङ्गिनीमरणमप्युक्तन्यायतः प्रतिपद्य शुद्धस्थण्डिलस्थाता एकाक्येव कृतचतुर्विधाहारप्रत्याख्यान स्तत्स्थण्डिलस्यान्तश्छायात उष्णमुष्णाच छायां स्वयं संक्रामति, तथा चाह- 'इंगियमरणविहाणं आपषजं तु वियडणं दाउ संलेहणं च कार्ड जहासमाही जहा कालं ॥ १ ॥ पञ्चक्खति आहारं चउविहं णियमओ गुरुसगासे । इंगियदेसंमि तहा चेपि हु इंगियं कुणइ ॥ २ ॥
१ आलोचनमभ्युत्थानमुचितां संलेखनां च कृत्वा । प्रत्याख्याति आहारं त्रिविधं चतुर्विधं वाऽपि ॥ १ ॥ उद्वर्त्तते परिवर्त्तते स्वयमन्येनापि कारयेत् किञ्चित् । यदि समर्थो नवरं समाधिजनकमप्रतिबद्धः ||२|| २ इङ्गिनीमरणविधानमाप्रत्रज्यं तु आलोचनां दत्वा । संलेखनां कृत्वा च यथासमाधि यथाकालम् ॥ १ ॥ प्रत्याख्याति आहारं चतुर्विधं नियमतो गुरुसकाशे । इङ्गितदेशे तथा चेष्टामपि इङ्गितां करोति ॥ २ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-1 / गाथा ||९-१३|| नियुक्ति: [५१३...]
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प्रत सूत्रांक [९-१३]
उत्तराध्य.
उत्तइ परियत्तइ काइयमाईसु होइ उ विभासा । किचंपि अप्पणुच्चिय झुंजइ नियमेण धीवलिओ ॥३॥" तपोमार्गअविचारं तु पादपोपगमनं,तत्र हि सव्याघाताव्याघातभेदतो विभेदेऽपि पादपवन्निश्चेष्टतयैव स्थीयते,तथा च तद्विधिः
गत्य०३० वृहद्वृत्तिः “अभिवंदिऊण देवे जहाविहं सेसए य गुरुमाई। पञ्चक्खाइनु ततो तयंतिए समाहारं ॥१॥ समभावंमि ॥६०२|| ठियप्पा सम्म सिद्धंतमणितमग्गेणं । गिरिकंदरं तु गंतु पायवगमणं अह करेह ॥ २॥ सवत्थापडिबद्धो दंडायय
मादिठाणमिह ठाउं । यावजीवं चिट्ठा णिचिट्ठो पायवसमाणो ॥३॥" पुनद्वैविध्यमेव प्रकारान्तरेणाह-'अथवेति || प्रकारान्तरसूचने सह परिकर्मणा-स्थाननिषदनत्वग्वर्तनादिना विश्रामणादिना च वर्तते यत्तत्सपरिकर्म अपरिकर्म च तद्विपरीतम् 'आख्यातं' कथितं, तत्र सपरिकर्म भक्तप्रत्याख्यानमिङ्गिनीमरणं च, एकत्र खयमन्येन वा कृतस्य अन्यत्र तु वयंविहितस्योद्वर्तनादिचेष्टात्मकपरिकर्मणोऽनुज्ञानात् , तथा चाह-"आयपरपरिकम्मं भत्तपरिणाएँ दो
अणुन्नाया। परवजिया य इंगिणि चउबिहाहारविरई य ॥१॥ ठाणनिसियणतुयट्टण इत्तरियाई जहासमाहीए । ol १ उद्वर्तते परिवर्त्तते कायिक्यादिषु भवति तु विभाषा। कृत्यमप्यात्मनैव युनक्ति नियमेन धृतिवलिकः॥॥२ अमिवन्ध देवान् यथाविधि
शेषांश्च गुर्वादीन । प्रत्याख्याय ततस्तदन्तिके सर्वमाहारम् ॥ १॥ समभावे स्थितात्मा सम्यक् सिद्धान्तभणितमार्गेण । गिरिकन्दरां तु गत्वा ||६०२॥ पादपोपगमनमथ करोति ॥२॥ सर्वत्राप्रतिबद्धो दण्डायतादि स्थानमिह स्थित्वा । यावज्जीवं तिष्ठन् निश्चेष्टः पादपसमानः ॥२॥ ३ आत्मप-| परिकर्मणी भक्तपरिक्षायां द्वे अध्यनुज्ञाते । परवर्जितं चेङ्गिते चतुर्विधाहारविरतिश्च ॥ १॥ स्थाननिषिदनत्ववर्तनानीत्वराणि यथासमाधि ।।
दीप
अनुक्रम [११९५-१२०१]
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प्रत
सूत्रांक
[९-१३]
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अनुक्रम [११९५
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||९-१३ || निर्युक्ति: [ ५१३...]
अध्ययनं [३०],
सयमेव य सो कुणई उवसग्गपरिसहऽद्दियासे ॥ १ ॥ " अपरिकर्म च पादपोपगमनं, निष्प्रतिकर्मताया एव तत्राभिधानात् तथा चागमः - " समविसमंमि य पडिओ अच्छद जह पायवो व्व णिकंपो । णिचलणिप्पडिकम्मो णिक्खिवई जं जहिं अंगं ॥ २ ॥ तं चिय होइ तहचिय णवरं चलणं परप्पओगाओ । वायाईहिं तरुस्स व पडिणीवाईहिं तह तस्स ॥ ३ ॥" यद्वा परिकर्म — संलेखना सा यत्रास्ति तत्सपरिकर्म, तद्विपरीतं त्वपरिकर्म, तत्र चाव्याघाते त्रयमप्येतत्सूत्रार्थोभयनिष्ठितो निष्पादितशिष्यः संलेखनापूर्वकमेव विधत्ते, अन्यथाऽऽर्त्तध्यानसम्भवात् उक्तञ्च"देहम्मि असंलिहिए सहसा धाऊहि खिजमाणाहिं । जायह अट्टज्झाणं सरीरिणो चरिमकालंमि ॥ ४ ॥” इति सपरिकर्मोच्यते, यत्पुनर्व्याघाते गिरिभित्तिपतनाभिघातादिरूपे संलेखनामविधायैव भक्तप्रत्याख्यानादि क्रियते तदपरिकर्म, उक्तञ्चागमे - “अवि घातो या बिज्जूगिरिभित्तीकोणगा य वा होज्या । संबद्धहत्थपायादयो व
बाएण
१ स्वयमेव च स करोति उपसर्गपरीषदान् अभ्यास्ते ॥ १ ॥ समे विषमे च पतितो यथा तिष्ठति पादप इव निष्प्रकम्पः । निलो निष्पतिकर्मा निक्षिपति यथा यन्त्राङ्गम् ॥ १॥ तत् तथैव भवति नवरं चलनं परप्रयोगात् । वातादिभिस्तरोरिव प्रत्यनीकादिभिस्तथा तस्य ॥ २ ॥ ३ देहेऽसंलिखिते सहसा धातुषु क्षीयमाणेषु जायते आर्त्तध्यानं शरीरिणश्वरमकाले || ३ | ४ अपि घातश्च गिरिविद्युद्भित्तिपतनाथ वा भवेत् । संबद्धहस्तपादादयो वा भवेयुर्वा
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [३०], मूलं [-1 / गाथा ||९-१३|| नियुक्ति: [५१३...]
तपोमार्ग
गत्य०३०
प्रत सूत्रांक [९-१३]
उत्तराध्य.
होजाहि ॥ १॥एपहिं कारणेहि वाघाइममरण होइ बोद्धव्वं । परिकम्ममकाऊणं पञ्चक्खाई ततो भत्तं ॥२॥"
तथा निर्हरणं निहारो-गिरिकन्दरादिगमनेन प्रामादेवहिर्गमनं तद्विद्यते यत्र तन्निहारि तदन्यदनिर्हारि यदुत्थाबृहद्वृत्तिः
तुकामे प्रजिकादौ विधीयते, एतच प्रकारद्वयमपि पादपोपगमनविषयं, तत्प्रस्ताव एवागमेऽस्याभिधानात्, तथा ॥३०॥
चागमः-"पंन्वज्जाई काउंणेयव्यं जाव होयवोच्छित्ती। पंच तुले काऊण य सो पाओगमपरिणतो य॥३॥ तं दुविहं णायव्वं णीहारिं चेव तहमणीहारिं । बहिया गामाईणं गिरिकंदरमाइ णीहारि॥४॥ वइयाइसु जं
अंतो उठेउमणाणं ठाइ अणिहारिं । कम्हा? पायवगयाणं जं उवमा पायवेणऽत्थं ॥५" आहारः-अशनादिस्तबच्छेदः-तन्निराकरणम् , आहारच्छेदश्च द्वयोरपि सपरिकर्मापरिकर्मणोर्निहार्यनिहारिणोश्च सम इति शेषः, उभयत्र
तयवच्छेदस्य तुल्यत्वादिति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ उक्तमनशनमूनोदरतामाह| १. सेन ॥ १॥ एतैः कारणैयाघातिम मरणं भवति बोद्धव्यम् । परिकर्माकृत्वा प्रत्याख्याति ततो भक्तम् ॥ २ ॥ २ प्रमज्यादि कृत्वा नेयं यावद्भवत्यव्युच्छित्तिः । पञ्च तुलनाः कृत्वा च स पादपोपगमने परिणतश्च ।। ३ ।। तहिविधं ज्ञातव्यं निर्हार्य निहारि चैव तथा । बहिर्गमादेगिरिकन्दरादौ निहरि ॥ ४ ॥ जिकादिषु यदन्तः उत्थातुमनसि तिष्ठति अनिहोरि । कस्माद् ! पादपोपगतानां यदुपमा पावपेनात्र ॥४॥
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||१४-२४|| नियुक्ति: [५१३...]
प्रत
सूत्रांक
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[१४-२४]
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ओमोअरणं पंचहा, समासेण वियाहियं । दवओ खित्तकालेणं, भावेणं पजवेहि य ॥१४॥जो जस्स उ आहारो, तत्तो ओमं तु जो करे । जहन्नेणेगसिस्थाई, एवं व्वेण ऊ भवे ॥१५॥ गामे नगरे तह रायहाणिनिगमे य आगरे पल्ली । खेडे कब्बडदोणमुहपट्टणमडंपसंचाहे ॥ १६॥ आसमपए विहारे संनिवेसे समायघोसे य । थलिसेणाखंधारे सत्थे संवट्ट कोहे य ॥१७॥ वाडेसु य रस्थासु य घरेसु वा एवमित्तियं खित्तं ।। कप्पइ उ एवमाई एवं खित्तेण ऊ भवे ॥ १८॥ पेडा य अद्धपेडा गोमुत्ति पयंगवीहिया चेव । संयुकावट्टाययगंतुंपच्छागया छडा ॥१९॥ दिवसस्स पोरिसीणं चउण्डंपि उ जत्तिओ भवे कालो । एवं चरमाणो
खलु कालोमाणं मुणेयध्वं ॥२०॥ अहवा तइयपोरिसीए, ऊणाए घासमेसंतो। चउभागूणा एवा, एवं कालेण Kा भवे ॥ २१॥ इत्थी वा पुरिसो वा अलंकिओ वाऽणलंकिओ वावि । अन्नयरवयस्थो वा, अण्णयरेणं च
वस्थेणं ॥ २२ ॥ अण्णेण विसेसेणं वण्णेणं भावमणुमुअंते उ । एवं चरमाणा खलु भावोमोणं मुणेयध्वं ॥२३॥ दब्बे खित्ते काले भावंमि य आहिया उजे भावा । एएहिं ओमचरओ पजवचरओ भवे भिक्खू ॥ २४ ॥
तत्रावर्म-न्यूनमुदरं-जठरमस्थासाववमोदरस्तद्भावः अवमौदर्य-न्यूनोदरता, पठन्ति च-'ओमोयरणन्ति तत्र चावमं च तदुदरं चावमोदरं तस्मात्करोत्यर्थे णिचि ल्युटि चावमोदरणम् , अवमोदरकरणमित्यर्थः, तच 'पंचह'त्ति 'पञ्चधा' पञ्चप्रकारं 'समासेन' सझेपेण व्याख्यातं, पञ्चधात्वमेवाह-'द्रव्यत इति द्रव्यात् हेतौ पञ्चमी, क्षेत्रं च
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दीप अनुक्रम [१२०२-१२१२]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१४
-२४]
दीप
अनुक्रम
[१२०२
-१२१२]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥ ६०४॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१४-२४|| निर्युक्ति: [५१३...]
अध्ययनं [३०],
कालश्चेति क्षेत्रकालं तेन भावेन च पर्यायैवोपाधिभूतैः सर्वत्र हेतौ तृतीया ॥ तत्र द्रव्यत आह-यो यस्य 'तुः ' पूरणे आहारो-भोजनं ततः - खाहारादवमम् - ऊनं 'तुः' प्राग्वद् यः कुर्याद् भुञ्जान इति शेषः, अयमत्र भावार्थ:-- पुरुषस्य हि द्वात्रिंशत्कवलमान आहारः स्त्रियश्चाष्टाविंशतिकवलमानः, यत उक्तं-" बत्तीस किरकवला आहारो कुच्छिपूरओ भणिओ । पुरिसस्स महिलियाए अट्ठावीसं भवे कवला ॥ १ ॥ कवलाण य परिमाणं कुकुडिअंडगपमाणमेत्तं तु । जो वा अविगियवयणो वयणंमि हिज्ज वीसत्यो ॥ २ ॥ ततश्चैतन्मानादूनं यो भुङ्क्ते यत्तदोर्नित्यमभिसम्बन्धात्तस्य 'एवम्' अमुना प्रकारेण 'द्रव्येण' उपाधिभूतेन भवेदिति सण्टङ्कः, अवमौदार्यमिति प्रक्रमः, एतच जघन्येनैकसिथु-यत्रैकमेव सिक्थु भुज्यते तदादि, आदिशब्दात्सिक्थुइयादारभ्य यावदेककवलभोजनम्, एवं चाअल्पाहाराख्यमवमौदार्यमाश्रित्योच्यते, यत उपार्द्धादिषु तेषु कवलनवकादिमानमेवैतत्, तथा च सम्प्रदायः - "अप्पाहारोमोयरिया एककवलाहारोमोयरिया (जहण्णा अटुकवला० ) उकोसा सेसा अजहण्णुकोसा, अवहाहारोमोयरिया जहन्निया नवकपला उक्कोसेणं बारस सेसा अजहन्नमणुकोसा" इत्यादि, एतद्भेदाभिधायिनी चेयं गाथा - "अप्पाहार १ अवहे २ दुभाग ३ पत्ता ४ सहेब किंचूणा ५ । अट्ट १ दुवालस २ सोलस ३ चउवीस ४ तहेकतीसा य १ द्वात्रिंशत्किल कवला आहारः कुक्षिपुरको भणितः । पुरुषस्य महेलाया अष्टाविंशतिर्भवेयुः कवलाः ॥ १ ॥ कवलानां च परिमाणं कुकुट्यण्डकप्रमाणमात्रमेव । यं वाऽविकृतवदनो वदने क्षिपेद्विश्वस्तः ॥ २ ॥
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तपोमार्ग •
गत्य० ३०
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||६०४॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||१४-२४|| नियुक्ति: [५१३...]
प्रत
सूत्रांक
[१४-२४]
sInt" क्षेत्रावमौदर्यमाह-सति गुणान् गम्यो वाऽष्टादशानां कराणामिति प्रामस्तस्मिन् , नान करोऽस्तीति
का तस्मिन, तथा राजाऽनया धीयत इति राजधानी-राज्ञः पीठिकास्थानमित्यर्थः, निगमयन्ति तस्मिन्ननेक-1|| विधभाण्डानीति निगमः-प्रभूततरवणिजां निवासोऽनयोः समाहारस्तमिश्च, आकुर्वन्ति तस्मिन्नित्याकरो-हिरण्यायुत्पत्तिस्थानं तस्मिन् , 'पलि'त्ति सुव्यत्ययात् पाल्यन्तेऽनया दुष्कृतविधायिनो जना इति पल्ली, नैरुक्तो विधिः, | यक्षगहनाद्याश्रितःप्रान्तजननिवासस्तयां, खेट्यन्ते-उनास्वन्तेऽस्मिन्नेव स्थितैः शत्रय इति खेटं-पांशुप्राकारप-18 रिक्षिप्तम् , उक्तं हि-"खेडं पुण होइ धूलिपायारं " तस्मिन् , कट-कर्बटजनावासः, कुनगरमित्यर्थः, द्रोण्योनायो मुखमस्येति द्रोणमुख-जलस्थलनिर्गमप्रवेशं यथा भृगुकच्छ ताम्रलिप्सिा, पतन्ति तस्मिन् समस्त दिग्भ्यो जना इति पत्तनं,तच जलपत्तनं यजलमध्यवर्ति,यथा काननद्वीपः, स्थलपत्तनं च निर्जलभूभागभावि यथा मथुरा, 'मडंब'चि देशीपदं यस्य सर्वदिश्वर्द्धतृतीययोजनान्तामो नास्ति, समिति-भृशं वाध्यन्तेऽस्मिन् जना इति संबाधः-प्रभूतचा-14 तुर्वर्ण्यनिवासः, कर्बटादीनां चात्र समाहारद्वन्द्वस्तस्मिन्, आ-समन्तात् श्राम्यन्ति-तपः कुर्वन्सस्मिन्नित्याश्रम:
तापसावसधादिस्तदुपलक्षितं पदं स्थानमाश्रमपदं तस्मिन्, विहारो-भिक्षुनिवासो देवदंवा तत्प्रधानो ग्रामादिहारपि विहारस्तस्मिन् , 'संनिवेशे' यात्रादिसमायातजनावासे, समाजा-पथिकसमूह घोषो-गोकुलमनयोः समाहारे
समाजघोष तस्मिन् , 'च' समुच्चये, स्थल्याम्-उच्चभूभागे सेना-चातुरङ्गबलसमूहः स्कन्धावारः स एवाशेपखेडाडुप-|
दीप अनुक्रम [१२०२-१२१२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||१४-२४|| नियुक्ति: [५१३...]
उत्तराध्य.
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥६०५॥
[१४
-२४]
लक्षितोऽनयोः समाहारे सेनास्कन्धावार तस्मिन्, 'सार्थे' गणिमधरिमादिभृतवृषभादिसङ्घाते संवर्त्तन्ते-पिण्डीभव- तपोमार्गत्यस्मिन् भयत्रस्ता जना इति संवर्तस्तस्मिन्, कोर्ट-प्राकारोऽनयोः समाहारे संवर्तकोर्ट तस्मिन्, 'चः' समुच्चये,
गत्य०३० क्षेत्रप्रस्तावादिह समाजिकादिषु च क्षेत्रमेयोपलक्ष्यते । 'वाडेसुत्ति बाटेषु पाटेषु वा वृत्तिवरण्डिकादिपरिक्षिप्तगृहसमूहात्मकेषु 'रथ्यासु' सेरिकासु 'गृहेषु' प्रतीतेपु, सर्वत्र वा विकल्पे, "एवं'मित्यनेन हृदयस्थप्रकारेण 'एत्तियन्ति एतावत् विवक्षातो नियतपरिमाणं क्षेत्रं 'कल्पते' उपयोगं याति पर्यटितुमिति शेषः, 'तुः' पूरणे, एवमादि, आदिशब्दागृहशालादिपरिग्रहः, 'एव'मित्यमुना क्षेत्रप्राधान्यादभिग्रहग्रहणलक्षणेन प्रकारेणेति 'क्षेत्रेण' इति क्षेत्रहेतुकं 'तुः पूरणे भवेदवमौदार्यमिति प्रक्रमः ॥ पुनरन्यथा क्षेत्रावमौदार्यमाह-पेडे'त्यादि, अत्र च सम्प्रदायः-"पेडा पेडिका |इव चउकोणा अद्धपेडा इमीए चेव अद्धसंठिया घरपरिवाडी गोमुत्तिया कावलिया पयंगविही अणियया पर्यगुडा-I णसरिसा 'संयुकावटुं'ति शम्बूक:-शङ्खस्तस्यावतः शम्बूकावतस्तद्वदावर्तो यस्यां सा शम्बूकावा, सा च द्विविधायतः सम्प्रदाय:-"अभितरसंवुक्का बाहिरसंबुका य, तत्थ अभंतरसंबुक्काए संखनाभिखेत्तोवमाए आगिइए अंतो || आढवति बाहिरओ संणियट्टइ, इयरीए विवजओ,"'आययगंतुंपचागय'त्ति, अत्रायतं-दीचे प्राञ्जलमित्यर्थः, तथा
॥६०५॥ च सम्प्रदायः-"तत्थ उज्जुयं गंतूण नियट्टई" 'छट्टत्ति पष्ठी, नन्वत्र गोचररूपत्वाद्भिक्षाचर्यात्वमेवासा तत्कथ-४ |मिह क्षेत्रावमौदार्यरूपतोक्ता ?, उच्यते, अवमौदार्य ममास्त्वित्सभिसम्बन्धिना विधीयमानत्वादवमौदार्यव्यपदेशोड-11
दीप अनुक्रम [१२०२-१२१२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||१४-२४|| नियुक्ति: [५१३...]
R
प्रत
सूत्रांक [१४
-२४]
प्यदुष्ट एच, दृश्यते हि निमित्तभेदादेकत्रापि देवदत्तादौ पितृपुत्राद्यनेकव्यपदेशः, एवं पूर्वत्र प्रामादिविषयस्योत्तरत्र || 8 कालादिविषयस्य च नैयतस्याभिग्रहत्वेन भिक्षाचर्यात्वप्रसङ्गे इदमेवोत्तरं वाच्यम् ॥ कालावमौदार्यमाह-दिवसस्य अहः 'पौरुषीणां' प्रहराणां चतसृणामपि 'तुः प्राग्वद् यावान् भवेत्कालोऽभिग्रहविषय इति शेषः, 'एव'मित्येवं प्रक्रमा-13 कालेन 'चरमाण'त्ति तिसुव्यत्ययाचरतः 'खलु निश्चित कालोमाण'न्ति कालेनावमत्वं प्रस्तावादुदरस्य कालावमत्वं
कोऽर्थः ?-कालावमौदार्य मुणितव्यं, कालहेतुत्वादस्येति भावः, यदिवाऽभेदोपचारेण स एवाभिगृहीतकाले चरन-2 विमौदार्य मुणितव्यः॥ एतदेव प्रकारान्तरेणाह-अथवा तृतीयपौरुष्यामूनायां प्रासम्-आहारमेषयन्-त्रिविधेपणया ।
गवेषयन् , न्यूनत्वमेव विशेषत आह-चतुर्भागोनायां वाशब्दात्पश्चादिभागोनायां वा तृतीयपौरुष्याम्, 'एवम्' अमुना कालविषयाभिग्रहलक्षणेन प्रकारेण चरन्नित्यनुवर्तते, कालेन तु भवेदवमौदार्ययोगाद् यतिरप्यवमौदार्यम् , औत्स|र्गिकविधिविषयं चैतत् , उत्सर्गतो हि तृतीयपौरुष्यामेव भिक्षाटनमनुज्ञातं, यदुक्तम्-"पंथो भिक्खा य तइयाए"त्ति। भावावमौदार्यमाह-स्त्री वा पुरुषो वा 'अलङ्कतो वा' कटकाद्यलङ्कारविभूषितो वा 'अनलङ्कृतो वाऽपि तद्विपरीतः, तथाऽन्यतरच तद्वयश्च-बाल्याद्यन्यतरवयस्तत्स्थो वा, अन्यतरेण वा पट्टवाटकमयादिना 'वाण' वाससा, लक्षणे त-14 |तीया, सर्वत्र वा विकल्पे । 'अन्येन' विशेषान्तराद्भिन्नेन 'विशेषेण' कुपितप्रहसितादिनाऽवस्थाभेदेन 'वर्णेन' कृष्णादिना प्रक्रमादन्यतरेणोपलक्षितः 'भाव' पर्यायमुक्तरूपमेवालङ्कृतत्वादि 'अणुमुयंते उ' त्ति तुशब्दस्वावधारण(गार्थ)त्वाद् ४
दीप अनुक्रम [१२०२-१२१२]
ECEOCOCKS
wwjanatarary.om
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||१४-२४|| नियुक्ति: [५१३...]
तपोमार्ग
प्रत
सूत्रांक
[१४
-२४॥
उत्तराध्या
अनुन्मुञ्चन्नेव' अत्यजन्नेव यदि दाता दास्यति ततोऽहं ग्रहीष्ये न त्वन्यथेत्युपस्कारः, एवं चरन् ‘खलु' निश्चित 'भा- दिवोमोणं' ति भावावमत्वेनोपलक्षितः प्रक्रमादुदरख मुणितव्यः, यद्वा सुच्च्यत्ययादेवं चरतः खलु सुब्व्यत्ययाभावाववृहातमत्वेन हेतुना मुणितव्यमावमौदार्यमिति प्रक्रमः॥ पर्यवावमौदार्यमाह-'द्रव्ये' अशनादौ क्षेत्रे' प्रामादौ 'काले' ॥६०६|3|पौरप्यादौ 'भावे च' स्त्रीत्वादी 'आख्याताः' कथिताः 'तुः' पूरणे ये 'भावाः' पर्याया एकसिक्थोनत्वादयः, एतैः|
सर्वैरपि द्रव्यादिपर्यायैः 'ओमत्ति' अवममुपलक्षणत्वादवमौदार्य चरति-आसेवते अवमचरकः पर्यवचरको भवे-13 शिक्षुः, इह च पर्यवग्रहणेन पर्यवप्राधान्यविवक्षया पर्यवावमौदार्यमुक्तम् , अथवा 'एएहि अवमचरओ'त्ति एतेभ्यः' द्रव्यादिपर्यायेभ्यः 'अवमचरकः' न्यूनत्वासेवकः, किमुक्तं भवति !-एकसिक्थोनत्वादावपि नवपुराणादिविशेषाभिग्रहवान् , एवं ग्रामपौरुषीस्त्रीत्वादिष्वपि विशिष्टाभिग्रहतः पूर्वस्मान्न्यूनत्वं भावनीयम् । आह-क्षेत्रावमौदार्यादिष्यप्यशनादिद्रव्येणैवोदरस्थावमत्वमिति कथं द्रव्यावमौदार्यादेषां विशेषः १, उच्यते, क्षेत्रादिहेतुकत्वस्यैव तत्र प्राधान्येन | विवक्षितत्वात्, तद्विवक्षा च द्रव्यावमौदार्यस्खापि तेषु त तुकत्वात्, यदिवा यत्रापि द्रव्यतो न्यूनत्वमुदरस्य नास्ति
तत्रापि क्षेत्रादिन्यूनतामपेक्ष्य क्षेत्राद्यवमौदार्याणि भण्यन्त इति प्रश्नानवकाश एवेति सूत्रैकादशकगर्भार्थः ॥ इत्थमदिवमौदार्यमभिधाय भिक्षाचर्यामाह
अट्टविहगोयरग्गं तु, तहा सत्तेव एसणा । अभिग्गहा य जे अन्ने, भिक्खायरियमाझ्या ॥२५॥
दीप अनुक्रम [१२०२-१२१२]
॥६०६॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||२५|| नियुक्ति : [५१३...]
प्रत
सत्राक
[२५]
'अविहगोयरग्गं'ति प्राकृतत्वाद् अष्टविधा-अष्टप्रकारोऽना-प्रधान आधाकर्मादिपरिहारेण स चासौ गौरिव चरणम्-उच्चावचकुलेष्वविशेषेण पर्यटनं गोचरश्चाष्टविधानगोचरः, 'तुः उत्तरभेदापेक्षया समुचये, तथा सप्तवेषणा अभिगृह्यन्त इत्यभिग्रहाः 'चा' समुच्चये ये अन्ये एतदतिरिक्ताः, ते किमित्याह-'भिक्खायरियमाहियति सूत्रत्वेन भिक्षाचर्याविषयत्वात् भिक्षाचर्या वृत्तिस पापरनामिकाऽऽख्याताः, अत्र चाटावग्रगोचरभेदाः पेडादय एव शम्बूकावदाया वैविध्याश्रयणतः तथा ऋज्व्याद्याश्चापरायाः प्रक्षेपात्, ससैषणामाः-"संसहमसंसठ्ठा उद्धड तह अप्पलेवडा
चेव। उग्गहिया पग्गहिया उज्झियधम्मा य सत्तमिया ॥१॥" 'अभिग्रहाच' द्रव्यक्षेत्रकालभावविषयाः, तत्र द्रव्याभिग्रहा:-कुन्तानादिसंस्थितमण्डकखण्डादि ग्रहीष्य इत्यादयः क्षेत्राभिग्रहा:-देहलीजङ्योरन्तर्विधाय यदि दास्यति ४ ततो प्रायमित्यादयः, कालाभिग्रहाः-सकलभिक्षाचरनिवर्तनावसरे मया पर्यटितव्यमित्यादयः, भावाभिग्रहास्तु-हसन् द रुदन् बद्धो वा यदि प्रतिलाभयिष्यति ततोऽहमादास्ये न त्वन्ययेत्येवमादय इति सूत्रभावार्थः ॥ (प्रन्यानम्१५०००)।
अभिहिता भिक्षाचर्या, रसपरित्यागमाह2 खीरदहिसप्पिमाई, पणीय पाणभोयणं । परिवजणं रसाणं तु, भणियं रसविषजणं ॥ २६ ॥
क्षीरं-दुग्धं दधि-तद्विकारः सर्पिः-घृतं तदादि, आदिशब्दाद् गुडपक्कान्नादिपरिप्रहः, 'प्रणीतम्' अतिबृंहकं पीयत इति पानं-वर्जूररसादि भुज्यत इति भोजनालविन्द्वोदनादि अनयोः समाहारे पानभोजनं सोपस्कारत्वादेषां ।
दीप
अनुक्रम [१२१३]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||२६|| नियुक्ति: [५१३...]
बृहद्वृत्तिः
प्रत
सत्राक
[२६]
उत्तराध्य. 'परिवर्जन' परिहरणं रसाना रस्यमानत्वेन 'तुः' पूरणे 'भणितम्' अभिहितं तीर्थकृदादिभिरिति गम्यते, रसविवर्जनं । तपो
नाम बाह्यं तप इति सूत्रार्थः ॥ उक्तो रसपरित्यागः, कायक्लेशमाहठाणा वीरासणाईया, जीवस्स उ सुहावहा । उग्गा जहा धरिजंति, कायकिलेसं तमाहियं ॥२७॥
| गत्व०३० ॥६०७॥ स्थीयत एभिरिति स्थानानि-कायावस्थितिभेदा वीरासन-पत्सिंहासनस्थितस्य तदपनयने तथैवावस्थानं तदादि-1
आयेषां तानि वीरासनादिकानि, आदिशब्दागोदोहिकासनादिपरिग्रहः, सूत्रत्वालिङ्गव्यत्ययात् , लोचाधुपलक्षणं चैतत् ,
तथाऽऽह-"वीरासण उकुडुगासणाइ लोयाइओ अ बिण्णेओ । कायकिलेसो संसारवासणिवेयहेउत्ति ॥१॥" 'जीवस्य जन्तोः 'तु:' अवधारणे भिन्नक्रमश्च, ततः सुखावहान्येव मुक्तिसुखप्रापकत्वेन शुभावहान्येव वा 'उप्राणि' दुरनुष्ठेयतयोत्कटानि 'यथा' येन प्रकारेण 'धार्यन्ते' इत्यासेव्यन्ते गम्यमानत्वाद्यतिभिः 'कायकिलेसं तमाहियन्ति कायस्य क्लेशो-बाधनं कायक्लेशः सः 'आख्यातः' कवितस्तथैवेति शेषः, इह घ संसार्यात्मनः कायानुगतत्वेन तत्क्लेशे यद्यप्यवश्यं क्लेशसम्भवस्तथाऽपि भावितात्मनामसौ सन्नप्यसत्सम एवेति तदनभिधानमिति सूत्रार्थः ॥ एवं कायक्लेशमुक्त्वा संलीनतां वक्तुमाह
६०७॥ एगतमणावाए, इत्थीपसुविवज्जिए । सयणासणसेवणया, विवित्तं सयणासणं ॥ २८॥ १ वीरासनोत्कटुकासनादि लोचादिकश्च विज्ञेयः । कायक्लेशः संसारवासनिर्वेदहेतुरिति ॥ १ ॥
दीप
अनुक्रम [१२१४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||२८|| नियुक्ति: [५१३...]
प्रत सुत्रांक [२८]
MI एगंतति सुव्यत्ययाद् 'एकान्ते' जनेनानाकुले 'अनापाते' ख्याधापातरहिते 'स्त्रीपशुविवर्जिते' तत्रैव स्थितख्या
दिरहिते शून्यागारादाविति भावः 'सयणासणसेवणय'त्ति सूत्रत्वात् शयनासनसेवनं विविक्तशयनासनं बावं तप | उच्यत इति शेषः, उपलक्षणं चैतदेषणीयफलकादिग्रहणस्य, तथा चानेन विविक्तचर्या नाम संलीनतोक्ता भवति,
यतस्तल्लक्षणमिदम्-"आरामुजाणाइसु थीपसुपंडगविवजिए ठाणं । फलगाईण य गहणं तह भणियं एसणिजाणं Mu॥"शेषसंलीनतोपलक्षणं चासौ, प्राधान्याचास्या एव साक्षादभिधानं, प्राधान्यं चेन्द्रियादिसलीनतोपकारित्वा-IN
दस्याः, इयं चेत्थं चतुर्विधा, यत उक्तम्-"इंदियकसायजोगे पडुच संलीणया मुणेयवा । तह जा विवित्तचरिया पण्णत्ता वीयरागेहिं ॥१॥” तत्रेन्द्रियसलीनता श्रोत्रादिभिरिन्द्रियैः शब्दादिषु सुन्दरेतरेषु रागद्वेषाकरणं, कषायसंलीनता तदुदयनिरोध उदीर्णविफलीकरणं च, योगसंलीनता च मनोयोगादीनामकुशलानां निरोधः कुशलानामुदीर-13 गमिति सूत्रार्थः । उक्तमेवार्थमुपसंहरन्नुत्तरग्रन्थसम्बन्धाभिधानायाह
एसो बाहिरगतबो, समासेण वियाहिओ। अम्भितरं तवं इत्तो, बुच्छामि अणुपुव्वसो॥२९॥ 'एतत् अनन्तरोक्तं बायकं तपः समासेन व्याख्यातम् , आह-किं पुनरितो बाद्यात्तपसः फलमवाप्यते ?, उच्यते, M १ आरामोद्यानादिषु स्त्रीपशुपण्डकविवर्जिते स्थाने । फलकादीनां च ग्रहणं तथा भणितमेषणीयानाम् ॥ १ ॥ २ इन्द्रियकवाययोगान्
प्रतीत्य संलीनता ज्ञातव्या । तथा या विविक्तचयाँ प्रज्ञप्ता वीतरागैः ॥ २॥
दीप
CSCRICE
अनुक्रम [१२१६]
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||२९|| नियुक्ति : [५१३...]
तपोमार्ग
बृहद्वृत्तिः
गत्य०३०
प्रत
॥६०८॥
सत्राक
[२९]
उत्तराध्य. निःसमता शरीरलाघवेन्द्रियविजयसंयमरक्षणादिगुणयोगात् शुभध्यानावस्थितस्य कर्मनिर्जरणमिति, अभ्यन्तरतपः
इतः' बासतपोऽभिधानादनन्तरं 'वक्ष्यामि' अभिधास्से 'अणुपुब्बसो'त्ति आनुपूयेति सूत्रार्थः ॥ प्रतिज्ञातमाह
पायच्छिसं विणओ, बेवावञ्च तहेव समाओ। झाणं च विउस्सग्गो, एसो अभितरो तवो ॥३०॥ अक्षरार्थः सुगम एव, भावार्थ तु सूत्रत एवाह सूत्रकृत्
आलोअणारिहाईयं, पायच्छित्तं तु दसविहं । जे भिक्खू वहई सम्म, पायच्छित्तं तमाहियं ॥ ३१ ॥ अ-1 म्भुट्टाणं अंज(गंज)लिकरण, तहेवासण दायणं । गुरुभत्तिभावसुस्सूसा, विणओ एस वियाहिओ ॥ ३२ ॥
आयरियमाइयंमि, वेयावचे य दसविहे । आसेवर्ण जहाथाम, यावच्चं तमाहियं ॥ ३३ ॥ बायणा पुच्छदाणा चेच, तहेव परियट्टणा । अणुप्पेहा धम्मकहा, सहाओ पंचहा भवे ॥ ३४ ॥ अहरुदाणि वजित्ता, झा-3
इज्जा सुसमाहिए। धम्मसुकाई झाणाई, झाणं तं तु बुहा वए (वयन्ति)॥ ३५॥ सपणासण ठाणे वा, जे उ भिक्खू ण वावरे । कायस्स विउस्सग्गो, छटो सो परिकित्तिओ ॥३६॥ | आलोचनं विकटनं प्रकाशनमाख्यानं प्रादुष्करणमित्यनान्तरं, तदहत्यालोचनाई-यत् पापमालोचनात एव शु-15 ध्यति, उक्तं हि-"आलोयणमरिहंति आ मज्जा लोयणा गुरुसगासे। जं पाव विगडिएणं सुज्झइ पच्छित्तपढमेयं ॥१॥" १ आलोचनाई मिति आमर्यादायामालोचना गुरुसकाशे । यत् पापं विकटनेन शुध्यति प्रायमित्तं प्रथममिषम् ॥ १ ॥
दीप
अनुक्रम [१२१७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||३१-३६|| नियुक्ति: [५१३...]
प्रत
सूत्रांक
[३१.
-३६]
आदिशब्दात्प्रतिक्रमणाहीदिपरिग्रहः, इह पुनरुपचारादेवंविधपापविशुद्धयुपायभूतान्यालोचनादीन्येवालोचनार्दादिशब्देनोक्तानि, उपचारनिमित्तं चात्र विषयविषयिभावः, एवंविधानि हि पापान्यालोचनादीनां विषय आलोचनादीनि च विषयीणीति भावनीयं, तथा चान्यत्र 'आलोयणपडिक्कमणे' त्यादिनाऽहंशब्दं विनैव तद्भेदाभिधानं, तदेवंविधमालोचनाईमादिर्यस्य तदालोचनार्हादिकं, शेषाद्विभाषेति (पा.५-४-१५४)कप्प्रत्ययः, 'प्रायश्चित्तम्' उक्तनिरुक्तं 'तुः। अवधारणे भिन्नक्रमश्च, ततः 'दशविधमेव' दशप्रकारमेव, दशविधत्वं चेत्यम्-"आलोयण पडिकमणे मीस विवेगे तहा विउस्सग्गे। तव छेय मूल अणवठ्ठया य पारंचिए चेव ॥१॥" 'जत्ति आर्षत्वाद् यद्भिक्षुः 'वहति' आसेवते 'सम्यग'। अवैपरीत्येन प्रायश्चित्तं तदाख्यातम् शा विनयमाह-अभ्युत्थानमञ्जलिकरणमुभयमपि प्रतीतं 'तथे ति समुच्चये 'एवेति पूरणे 'आसणदायण'ति सूत्रत्वादासनदानं पीठादिदानमित्यर्थः, गुरूणां गौरवार्हाणां भक्तिर्गुरुभक्तिः, भावः-अन्तः। करणं तेन शुश्रूषा-तदादेशं प्रति श्रोतुमिच्छा पर्युपासना वा भावशुश्रूषा, विनय एष व्याख्यातः २॥ वैयावृत्त्यमाहआयरियमाईत्तिमकारोऽलाक्षणिकस्ततः आचायोदिके आचार्य(यादि)विषये व्यापृतभावो वैयावृत्त्यम्-उचिताहारादिसम्पादनम् ,उक्तश्च-"यावचं वावडभायो तह धम्मसाहणणिमित्तं। अन्नाइयाण विहिणा संपाडणमेस भावत्यो॥१॥"
१ आलोचना प्रतिक्रमणं मिश्र विवेकस्तथा व्युत्सर्गः । तपश्छेदो मूलमनवस्थाप्यता च पाराभिकमेव ॥१॥२ वैयावृत्त्यं व्यापृत|भावस्तथा धर्मसाधननिमित्तम् । अन्नादिकानां विधिना संपादनमेष भावार्थः ॥ २ ॥
दीप अनुक्रम [१२१९-१२२४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||३१-३६|| नियुक्ति: [५१३...]
GianSUMAN
TR"TN
प्रत
सूत्रांक
बृहद्वृत्तिः ॥६०९॥
[३१
CONCE
-३६]
तस्मिन् 'दशविधे' दशप्रकारे, दशविधत्वं चाचार्यादिविषयभेदाद्, उक्तं हि-"आयरिय १ उवझाय २ थेर ३-1ोमा तवस्सी ४ गिलाण ५ सेहाणं ६ । साहम्मिय ७ कुल ८ गण ९ संघ १० संगयं तमिह कायचं ॥१॥" 'आसेव-11 नम्' एतद्विषयमनुष्ठानं 'यथास्थानं' खसामर्थ्यानतिक्रमेण वैयावृत्त्यं तदाख्यातमिति ३॥ स्वाध्यायमाह-वायणे'- गत्य०३० त्यादि प्राग्व्याख्यातप्रायमेव ४॥ सम्प्रति ध्यानमाह-ऋतं-दुःखम् , उक्तं हि-"ऋतशब्दो दुःखपर्यायवाच्याथी-1 यते," ऋते भवमात, तथा रोदयत्यपरानिति रुद्रः-प्राणिवधादिपरिणत आत्मैव तस्खेदं कर्म रौद्रम् , आत च रौद्रं |च आर्सरौद्रे, प्राकृतत्याच बहुवचननिर्देशः, 'वर्जयित्वा' हित्वा ध्यायेत्सुसमाहितः प्राग्वत् , किमित्याह-धर्मःक्षमादिदशलक्षणस्तस्मादनपेतं धयं शुक्लं-शुचि-निर्मलं सकलमिथ्यात्वादिमलविलयनात् यद्वा शुगिति-दुःखमष्टप्रकारं वा कर्म ततः शुचं क्लमयति-निरस्पतीति शुक्लमनयोर्द्वन्द्वस्ततःधर्म्यशुक्लथ्याने स्थिराध्यवसानरूपे, उक्त हि-"जं घिरमज्झवसाणं तं झाणं जं चलं तयं चित्तं"ति, "ध्यानं ध्यानाख्यं तपस्तत् तुशब्दस्यैवकारार्थत्वात्तदेव |बुधाः 'वयंति' वदन्ति ५॥ अधुना व्युत्सर्गमाह-शय्यत इति शयनं-संस्तारकादौ तिर्यक् शरीरनिवेशनं तत्रासनम्
उपवेशनं तस्मिन् , उभयत्र सूत्रत्वात्सुपोर्लुक् 'स्थाने' ऊर्ध्वस्थाने 'वा' विकल्पे प्रत्येकं च योज्यते, खशक्त्यपेक्षं स्थित ६०९॥ - १ आचार्योपाध्यायस्थविरतपस्विग्लानशैक्षाणाम् । साधर्मिककुलगणसङ्ग्रे संगतं तदिह कर्त्तव्यम् ॥ १॥ २ यत् स्थिरमध्यवसानं तत् भ्यानं यत् चलत् तत् चित्तम् ।
दीप अनुक्रम [१२१९-१२२४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३०], मूलं [-] / गाथा ||३७|| नियुक्ति: [५१३...]
प्रत सूत्रांक
[३७]
इति गम्यते, यस्तु भिक्षुः 'न वावरे'त्ति 'न व्याप्रियते' न चलनादिक्रियां कुरुते, यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धादर्थवशादर विभक्तिपरिणामतच तस्य भिक्षोः 'कायस्य' शरीरस्य 'व्युत्सर्गः' चेष्टां प्रति परित्यागो यः 'छटो सो परिकित्तितो'ति |सत्रत्याप्लिङ्गव्यत्यये षष्ठं 'तत्' प्रक्रमादभ्यन्तरं तपः परिकीर्तितं' तीर्थकरादिभिरुक्तं, शेषव्युत्सर्गोपलक्षणं चैतद्,
अनेकविधत्वात्तस्य, उक्तंच-"देचे भावे य तहा दुविधुस्सग्गो चउविहो दब्वे । गणदेहोवहिभत्ते भावे कोहाभाइचातोत्ति ॥१॥" इति सूत्रपदार्थः ॥ सम्प्रत्यध्ययनार्थमुपसंहरन्नस्यैव फलमाहएयं तवं तु दुविहं, जं सम्मं आयरे मुणी । से खिप्पं सव्वसंसारा, विप्पमुच्चइ पंडिए ॥ ३७॥ तिबेमि ॥
॥ तवमग्गिज ॥ ३८॥ एतत्' अनन्तरोक्तखरूपं तवं तु दुविहति तपः द्विविधमपि उक्तभेदतो द्विभेदमपि यः सम्यक् 'आचरेत्' आसेवते मुनिः स क्षिप्रं 'सर्वसंसारात्' चतुर्गतिरूपात् 'विप्रमुच्यते' पृथग् भवति पण्डितः, पठन्ति च-सो खवेत्तु दरयं अरओ, नीरयं तु गई गए' इह च 'आयरे ति तिब्यत्ययादाचारीत्, अतीतनिर्देशश्च भूतभविष्यतोरप्युपल
क्षणं, कालत्रयेऽपि तुल्यमाहात्म्यत्वादस्खैतत्क्षेत्रापेक्षा (क्षया) वेति सूत्रार्थः ।। इति' परिसमासौ, ब्रवीमीति पूर्ववत् । 18॥ इत्यवसितोऽनुगमो, नयाश्च प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां तपोमागेंगति नामकं त्रिंशत्तममध्ययनं समासमिति ॥ ३०॥
१ द्रव्ये भावे तथा द्विविध उत्सर्गः चतुर्विधो द्रव्ये | गणदेहोपधिभक्ते भावे क्रोधारित्याग इति ॥ १॥
दीप अनुक्रम [१२२५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- ३० परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||३७...|| नियुक्ति: [५१४-५१७]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
अथ चरणाख्यमेकत्रिंशत्तममध्ययनम् ।
चरणवि
| ध्य०३१
प्रत
॥६१०॥
सत्राक
[३७]
दीप अनुक्रम [१२२५]
व्याख्यातं त्रिंशचममध्ययनम् , अधुनकत्रिंशत्तममारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने तप उक्तम्, इह तु तच्चरणवत एव सम्यग् भवतीति चरणमुच्यते इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्याध्ययनस्य पूर्ववदुपक्रमादिद्वारचतुष्टयप्ररूपणा तावद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे चरणविधिरिति नाम, अतश्चरणविधिशब्दनिक्षेपायाह नियुक्तिकृत्निक्खेवो चरणमि(मी)चउविहो दुविहोय होइ दबंमि। आगमनोआगमओ नोआगमओय सोतिविहो। जाणगसरीरभविए तवतिरित्ते य गइभिक्खमाईसुं। आचरणे आचरणं भावाचरणं तुणायत्वं ॥५१५॥ णिक्खेवो उ विहीए चउबिहो दुविहो य होइ दबंमि।आगमनोआगमओ नोआगमओ य सो तिविहो ।
जाणगसरीरभविएं तबतिरित्ते य इंदियत्थेसुं। भावविही पुण दुविहा संजमजोगो तवो चेव ॥ ५१७॥ BI गाथाचतुष्टयं स्पष्टमेच, नवरं 'तव्वइरित्ते यत्ति तद्यतिरिक्तं च गतिभिक्षादिषु गतिः-गमनं भिक्षा-भक्षणं, पठ्यते ।
च'चर गतिभक्षणयोः' इति, आदिशब्दादासेवापरिग्रहः, उक्तं हि-"चरतिरासेवायामपि वर्तते" इति, तत एतेषु सत्सु
१०॥
ता
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -३१ "चरणविधि" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५१८]
प्रत
प्रक्रमाद्रव्यमेव सुव्यत्ययेन गत्यादयो वा भावचरणकार्याकरणत्वेन तद्यतिरिक्तद्रव्यचरणं, तथा 'आचरणे' प्रस्तावाजाज्ज्ञानाद्याचारे 'आचरणम्' अनुष्ठान सिद्धान्ताभिहितं 'भावे' विचार्ये चरणं 'तुः' विशेषणे ज्ञातव्यमिति ॥ तथा ||'इंदियत्थेसु'न्ति इन्द्रियाणि-स्पर्शनादीनि तेषामर्थाः-स्पर्शादयस्तेषु प्रक्रमाद् यः 'विधिः' अनुष्ठानमासेवनमितियावत्, अस्यापि द्रव्यत्वं भावविधिफलासाधकत्वेन द्रव्यप्राधान्यविवक्षया वा, भावविधिः पुनः 'द्विविधः' द्विप्रकारः, द्वैविध्यमाह-संयमयोगः संयमव्यापारः 'तपश्चैव' अनशनाद्यनुष्ठानरूपं, चरणासेवनं छत्र भावविधिः, स| |चैवंविध एवेति गाथाचतुष्टयार्थः ॥ सम्प्रति येनेह प्रकृतं तदुपदर्शयन्नुपदेशमाहपगयं तु भावचरणे भावविहीए अहोइ नायवं । चइऊण अचरणविहिं चरणविहीए उ जइयत्वं ॥५१८॥
निगदसिद्धा, नवरं 'भावचरणेन' प्रस्तावाचारित्राचारानुष्ठानेन 'अचरणविधिम्' अनाचारानुष्टानं त्यक्त्वा 'चरणविधौ' उक्तरूपे 'यतितन्य' यतो विधेय इति गाथार्थः ॥ उक्तो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तच्चेदम्
चहणविहिं पवक्खामि, जीवस्स उ सुहावहं । जे चरित्ता बहू जीवा, तिन्ना संसारसागरं ॥१॥ चरणस्य विधिः आगमोक्तन्यायः चरणविधिस्तं प्रवक्ष्यामि जीवस्य 'तुः' अवधारणे भिन्नक्रमस्ततः 'सुहावह'ति
दीप
अनुक्रम [१२२६]
.
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०
उत्तराध्य.
सुखावहमेव शुभावहमेव वा, यथा चैतदेवं तथा फलोपदर्शनद्वारेणाह-यं चरित्वा' आसेव्य वहयो जीवाः 'तीर्णाः [ चरणवि
अतिकान्ताः 'संसारसागरं' भवसमुद्र मुक्तिमवाप्सा इत्यभिप्राय इति सूत्राथें ॥ बृहद्वृत्तिः ॥११॥
एगओ विरई कुज्जा, एगओ अपवत्तणं । अस्संजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं ॥२॥ रागद्दोसे य दो पाचे, पावकम्मपवत्तणे । जे भिक्खू संभई निचं, से न अच्छह मंडले ॥३॥ दंडाणं गारवाणं च, सल्लाणं च तियं । तियं । जे भिक्खू चयई निचं, से न अच्छा मंडले ॥४॥ दिब्वे यजे उबस्सग्गे, तहा तेरिच्छमाणुसे। जे भिक्खू सहई निचंसे न अच्छह मंडले ॥५॥ विगहाकसायसनाणं, झाणाणं च दुर्य तहा । जे भिक्खू/8|| वजई निर्च, से न अच्छा मंडले ॥६॥बएस इंदियत्येसु, समिईसु किरियासु य । जे भिक्खू जयई निचं, | से न अच्छह मंडले ॥७॥ लेसासु छसु काएस, छक्के आहारकारणे । जे भिक्खू जय निचं, से न अच्छा | मंडले ॥८॥ पिंहुग्गहपडिमासु, भयवाणेसु सत्तसु । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छा मंडले ॥९॥ |मएस बंभगुत्तीसु, भिक्खुधम्ममि दसविहे । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छद मंडले ॥१०॥ उवास
गाणं पडिमासु, भिक्खूणं पडिमासु य । जे भिक्खू जयई निच्चं, से न अच्छद मंडले ॥११॥ किरियामु| neen दाभूयगामेसु, परमाहम्मिएसु य । जे भिक्खु जई निचं. सेन अच्छह मंडले ॥ २२ ॥ गाहासोलसएहि, तहा|
अस्संजमंमि अ । जे भिक्खू जयई निचं, सेन अच्छद मंडले ॥१॥ भमि नायज्झयणेसु, ठाणेसु यसमा-1
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दीप
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4
अनुक्रम [१२२७-१२४५]
*
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
हिए । जे भिक्खू जयई निच,से न अच्छा मंडले ॥१४॥ इकवीसाए सबलेसुं, बावीसाए परीसहे। जे भिक्खू जयई निर्य, से न अच्छद मंडले ॥१५॥ तेवीसईसुयगडे, स्वाहिएसु सुरेसु य ।जे भिखू जयई निचं, से न अच्छह मंडले ॥१६॥ पणवीसा भावणाहिं च, उद्देसेसु दसाइणं । जे भिक्खू जयई निर्थ, से म|| अच्छद मंडले ॥१७॥ अणगारगुणेहिं प्य, पगप्पंमि तहेव य। जे मिक्खू जयई निचं, से म अच्छा मंडले १८| पावसुयपसंगेसु [य], मोहहाणेसु व य । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छह मंडले ॥१९॥ सिद्धाइगुणजोगेसु, तित्तीसासायणासु य । जे भिक्खू जयई निचं, से न अच्छह मंडले ॥ २०॥
तत्र च 'एकतः' एकस्मात् स्थानाद् विरतिं विरमणमुपरममितियावत् 'कुर्यात्' विदध्यात् 'एकतश्च' एकस्मिंश्च, आद्यादित्वात्सप्तम्यन्तात्तसिः, 'चः' समुच्चये भिन्नक्रमः, प्रवर्तनं च कुर्यादिति सम्बन्धः । एतदेव विशेषत आह'असंयमात्' हिंसादिरूपात् पञ्चम्यर्थे सप्तमी 'निवृत्तिं च' परिहाररूपां 'संयमें उक्तरूपे चस्प भिन्नक्रमत्वात्प्रवदानं च कुर्यादित्यनुवर्तते, चशब्दादुभयत्र परस्परापेक्षया समुचये। तथा 'रागद्वेषौ' उक्तरूपी 'चः' पूरणे 'द्वौ' द्विस
जयी, एतदभिधानं च प्राकृते द्वित्वबहुत्वयोः संदिग्धत्वाद् उक्तार्थानामप्यपूपी द्वावानयेत्यादिवल्लोके प्रयोगदर्शनाच, 'पापी' कोपादिपापप्रकृतिरूपत्वात् पापकर्माणि-मिथ्यात्वादीनि प्रवर्तयतो-जनयत इति पापकर्मप्रवर्तको यः 'भिक्षुः तपस्वी 'रुणद्धि' उदयस्य कथञ्चिदुदितयोर्वा प्रसरस्य निराकरणतस्विरस्कुरुते 'नित्य' सदा सः 'नास्ते
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मलं -माया
मूलं [-1 / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति : [५१८...]
बृहद्भुत्तिः
ध्यक
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
उत्तराध्यान तिष्ठति मण्डले, पठन्ति च-से ण गच्छइ मंडले'त्ति 'न' नैव 'गच्छति' याति भ्राम्यतीति योऽर्थः, उभयत्र च चरणवि
मण्डलशब्दस्य वृद्धव्याख्या-मण्डलग्रहणाचतुरन्तः संसारः परिगृह्यते, मुक्तिपदप्राप्तिश्चात्र हेतुः, एवमुत्तरत्र सूत्रे
प्वपि नित्यमित्यादि व्याख्येयम् । दण्ड्यते-चारित्रैश्चर्यापहारतोऽसारीक्रियते एमिरात्मेति दण्डा-दुष्प्रणिहितमा॥१२॥ नसादिरूपा मनोदण्डादयः, उक्तं हि-"जह लोए दंडिज्वइ दवं हीरइ य वज्झए यावि। इस दंडतऽप्पाणं मणमाई|
दुप्पणिहिएहिं ॥१॥" तेषां 'त्रिक' मनोदण्डवाग्दण्डकायदण्डरूपं, तथा गुरु:-लाभाभिमानाध्मातचित्त आत्मैव तद्भावास्तस्य वैतान्यध्यवसानानि गौरवाणि तेषां 'त्रिक' ऋद्धिगौरवरसगौरवसातगौरवात्मकं, तथा शल्यते-अनेकार्थत्वाद्वाध्यते जन्तुरेभिरिति शल्यानि तेषां च 'त्रिक' मायाशल्यनिदानशल्यमिथ्याशल्यात्मकम् , उभयत्र 'चः | समुचये, त्रिकं त्रिकमिति च प्रत्येकं त्रैविध्याभिधानतो व्याख्यातमेव, यो भिक्षुः 'त्यजति' वर्जयति । दिव्यांश्चहास्यप्रद्वेषविमर्शपृथविमात्राभिर्देवविहितान् उप-सामीप्येन सृज्यन्ते-देवादिभिरुत्पाद्यन्त इत्युपसर्गास्तान्, तथा 'तेरिच्छमाणुसे त्ति तिरश्चामेते भयप्रद्वेषाहारहेत्वपत्यलयनसंरक्षणहेतोस्तैः क्रियमाणत्वात्तैरश्वाः तथा मानुषाणामेते
हासप्रद्वेषविमर्शकशीलप्रतिसेवनात्मकनिमित्ततस्तैर्विधीयमानत्वान्मानुषकाश्च तैरश्चमानुषकास्तान् उपलक्षणत्वात्पू-ICInter त्रि चशब्दस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वाद्वाऽऽत्मसंवेदनीयांश्च घट्टनप्रपतनस्तम्भन श्लेषणोद्भवान् यो भिक्षुः ‘सहते'
१ यथा लोके दण्यते द्रव्यं हियते च वध्यते चापि । इति दण्डयन्त्यात्मानं भनआदीनि दुष्प्रयुक्तः ॥१॥
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
दमकक
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
सम्यगध्यास्ते। विरुद्धा विरूपा वा कथा विकथा,सा च स्त्रीभक्तजनपदनृपतिभेदतश्चतुर्धा, कषायाः-क्रोधमानमायालो|भाः सज्ञा-आहारभयमैथुनपरिग्रहाख्याः, एषां कृतद्वन्द्वानां प्रत्येकं चतुष्कमिति शेषः, 'झाणाणं च'त्ति प्राकृतस्वाद ध्यानयोश्च द्विकमारौद्ररूपं तथा यो भिक्षुः 'वर्जयति' परिहरति, चतुर्विधत्वाच ध्यानस्यात्र प्रस्तावेऽभिधानम् । 'व्रतेषु' हिंसाऽनृतस्तेयात्रमपरिग्रहविरतिलक्षणेषु 'इन्द्रियार्थेषु' शब्दरूपरसगन्धस्पर्शेषु 'समिति समित्यध्ययना|भिहितासु च क्रियासु-कायिक्याधिकरणिकीप्राद्वेषिकीपारितापनिकीप्राणातिपातरूपासु, पठन्ति च 'समीतीसु य तहेव यत्ति, अत्र च चशब्दाक्रियासु चेति यो भिक्षुः 'यतते' यत्नं कुरुते यथावत्परिपालनातो व्रतसमितिले माध्यस्थ्यविधानतश्चेन्द्रियार्थेषु परिहारतश्च क्रियासु । 'लेश्यासु' वक्ष्यमाणरूपासु 'पट्सु कायेषु' पृथिव्यादिषु वक्ष्यमाणेष्वेव षङ्के पट्रपरिमाणे 'आहारकारणे वेदनादायुक्तरूपे यो भिक्षुः 'यतते' यथायोग निरोधोत्पादनरक्षानुरोधविधानेन यलं कुरुते । 'पिण्डावग्रहप्रतिमासु' आहारग्रहणविषयाभिग्रहरूपासु संसृष्टादिष्वनन्तरा|ध्ययनोक्तासु सप्तखिति संवध्यते, तथा 'भयस्थानेषु' भयस्य-भवमोहनीयसमुत्थात्मपरिणामस्योत्पत्तिनिमित्ततयाऽऽश्रयेषु इहलोकादिषु प्रागुक्तरूपेषु 'सप्तसु' सप्तसङ्खयेषु यो भिक्षुः 'यतते' एकत्र तु पालनातोऽन्यत्र तदशेन भयाकरणतः । मदा-जातिमदादयः प्रागभिहिता अष्टौ तेषु, प्रतीतत्वाचेहान्यत्र च सूत्रे सङ्ख्यानभिधानं, ब्रह्म-वनचर्यं तस्य गोपनं गुप्तिर्यकाभिस्ता ब्रह्मगुप्तयो गमकत्वादहुव्रीहिस्तासु वसत्यादिषु नवसु, उक्तं च
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
JABERatinintamational
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
चरणवि
बृहद्वृत्तिः
ध्य०
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
उत्तराध्य- |"वसंहिकहणिसिर्जिदिय कुड़ितरपुवकीलियपणीए । अतिमायाहारविभूसणा य णव बंभगुत्तीओ ॥१॥"
मिक्षुधर्मे 'दशविधे' क्षान्त्यादिभेदतो दशप्रकारे प्रागुक्त एव यो भिक्षुर्यतते यथावत्परिहारासेवनपरिपालनादिभिः। उपासते-सेवन्ते यतीनित्युपासकाः-श्रावकास्तेषां 'प्रतिमासु' अभिग्रहविशेषरूपाखेकादशसु दर्शनादिपु, उक्तं हि'दसैणवयसामाइय पोसहपडिमाअभसचित्ते। आरंभपेसउद्दिवजए समणभूए य ११॥१॥" 'भिक्षूणां' वतीनां 'प्रतिमासु च' मासिक्यादिषु द्वादशसु, यत आगमः-"मासाई सर्तता पढमावितिततिय सत्तराइदिणा ।। अहराइएगराई भिक्खुपडिमाण वारसगं ॥१॥" यो भिक्षुर्यतते यथावत्परिज्ञानोपदेशपालनादिभिः। क्रियन्ते मिथ्यावादिकोडीकृतैर्जन्तुभिरिति क्रियाः-कर्मवन्धनिबन्धनभूताश्चेष्टास्ताखानर्थादिभेदतस्त्रयोदशसु, तथा चागमः"अट्ठाणहाहिंसाऽकम्हा दिछी य मोसऽदिण्णे य । अज्झत्थमाणमेचे मायालोमेरियावहिया ॥१॥" अभूवन् भवन्ति भविष्यन्ति चेति भूतानि-प्राणिनस्तेषां ग्रामाः-सङ्घाता भूतग्रामास्तेष्वेकेन्द्रियसूक्ष्मेतरादिभेदतश्चतुर्दशसु, उक्कं हि
१ वसतिः कथानिषद्येन्द्रियाणि कुड्यान्तरं पूर्वक्रीडितं प्रणीतम् । अतिमात्राहारो विभूषणा च नव ब्रह्मगुप्तयः ॥ १॥ २ दर्शनं व्रतापनि सामायिक पोषधं प्रतिमा अब्रह्मचर्य सचित्तम् । आरम्भः प्रेष्य उद्दिष्टवर्जकः श्रमणभूतश्च ॥२॥ ३ मासादयः सप्तान्ताः प्रथमा द्विती-
या तृतीया सप्तरात्रिदिनाः । अहोरात्रिकी एकरात्रिकी भिक्षुप्रतिमानां द्वादशकम् ॥ ३ ॥ ४ अर्थानर्थहिंसे अकस्मादृष्टिश्च भूषाऽदतं च ।। अध्यात्म मानो मैत्री माया लोभ ईयोपथिकी ॥५॥
दीप
4645
अनुक्रम [१२२७-१२४५]
६१३॥
JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
"एगिदिय सहमियरा सनियरा पणिदिया सबितिचउ । पजत्तापजत्तगभेएणं चोहसग्गामा ॥१॥" धर्मेण । सचरन्ति धार्मिका येन तथा तेऽधार्मिकाः परमाश्च ते सकलाधार्मिकप्रधानतयाऽधार्मिकाच परमाधार्मिका:-18
अत्यन्तसंक्लिष्टचेतसोऽम्बादयस्तेषु, ते च पञ्चदश, यत उक्तम्-"अंबे १ अंबरिसी २ चेव, सामे ३ सबलेत्ति ४ आ-1 दावरे । रुद्दो ५ बरुद६ काले य ७, महाकालेत्ति आवरे ८॥१॥ असिपत्ते ९ घण १० तमे ११. चालू १२ वेय-15
रणी इय १३।खरस्सरे १४ महाघोसे १५, एए पण्णरसाहिया ॥२॥" तेषु यो भिक्षुर्यतते यथाक्रमं परिहाररक्षापरिज्ञानादिभिः। गीयते-शव्यते खपरसमयखरूपमस्यामिति गाथा-सूत्रकृताङ्गस्य पोडशमध्ययनम्, उक्तं हि-"गाहासोलसमं होइ अज्झयणं" ततश्च गायाध्ययनं पोडशं येषु तानि गाथाषोडशकानि शेषाद्विभाषेति (पा.५-४-१५४) कप,सुव्यत्ययात्तेषु समयादिषु सूत्रकृताध्ययनेषु, उक्तश्च-"समओ १ वेलालीयं २ उबसम्गपरिण ३ थीपरिषणा य ।।
। णिरयविभत्ती ५ वीरत्थओ य ६ कुसीलाण परिभासा ७॥१॥ वीरिय ८ धम्म ९ समाही १० मग्ग ११ समो-| सरण १२ अहतह १३ गंथो १४ । यमदीयं १५ तह गाहा १६ सोलसमं होइ अज्झयणं ॥२॥” तथा संयमनं सं
१ एकेन्द्रियाः सूक्ष्मा इतरे च संज्ञिन इतरे पञ्चेन्द्रियाः सद्वित्रिचतुरिन्द्रियाः । पर्याप्तापर्याप्तकभेदेन चतुर्दश प्रामाः ॥ १॥ २ अ|म्बोऽम्बर्षिश्चैव श्यामः शबल इत्यपरः। रुद्र उपरुद्रः कालच महाकाल इति चापरः ॥ २॥ असिपत्रो धनुः कुम्भः वालुक: वैतरणिरिति । खरखरो महाघोषः एते पञ्चदशाख्याताः ॥ ३ ॥
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
~261
Page #262
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
उत्तराध्ययमोन संयमोऽसंयमः स च सप्तदशभेदः पृथिव्यादिविषयः, तथात्वं चास तत्प्रतिपक्षस्य संयमख सप्तदशभेद- चरणवि
त्वात्, यदुक्तम्-"पुढविदगअगणिमारुयवणप्फतीबितिचऊपणिदिअजीवे । पेहोपेहपमजणपरिहवणमणोवई-INI बृहद्वृत्तिः
काए ॥१॥” तसिंच यो भिक्षुर्यतते एकत्र तदुक्तानुष्ठानतोऽन्यत्र तु परिहारतः । 'ब्रह्मणि' ब्रह्मचर्येऽष्टादशमे-10 ॥१४॥ | दभिन्ने, उक्तं हि-"ओरालियं च दिवं मणवयकाएण करणजोएणं । अणुमोयणकारावणकरणाणटारसावभं ॥२॥"|8|
ज्ञातानि-उदाहरणानि तत्प्रतिपादकान्यध्ययनानि ज्ञाताध्ययनानि तानि चोक्षिप्तज्ञातादीन्येकानविंशतिस्तेषु, यदु-1 क्तम्-“उक्खित्तणाए १ संघाडे २, अंडे ३ कुम्मे य ४ सेलए ५। तुंचे य ६ रोहिणी मल्ली८, मायंदी९ चंदिमा इय (१०॥१॥ दावदए ११ उदगणाए ११, मंडुको १३ तेयली इय १४॥णंदीफले १५ अबरकंका १६, आइण्णे १७ सुंस १८ पुंडरिए १९ ॥१॥" 'स्थानेषु' आश्रयेषु कारणेष्वितियावत् कस्येत्याह-समाधिः-समाधानं ज्ञानादिषु चित्री-|| कायं न समाधिरसमाधिस्तस्य, तानि च द्रुतं द्रुतं गमनादीनि विंशतिः, तथा च समवायानम्-"वीसं असमाहिट्ठाणा पण्णत्ता, तंजहा-दवदवचारी यावि भवति १ अपमजचारी आवि भवति २ दुप्पमज्जियचारि यावि भवति ३| ॥६१४ा
१ औदारिकं च दिव्यं मनोवचःकायेन करणयोगेन । अनुमोदनकारणकरणान्यष्टादशधाऽब्रह्म ॥१॥२ विंशतिरसमाधिस्थानानि | प्राप्तानि, तपधा-हुर्त दुतं चारी चापि भवति १ अप्रमृज्यचारी चापि भवति २ दुष्प्रमृज्यचारी चापि भवति ३
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
अतिरित्तसेजासणिए ४ रायणियपरिभासी ५ थेरोवघातिए ६ भूतोवघातिए ७ संजलणे ८ कोहणे ९ पिटिमंसिए १० अभिक्खणं ओहारइत्ता भवति ११ णवाणं अहिगरणाणं अणुप्पन्नाणं उप्पाएत्ता भवति १२ पोराणाणं
अहिगरणाणं खामियविओसबियाणं पुणोदीरिता भवति १३ ससरक्खपाणिपाए १४ अकालसज्झायकारए दियापि भवति १५ सहकरे १६ कलहकरे १७ झंझकरे १८ सूरप्पमाणभोई १९ एसणाअसमिई यापि भवति २०॥"
यो भिक्षुर्यतते रक्षापरिज्ञानपरिहारादिभिः । एकविंशतो शबलयन्ति-कर्बुरीकुर्वन्त्यतीचारकलुषीकरणतश्चारित्रमिति शवला:-क्रियाविशेषास्तेषु, तथा चाह-"अवराहमि पयणुगे जेण य मूलं ण वच्चए साहू । सबलेंति तं चरित्तं तम्हा सबलत्ति णं भणियं ॥१॥" तानि च हस्तकर्मादीन्येकविंशतिः, तथा चागमः-"तं जह उ हत्थकम्मं कुर्वते १ मेहुणं च सेवंते २ । राई च भुंजमाणे ३ आहाकम्मं च भुंजए ४ ॥१॥ तत्तो य रायपिंडं ५ कीयं ६ पामिच ७
१ अतिरित्तशय्यासनिकः राजिकपरिभाषी स्थविरोपघाती भूतोपघाती संज्वलनः क्रोधनः पृष्ठमासिकः अभीक्षणमवधारयिता भवति नवानामधिकरणानामनुत्पन्नानामुत्पादयिता भवति पुराणानामधिकरणानां क्षामितव्युत्सृष्टानां पुनरुदीरविता भवति सरजस्कपाणिपादः | अकालस्वाध्यायकारकचापि भवति शब्दकरः कलहकरः झन्झाकरः सूर्यप्रमाणभोजी एषणायामसमितश्चापि भवति । २ अपराधे प्रतनुके थेन च मूलं न प्राप्नोति साधुः । शबलयन्ति तचारित्रं तस्मात् शबला इति भणिताः॥१॥ ३ तद्यथा हस्तकर्म कुर्वन् मैथुनं च सेवमानः । रात्री भुजान आधाकर्म भुजानः ॥ १॥ ४ ततश्च राजपिण्ड कीतं प्रामित्यं
दीप
अनुक्रम [१२२७-१२४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
पत्तराध्य. अभिहई ८च्छेज ९ । मुंजते सबले ऊ९ पञ्चक्खियऽभिक्टभुजते १०॥२॥छम्मासऽभतरो गणा गणं सचरणविवृहद्वृत्तिः संकमं करेंते य ११ । मासम्भंतर तिन्नि य दगलेवा ऊ करेमाणे ॥३॥ मासमंतरओ या माइट्ठाणाई तिण्णि||
ध्य०३१ | कुणमाणे १२ । पाणातिवायआउटिं कुच्चन्त १३ मुसं वयंते य १४ ॥४॥ गिण्हते य अदिन्नं १५ आउट्टियंस ॥१५॥1 तह अणंतरहियाए । पुढपीए ठाणसेजाणिसीहियं वावि चेएति १६ ॥५॥ एवं ससिणद्धाए ससरक्खाए चित्त
है मन्तसिललेलू । कोलापासपइट्ठा कोल घुणा तेसि आवासे १७॥६॥ संडसपाणसवीए जाय उ सन्ताणए भवे
तहियं । ठाणादिचेयमाणे सबले आउट्टियाए उ १८॥७॥ आउहिमूलकन्दे पुप्फे य फले य बीय हरिए य ।
भुंजते सबले ऊ १९ तहेव संवच्छरस्संतो॥८॥दस दगलेवे कुवंत माइट्ठाणा दस य परिसंतो २० आउट्टियसीओ-12 * अभ्याहृतं आच्छेयम् । भुजानः शबल एव प्रत्याख्यायाभीक्ष्णं भुखानः ।। २।। षण्मास्यभ्यन्तरे गणा गणं संक्रम कुर्वश्च । मासाभ्यन्तरे तात्रीच दकलेपान कुर्षस्तु ॥३॥ मासाभ्यन्तरतश्च मातृस्थानानि त्रीणि कुर्वन् । पाणातिपातमाकुट्टपा कुर्वन भूषा पदंश्च ।। ४ ।। गृहत्यदत्ते || चाकुट्टया तथाऽनन्तरायां पृथिव्यां स्थानशय्यानैपेधिकीर्वापि चेतयति ॥५॥ एवं सस्निग्धायां सरजस्कायां चित्तवच्छिलालेलुमत्यां ।।
॥६१५॥ ४ कोलावासप्रतिष्ठायां कोला घुणास्तेषामावासे ॥६॥ साण्डसप्राणसबीजं यावत् ससंतानकं भवेत् तत्र । स्थानादि कुर्वन् शबल आकुट्टथैव |
॥ ७॥ आकुट्टया मूलानि कन्दान पुष्पाणि फलानि च बीजानि हरितानि च । भुजानः शबलस्तु तथैव संवत्सरस्यान्तः ।। ८॥ दश उदकलेपान् कुर्वन् मातृस्थानानि दश च वर्षस्यान्तः आकुट्टया
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
Sinmlainginrayom
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः)
अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
देगवग्धारियहत्थमत्ते य ॥९॥दवीए भायणेण य दिजन्तं भत्तपाण घेत्तूणं । भुंजइ सबलो एसो, इगविसो होइणाययो। C॥१०॥'बावीसपरीसहति द्वाविंशती 'परीषहेपु' परीपहाध्ययनेनाभिहितस्वरूपेषु यो भिक्षुर्यतते परिहारादि(धि)
सहनादिभिः । त्रिभिरधिका विंशतिस्त्रयोविंशतिः, 'त्रयस्खयश्चेति (पा०६-३-४८ खयः) त्रयसादेशः, तत्सङ्ख्याध्ययनयोगात्रयोविंशतिसूत्रकृतं तस्मिन् , त्रयोविंशतिसूत्रकृताध्ययनानि च पुण्डरीकादीनि सप्त पोडश च समयादीनि, तथा चाह-"पुंडरीय १ किरियठाणं २ आहारपरिण ३ पञ्चखाणं ४ च । अणगार ५ अद्द ६ णालंद ७ सोलसाइंच तेवीसं ८॥" तथा रूपम्-एकस्तेनाधिकाः प्रक्रमात्सूत्रकृताध्ययनेभ्यो रूपाधिकाश्चतुर्विंशतिरित्यर्थ-15 तेषु, केषु ? इत्याह-सुरेषु, पठन्ति च-देवेषु, तत्रच दीव्यन्ति-क्रीडन्तीति देवा-भवनपत्यादयस्तेषु, यदिवां दीन्यन्ते|स्तूयन्ते जगत्रयेणापीति देवाः-अर्हन्तस्तेषु ऋषभादितीर्थकरेषु, उक्तं च-"भवणवणजोइवेमाणिया य दस अट्ठ पंच एगविहा । इति चउवीसं देवा केई पुण बेंति अरहंता ॥१॥" यो भिक्षुर्यतते यथावत्प्ररूपणादिना । 'पणवीसत्ति 'पञ्चविंशतो' पञ्चविंशतिसङ्खचासु 'भावणाहिँति भाव्यन्त इति भावनाः, ताश्चेह महाव्रतविषया ईर्यासमितियत्नादयः परिगृह्यन्ते, सुव्यत्ययात्तासु, उक्तं हि-"पणवीसं भावणाओ पण्णत्ताओ, तं०-इरियासमिति १ मण
१ शीतोदकछिन्ने हस्ते मात्रे च ।। ९॥ दा भाजनेन च दीयमानं भक्तपाने गृहीत्वा । भुनक्ति शवल एष एकविंशतितमो भवति ज्ञातव्यः ॥१०॥
दीप
अनुक्रम [१२२७-१२४५]
wwwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
प्रत
सूत्रांक
॥१६॥
[२-२०]
गुत्ती २ वयगुत्ती ३ आलोइऊण पाणभोयण ४ आयाणभंडणिक्खेवणासमिई ५, अणुवीइभासणया १ कोहविवेगे चरणवि२ लोहविवेगे ३ भयविवेगे ४ हासविवेगे ५, उग्गहमणुण्णवणया १ उग्गहसीम जाणणया २ सयमेव उग्गह है अणुण्णविय परिभुजणया ४ साहारणभत्तपाणं अणुण्णविय परिभुंजणया ५, इत्थिपसुपंडयसंसत्तसयणासणवजणया,
ध्य०३१ १ इत्थिकहविवजणया २ इत्थीण इंदियाणि आलोयणवजणया ३ पुधरयपुरकीलियाणं विसयाणं असरणया
४ पणीयाहारविवजणया ५, सोइंदियरागोवरई, एवं पंचषि इंदिया ॥" 'उद्देशेष्वि'त्युपलक्षणत्वादुद्देशनकालेषु । ४ दशादीना-दशाश्रुतस्कन्धकल्पव्यवहाराणां पड़िशतिसङ्खयेष्विति शेषः, उक्तं हि-"दस उद्देसणकाला दसाण कप्पस्स है होति छच्चेच । दस चेव य ववहारस्स हुंति सत्वेऽवि छबीसं ॥१॥" यो भिक्षुर्यतते सर्वदा परिभावना
प्ररूपणाकालग्रहणादिभिः । अनगारः प्राग्वत्तस्य गुणा:-प्रतषदेन्द्रियनिग्रहादयः सप्तविंशतिः सुब्व्यत्ययात्रेषु च, उक्त |हि-"वयछक्क ६ मिदियाणं च निग्गहो ११ भाव १२ करणसचं च १३ । खमया १४ विरागयाविय १५ मणमाईर्ण [णिरोहो य १८ ॥१॥ कायाण छक २४ जोगम्मि जुत्तया २५ बेयणाहियासणया २६ । तह मारणतियहियासणया २७ एएऽणगारगुणा ॥२॥" प्रकृष्टः कल्पो-यतिव्यवहारो यस्मिन्नसी प्रकल्पः स चेहाचारानमेव शस्त्रपरि- ॥६१६॥ ज्ञाद्यष्टाविंशत्यध्ययनात्मकं तस्मिन् , उक्तं च-"सत्यपरिण्णा १ लोगविजओ २ सीओसणिज ३ सम्मत्तं ४ । आवंति || ५ धुव ६ विमोहा ७ उवहाणसुयं ८ महपरिषणा ९ ॥१॥ पिंडेसण १० सेजि ११ रिय १२ । भासा १३ वत्थे
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
CENSESSAGACASSES
सणाय १४ पाएसा १५। उग्गहपडिमा १६ सत्तिकसत्तया १७ भावण २४ विमुची २५॥१॥" "उग्घाय २६ मणुग्घायं २७ आरोवण २८ तिविहमो निसीहं तु । इह अट्ठावीसविहो आयारपकप्पनामो उ ॥१॥" मासिक्याचारोपणात्मके
वा समवायाजाभिहितेऽष्टाविंशतिविधे प्रकल्पे 'तथैव' तेनैव यथावदासेवनाप्ररूपणादिना प्रकारेण 'तुः समुचये भिक्षुकार्यतते॥पापोपादानानि श्रुतानि पापश्रुतानि तेषु प्रसअनानि प्रसङ्गाः-तथाविधासक्तिरूपाः पापश्रुतप्रसाः, ते चाष्टा
निमित्तसूत्रादिविषयभेदादेकोनत्रिंशत्तेषु, उक्तं हि-"अट्ठनिमित्तंगाई दिचुप्पायंतलिक्ख भोमंचा अंगं सरलक्षण - जणं च तिविहं पुणोकेक॥१॥सुत्तं वित्ती तह वित्तियं च पावसुय अउणतीसविह। गंधवनवत्थु आउंधणुवेयसंजुत्त॥२॥" मोहो-मोहनीयं तिष्ठति-कोऽर्थः ?-निमित्ततया वर्चते एतेष्विति मोहस्थानानि-वारिमध्यावममत्रसप्राणमारणादीनि त्रिंशत्तेषु, उक्तं हि-"वोरिमझेऽवगाहित्ता, तसे पाणेय हिंसति शछाएउ मुहं हत्थेणं, अंतोणाई गलेरयं २॥१॥ सीसा-11 येढेण वेद्वित्ता, संकिलेसेण मारए। सीसम्मि जे य आहेत. दुहमारेण हिंसए ४ ॥२॥ बहुजणस्स णेयारं, दीपं ताणं चला
१ अष्टौ निमिताङ्गानि दिव्यमौत्पातं आन्तरिक्षं भौमं च । आङ्गं स्वरलक्षणे व्यजनं च त्रिविधं पुनरेकैकम् ॥ १॥ सूत्रं वृत्तिस्तथा वार्तिकं च पापश्रुतमेकोनविंशविधं । गान्धर्वनाट्यवास्त्वायुधनुर्वेदसंयुक्तम् ॥२॥२ वारिमध्येऽवगाह प्रसान् प्राणान् विहिंसति छादयित्वा मुखं हसेनान्तर्नादं पीवारवं (गलेरख) ॥शा शीर्षांवेष्टेन वेष्टयित्वा संक्शेन मारयेत् । शीर्षे आइत्य पदुःखमारेण हिनस्ति ॥२॥ बहुजनस्य नेतारं द्वीपं त्राणं च
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
awarjandiarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३१], मूलं [-1 / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति : [५१८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२०]
उत्तराध्य. पाणिणं ५ । साहारणे गिलाणमि पहूकिचं ण कुवति ६ ॥३॥ साई अकम्मधम्मो उ, जो भंसेज उवट्टियं ७ चरणविबृहद्वृत्तिः
दाणेयाउयस्स मग्गस्स, अवगारंमि बद्दति ॥४॥ जिणाणणंतनाणीणं, अवण्णं जो पभासए । आयरियउवज्झाए,
खिसए मंदबुद्धिए ९॥५॥तेसिमेव य गाणीणं, सम्म णो परितप्पई १० । पुणो पुणो अहिगरणं, उप्पाए ॥६१७॥
११ वित्थभेयए १२॥६॥ जाणं आहम्मिए जोए, पउंजति पुणो पुणो १३ । कामे पमित्ता पत्धेइ, इहऽण्ण-1 भविए इ वा १४ ॥७॥ अभिक्खं बहुस्सुएऽहंति, जे भासंतऽबहुस्सुए १५ । तहा य अतवस्सीवि, जे तवस्सित्तिहं वए १६ ॥ ८॥ जायतेएण बहुजणं, अन्तोधूमेण हिंसए १७ । अकिचमप्पणा काउं, कयमेएण भासते १८ ॥९॥ |णियडुवहिपणिहीए पलियंचे सायजोगजुत्ते य १९ । बेह सर्व मुसं वयसि २०, अज्झीणं झंझए सया २१ । ॥१०॥ । १ प्राणिनाम् । साधारणे ग्लाने प्रभुकार्य न करोति॥३॥साधुमधर्मकर्मा तु यो भ्रंशयति उपस्थितं । नैयायिकस्य मार्गस्यापकारे वर्तते ॥४॥ जिनानामनन्तज्ञानिनामवज्ञा यस्तु प्रभाषते । आचार्योपाध्यायान खिसति मन्दबुद्धिकः ॥ ५॥ तेषामेव च ज्ञानिनां सम्यक् नो प्रतिचारं | करोति । पुन: पुनरधिकरणमुत्पादयति तीर्थभेदकश्च ॥ ६ ॥ जानन् आधर्मिकान् योगान् प्रयुणक्ति पुनः पुनः। कामान् वान्त्वा प्रार्थयते । इहान्यभविकान् वा ॥ ७॥ अभीक्ष्णं बहुक्षुतोऽहमिति यो भाषतेऽबहुश्रुतः । तथा चातपखीति यस्तपस्यहमिति वदति ॥ ८॥ जाततेज-3॥१७॥ सा बहुजनमन्तधूमेन हिनस्ति । अकृत्यमात्मना कृत्वा कृतमेतेनेति भाषते ॥ ९ ॥ निकृत्युपधिप्रणिधिकः परिकुथकः सातियोगयुक्तश्च । जूते सर्व मृषा वदसि अङ्केशं छेशयति सदा ॥१०॥
G
दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
inatandinrary om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२-२०|| नियुक्ति: [५१८...]
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प्रत
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सूत्रांक
[२-२०]
Hद्धाणमि पवेसित्ता, जो धणं हरइ पाणिणं २२ । वीसंभेत्ता उवाएणं, दारे तस्सेव लुब्भति २३ ॥११॥ अभिक्खमकु-4
मारे उ, कुमारेऽहन्ति भासए २४ । एवमबंभयारिं बंभयारित्ति भासए २५॥ १२॥ जेणेयेसरीयं णीए, वित्ते तस्सेव |लुभए २६ । तप्पहाबुढ़िए वावि, अन्तरायं करेति से २७। ॥ १३ ॥ सेणावतिं पसत्यारं, भत्तारं वावि हिंसए। रहस्स वावि णिगमस्स, णायगं सेडिमेव वा २८ । ॥१४॥ अपस्समाणो पस्सामि, अहं देवत्ति वा वए २९ । अवण्णेणं है |च देवाण, महामोहं पकवति ३० । ॥१५॥" यो भिक्षुर्यतते तत्परिहारद्वारतः । सिद्धाः-सिद्धिपदप्रासास्तेपामादी-1 प्रथमकाल एवातिशायिनो वा गुणाः सिद्धादिगुणाः सिद्धातिगुणा वा-संस्थानादिनिषेधरूपा एकत्रिंशत्, उक्तं हि-14
"पडिसेहणसंठाणे वण्ण गंधरसफासवेए य । पणपणदुपणट्ठतिहा इगतीसमकायऽसंगऽरुहा ॥१॥ अहवा कम्मेप्रणव दुरिसणंमि चत्तारि आउए पंच आइमे अंते । सेसे दो दो भेया खीणभिलावेण इगतीसं ॥२॥" तथा 'जोग'-6, |ति पदेकदेशेऽपि पदप्रयोगदर्शनाद् योगसङ्कहा योगाः-शुभमनोवाकायन्यापाराः सम्यग् गृबन्ते-खीक्रियन्ते ते आलोचनानिरपलापादयो द्वात्रिंशत् , उक्तं हि-"आलोयणा १ निरवलावे २, आवईसु दढधम्मया ३ । अणस्सिओ
१ अध्वनि प्रवेश्य यो धनं हरति प्राणिनाम् । विशम्भ्योपायेन दारेषु वस्य लुभ्यति ॥१शा अभीक्ष्णमकुमारोऽपि कुमारोऽहमिति भाषते । एवमनवाचार्यपि मह्मचारीवि भाषते २५ ॥१२॥ येनैवैश्वर्य प्रापितो विते तस्यैव लुभ्यति । सत्प्रभावोत्थितश्चापि अन्तरायं करोति तस्य ।।१३॥
सेनापति प्रशास्तार भरि वा विहिनस्ति । राष्ट्रस्य वापि निगमस्य, नायकं श्रेष्ठिनमेव वा ॥ १४ ॥ अपश्यन् पश्याम्यहं देवानिति वा वदेत् ।। ६ अवर्णेन च देवानां महामोइं प्रकरोति ॥ १५ ॥
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दीप अनुक्रम [१२२७-१२४५]
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JABERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३१], मूलं [-] / गाथा ||२१|| नियुक्ति: [५१८...]
चरणवि
प्रत
सत्राक
[२१]
उत्तराध्य.
वहाणे य ४, सिक्खा ५णिप्पडिकम्मया ६ ॥१॥ अण्णाणया ७ अलोमे य८, तितिक्षा ९ अज्जवे १० सुई।
११ । सम्मदिट्ठी १२ समाही य १३, आयारे १४ विणओवए १५॥२॥ धिईमई य १६ संवेगो १७, पणिही बृहद्वृत्तिः
|१८ सुविही १९ संवरे २० । अत्तदोसोवसंहारे २१, सबकामविरत्तया २२ ॥३॥ पचक्खाणे २३ विउस्सग्गे २४. य०३१ ॥६१८॥ 18 अप्पमाए २५ लवालवे २६ । झाणं २७ संवरजोगे २८ य, उदए मारणंतिए २९ ॥ ४॥ संगाणं च परिण्णाया ३०,151 दिपायच्छित्तकरणे इय ३१ । आराहणा य मरणते ३२, बत्तीसं जोगसंगहा ॥५॥" ततो इन्हे सिद्धादिगुणयोगाः आसिद्धातिगुणयोगा वा तेषु, 'तिचीसासायणासु यति त्रयस्त्रिंशत्सझ्याखाशातनास चोक्तशब्दार्थाखर्हदादिविषयासु प्रतिक्रमणसूत्रप्रतीतासु रत्नाधिकस्य पुरतः शिक्षकगमनादिकासु वा समवायाङ्गाभिहितासु यो भिक्षुर्यतते यथायोग
सम्यश्रद्धानासेवनावर्जनादिनेत्येकोनविंशतिसूत्रार्थः ॥ अध्ययनार्थ निगमयितुमाहहै। इइ एएसु जे भिक्खू, ठाणेसु जयई सया । खिप्पं से सब्वसंसारा, विष्पमुच्चइ पंडिए ॥ २१॥ तिमि ॥
॥चरणविहिज्वं ।। ३१ ॥ 'इती' सनेन प्रकारेण 'एतेषु' अनन्तरोक्तरूपेषु 'स्थानेषु' असंयमादिषु यो भिक्षुः 'यतते' उक्तन्यायेन यत्नवान् ।
IP॥१॥ भवति सदा क्षिप्रं स सर्वसंसाराद्विप्रमुच्यते पण्डित इति सूत्रार्थः । इति' परिसमाप्ती, ब्रवीमीति पूर्ववत् । अवसितपश्चानुयोगो,नयाश्च प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां शिष्यहितायामेकत्रिंशं चरणविध्यध्ययनं समासमिति ॥
दीप अनुक्रम [१२४६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- ३१ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२१...|| नियुक्ति : [५१९-५२१]
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॥अथ प्रमादस्थानाख्यं द्वात्रिंशमध्ययनम् ॥
प्रत
सत्राक
[२१]
व्याख्यातं चरणविधिनामकमेकत्रिंशमध्ययनम् ,इदानी द्वात्रिंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने नेकधा चरणमभिहितं, तञ्च प्रमादस्थानपरिहारत एवासेवितुं शक्यं, तत्परिहारश्च तत्परिज्ञानपूर्वक इति तदर्थमिदमारभ्यते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनम् , अस्य चत्वार्यनुयोगद्वाराणि यावन्नामनिष्पन्न निक्षेपस्तावत्पूर्ववदेवेति मनसाधाय नामनिष्पन्ननिक्षेपाभिधानायाह नियुक्तिकृत्|निक्खेवो अपमाए चउबि०
॥५१९ ॥ जाणग० तवइरिते अ मजमाईसु । निदाविकहकसाया विसएसु भावओ पमाओ ॥ ५२० ॥ नामं ठवणादविए खित्तद्धा उड्ड उवरई वसही। संजमपग्गहजोहे अयलगणणसंधणा भावे ॥५२९॥
णिक्खेवेत्यादिगाथास्तिस्रः सुगमा एव, नवरं 'मजमाईसु'त्ति मकारोऽलाक्षणिको मदयतीति मद्य-काष्ठपिष्टनिष्पन्नमादिशब्दादासवादिपरिग्रहः एतानि, सुब्ब्यत्ययाच प्रथमार्थे सप्तमी, भावप्रमादहेतुत्वाव्यप्रमादः, 'निद्रा
दीप अनुक्रम [१२४६]
४
JABERatinintamational
tandinary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं - ३२ "प्रमादस्थानं" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"-मलस अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२१...||
नियुक्ति: [५१९-५२१]
बृहदृत्तिः
प्रत
सत्राक
[२१]
उत्तराध्य. विकथाकषायाः उक्तरूपाः 'विसए'त्ति प्राग्वद्विषयाश्च 'भावतः' भावमाश्रित्य प्रमादः । तथा स्थाननिक्षेपे प्रस्ता-प्रमादस्थावात्स्थानशब्दो नामादिभिः प्रत्येकं योज्यते, तत्र च द्रव्यस्थान-नोआगमतो ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तं यत्सचित्ता
ना०३२ दिद्रव्याणामाश्रयः, क्षेत्रस्थान-भरतादिक्षेत्रमूर्ध्वलोकादि वा यत्र वा क्षेत्रे स्थानं विचार्यते, अद्धा-कालः सैव तिष्ठत्स-11 ॥१९॥ स्मिन्निति स्थानमद्धास्थानं तच पृथिव्यादीनां भवस्थित्यादि समयावलिकादि वा, ऊर्द्धस्थानं-कायोत्सर्गादि उप
रतिः-विरतिस्तत्स्थानं यत्रासौ गृह्यते, वसतिः-उपाश्रयस्तत्स्थानं ग्रामारामादि संयमः-सामायिकादिस्तस्य स्थानं-12 प्रकर्षापकर्षवदध्यवसायरूपं, यत्र संयमस्यावस्थानं, तचासङ्खयेयभेदभिन्नं, तथाहि-सामायिकच्छेदोपस्थापनीयपरि-II हारविशुद्धिकानां प्रत्येकमसङ्खयेयलोकाकाशप्रदेशपरिमाणानि संयमस्थानानि, सूक्ष्मसम्परायसंयमस्त्वान्तमौकर्तिक । इत्यन्तर्मुहूर्त्तसमवपरिमाणानि तत्स्थानानि, यथाख्यातसंयमस्तु प्रकर्षापकर्षरहित एकरूप एवेत्येकमेव तत्स्थानम्, |एवं च सामायिकादीनामसङ्खयेयभेदत्वात्समुदायात्मकस्य संयमस्थानस्याप्यसञ्जयेयभेदता, केवलमिह बृहत्तरमस
येयं गृह्यते, असङ्ख्यातानामसङ्ख्यातभेदत्वात् , 'प्रग्रहस्थान' तु प्रकर्षण गृह्यतेऽस्य वचनमिति प्रग्रहः-उपादेयवा
क्योऽधिपतित्वेन स्थापितः, स च लौकिको लोकोत्तरतश्च तस्य स्थानं, तच लौकिकं पञ्चधा-राजयुवराजमहत्तरामा- ॥१९॥ जयकुमारभेदात् , लोकोत्तरमपि पञ्चधैव-आचार्योपाध्यायप्रवृत्तिस्थविरगणावच्छेदकभेदात् , 'योधस्थानम्' आलीढादि ।
'अचलस्थानं' निश्चलस्थितिरूपं, तत्र सादिसपर्यवसितादि परमाण्यादीनां, गणनास्थानम्-एककादि सन्धानस्थानं
दीप
अनुक्रम [१२४६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२१...|| नियुक्ति : [५१९-५२१]
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प्रत
सत्राक
[२१]
द्रव्यतः कशुकादिगतं भावस्थानम्-औदयिकादिको भावस्तिष्ठन्यत्र जन्तय इतिकृत्वेति गाथात्रयार्थः ॥ सम्प्रति येनात्र प्रकृतं तदुपदर्शयन्नुपदेशसर्वस्खमाहभावप्पमाय पगयं संखाजुत्ते अभावठाणंमि । चइऊणं च (ण इइ)पमायं जइयत्वं अप्पमायंमि ॥५२२॥
भावप्रमादेन उक्तरूपेण प्रकृतम्-अधिकारः, तथा 'संख'त्ति सङ्ख्यास्थानं तद्युक्तेन, चख भिन्नक्रमत्वाद्भावस्थानेन । च, कोऽर्थः -सङ्खथास्थानेन च, सर्वत्र सुव्यत्ययेन सप्तमी, अत्र हि गुरुवृद्धसेवाद्यभिधानतः प्रकामभोजनादिनिषेधततश्च भावप्रमादा निद्रादयोऽर्थात्परिहत्तव्यत्वेनोच्यन्ते, ते चैकादिसडबायोगिन औदयिकमावखरूपाश्चेति भावः,
'त्यक्त्वा' विहाय 'इती'त्येवंप्रकार प्रमाद, किमित्याह-'यतितव्यं' यत्नो विधेयः, क ?-'अप्रमादे' प्रमादप्रतियोगिनि धर्म प्रत्युद्यम इति गाथार्थः ।। अस्यैवार्थस्य दृढीकरणार्थमुत्तमनिदर्शनमाहवाससहस्सं उग्गं तवमाइगरस्स आयरंतस्स । जो किर पमायकालो अहोरत्तं तु संकलिअं ॥५२३॥ बारसवासे अहिए तवं चरंतस्स वद्धमाणस्स । जो किर पमायकालो अंतमुहुत्तं तु संकलिअं॥५२४॥ 'वर्षसहस्रमिति कालात्यन्तसंयोगे द्वितीया, ततश्च वर्षसहस्रप्रमाणं कालं यावत् 'उग्रम्' उत्कटं 'तपः' अनश
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दीप अनुक्रम [१२४६]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२१...|| नियुक्ति : [५२३-५२४]
*
प्रमाद
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
*
ना
१२०
***
प्रत सूत्रांक [२१]
नादि आदिकरस्य ऋषभनानो भगवत आचरतो यः किलेति परोक्षाप्तवादसूचकः 'प्रमादकालः' यत्र प्रमादो- भूत् यत्तदोरभिसम्बन्धात्सोऽहोरात्रं 'तुः' अवधारणे ततोऽहोरात्रमेव, किमयमेकावस्थामाविनःप्रमादस्य काल उतान्यथेत्याशङ्कयाह-सङ्कलितः, किमुक्तं भवति ?-अप्रमादगुणस्थानस्थान्तमौहूर्तिकत्वेनानेकशोऽपि प्रमादप्राप्तौ तदव६ स्थितिविषयभूतस्यान्तर्मुहूर्त्तस्याङ्खधेयभेदत्वात्तेषामतिसूक्ष्मतया सर्वकालसङ्कलनायामप्यहोरात्रमेवाभूत् ॥ तथा द्वादश वर्षापयधिकानि तपश्चरतो वर्बमानस्य यः किल प्रमादकालः प्राग्वत्सोऽन्तर्मुहूर्तमेव सङ्कलितः, इहाप्यन्तर्मुहूर्तानामसङ्खधेयभेदत्वात्प्रमादस्थितिविषयान्तर्मुहूर्तानां सूक्ष्मत्वं, सङ्कलनान्तर्मुहूर्तस्य च बृहत्तरत्वमिति भावनीयम् , अन्ये खेतदनुपपत्तिभीत्या निद्राप्रमाद एवायं विवक्षित इति व्याचक्षत इति गाथाद्वयार्थः ॥ इत्यमुत्तमनिदर्शनाभ्या|मप्रमादानुष्ठाने दाढवमापाद्य विपर्यये दोषदर्शनद्वारेण पुनस्तदेवापादयितुमिदमाह
जर्सि तु पमाएणं गच्छइ कालो निरत्थओ धम्मे । ते संसारमणतं हिंडंति पमायदोसेणं ॥ ५२५ ॥ GI 'येषां प्राणिनां 'तुः' पूरणे प्रमादेनोपलक्षितानां 'गच्छति' ब्रजति कालः 'निरर्थकः' निष्प्रयोजनः, क-
'धर्म' धर्मविषये धर्मप्रयोजनरहित इत्यर्थः, प्रमादतो हि नश्यन्त्येव धर्मप्रयोजनानि, ते किमित्याह-संसारम् 'अनजन्तम्' अपर्यवसितं 'हिण्डन्ते' भ्राम्यन्ति 'प्रमाददोषेण' हेतुनेति गाथार्थः । यतश्चैवं ततः किं कर्तव्यमित्याह
दीप अनुक्रम [१२४६]
॥२०॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५२६]
प्रत
तम्हा खलुप्पमायं चइऊणं पंडिएण पुरिसेणं । दसणनाणचरिते कायवो अप्पमाओ उ॥ ५२६ ॥
तस्मात् 'खलु' निश्चयेन प्रमादं त्यक्त्वा 'पण्डितेन' बुद्धिमता पुरुषेण उपलक्षणत्वात्ल्यादिना च, दर्शनं च ज्ञानं च चारित्रं चेति समाहारस्तस्मिन मुक्तिमार्गतया प्रागभिहिते 'कर्जव्यः' विधेयः 'अप्रमादः' उद्यमः 'तुः' अवधार-11 ४ाणार्थ इत्याप्रमाद एव न तु कदाचित्प्रमादः, तस्यैवं दोषदुष्टत्वादिति गाथार्थः । इत्यवसितो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तच्चेदम्
अचंतकालस्स समूलयस्स, सब्बस्स दुक्खस्स उ जो पमोक्यो।
तं भासओ मे पडिपुन्नचित्ता, सुणेह एगग्गहियं हियस्थं ॥१॥ __ अन्तमतिक्रान्तोऽत्यन्तो, वस्तुनश्च द्वावन्तौ-आरम्भक्षणः समासिक्षणच, तथा चान्यैरप्युच्यते-"उभयान्तापरिच्छिन्ना वस्तुसत्ता नित्यते" ति, तत्रेहारम्भक्षणा(णलक्षणोऽन्तः परिगृखते, तथा चात्यन्तः-अनादिः कालो यस्य || सोऽयमसन्तकालस्तस्य, सह मूलेन-कषायाविरतिरूपेण वर्तत इति समूलकः(कः)प्राग्वत्तस्य,उक्त हि-"मूलं संसारस्स उ हुति कसाया अविरती य" 'सर्वस्य निरवशेषस्य, दुःखयतीति दुःख-संसारस्तस्य, असातं चेह दुःखं गृह्यते, अत्र च पक्षे मूलं रागद्वेषौ, यः प्रकर्षेण मोक्षयति-मोचयतीति प्रमोक्ष-आत्मनो दुःखापगमहेतुः, पूर्वत्र तुशब्दस्यावधारणा
१ मूलं संसारम तु भवन्ति कषाया अविरतिश्च
दीप अनुक्रम [१२४७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५२६...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥२१॥
प्रत
सुत्रांक
येह सम्बन्धात्प्रमोक्ष एव, तं 'भाषमाणस्य' प्रतिपादयतः, यदिवा प्रमोक्षः-अपगमतं भाषमाणस्पति, कोऽर्थः - प्रमादस्थायथाऽसौ भवति तथा ब्रुवाणस्य 'मे' मम प्रतिपूर्ण-विषयान्तरागमनेनाखण्डितं चित्तं चिन्ता वा येषां ते प्रतिपूर्ण
ना० ३२ चित्ताः प्रतिपूर्णचिन्ता वा 'शृणुत' आकर्णयत, एकाग्रस्य-एकालम्बनस्यार्थाचेतसो भाव एकाग्र्यं-ध्यानं तच प्रक्रमाद्धादि तस्मै हितमेकाम्यहितं, पाठान्तरत-एकान्तहितं वा हितः-तत्त्वतो मोक्ष एव तदर्थमिति सूत्रार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमाह
णाणस्स सव्वस्स पगासणाए, अन्नाणमोहस्स विवज्जणाए।
रागस्स दोसस्स य संखएणं, एगंतसुक्खं समुवेइ मोक्खं ॥२॥ 'ज्ञानस्य' आभिनियोधिकादेः 'सर्वस्य' निरवशेषस्य पाठान्तरतः 'सत्यस्य या' अवितथस्य 'प्रकाशनया' इति प्रभासनया निर्मलीकरणेनेत्यर्थः, अनेन ज्ञानात्मको मोक्षहेतुरुक्तः, तथा अज्ञानं-मत्यज्ञानादि मोहो-दर्शनमोहनीयमनयोः समाहारेऽज्ञानमोहं तस्य विवर्जना-परिहारो मिथ्याश्रुतश्रवणकुदृष्टिसङ्गपरित्यागादिना तया, अनेन स एव सम्यग्दर्शनात्मकोऽभिहितः, तथा 'रागस्य द्वेषस्य च' उक्तरूपस्य 'संक्षयेण' विनाशेन, एतेन तस्यैव चारित्रात्मकस्वाभिधानं, रागद्वेषयोरेव कषायरूपत्वेन तदुपघातकत्वाभिधानात् , ततश्चायमर्थः-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैः 'एका-12
SAXCEKC
दीप अनुक्रम [१२४७]]
॥६२१॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत
४ान्तसौख्यं' दुःखलेशाकलङ्कितसुखं समुपैति 'मोक्षम्' अपवर्गम् , अयं च दुःखप्रमोक्षाबिनाभावीत्यतः स एषोपलक्षित इति सूत्रार्थः ॥ नन्यस्तु ज्ञानादिभिर्दुःखप्रमोक्षः, अमीषां तु का प्राप्तिहेतुः १, उच्यते
, तस्सेस मग्गो गुरुचिद्धसेवा, विवजणा बालजणस्स दरा।।
सज्झायएगंतनिसेवणा य, सुत्तस्थसंचिंतणया घिई य ॥३॥ तस्येति योऽयमनन्तरं मोक्षोपाय उक्तः 'एषः' अनन्तरवक्ष्यमाणः 'मार्गः पन्थाः प्राप्तिहेतुः, यदुत गुरवो-यथावच्छाखाभिधायका वृद्धाश्थ-श्रुतपर्यायादिवृद्धास्तेषां सेवा-पर्युपासना गुरुवृद्धसेवा, इयं च गुरुकुलवासोपलक्षणं,13 तत्र च सुमापान्येव ज्ञानादीनि, यदुक्तम्-"णाणस्स होइ भागी थिरयरओ दसणे चरित्ते य । धन्ना आवकहाए। गुरुकुलवासं न मुंचंति ॥१॥"ति, सत्यपि च गुरुकुलवासे कुसंसर्गतो न स्यादेव तत्प्राप्तिरित्याह-विवर्जना' विशेषेण परिहारः 'बालजनस्य' पार्श्वस्थादेः 'दूरात्' दुरेण, तत्सङ्गस्याल्पीयसोऽपि महादोषनिवन्धत्वेनाभिहितत्वात् , तत्परिहारेऽपि च न खाध्यायतत्परतां विना ज्ञानाद्यवाप्तिरित्याह-खाध्याये-उक्तरूपे एकान्तेन-इतरच्यासअपरिहारात्मकेन निवेशना-स्थापना खाध्यायकान्तनिवेशना सा च मनोवाकायानामिति गम्यते, पठन्ति च'सज्झायएगंतणिसेवणाए'त्ति, स्वाध्यायस्यैकान्तनिषेवणा-निश्चयेनानुष्ठानं खाध्यायकान्तनिपेवणा, सा च तत्रापि १ज्ञानस्य भवति भागी खिरतरो दर्शने चारित्रे च । धन्या यावत्कथं गुरुकुलवासं न मुञ्चन्ति ॥१॥
RRORMALAkse
दीप अनुक्रम [१२४८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||३|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रमादस्था
वृहद्वृत्तिः
प्रत
॥६२२॥
उत्तराध्य. वृथा श्रुतमचिन्तित'मितिकृत्वाऽनुप्रेक्षैव प्रधानेत्यभिप्रायेणाह-सूत्रस्थार्थ:-अभिधेयः सूत्रार्थस्तस्य 'संचिंतणय'त्ति
सूत्रत्वात्संचिन्तना सूत्रार्थसंचिन्तना, अस्यामपि न चित्तखास्थ्यं विना ज्ञानादिलाम इत्याह-'धृतिश्च' चित्तवास्थ्य18/मनुद्विमत्वमित्यर्थ इति सूत्रार्थः ॥ यतबैवंविधो ज्ञानादिमार्गस्तत एतान्यभिलषता प्राक कि विधेयमित्याह
आहारमिच्छे मियमेसणिजं, सहायमिच्छे निउणस्थबुद्धिं ।
निकेयमिचिछज विवेगजोग, समाहिकामे समणे तवस्सी ॥४॥ ६ 'आहारम्' अशनादिकम् 'इच्छेत् ' अभिलपेन्मितमेषणीयम् , अपेर्गम्यमानत्वादिच्छेदप्येवंविधमेव, दानभोजने
तु दूरोत्सारिते एव अनेवंविधाहार (स) एव बनन्तरोक्तं गुरुवृद्धसेवाज्ञानादिकारणमाराधयितुं क्षमः, तथा 'सहायं सहचरमिच्छेद्गच्छान्तवर्ती सन्निति गम्यते, निपुणा-कुशला अर्थेपु-जीवादिषु बुद्धिः-मतिरस्पेति निपुणार्थबुद्धिस्तं, पठ्यते च-णिउणेहबुद्धिं तत्र निपुणा-सुनिरूपिता ईहा-चेष्टा बुद्धिश्च यस्य स तथा, अनीरशो हि सहायः स्वाच्छन्योपदेशादिना ज्ञानादिकारणगुरुवृद्धसेवादिभ्रंशमेव कुर्यादिति, तथा 'निकेतम्' आश्रयमिच्छेदू विवेका- पृथग्भावः सयादिसंसगोंभाव इतियावत्तस्मै योग्यम्-उचितं तदापाताद्यसम्भवेन विवेकयोग्यम् , विविक्ताश्रये हि ख्यादिसंसर्गाचित्तविप्लवोत्पत्ती कुतो गुरुवृद्धसेवादिज्ञानादिकारणं संभवेत् ?, समाधि कामयते-अभिलपति समा
दीप अनुक्रम
[१२४९]]
॥२२॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||४|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत
धिकामः, अत्र च समाधिव्यभाषभेदाद्विभेदः, तत्र द्रव्यसमाधिः क्षीरशर्करादिद्रव्याणां परस्परमविरोधेनावस्थान, मावसमाधिस्तु ज्ञानादीनां परस्परमवाधयाऽवस्थानं तदनन्यत्वाच ज्ञानादीनामयमवेह गृह्यते, तथा च ज्ञानाघवाप्सुकाम इत्युक्तं भवति, श्रमणस्तपस्वीति प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ कालादिदोषत एवंविधसहायाप्राप्ती यत्कृत्यं | तदाह
न वा लमिजा निउणं सहायं, गुणाहियं वा गुणओ समं वा।
एगोवि पावाइ विवजयंती, विहरेज कामेसु असज्जमाणो ॥५॥ 'न' निषेधे वाशब्दश्चेदर्थे ततश्च न चेत् 'लभेत्' प्रामुयात् 'निपुणम्' इति निपुणवुद्धिं 'सहायं गुणैः-ज्ञाना|दिभिरधिकम्-अर्गलं गुणाधिकं वा 'गुणतः' इति ज्ञानादिगुणानाश्रित्य 'समं वा' तुल्यमुभयत्रात्मन इति गम्यते,
ति विकल्ये, ततः किमित्याह-'एकोऽपि' असहायोऽपि 'पापानि' पापहेतुभूतान्यनुष्ठानानि 'विवर्जयन्' विशे६षेण परिहरन् , पठ्यते च-'अणायरंतो'त्ति अनाचरन् 'विहरेत्' संयमाध्वनि यायात् 'कामेषु' विषयेषु 'असजन्|
प्रतिबन्धमकुर्वन्, तथाविधगीतार्थयतिविषयं चैतद्, अन्यथैकाकिविहारस्यागमे निषिद्धत्वात्, एतदविधाने च 'मध्यग्रहणे आद्यन्तयोरपि ग्रहणं भवतीति न्यायादाहारवसतिविषयोऽप्यपवाद उक्त एव भवतीति मन्तव्यम् ॥ इत्थं सप्रसङ्गं ज्ञानादीनां दुःखप्रमोक्षोपायत्यमुक्तम् , इदानीं तेषामपि मोहादिक्षयनिबन्धनत्यात्तत्क्षयस्यैव प्राधा
दीप अनुक्रम [१२५०]
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JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||६-८|| नियुक्ति: [५२६...]
44
उत्तराध्य- बृहद्वृत्तिः ॥६२२॥
प्रत सूत्रांक [६-८]
न्येन दुःखप्रमोक्षहेतुत्वख्यापनार्थं यथा तेषां सम्भवो यथा दुःखहेतुत्वं यथा च दुःखस्य प्रसङ्गतस्तेषां चाभावस्तथा । प्रमादस्थावि(ऽभि)धातुमाह
ना०३२ | जहा य अंडप्पभवा बलागा, अंडं बलागप्पभवं जहा य । एमेव मोहाययणं खु तण्हं, मोहं च तण्हाययणं वयंति ॥६॥रागो य दोसोविय कम्मबीयं, कम्मं च मोहप्पभबं वयंति । कम्मं च जाईमरणस्स मूलं, दुक्खं च जाईमरणं वयंति ॥७॥ दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो, मोहो हो जस्स न होइ तण्हा । तण्हा हया जरस न होइ लोभो, लोभो हओ जस्स न किंचणाई ॥८॥
'यथा चेति येनैव प्रकारेणाण्डं-प्रतीतं ततः प्रभव-उत्पत्तिर्यस्याः साऽण्डप्रभवा 'बलाका' पक्षिविशेषः, अण्ड बलाकातः प्रभवतीति बलाकाप्रभवं यथा च, किमुक्तं भवति ?-यथाऽनयोः परस्परमुत्पत्तिस्थानता 'एवमेव' अनेनैव प्रकारेण मोहयति-मूढतां नयत्यात्मानमिति मोहः-अज्ञानं तह मिथ्यात्वदोषदुष्टं ज्ञानमेव गृह्यते, उक्तं हि"जह दुधयणमवयण"मित्यादि, आयतनम्-उत्पत्तिस्थानं यस्याः सा मोहायतना तां 'खुः' अवधारणे ततो मोहायतनामेव 'तण्ह'न्ति तृष्णां वदन्तीति सम्बन्धः, यथोक्तमोहाभावे अवश्यम्भावी तृष्णाक्षय इति, मोहं च तृष्णाऽऽ-17||२|| यतनं यस्यासौ तृष्णायतनस्तं वदन्ति, तृष्णा हि सति मूर्छा, सा चात्यन्तदुस्त्यजेति रागप्रधाना ततस्तया राग उपलक्ष्यते सति च तत्र द्वेषोऽपि संभवतीति सोऽप्यनयवाक्षिप्यते ततस्तृष्णाग्रहणेन रागद्वेषावुक्ती, एतयोश्चा
दीप अनुक्रम [१२५२-१२५४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||६-८|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [६-८]
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नन्तानुबन्धिकषायरूपयोः सत्तायामवश्यम्भावी मिथ्यात्वोदयः, अत एवोपशान्तकषायवीतरागस्यापि मिथ्यात्वगमनं, तत्र च सिद्ध एवाज्ञानरूपो मोहः, एतेन च परस्परं हेतुहेतुमद्भावाभिधानेन यथा रागादीनां सम्भव-13 स्तथोक्तं, सम्प्रति यथतेषां दुःखहेतुत्वं तथा वक्तुमाह-रागश्च मायालोभात्मकः 'द्वेषोऽपिच' क्रोधमानात्मकः कर्मज्ञानावरणादि तस्य वीज-कारणं कर्मवीजं, कर्म चस्प भिन्नक्रमत्वान्मोहात्प्रभवतीति मोहप्रभवं च-मोहकारणं वदन्ति । 'चः सर्वत्र समुचये 'कर्मच' इति कर्म पुनर्जातयश्च मरणानि च जातिमरणं तस्य 'मूलं कारणं 'दुःखं' संसारमसातपक्षे तु दुःखयतीति दुःखं, कोऽर्थः ?-दुःखहेतुं, चस्य पुनरर्थस्य भिन्नक्रमत्वात् जातिमरणं पुनर्वदन्ति, तीर्थकरादय इति गम्यते, जातिमरणस्यैवातिशयदुःखोत्पादकत्वात् , उक्तं हि-"मेरमाणस्स जं दुक्खं, जायमाणस्स जंतुणो । तेण| दुक्खेण संतत्तो, न सरति जातिमप्पणो॥१॥" यतश्चैवमतः किं स्थितमित्याह-'दुःखम् उक्तरूपं हतमिव हतं, केनेत्याह-यस्य 'न भवति' न विद्यते, कोऽसौ ?-मोहः, अस्यैव तन्मूलकारणत्वात् , ततो हि कर्म कर्मणश्च दुःखमित्यनन्तरमेवोक्तं, हतमिम हतमिति च व्याख्यातं तत्क्षयेऽपि नारकादिगतौ स्वतत्त्वभावनापरस्यापि कियतोऽपि
दुःखस्य सम्भवात्, यदि दुःखहननं मोहाभावाद् असावपि कुत इत्याह-मोहो हतो यस्य न भवति तृष्णा ४ कोऽधः ?-तृष्णाया अभावान्मोहाभावः, तदायतनत्वेन तस्या अभिधानात् , तृष्णाया अपि कुतो हननमित्याह
१ म्रियमाणस्य यदुःख जायमानस्य जन्तोः । तेन दुःखेन संतप्तो न स्मरति जातिमात्मनः ॥ १॥ २ ख्यापक्षयेऽपि
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दीप अनुक्रम [१२५२-१२५४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||६-८|| नियुक्ति: [५२६...]
बृहद्वृत्तिः
ना
प्रत सूत्रांक [६-८]
उत्तराध्य. तृष्णा हता यस्य न भवति लोभः, किमुक्तं भवति ?-लोभाभावात्तृष्णाऽभावः, तृष्णाग्रहणेनोक्तनीत्या रागद्वेषयो
रुक्तत्वात्तयोश्च लोभक्षये सर्वथैवाभावाद, अत एव प्राधान्याल्लोभस्य रागान्तर्गतत्वेऽपि पृथगुपादानं, दृश्यते हि
प्रधानस्य सामान्योक्तावपि विशेषोक्त्यभिधानं, यथा ब्रामणा आयाता वशिष्ठोऽप्यायात इति, स तर्हि केन हत। ॥६२४॥ इत्याह-लोभो हतो यस्य न किश्चनानि-द्रव्याणि सन्तीति गम्यते,सत्सु हि तेषु संभवत्यभिकाङ्क्षा तद्रूप एव च लोभः,
इयत्तु तत्सद्भावेऽपि लोभहननं भरतादीनां तत्कादाचित्कमित्यविवक्षितमेव, पठ्यते च-यस्य न किञ्चन, नास्ति
न किचिद्विद्यते द्रव्यादिकमिति गम्यत इति सूत्रार्थः॥ सन्त्वेवं दुःखस्य मोहादयो हेतवो, हननोपायस्तेषां| |किमयमेवोतान्योऽप्यस्ति ? इत्याशय सविस्तरं तदुन्मूलनापायं विवदिषुःप्रस्तावमारचयति
रागं च दोसं च तहेव मोहं, उद्धत्तुकामेण समूलजालं।.
जे जे उवाया पडिवजियच्या, ते कित्तइस्सामि अहाणुपुचि ॥९॥ स्पष्टं, नवरं यदिह रागस्य प्रथममुपादानं पूर्व तु मोहस्य तत् मोहस्य रागद्वेषयोश्च परस्परायत्तत्वेन पूर्वापरावस्थानियमात्, तथा 'उद्धकामेन' इत्युन्मूलयितुमिच्छता सह मूलानामिव मूलाना-तीनकपायोदयादीनां मोहाकृतीनां जालन-समूहेन वर्तत इति समूलजालस्तम्, एतच रागादीनां प्रत्येक विशेषणम् , 'उपायाः तदुद्धरण-| हेतवः 'प्रतिपत्तव्याः' अङ्गीकृतव्याः कर्तुमिति गम्यते, पठ्यते च-अपाया परिवज्जियवा' इति 'अपायाः' तदुद्धरणप्रवृत्तानां विषन्धकारिणोऽर्थाः 'परिवर्जयितव्याः' परिहर्चन्या इति सूत्रावयवार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमेवाह
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दीप अनुक्रम [१२५२-१२५४]
॥६२४॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत
सूत्रांक
[१०
-२०]
रसा पगामं न हु सेवियब्वा, पायं रसा दितिकरा नराणं । दित्तं च कामा समभिवंति, दुर्म जहा साउफलं व पक्खी ॥१०॥ जहा दवग्गी परिंधणे वणे, समारुओ नोवसमं वेइ । एर्विदियग्गीवि पगामभोइणो, न बंभयारिस्स हियाय कस्सई ॥ ११ ॥ विवित्तसिज्जासणजंतियाणं, ओमासणाणं दमिइंदियाणं । न रागसत्तू धरिसेइ चित्तं, पराइओ वाहिरिवोसहेहि ॥ १२ ॥ जहा बिरालावसहस्स मूले, न मूसगाणं वसही पसत्था । एमेव इत्थीनिलयस्स मज्झे, न बंभयारिस्स खमो निवासो ॥ १३॥ न रूबलावण्णविलासहासं, न जंपियं इंगिय पेहियं वा । इस्थीण चित्तंसि निवेसइत्ता, दडे ववस्से समणे तवस्सी ॥१४॥ अदसणं चेच अपत्थणं च, अचिंतणं चेव अकित्सणं च । इत्थीजणस्सारियझाणजुग्गं, हियं सया बंभवए रयाणं ॥ १५ ॥ कामं तु देवीहिं विभूसियाई, न चाइया खोभइ तिगुत्ता । तहावि एगंतहियंति नथा, विविसवासो मुणिणं पसत्थो॥१३॥ मुक्खाभिकंखिस्सवि माणवस्स, संसारभीरुस्स ठिपस्स धम्मे । नेयारिस दुसरमस्थि लोए,जहत्थिओ बालमणोहराओ॥१७॥ एए य संगा समइक्कमित्ता, सुहत्तरा चेव हवंति सेसा।जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भषे अवि गंगासमाणा ॥१८॥ कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं, सब्वस्स लोगस्स सदेवगस्स। काइयं माणसियं च किंचि, तस्संतयं गच्छइ वीयरागो॥१९॥ जहा य किंपागफला मणोरमा, रसेण बनेण य भुजमाणा। ते खाए जीविय पच्चमाणा, एओवमा कामगुणा विधागे ॥२०॥
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
वृद्धृत्तिः
-२०]
उत्तराध्य.
रसेत्यादि सूत्रैकादशकम् । रसाः' क्षीरादिविकृतयः 'प्रकामम्' अत्यर्थ न निषेवितव्याः' नोपभोक्तव्याः, प्रकामग्रहणं प्रमादस्थातु वातादिक्षोभनिवारणाय रसा अपि निषेवितव्या एव, निष्कारणनिषेवणस्य तु निषेध इति ख्यापनार्थम् , उक्तं च
"अचाहारो न सहे अतिनिद्धेण विसया उदिति । जायामायाहारो तपि पगाम ण भुंजामि ॥१॥" किमित्ये-४ ॥६२५॥ वमुपदिश्यते इत्याह-'प्रायः' बाहुल्येन रसा निषेन्यमाणा इति गम्यते, दृप्तिः-धातूद्रेकस्तत्करणशीला दृप्तिकरा
दृप्तकरा वा पाठान्तरतः इह च भावे क्तप्रत्यय इति संदर्प उच्यते, दृश्यन्त एव हि कुर्वन्तो रसत्वममी प्राणिनामिति, यदिवा दीसं दीपनं मोहानलज्वलनमित्यर्थस्तत्करणशीला दीप्तकराः, केषां -नराणामुपलक्षणत्वात्स्यादीनां
च, उदीरयन्ति हि ते उपभुक्तास्तेषां मोहानलमिति, उक्तं हि-"विगैई परिणइधम्मो मोहो जमुदिजए उदिण्णे | जय । सुहुवि चित्तजयपरो कहं अकजे ण वहिहिई ? ॥१॥" एवं च को दोष इत्याह-दसं यदिवा दीप्तं नरमिति |
प्रक्रमः 'चः पुनरर्थे जाति विवक्षया च बहुवचनप्रक्रमेऽप्येकवचनं, 'कामा' विषयाः 'समभिद्रवन्ति' अभिभवन्ति, तथाविधस्य ख्याधभिलषणीयत्वात्सुखाभिभवनीयत्वाचेति भावः, कमिव क इवेस्याह-'दुमं' वृक्षं 'यथे' सीपम्ये, 'खादुफल' मधुरफलान्वितं 'च' इति भिन्नक्रमः, ततश्च 'पक्खि'त्ति पक्षिण इव, इह च द्रुमोपमः पुरुषादिः खादु
१ अत्याहार न भुजामि अतिथिग्धेन विषया उदीयन्ते । यात्रामाषाहारस्तमपि प्रकामं न मुजामि ॥१॥२ विकृतिः परिणतिधर्मा || मोहो यदुवीर्यते उदीणे च । सुष्ठापि चित्तजयपरः कथमकार्थे न यमति ? ॥२॥
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[१०
-२०]
दीप
अनुक्रम [१२५६
-१२६६]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” – मूलसूत्र - ४ (मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||१०-२० || निर्युक्ति: [५२६...]
अध्ययनं [३२],
फलतातुल्यं च सत्यं दीसत्यं वा पक्षिसदृशाश्च कामा इति । अनेन रसप्रकामभोजने दोष उक्तः, सम्प्रति सामान्येनैव प्रकामभोजने दोषमाह-यथा 'दवाग्भिः' दावानलः प्रचुरेन्धने 'वने' अरण्ये, एतदुपादानं च वसति ( ०तिमति ) कश्चिद्विध्यापकोऽपि स्यादिति, 'समारुतः सवायुः 'नोपसमन्ति न 'उपशमं ' विध्यापनम् 'उपैति' प्राप्नोति, 'एवम्' इति दयानिवन्नोपशमभाग भवति 'इंदियग्गिति इन्द्रियशब्देनेन्द्रियजनितो राग एवोक्तः, तस्यैवानर्थहेतुत्वेनेह चिन्त्यमानत्वात्, सोऽग्निरिव धर्मवनदाहकत्वाद् इन्द्रियाग्निः सोऽपि 'प्रकामभोजिनः' अतिमात्राहारस्य, प्रकामभोजनस्यैव पवनप्रायत्वेनातीव तदुदीरकत्वाद्, अतश्चायं न ब्रह्मचारिणः 'हिताय' हितनिमित्तं ब्रह्मचर्यविघातकत्वेन कस्यचिद् अतिसुस्थितस्यापि तदनेन प्रकामभोजनस्य काका परिहार्यत्वमुक्तम् ॥ इत्थं रागमुद्धर्तुकामेन यत्परिहर्त्तव्यं तदभिधाय यदतियत्नेन कर्त्तव्यं तदाह-विविक्ता-ख्यादिविकला शय्या वसतिस्तस्यामासनम्-अवस्थानं तेन यन्त्रिता- नियन्त्रिता विविक्तशय्यासनयन्त्रितास्तेषाम् 'अवमाशनानाम्' न्यूनभोजनानां पठन्ति च- 'ओमासणाए 'ति अवमं- न्यूनमशनम् - आहारो येषां तेऽमी अथमाशनास्तद्भावोऽवमाशनता- अब मौदर्य रूपा तथा दमितानि वशीकृतानि इन्द्रियाणि यैस्ते तथा तेषां दमितेन्द्रियाणां पठ्यते च- 'ओमासणाईद मिइंदियाणं'ति, अवममशनं यत्र तपसि तदवमाशनं तदादिभिस्तपो भेदैर्दमितानीन्द्रियाणि यैस्ते तथा तेषां 'न' नैव रागः शत्रुरिवाभिभवहेतुतया रागशत्रुः 'घर्पयति' पराभवति, किं तत् १ - चित्तं, किन्तु स एवेत्थं परापृप्यत इति भावः, क
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
उत्तराध्य.
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥२६॥
-२०]
इस ?-'पराजितः' पराभूतः 'च्याधिरिष' कुष्ठादिः 'औषधैः' गडूच्यादिमिर्देहमिति गम्यते, अनेनापि विविक्तश-प्रमादस्थ ग्यासनादीनां काका विधेयत्वमुक्तम्, इदानीं तु विविक्तशयनासने यत्नाधानाय विपर्यये दोषमाह-यथा विडालामार्जारास्तेषामाषसथः-आश्रयो विडालावसथस्तख 'मूले समीपे न मूषकाणां वसतिः 'प्रशस्ता' शोभना, अवश्यं तत्र तदपायसम्भवात् , एवमेव स्त्रीणां-युवतीनां पण्डकाधुपलक्षणमेतत् निळयो-निवासः स्त्रीनिलयस्तस्य 'मध्ये' अन्तन ब्रह्मचारिणः 'क्षमः' युक्तः, कोऽसौ?-निवासः-वसतिः, तत्र ब्रह्मचर्यचाधासम्भवादिति भावः। विविक्तशय्याषस्थितावपि कदाचित्खीसंपाते यत्कर्तव्यं तदाह-'न' नैवरूपं-सुसंस्थानता लावण्यं-नयनमनसामाहादको गुणो विलासाविशिष्टनेपथ्यरचनादयो हासः-कपोलविकासादिरेषां समाहारे रूपलावण्यविलासहासं न जल्पितं-मन्मनोलापादि। 'इंगिय'त्ति विन्दुलोपाद 'इङ्गितम' अङ्गमकादि वीक्षितंकटाक्षवीचितादि वा समुचये खीणां सम्बन्धि 'चित्त-1 | सि'त्ति 'चित्ते' मनसि 'निवेश्य' अहो । सुन्दरमिदं चेति विकल्पतः स्थापयित्वा 'द्रष्टुं इन्द्रियविषयतां नेतुं 'म्यवस्येत्'। अध्यवस्खेत् श्रमणस्तपस्वीति प्राग्वत्, चित्ते निवेश्येत्यनेन च रागाद्यभिसन्धि विनतदर्शनमपि न दोपायेति ख्याप्यते, उक्तं हि-'न सकं रूवमह९'इत्यादि, निवेश्येति च समानकालत्वेऽपि क्त्वाप्रत्ययः अक्षिणी निमील्य हसतीत्या- ॥२६॥ दिवत् । किमित्येवमुपदिश्यते इत्याह-'अदर्शनम्' इन्द्रियाविषयीकरणं 'चः' समुषये 'एवः' अवधारणेऽदर्शनमेव च |'अप्रार्थनं च' अनभिलषणम् 'अचिन्तनं चैव' रूपाद्यपरिभावनम् 'अकीर्तनं च' असंशब्दनं, तच नामतो गुणतो
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत
सूत्रांक
१०
-२०]
वा स्त्रीजनस्वार्यध्यान-धादि तस्य योग्य-तहेतुत्वेनोचितमार्यध्यान योग्य 'हित' पथ्यं 'सदा' सर्वकालं नमनते पाठान्तरतो ब्रह्मचर्ये 'रतानाम्' आसक्तानां, ततः स्थितमेतत्-स्त्रीणां रूपादि मनसि निवेश्य द्रष्टुं व्यवस्खेत् ॥ ननु |
'विकारहेतौ सति विक्रियन्ते, येषां न चेतांसि त एव धीराः' तत्किमिति रागमुद्ध कामेन विविक्तशयनासनताविनिधयेत्युच्यते ? इत्याशङ्कयाह-'कामं तुति अनुमतमेवैतद् यदुत 'देवीहिवित्ति 'देवीभिरपि'अप्सरोभिरप्यास्तां मानुषी|भिरित्यपिशब्दार्थः 'भूषिताभिः' अलङ्कृताभिः 'न' नैव 'चाइय'त्ति शकिताः 'क्षोभयितुं' चालयितुं संयमादिति गम्यते 'तिसृभिः' मनोगुप्त्यादिगुप्तिभिर्गुसाः अर्थान्मुनयः 'तथाऽपि' यदप्येवंविधाचाल यितुं न शक्यन्ते तदप्येकान्तहितमेतदिति ज्ञात्वा, किमुक्तं भवति ?-संभवन्ति हि केचिदभ्यस्तयोगिनोऽपि ये तत्समतः क्षुभ्यन्ति, येऽपि न क्षुभ्यन्ति तेऽपि खीसंसक्तवसतिवासे “साहु तवो वणवासो" इत्याद्यवर्णादिदोपभाजो भवेयुरिति परिभाष्य 'विविक्तवासो' विविक्तशय्यासनात्मको मुनीनां प्रशस्त इत्यन्त वितण्यर्थतया 'प्रशंसितः' गणधरादिभिः श्लाधित इत्यर्थः, अतः स एवाश्रयणीय इति भावः । एतत्समर्थनार्थेमेव स्त्रीणां दुरतिक्रमत्वमाह-'मोक्षाभिकातिणोऽपि' मुक्त्यभिलाषिणो-IK |ऽपि मानवस्य संसारात-चतुर्गतिरूपायनशीलो भीरुः संसारभीरुः, अपेरिहापि सम्बन्धात्तस्यापि-तथास्थितस्यापि 'धर्मे' श्रुतधर्मादौ 'न' नैव 'एतादृशम् ईदृशं दुस्तरं-दुरतिक्रमम् 'अस्ति' विद्यते 'लोके' जगति यथा 'स्त्रियः' युवतयः 'बालमनोहराः' निर्विवेकचित्ताक्षेपिण्यो दुस्तराः, दुस्तरत्वे च बालमनोहरत्वं हेतुः, अतश्चातिदुस्तरत्वादासां परि
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥६२७॥
OEM-TENCEShe-
१०.
-२०]
हार्यत्वेन विविक्तशय्यासनमेव श्रेय इति भावः ॥ नन्वेवं स्त्रीसङ्गातिकमार्थमयमुपाय उपदिष्टस्तथा शेषसङ्गातिक्र-11
प्रमादस्थामणार्थमपि किंन कश्चनोपाय उपदिश्यते ? इत्याह,-यदिवा स्त्रीसाइतिक्रमे गुणमाह-एतांथ 'सहान्' सम्बन्धान प्रक्रमात्स्त्रीविषयान् 'समतिक्रम्य' उलय 'सुखोत्तराश्चैष' अकृच्छ्रोल्लट्याश्चैव भवन्ति 'शेषाः' द्रव्यादिसाः, सर्वस
ना नानां रागरूपत्वे समानेऽपि खीसङ्गानामेवैतेषु प्रधानत्वादिति भावः, रटान्तमाह-यथा 'महासागरं' खयम्भूरमण-12 | मुत्तीर्य 'नदी' सरित् 'भवेत्' स्यात्सुखोत्तरैवेति प्रक्रमो वीर्यातिशययोगत इति भावः, 'अवि गंगासमाने ति गङ्गा किल ||४| महानदी तत्समानाऽपि-तत्सदृशाऽपि, आस्तामितरा क्षुद्रनदीत्यपिशब्दार्थः ॥ यदुक्तं "विवित्तसेज्जासणजत्तियाण"मित्यत्र विविक्तावसथमर्थतो व्याख्याय “ओमासणाणं दमिइंदियाण" मित्यत्रावमाशनत्वमनन्तरमेव प्रकामभोजन-2 | निषेधेन समर्थितं, दमितेन्द्रियत्वं तृत्तरत्र वक्ष्यत इत्युभयमुपेक्ष्य "न रागसत्त परिसइ चित्त"मित्यत्र किमिति रागप-|| राजयं प्रत्येवमुपदिश्यते ? इत्याशय रागस्य दुःखहेतुत्वं दर्शयितुमाह-कामाः-विषयास्तेष्वनुगृद्धिः-सततामिकाङ्का अनुभावानुवन्ध इत्यादिष्यनोः सातत्येऽपि दर्शनात् तस्याः प्रभवो यस्य तत्कामानुगृद्धिप्रभवं 'खु'त्ति खुशब्दस्वावधार|णार्थत्वात्कामानुगृद्धिप्रभवमेव, किंतत् ?-'दुःखम्' असातं सर्वस्य लोकस्व-प्राणिगणस्य, कदाचिद्देवानां विशिष्टानुमा-12॥२७॥ | ववत्तयैवं न पादत आह-'सदेवकस्य' देवैः समन्वितस्य, कतरत्तद् दुःखमित्याह-यत्'कायिक' रोगादि 'मानसिकं | च' इष्टवियोगादिजन्यं 'किश्चित्' सल्पमपि, कदाचिदेतदभावेऽप्येतत्स्याद् अत आह-तस्य द्विविधखापि दुःख-14
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...]
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सूत्रांक
[१०
-२०]
प्रस्थान्तमेव अन्तक-पर्यन्तं गच्छति 'बीतरागः' विगतकामानुद्धिरित्यर्थः ॥ ननु कामाः सुखरूपतयैवानुभूयन्ते
तत्कथं कामानुगृद्धिप्रभव दुःखम् ?, उच्यते, 'यथा च' इति यथैव किम्पाको-वृक्षविशेषस्तत्फलानि, अपेगेम्यमानत्वात् |'मनोरमाण्यपि हृदयजमान्यपि 'रसेन' आखादेन 'वर्णेन च रुचिररक्तादिना चशब्दाद् गन्धादिना च भुज्यमानानि' उपभुज्यमानानि 'ते' इति 'तानि' लोकप्रतीतानि क्षोदयितुम्-अध्यवसनादिभिरुपक्रमकारणैर्विनाशयितुं शक्यत इति क्षुद्रं तदेवानुकम्प्यतया क्षुद्रकं सोपक्रममित्यर्थस्तस्मिन् जीविते-आयुषि पच्यमानानि-विपाकावस्थाप्रासानि मरणान्तदुःखदायीनीति शेषः, प्राग्वच लिङ्गव्यत्ययः, पठ्यते च-'ते जीवियं ख़ुदति पञ्चमाणे ति तानिकिम्पाकफलानि जीवितम्-आयुः 'खुंदति' आपत्वात् 'योदयन्ति' विनाशयन्ति विपच्यमानानि, 'एतदुपमाः' किम्पाकफलतुल्याः कामगुणाः 'विपाके' फलप्रदानकाले, किमुक्तं भवति ?-यथा किम्पाकफलान्युपभुज्यमानानि मनोरमाणि विपाकावस्थायां तु सोपक्रमायुषां मरणहेतुतयाऽतिदारुणानि, एवं कामगुणा अपि उपभुज्यमाना मनोरमा विपाकायस्थायां तु नरकादिदुर्गतिदुःखदायितयाऽत्यन्तदारुणा एव, ततः सुखरूपतया प्रतिभासनं सुखहेतुत्वेऽनैकान्तिकमेव, किम्पाकफलानां मनोरमत्वेन सुखप्रतिभासेऽप्यन्यथाभावादिति सूत्रैकादशकार्थः ॥ इत्थं बहुतरगुणस्थानानुयायित्वेन रागस्य प्राधान्यात्केवलस्यैवोद्धरणोपायमभिधाय सम्प्रति तस्यैव द्वेषसहितस्य तमभिधित्सुर्दमितेन्द्रियत्वं च सिंहावलोकितन्यायाश्रयणेन व्याचिख्यासुरिदमाह
दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||२१|| नियुक्ति: [५२६...]
बृहद्वृत्तिः
ना०
प्रत
सत्राक
[२१]
उत्तराध्य.
जे इंदियाणं विसया मणुण्णा, न तेसु भाव निसिरे कयाई।
न यामणुन्नेसु मणपि कुजा, समाहि कामे समणे तबस्सी ।। २१॥ ये 'इन्द्रियाणां' चक्षुरादीनां 'विषयाः' रूपादयः 'मनोज्ञाः' मनोरमाः न तेषु' विषयेषु 'भावम्' अभिसन्धिम् , ॥६२८॥ अपेर्गम्यमानत्वादावमपि प्रस्तावादिन्द्रियाणि प्रवर्त्तयितुं, किं पुनस्तत्प्रवर्त्तनमित्यपिशब्दार्थः, 'निसृजेत्' कुर्यात् ।
'कदाचित् कस्मिंश्चित्काले, 'न च' नैव 'अमनोज्ञेषु' अमनोरमेषु 'मनोऽपि' चित्तमपि, अत्रापीन्द्रियाणि प्रवर्तयि
तुम् अपिशब्दार्थश्च प्राग्वत् 'कुर्यात्' विदध्यात्, अनेन वाक्यद्वयेनापीन्द्रियदम उक्तः, समाधिः-चित्तकाञ्यं स च* दरागद्वेषाभाव एवेति स एवानेनोपलक्ष्यते, ततस्तत्कामो-रागद्वेषोद्धरणाभिलाषी श्रमणस्तपखीति च प्राग्वत्,
नन्वेवमुभयोद्धरणहेतुत्वेनेन्द्रियदमस्य किमिति रागोद्धरणहेतुष्वभिधानम् ?, उच्यते, हेतुप्रक्रमात् , न चोभयोद्धरण
हेतुतयैकोद्धरणहेतुता विरुध्यते, यदिवा तत्रापि रागस्य द्वेषोपलक्षणत्वादुभयोद्धरणोपायतैव विवक्षिता, किन्तु दतत्र विविक्तशय्या-सामान्येनैकान्तशय्या गृह्यते, तदवस्थानस्य च प्रतीतैव तदुद्धरणोपायता, एवं प्रकामभोजिन
एव दर्पतो द्वेषसम्भवादवमाशनत्वस्याप्यसौ भावनीयेत्सलं प्रसङ्गेनेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं रागद्वेषोद्धरणैषिणो विष- येभ्यो निवर्तनमिन्द्रियाणामुपदिष्टम् , अधुना त्वेतेषु तत्प्रवर्तने रागद्वेषानुद्धरणे च यो दोषस्तं प्रत्येकमिन्द्रियाणि : तत्प्रसङ्गतो मनश्चाश्रित्य दर्शयितुमाह
दीप
अनुक्रम [१२६७]
॥२८॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
[२२
-९९]
चक्खुस्स रूवं गहणं वयंति, तं रागहे तु मणुन्नमाहु । तं दोसहेउ अमणुन्नमाहु, समो अ जो तेसु स वीयरागो ॥१२॥ स्वस्स चक्खं गहणं वयंति, चक्खुस्स एवं गहणं वयंति । रागस्स हे समणुन्नमाहु, KI दोसस्स हे अमणुन्नमाहु ॥२३॥ रूवेसु जो गिद्विमुवेइ तिब्वं, अकालियं पावा सो विणासं । रागा-I
उरे से जहवा पयंगे, आलोअलोले समुह मचं ॥२४॥ जे यावि दोसं समुवेद तिव्वं, तंसि क्खणे से व उवेद |दुक्खं । दुईतदोसेण सएण जंतू, न किंचि रूवं अवरज्झई से ॥ २५ ॥ एगंतरत्तो रुहरंसि रूवे, अतालिसे |से कुणई पओस । दुक्खस्स संपीलमुवेइ वाले, न लिप्पई तेण मुणी विरागे ॥ २६ ॥ रूवाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरेहिं सयणेगरूवे । चित्तेहिं ते परियावेह चाले, पीलेइ अत्तगुरू किलिट्टे ॥ २७ ॥ रूवाणुवाएण परिग्गहेण, उप्पायणे रक्खणसंनिओगे । वए विओगे य कहं सुहं से, संभोगकाले य अतित्तलाभे? ॥२८॥ रूवे अतिते अपरिग्गडंमि, सत्तोवसत्तो न उबेद तुहि । अतुढिदोसेण दुही परस्स, लोभाविले आयई अदत्तं ॥ २९ ॥ तण्हाभिभूयस्स अदत्तहारिणो, रूवे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायामुसं वडइ
लोभदोसा, तत्वावि दुक्खा न विमुच्चई से ॥३०॥ मोसस्स पच्छा य परत्यओ य, पओगकाले य दुही *दुरंते । एवं अदत्ताणि समायअंतो, रूवे अतित्तो दुहिओ अणिस्सो ॥ ३१ ॥ रूवाणुरत्तस्स नरस्स एवं,
कत्तो सुहं हज्ज कयाह किंचि। तत्थोवभोगेऽवि किलेसदुखं, निव्वसई जस्स करण दुक्खं ॥३२॥ एमेव रूवंमि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोहपरंपराओ । पदुद्दचित्तो अ चिणाइ कम्मं, जं से पुणो होइ दुई
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दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत
सूत्रांक
[२२
-९९]
उत्तराध्य18 विवागे ॥ ३३ ॥ रूवे विरत्तो मणुओ यिसोगो, एएण दुक्खोहपरंपरेण । न लिप्पई भवमझेऽषि संतो, जले-प्रमाद
टण वा पुक्खरिणीपलासं ॥ ३४ ॥ सोयरस सई गहणं वयंति, तं रागहे तु मणुन्नमाहु । तं दोसहेजे अमणु-|| बृहद्वृत्तिः
नमाहु, समो अ जो तेसु स वीयरागो ॥ ३५ ॥ सहस्स सोयं गहणं वयंति, तं रागहेतु मणुन्नमाहु । ॥६२९॥ तं दोसहेउं अमणुन्नमाहु, समो अ जो तेसु स वीयरागो ॥ ३६॥ सद्देसु जो गेहिमुवेइ तिब्ब, अकालिय 4
पावइ सो विणासं। रागाउरे हरिणमिउब्व मुन्डे, सद्दे अतिते समुवेइ मझु ॥ ३७॥ जे यावि दोसं समुवेइ तिव्वं, तंसि क्खणे से उ उबेइ दुक्खं । दुईतदोसेण सएण जंतू, न किंचि सई अवरज्झई से ॥ ३८॥ एगतरत्ते रुइरंसि सद्दे० ॥ ३९॥ सहाणुगासाणु०॥४०॥ सहाणुवाएण परिग्गहेण ॥४१॥ सद्दे अतिते०४२ तण्हाभिभूयस्स०॥४३॥ मोसस्स पच्छा य॥४४॥ सदाणु ॥४५॥ एमेव सइंमि०॥४ा सहे विरत्तो ॥४७॥ घाणस्स गंधं गहणं वयंति०॥४८॥ गंधस्स घाणं ॥४९॥ गंधेसु जो गेहिं० रागाउरे ओसहिगं
धगिद्धे, सप्पे पिलाओ विष निक्खमंते ॥५०॥जे यावि दोसं०॥५१॥ एगंतरसो कदरंमि गंधे० ॥५२ ।। Iगंधाणु०॥५३॥ गन्धाणुवा०॥५४॥ गंधे अतित्ते॥५५॥ तण्हा०॥५६॥ मोसस्स०॥५७॥ गंधाणु014
॥ ५८ ॥ एमेव गंधमि०॥ ६९॥ गंधे विरत्तो०॥६०॥ जिन्भाए रसं गहणं० ॥११॥ रसस्स जीहं गहणं ॥२९॥ |वयंति०॥ १२॥ रसेसु जो गेहि रागाउरे बडिसविभिन्नकाए, मच्छे जहा आमिसभोगगिद्धे ॥१३॥ गाथा १३ ॥७३॥ कायस्स फासं गहणं वयंति०१॥ फासस्स कायं गहणं० २॥ फासेसु जो गेहिमुकारागाउरे सीयज
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक
[२२
HABAR
-९९]
लावसन्ने, गाहग्गहीए महिसे व रन्ने, ३ ॥ एवं फासाभिलापे गाथा १३ ॥८६॥ मणस्स भावं गहणं०१॥ भावस्स मणं ग० २॥ भावेसु जो गेहि। रागाउरे कामगुणेसु गिडे, करेणुमग्गावहिए व नागे ३॥ एवं भावाभिलापे गाथा १३ ॥१९॥ ___ 'चक्खुस्से'त्यादि सूत्राण्यष्टसप्ततिः। तत्रापि चक्षुराश्रित्य त्रयोदश । 'चक्षुपः' चक्षुरिन्द्रियस्य रूप्यत इति रूपंवर्णः संस्थानं वा, गृयतेऽनेनेति ग्रहणं, कोऽर्थ ?-आक्षेपकं, विशिष्टेन हि रूपेण चक्षुराक्षिप्यते तद् वदन्ति' अभिदधति तीर्थदादय इति गम्यते, ततः किमित्याह-'तद्' इति रूपं रागः-अभिष्वास्तहेतुः तदुत्पादक 'तुः' पूरणे मनोज्ञमाहुः, तथा 'तदू' इति रूपमेव दोषस्तद्धेतुममनोज्ञमाहुः, ततस्तयोश्चक्षुःप्रयर्सने रागद्वेषसम्भवात्तदुद्धरणाशक्तिलक्षणो दोष इति भावः, आह-एवं न कश्चित् सति रूपे वीतरागः स्यादत आह-समस्तु' अर-1 |क्तद्विष्टतया तुल्यः पुनर्यः 'तयोः' मनोज्ञेतररूपयोः स 'वीतराग' इति तथाविधरागाभावतो वीतरागस्तदविनाभावि| त्वाद् द्वेषस्य तथैव वीतद्वेषश्च, इदमाकूतम्-यस्यैव रागद्वेषौ स्तस्तस्यैव तदुदीरकत्वेनानयोस्तजनकत्वमुच्यते न तु, यः सम एव, तथा च न तावचक्षुस्तयोः प्रवत्तयेत्, कश्चित्प्रवर्त्तने वा समतामेवालम्बेतेत्युक्तं भवति, ननु यद्यवं रूपमेव रागद्वेषजनकं ततस्तदुद्धरणार्थिनस्तद्तैव चिन्ताऽस्तु, रूपे चक्षुने प्रवर्तयेदित्येवं तुन युक्तैव चक्षुषश्चिन्ता इत्याशङ्कयाह-रूपस्य चक्षुः गृहातीति ग्रहणं, बहुलवचनात्कर्तरि ल्युट्, तद्वदन्ति, तथा चक्षुषो रूपं गृह्यत इति ।
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
vपूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [२२
-९९]
उत्तराध्य.
प्राग्यल्युटि ग्रहणं-ग्राह्यं तद्वदन्ति, अनेन रूपचक्षुपोगाणग्राहकभार उक्तः, तथा च न ग्राहकं विना प्रायत्यं नापि प्रमादस्थाग्रायं विना ग्राहकत्वमित्यनयोः परस्परमुपकार्योपकारकभाव उक्तो भवति, एतेन त्वनयो रागद्वेषजनने सहका
ना०३२ रिभावः ख्याप्यते, तथा च यथा रूपं रागद्वेषकारणं तथा चक्षुरपि, अत एवाह-रागस्य हेतुं-कारणं प्रक्रमाचक्षुः । ॥३०॥ सह मनोजेन ग्राह्येण रूपेण वर्तते इति समनोज, मनोज्ञरूपविषयभित्युक्तं भवति, 'आहुः' अवते, यत्र तु 'हेउं तम-16
द्रगुण्ण मिति पाठस्तत्र 'तंति तथक्षुमनोज मनोज्ञरूपविषयत्वेन ततो दोषो-द्वेषः, उक्तं हि-"ईया रोपो द्वेषः"
इत्यादि, तस्य हेतुममनोज्ञम्-अमनोज्ञरूपं, पाठान्तरतश्च हेतुं तदमनोज्ञमाहुः, उभयप्रक्रमेऽपि चक्षुप एव विशे-14 प्यत्वेनोपदर्शन, रूपस्य पूर्वसूत्रेणैव, एवं च रूपचक्षुषोः सहितयोरेव रागद्वेषजनकत्वाद्युक्तमुक्तं तावुद्ध कामो रूपे ४. चक्षुनै प्रवर्तयेत्, यदा तु पाश्चात्यपादत्रयं पूर्ववत्पठ्यते तदा पूर्वसूत्रे चक्षुपो रूपं ग्रहणं-प्राह्यमिति व्याख्येयं, ततश्चेहै हापि ग्राह्यग्राहकभाव उक्तः, तत्र चोक्त एवाभिप्रायः, तथा यदि चक्षु रागद्वेषकारणं न कश्चिद्वीतरागः पादत आह
समवेत्यादि, शेष सुगमम् । आह-अस्त्वयं रागद्वेषोद्धरणोपायः, एतदनद्धरणे च को दोषः? येन तदुद्धरणार्थमि-12 स्थमुपदिश्यत इत्याह-रूपेषु यो 'गृद्धि' गाय रागमित्यर्थः, उक्तं हि वाचकैः-"इच्छा मूर्छा कामः स्नेहो गाये ममत्वमभिनन्दः। अभिलाष इत्यनेकानि रागपर्यायवचनानि ॥१॥” उपैति' गच्छति तीब्राम्' उत्कटां गृद्धेविशेषणं,
॥३०॥ स किमित्याह-अकाले भवम् आकालिक यथास्थित्यायुरुपरमादागेव प्राप्नोति स 'विनाशं' घात, पाठान्तरतः
RECER+RA+
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
15%
प्रत सूत्रांक
[२२
-९९]
E0%ANISH
निशं या' मरणान्तवाधात्मकं, रागेणातुरो-वितलो रागातुरः सन् 'से' इति स लोकप्रतीतः 'यथा वा' इति वाश-1 ब्दस्यैवकारार्थत्वाद् 'यथैव' येनैव प्रकारेण पतङ्गः शलभः आलोक:-अतिस्निग्धदीपशिखादिदर्शनं तस्मिन् लोलोलम्पट आलोकलोलः समुपैति 'मृत्यु' प्राणत्याग, तस्यापि गृयाऽऽलोकलोलत्वं राग एवेति भावः । 'यश्च' इति यस्तु, अपीति च तस्मिन्नित्यनेन योक्ष्यते 'दोष' द्वेष 'समुतित्ति बचनव्यत्ययात् 'समुपैति' समुपगच्छति रूपेबितिप्रक्रमः 'नित्यं सदा न तु कदाचित्, स किमित्याह-तस्मिन्नपि 'क्षणे प्रस्तावे यस्मिन् द्वेष उत्पन्नः 'स' इति सः 'तुः पूरणे उपैति 'दुःखं शारीरादि, द्विष्टो हि किमिदमनिष्टं मया दृष्टमिति मनसा व्याकुलीभवति परितप्यते च देहेन, न तु यथा रागमुपगच्छंस्तत्काले मनोज्ञविषयावलोकनजनितं सुखमभिमन्यते उत्तरकालमेव तु दुःखमिति, पठन्ति च 'समुति सचंति स्पष्टं, यदि रूपदर्शनाद् द्वेषमुपगच्छन् दुःखमुपैति ततस्तथाविधरूपदोषेणैवाख दुःखावाप्तिरिति प्राप्तमित्याशङ्कवाह-दुष्टं दमनं दुर्दान्तं तच प्रक्रमाचक्षुषस्तदेव दोषो दुर्दान्तदोषस्तेन 'खकेन' आत्मी-| येन 'जन्तुः' प्राणी, न किञ्चित्' खल्पमपि रूपं प्रक्रमादमनोज्ञम् 'अपराध्यति' दुष्यति से' तस्य, यदि हि रूप-2 मेवापराध्येन्न कस्यचिद्वेषाभावः स्यात्, तथा च मुक्त्यभावादयो दोषा इति भावः । इत्थं रागद्वेषयोयोरप्यनर्थहेतुत्वमुक्तमिदानीं तु द्वेपस्यापि रागहेतुकत्वात्स एव महाऽनर्थमूलमिति दर्शयंस्तस्य विशेषतः परिहर्त्तव्यता ख्यापयितुमाह-'एकान्तरक्तो' यो न कथञ्चिद्विरागं याति 'रुचिरें मनोरमे रूपे, किमित्याह-'अतालिसि'त्ति
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दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
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vपूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [--1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक [२२-९९]
उत्तराध्य. मागधदेशीभाषया 'अताशे' अन्यादृशे, तथा च तल्लक्षणं-रशयोर्लसौ मागधिकाया मिति, 'से' इति स करोति प्रमादस्था
४'प्रदोष' द्वेष सुन्दरीनन्द इव सुरसुन्दरीरागतः सुन्दया, तथा च दुःखस्य 'संपीडन' सङ्घातं, यद्वा समिति-भृशं . बृहद्वृत्तिः
ना०३२ पीडा-दुःखकृताबाधा संपीडा तामुपैति 'बालः' अज्ञः उक्तमेवार्थ व्यतिरेकमुखेनाह-न लिप्यत इव ॥१३॥ लिप्यते, शिष्यत इत्यर्थः, 'तेन' द्वेषकृतदुःखेन मुनिः 'विरागः' रागविरहितः, तस्यैव सन्मूलत्वादिति भावः ॥
सम्प्रति रागस्यैव पापकर्मोपचयलक्षणमहाऽनर्थहेतुतां ख्यापयितुं हिंसाद्याश्रयनिमित्तता पुनरिह च तद्वारेण दुःखजनकत्वं च सूत्रषट्वेनाह-रूपं प्रस्तावान्मनोज्ञमनुगच्छति रूपानुगा सा चासावाशा च रूपानुगाशा, रूपविषयोऽभिलाष इति योऽर्थः, तदनुगतश्च जीवः, पठन्ति च-रूवाणुवायाणुगए य जीवे'त्ति तत्र रूपाणां-मनोज्ञानामुपायैः-उपार्जनहेतुभिरनुगतो-युक्त उपायानुगतः स च प्राणी जीवान् 'चराचरान्' उसस्थावरान् 'हिनस्ति' विनाशयति 'अनेकरूपान्' जात्यादिभेदतोऽनेकविधान् , कांश्चित्तु 'चित्रैः' अनेकप्रकारैः खकायपरकायशस्खादि|भिरुपायैरिति गम्यते सुव्यत्ययाद् यथासम्भवं चित्तेषु वा तानिति-चराचरजीवान् परीति-सर्वतस्तापयति-दुःखयति परितापयति बाल इच बालः-विवेकविकलतयाऽपरांश्च पीडयति एकदेशदुःखोत्पादनेनात्मार्थ गुरु:-खप्रयो- ॥३१॥
जननिष्ठः 'क्लिष्टः' रागबाधितः ॥ अन्यच-रूपानुपातो-रूपविषयोऽनुपातः अनुगमनमनुराग इतियावत् ससिंच दसति 'परिग्रहेण' मूर्जात्मकेन हेतुना 'उत्पादने' उपार्जने रक्षणं च-अपायविनिवारणं सन्नियोगश्च-खपरप्रयोजनेषु ।
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
[२२
-९९]
सम्यग्रव्यापारणं रक्षणसन्नियोगं तस्मिन् 'पये'त्ति 'व्यये विनाशे 'वियोगे' विरहे सतोऽप्यनेककारणजनिते. सर्वत्र रूपस्येतिप्रक्रमः, क सुखं ?, न कचित्, किन्तु सर्वत्र दुःखमेवेति भावः, 'से' इति तस्य जन्तोः, इयमत्र भावना-रूपमूर्छितो हि रूपयत्करितुरङ्गमकलत्रादीनामुत्पादनरक्षणार्थ तेषु तेष क्लेशहेतुपूपायेषु जन्तुः प्रवर्तते, तथा नियोज्यापि तथाविधप्रयोजनोत्पत्ती रूपवत्कलत्रादि तदपायशङ्कया पुनः पुनः परितप्यत एवेति सिद्ध| मेवास्योत्पादनरक्षणसंनियोगेषु दुःखम् , एवं व्ययवियोगयोरपि भावनीयम् , अन्ये तु पठन्ति-रूवाणुरागेण परि
गहेणं'ति, तत्र रूपानुरागेण हेतुना यः परिग्रहस्तेन, शेषं प्राग्वत्, स्यादेतत्-मा भूदुत्पादनादिषु रूपस्य सुखं,
सम्भोगकाले तु भविष्यतीत्याशङ्कयाह-'सम्भोगकाले च' उपभोगप्रस्तावे च 'अतित्तलाभेति तर्पणं तृप्तं तृप्तिरि-४ दतियावत्तस्य लाभः-प्राप्तिस्तृतलाभो न तथाऽतृसलाभः, किमुक्तं भवति -बहुधाऽपि रूपदर्शने रागिणां न तृप्सि
रस्ति, यतोऽन्यैरप्युक्तम्-“न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्मेव, भूय एवाभिवर्द्धते x॥१॥" तथा "यथाऽभ्यासं विवर्द्धन्ते विषयाः कौशलानि चेन्द्रियाणा"मिति, तस्मिन् सति क सुखमिति सम्बन्धः, Kउत्तरोत्तरेच्छया हि परितप्यत एव जन्तुरिति, पठन्ति च-'अतित्तिलाभे ति तृसिप्राप्त्यभावे । आह-एवं परिग्रहाद्
दुःखमनुभवतस्तगीरुतया ततो निवृचिर्दोषान्तरानारम्भणं वा किमस्य संभवतीत्याशङ्कयाह-रूपेऽतृप्तश्च परिग्रहे चतद्विषयमूर्छात्मके सक्तः-सामान्येनेवासक्तिमान् उपसक्तश्च-गाढमासक्तस्ततः सक्तश्च पूर्वमुपसक्तश्च पश्चात् सक्तो
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [--1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [२२-९९]
उत्तराध्यापसक्तः 'नोपैति' नोपगच्छति 'तुष्टिं परितोष सन्तोषमितियावत् , तथा चातुष्टिरेव दोषोऽतुष्टिदोषस्तेन दुःखी- प्रमादस्थाहै यदि ममेदमिदं च रूपबद्वस्तु स्यादित्याकाङ्क्षातोऽतिशयदुःखवान् , स किं कुरुत इत्याह-परस्य अन्यस्य सम्बन्धि
ना० रूपयद्वस्त्विति गम्यते 'लोभाविलः' लोभकलुषः,यद्वा परेषां स्वं परखं प्रक्रमाद् यद्यवस्तु तस्मिन् लोभो-गाध्ये ॥६३२॥ तेनाविलः परखलोभाबिलः 'आदत्ते' गृह्णाति 'अदत्तम्' अनिसृष्टं परकीयमेव रूपयद स्त्विति गम्यते,अनेन रागस्याति-18||
दुष्टतां ख्यापयितुं परिग्रहाद्दोषदर्शनेऽपि विशेषतस्तत्रासक्तिर्दोषान्तरारम्भणं चाभि हितं ॥ तक्किमस्यैतावानेव दोष उतान्योऽपि.१ इत्याशङ्कयोक्तदोषानुवादेन दोवान्तरमप्याह-'तृष्णाभिभूतस्य' लोभाभिभूतस्य तत एवादत्तं हरति-II गृह्णातीत्येवंशीलोऽदत्तहारी तस्य,तथा रूपे-रूपविषयो यः परिग्रहस्तस्मिन्निति योगः, चस्य भिन्नक्रमत्वादतृप्तस्य च तत्रासन्तुष्टस्य मायाप्रधान मोसंति-भूषाऽलीकभाषणं मायामृषा 'वर्द्धते' वृद्धि याति, कुतः पुनरिदमित्यमित्याह-'लोभदोषात्' लोभापराधात्, लुब्धो हि परखमादत्ते आदाय च तद्गोपनपरो मायामृषा वक्ति, तदनेन
लोभ एव सर्वाश्रवाणामपि मुख्यो हेतुरित्युक्तं, तथा रागप्रक्रमेऽपि सर्वत्र लोभाभिधानं रागेऽपि लोभांशस्यैवाहतिदुष्टतावेदनार्थे, तत्रापि को दोषः ? इत्याह-'तत्रापि' मृषाभाषणेऽपि 'दुःखात्' असातात् 'न विमुच्यते' | M६३२॥
न विमुक्तिमामोति सः, किन्तु ?, दुःखभाजनमेव भवतीति भावार्थः॥ दुःखाविमुक्तिमेव भावयति-'मोसस्स'त्ति मृषा, कोऽर्थः।-अनृतभाषणस्य पश्चाच्च पुरस्ताच 'प्रयोगकाले च तद्भाषणप्रस्तावे च दुःखी सन् तत्र पश्चादिदमिदं च न मया
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
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[२२
सुसंस्थापितमुक्तमिति पश्चात्तापतः पुरस्ताच कथमयं मया वञ्चनीय इति चिन्ताव्याकुलत्वेन प्रयोगकाले च नासौ |ममालीकभाषितां लक्षयिष्यतीति क्षोभतः तथा दुष्टोऽन्तः-पर्यवसानं तजन्मन्यनेकविडम्बनातो विनाशेन अन्यज
न्मनि च नरकादिप्राप्त्या यस्यासौ दुरन्तो भवति जन्तुरिति गम्यते, तदेवं मृषाद्वारेणादत्तादानस्य दुःखहेतुत्वमुक्तं, दायदा च 'मोसस्स'त्ति 'मोषस' तेयस्येति व्याख्या तदा साक्षादेव तस्य दुखिहेतुत्वाभिधानम्, उपसंहारमाह
एवम्' अमुनोक्तप्रकारेणादत्तानि 'समाददानः' गृहन् रूपेऽतृप्तः सन् दुःखितो भवति, कीदृशः सन् ? इत्साह'अनिश्रः' दोषवत्तया सर्वजनोपेक्षणीय इति कस्यचित्सम्बन्धिनाऽवष्टम्भेन रहितः, मैथुनरूपाश्रवोपलक्षणं चैतदिति, प्रसिद्धत्वाच रागिणां तस्य साक्षादनभिधानं, यद्वा रूपसम्भोगोऽपि मिथुनकर्मकत्वाद्देवानामिय मैथुनमेव, तथा च रागिवचनम्-"आलोए चिय सा तेण पिययमा णेह निम्भरमणेणं । आभासियच अवगूहियव रमियछ पीयच ॥१॥" त्ति, स च प्रक्रान्तः, एवमुत्तरत्रापि स्त्रीगतशब्दादिसम्भोगानां मैथुनत्वं सम्भावनीयम् । उक्तमेवा) निगमयितुमाह४ रूपानुरक्तस्य नरस्य 'एवम्' अनन्तरसूत्रकदम्बकोक्तप्रकारेण कुतः सुखं भवेत् ? कदाचित्किञ्चित् , सर्वदा दुःखमे-ट
चेति भावः, किमित्येवं ?, यतः 'तत्र' रूपानुरागे 'उपभोगेऽपि' उपभोगावस्थायामपि 'क्लेशदुःखम्' अतृप्तलाभतालक्षणवाधाजनितमसातम् , उपभोगमेव विशिनष्टि-निवर्त्तयति' उत्पादयति यस्य-इत्युपभोगस्य कृते यदर्थ 'ण' १ आलोक एव सा तेन प्रियतमा स्नेहनिर्भरमनसा आभाषितेव अवगूहितेब रमितेव पीतेव ॥ १ ॥
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दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [--1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक [२२-९९]
उत्तराध्य. दि इति वाक्यालङ्कारे 'दुःखं' कृच्छ्रमात्मन इति गम्यते, उपभोगार्थ हि जन्तुः क्लिश्यति-तत्र सुखं स्वादिति, यदा चप्रमादस्थाबृहद्वृत्तिः द तदाऽपि दुःखं तदा कुतोऽन्यदा सुखसम्भवः ? इति भावः । इत्थं रागस्थानर्थहेतुतामभिधाय द्वेषस्यापि तामतिदे-12
ना० ३२ टुमाह-'एवमेव' यथाऽनुरक्तस्तथैव रूपे गतः प्रदोष-द्वेषम् 'उपैति' प्राप्नोति इहैवेति शेषः 'दुःखौघपरम्पराः' उत्तरो॥३३॥ त्तरदुःखसमूहरूपाः, तथा प्रदुष्ट-प्रकर्षण द्विष्टं चित्तं यस्य तथाविधः, चस्य भिन्नक्रमत्वात् 'चिनोति वा' बनाति
कर्म, तत् शुभमपि संभवत्यत आह-यत् 'सें' तस्य पुनर्भवति 'दुःखं दुःखहेतुः 'विपाके' अनुभवकाले इह परत्र चेति भावः, पुनर्ग्रहणमैहिकदुःखापेक्षम् , अशुभकर्मोपचयश्च हिंसाद्याश्रयाविनाभावीति तद्धेतुत्वमनेनाक्षिप्यते । इत्थं रे रागद्वेषयोरुबरणाहतां ख्यापयितुं तदनुद्धरणे दोषमभिधाय तदुद्धरणे गुणमाह-रूपे विरक्त उपलक्षणत्वादद्विष्टश्च 'मनुजः' मनुष्यः 'विशोकः' शोकरहितः संस्तन्निबन्धनयो रागद्वेषयोरभावात् 'एतेन' अनन्तरमुपदर्शितेन 'दुक्खो-र हपरंपरेण ति दुःखानाम्-असातानामोघाः-सङ्घातास्तेषां परम्परा-सन्ततिर्दुःखौघपरम्परा तया 'न लिप्यते' न स्पृश्यते भवमध्येऽपि 'सन्' भवन् , संसारवयंपीत्यर्थः, दृष्टान्तमाह-जलेनेव पाशब्दस्योपमार्थत्वात् 'पुष्करिणीपलासं' पमिनीपत्रं जलमध्येऽपि सदिति शेषः । १३ ॥ ३४ ॥ इत्थं चक्षुराश्रित्य त्रयोदश सूत्राणि व्याख्यातानि, ६३३।। एतदनुसारेणैव शेषेन्द्रियाणां मनसश्च सविषयप्रवृत्ती रागद्वेषानुद्धरणदोषाभिधायकानि प्रयोदश सूत्राणि व्याख्येयानि, नवरं 'श्रोत्रस्खेति श्रोत्रेन्द्रियस्य शब्द्यत इति शब्दो-ध्वनिस्तं 'मनोज' काकलीगीतादि 'अमनोज' खरकर्क
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दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [--1 / गाथा ||२२-९९|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक
[२२
-९९]
शादि, तथा हरिणमियच मुद्धेति, मृगः सर्वोऽपि पशुरुच्यते, यदुक्तम्-"मृगशीर्षे हस्तिजाती, मृगः पशुकरायोः" दि इति, हरिणस्तु कुरङ्ग एवेति तेन विशेष्यते, हरिणश्वासी मृगश्च हरिणमृगः 'मुग्धः' अनभिज्ञः सन् 'शब्द' गौरिगीप्रतात्मकेऽतृसः तदाकृष्टचित्ततया तत्रातृप्तिमान् । 'माणस्य' इति घाणेन्द्रियस्य गन्ध्यते-चायत इति गन्धस्तं 'मनो|' सुरभिम् 'अमनोजम्' असुरभि, तथौषधयो-नागदमन्यादिकास्तासां गन्धस्तत्र गृद्धो-गृद्धिमानौषधिगन्धगृद्धः | सन् 'सप्पविलाओ विव'त्ति इयशब्दस्य भिन्नक्रमत्वात्सर्प इव बिलान्निष्क्रमन् , स खत्यन्तप्रि(तप्रियतया तगन्धं सोढुमशक्नुवन् बिलान्निष्कामति ३ । 'जिह्वायाः' 'जिह्वेन्द्रियस्य रयते-आखाद्यत इति रसस्तं 'मनोज' मधुरादि। 'अमनोज कटुकादि तथा बडिश-प्रान्तन्यस्तामिषो लोहकीलकस्तेन विभिन्नकायो-विदारितशरीरो बडिशवि|भिन्नकायः 'मत्स्यः' मीनो यथाऽऽमिषस्य-मांसादेर्भोगः-अभ्यवहारस्तत्र गृद्ध आमिषभोगग्रद्धः ४ । काय इह-13 स्पर्शनेद्रियं, सर्वशरीरगतत्वख्यापनार्थ चास्यैवमुक्तं, तस्य स्पृश्यत इति स्पर्शस्त 'मनोज' मृदुप्रभृति 'अमनोझ'कर्कशादि शीतं-शीतस्पर्शवजलं-पानीयं तत्रावसन्न:-अवमनः शीतजलावसन्नो ग्राहैः-जलचरविशेषैगृहीत:-क्रोडीकृतो ग्राहगृहीतो महिप इवारण्ये, वसति हि कदाचित्केनचिदुन्मोच्येतापीत्यरण्यग्रहणम् ५। 'मनसः' चेतसो भाव:-अभिप्रायः स चेह स्मृतिगोचरस्तं 'ग्रहणं' ग्राह्यं वदन्तीन्द्रियाविषयत्यात्तस्य, 'मनोज' मनोजरूपादिविषयम् 'अमनोज' तद्विपरीतविषयम् , एवमुत्तरग्रन्थोऽपि भावविषयरूपाद्यपेक्षया व्याख्येयः, यद्वा खप्नकामदशादिषु
दीप अनुक्रम [१२६८-१३४५]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१००|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रमादस्था
ना०३२
प्रत सूत्रांक [१००]
उत्तराध्य. भावोपस्थापितो रूपादिरपि भाव उक्तः, स मनसो ग्रायः, खमकामदशादिपु हिमनस एव केवलस्य व्यापार इति,
कामगुणेषु' मनोज्ञरूपादिषु 'गृद्धः आसक्तः 'करेणुमग्गावहिए वणागे' इति इवार्थस्य चस्य भिन्नक्रमत्वात् करेण्वाबृहद्वृत्तिः
करिण्या मार्गेण-निजपधेनापहृतः-आकृष्टः करेणुमार्गापहृतः 'नाग इव' हस्तीव, स हि मदान्धोऽप्यदूरवर्तिनीकरे॥६३४॥
eणुमुपदर्य तद्रूपादिमोहितस्तन्मार्गानुगामितया च गृखते सङ्घामादिषु च प्रवेश्यते तथा च विनाशमाप्नोतीति
दृष्टान्तत्वेनोक्तः, आह-एवं चक्षुरादीन्द्रिययशादेव गजस्य प्रवृत्तिरिति कथमस्यात्र दृष्टान्तत्वेनाभिधानम् ?, उच्यते, एवमेतत् , मनःप्राधान्यविवक्षया वेतन्नेयं, यदिवा तथाविधकामदशायां चक्षुरादीन्द्रियव्यापाराभावे मनसः प्रवृतिरिति न दोषः, इह चानानुपूर्यपि निर्देशाङ्गमितीन्द्रियाणामित्थमुपन्यास इत्यष्टसप्ततिसूत्रावयवार्थः ॥ उक्तमेवार्थ है सझेपत उपसंहारव्याजेनाह
एविंदियत्था य मणस्स अस्था, दुक्खस्स हे मणुवस्स रागिणो।
ते चेव थेबंपि कयाइ दुक्खं, न बीयरागरस करिति किंचि ॥१०॥ है "एवम्' उक्तन्यायेन 'इन्द्रियार्थाः' चक्षुरादिविषया रूपादयः चशब्दो भिन्नक्रमस्ततो मनसोऽर्थाश्च-उक्तरूपा उप-
लक्षणत्वादिन्द्रियमनांसि च दुःखस्य 'हे'त्ति हेतयो मनुजस्य रागिणः, उपलक्षणत्वाद् द्वेषिणश्च, विपर्यये गुणमाह'ते चेय' इन्द्रियमनोऽर्थाः 'स्तोकमपि' खल्पमपि कदाचिद् दुःखं 'न' नैव वीतरागस्य उपलक्षणत्वाहीतद्वेषस्य
दीप अनुक्रम [१३४६]
॥६३४॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१०१|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१०१]
कुर्वन्ति 'किञ्चिदिति शारीरं मानसं चेति सूत्रार्थः ॥ ननु कश्चन कामभोगेषु सत्सु (न) वीतरागः संभवति, तत्कथमस्य दुःखाभावः १, उच्यते
न कामभोगा समयं उविति, न यावि भोगा विगई उविति ।
जे तप्पओसी य परिग्गही य, सो तेसु मोहा विगई उवेद ॥१०१॥ 'न' नैव 'कामभोगाः' उक्तरूपाः 'समतां' रागद्वेषाभावरूपाम् 'उपयान्ति' उपगच्छन्ति हेतुत्येनेति गम्यते, दात तुत्वे हि तेषां न कश्चिद्रागद्वेषवान् भवेत् , न चापि 'भोगाः' भुज्यमानतया सामान्येन शब्दादयः 'विकृति
क्रोधादिरूपाम् , इहापि हेतुत्वेनोपयन्तीत्यन्यथा न कश्चन रागद्वेषरहितः स्यात्, कोऽनयोस्तर्हि हेतुः इत्याह-यः 'तत्प्रदोषी च तेषु-विषयेषु प्रद्वेषवान् 'परिग्रही च' परिग्रहबुद्धिमान् , तेष्वेव रागीत्युक्तं भवति, स तेषु' विषयेषु 'मोहात्' रागद्वेषात्मकात् मोहनीयात् विकृतिमुपैति, रागद्वेषरहितस्तु समतामित्सर्थादुक्तम् , उक्तं हि पूर्व'सतोखे रागद्वेषयोरुदीरकत्वेन शब्दादयो हेतव' इति, आह-"समो य जो तेसु स वीयरागो" इत्यनेन गतार्थ|मेतत् , सत्सं, तस्यैव त्वयं प्रपञ्चः, उक्तं हि त एव विधयः सुसंगृहीता भवन्ति येषां लक्षणं प्रपञ्चथोच्यते' इति सत्रार्थः ॥ किंखरूपाः पुनरसौ विकृतियों रागद्वेषवशादुपैतीसाह
दीप अनुक्रम [१३४७]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [--] / गाथा ||१०२-१०३|| नियुक्ति : [५२६...]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [१०२-१०३]
कोहं चमाणंच तहेवमायं, लोभंदुगुंछ अरईरइंचाहासं भयं सोगपुमिथिवेयं, नपुंसवेयं विविहे यभावे॥१०२॥प्रमादस्थाआवजई एवमणेगरूचे,एवंविहे कामगुणेसु सत्तो। अन्ने य एयप्पभवे विसेसे,कारुपणदीणे हिरिमे बइस्सो॥१०॥
काना क्रोधं च मानं च तथैव मायां लोभ-चतुष्टयमप्युक्तरूपं 'जुगुप्सा' चिकित्साम् 'अरति' अस्वास्थ्यं रतिं च' | विषयासक्तिरूपां 'हासं च वऋविकाशलक्षणं 'भयं' साध्वसं शोकपुंखीवेदमिति समाहारनिर्देशः ततः शोक-18 प्रियविप्रयोगजं मनोदुःखात्मकं पुंवेद-स्त्रीविषयाभिलाषं स्त्रीवेद-पुरुषाभिष्वङ्गं 'नपुंसकवेयंति नपुंसकवेदम्-18 उभयाभिलाषं 'विविधांश्च' नानाविधान् 'भावान्' हर्पविषादादीनभिप्रायान् 'आपद्यते' प्राप्नोति, 'एवम्' अमुना रागद्वेषवत्तालक्षणेन प्रकारेण 'अनेकरूपान्' बहुभेदाननन्तानुबन्ध्यादिभेदेन तारतम्यभेदेन च एवंविधान्' उक्तप्रकारान् विकारानिति गम्यते 'कामगुणेषु' शब्दादिषु 'सक्तः' अभिष्वङ्गवान् उपलक्षणत्वाद् द्विष्टश्च, अन्यांश्च 'एतत्प्रभवान्' क्रोधादिजनितान् 'विशेषान्' परितापदुर्गतिपातादीन् , कीरशः सन् ! इत्याह-कारुण्यास्पदीभूतो दीनः कारुण्यदीनो मध्यपदलोपी समासोऽत्यन्तदीन इत्यर्थः, 'हिरिमे'त्ति 'हीमान्' लज्जावान्, कोपाधापन्नो हि प्रीतिविनाशादिकमिहैवानुभवन् परत्र च तद्विपाकमतिकटुकं विभावयन् प्रायोऽतिदैन्यं लजां च भजते, तथा ६३५॥ 'वहस्स'त्ति आर्षत्वात् 'द्वेष्यः' तत्तदोषदुष्टत्वात्सर्वस्याप्रीतिभाजनमिति सूत्रद्वयार्थः । यतश्चैवं रागद्वेषावेव दुःखमू-12 लमतः प्रकारान्तरेणापि तयोरुद्धरणोपायाभिधानार्थं तद्विपर्यये दोपदर्शनार्थ चेदमाह
दीप अनुक्रम [१३४८-१३४९]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१०४|| नियुक्ति: [५२६...]
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प्रत सूत्रांक [१०४]
कप्पं न इच्छिज्ज सहायलिच्छ, पच्छाणुतावेण तवप्पभावं।
एवं विकारे अमियप्पयारे, आवजई इंदियचोरवस्से ॥ १०४॥ कल्पते-स्वाध्यायादिक्रियासु समर्थों भवतीति कल्पो-योग्यस्तम् , अपेर्गम्यमानत्वात्कल्पमपि, किं पुनरकल्पं ?, शिष्यादीति गम्यते, 'नेच्छेत्' नाभिलषेत् 'सहायलिच्छू'त्ति विन्दोरलाक्षणिकत्वात् 'सहाये (य) लिप्सुः' ममासौ शरीरसंबाधनादि साहाय्यं करिष्यतीत्यभिलाषुकः सन् , तथा पश्चादिति-प्रस्तावातस्य तपसो वाजीकारादुत्तरका-12 लमनुतापः-किमेतावन्मया कष्टमङ्गीकृतमिति चित्तवाधात्मको यस्य स तथाविधः चशब्दादन्याशश्च सम्भूतयतिवद् |भवान्तरे भोगस्पृहयालुः, तपःप्रभावं प्रक्रमानेच्छेदू, यथा-न शक्यमशीकृतं त्यक्तुं परं यद्यस्य प्रतस्य तपसो वा
फलमस्ति तत एतस्मादिहवामोषध्यादिलब्धिरस्तु, तदन्याशापेक्षया तु भवान्तरे शकचक्रिविभूत्यादि भूयादिति, ६ किमेव निषिध्यते ? इत्याह-एवम्' अमुना प्रकारेण 'विकारान्' दोषान् 'अमितप्रकारान्' अपरिमितभेदान् 'आप-2
यते' प्रामोति इन्द्रियाणि चौरा इव धर्मसर्वखापहरणाद् इन्द्रियचौरास्तदश्यः-तदायत्तः, उक्तविशेषणविशिष्टस्य हि कल्प्यतपःप्रभावबान्छारूपेण स्पर्शनादीन्द्रियवश्यताऽवश्यसंभाविनी ततश्चोत्तरोत्तरविशेषानभिलषतः संयम
प्रति चित्तविप्नुत्सवधावनादिदोषा अपि संभवन्त्येवेति, एवं च अवतोऽयमाशयः तदनुग्रहबुद्ध्या कल्पं पुष्टालदम्पने च तपःप्रभावं च वाञ्छतोऽपि न दोपः, अथवा कल्पमुक्तरूपं नेच्छेत्सहायलिप्सुं यदि कथञ्चनामी मम धर्म
दीप अनुक्रम [१३५०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१०४|| नियुक्ति: [५२६...]
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प्रत सूत्रांक [१०४]
उत्तराध्या
सहाया भवन्तीत्येवमभिलापुकमप्यास्तामन्यमिति भावः, जिनकल्पिकापेक्षं चैतत् , एतेन च रागस्य हेतुद्वयपरि- काप्रमादस्था
|हरणमुद्धरणोपाय उक्तः, उपलक्षणं चैतदीरशामन्येषामपि रागहेतूनां च परिहारस्य, ततः सिद्धं द्वयोरप्युद्धरणोपा-II बृहद्भुत्तिः
ना० ३२ यानां तद्विपर्यये च दोषाणामभिसन्धानमिति सूत्रार्थः ॥ अनन्तरं रागद्वेषोद्धरणोपायविपर्यये यो दोष उक्तस्तमेव दोपान्तरहेतुताऽभिधानद्वारेण समर्थयितुमाह
तओसि जायंति पओअणाई, निमजि मोहमहन्नवंमि ।
सुहेसिणो दुक्खविणोय [मुक्ख] गट्ठा, तप्पच्चयं उज्जमए अरागी ॥ १५ ॥ 'ततः' इति विकारापत्तेरनन्तरं 'से' तस्य 'जायन्ते' उत्पद्यन्ते 'प्रयोजनानि' विषयसेवनप्राणिहिंसादीनि 'निमजितु'मित्यन्त वितण्यर्थत्वान्निमजयितुमिव निमज्जयितुं प्रक्रमातमेव जन्तुं मोहो महार्णव इवातिदुस्तरतया मोहमहार्णवस्तस्मिन्, किमुक्तं भवति ?-यैर्मोहमहार्णवनिमग्न इव जन्तुः क्रियते स बुत्पन्नविकारतया मूढ एवासीत् | विषयासेवनादिभिश्च प्रयोजनैः सुतरां मुघतीति, कीदृशस्य पुनरस्य किमर्थं चैवंविधप्रयोजनानि जायन्ते ? इत्साह
'सुखैषिणः' सुखाभिलषणशीलस्य 'दुःखविनोदार्थ' दुःखपरिहारार्थं पाठान्तरतो दुःखविमोचनाय वा, सुखैपितायां साहि दुःखपरिहाराय विषयसेवनादिप्रयोजनसम्भव इति भावः, कदाचिदेवंविधप्रयोजनोत्पत्तावपि तत्रायमुदासीदान एव स्याद् ?, अत्रोच्यते-'तत्प्रत्ययम्' उक्तरूपप्रयोजननिमित्तं पाठान्तरतस्तत्प्रत्ययादुद्यच्छति चशब्दस्यैवकारार्थ
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दीप अनुक्रम [१३५०]
॥६३६॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१०५|| नियुक्ति : [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१०५]]
त्यादुधपछत्येव, कोऽर्थः ?-तत्प्रवृत्तावुत्सहत एव, 'रागी' रागवानुपलक्षणत्वाद् द्वेषी च सन् , रागद्वेषयोरेव सकलानर्थस्य परम्पराकारणत्वादिति सूत्रार्थः ॥ किमिति रागद्वेषवतः सकलाऽप्यनर्थपरम्परोच्यते ? इत्याशङ्कयाह
विरजमाणस्स य इंदियत्था, सद्दाइया तावइयप्पगारा।
न तस्स सब्वेवि मणुन्नयं वा, निव्वत्तयंती अमणुन्नयं वा ॥१०६॥ विरज्यमानस्येति उपलक्षणत्वादद्विषतश्च 'चः' पुनरर्थे ततो विरज्यमानस्याद्विषतश्च पुनः 'इन्द्रियार्थाः' शब्दालादिकाः पाठान्तरतो वर्णादिका वा तावन्त इति यावन्तो लोके प्रतीताः प्रकाराः खरमधुरादिभेदा येषां ते तावत्प्र-18
काराः, बहुप्रभेदा इत्यर्थः, न तस्य' इति मनुजस्य 'सर्वेऽपि' समस्ता अपि मनोज्ञतां वा 'निर्वर्त्तयन्ति' जनयन्त्यमनोज्ञतां वा [निर्वयन्ति,] किन्तु ?, रागद्वेषवत एव, खरूपेण हि रूपादयो न मनोज्ञताममनोज्ञतां वा कर्तुमात्मनः क्षमाः किन्तु रक्तरपतिपत्रध्यवसायवशा, उच्यते चान्यैरपि-"परिवादकामुकशुनामेकस्यां प्रमदातनी । कुणपं कामिनी भक्ष्यमिति तिस्रो विकल्पनाः॥१॥ ततो वीतरागस्य तन्निर्वर्तन हेत्वभावात्कथममी मनोज्ञतामनोज्ञतां पा निर्वतयेयुः १,तदभावे च कथं विषयसेवनाक्रोशदानादिप्रयोजनोत्पत्तिः इति, पूर्व सति मनोज्ञत्वेऽमनो
ज्ञत्वे च समस्य रूपादीनामकिञ्चित्करत्वमुक्तम् , इह तु मनोज्ञत्वामनोज्ञत्वे अपि तादृशस्य न भवत एवेत्युच्यत: । इति पूर्वस्माद्विशेष इति सूत्रार्थः । तदेवं "जे जे उपाया पडिवज्जियव"त्ति प्रतिज्ञातरागद्वेषयोर्मोहस्य च परस्प-|
दीप
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अनुक्रम [१३५१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०६|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१०६]]
उत्तराध्य.
| रायतनत्वेऽपि रागद्वेषयोरतिदुष्टत्वात्साक्षात् मोहस्य च तदायतनत्वात्तद्वारेणोद्धरणोपायान् प्रतिपत्तव्यान्निरूप्य यदा प्रमादस्था
तु “जे जे अवाया परिवजियव"त्ति(पाठः) तदा रसनिषेवणादीनपायानुक्तन्यायतोऽभिधायोपसंहरनाहबृहदृत्तिः
ना०३२ एवं ससंकप्पविकप्पणासुं, संजाई समयमुवट्टियस्स । ॥३०॥
अत्थे च संकप्पयओ तओ से, पहीयए कामगुणेसु ताहा ।। १०७ ॥ 'एवम्' उक्तप्रकारेण स्वस्य-आत्मनः सङ्कल्पा:-प्रक्रमाद्रागद्वेषमोहरूपाध्यवसायास्तेषां विकल्पना:-सकलदोपमूलत्वादिपरिभावनाः स्वसङ्कल्पविकल्पनास्तासुपस्थितस्य-उद्यतस्येति सम्बन्धः, किमित्याह-संजायते' समुत्पद्यते || है 'समय'ति आपत्वात् 'समता' माध्यस्थ्यमर्थान्-इन्द्रियार्थान् रूपादीश्वस्य भिन्नक्रमत्वात्सङ्कल्पयतश्च-यथा नैवैतेऽपाय
हेतयः किन्तु ! रामादय एवेत्युक्तनीत्या चिन्तयतो यदिवा समता-परस्परमध्यवसायतुल्यता सा चानिवृत्तिबा
दरसम्परायगुणस्थान एव, एतत्प्रतिपत्तृणां हि बहूनामप्येकरूप एवाध्यवसाय इत्यनयैतदुपलक्ष्यते, तथा 'अर्थान् । दाजीवादीन् 'संकल्पयतश्च' शुभध्यानविषयतयाऽध्यवस्यतः 'ततः' इति समतायाः 'से' तस्य जन्तोः [साधोः] 'प्रही-IX |यते' प्रकर्षण हानि याति,काऽसौ ?-'कामगुणेषु' रूपादिषु तृष्णा' अभिलाषो लोभ इतियावत् , समतायां हि द्विवि-/६३७॥ धायामपि प्राप्तायामुत्तरोत्तरगुणस्थानावात्या क्षीयत एव लोभ इति । अथवा 'एवम्' उक्तप्रकारेण 'समकम्' एककालम् 'उपस्थितस्य' उद्यतस्य रागायुद्धरणोपायेष्विति प्रक्रमः, यदिवा 'समयम्' एतदभिधायक सिद्धान्तं प्रतीति शेषः।
दीप अनुक्रम [१३५२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
प्रत सूत्रांक
[१०७]
दीप
अनुक्रम [१३५३]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३२], मूलं [--] / गाथा ||१०७|| निर्युक्ति: [५२६...]
'उपस्थितस्य' तदुक्तार्थानुष्ठानोद्यतस्येत्यर्थः किमित्याह-खसङ्कल्पानाम् - आत्मसम्बन्धिनां रागाद्यध्यवसायानां विकल्पना-विशेषेण छेदनं स्वसङ्कल्पविकल्पना, दृश्यते हि छेदवाच्यपि कल्पशब्दः, यथोक्तम्- "सामर्थ्य वर्णनायां च, छेदने करणे तथा । औपम्ये चाधिवासे च कल्पशब्दं विदुर्बुधाः ॥ १ ॥" ' आसुं'ति 'आशु' शीघ्रं 'संजायते' भवति, पठन्ति च- 'ससंकष्पविकप्पणासो'त्ति, तथा 'अत्थे असंकम्पयतो'ति, तत्र च खस्य - आत्मनः सङ्कल्पः - अध्यवसायस्तस्य विकल्पा- रागादयो भेदास्तेषां नाशः - अभावः स्वसङ्कल्पविकल्पनाशः, तथा को गुणः ? इत्याह- 'अर्थान्' रूपादीन् 'असङ्कल्पयतः' रागादिविषयतयाऽनध्ययस्यतः 'ततः' इति खसङ्कल्पविकल्पनातः स्वसंकल्पविकल्पनाशाद्वा 'से' तस्य प्रहीयते कामगुणेषु तृष्णेति सूत्रार्थः ॥ ततः स कीदृशः सन् किं विधत्ते : इत्याहसो वीयरागो कसव्यकिञ्चो, खवेइ नाणावरणं खणेणं ।
तव जं दरिसणमावरेइ, जं चंतराय पकरेइ कम्मं ॥ १०८ ॥
'सः' इति हीनतृष्णः ‘वीतरागः' विगतरागद्वेषो भवति, तृष्णा हि लोभस्तत्क्षये च क्षीणकषायगुणस्थानावातिरिति तथा कृतसर्वकृत्य इव कृतसर्वकृत्यः प्राप्तप्रायत्वादनेन मुक्तेः 'क्षपयति' क्षयं नयति 'ज्ञानावरणं' वक्ष्यमा णस्वरूपं 'क्षणेन' समयेन तथैव यद् 'दर्शनं' चक्षुर्दर्शनादि 'आवृणोति' स्थगयति दर्शनावरणमित्यर्थः, यथ 'अन्तरायं' दानादिलब्धिविनं प्रकरोति 'कर्म' अन्तरायनामकमित्युक्तं भवति, स हि क्षपितमोहनीयस्तीर्णमहासागर
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-1 / गाथा ||१०८|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१०८]
उत्तराध्य. 15 इव श्रमोपेतो विश्रम्यान्तर्मुहूर्त तड्विचरमसमये निद्राप्रचले देवगत्यादिनामप्रकृतीश्च क्षपयति, चरमसमये च ज्ञानाबृहद्वृत्तिः वरणादित्रयमिति सूत्रार्थः ॥ तत्क्षयाच कं गुणमवानोति ? इत्याह
ना० ३२ सव्वं तओ जाणइ पासई य, अमोहणो होइ निरंतराए। ॥१३॥
अणासवे झाणसमाहिजुत्तो, आउक्खए मुक्खमुवेइ सुद्धे ॥१०९॥ 'सर्व' निरवशेष 'ततः' ज्ञानावरणादिक्षयात् 'जानाति' विशेषरूपतयाऽवगच्छति पश्यति च सामान्यरूपतया | 'चः' समुच्चयार्थः, तत एतेन भेदविषयत्वात्समुच्चयस्य पृथगुपयोगत्वमनयोः सूच्यते, ततश्च यदुक्तं युगपदुपयोगवा-2 दिना-"मणपजवणाणतो णाणस्स य सणस्स य विसेसो । केवलणाणं पुण दंसणन्ति नाणंति य समाणं ॥१॥"ति, तनिराकृतं भवति, तथा च प्रज्ञप्त्यामभिहितम्-"ज समयं जाणंति णो तं समयं पासंति,' तथा केवली णं भंते । इमं रयणप्पमं पुढर्षि आगारेहिं हेऊहिं पमाणेहिं संठाणेहिं परिवारहिं जं समयं जाणइनो तं समयं पासति', हंता गोयमा! केवली ण" मित्यादि, न चात्र केवलिशब्देन छद्मस्थ एव श्रुतकेवल्यादिर्विवक्षित इति वाच्यं, यत इहायसूत्रे |
- ॥६३८॥ ४ १ मनःपर्यायज्ञानान्तः ज्ञानस्य च दर्शनस्य च विशेषः । केवलज्ञानं पुनर्दर्शनमिति ज्ञानमिति च समानम् ॥ १॥ २ यस्मिन्
समये जानन्ति न तस्मिन् समये पश्यन्ति ३ केवली भदन्त ! इमां रत्नप्रभा पृथ्वीमाकारैः प्रमाणहेतुभिः संस्थानः परिवारैः यस्मिन् समये जानाति न तस्मिन् समये पश्यति ? हन्त गौतम ! केवली
दीप अनुक्रम [१३५४]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०९|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१०९]
स्नातक एवं प्रस्तुतः,सच घातिकर्मक्षयादेव भवतीति न तस्य छद्मस्थता संभवेत् , द्वितीयसूत्रे तु परमाणुदर्शनमेव प्रक्रान्तं. तस्य च केवलं विना परमावधेस्ततो वा किञ्चिन्न्यूनस्यैव सम्भवस्तत्र च ती व्यवच्छेदिताविति केवलमेवावशिष्यते, उक्त |च पूज्यैः-"ते दोऽवि विसेसेउं अन्नो छउमत्थकेवली को सो ?। जो पासइ परमाणुं गहणमिहं जस्स होजाहि ॥१॥" न चैवमप्यस्मिन् विशेषयति सूत्रे परवक्तव्यतैवेयमित्युपगन्तुमुचितम् , उक्तं हि-"एवं विसेसियंमिवि परमयमेगं-12 तविओगोत्ति । ण पुण उभओवओगो परवत्चबत्ति का बुद्धी? ॥१॥" इत्यादि कृतं प्रसझेन प्रकृतमुच्यते-तथा
चामोहनः-मोहरहितो भवति, तथा निष्क्रान्तोऽन्तरायो (यात्) निरन्तरायोऽनाप्रवः प्राग्वत्, ध्यान-शुक्लध्यानं दातेन समाधि:-परमखास्थ्यं तेन युक्तः-सहितो ध्यानसमाधियुक्तः आयुष उपलक्षणत्वानामगोत्रवेद्यानां च क्षय आयु:क्षयस्तस्मिन् सति मोक्षम् 'उपैति प्राप्नोति 'शुद्धः' विगतकर्ममल इति सूत्रार्थः ॥ मोक्षगतश्च यादृशो भवति तदाह
सो तस्स सव्वस्स दुहस्स मुक्खो , जं बाहई सययं जंतुमेयं ।
दीहामयविप्पमुको पसत्थो, तो होइ अचंतसुही कयत्थो ॥ ११०॥ 'सः' इति मोक्षप्राप्तो जन्तुः 'तस्मात्' इति जातिजरामरणरूपत्वेन प्रतिपादितात् 'सर्वस्मात्' निरवशेषाद् दुःखात् । ____१ तौ द्वावपि अपोह्य अन्यश्छद्मस्थकेवली कः सः । यः पश्यति परमाणुं ग्रहणमिह यस्य भवेत् ।। १ ॥२ एवं विशेषितेऽपि परमतमेकान्तरोपयोग इति । न पुनरुभयोपयोगः परवक्तव्योति का युद्धिः ॥२॥
दीप अनुक्रम [१३५५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१११|| नियुक्ति: [५२६...]
प्रत सूत्रांक [१११]
उत्तराध्य.
सर्वत्र सुव्यत्ययेन षष्ठी 'मुक्तः पृथगभूतः, यत् कीदगियाह-'यदू'दुःखं 'बाधते' पीडयति 'सततम्' अनवरतं 'जन्तं प्रमादस्थ
प्राणिनम् 'एन' प्रत्यक्षमनुभवोपदर्शनमेतत् , दीर्घाणि यानि स्थितितः प्रक्रमात्कर्माणि तान्यामया इव-रोगा इव बृहद्वृत्तिः विविधवाधाविधायितया दीर्घामयास्तेभ्यो विप्रमुक्तो दीर्घामयविप्रमुक्तः अत एव 'प्रशस्तः' प्रशंसाहः, ततः किमिRAM त्याह-'तो' इति 'ततः दीर्घामयविप्रमोक्षाद् भवति' जायतेऽत्यन्तम्-अतिक्रान्तपर्यन्तं सुख-शर्म तदस्यास्तीत्यस्सन्त-12 सुखी तत एव च 'कृतार्थः कृतसकलकृत्य इति सूत्राथेंः ॥ सकलाध्ययनाथें निगमयितुमाह
अणाइकालप्पभवस्स एसो, सब्वस्स दुक्खस्स पमुक्खमग्गो। वियाहिओ जं समुविच सत्ता, कमेण अचंतसुही भवंति ॥ १११ ॥ त्तिमि ॥
॥पमायहाणं ॥ ३२॥ 'अनादिकालप्रभवस्ख' अनादिकालोत्पन्नस्य 'एषः' अनन्तरोक्तः सर्वस्य दुःखस्य 'प्रमोक्षमार्गः' प्रमोक्षोपायः, |पाठान्तरतश्च संसारचक्रस्य विमोक्षमार्गो, व्याख्यातः, यः कीदृशः? इत्याह-'य' दुःखप्रमोक्षमार्ग 'समुपेत्य' | सम्यक् प्रतिपय 'सत्त्वाः' प्राणिनः 'क्रमेण' उत्तरोत्तरगुणप्रतिपत्तिरूपेणात्यन्तसुखिनो भवन्तीति सूत्रार्थः ॥ इति
॥६३९॥ परिसमाप्ती, ब्रवीमीति पूर्ववत् । अवसितोऽनुगमो, नयाश्च प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविर-IN |चितायां शिष्यहितायां प्रमादस्थानं नाम द्वात्रिंशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ ३२ ॥
दीप अनुक्रम [१३५७]
RRC
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- ३२ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||१११...|| नियुक्ति: [१२७-५३२]
अथ कर्मप्रकृतिरितिनाम त्रयस्त्रिंशत्तममध्ययनम् ।
प्रत सूत्रांक [१११]
व्याख्यातं प्रमादस्थानाख्यं द्वात्रिंशमध्ययनमिदानी प्रयस्त्रिंशमारभ्यते, अस्स चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने प्रमादस्थानान्युक्तानि, तैश्च 'मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः' (तत्त्वा० अ०८ सू०१) इतिवचनात्कर्म बध्यते, तस्य च काः प्रकृतयः ? कियती वा स्थितिः ? इत्यादिसन्देहापनोदायेदमारभ्यते, अस्य च चतुरनुयोगद्वारचर्चा प्राग्वद्यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे कर्मप्रकृतिरिति नाम, अतः कर्मणः प्रकृतेश्च निक्षेपाभिधानायाह नियुक्तिकृत्कम्ममि अ निक्खेवो चउबिहो० ॥ ५२७ ॥ जाणगभवियसरीरे तबइरित्तं च तं भवे दुविहं । कम्मे नोकम्मे या कम्ममि अअणुदओ भणिओ ५२८ नोकम्मदवकम्मं नायवं लेप्पकम्ममाईअं । भावे उदओ भणिओ कम्मटविहस्स नायवो ॥ ५२९ ॥ निक्खेवो पयडीए चउदि०
॥ ५३०॥ जाणगभवियसरीरा तबइरित्ताय सा पुणो दुविहा। कम्मे नोकम्मे या कम्ममिअअणुदओ भणिओ ५३१
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दीप अनुक्रम [१३५७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं - ३३ "कर्मप्रकृति" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||१११...|| नियुक्ति: [५२७-५३२]
उत्तराध्य.
कर्मप्रक
बृहद्वृत्तिः
त्यध्य-२३
॥६४०
प्रत सूत्रांक [१११]
नोकम्मे दवाइं गहणपाउग्गमुक्कगाइं च । भावे उदओ भणिओ मूलपयडि उत्तराणं च ॥ ५३२॥ | कम्मंमीत्यादि गाथाः षट् सुगमाः, नवरं 'कर्मणि' ज्ञानावरणादिके उदयो-विपाकस्तदभावोऽनुदयो भणितः,
" ६ किमुक्तं भवति ?-अनुदयावस्थं कमैय कर्मकार्याकरणात् तद्यतिरिक्तं द्रव्यकर्म, नोकर्मद्रव्यकर्म ज्ञातव्यं लेप्यकर्मादिकम् , आदिशन्दाकाष्ठकर्मादिपरिग्रहः, नोकर्मता चास्य ज्ञानावरणादिकर्माभावरूपत्वात् , द्रव्यकर्मता च द्रव्यस्यप्रतिमादेः क्रियमाणत्वात् , 'भावे' विचार्य प्रक्रमाकर्म 'उदयः' विपाकः 'भणितः' उक्तः, अयं च कस्य सम्बन्धी ज्ञायताम् ? इत्साह-कम्मट्टविहस्स'त्ति प्राग्वदष्टविधकर्मणो ज्ञातव्यो, ज्ञानावरणाद्यष्टविधकर्मोदयावस्थं भावकर्म, तस्यैव कर्मकार्यकरणादिति भावः । प्रकृतिनिक्षेपे कर्मणि-मूलप्रकृत्यादिरूपेऽनुदयस्तयतिरिक्ता द्रव्यप्रकृतिः, नोकआणि द्रव्याणि ग्रहणप्रायोग्यानि यान्यद्यापि तावन्न गृयन्ते ग्रहणयोग्यता चास्ति येषाम् , आपत्वात्सुपो लुक् , तथा मुक्तान्येव मुक्तकानि-यानि कर्मतया परिणमय्य प्रोज्झितानि यथाक्रमं पुरस्कृतपश्चात्कृतपर्यायवाद्, 'भाव'| इति भावे विचार्ये 'उदयः' विपाकः 'भणितः' उक्तः प्रकृतिरिति प्रक्रमः, कासामित्याह-'मूलपगडि उत्तराणं च' त्ति मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीनां चेहैव वक्ष्यमाणानामिति गाथाषट्कार्थः ॥ इत्यवसितो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति P सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तचेदम्
अट्ठ कम्माई वुच्छामि, आणुपुचि जहकर्म । जेहिं बद्धे अयं जीवे, संसारे परिवत्तए ॥१॥
दीप अनुक्रम [१३५७]
SASACXSAX
६४०॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५३२...]
प्रत
'अष्ट' इत्यष्टसङ्खयानि क्रियन्ते- मिथ्यात्वादिहेतुभिर्जीवेनेति कर्माणि 'वक्ष्यामि' प्रतिपादयिष्ये 'आणुपुचिन्ति प्राग्वत्सुब्ब्यत्ययादानुपूळ, इयं च पश्चानुपूर्व्यादिरपि संभवत्यत आह-'यथाक्रम' क्रमानतिक्रमेण पूर्वानुपूर्येतियायत्, । पठन्ति च 'सुणेह में इति प्राग्वत् , यानि कीशीत्याह-'यैः' कर्मभिः 'बद्धः' लिष्टः 'अयमिति प्रतिप्राणिखसंवेद्यो|
जीवः संसारे परिवर्त्ततेऽज्ञतादिविविधपर्यायानुभवनतोऽन्यथा च अन्यथा च भवति परिभ्रमति या पाठान्तरत इति ४ सूत्रार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमाह| नाणसावरणिनं, दसणाचरणं तहा । वेयणिज्ज तहा मोहं, आउकम्मं तहेव य ॥२॥ ___ नामकम्मं च गोयं च, अंतरायं तहेव य । एवमेयाई कम्माई, अद्वेव य समासओ॥३॥
ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम्-अवबोधस्तस्य आत्रियते-सदप्याच्छाद्यतेऽनेन पटेनेव विवसत्प्रकाश इत्यावरणीयं कृत्यल्युटो। बहुल'(पा०३-३-११३)मिति वचनात्करणेऽनीयः, दृश्यतेऽनेनेति दर्शनं-सामान्याववोधस्तदात्रियते वस्तुनि प्रतीहारे-14 दव नृपतिदर्शनमनेनेति दर्शनावरणं, तथा वेद्यते-सुखदुःखतयाऽनुभूयते लिह्यमानमधुलिप्तासिधारायदिति वेदनीयं,
तथा मोहयति जानानमपि मद्यपानवद्विचित्तताजननेनेति मोहस्तम्, आयाति-आगच्छति खकृतकर्मावाप्सनरकादिकुगतेर्निष्क्रमितुमनसोऽप्यात्मनो निगडवत्प्रतिवन्धकतामित्यायुः तदेव कर्म आयुःकर्म तथैव च । नमयतिगत्यादिविविधभावानुभवनं प्रत्यात्मानं प्रवणयति चित्रकर इव करितुरगादिभावं प्रति रेखाकृतिमिति नामकर्म,
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दीप अनुक्रम [१३५८]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||२-३|| नियुक्ति: [५३२...]
बृत्तिः
प्रत सूत्रांक [२-३]
उत्तराध्य. 1४'चः' समुचये, गीयते-शब्द्यते उच्चावचैः शब्दैः कुलालादिव मृद्रव्यमत आत्मेति गोत्रं तच अन्तरा-दातृप्रतिग्राहकयो-1 कर्मप्रकृ
रन्तर्भाण्डागारिकवद्विप्नहेतुतयाऽयते-गच्छतीत्यन्तरायं तथैव च सर्वत्रासदपि कर्मेति संबध्यते, उपसंहारमाह-18
'एवम्' अमुना प्रकारेणैतानि कर्माण्यष्टैव 'तुः' पूरणे 'समासतः' सझेपेण, विस्तरतस्तु यावन्तो जन्तुभेदास्तान्यपि, ॥१४॥ तावन्तीत्यनन्तान्येवेति भावः ॥ अत्र च ज्ञानदर्शनखतत्त्वोऽयमात्मेत्यन्तरमत्त्वात्तयोरादितस्तदावरणोपादानं, समा
नेऽपि च तयोरन्तरत्वे ज्ञानोपयोग एव सर्वलब्धीनामवाप्तिः, यदुक्तम्-"सबाओ लद्धीओ सागारोवओगउत्तस्स"त्ति, अतो ज्ञानस्य प्राधान्यमिति तदावरणस्य प्रथमस्तदनु दर्शनावरणस्य ततः केवलिनोऽप्येकविधवन्धकस्य सातबन्धोऽस्तीति व्यापित्वावेदनीयस्य ततोऽपि प्रायः संसारिणामिष्टानिष्टविषयसम्बन्धात्सुखदुःखे इष्टानिष्टता च रागद्वेपाभ्यां तद्रूपं च प्रायो मोहनीयमिति तस्य ततश्चैतत्प्रकर्षापकर्षभाषित्वादायुर्निबन्धनानां बहारम्भपरिग्रहत्वाल्पारम्भपरिग्रहत्वादीनां तदुद्भवं चायुष्कमिति तस्य तदुदयश्च प्रायो गत्यादिनामोदयाविनाभावीति ततो नाम्नः ततोऽपि च नरकादिनामोदयसहभाव्येव गोत्रकर्मोदय इति गोत्रस्य ततश्चोचनीचभेदभिन्नात्यायो दानादिलब्धिमा
वाभावी तयोश्चान्तरायक्षयोदयावन्तरङ्गहेतू इति तदनन्तरमन्तरायस्येति सूत्रद्वयार्थः । इत्थं कर्मणो मूलप्रकृतीर- D६४१॥ दभिधायोत्तरप्रकृतीराह
नाणावरणं पंचविहं, सुअं आभिणियोहियं । ओहिं नाणं तईयं, मणनाणं च केवलं ॥ ४॥ निद्दा तहेव
दीप अनुक्रम [१३५९-१३६०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||४-१५|| नियुक्ति : [५३२...]
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प्रत सूत्रांक [४-१५]
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पथला निहानिहाय पयलपयला य । तत्तो घ थीणगिद्धी पंचमा होइ नायब्वा ॥५॥ चक्खमचक्खओ-II हिस्स दसणे केवले य आवरणे । एवं तु नवविगप्पं नायब्वं दसणावरणं ॥६॥ वेयणियपि हु(य) दुविहं सायमसायं च आहियं । सायस्स उ बहू भेया, एमेवासायस्सवि ॥ ७ ॥ मोहणियंपि य दुविहं, दसणे चरणे
तहा। दसणे तिविहं वुत्तं, चरणे दुविहं भवे ॥८॥ संमत्तं चेव मिच्छत्तं, सम्मामिच्छत्तमेव य । एयाओ ६ तिन्नि पयडीओ, मोहणिजस्स दसणे ॥९॥ चरित्तमोहणं कम्म, दुविहं तु वियाहियं । कसायमोहणिज्जं च, नोकसायं तहेव य ॥ १०॥ सोलसविहभेएण, कम्मं तु कसायर्ज । सत्तविह नवविहं वा, कम्मं नोकसायजं ॥ ११ ॥ नेरइयतिरिक्खाऊ, मणुस्साउं तहेव य । देवाऊयं चउत्थं तु, आउकम्मं चउब्विहं ॥१२॥ नामकम्मं दुविहं, मुहममुहंच आहियं । सुहस्स उ बहू भेया, एमेव य असुहस्सवि ॥१३॥ गोयं कम्म ४ दुविह, उचं नीयं च आहियं । उच्चं अट्ठविहं होइ, एवं नीयपि आहियं ॥ १४ ॥ दाणे लाभे य भोगे य, |उवभोगे पीरिए तहा। पंचविहमन्तराय, समासेण वियाहियं ॥१५॥ हा णाणावरणेत्यादि सूत्राणि द्वादश, ज्ञानावरणं 'पञ्चविधं' पञ्चप्रकारं, तब कथं पञ्चविधमित्याशङ्कायामावार्यभेदादेवेहावरणस्य भेद इत्यभिप्रायेणावार्यस्य ज्ञानस्यैव भेदानाह-श्रुतमाभिनिवोधिकमवधिज्ञानं तृतीयं मनोजानं च केवलम् , एतत्खरूपं मोक्षमार्गाध्ययन एवोक्तम्। निद्राणं निद्रा, सा चेह सुखप्रतिबोधोच्यते, यदुक्तम्-"सुहपडिबोहोणिद्द"त्ति, १सुखप्रतिबोधो निद्रा
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दीप अनुक्रम [१३६१-१३७२०
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||४-१५|| नियुक्ति : [५३२...]
प्रत
सूत्रांक
उत्तराध्य.18'तथैवेति तेनैव निद्रावत्किञ्चिन्छुभरूपतात्मकेन प्रकारेण प्रचलत्यस्थामासीनोऽपीति प्रचला, उक्तं हि-"पयलाकर्मप्रकृ
होति ठियस्स उ"त्ति, 'निद्रानिद्रा च' अतिशयनिद्रा दुःखप्रतिबोधात्मिकाऽतिशयख्यापनार्थत्वाद् द्विरुच्चारणस्य, बृहद्वृत्तिः
त्यध्य.३३ यदुक्तम्-"दुहपडिबोहो य णिहणिद्द"त्ति, एवं 'प्रचलाप्रचला' प्रचलाऽतिशायिनी, सा हि चक्रम्यमाणस्यापि ॥३४॥
भवति, यथोक्तम्-"पैयलापयला उ चंकमओ"त्ति, चशब्दावुभयत्र तुल्यताख्यापको, द्वे अपि बशुभतया तुल्ये एवैते, तत उपरीति शेषस्ततश्च प्रकृष्टतराशुभानुभावतया ताभ्य उपरिवर्तिनी स्त्याना संहतोपचितेत्यर्थः ऋद्धिद्धिा यस्यां सा स्त्यानद्धिः स्त्यानगृद्धि, प्राच्यश्चः समुच्चयार्थ इह योज्यते, एतदुदये च वासुदेववलार्द्धबलः प्रबलरागद्वेषोदयवांश्च जन्तुर्जायते, अत एव परिचिन्तितार्थसाधन्यसाबुच्यते, यदुक्तम्-“थीणद्धी पुण दिण४ चिंतियस्स अत्थस्स साहणी पायं"ति, 'तुः' पूरणे पञ्चमी भवति ज्ञातव्या । 'चक्षुमचक्खूओहिस्स'त्ति मकारोऽ-18 दालाक्षणिकः, ततश्चक्षुश्चाचक्षुश्चावधिश्च चक्षुरचक्षुरवधीति समाहारस्तस्य दर्शन इति च प्रत्येक दर्शनशब्दो योज्यते
ततश्चक्षुर्दर्शने-चक्षुषा रूपसामान्यग्रहणे अचभूषि-चक्षुःसदृशानि शेषेन्द्रियमनांसि तद्दर्शने-तेषां खखविषयसामान्यपरिच्छेदे अवधिदर्शने-अवधिना रूपिद्रव्याणां सामान्यग्रहणे. तथा 'केवले य'त्ति प्रक्रमात्केवलदर्शने-सवेद्रव्यपयोणां सामान्यावबोधे, आवरणमेतचक्षुर्दर्शनादिविषयभेदाचतुर्विधमत आह-'एवम्' इत्यनेन निद्रापञ्चविधत्वच
६४२॥ १प्रचला भवति स्थितस्यैव २ दुःखप्रतिबोधो निद्रानिद्रेति ३ प्रचलाप्रचला तु चंक्रम्य माणस्म ४ स्त्यानदिः पुनर्दिनचिन्तितार्थस्य साधनी प्रायः
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[४-१५]
दीप
अनुक्रम [१३६१-१३७२]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||४-१५|| नियुक्ति: [५३२...]
प्रत सूत्रांक [४-१५]
क्षुर्दर्शनावरणादिचतुर्विधत्वात्मकेन प्रकारेण 'तुः' पूरण नव विकल्पा-भेदा यस्य तत्तथाविधं ज्ञातव्यं दर्शनावरणम् ।। 'वेदनीय' वेदनीयकर्म 'अपि च' इति पूरणे 'द्विविध' विभेदं खाद्यते-आल्हादकत्वेनाखाद्यत इति नैरुक्तविधिना M'सातं' सुखं शारीरं मानसं च इहोपचारात्तनिवन्धनं कर्मैवमुक्तम् , 'असातं च' तद्विपरीतम् 'आख्यातं' कथितं ।
तीर्थकृद्भिरिति गम्यते, 'सायस्स उत्ति 'तुः' अपिशब्दार्थः ततः सातस्यापि बहयो भेदाः, न केवलं ज्ञानदर्शनासावरणयोरित्यपिशब्दार्थः, ते च तद्धेतुभूतभूतानुकम्पादिबहुभेदत्वाद, एवमेवेति बहय एव भेदा असातस्यापि दुःख
शोकतापादितद्धेतुबहुविधत्वादेवेति गर्भार्थः । मोहनीयमपि द्विविध, न केवलं घेदनीयं, विषयतश्चैतविधेति वैवि-है। माध्यमाह-दर्शने' तत्त्वरुचिरूपे 'चरणे' चारित्रे तथा, किमुक्तं भवति ?-दर्शनमोहनीयं चारित्रमोहनीयं च, तत्र || || 'दर्शने' दर्शनविषयं प्रक्रमान्मोहनीयं त्रिविधमुक्तं भवति, 'चरणे' चरणविषयं मोहनीयं द्विविधं भवेत् । यथा दर्श-| | नमोहनीयत्रैविध्यं तथाऽऽह-सम्यग्भावः सम्यक्त्वं-शुद्धदलिकरूपं यदुदयेऽपि तत्त्वरुचिः स्यात् 'चैयेति पूरणे मिथ्याभावः मिथ्यात्वम्-अशुद्धदलिकरूपं यतस्तत्त्वेऽतत्त्वमतत्त्वेऽपि तत्त्वमिति बुद्धिरुत्पद्यते, सम्यग्मिथ्यात्वमेव च-शुद्धाशुद्धदलिकरूपं यत उभयखभावता जन्तोर्भवति, इह च सम्यक्त्वादयो जीवधर्मास्तद्धेतुत्वाच दलिकेष्वेतद्यपदेशः, एतास्तिस्रः प्रकृतयो मोहनीयस्य 'दर्शने' दर्शनविषयस्य ६ । चरित्रे मुबतेऽनेनेति मोहनं चरित्र-|| मोहनं कर्म यतः श्रद्दधानोऽपि यदि कथञ्चनाहमेनं प्रतिपद्य इति जानन्नपि तत्फलादि न तत्प्रतिपद्यते, उत्तरत्र
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अनुक्रम [१३६१-१३७२]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||४-१५|| नियुक्ति : [५३२...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
॥३४॥
प्रत सूत्रांक [४-१५]
तुशब्दस्य भिन्नक्रमत्वात्तत्पुनर्द्विविधं व्याख्यातं श्रुतधरैरिति शेषः, पठन्ति च 'चरित्तमोहणिजं दुविहं वोच्छामि कर्मप्रकअणुपुखसोति स्पष्टमेव, कथं तद् द्विविधमित्याह-कषायाः-क्रोधादयस्तद्रूपेण वेद्यते-अनुभूयते यत्तत्कषायवेदनीयं 'चः समुच्चये 'नोकषायम्' इति प्रस्तावानोकषायवेदनीयं नोकपाया:-कषायसहवर्तिनो हास्यादयस्तद्रूपेण
त्यध्य. ३३ यद्वद्यते 'तथेति समुच्चये । अनयोरपि भेदानाह-पोडशविधः-पोडशप्रकारो यो भेदो-नानात्वं तेन, लक्षणे तृतीया, यद्वा षोडशविधं भेदेन-भिद्यमानतया चिन्त्यमानं, प्राकृतत्वादनुवारलोपः, कर्म क्रियमाणत्वात् 'तुः14 पुनरर्थे भिन्नक्रमश्च, कषायेभ्यो जायत इति कपायज "ज वेयति तं बंधति" इतिवचनात् कषायवेदनीयमित्यर्थः, षोडशविधत्वं चास्य क्रोधमानमायालोभानां चतुर्णामपि प्रत्येकमनन्तानुवन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसंज्वलनभेदतश्चतुर्विधत्वात् 'सत्तविह'त्ति प्राग्वद्विन्दुलोपात्सप्तविध वा कर्म नोकषायेभ्यो जायत इति 'नोकषायज' नोक-12 पायवेदनीयमित्यर्थः, तत्र सप्तविधं हास्यरत्यरतिभयशोकजुगुप्साःपड वेदश्च सामान्यविवक्षयेक एवेति, यदा तु वेदः18 स्त्रीपुंनपुंसकभेदेन त्रिधेति विवक्ष्यते तदा पशिस्त्रयो मीलिता नव भवन्तीति नवविधमिति । 'णेरइयतिरिक्खाउत्ति आयुःशब्दः प्रत्येक योज्यते, ततश्च निष्क्रान्ता अयातु-इष्टफलदैवात्तत्रोत्पन्नानां सवेदनाऽभावेनेति निरयास्तेषु || BINEyan भवा नैरयिकास्तेषामायुः [ग्रन्थानम् १६०००] नैरयिकायुयेन तेषु भियन्ते, तथा तिरोऽञ्चन्तीति-गच्छन्तीति १ यवेदयति तनाति
दीप अनुक्रम [१३६१-१३७२०
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[४-१५]
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अनुक्रम
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-१३७२]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा ||४-१५ || निर्युक्तिः [५३२...]
अध्ययनं [ ३३ ],
तिर्यञ्चः, व्युत्पत्तिनिमित्तं चैतत् प्रवृत्तिनिमित्तं तु तिर्यग्गतिनाम, एते चैकेन्द्रियादयः, तत एषामायुस्तिर्यगायुर्येनेतेषु स्थितिर्भवति, तथा मनोरपत्यानि मनुष्याः 'मनोजतावण्यती सुक्चे 'ति (पा. ४-१-१६१ ) यत्प्रत्ययः सुगागमस्तेषामायुर्मनुष्यायुः 'तथैव' तद्भावावस्थितिहेतुतयैव देवा-उक्तनिरुक्तास्तेषामायुर्देवायुर्येन तेष्ववस्थीयते चतुर्थ 'तुः' पूरणे, एवं चायुः कर्म चतुर्विधम् ९ । नामकर्म द्विविधं कथमित्याह - शोभते सर्वावस्थास्वनेनात्मेति शुभम् अशुभं च तद्विपरीतमाख्यातं 'सुहस्स'त्ति शुभस्यापि बहवो भेदा एवमेवाशुभस्यापि तदपि बहुभेदमिति भावार्थः । तत्रोत्तरोतरभेदतः शुभनाम्नोऽनन्त भेदत्वेऽपि विमध्यमविवक्षातः सप्तत्रिंशद्भेदाः, तद्यथा-मनुष्यगति १ देवगति २ पञ्चेन्द्रि यजाति ३ औदारिक ४ वैक्रिय ५ आहारक ६ तैजस ७ कार्मण ८ शरीराणि पञ्च समचतुरस्रसंस्थानं ९ वर्षभनाराचसंहननम् १० औदारिक ११ वैक्रिय १२ आहारक १३ अङ्गोपाङ्गानि त्रीणि प्रशस्तवर्ण १४ गन्ध १५ रस१६ स्पर्शाश्चत्वारः १७ मनुष्यानुपूर्वी १८ देवानुपूर्वी १९ चेत्यानुपूर्वीद्रयमगुरुलघु २० पराघातम् २१ उच्छास २२ आतप २३ उद्योत २४ प्रशस्तविहायोगति २५ तथा त्रस २६ वादरं २७ पज्जतं २८ प्रत्येकं २९ स्थिरं ३० शुभं ३१ सुभगं ३२ सुखरम् ३३ आदेयं ३४ यशः कीर्त्तिश्चेति ३५ निर्माणं ३६ तीर्थकरनाम चेति ३७, एताश्च सर्वा अपि शुभानुभावात् शुभं तथाऽशुभनाम्नोऽपि विमध्यमविवक्षया चतुस्त्रिंशद्भेदाः, तद्यथा-नरकगति १ तिर्यग्गति २ एकेन्द्रियजाति ३ द्वीन्द्रियजाति ४ श्रीन्द्रियजाति ५ चतुरिन्द्रियजाति ६ ऋषभनाराचं ७ नाराचं
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||४-१५|| नियुक्ति : [५३२...]
प्रत सूत्रांक [४-१५]
उत्तराध्य. 15८ अर्धनाराचं ९ कीलिका १० सेवा ११ न्यग्रोधमण्डलं १२ साति १३ वामनं १४ कुब्ज १५ हुण्डम् १६ कर्मप्रकृ
* अप्रशस्तवर्ण १७ गन्ध १८ रस १९ स्पर्शचतुष्टयं २० नरकानुपूर्वी २१ तिवंगानुपूर्वी २२ उपघातम् २३ अप्रशस्त- त्यध्य.३३ बृहद्वृत्तिः
विहायोगति २४ स्थावरं २५ सूक्ष्मम् २६ साधारणम् २७ अपर्याप्तम् २८ अस्थिरम् २९ अशुभं ३० दुर्भगं ॥४४॥ ३१ दुःस्वरम् ३२ अनादेयं ३३ अयशःकीर्तिश्चेति ३४, एतानि चाशुभनारकत्वादिनिबन्धनत्वेनाशुभानि, अत्र च8
बन्धनसहाते शरीरभ्यो वर्णाद्यवान्तरभेदाश्च वर्णादिभ्यः पृथग्न विवक्ष्यन्त इति नोक्तसङ्ख्यातिक्रमः । गोत्रं कर्म | द्विविधमुबमिक्ष्वाकुजातायुथैर्व्यपदेशनिबन्धनं, नीचं च तद्विपरीतमाख्यातं, तत्रोचमित्युचैर्गोत्रमष्टविघं भवति, 'एवम्' इत्यष्टविधतयैव 'नीचमपि' नीचैर्गोत्रमप्याख्यातम् , अष्टविधत्वं चानयोर्वन्धहेत्वष्टविधत्वात् , अष्टौ हि
जात्यमदादय उच्चैर्गोत्रस्य बन्धहेतवः, तावन्त एव च जातिमदादयो नीचैर्गोत्रस्य, तथा च प्रज्ञापना-"उचागोयकधम्मसरीरपुच्छा, गोयमा ! जाइअमएणं कुलअमएणं बलअमएणं तवअमएणं ईसरियअमएणं सुयअमएणं लाभअ
मएणं उच्चागोयकम्मसरीरपयोग होति, णीयागोयकम्मसरीरपुच्छा, गोयमा ! जाइमएणं कुलमएणं" इत्याद्या- R६४४ा लापकविपर्ययेणाष्टौ यावत् “णीयागोयकम्मसरीरपओगवं हवति"त्ति । दीयत इति दानं तस्मिन् , तथा लभ्यत इति लाभस्तस्मिंश्चं, भुज्यते-सकृदुपयुज्यत इति भोगः-सकृद्रोग्यः पुष्पाहारादिविषयस्तत्र च, तथा उपेति
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अनुक्रम [१३६१-१३७२]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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(४३)
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सूत्रांक
[४-१५]
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[१३६१
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || ४-१५|| निर्युक्तिः [५३२...]
अध्ययनं [ ३३ ],
अभ्यधिकं पुनः पुनरुपभुज्यमानतया भुज्यत इत्युपभोगः-पुनः पुनरुपभोग्यभवनाङ्गनादिविषयः उक्तं हि - "संति भुजइत्ति भोगो सो पुण आहारपुप्फमाईओ । उपभोगो उ पुणो पुण उवभुजद्द व भवणवनियाई ॥ १ ॥” तस्मिन् विशेषेण ईर्य्यते चेष्टयतेऽनेनेति वीर्य तस्मिन्, 'तथा' समुचये सर्वत्रान्तरायमिति प्रक्रमः, ततश्च विषयभेदात्पञ्चवि धमन्तरायं समासेन व्याख्यातं, तत्र दानान्तरायं यत्सति विशिष्टे ग्रहीतरि देये च वस्तुनि तत्फलमवगच्छतोऽपि दाने प्रवृत्तिमुपहन्ति, यत्पुनर्विशिष्टेऽपि दातरि यावन्निपुणेऽपि याचितरि उपलब्धिउपघातकृत् तलाभान्तरायं, भोगान्तरायं तु सति विभवादी सम्पद्यमाने च आहारमात्यादौ यद्वशान्न भुङ्क्ते, उपभोगान्तरायं तु यस्योदयात्सदपि वखाल - ङ्कारादि नोपभुङ्क्ते, वीर्यान्तरायं यद्वशाद्वलवान्नीरुग्ययःस्थः अथ च तृणकुब्जीकरणेऽप्यसमर्थ इति सूत्रद्वादशकार्थः १२ ॥ इत्थं प्रकृतयोऽभिहिताः, सम्प्रत्येतन्निगमनायोत्तरग्रन्थसम्बन्धनाय चाह -
एयाओ मूलपपडीओ, उत्तराओ अ आहिया । पएसग्गं खित्तकाले य, भावं चादुत्तरं सुण ॥ १६ ।। 'एता:' अनन्तरोक्ता ज्ञानावरणादिरूपा मूलप्रकृतयः, तथा 'उत्तराः' इत्युत्तरप्रकृतयश्च श्रुतावरणाद्याः, चशब्दः श्रुतादीनामप्यक्षरानक्षरादिभेदतो बहुविधत्वादनुक्तवहुभेदसूचकः 'आख्याताः कथिताः प्रदेशाः - परमाणवस्तेषामत्रंपरिमाणं प्रदेशाश्रं 'खेत्तकाले य'त्ति क्षेत्रकालौ च तत्र क्षियन्ति-निवसन्ति तस्मिन्निति क्षेत्रम् - आकाशं कालभ१ सकृदू भुज्यते इति भोगः स पुनराहारपुष्पादिः । उपभोगस्तु अनेकशः पुनः पुनरुपभुज्यते वा भवनवनिवादिः ॥ १ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||१६|| _ नियुक्ति: [५३२...]
कर्मप्रकृत्यध्य.३३
प्रत
सत्राक
[१६]
उत्तराध्य.
तबद्धस्स कर्मणो जीवप्रदेशाविचटनात्मकः स्थितिकालः 'भावं च' अनुभागलक्षणं कर्मणः पर्यायं चतुःस्थानिकत्रि-
स्थानिकादिरसमितियावद् 'अतः उत्तर मिति अतः-प्रकृत्यभिधानादूर्ध्वं शृणु कथ्यमानमिति शेष इति सूत्रार्थः। तत्र बृहद्वृत्तिः
सतावत्प्रदेशाग्रमाह॥६४५॥ सब्वेसिं चेव कम्माणं, पएसग्गमणंतगं । गठियसत्ताईयं, अंतो सिद्धाण आहियं ॥१७॥
'सर्वेषां समस्तानां 'चः' पूरणे एवः' अपिशब्दार्थे सर्वेषामपि न तु केपाश्चिदेष 'कर्मणां' ज्ञानावरणादीनां 'प्रदेशाग्रं परमाणुपरिमाणम् अनन्तमेवानन्तकमनन्तपरमाणुनिष्पन्नत्वात्तद्वर्गणानां, तच्चानन्तकं प्रन्धिरिख ग्रन्थिः-घनो रागद्वेषपरिणामस्तं गच्छन्ति प्रन्थिगास्ते च ते सत्त्वाश्च प्रन्थिगसत्त्वाः-ये ग्रन्धिप्रदेशं गत्वाऽपि तद्भेदाविधानेन न कदाचिदुपरिष्टागन्तारः ते चाभव्या एवात्र गृह्यन्ते तानतीत-तेभ्योऽनन्तगुणत्वेनातिकान्तं अधिगसवातीतं, तथा 'अन्तः' मध्ये 'सिद्धानां' सिद्धिपदप्राप्तानाम् 'आख्यातं' कथितं गणधरादिभिरिति गम्यते, सिद्धे
भ्यो हि कर्मपरमाणवोऽनन्तभाग एव, तदपेक्षया सिद्धानामनन्तगुणत्वाद्, अतः सङ्ख्यामपेक्ष्य सिद्धान्तर्वति तदहैनन्तकमुच्यते, एकसमये प्राबकर्मपरमाण्यपेक्षं चैतत् , उक्तं हि-ते य कम्मपोग्गला भवसिद्धिपहिं अनंतगुणा सिद्धाणमणंतभागमित्ता एगेगंमि समए गहणमिति"त्ति, पठन्ति च-गंठि(प)सत्ताऽणाइ'त्ति अत्र व्याख्यानिक
१ ते च कर्मपुद्गला भवसिद्धिकेभ्योऽनन्तगुणाः सिद्धानामनन्तभागमात्रा एकैकस्मिन् समये प्रहणमायान्ति
%
दीप
%
अनुक्रम [१३७३]
६४५॥
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4
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||१७|| _ नियुक्ति: [५३२...]
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प्रत सूत्रांक [१७]]
व्याख्या-प्रन्धिप्रसक्तानां-धनरागद्वेषपरिणामपन्थि कर्कशघनरूढग्रन्धिसमं तथाविधपरिणामाभावतोऽमिन्दानानां सत्त्वानां यो बन्धः सोऽनाद्यनन्तः-आद्यन्तविकलो ज्ञेयः, सिद्धानां पुनः भविष्यत्सिद्धीनां बन्धोऽनादिरपि 'अन्तर इति सान्तस्तथाविधपरिणामतो व्याख्यातो भगवद्भिरिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति क्षेत्रमाह
सब्वजीवाण कम्मं तु, संगहे उद्दिसागयं । सब्वेमुवि पएसेसु, सव्वं सब्वेण बद्धगं ॥१८॥ GI सर्वे-एकेन्द्रियायशेषभेदास्ते च ते जीवाश्च तेषां 'कर्म' ज्ञानावरणादि 'तुः' पुरणे सहः-सङ्घहणक्रिया तत्र
योग्यं भवतीतिशेषः, यदिवा सर्षजीया 'ण'ति वाक्यभूपायां कर्म- 'संगहे'त्ति संगृह्णन्ति, कीरशं सदित्याह-'छद्दिसागयन्ति षण्णां दिशानां समाहारः पदिशं तत्र गतं-स्थितं षड्दिशागतम् , अत्र चतस्रो दिशः पूर्वादय ऊर्दाधोदिगद्वयं चेति षड् भवन्ति, इदं चात्मावष्टब्धाकाशप्रदेशापेक्षयोच्यते, यत्र याकाशे जीवोऽवगाढस्तत्रैव ये कर्म-13 पुद्गलास्ते रागादिस्नेहगुणयोगादात्मनि लगन्ति न क्षेत्रान्तरावगाढाः, भिन्नदेशस्य तद्भावपरिणामाभावात् , यथा । अग्निः खदेशस्थितान् प्रायोग्यपुरलानात्मभावेन परिणमयति एवं जीवोऽपीति, अल्पत्वाचेह विदिशामविवक्षितत्वेन षदिशागतमित्यभिधानं, यतो विदिग्व्यवस्थितमपि कर्मात्मना गृह्यते, उक्तं हि गन्धहस्तिना-"सर्वासु दिवामावधिकासु व्यवस्थितान् पुद्गलानादत्ते” इति, तथा क्षेत्रप्रस्तावे यद्विदिग्निरूपणं तचासामाकाशादभेदज्ञापनार्थ, तद्भेदेन तासामप्रतीतेः, तथा च यत्कैश्चिदिशा द्रव्यान्तरत्वमुक्तं तदपास्तं भवति, तथा पड्दिग्गतमपि वीन्द्रियादीने
दीप
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अनुक्रम [१३७४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||१८|| _ नियुक्ति: [५३२...]
प्रत
सूत्रांक [१८]
उत्तराध्य. वाधिकृत्य नियमेन व्याख्येयमेकेन्द्रियाणामन्यथाऽपि सम्भवात् , तथा चागम:-"जीवे णं भंते ! तेयाकम्मापोग्गलाणं | कर्मप्रकृ
गहणं करेमाणे किं तिदिसिं करेति चउद्दिसिं करेइ पंचदिसि करेइ छद्दिसि करेइ ?, गोयमा ! सिय तिदिसिं सिय चउबृहद्वृत्तिः दाहिसि सिय पंचदिसिं सिय छद्दिसिं करेति, एगिदिया णं भंते ! तेयाकम्मपोग्गलाणं गहणं करेमाणे किं तिदिसि जाय
त्यध्य.३३ ॥६४६॥ हिसिं करेति ?, गोयमा ! सिय तिदिसिं सिय चउहिसिं सिय पंचदिसि सिय छहिसि करेइ, दियतेंदियचउरिदिय
पंचिंदिया नियमा छुद्दिसिं"ति, तच्च पदिग्गतं सर्वेष्वपि न तु कतिपयेषु प्रदेशेष्वपि, अर्थादाकाशस्योक्तन्यायादात्मावष्टब्धेषु कर्म सर्वजीवानां सङ्घहे योग्यं भवति, ते वा तत्संगृहन्ति, तत्स्थकर्मपुद्गलान् प्रत्यात्मनो ग्रहणहेत्ववि
शेषात्, तथा 'सर्व समस्तं ज्ञानावरणादि न त्वन्यतरदेव, आत्मा हि सर्वप्रकृतिप्रायोग्यान् पुद्गलान् सामान्येनापू दाय तानेवाध्यवसायविशेषात् पृथक् पृथग् ज्ञानावरणादिरूपत्येन परिणमयति, तचैवंविधं कर्म संगृहीतं सत् किं है कैश्चिदेवात्मप्रदेशैर्वद्धं भवति यद्वा सर्वेणात्मना ? इत्याह-'सर्वेण' समस्तेन प्रक्रमादात्मना न तु कियद्भिरेव तत्प्र
देशैः बर्दू-क्षीरोदकवदात्मप्रदेशः श्लिष्टं तदेव बद्धकम् , अन्योऽन्यसम्बद्धतया हि शृङ्खलावयवानामिव परस्परोपका६ रित्वादात्मनः प्रदेशानां सहैव योगोपयोगी भवतो, न त्वेकैकशः, तन्निमित्तकश्च कर्मबन्ध इति सोऽपि सर्वेणैवात्मना, ग्रहणपूर्वकत्वाच बन्धस्य तदप्येवमेव, यद्वा तद् गृहीतं सत् केन सह कियत्कथं वा बद्धं भवति? इत्याह
M ॥४६॥ सवेसुवि पएसेसु' सुब्ब्यत्ययात्सर्वैरपि प्रदेशैः प्रक्रमादात्मनः 'सर्व' सर्वप्रकृतिरूपं 'सर्वेण' गम्यमानत्वात्प्रकृतिस्थिहत्यादिना प्रकारेण बद्धकमिति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रति कालमाह
दीप अनुक्रम [१३७५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||१९-२३|| नियुक्ति : [५३२...]
प्रत
सूत्रांक
[१९
-२३]
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बीमारिनामाण, तीसई कोडिकोडीओ । उक्कोसिया होइ ठिई, अंतमुहत्तं जहनिया ॥१९॥ आवरणिजाण दण्डंपि, वेयणिजे तहेव य । अंतराए य कम्ममि, ठिई एसा वियाहिया ॥२०॥ उयहीसरिसनामाणं.!
सत्तर कोडिकोडिओ। मोहणिजस्स उक्कोसा, अंतमुहृत्तं जहनिया ॥ २१॥ तित्तीससागरोषमा, उक्कोसेणं नाविवाहिया। ठिई उ आउकम्मरस, अंतमुहुत्तं जहनिया ॥ २२॥ उदहीसरिसनामाणे, वीसहं कोडिकोडिओ।। ४|नामगोआण उक्कोसा, अंतमुहुत्तं जहनिया ॥ २३ ॥
उदधिः-समुद्रस्तेन सरक-सदृशं नाम-अभिधानमेषामुदधिसदृग्नामानि-सागरोपमाणि तेषां त्रिंशत्कोटीकोव्यः। |'उक्कोसिय'त्ति उत्कृष्टा भवति 'स्थितिः' अवस्थानं, तथा मुहूर्त्तस्यान्तरं अन्तर्मुहूर्त, मुहूर्त्तमपि न्यूनमित्यर्थः, जघन्यैव
जघन्यका प्रक्रमात्स्थितिः । केषामित्याह-'आवरणीययोः' अन्यत्रैतयपदेशाश्रवणाज्ञानदर्शनविषययोः, ततो ज्ञानासावरणीयदर्शनावरणीयोईयोरपि, वेदनीये तथैव च अन्तराये च कर्मणि स्थितिरेवं व्याख्याता, इह च षष्ठीप्रक्रमेऽपि
वेदनीय इत्यादौ सप्तम्यभिधानमनयोरर्थस्य तत्त्वतोऽभिन्नत्वात् , उक्तं हि-"राजा भर्ता मनुष्यस्य, तेन राज्ञः स उच्यते।
वृक्षस्तिष्ठति शाखासु, ता वा तत्रेति तख ताः॥१॥"तथा इति वेदनीयस्यापि जघन्यस्थितिरन्तर्मुहर्तमानव सूत्रकारे४ाणोक्ता, अन्ये तु 'जघन्या(अपरा) द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्येति (तत्त्वा. अ.८सू. १९) द्वादशमुहूर्त्तमानामेवैतामिच्छन्ति,
तदभिप्रायं न विद्मः। उदधिसशनानां सप्ततिकोटीकोट्यो मोहनीस्योयत्कृष्टा अन्तर्मुहूर्त जघन्यका। त्रयस्त्रिंशत्सागरो
दीप अनुक्रम [१३७६-१३८०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३३], मूलं [-] / गाथा ||१९-२३|| नियुक्ति: [५३२...]
प्रत
सूत्रांक
[१९
-२३]
उत्तराध्यापमाणि आर्षत्वाच सुपो लुक, उत्कृष्टेन व्याख्याता स्थितिः 'तुः' पूरणे आयुःकर्मणोऽन्तर्मुहूर्त जघन्यका । उदधिस- कर्मप्रकृ
दशनाम्नां विंशतिकोटीकोव्यो नामगोत्रयोरुत्कृष्टा अष्ट मुहूर्ता जघन्यका इति सूत्रपञ्चकार्थः । इत्यमुत्कृष्टा जघन्या च|| बृहद्वृत्तिः स्थितिमूलप्रकृतिविषया सूत्रकारेणाभिहिता, विनेयानुग्रहार्थ तूत्तरप्रकृतिविषया प्रदर्श्यते-तत्रोत्कृष्टा स्त्रीवेदसातवे
त्यध्य.३३ ॥४७॥ दनीयमनुजगत्यानुपूर्वीणां चतसृणामुत्तरप्रकृतीनां पञ्चदश सागरोपमकोटीकोट्यः, कषायषोडशकस्य चत्वारिंशन्नपुं
सकारतिशोकमयजुगुप्सानां पञ्चानां विंशतिः, पुंवेदेहास्यरंतिदेवगैत्यानुपूर्वीद्वयाद्यसंहननसंस्थानप्रशस्तविहायोगति-12 स्थिरशुभसुभगसुखरादेययशःकीर्युञ्चैोत्राणों पञ्चदशानां दश न्यग्रोधसंस्थान द्वितीयसंहननयोर्द्वादश सातिसंस्थाननाराचसंहननयोश्चतुर्दश कुजार्द्धनाराचयोः पोडश वामनसंस्थानकीलिकासंहननद्वित्रिचतुरिन्द्रियजातिसूक्ष्मापर्यासकसाधारणानामष्टानामष्टादश तिर्यग्मनुष्यायुषोः पल्योपमत्रयं, अवशिष्टानां तु मूलप्रकृतिवदुत्कृष्टा स्थितिः, जघन्या तु निद्रापश्चकासातावेदनीयानां पण्णां सागरोपमससभागास्त्रयः पल्योपमासङ्खयेयभागन्यूनाः सातस्य तु द्वादश मुहूत्तोंः। मिथ्यात्वस्य पल्योपमासमवेयभागोनं सागरोपमं आद्यकपायद्वादशकस्य चत्वारः सागरोपमसप्तभागास्तावतैव न्यूनाः,
क्रोधस्य संज्यलनस्य मासदयं मानस्य मासो मासा मायायाः पुंवेदस्याष्टी वर्षाणि शेषनोकायमनुष्यतियेग्गतिजीति-IMIn६४७॥ दिपञ्चकौदारिकशरीस्तदङ्गोपाङ्गतैजसकर्मिणसंस्थानषट्कसंहननषट्कवर्णचतुष्कँतिर्यग्मनुष्यानुपूर्व्यगुरुलधूपघातपरापोतो.|
छाँसातपोद्योतप्रशस्ताप्रशस्तविहायोगतियतःकीर्तिवर्जवसादिवितिनिर्माणनीचर्गोत्राणां षट्पष्टयुत्तरप्रकृतीनां सा
दीप अनुक्रम [१३७६-१३८०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||२४|| नियुक्ति: [५३२...]
प्रत सूत्रांक [२४]
द
गरोपमसप्तभागी द्वौ पल्योपमासलयेयभागन्यूनौ वैक्रियषट्कस्य सागरोपमसहस्त्रभागौ द्वौ पल्योपमासङ्घधेयभागन्यूनौ | आहारकतदङ्गोपाङ्गतीर्थकरनानामन्तःसागरोपमकोटीकोटी, ननूत्कृष्टाऽपि एतावत्येवासां तिसृणां स्थितिरभिहिता, सत्य, तथापि ततः संङ्खयेयगुणहीनत्वेनास्या जघन्यत्वमिति सम्प्रदायः, कृतं प्रसझेन प्रकृतं प्रस्तुम इति, तत्र यदुक्तं प्रदेशाग्रं क्षेत्रकालौ च भावं चो(चात उ)त्तरं विति तत्र प्रदेशाग्रं क्षेत्रकालौ चाभिहितो, सम्प्रति भावमभिधातुमाह
सिद्धाणणतभागो, अणुभागा हचंति उ । सव्वेसुवि पएसगं, सव्वजीवेसु (स) इच्छियं ॥ २४ ॥ . 'सिद्धानाम्' मुक्तानामनन्तभागवर्तित्वादनन्तभागः 'अनुभागाः' रसविशेषा भवन्ति 'तुः' पूरणे' अयं चानन्त-| भागोऽनन्तसङ्घय एवेति, अनेनैषामानन्त्यमेवेत्थं विशिष्टमुक्त, सम्पत्ति प्रदेशपरिमाणमाह-सर्वेष्वपि प्रक्रमादनुभागेषु प्रदिश्यन्त इति प्रदेशा-बुया विभज्यमानास्तदविभागैकदेशास्तेषामग्रं प्रदेशाग्रं 'सबजीवेसुनिजिझ(इच्छि)य'ति 'सर्वजीवेभ्यः भव्याभव्येभ्योऽतिक्रान्तं ततोऽपि तेषामनन्तगुणत्वेनाधिकत्वादिति सूत्रार्थः ॥ एवं प्रकृतिप्रदर्शमेन प्रकृतिवन्धप्रदेशापाभिधानेन च प्रदेशवन्धं कालोक्त्या च स्थितिवन्धं अनेन चानुभागमभिधाय यदर्थेमेते प्ररूपि-| तास्तदुपदर्शयन्नुपसंहारव्याजेनोपदेष्टुमाहतम्हा एएसि कम्माणं, अणुभागे वियाणिया । एएसि संवरे चेव, खवणे य जए बुहे ॥ २६ ॥ सिमि ॥
॥ कम्मपयडी ॥३३॥
दीप
456154545-25
अनुक्रम [१३८१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: अत्र सूत्रान्ते यत् गाथाक्रमांक ||२६|| दृश्यते तत् मूल संपादकस्य मुद्रणअशुद्धिः, अत्र गाथाक्रम ||२५|| एव वर्तते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३३], मूलं [-1 / गाथा ||२५|| नियुक्ति: [५३३]
वृहदृत्तिः
त्यध्य.३३
प्रत
सत्राक
उत्तराध्या
'तम्हात्ति यस्मादेवंविधाः प्रकृतिबन्धादयस्तस्मात् एतेषाम्' अनन्तरमुक्तानां 'कर्मणां' ज्ञानावरणादीनामनुमा-121 कर्मप्रकृगानुपलक्षणत्वात्प्रकृतिबन्धादींश्च 'विज्ञाय' विशेषेण-कटुकविपाकत्वलक्षणेन भवहेतुत्वलक्षणेन वाऽवबुध्य, अनुभा
गानामेव च साक्षादुपादानमेषामेवाशुभानां प्रायो भवनिर्वेदहेतुत्वात् , 'एषाम्' इति कर्मणां 'संवरे' अनुपात्तानामु॥१४८पादाननिरोधे 'चः' समुचये 'एवे' सवधारणे भिन्नक्रमस्ततः 'क्षपणे च' उपात्तानां निर्जरणे 'जए'त्ति 'यतेतैय' यलं|
कुर्यादेव, कोऽसौ ?-'बुधः' तत्त्वावगमवानिति सूत्रार्थः ॥ अमुमेवार्थमनुवादद्वारेण व्यक्तीकर्तुमाह नियुक्तिकृत्पगइठिई अणुभागं पएसकम्मं च सुटु नाऊणं । एएसिं संवेर खलु खवणे उ सयावि जइअवं ॥५३३॥
स्पष्टैव । 'इति' परिसमाप्तौ ब्रवीमीति पूर्ववत् । इत्यवसितोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां त्रयविंशमध्ययनं समाप्तमिति ॥ ३३॥
[२५]
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दीप
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अनुक्रम [१३८२]
॥६४८॥
इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराटी कर्मप्रकृत्यभिध त्रयस्त्रिंशमध्ययनं ॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अत्र अध्ययन- ३३ परिसमाप्तं
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(४३)
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सूत्रांक
[२५]
दीप
अनुक्रम
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२५...||
अध्ययनं [३४],
निर्युक्ति: [५३४-५४४]
अथ लेश्याख्यं चतुस्त्रिंशमध्ययनम् ।
व्याख्यातं कर्मप्रकृतिनामकं त्रयस्त्रिंशमध्ययनं सम्प्रति चतुस्त्रिंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - अनन्तरा ध्ययने कर्मप्रकृतय उक्ताः, तत्स्थितिश्च लेश्यावशत इत्यतस्तदभिधानार्थमिदमारभ्यते, अस्य चैवमभिसम्बन्धा गतस्योपक्रमादिद्वारप्ररूपणा प्राग्वत्युकरैव यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपः, तत्र चास्य लेश्याऽध्ययनमिति नामातो लेश्याध्ययनशब्दयोर्निक्षेपमाह निर्युक्तिकृत् -
॥ ५३४ ॥
लेसाणं निक्खेवो चउक्कओ दुविह होइ नायवो 10 जाणगभवियसरीरा तबइरित्ता य सा पुणो दुविहा । कम्मा नोकम्मे या नोकम्मे हुंति दुविहा उ ॥ ५३५ ॥ जीवाणमजीवाण य दुविहा जीवाण होइ नायवा । भवमभवसिद्धिआणं दुविहाणवि होइ सत्तविहा ॥ अजीवकम्मनो दवलेसा सा दसविहा उ नायवा । चंद्राण य सूराण य गहगणनक्खत्तताराणं ॥ ५३७॥ | आभरणच्छायणादंसगाण मणिकागिणीण जा लेसा । अजीवदवलेसा नायवा दसविहा एसा ॥ ५३८ ॥ जा दबकम्मलेसा सा नियमा छबिहा उ नायवा । किण्हा नीला काऊ तेऊ पम्हा य सुक्का य ५३९
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - ३४ "लेश्या" आरभ्यते
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२५...|| निर्युक्ति: [५३४-५४४]
अध्ययनं [३४],
उत्तराध्य. 2 दुविहा उ भावलेसा विसुद्धलेसा तहेव अविसुद्धा । दुविहा विसुद्धलेसा उवसमखइआ कसायाणं ॥ अविसुद्धभावलेसा सा दुविहा नियमसो उ नायवा । पिज्जंमि अ दोसंमि अ अहिगारो कम्मलेसाए५४१ बृहद्वृत्तिः नोकम्मदवलेसा पओगसा वीससा उ नायवा । भावे उदओ भणिओ छण्हं लेसाण जीवेसु ॥९४२॥ अज्झयणे निक्खेवो चउक्कओ दुविह होइ नायवो 10 जाणगभवियसरीरं तबइरितं च पोत्थगाईसुं । अज्झप्पस्साणयणं नायवं भावमज्झयणं ॥ ५४४ ॥
॥६४९॥
॥ ५४३ ॥
साणमित्यादि गाथा एकादश, तत्र 'लेसाणं'ति सूत्रत्वाल्लेश्यायां, कोऽर्थः ? – लेश्याशब्दस्य निक्षेपश्चतुर्विधो नामादि, 'दुविहो' इत्यादि प्राग्वद् यावत् 'सा पुणो दुविहति, 'सा' व्यतिरिक्तलेश्या पुनर्द्विविधा, द्वैविध्यमेवाह - कर्मणि नोकर्मणि च तत्र कर्मण्यल्पवक्तव्यैवेति तामुपेक्ष्य नोकर्मविपयामाह-- 'नोकर्मणि' कर्माभावरूपे भवति द्विविधा 'तुः' अवधारणार्थ इति द्विधैव । कथमित्याह -- 'जीवानाम्' उपयोगलक्षणानाम् 'अजीवानां च' तद्विपरीतानाम् उभयत्र लेश्येति प्रक्रमः, अत्र च नोकर्मत्वमुभयोरपि कर्माभावरूपत्वात्सम्बन्धिभेदाच्च द्विभेदत्वं तत्रापि द्विविधा जीवानां भवति ज्ञातव्या, 'भवमभवसिद्धियाणं' ति मस्यालाक्षणिकत्वात् सिद्धिशब्दस्य च प्रत्येकमभिस
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२५...|| निर्युक्ति: [५३४-५४४]
अध्ययनं [३४],
| स्वन्धाद् भविष्यतीति भवा- भाविनीत्यर्थः तारशी सिद्धिर्येषां ते भवसिद्धिका - भव्यास्तेषाम् ' अभवसिद्धिकानां तद्विपरीतानां द्विविधानामप्युक्तभेदेन प्रक्रमाजीवानां भवति 'सप्तविधा' सतप्रकारा इहापि लेश्येति प्रक्रमः, अत्र च जयसिंहसूरिः कृष्णादयः पट् सप्तमी संयोगजा इयं च शरीरच्छायात्मका परिगृह्यते, अन्ये त्वौदारिकौदारिकमि| श्रमित्यादिभेदतः सप्तविधत्वेन जीवशरीरस्य तच्छायामेव कृष्णादिवर्णरूपां नोकर्मणि सप्तविधां जीवद्रव्यलेश्यां मन्यन्ते, तथा 'अजीवकम्मणो दबलेस'त्ति अजीवानां 'कम्मणो'त्ति आर्षत्वान्नो कर्मणि द्रव्यलेश्या अजीवनोकर्मद्रव्यलेश्या, तुशब्दस्येह सम्बन्धात्सा पुनर्दशविधा ज्ञातव्या, चन्द्राणां सूर्याणां च ग्रहा - मङ्गलादयस्तद्गुणश्च नक्षत्राणि च-कृत्तिकादीनि ताराश्च प्रकीर्णज्योतींषि ग्रहगणनक्षत्रतारास्तेषाम्, आभरणानि च - एकावलिप्रभृतीनि आच्छादनानि च सुवर्णचरितादीनि आदर्शा एवादर्शका-दर्पणास्त्रे चाभरणाच्छादनादर्शकास्तेषां तथा मणिश्च-मरकता| दिः काकिणिः - चक्रवर्तिरत्तं मणिकाकिण्यौ तयोर्या लेशयति-श्लेषयतीवात्मनि जननयनानीति लेश्या-अतीव चक्षुराक्षेपिका स्निग्धदीसरूपा छाया अजीवद्रव्यलेश्या प्रक्रमान्नोकर्मणि ज्ञातव्या दशविधैषा, अत्र च चन्द्रादिशब्दैस्तद्विमानानि 'तास्थ्यात्तव्यपदेश' इति न्यायेनोच्यन्ते, तेषां च पृथ्वीकायरूपत्वेऽपि खकायपरकाशस्त्रोपनिपातसम्भवात् तत्प्रदेशानां केषाञ्चिदचेतनत्वेनाजीवद्रव्यलेश्यात्वं द्रष्टव्यम् उपलक्षणं चात्र दशविधत्वमेवंविधद्रव्याणां रजतरूप्यताम्रादीनां बहुतरत्वेन तच्छायाया अपि बहुतरभेदसम्भवात् इत्थं नोकर्मद्रव्यलेश्यामभिधाय कर्मद्रव्य
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-1 / गाथा ||२५...|| नियुक्ति: [५३४-५४४]
उत्तराध्य.
लेश्याध्य
CRESS
बृहद्वृत्तिः
प्रत
॥५०॥
सत्राक
[२५]
लेश्यामाह-या कर्मद्रव्यलेश्याऽग्रेतनतुशब्दसम्बन्धात्सा पुनः 'नियमात्' अवश्यम्भावात् पडिधा 'ज्ञातव्या' अव- बोद्धव्या, कथमित्याह-कृष्णा नीला 'काउ'चि कापोता 'तेउत्ति तैजसी पझा च शुक्ला चेति, इह च कर्मद्रव्यलेश्येति सामान्याभिधानेऽपि शरीरनामकर्मद्रव्याण्येव कर्मद्रव्यलेश्या, यदुक्तं प्रज्ञापनावृत्तिकृता-"योगपरिणामो लेश्या, कथं पुनर्योगपरिणामो लेश्या ?, यस्मात्सयोगिकेवली शुक्ललेश्यापरिणामेन विहत्यान्तर्महः शेषे योगनिरोध करोति, ततोऽयोगित्वमलेश्यत्वं च प्राप्नोति, अतोऽवगम्यते-योगपरिणामो लेश्येति, स पुनर्योगः शरीरनामकर्मपरिआणतिविशेषः, यस्मादुक्तं-“कर्म हि कार्मणस्य कार्यमन्येषां च शरीराणा"मिति, तस्मादौदारिकादिशरीरयुक्तस्यात्मनो वीर्यपरिणतिविशेषः काययोगः, तथौदारिकवैक्रियाहारकशरीरव्यापाराहृतवारद्रव्यसमूहसाचिव्याजीवव्यापारो यः स वाग्योगः, तथैयौदारिकादिशरीरव्यापाराहृतमनोद्रव्यसमूहसाचिव्याज्जीवव्यापारो यः स मनोयोग इति, ततो यथैव कायादिकरणयुक्तस्यात्मनो वीर्यपरिणतियोग उच्यते तथैव लेश्याऽपी"ति गुरवस्तु व्याचक्षते-कर्मनिस्यन्दो लेश्या, यतः कर्मस्थितिहेतवो लेश्याः, यथोक्तम्-"ताः कृष्णनीलकापोततेजसीपद्मशुक्लनामानः । श्लेष इव वर्णवन्धस्य कर्मबन्धस्थितिविधात्र्यः ॥१॥” इति, योगपरिणामत्वे तु लेश्यानां "योगा पयडिपएसं ठिइअणुभाग कसायओ कुणति"त्ति वचनात्प्रकृतिप्रदेशवन्धहेतुत्वमेव स्यात् न तु कर्मस्थितिहेतुत्वं, कर्मनिस्यन्दरूपत्वे तु | यावत्कषायोदयस्तावत्तन्निस्यन्दस्वापि सद्भावात्कर्मस्थितिहेतुत्वमपि युज्यत एव, अत एयोपशान्तक्षीणमोहयोः
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सत्राक
कर्मवन्धसद्भावेऽपि न स्थितिसम्भयो, यदुक्तम्-"तं पढमसमये बद्धं बीयसमये वेइयं ततियसमए निजिण्ण"ति, आह-यदि कर्मनिस्सन्दो लेश्या तदा समुच्छिन्नक्रियं शुक्लध्यानं ध्यायतः कर्मचतुष्टयसद्भावे तन्निस्यन्दसम्भवेन कथं न लेश्यासद्भावः ?, उच्यते, नायं नियमो यदुत निस्सन्दवतो निस्सन्देन सदा भाव्यं, कदाचिन्निस्वन्दवत्स्व पि वस्तुपु तथाविधावस्थायां तदभावदर्शनात् , यच्चोक्तम्-अयोगिनो योगपरिणामाभावे लेश्यापरिणामाभाव इति निश्चिनुमः-योगपरिणाम एव लेश्येति, तदप्यसाधकं, यतो रश्म्यादयः सूर्याद्यभावे न भवन्ति, न च ते तद्रूपा एव, यत उक्तम्-“यच चन्द्रप्रभाधत्र, ज्ञातं तज्ज्ञातमात्रकम् । प्रभा पुद्गलरूपा यत्तद्धर्मों नोपपद्यते ॥१॥" अन्ये त्वाःकार्मणशरीरवत्पृथगेव कर्माष्टकाकर्मवर्गणानिष्पन्नानि कर्मलेश्याद्रव्याणीति, तत्त्वं पुनः केवलिनो विदन्ति । इत्युक्ता द्रव्यलेश्या,भावलेश्यामाह-द्विविधा च भावलेश्या विशुद्धलेश्या'अकलुषद्रव्यसंपर्कजात्मपरिणामरूपा तथैव अविशुद्धा इत्यविशुद्धलेश्या, तत्र द्विविधा विशुद्धलेश्या 'उवसमखइय'त्ति सूत्रत्वादुपशमक्षयजा,केषां पुनरुपशमक्षयी ? यतो जायत इयमित्याह-कषायाणाम् , अयमर्थः-कपायोपशमजा कषायक्षयजा च, एकान्तविशुद्धिं चाऽऽश्रित्यैवमभिधानम् , अन्यथा हि क्षायोपशमिक्यपि शुक्ला तेजःपझे च विशुद्धलेश्ये संभवत एवेति । अविशुद्धभावलेश्या सेति या प्रागुपक्षिप्ता 'द्विविधा' द्विभेदा 'णियमसा उत्ति, आपत्वात् 'नियमेन' अवश्यम्भावेन ज्ञातव्या पेजंमि यत्ति 'दोसंमियत्ति प्रेमणि च-रागे दोषे च द्वये, किमुक्कं भवति?-रागविषया द्वेषविषया च, इयं चात्कृष्णनीलकापोतरूपा,
[२५]
दीप
अनुक्रम [१३८२]
ANASI
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२५]
दीप
अनुक्रम [१३८२ ]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥६५१||
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||२५...|| निर्युक्ति: [५४५]
अध्ययनं [३४],
नं. ३४
तदेवमस्या नामादिभेदतोऽनेकविधत्वे इद्द कथाऽधिकृतमित्याह - अधिकारः कर्मलेश्यया, कोऽर्थः :- कर्मद्रव्य- ५ लेश्याध्यलेश्यया, प्रायस्तस्या एवात्र वर्णादिरूपेण विचारणात् । इत्थं नामादिभेदेन लेश्योक्ता, तत्र च वैचित्र्यात्सूत्रकृतेनॉकर्मद्रव्य लेश्यायां भावलेश्यायां च यत्प्राग् नोक्तं सम्प्रति तदाह- 'नोकर्मद्रव्य लेश्या' शरीराभरणादिच्छाया 'पओगस्स'त्ति प्रयोगः- जीवव्यापारः स च शरीरादिषु तैलाभ्यञ्जनमनःशिलाघर्षणादिस्तेन 'वीससा यत्ति विवसा जीवव्यापार निरपेक्षाऽनेन्द्रधनुरादीनां तथावृत्तिस्तया च ज्ञातव्या, 'भाव' इति भावलेश्या 'उदयः' विपाकः, इद तूपचारादुदयजनितपरिणामो भणितः षण्णां लेश्यानां जीवेषु । 'अज्झयणे' त्यादिगाथाद्वयमध्ययननिक्षेपाभिधायि विनयश्रुत एव व्याख्यातप्रायमिति गाथैकादशकार्थः ॥ सम्प्रत्युपसंहारव्याजेनोपदेशमाह -
एयासिं लेसाणं नाऊण सुहासुहं तु परिणामं । चइऊण अप्पसत्थं पसत्थलेसासु जइअहं ॥ ५४५ ॥
'एतासाम्' अनन्तरमुक्तखरूपाणां लेश्यानां 'ज्ञात्वा' एतदध्ययनानुसारतोऽववुध्य शुभाशुभं 'तुः' पुनरर्थे ततः शुभाशुभं पुनः परिणामं किमित्याह - 'त्यक्त्वा' अपहाय 'अप्पसत्यं'ति 'अप्रशस्ता' अशुभपरिणामा कृष्णादिलेश्या इति योऽर्थः प्रशस्त लेश्यासु - शुभपरिणामरूपासु पीताद्यासु यतितव्यं, यथा ता भवन्ति तथा यतो विधेय इति गाथार्थः ॥ इत्यवसितो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं तचेदम्
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॥६५१॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||१|| नियुक्ति : [५४५...]
प्रत
लेसज्झयणं पवक्खामि, आणुपुचि जहक्कम । छहंपि कम्मलेसाणं, अणुभाचे मुणेहि मे ॥१॥ लेश्याभिधायकमध्ययनं लेश्याऽध्ययनं तत् 'प्रवक्ष्यामि' प्रकर्षण-तासामेव नामवर्णादिनिरूपणात्मकेनाभिधास्ये, आनुपूर्व्या यथाक्रममिति च प्राग्वत् , तत्र च 'षण्णामपि' षट्सङ्खयानामपि वक्ष्यमाणभेदेन 'कर्मलेश्याना' कर्मस्थितिविधातृतत्तद्विशिष्टपुद्गलरूपाणाम् 'अनुभावान्' रसविशेषान् शृणुत मम कथयत इति शेष इति सूत्रार्थः । एतदनुभावाश्च नामादिप्ररूपणातः कथिता एव भवन्तीति तत्प्ररूपणाय विनेयाभिमुखीकरणकारि द्वारसूत्रमाहनामाई वण्णरसगंधफासपरिणामलक्खणं ठाणं । ठिई गई च आउं, लेसाणं तु सुणेह मे ॥२॥ दारगाहा॥ 'नामानि' अभिधानानि वर्णश्च-कृष्णादी रसश्च-तिक्तादिर्गन्धश्च-सुरभ्यादिः स्पर्शश्च-कर्कशादिः परिणामश्चजघन्यादिः लक्षणं च-पञ्चाश्रवासेवनादि, एषां समाहारे वर्णगन्धरसस्पर्शपरिणामलक्षणं तत् , 'स्थानम्' उत्कर्षापकपरूपं स्थितिम्' अवस्थानकालं गतिं च नरकादिकां यतो याऽवाप्यते 'आयुः जीवितं च यावति च तत्रावशिष्यमाणे आगामिभवलेश्यापरिणामस्तदिह गृह्यते, लेश्यानां 'तुः' पूरणे 'सुणेह में ति प्राग्यदिति सूत्रार्थः । अत्र च यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायतो नामान्याह
किण्हा नीला य काऊ य, तेऊ पम्हा तहेच य । सुक्का लेसा य छट्ठा उ, नामाई तु जहक्कम ॥ ३ ॥ किण्हासूत्रं स्पष्टमेव ॥ प्रत्येकमासां वर्णानाह
दीप अनुक्रम [१३८३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४-९|| नियुक्ति: [५४५...]
है यनं.
प्रत सूत्रांक [४-९]
उत्तराध्य. जीमूतनिहसंकासा, गवलरिद्वगसंनिभा । खंजणनयणनिभा, किण्हलेसा उ वण्णओ ॥ ४॥ नीलासो-लेश्याध्य
गसंकासा, चासपिच्छसमप्पभा । वेरुलियनिद्धसंकासा, नील लेसा उ वपणओ ॥५॥ अयसीपुप्फसंकासा, बृहद्वृत्तिः कोइलच्छदसंनिभा । पारेवयगीवनिभा, काउलेसा उ वण्णओ॥ ६॥ हिंगुलुयधाउसंकासा, तरुणाइच्चसं
३४ ॥६५२॥ निभा । सुयतुंडपईवनिभा, तेउलेसा उ वण्णओ ॥७॥ हरियालभेयसंकासा, हलिद्दाभेदसंनिभा । सणा
४ सणकुसुमनिभा, पम्हलेसा उ चण्णओ॥८॥ संखंककुंदसंकासा, खीरधारसमप्पा । रपयहारसंकासा, तसुक्कलेसा उ वण्णओ॥९॥ RI 'जीमूयनिद्धसंकास'त्ति प्राकृतत्वात् स्निग्धश्चासौ सजलत्वेन जीमूतश्च-मेघः स्निग्धजीमूतस्तद्वत्सम्यक् काशते
वर्णतः प्रकाशत इति स्निग्धजीमूतसङ्काशा तत्सरशीतियावत् , तथा गवलं-महिषय रिष्ठो-द्रोणकाकः स एव रिष्ठकः ४ यद्वा रिष्टको नाम फलविशेषस्तत्संनिभा-तच्छाया, 'खंजण'त्ति खञ्जनं-नेहा पक्तश कटाक्षघर्षणोद्भुतमअनं च-कज्जलं||
नयनं-लोचनम् इह चोपचारात्तेदकदेशस्तन्मध्यवती कृष्णसारस्तन्निभा-तत्समा कृष्णलेश्या 'तुः' विशेषणे स च शेपलेश्याभ्यो वर्णकृतं विशेष योतयति, यद्वा 'तुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च ततः 'वर्णत एव' वर्णमेवाथित्य न तु रसा- ५२॥ दीन् , एवमुत्तरत्रापि । नीलश्चासावशोकच-वृक्षविशेषो नीलाशोकस्तत्सङ्काशा, रक्ताशोकव्यवच्छेदार्थ च नीलविशेपणं, चासः-पक्षिविशेषस्त्रस्य पिच्छं-पतत्रं तत्समप्रभा-तत्तुल्यधुतिः, स्निग्धो-दीप्तो वैडूर्यो-मणिविशेषस्तत्सङ्काशा
CARRCESAKACK
दीप अनुक्रम [१३८६-१३९१]
JABERatinintamational
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४-९|| नियुक्ति: [१४५...]
प्रत सूत्रांक
[४-९]
तत्सरशी पदविपर्ययः प्राग्वत् नीललेश्या तु वर्णतो नीलेति तात्पर्यम् । अतसी-धान्यविशेषस्तत्पुष्पसङ्काशा, कोकिलच्छदः-तैलकण्टकः, तथा च वृद्धसम्प्रदायः-“वण्णाहिगारे जो एत्थ कोइलच्छदो सो तेलकंटतो भण्णई"त्ति, कचित्तु पठ्यते च-'कोइलच्छवि'त्ति,तत्र कोकिला-अन्यपुष्टस्तस्य छविस्तत्संनिभा, पारापतः-पक्षिविशेषस्तस्य ग्रीवा-कन्धरा तन्निभा कापोतलेश्या तु वर्णतः, किश्चित्कृष्णा किश्चिच लोहितेति भावः, तथा च प्रज्ञापना-"काऊलेसा काललोहितेण यण्णेणं साहिजइ"त्ति।हिङ्गुलुकः-प्रतीतो धातुः-पाषाणधात्वादिस्तत्सङ्काशा, तरुण इहाभिनयोदितः आदित्यः-- सूर्यस्तत्संनिमा, शुकः-प्रसिद्धस्तस्य तुण्डं-मुखं शुकतुण्डं तच प्रदीपश्च तन्निभावा, पठन्ति च-'सुयतुंडालत्तदीवाभा' अन्ये तु 'मुयतुंडग्गसंकासा' द्वयमपि स्पष्ट, तेजोलेश्या तु वर्णतो रक्तेति भावार्थः । हरितालो-धातुविशेषस्तस्य भेदो |-द्विधाभावस्तत्सकाशा, भिन्नस्य हि वर्णप्रकर्षों भवतीतिभेदग्रहणं, हरिद्रेह पिण्डहरिद्रा तस्या भेदस्तत्संनिभा, सणोधान्यविशेषोऽसनो-बीयकस्तयोः कुसुमं तन्निभा पालेश्या तु वर्णतःपीतेति गर्भार्थः । शङ्ख:-प्रतीतोऽको-मणिविशेषः कुन्दः-कुन्दकुसुमं तत्सङ्काशा, क्षीरं-दुग्धं तूलकं-तूलं पाठान्तरतः पूरो वा-क्षीरप्रवाहः, अन्ये तु 'धारि'त्ति पठन्ति, तद्ब्रहणं तु भाजनस्थस्य हि तदशादन्यथात्वमपि संभवतीति तत्समप्रभा, रजतं-रूप्यं हारो-मुक्ताकलाप-P |स्तत्सङ्काशा शुक्ललेश्या तु वर्णतः शुक्लेति हृदयमिति सूत्रपकार्थः । इत्युक्तो वर्णः सम्प्रति रसमाह
जह कड्डयतुंबरसो निंबरसो कडयरोहिणिरसो वा । इत्तोवि अणंतगुणो रसो उ कण्हाइ नायब्वो ॥१०॥
दीप अनुक्रम [१३८६-१३९१]
ainatorary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||१०-१५|| नियुक्ति: [५४५...]
प्रत
सूत्रांक
-१५]
सत्तराध्य. 18/जह तिकडयस्स य रसो तिक्खो जह हस्थिपिप्पलीए वा । इत्तोचि अणंतगुणो रसो ज नीलाइ नायब्योरालेश्याध्य
द॥११॥ जह तरुणवयरसो तुपरकवित्थस्स वावि जारिसओ । इत्तोवि अर्णतगुणो रसो उ काऊ णायब्चो|| बृहद्वृत्तिः
कायन. ३४ ॥१२॥ जह परिणयंवगरसो पक्ककवित्थस्स वावि जारिसओ। इत्तोवि अणतगुणो रसो उ तेऊइ नायब्बो १३ ।। बरवारुणीह व रसो विविहाण व आसवाण जारिसओ। महुमेरगस्स व रसो इत्तो पम्हाइपरएर्ण ॥१४॥ खज्जरमुदियरसो खीररसो खंडसक्कररसो वा । इत्तो उ अणंतगुणो रसो उ सुक्काइ नायव्वो॥१५॥
'यथेति सादृश्ये ततश्च याक् कटुकतुम्बकस्य रस-आखादः कटुकतुम्बकरसः 'निम्बरसः' प्रतीतः कटुका है। चासौ रोहिणी च-त्यग्विशेषः कटुकरोहिणी कटकवाव्यभिचारित्वेऽपि तद्विशेषणमतिशयख्यापकं तद्रसो वा, IT औषधीविशेषो वा कटुकेह गृह्यते, 'यथेति सर्वत्रापेक्षते, इतोऽपि कटुकतुम्बकरसादेरनन्तेन-अनन्तराशिना गुण-18 नं गुणो यस्यासावनन्तगुणो 'रसस्तु' आखादः 'कृष्णायाः' कृष्णलेश्यायाः 'ज्ञातव्यः' अवबोद्धव्योऽतिकटुक इति | तात्पर्यम् । 'यथा' यादृशः 'त्रिकटुकस्य' प्रसिद्धस्य रसस्तीक्ष्णः-कटुर्यथा 'हस्तिपिप्पल्या वा' गजपिप्पल्या वाऽतोऽप्यनन्तगुणो रसस्तु नीलाया ज्ञातव्योऽतिशयतीक्ष्ण इति हृदयम् । यथा तरुणम्-अपरिपकं तच तदानकं चआम्रफलं तद्रसः, तुवरं-सकषायं पाठान्तरतः, आर्द्रत्वाद् , उभयत्र चार्थादपक्कं तच तत्कपित्थं च-कपित्थफलं तस्य 'बा' विकल्पे 'अपि' पूरणे यादृशको रस इति प्रक्रमः अतोऽप्यनन्तगुणो रसस्तु 'काऊए'त्ति कापोताया ज्ञातव्यो
-MARKARI
दीप अनुक्रम [१३९२-१३९७]
मा॥६५॥
JAMERatunintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||१०-१५|| नियुक्ति : [५४५...]
प्रत
सूत्रांक
१०
|ऽतिशयकषाय इत्याशयः। यथा परिणतं-परिपक्कं यदानकं तद्रसः पक्ककपित्थस्य वाऽपि याशको रसोऽतोऽप्यनन्तगुणो रसस्तु तेऊए'त्ति तेजोलेश्याया ज्ञातव्यः आम्लः किश्चिन्मधुरश्चेत्यैदम्पर्य । वरवारुणी-प्रधानमुरा तस्या वा रसो यारशक इति योगः 'विविधानां वा' नानाप्रकाराणाम् 'आसवानां' पुष्पप्रसवमद्यानां वा यादृशको रस इति सम्बन्धः, 'महुमेरयस्स व रसो'त्ति मधु-मद्यविशेषो मैरेयं-सरकस्तयोः समाहारे मधुमैरेयं तस्य वा रसोयाइशकोऽतो वरवारुण्यादिरसात्पद्मायाः प्रक्रमाद्रसः 'परकेणं'ति अनन्तानन्तगुणत्वात्तदतिक्रमेण वर्तत इति गम्यते, अयं च किश्चिदम्लकषायो माधुर्यवांश्चेति भावनीयं, पाठान्तरतोऽप्यनन्तगुणो रसस्तु पद्माया ज्ञातव्यः । खजूरं च-पिण्डखजूरादि मृबीका च-द्राक्षा एतद्रसः तथा 'क्षीररसः' प्रतीतः खण्डं च-इक्षुविकारः शर्करा च-काशादिप्रभवा तद्रसो वा यादश इति शेषः, अतोऽप्यनन्तगुणो रसस्तु शुक्लाया ज्ञातव्योऽत्यन्तमधुर इति गर्म इति सूत्रषट्कार्थः ॥ उक्तो रसः, सम्प्रति गन्धमाहजह गोमडस्स गंधो सुणगमस्स व जहा अहिमडस्स । इत्तो वि अणंतगुणो लेसाणं अप्पसस्थाणं ॥१६॥ जह सुरहिकुसुमगंधो गंधवासाण पिस्समाणाणं । इत्तोचि अणंतगुणो पसत्थलेसाण तिण्हं पि ॥१७॥
यथा गवां मृतक-मृतकशरीरं तस्य गन्धः श्वमृतकस वा तथा यथाऽहिः-सर्पस्तन्मृतकस्य गन्ध इति सम्बन्धः, सूत्रत्वान्मृतकशब्दे कलोपः 'अतोऽपि' एतत्प्रकारादपि गन्धादनन्तगुणोऽतिदुर्गन्धतया लेश्यानाम् 'अप्रशस्तानाम्'
दीप अनुक्रम [१३९२-१३९७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
༄ཀྐལླཱ ཡྻ
[१३९८
-१३९९]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥ ६५४ ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” – मूलसूत्र - ४ (मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१६-१७|| निर्युक्ति: [५४५...]
अध्ययनं [३४],
अशुभानां, कोऽर्थः ?- कृष्णनीलकापोतानां गन्ध इति प्रक्रमः, इह च लेश्यानामप्रशस्तत्वं गन्धस्याशुभत्वे हेतुरिति तद्विशेषादनुतोऽप्यस्य विशेषोऽवगम्यत इति नोक्तः । यथा सुरभिकुसुमानां-जातिकेतक्यादिसम्बन्धिनां सुगन्धपुष्पाणां गन्धः - परिमलः सुरभिकुसुमगन्धः, तथा गन्धाश्च - कोष्ठपुटपाकनिष्पन्ना बासाश्च - इतरे गन्धवासाः, इह चैतदङ्गान्येवोपचारादेवमुक्तानि तेषां पाठान्तरतश्च गन्धानां च 'विष्यमाणानां' संचूयमानानां यथा गन्ध इति प्रक्रमः, तथा चातिप्रवलतरोऽसौ प्रादुर्भवतीत्येवमभिधानम्, 'अतोऽपि' एतत्प्रकारादपि गन्धाद् अनन्तगुणः अतिशय सुगन्धितया प्रशस्तलेश्यानां 'तिसृणामपि' तैजसीपद्मशुक्लानां गन्ध इति प्रक्रमः, इहापि प्रशस्तत्व विशेषाङ्गन्धविशेषोऽनुमीयत इति नोक इति सूत्रद्वयार्थः ॥ सम्प्रति स्पर्शमाह -
जह करगयस्स फासो गोजिन्भाए व सागपत्ताणं । इत्तोवि अनंतगुणो लेसाणं अप्पसत्थानं ॥ १८ ॥ जह बूरस्सवि फासो नवणीयस्स व सिरीसकुसुमाणं । इतोवि अनंतगुणो पसत्यलेसान तिपि ॥ १९ ॥ यथा 'करगयस्स'ति क्रकचस्य करपत्रस्य स्पर्शी गोर्जिह्वा गोजिहा तस्या वा यथा या शाको वृक्षविशेषस्तत्पत्राणां स्पर्श इति प्रक्रमः, 'अतोऽपि' एतत्प्रकारादपि स्पर्शादनन्तगुणः अत्यतिशायितया यथाक्रमं लेश्यानामप्रशस्तानामाद्यानां तिसृणां प्रक्रमात्स्पर्शोऽतिकर्कश इति हृदयम् । यथा 'बूरस्य वा' प्रतीतस्य स्पर्शः 'नवनीतस्य' प्रक्षणस्य, यथा वा शिरीषो- वृक्षविशेषस्तत्कुसुमानामुभयत्र यथा स्पर्श इति प्रक्रमः, 'अतोऽपि' एतत्प्रकारादपि
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For Patenty
लेश्याध्य
यनं. ३४
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॥६५४॥
g
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||१८-१९|| नियुक्ति: [५४५...]
प्रत
सूत्रांक
-१९]]
स्पर्शाद् 'अनन्तगुणः' अतिसुकुमारतया यथाक्रमं प्रशस्त लेश्यानां 'तिसृणामपि' उक्तरूपाणा स्पर्श इति प्रक्रमः, इह 8 च यदनेकदृष्टान्तोपादानं तन्नानादेशजविनेयानुग्रहार्थ, कचिद्धि किञ्चित्प्रतीतमिति, यद्वा निगदितोदाहरणेषु वर्णादितारतम्यसम्भवाल्लेश्यानां खस्थानेऽपि वर्णादिवैचित्र्यज्ञापनार्थमिति सूत्रद्वयार्थः ॥ परिणामद्वारमाह| तिविहो व नवविहो वा सत्तावीसइविहिक्कसीओ वा । दुसओ तेयालो वा लेसाणं होइ परिणामो २० | त्रिविधो नवविधो वा 'सत्तावीसइविहेक्कसीओ वत्ति विधशब्दो वाशब्दश्चोभयत्र संवध्यते, ततश्च सप्तविंशति
विध एकाशीतिविधो वा 'दुसओ तेआलो वत्ति अत्रापि विधशब्दस्य सम्बन्धात् त्रिचत्वारिंशद्भिशत विधो वा शालेश्यानां भवति परिणाम:-तत्तद्रूपगमनात्मकः, इह च 'त्रिविधः' जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदेन 'नवविधः' यदेषामपि ४ जघन्यादीनां स्वस्थानतारतम्यचिन्तायां प्रत्येकं जघन्यादित्रयेण गुणना एवं पुनखिकगुणनया सप्तविंशतिविधत्व
मेकाशीतिविधत्वं त्रिचत्वारिंशद्विशतबिधत्वं च भावनीयम् । आह-एवं तारतम्यचिन्तायां का सायानियमः,I&II उच्यते, एवमेतत् , उपलक्षणं चैतत् , तथा च प्रज्ञापना-"कण्हलेसाण भंते! कतिविधपरिणाम परिणमति, गोयमा ! तिविहं वा नवविहं वा सत्तावीसइविहं वा एकासीइविहं वावि तेयालदुसयविहं वा बहुं वा बहुविहं वा परिणामं परिणमति, एवं जाव सुक्कलेसा" इति सूत्रार्थः॥ उक्तः परिणामः, सम्पति लक्षणमाह, तत्र चपंचासवप्पमत्तो तीहिं अगुत्तो छसू अविरओ य । तिवारंभपरिणओ खुद्दो साहस्सिओ नरो॥२१॥ निहं
दीप अनुक्रम [१४००
-१४०१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२१
-३२]
दीप
अनुक्रम
[१४०३
-१४१४]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||२१-३२|| निर्युक्ति: [५४५...]
अध्ययनं [३४],
उत्तराध्य.
धसपरिणामो, निस्संसो अजिइंदिओ । एयजोगसमाउत्तो, कण्हलेसं तु परिणमे ||२२|| इस्साअमरिसअतवो, अविज माया अहीरिया । गेही पओसे य सढे, रसलोलुए सायगवेसए य ॥ २३ ॥ आरंभा अविरओ, बृहद्वृत्तिः खुद्द साहस्सिओ नरो । एयजोगसमाउन्तो, नीललेसं तु परिणमे ॥२४॥ बंके वकसमायारे, नियडिल्ले अणु॥६५५॥उजु । पलिउंचग ओवहिए, मिच्छदिट्ठी अणारिए ॥ २५ ॥ उष्फालगदुडबाई प, तेणे अविय मच्छरी ।
एयजोगसमाउन्तो, काउलेसं तु परिणमे ||२६|| नीआवित्ती अचवले, अमाई अकुहले । विणीयविणए दंते, | जोगवं उवहाणवं ॥ २७ ॥ पियधम्मे दृढधम्मे, वज्जभीरू हिएसए । एयजोगसमाउत्तो, तेउलेसं तु परिणमे ॥ २८ ॥ पयणुको हमाणो य, मायालोभे य पयणुए । पसंतचित्ते दंतप्पा, जोगवं उवहाणवं ॥ २९ ॥ तहा य पयणुबाई य, उवसंते जिइंदिए । एयजोगसमाउन्तो, पम्हलेस तु परिणमे ॥ ३० ॥ अट्टहाणि वजित्ता, धम्मसुकाणि साहए। पसंतचिन्ते दंतप्पा, समिए गुत्ते य गुत्तिसु ॥ ३१ ॥ सरागे बीयरागे वा, उवसंते जिदिए । एयजोगसमाउत्तो, सुकलेसं तु परिणमे ॥ ३२ ॥
पञ्चाश्रवा - हिंसादयस्तैः प्रमत्तः प्रमादवान् पञ्चाश्रवप्रमत्तः पाठान्तरतः पञ्चाश्रवप्रवृत्तो वाऽतस्त्रिभिः प्रस्तावान्मनोवाक्कायैः 'अगुप्तः' अनियन्त्रितो मनोगुत्यादिरहित इत्यर्थः तथा 'षट्सु' पृथ्वीकायादिषु 'अविरतः' अनिष्टतस्तदुपमर्दकत्वादेरिति गम्यते, अयं चातीत्रारम्भोऽपि स्यादत आह-तीत्रा — उत्कटाः खरूपतोऽध्यवसायतो
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लेश्याध्य
यनं. ३४
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॥६५५॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||२१-३२|| नियुक्ति: [५४५...]
प्रत
सूत्रांक
-३२]
&ावाssरम्भाः-सावद्यव्यापारास्तत्परिणतः-तत्प्रवृत्त्या तदात्मतां गतः, तथा 'वद्रः' सर्वस्यैवाहितैषी कार्पण्ययुक्तो
वा, सहसा-अपलोच्य गुणदोषान् प्रवर्त्तत इति साहसिकः, चौर्यादिकृदिति योऽर्थः, 'नरः' पुरुष उपलक्षणत्वाल्यादिर्वा 'णिद्धंधस'त्ति अत्यन्तमैहिकामुष्मिकापायशङ्का विकलोऽत्यन्तं जन्तुवाधानपेक्षो वा परिणामोऽध्यवसायो या यस्य स तथा 'णिसंसोति 'नृशंसः' निस्तूंशो जीवान् विहिंसन् मनागपि न शकते, निःशंसो वा-परप्रशंसारहितः । 'अजितेन्द्रियः' अनिगृहीतेन्द्रियः, अन्ये तु पूर्वसूत्रोत्तरार्द्धस्थान इदमधीयते तचेहेति, उपसंहारमाह
एते च तेऽनन्तरोक्ता योगाश्च-मनोवाकायव्यापारा एतद्योगा:-पञ्चाश्रवप्रमत्तत्वादयस्तैः समिति-भृशमाङित्यभिसाव्यात्या युक्तः-अन्वितः एतद्योगसमायुक्तः कृष्णलेश्यां 'तुः' अवधारणे कृष्णलेश्यामेव 'परिणमेत् तद्रव्यसाचिव्येन तथाविधद्रव्यसम्पर्कात्स्फटिकवत्तदुपरञ्जनात्तद्रूपतां भजेत्, उक्तं हि-"कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात्परिणामो य आत्मनः । स्फटिकस्येव तत्रायं, लेश्याशब्दः प्रयुज्यते ॥१॥" एतेन पञ्चाश्रवप्रमत्तत्वादीनां भावकृष्णलेश्यायाः
सद्भावोपदर्शनादमीषां लक्षणत्वमुक्तं, यो हि यत्सद्भाव एव भवति स तस्य लक्षणं यथौष्ण्यममे, एवमुत्तरत्रापि लक्षदणत्वभावना कार्या । नीललेश्यालक्षणमाह-ईर्ष्या च परगुणासहनममर्षश्च-अत्यन्ताभिनिवेशोऽतपश्च-तपोविपर्य
योऽमीषां समाहारनिर्देशः, 'अविज'त्ति 'अविद्या' कुशावरूपा मायावञ्चनात्मिका 'अहीकता च' असमाचार-14 | विषया निर्लजता 'गृद्धिः' अभिकाङ्क्षा विषयेष्विति गम्यते 'प्रदोषश्च' प्रद्वेषो मतुब्लोपादभेदोपचाराद्वा सर्वत्र तद्वान् ।
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दीप अनुक्रम [१४०३-१४१४]
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आगम
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||२१-३२|| नियुक्ति: [५४५...]
(४३)
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प्रत सूत्रांक
-३२]
उत्तराध्य.
जन्तुरुच्यतेऽत एव शठः अलीकभाषणात् प्रमत्तः प्रकर्षेण जात्यादिमदासेवनात् , पाठान्तरतः शठश्च मत्तः, तथा लेश्याध्यबरसेषु लोलुपो-लम्पटो रसलोलुपः, सातं-सुखं तद्वेषकश्च-कथं मम सुखं स्यादिति बुद्धिमान्, 'आरम्भात्
यनं. ३४ पृहाताप्राण्युपमर्दात 'अविरतः' अनिवृत्तः क्षुद्रः साहसिको नरः, एतद्योगसमायुक्तो नीललेश्यां परिणमेत्, 'तुः' प्राग्व-12 ॥६५६॥ त्पुनरर्थो वा ४ । 'वक्रः' वचसा 'वक्रसमाचारः' क्रियया 'निकृतिमान्' मनसा 'अनृजुकः' कथचिजूक मश
क्यतया पलिउंचग'त्ति प्रतिकुश्चकः-खदोषप्रच्छादकतया उपधिः-छद्म तेन चरत्यौपधिकः, सर्वत्र व्याजतः प्रवृत्तेः, एकार्थिकानि वैतानि नानादेशजविनेयानुग्रहायोपात्तानि, मिथ्यारष्टिरनार्यश्च प्राग्वत्, 'उप्फालग'त्ति उत्प्रासकं यथा पर उत्प्रास्यते दुष्टं च रागादिदोषवद्यथा भवत्येवं वदनशील उत्प्रासकदुष्टवादी 'चः' समुच्चये 'स्तेनः। चौरः 'च' प्राग्वत् 'अपि च'इति पूरणे 'मत्सरः' परसम्पदसहनं सति वा वित्ते त्यागाभावः, तथा चाहुः शान्दिकाः"परसम्पदामसहनं वित्तात्यागश्च मत्सरो ज्ञेयः" इति, तद्वान् मत्सरी, एतद्योगसमायुक्तः कापोतलेश्यां 'तुः इति पुनः परिणमेत् ॥ 'णीयावित्ति'त्ति नीतिः -कायमनोवाग्भिरनुत्सितः 'अचपलः' चापलानुपेतः 'अमायी' शाठ्यानन्वितः 'अकुतूहला' कुहकादिष्वकौतुकवानत एव 'विनीतविनयः' सभ्यस्तगुर्याधुचितप्रतिपत्तिः, तथा|॥१५॥ 'दान्तः' इन्द्रियदमेन योगः-खाध्यायादिव्यापारस्तद्वान् , 'उपधानवान्' विहितशास्त्रोपचारः, 'प्रियधर्मा' अभिरुचितधर्मानुष्ठानः 'दृढधर्मा' अङ्गीकृतत्रतादिनिर्वाहकः, किमित्येवम् ?, यतः 'वज'त्ति वज्यं प्राकृतत्वादकारलोपे
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दीप अनुक्रम [१४०३-१४१४]
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[२१
-३२]
दीप
अनुक्रम [१४०३
-१४१४]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||२१-३२||
अध्ययनं [३४],
निर्युक्ति: [५४५...]
अवयं चोभयत्र पापं तद्भीरुः 'हितैषकः' मुक्तिगवेषकः, पाठान्तरतो हिताशयो वा परोपकारचेताः, पठ्यते च'अणासवे 'ति तत्र च न विद्यन्ते आश्रवा - हिंसादयो यस्यासावना श्रवः, एतद्योगसमायुक्तस्तेजोलेश्यां तु परिणमेत् ॥ प्रतनू - अतीवाल्पी क्रोधमानौ यस्य स तथा चः पूरणे, माया लोभव उक्तरूपः प्रतनुको यस्येति शेषः, अत एवं प्रशान्तं - प्रकर्षेणोपशमवचित्तमस्येति प्रशान्तचित्तः, दान्तः - अहितप्रवृत्तिनिवारणतो वशीकृत आत्मा येन स तथा, योगवानुपधानवानिति च प्राग्वत्, तथा 'प्रतनुवादी' खल्पभाषक श्वशब्दो भिन्नक्रमो योक्ष्यते, 'उपशान्तः' अनुद्भटतयोपशान्ताकृतिः 'जितेन्द्रियश्च' वशीकृताक्षः, एतद्योगसमायुक्तः पद्मलेश्यां तु परिणमेत् ॥ 'आर्त्तराद्रे' उक्तरूपे ध्याने 'वर्जयित्वा' परिहत्य 'धर्मशुक्ले' प्रागुक्ते एव शुभध्याने 'साधयेत्' सतताभ्यासतो निष्पादयेत् यः कीदृशः सन् ? इत्याह-प्रशान्तचित्तो दान्तात्मेति च प्राग्वत् पाठान्तरतश्च ध्यायति यो विनीतविनयो दान्तः 'समितः' समितिमान् 'गुप्तश्च' निरुद्धसमस्तव्यापारः 'गुप्तिभिः' मनोगुत्यादिभिः, तृतीयार्थे सप्तमी, स च 'सरागः ' अक्षीणानुपशान्तकपायतया वीतरागो वा ततोऽन्य उपशान्तः पाठान्तरतः 'शुद्धयोगो वा' निर्दोषव्यापारो जितेन्द्रियः प्राग्वत् स एतद्योगसमायुक्तः शुक्ललेश्यां तु परिणमति, इह च शुभलेश्यासु केषाञ्चिद्विशेषणानां पुनरुपादानेऽपि लेश्यान्तरविषयत्वादपौनरुक्तत्यं पूर्वपूर्वापेक्षयोत्तरोत्तरेषां विशुद्धितः प्रकृष्टत्वं च भावनीयं, विशिष्टलेश्या वाऽपेक्ष्यैवं लक्षणाभिधानमिति न देवादिभिर्व्यभिचार आशङ्कनीय इति द्वादशसूत्रार्थः ॥ सम्प्रति स्थानद्वारमाह
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”-मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [३४], मूलं [-1 / गाथा ||३३|| नियुक्ति : [५४५...]
उत्तराध्य.
यनं. ३४
बृहद्वृत्तिः hવરબા
प्रत
सूत्रांक [३३]
अस्संखिजाणोसप्पिणीण उस्सप्पिणीण जे समया । संखाईया लोगा लेसाण हवंति ठाणाई ॥ ३३ ॥ लेश्याध्य'असङ्खधेयानां' सङ्ख्यातीतानाम् अवसर्पन्ति-प्रतिसमयं कालप्रमाणे जन्तूनां वा शरीरायुःप्रमाणादिकमपेक्ष्य । हासमनुभवन्त्यवश्यमित्यवसर्पिण्यो-दशसागरोपमकोटीकोटिपरिमाणास्तासां तथा तत्परिमाणानामेव उत्सर्प|न्ति-उक्तन्यायतो वृद्धिमनुभवन्त्यवश्यमित्युत्सर्पिण्यस्तासां ये 'समयाः' परमनिरुद्धकाललक्षणाः, कियन्त इत्याहसलयातीताः पाठान्तरतोऽसङ्ग्येया या लोका असङ्घयेयलोकप्रमितत्वेन यथा दशप्रस्थप्रमितत्वेन ब्रीहयो दश-14 प्रस्थाः, ततोऽयमर्थः-असङ्खयेयलोकाकाशप्रदेशपरिमाणानि लेश्यानां भवन्ति स्थानानि प्रकर्षापकर्षकृतानि, अशुभानां संक्लेशरूपाणि शुभानां च विशुद्धिरूपाणि तत्परिमाणानीति शेषः, यद्वा असञ्जयोत्सर्पिण्यवसर्पिणीनां ये समया गम्यमानत्वात्तावन्ति लेश्यानां भवन्ति स्थानानीति कालतोऽसङ्गयाता लोका इति च क्षेत्रतः स्थानमान| मेवोक्तमिति सूत्रार्थः । उक्तं स्थानमिदानी स्थितिमाह__ मुहत्तद्धं तु जहन्ना तित्तीसा सागरा मुहुत्तहिया । उक्कोसा होइ ठिई नायब्वा किण्हलेसाए ॥ ३४ ॥ |मुहुसद्धं तु जहन्ना दसउदहिपलियमसंखभागमेन्भहिया । उक्कोसा होइ ठिई नापब्वा नीललेसाए ॥ ३५॥ " मुहुत्तद्धं तु जहन्ना तिण्णुदही पलियमसंखभागमभहिआ। उक्कोसा होइ ठिई नायब्चा काउलेसाए ॥३६॥ मुहुत्तद्धं तु जहन्ना दोण्हुदही पलियमसंखभागमभहिआ। उक्कोसा होइ ठिई नायब्वा तेउलेसाए ॥ ३७ ।।
दीप अनुक्रम [१४१५]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||३४-३९|| नियुक्ति : [५४५...]
+
प्रत
सूत्रांक
[३४
-३९]
मुहत्तद्धं तु जहन्ना दसउदही होइ मुहुत्तममहिआ । उकोसा होइ ठिई नायब्वा पम्हलेसाए ॥ ३८॥ मुलुत्तद्धं तु जहन्ना तित्तीसं सागरा मुहुत्तहिया । उक्कोसा होइ ठिई नायव्वा सुक्कलेसाए ॥ ३९॥ AL मुहूर्तस्याङ्के मुहूर्ताः, तत्कालात्यन्तसंयोगे द्वितीया, इह च समप्रविभागस्थाविवक्षितत्वादन्तर्मुहुर्तमित्युक्तं ।।
भवति, 'तुः' अवधारणे ततो मुहूर्तार्द्धमेव जघन्या 'तेत्तीस'त्ति त्रयस्त्रिंशत् 'सागराईति पदैकदेशेऽपि पदप्रयोगदर्शनात्सागरोपमाणि 'मुहुत्तहिय'त्ति इहोत्तरत्र च मुहूर्त्तशब्देन मुहूत्तैकदेश एवोक्तः, समुदायेपु हि प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते यथा ग्रामो दग्धः पटो दग्ध इति, ततश्चान्तर्मुहूर्त्ताधिकान्युत्कृष्टा भवति स्थितिातव्या कृष्णलेश्यायाः, इह चान्तर्मुहुर्तस्थासङ्ख्यभेदत्वादन्तर्मुहूर्त्तशब्देन पूर्वोत्तरभवसम्बन्ध्यन्तर्मुहूर्तद्वयमुक्तं द्रष्टव्यमेवमुत्तरत्रापि । मुहत्तीर्द्धस्तु जघन्या 'दशे'ति दशससथानि उदधय इत्युक्तन्यायेनोदध्युपमानि कोऽर्थः -सागरोपमाणि |'पलिय'त्ति तथैव पल्योपमं तस्यासङ्ख्यभागस्तेनाधिकानि पल्योपमासपेयभागाधिकान्युत्कृष्टा भवति स्थितिमतव्या नीललेश्यायाः, नन्वया धूम्रप्रभोपरितनप्रस्तट एव सम्भवः तत्र च 'अंतोमुटुत्तमि गए"त्यादिवक्ष्यमाणन्यायतः पूर्वोत्तरभवान्तर्मुहूर्तद्वयपल्योपमासययभागाभ्यधिकदशसागरोपमपरिमाणवासी किं नोक्ता ?. उच्यते. उक्तैव, पल्योपमासङ्खयेयभाग एव तस्याप्यन्तमुहूर्त्तद्वयस्थान्तर्भावात् , तदसङ्खयेयभागानां चासायेयभेदत्वादिहैतावत्परिमाणस्यैवास्थ विवक्षितत्वान्न विरोधः, एवमुत्तरत्रापि भावनीयम् । अक्षरसंस्कारस्तूत्तरेषु कृत एव, नवरं .
ELE
दीप अनुक्रम [१४१६-१४२१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||३४-३९|| नियुक्ति: [५४५...]
उत्तराध्य. बृहदृत्तिः
प्रत
सूत्रांक
॥६५८॥
[३४-३९]
त्रय उदधयः सागरोपमाणि द्वावुदधी-द्वे सागरोपमे, दशोदधयो-दश सागरोपमाणि, 'तेत्तीसं ति त्रयस्त्रिंशत्साग
लेश्याध्यरोपमाणि, पठन्ति च सर्वत्र 'मुहुत्तद्धा उत्ति, तत्र मुहर्त(Fध)शब्देन प्राग्वदन्तर्मुहुर्तस्योक्तत्वादन्तर्मुहूर्त्तकालमिति
यनं. ३४ सूत्रपकार्थः । सम्प्रति प्रकृतमुपसंहरन्नुत्तरग्रन्थसम्बन्धमाह
एसा खलु लेसाणं आहेण ठिई उ वणिया होइ । चउसुचि गईसु इत्तो लेसाण ठिई उ बुच्छामि॥४०॥ स्पष्टमेव, नवरम् 'ओपेन' इति सामान्येन गतिभेदाविवक्षयेतियावत्, 'चतसृष्यपि गतिपु' नरकगत्यादिषु प्रत्येकमिति शेषः, 'अतः' इत्योपस्थितिवर्णनानन्तरमिति सूत्रार्थः ॥ प्रतिज्ञातमेवाह
दसवाससहस्साई काऊ ठिई जहन्निया होइ । तिन्नोदही पलिय असंखेनभागं च उक्कोसा ॥४१॥ तिण्णुदहीपलिओवममसंखभागो जहन्ननीलठिई । दसउदहीपलिओवममसंखभागं च उकोसा ॥ ४२ ॥ दसउदहीपलिओवममसंखभागं जहनिया होइ । तित्तीससागराई उकोसा होइ किण्हाए ॥४३॥ एसा नेरईयाणं लेसाण ठिई उ घण्णिया होइ । तेण परं वुच्छामि तिरियमणुस्साण देवाणं ॥४४ ॥ अंतोमुहुत्तमद्धं लेसाण ठिई जहि जहिं जाउ तिरियाण मराणं वा बज्जित्ता केवलं लेसं ॥ ४५ ॥ मुहत्तद्धं तु जहन्ना उक्कोसा होई ॥६५॥ पुवकोडी उ । नवहिं वरिसेहिं ऊणा नायब्वा सुक्कलेसाए ॥४६॥ एसा तिरियनराणं लेसाण ठिई उ वण्णिया होइ । तेण परं चुच्छामि लेसाण ठिई उ देवाणं ॥४७॥ दसवाससहस्साई किण्हाए ठिई जहनिया होह।||२१
दीप अनुक्रम [१४१६-१४२१]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४१-५५|| नियुक्ति : [५४५...]
सूत्रांक
[४१
पलियमसंखिजइमो उक्कोसो होइ किण्हाए ॥४८॥ जा किण्हाइ ठिई खलु नकोसा सा उ समयमभहिया ।
जहन्नेणं नीलाए पलियमसंखं च उक्कोसा ।। ४९॥ जा नीलाइ ठिई खलु उक्कोसा सा उ समयमभहिया । है जहन्नेणं काऊए पलियमसंखं च उक्कोसा ॥५०॥ तेण परं वुच्छामी तेजलेसा जहा सुरगणाणं । भवणवइ
वाणमंतरजोइसवेमाणियाणं च ।। ५१ ॥ पलिओवमं जहन्ना उक्कोसा सागरा उ दुपहहिया । पलियमसंखिजेणं होई भागेण तेऊए ॥५२॥ दसवाससहस्साई तेजइ ठिई जहनिया होइ । दुन्नुदही पलिओवमअसंखभागं च उक्कोसा ॥५३॥ जा नेऊइ ठिई खलु उक्कोसा सा उ समयमभहिया। जहन्नेण पम्हाए दस | मुहुत्तहियाई उक्कोसा ॥५४॥ जा पम्हाइ ठिई खलु उक्कोसा सा उ समयमभहिया । जहन्नेणं सुकाए| तित्तीसमुहुत्तमम्भहिया ॥ ५५॥
दशवर्षसहस्राणि कापोतायाः स्थितिर्जघन्यका भवति, त्रय उदधयः 'पलियमसंखेज्जभागं च'त्ति सूत्रत्यात् पल्योपमासङ्खयेयभागं चोत्कृष्टा, पठन्ति च-'उकोसा तिन्नुदही पलियमसंखेजभागऽहिय'त्ति स्पष्टम् , इयं च जघन्या रत्नप्रभायां, तस्यां हि जघन्यतोऽपि दशवर्षसहस्राण्यायुरिति, उत्कृष्टा च वालुकाप्रभायां, तत्राप्युपरितनन-11 |स्तटनारकाणामेव, तेषामेतावस्थितिकानामसाविति भावनीयम् । त्रय उदधयः पल्योपमासययभागश्च मकारस्थालाक्षणिकत्वात् चस्य गम्यमानत्वाजघन्या नीलायाः स्थितिर्दशोदधयः पल्योपमासङ्खयेयभागश्चोत्कृष्टा, इहापि
दीप अनुक्रम [१४२३-१४३७]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-1 / गाथा ||४१-५५|| नियुक्ति: [५४५...]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [४१
॥६५९॥
जघन्या वालुकाप्रभायामेतावस्थितिकानामेव, उत्कृष्टा च धूमप्रभायामुपरितनप्रस्तदनारकाणा, तत्रापि येषामेता-18/ लेश्याध्यबती स्थितिरिति मन्तव्या, इहोत्तरत्र च पाठान्तरं दृश्यते, तत्र च जघन्यस्थितिः समयाधिकत्यमुक्तं तच न वुध्यता
इति न तयाख्या, दशोदधयः पल्योमासङ्खयेयभागो जघन्यिका भवति प्रक्रमात्स्थितिः कृष्णाया इति सम्बन्धः ४ अस्याश्च धूमप्रभायामेतावत्स्थितिकेष्वेव नारकेषु सम्भवः, त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि उत्कृष्टा भवति कृष्णायाः, स्थितिहै रितीहापि प्रक्रमः, इयं च महातमःप्रभायां, तत्रैवैतावत्प्रमाणस्यायुषः सम्भवात् , इह च नारकाणामुत्तरत्र च४
देवानां द्रव्यलेश्यास्थितिरेवैवं चिन्त्यते, तद्भावलेश्यानां परिवर्त्तमानतयाऽन्यथाऽपि स्थितेः सम्भवात् , उक्तं हि-1 "देवाण नारयाण य दबलेसा भवंति एयाओ । भावपरावत्तीए सुरणेरइयाण छलेसा ॥१॥"पूर्वोक्तं निगमयन्नुत्तरं च ग्रन्थं प्रस्तावयन्निदमाह-'एषा' अनन्तरोक्ता निरये भवा नैरविकास्तेषां सम्बन्धिनीनां लेश्यानां स्थितिः' अवस्थितिः 'तुः पूरणे 'वर्णिता' आण्याता भवति, 'तेण'ति सूत्रत्वात्ततः 'परम्' इत्यग्रतो वक्ष्यामि प्रक्रमालेश्यानां स्थिति तियग्मनुष्याणां तथा देवानाम् ॥ यथाप्रतिज्ञातमेवाह-'अंतोमुहुत्तमद्धं'त्ति 'अन्तर्मुहूर्ताद्धाम्' अन्तर्मुहूर्त्तकालं लेश्यानां स्थितिर्जघन्योत्कृष्टा चेति शेषः, कतराऽसौ ? इत्याह-'यस्मिन् इति पृथिवीकायादौ संमूर्छिममनुष्यादौ च याः ॥६५९॥ | कृष्णायाः'तुः' पूरणे तिरश्चां मनुष्याणां मध्ये संभवन्ति तासाम् , एता हि कचित्काश्चित्संभवन्ति, यत आगम:
१ देवानां नैरयिकाणां च द्रव्यलेश्या भवन्ति एताः । भावपरावृत्तौ सुरनैरयिकयोः षङ्क लेश्याः ॥ १॥
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दीप अनुक्रम [१४२३-१४३७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४१-५५|| नियुक्ति : [५४५...]
OSESS
सूत्रांक
"पुढविकाइयाणं भंते ! कइलेसातो पन्नत्ताओ?, गोयमा ! चत्तारि लेसाओ, तंजहा-कण्हलेसा जाब तेउलेसा, |आउवणप्फइकाइयाणवि एवं चेव, तेउवाउवेइंदियतेइंदियचउरिंदियाण जहा नेरइयाणं पंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं| पुच्छा, गोयमा ! छलेसाओ कण्हा जाव सुक्कलेसा, मणुस्साणं पुच्छा, गोयमा ! छ एयाओ चेब, समुच्छिममणुस्साणं पुच्छा, गोयमा ! जहा नेरइयाणं ।" नन्येवं शुक्ललेश्याया अप्यन्तर्मुहूर्तमेव स्थितिः प्रासेत्याशङ्कयाह-वर्जयित्वा केवला शुद्धां लेश्यां शुक्ललेश्यामितियावत् । अस्थाश्च यावती स्थितिस्तामाह-'मुहुत्तद्धं तु'त्ति प्राग्वदन्तर्मुहूर्तमेव जघन्या उत्कृष्टा भवति पूर्वकोटी 'तुः' विशेषणे, स च जघन्यस्थित्यपेक्षयाऽस्या उक्तमेव विशेष द्योतयति, नवभिवषयूना ज्ञातव्या शुक्ललेश्यायाः स्थितिरिति प्रक्रमः, इह च यद्यपि कश्चित्पूर्वकोट्यायुरष्टवार्षिक एवं व्रतपरिणाममामोति. तथाऽपि नैताबद्वयास्थस्य वर्षपर्यायादक शुक्ललेश्यायाः सम्भव इति नवभिन्यूना पूर्वकोटिरुच्यते । 'एसा'सूत्रं
स्पष्टमेव । प्रतिज्ञातानुरूपमाह-दशवर्षसहस्राणि कृष्णायाः स्थितिर्जघन्यका भवति, भवनपतिव्यन्तरेषु चाखाः सम्भव*स्तेषामेव जघन्यतोऽप्येतावस्थितिकत्वात् , उक्तं च-"दस भवणवणयराणं वाससहस्सा ठिई जहन्नेणं"ति, 'पलिय
मसंखेजइमोति पल्योपमासवधेयतमः प्रस्तावाद् भाग उत्कृष्टा भवति कृष्णायाः स्थितिरिति प्रक्रम. एवंविधवि-12 मध्यमायुषामेव भवनपतिष्यन्तराणामियं द्रष्टव्या । सम्प्रति नीलायाः स्थितिमाह-या कृष्णायाः स्थितिः 'खलुः' १ दश वर्षसहस्राणि भवनपतीनां वनचराणां स्थितिर्जधन्येन
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[४१
*
*
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दीप अनुक्रम [१४२३-१४३७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४१-५५|| नियुक्ति: [५४५...]
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लेश्याव्ययनं. ३४
प्रत
सूत्रांक
[४१
उत्तराध्य. वाक्यालङ्कारे 'उत्कृष्टा' अनन्तरमुक्तरूपा 'सा उत्ति सैव 'समयमभहिय'त्ति समयाभ्यधिका जघन्येन नीलायाः, बृहहृत्तिः दिपलियमसंखिजत्ति प्राग्यत्पल्योपमासङ्खयेयश्च भाग उत्कृष्टा स्थिति वरमुक्तहेतोरवे बृहत्तरोऽयमसङ्गयेयभागोरखते।
या नीलायाः स्थितिः खलूत्कृष्टा 'सा उ'त्ति सैव समयाभ्यधिका जघन्येन कापोतायाः पल्योपमासङ्ख्येयश्च भाग ॥१०॥
उत्कृष्टा स्थितिः, एतावदायुषामेव भवनपतिव्यन्तराणामिमे मन्तव्ये, इहाप्युक्तहेतोरेव पूर्वस्मादृहत्तरोऽसङ्ख्यातभागः परिगृयते । इत्थं निकायद्वयभाविनीमाद्यलेश्यात्रयस्थितिमुपदर्य समस्तनिकायभाविनी तेजोलेश्या स्थितिम|भिधातुं प्रतिज्ञासूत्रमाह-'तेण'त्ति ततः परं प्रवक्ष्यामि तेजोलेश्यां, 'यथेति येनावस्थानप्रकारेण सुरगणानां भवति
तथेत्युपस्कारः, किमन्यतरनिकायानामेवामीषामुतान्यथेत्याह-भवनपतिवाणमंतरज्योतिर्वैमानिकानां चतुर्निकाया8/नामिति योऽर्थः, 'च' पूरणे, प्रतिज्ञातमेवाह-पल्योपमं जघन्या उत्कृष्टा 'सागर'त्ति सागरोपमे 'तुः' प्राग्वत् 'द्वे'| द्विसद्धये अधिके-अर्गले, कियतेत्याह-पल्योपमासययेनेति योगः, भवति तैजस्थाः स्थितिरिति प्रक्रमः, इयं च सामान्योपक्रमेऽपि वैमानिकनिकायविषयतयेय नेया, तत्र च सौधर्मेशानदेवानां जघन्यत उत्कृष्टतश्चैतावदायुषः सम्भवात् , उपलक्षणं चैतच्छेषनिकायतेजोलेश्यास्थितेः, ततश्च भवनपतिव्यन्तराणां जघन्यतो दशवर्षसहस्राणि, उत्कृष्टतस्तु भवनपतीनां सागरोपममधिकं, व्यन्तराणां च पल्योपमं, ज्योतिष्काणां तु जघन्यतः पल्योपमाष्टभागः,४ उत्कृष्टतस्तु वर्षलक्षाधिकं पल्योपमम्, एतावन्मात्राया एवैषां जघन्यत उत्कृष्टतचायुःस्थितेः सम्भवात् । 'दसवास
दीप अनुक्रम [१४२३-१४३७]
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॥६६॥
JAMERatinintamational
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||४१-५५|| नियुक्ति: [५४५...]
*२
*
सूत्रांक
[४१
सहस्साई' इत्यादि स्पष्टमेव, नवरमनेन निकायभेदमनङ्गीकृत्यैव लेश्यास्थितिरुक्ता, इह च दशवर्षसहस्राणि जघन्या तेजस्याः स्थितिरभिहिता, प्रक्रमानुरूप्येण तु योत्कृष्टा कापोतायाः स्थितिरसावेवास्थाः समयाधिका प्राप्नोति, अधीयते च केचनानन्तरसूत्रत्रयस्थाने-'जा काऊइ ठिई खलु उक्कोसे' त्यादि तदत्र तत्त्वं न विद्मः। पनायाः स्थितिमाहकाया तेजस्थाः स्थितिः खलुत्कृष्टा सा उत्ति सैव समयाभ्यधिका जघन्येन पनायाः स्थितिरिति प्रक्रमः, 'दश तु' इति । दशैव प्रस्तावात्सागरोपमाणि मुहूर्त्ताधिकान्युत्कृष्टा, इयं च जघन्या सनत्कुमारे उत्कृष्टा च ब्रह्मलोके, तयोरेवैतदायुष्क-1X सम्भवात. आह-यदीहान्तमहर्तमधिकमुच्यते ततः पूर्वत्रापि किं न तदधिकमुच्यते ? देवभवलेश्याया एव तत्र विव|क्षितत्वात् , प्रतिज्ञातं हि 'तेण परं वोच्छामि लेसाण ठिई तु देवाणं'ति, एवं सतीहान्तर्मुहाधिकत्वं विरुध्यते, न ४ अभिप्रायापरिज्ञानात्, अत्र हि प्रागुत्तरभवलेश्याऽपि "अंतोमुहुत्तंमि गए"ति वचनाद्देवभवसम्पन्धिन्येवेति प्रदर्श-, नार्थमित्थमुक्तमिति न विरोध इति भावनीयम् । शुक्ललेश्यास्थितिमाह-या पनायाः स्थितिः खलूत्कृष्टा 'सा उत्ति सैव समयाभ्यधिका जघन्येन शुक्लायाः स्थितिरिति प्रक्रमः, त्रयस्त्रिंशत् 'मुहुत्तमभहिय'त्ति प्राग्वन्मुहूर्ताभ्यधिकानि सागरोपमाण्युत्कृष्टेति गम्यते, अस्थाश्च लान्तकाभिधानषष्ठदेवलोकात्प्रभृति यावत्सर्वार्थसिद्धस्तावत्सम्भवः, अत्रैपैतावदायुषः सद्भाव इतिकृत्वेति पञ्चदशसूत्रार्थः । उक्तं स्थितिद्वारं, साम्प्रतं गतिद्वारमाह
किण्हा नीला काऊ तिन्निवि लेसाउ अहम्मलेसाउ । एयाहि तिहिवि जीवो दुग्गई उववजई ॥५६॥
दीप अनुक्रम [१४२३-१४३७]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[५६
-५७]
दीप
अनुक्रम
[१४३८
-१४३९]
मकर-%
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः +
॥ ६६१||
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || ५६-५७||
अध्ययनं [३४],
निर्युक्ति: [५४५...]
पहा सुका तिन्निवि एयाउ धम्मलेसाउ । एयाहि तिहिवि जीवो सुग्गई उवबजई ॥ ५७ ॥ कृष्णा नीला कापोतास्तिस्रोऽप्येता अधर्मलेश्याः, पापोपादानहेतुत्वात्, पाठान्तरतोऽधमलेश्या वा, तिसृणामव्यविशुद्धत्वेनाप्रशस्तत्वात्, यद्येवं ततः किमित्याह - 'एताभिः अनन्तरोक्ताभिः 'तिसृभिरपि' कृष्णादिलेश्याभिः 'जीवः' जन्तुः 'दुर्गतिं' नरकतिर्यग्गतिरूपाम् 'उपपद्यते' प्रामोति, सुच्व्यत्ययाद्वा दुर्गतौ 'उपपद्यते' जायते, संक्लिष्टत्वेन तत्प्रायोग्यायुष एव तद्वतां वन्धसम्भवादिति भावः । तथा तैजसी पद्मा शुक्लास्तिस्रोऽप्येताः 'धर्मलेश्याः' प्रधान लेश्याः, विशुद्धत्वेनासां धर्महेतुत्वात् तथा चागमः- “तओ लेसाओ अविसुद्धाओ तओ विसुद्धाओ ततो पसत्थाओ तओ अपसत्थाओ तओ संकिलिट्टाओ तओ असंकिलिट्ठाओ तओ दुग्गतिगामियाओ तओ सुगतिगामियाओ ।" अत एव 'एताभिस्तिसृभिः' तैजस्यादिलेश्याभिर्जीवः 'सोगतिं 'ति' सुगर्ति' देवमनुष्यगतिलक्षणां मुक्तिं बोपपद्यते, यद्वा प्राग्वत्सुगतौ 'उत्पद्यते' जायते, तथाविधायुबन्धतः सकलकमापगमतथेति सूत्रद्वयभावार्थः । उक्तं गतिद्वारं, साम्प्रतमायुद्वारावसरः, तत्र च यस्या लेश्याया यदायुषो मानं तत्स्थितिद्वार एवार्थतोऽभिहितम्, इह त्विदमुच्यते-अवश्यं हि जन्तुर्यल्लेश्येपूत्पद्यते तल्लेश्य एव म्रियते, यत आगमः- “जलेसाई दबाई परियाइत्ता कालं करेइ तलेसो उबवजइ"त्ति, तथेहैव वक्ष्यति "अंतोमुहुत्तंमि गए" इत्यादि तत्र जन्मान्तरभाविलेश्यायाः किं प्रथमसमये परभवायुप उदय आहोथि चरम समयेऽन्यथा वेति संशयापनोदानायाह
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लेश्याध्य
यनं. ३४
~356~
॥६६१॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३४], मूलं [-] / गाथा ||५८-६०|| नियुक्ति: [५४५...]
प्रत
सूत्रांक
[५८
-६०]
लेसाहिं सव्वाहिं पढमे समयंमि परिणयाहिं तु । नहु करसह उबवत्ति परे भवे अस्थि जीवस्स ॥ ५८॥ बालेसाहिं सवाहिं चरमे समयंमि परिणयाहिं तु। नहु कस्सइ उववत्ति परे भवे अस्थि जीवस्स ॥१९॥ अंतमुहुत्तंमि गए अंतमुहुत्तमि सेसए चेव । लेसाहिं परिणयाहिं जीवा गच्छंति परलोयं ॥ ६॥
'लेश्याभिः' उक्तरूपाभिः' 'सर्वाभिः' इति षडिरपि प्रथमे समये तत्प्रतिपत्तिकालापेक्षया 'परिणताभिः' प्रस्तावादात्मरूपतामापन्नाभिः, लक्षणे तृतीया, 'तुः' पूरणे 'न हुँ' नैव कस्यापि "उववत्ति'त्ति 'उत्पत्तिः' उत्पादः, ४ पठ्यते च 'नवि कस्सपि उववाओ'त्ति सुगम, 'परे' अन्यस्सिन् 'भवे' जन्मनि भवति' विद्यते 'जीवस्य जन्तोः।
तथा लेश्याभिः सर्वाभिः 'चरमे समये' इत्यन्तसमये परिणताभिस्तु 'नहु' नैव कस्याप्युत्पत्तिः परे भवे भवति जीवस्य । कदा तर्हि ? इत्याह-अन्तर्मुहूर्ते 'गत एवं' अतिक्रान्त एव, तथाऽन्तर्मुहर्ने शेपके चैव-अवतिष्ठमान एव लेण्याभिः | परिणताभिरुपलक्षिता जीवा गच्छन्ति 'परलोकं' भयान्तरम् , इत्थं चैतन्मृतिकाले भाविभवलेश्याया उत्पत्तिकाले वाऽतीतभवलेश्याया अन्तर्मुहर्तमवश्यम्भावात्, न विह विपरीतमवधार्यते-अन्तर्मुहर्त एव गत इत्यन्तमुहर्त एव शेषक इति च, देवनारकाणां स्वखलेश्यायाः प्रागुत्तरभवान्तर्मुहूर्तस्यसहितनिजायुःकालं यावदवस्थितत्वात् , उक्तं हि
प्रज्ञापनायाम्-"जलेसाई दबाई आयतित्ता कालं करेति तलेसेसु उवयजइ'त्ति,तथा 'कण्हलेसे रतिए कण्हलेसेसु घाणेरइएसु उववजति कण्हलेसेसु उबट्टइ, जलेसे उववजइ तछेसे उबद्दति, एवं नीललेसेवि काउलेसेवि, एवं असुर
दीप अनुक्रम [१४४०-१४४२]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[६१]
दीप
अनुक्रम
[१४४३]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥६६२ ||
Education
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ (मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||६१ || निर्युक्तिः [५४५...]
अध्ययनं [३४],
कुमारा जाय बेमाणियति, अनेनान्तर्मुहूर्त्तवशेष आयुषि परभवलेश्यापरिणाम इत्युक्तं भवतीति सूत्रत्रयार्थः ॥ इत्थं लेश्यानां नामाद्यभिधाय साम्प्रतमध्ययनार्थमुपसंजिहीर्षुरुपदेशमाह -
तम्हा एयासि लेसाणं, अणुभावं वियाणिया । अप्पसत्थाउ वज्जिन्त्ता, पसस्थाओ अहिए मुणि ॥ ६१ ॥ तिषेमि ॥ ॥ लेसझयणं ॥ ३४ ॥
'तम्छ'त्ति यस्मादेता अप्रशस्ता दुर्गतिहेतवः प्रशस्ताश्च सुगतिहेतवस्तस्मात् 'एतासाम्' अनन्तरमुक्तानां लेश्यानाम् 'अनुभागम्' उक्तरूपं 'विज्ञाय' विशेषेणावबुध्य अप्रशस्ताः कृष्णाद्यास्तिस्रो वर्जयित्वा 'प्रशस्ताः' तेजस्याद्यास्तिस्रः 'अधितिष्ठेत्' भावप्रतिपत्त्याऽऽश्रयेन्मुनिरिति शेष इति सूत्रार्थः । 'इति' परिसमाप्ती, ब्रवीमीति पूर्ववत्, नयाश्च । प्राग्वत् ॥ इति श्रीशान्त्याचार्यकृतायां शिष्यहितायामुत्तराध्ययनटीकायां चतुस्त्रिंशं लेश्याध्ययनं समाप्तम् ॥ ३४ ॥
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इति श्रीमदुत्तराध्य० शिष्य० श्रीशान्तिसू० वृत्तौ चतुखिंशत्तमं लेश्याध्ययनं समाप्तम् ॥
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लेश्याध्य
यनं. ३४
~358~
||६६२||
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
अत्र अध्ययनं ३४ परिसमाप्तं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||६१...|| नियुक्ति: [१४६-५४८]
अथ अनगारमार्गगतिरितिनाम पंचत्रिंशत्तममभ्ययनम् ।
प्रत
सत्राक
[६१]
व्याख्यातं लेश्याध्ययननामकं चतुर्विंशमध्ययनम् , अधुना पञ्चत्रिंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धःअनन्तराध्ययने लेश्या अभिहिताः, तदभिधाने चायमाञ्चयः-अशुभानुभावलेश्यात्यागतः शुभानुभावा एव लेश्या:
अधिष्ठातव्याः, एतच्च भिक्षुगुणव्यवस्थितेन सम्यग्विधातुं शक्यं, तयवस्थानं च तत्परिज्ञानत इति तदर्थमिदमाकरभ्यते, पतत्सम्बन्धागतस्य चास्यानुयोगद्वारचतुष्टयं प्राग्यवर्णनीयं यावन्नामनिष्पन्ननिक्षेपे अनगारमार्गगतिरिति । नाम, अतोऽनगारमार्गगतीनां त्रयाणामपि पदानां निक्षेपायाह नियुक्तिकृत् अणगारे निक्खेवो चउबिहो दुविह होइ नायवो। ॥५४६ ॥ जाणगभवियसरीरे तवइरिते अनिण्हगाईसु । भावे सम्मदिट्ठी अगारवासा विणिम्मुक्को ॥ ५४७ ॥ मग्गगईणं दुण्हवि पुवुद्दिट्टो चउक्कनिक्खेवो । अहिगारो भावमग्गे सिद्धिगईए उ नायवो॥ ५४८ ॥ | माथात्रयं स्पष्टमेव, नवरं तबतिरिक्तश्च निलवादिषु, आदिशब्दादन्येष्वपि चरित्रपरिणामं विना गृहाभाववत्सु, नि-12 रिमे सप्तमी, तसच यस्तेषु मध्येऽनमारत्वेन के सड इत्युपस्कारः, स तमतिरिक्तो द्रव्यानगारो, भाके 'सम्य
दीप अनुक्रम [१४४३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
अथ अध्ययनं -३५ "अनगारमार्गगति" आरभ्यते
~359
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[8]
दीप
अनुक्रम
[१४४४]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥६६३||
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा || १ || निर्युक्तिः [५४६-५४८]
दृष्टिः सम्यग्दर्शनवान्निश्चयतो यत्सम्यक्त्वं तन्मौनमिति चरित्री अगारवासेनागारपाशेन वा प्राकृतत्वा तृतीयार्थे पञ्चमी विशेषेण तत्प्रतिषन्धपरित्यागरूपेण निर्मुक्तः- त्यक्तो विनिर्मुक्तोऽनगार इति प्रक्रमः, तथा मार्गगत्योर्द्वयोरपि, पूर्व - मोक्षमार्गगतिनामन्यध्ययने उद्दिष्टः कथितः पूर्वोद्दिष्टः, इत्थमेषां चतुर्विधत्वेन के नेह प्रकृतमित्याह-अधिकारः 'भावमग्गि'प्ति सुव्यत्ययाद् 'भावमार्गेण सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणेन सिद्धिगत्या चार्थाद्भावगत्या उपलक्षणत्वाद्भावानगारेण च ज्ञातव्य इति गाथाश्रयावयवार्थः । गतो नामनिष्पन्नो निक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुचारणीयं, तचेदम्
सुणेह मे एगमणा, मग्गं सन्वन्नु (बुद्धेहिं) देखियं । जमायरंतो भिक्खू, दुक्खाणंतकरो भवे ॥ १ ॥ 'शृणुत' आकर्णयत 'मे' मम कथयत इति शेषः, एकाग्रमनसः कोऽर्थः १- अनन्यगतचित्ताः सन्तः शिष्या इति शेषः, किं तत् ? इत्याह- 'मार्गम्' उक्तरूपं प्रक्रमान्मुक्तेर्बुधैः - अवगतयथास्थितवस्तुतत्त्वैरुत्पन्न केवलैरर्हद्भिः श्रुतकेव| लिभिर्गणधरादिभिर्वेत्युक्तं भवति, देशितं प्रतिपादितमर्थतः सूत्रतश्च तमेव विशेषयितुमाह-'यम्' इति मार्गम् 'आचरन्' आसेवमानः 'भिक्षुः अनगारः 'दुःखानां' शारीरमानसानामन्तः - पर्यन्तस्तत्करणशीलोऽन्तकरः 'भवेत्' स्यात्, सकलकर्मनिर्मूलनत इति भावः, तदनेनासेव्यासेवकसम्बन्धेनानगारसम्बन्धित्वं मार्गस्य तत्फलं च मुक्तिगतिरिति दर्शितं, ततश्वानगारमार्गे तद्वतिं च शृणुतेत्य (त) उक्तं भवतीति सूत्रार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमेवाह
Education intimational
For
अनगारग
तिमार्गा
ध्य. ३५
~360~
॥६६३॥
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [५४८...]
प्रत सूत्रांक [२-२१]
गिहवासं परिचज्जा, पव्यज्जामस्सिए मुणी । इमे संगे वियाणिज्जा, जेहि सज्जंति माणवा ॥२॥ तहेव हिंसं अलियं, चोज्नं अव्यंमसेवणं । इच्छाकामं च लोभं च, संजओ परिवजए ॥शामणोहरं चित्सघरं, मल्लधूवणवा-13 सियं । सकवार्ड पंडालोपं, मणसावि न पत्थए ॥४॥ इंदियाणि उ भिक्खुस्स, तारिसंमि उवस्सए । दुफ-1 टू राहं तु धारे] निवारेज, कामरागविवद्हणे ॥५॥ सुसाणे सन्नगारे वा, कक्खमले व इकओ। पहरिके परक-13
डेवा, चासं तत्धऽभिरोयए ॥६॥ फासुपंमि अणाबाहे. इत्थीहिं अणभिए । तस्थ संकप्पए वासं, भिक्खू परमसंजए ॥७॥न सर्य गिहाई कुग्विजा, नेव अन्नेहिं कारप। मिहकम्मसमारंभे, भूयाणं दिस्सए l वहो ॥८॥ तसाणं धावराणं च, सुहुमाणं बायराण य । तम्हा गिहसमारंभ, संजओ परिवज्जए ॥९॥ तहेव भत्तपाणेसु, पयणे पयावणेसु य । पाणभूयदयट्ठाए, न पए ण पयावए ॥ १०॥ जलधन्ननिस्सिया जीवा, पुढवीकट्ठनिस्सिया । हम्मति भत्तपाणेसु, तम्हा भिक्खू न पयाषए ॥ ११ ॥ विसप्पे सध्यओ धारे, बहुपाणविणासणे । नत्थि जोइसमे सत्थे, तम्हा जोई न दीवए ॥ १२॥ हिरणं च जायसवं च, मणसावि न पत्थए । समलिड्छुकंचणे भिक्खू, विरए कयविक्कए ॥ १३ ॥ किणतो कहओ होइ, विक्षिणतो अ वाणिओ। कयविक्षयंमि वट्टतो, भिक्खू हवइ तारिसो॥१४॥ भिक्खियब्वं न केयब्वं, भिक्खुणा भिक्खवित्तिणा । कयविको महादोसो, भिक्खावित्ती सुहावहा ॥१५॥ समुयाणं उछमेसिज्जा, जहासुत्तमणिदिय । लाभालाभंमि) ट संतुढे, पिंडवार्य चरे मुणी ॥ १६ ॥ अलोलो न रसे गिडो, जिम्भादंतो अमुच्छिओ । न रसवाए अॅजिजा,
दीप
अनुक्रम [१४४५-१४६४]
ainatorary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
~361
Page #362
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [५४८...]
प्रत
सूत्रांक
[२-२१]
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उत्तराध्या जवणवाए महामुणी ॥ १७॥ अञ्चणं रयणं चेव, वंदणं पूअणं तहा । रहीसकारसम्माण, मणसावि न अनगारग
पत्थए ॥१८॥ मुफ झार्ण झियाइजा, अणियाणे अकिंचणे। बोसहकाए विहरिजा, जाव कालस्स पज्जओग बृहद्वृत्तिः ॥१९॥ निज्जूहिऊण आहारं, कालधम्मे उपट्टिए । चइंऊण माणुसं बुदि, पहू दुक्खा विमुचई ॥२०॥
तिमार्गा॥६६॥ निम्ममो निरहंकारो, वीयराओ अणासवो । संपत्तो केवलं नाणं, सासयं परिनिम्बुडे ॥ २१॥ तिमि ॥ ध्य.
॥अणगारमग्गं॥३५॥ 'गृहवास' गृहावस्थानं यदिवा गृहमेव वा पारवश्यहेतुतया पाशो गृहपाशस्तं 'परित्यज्य' परिहत्य 'प्रवज्यां' सर्व६ सपरित्यागलक्षणां भामवती दीक्षाम् 'आश्रितः' प्रतिपन्नो मुनिः 'इमान्' प्रतिप्राणि प्रतीततया प्रत्यक्षान् ‘सङ्गान् ।
पुत्रकलत्रादीस्तत्प्रतिबन्धान वा 'विजानीयात्' भवहेतवोऽमीति विशेषेणावबुध्येत, निश्चयतो निष्फलस्यासत्त्वाज्ज्ञानस्य च पिरतिफलत्वात्प्रत्याचक्षीतेत्युक्तं भवति, सङ्गशब्दव्युत्पत्तिमाह-जेहिं'ति सुव्यत्ययाद् येषु 'सज्यन्ते ४ प्रतिवध्यन्ते, अथवा यः सबैः 'सज्यन्ते' संवध्यन्ते ज्ञानावरणादिकमणेति गम्यते, के ते ?-'मानवाः' मनुष्या उपलक्षणत्वादन्येऽपि जन्तवः । 'तथा' इति समुचये 'एवेति पूरणे 'हिंसा' प्राणव्यपरोपणम् 'अलीकम्' अनृतभाषणं ।
|॥६६४॥ 'चौर्यम् अदत्तादानम् 'अब्रामसेवनं' मैथुनाचरणमिच्छारूप काम इच्छाकाम का-अनासबस्तुकासारूपं 'लोहं च लब्धवस्तुविषयरयात्मकम् , मनोभयेनापि परिवह उसाला परिवहं च 'संयतः पतिः 'परिवर्जयेत्' परिहरेत्।
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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अध्ययनं [३५],
अनेन मूलगुणा उक्ताः, एतद्व्यवस्थितस्यापि च शरीरिणोऽवश्यमाश्रयाद्वाराभ्यां प्रयोजनं, तयोश्च तदती चारहेतुत्वमपि कदाचित्स्यादिति मन्वानस्तत्परिहाराय सूत्रपङ्केन तावदाश्रयचिन्तां प्रति यतते-'मनोहरं' चित्ताक्षेपकं, किं तत् ?चित्रप्रधानं गृहं चित्रगृहं, तदपि कीदृशं । - माल्यैः -मन्धितपुष्पैर्धूपनैश्च - कालागुरुतुरुष्कादिसम्बन्धिभिर्वासितं - सुरभीकृतं माल्यधूपनवासितं, सह कपाटेन प्रतीतेन वर्त्तत इति सकपाटं तदपि 'पाण्डुरोलोचं' श्वेतवस्त्रविभूषितं । मनसाऽप्यास्तां वचसा 'न प्रार्थयेत्' नाभिलषेत् किं पुनस्तत्र तिष्ठेदिति भावः । किं पुनरेवमुपदिश्यते ? इत्याह'इन्द्रियाणि' चक्षुरादीनि 'तुः' इति यस्मात् 'भिक्षोः' अनगारस्य 'ताशे' तथाभूते 'उपाश्रये' आश्रये दुःखेन क्रियन्ते| करोतेः सर्वधात्वर्थत्वाच्छक्यन्ते दुष्कराणि - दुःशकानीत्यर्थः 'तुः' एवकारार्थो दुष्कराण्येव' धारयितुम्' उन्मार्गप्रवृत्तिनिवेधतो मार्ग एव व्यवस्थापयितुं, पठ्यते-दुष्कराणि 'णिवारेतुं'ति, तत्रापि 'निवारयितुम्' इति नियत्रितुं स्वस्वविपयप्रवृत्तेरिति गम्यते, कीरशि १ - काम्यमानत्वात्कामा - मनोज्ञा इन्द्रियविषयास्तेषु रागः- अभिष्वङ्गस्तस्य विवर्द्धने विशेषेण वृद्धिहेतौ कामरागविवर्द्धने, तथा च तथाविधचित्तव्याक्षेपसम्भवात्कस्यचिन्मूलगुणस्य कथञ्चिदतीचारसम्भवो दोष इत्येषमुपदिश्यत इति भावः । एवं तर्हि क कीदृशि स्थातव्यमित्याह-'श्मशाने' प्रेतभूमौ 'शून्यागारे' उद्वसितगृहे 'बा' विकल्पे 'वृक्षमूले वा' पादपसमीपे 'एकदा' इत्येकस्मिंस्तथाविधकाले, पठ्यते च- 'एकतो'त्ति 'एककः' रागद्वेषवियुतोऽसहायो वा तथाविधयोग्यतया 'पराक्वे' परसम्बन्धिनि तथाविधप्रतिबन्धेनाखीकृते पाठान्तरतः 'पति
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [१४८...]
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उत्तराध्य. रिके' देशीभाषया 'एकान्ते' ख्याधसाहले 'परकृते' परैः-अन्यैर्निष्पादिते खार्थमिति गम्यते 'वा' समुच्चये 'वासम्'
अवस्थानं 'तत्र' श्मशानादौ 'अभिरोचयेत्' प्रतिभासयेदर्थादारमने भिक्षुरित्युत्तरेण योगः। 'प्रासुके' अचित्तीभूतभूभा-2 बृहद्वृत्तिः
गरूपे, तथाऽविद्यमाना बाधाऽऽत्मनः परेषां वाऽऽगन्तुकसत्त्वानां गृहस्थानां च यस्मिंस्तत्तथा 'स्त्रीभिः' अङ्गनाभिरु॥६१५|| पलक्षणत्वात्पण्डकादिभिश्च अनभिद्रुते' अनुपद्रुते तदुपद्रवविरहित इत्यर्थः, एतानि हि मुक्तिपथप्रतिपन्थित्वेन तत्प्र
वृत्तानामुपद्रवहेतुभूतानीत्येवमभिधानं'तो'ति प्रागुक्तविशेषणे श्मशानादौ सम्यकल्पयेत्-कुर्यात्सङ्कल्पयेत् ,कं ?-वासं, भिक्षणशीलो भिक्षुः स च शाक्यादिरपि स्यादत आह-परमः-प्रधानः स चह मोक्षस्तदर्थ सम्यग् यतते परमसंयतः,
जिनमार्गप्रपन्न इत्युक्तं भवति, तस्यैव मुक्तिमार्ग प्रति वस्तुतः सम्यगयत्नसम्भवात्, प्राग्यास तत्राभिरोचयेदि-11 प्रत्युक्ते रुचिमात्रेणैव कश्चित्तुष्येदिति तत्र सङ्कल्पयेद्वासमित्यभिधानम् । ननु किमिह परकृत इति विशेषणमुक्तमित्या
शपाह-न 'खयम्' आत्मना 'गृहाणि' उपाश्रयरूपाणि 'कुति' विदधीत नैव 'अन्यैः' गृहस्थादिभिः 'कारयेत्' विधापयेदुपलक्षणत्वाज्ञापि कुर्वन्तमनुमन्येत, किमिति ?, यतो गृहनिष्पत्यर्थ कर्म गृहकर्म-इष्टकादानयनादि तदेव समारम्भः-प्राणिनां परितापकरत्वाद्, उक्तं हि-“परितावकरो भवे समारंभो"त्ति, यद्वा तस्य समारम्भःप्रवर्तनं गृहकर्मसमारम्भस्तस्मिन् 'भूतानाम्' एकेन्द्रियादिप्राणिनां 'दृश्यते' प्रत्यक्षत एयोपलभ्यते, कोऽसौ ?'वधः पिनाशः। भूतानां वध इत्युक्तं तत्र मा भूत्केपाश्चिदेवासावित्याशझवाह-'प्रसानां वीन्द्रियादीनां स्थावराण'
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || २-२१|| निर्युक्तिः [५४८...]
अध्ययनं [३५],
पृथिव्याद्ये केन्द्रियाणां 'चः समुचये तेषामपि 'सूक्ष्माणाम्' अतिश्लक्ष्णानां शरीरापेक्षया न जीवप्रदेशापेक्षया, तस्यामूर्ततयैवंप्रायव्यवहारायोगात्, 'बादराणां च' एवमेव स्थूलाना, यद्वा सूक्ष्मनामकर्मोदयात्सूक्ष्माणां तेषामपि प्रमादतो भावहिंसासम्भवाद्वादरनामकर्मोदयाच्च बादराणाम्, उपसंहर्तुमाह - ' तम्ह'ति यस्मादेवं भूतधस्तस्माद्गृहसमा - रम्भं 'संयतः' सम्यग्रहिंसादिभ्य उपरतोऽनगार इत्यर्थः 'परिवर्जयेत्' परिहरेत्, इत्थमाश्रयचिन्तां विधायाहारचिन्तामाह-'तथैव' तेनैव प्रकारेण भक्तानि च शाल्योदनादीनि पीयन्त इति पानानि पयःप्रभृतीनि तानि च भक्तपानानि तेषु, पचनानि च स्वयं विक्केदापादनकथनानि पाचनानि च तान्येवान्यैः पचनपाचनानि तेषु च भूतवधो दृश्यत इति प्रक्रमः, ततः किमित्याह - प्राणा-द्वीन्द्रियादयो भूतानि पृथिव्यादीनि तेषां दया रक्षणं प्राणभूतदया | तदर्थं तद्धेतोः, किमुक्तं भवति ? - पचनपाचनप्रवृत्तानां यः संभवी जीवोपघातः स मा भूदिति न पचेत्खतो भक्तादीति प्रक्रमो नापि पाचयेत्तदेवान्यैः । अमुमेवार्थं स्पष्टतरमाह-जलं च- पानीयं धान्यं च - शाल्यादि तन्निश्रिताःतत्रान्यत्र चोत्पद्य ये तन्निश्रया स्थिता पूतरकभुजगेलिकापिपीलिकाप्रभृतय उपलक्षणत्वात्तद्रूपाश्च 'जीवाः' प्राणिनः, एवं पृथ्वीकाष्ठनिश्रिता एकेन्द्रियादयो हन्यन्ते भक्तपानेषु प्रक्रमात्पच्यमानादिषु यत एवं तस्माद्भिर्न पाचयेत्, अपेर्गम्यमानत्वात्पाचयेदपि न किं पुनः खयं पचेत्, अनुमतिनिषेधोपलक्षणं चैतत् । अपरं च विसर्पतीति
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [५४८...]
प्रत सूत्रांक [२-२१]
उत्तराध्य. विसर्प-खल्पमपि बहु भवति, यत उक्तम्-"अण थोपं वण थो अग्गी थोष"मित्यादि, सर्वतः-सर्वासु दिक्षु धारेव 01
विचारवअनगारगधारा-जीवविनाशिका शक्तिरस्येति सर्वतोधार सर्वदिगवस्थितजन्तूपघातकत्वात्, उक्तं च-"पाईणं पडीणं वावी-"II बृहद्वृत्तिः
तिभागा
. त्यादि, अत एव 'बहुप्राणविनाशनम्' अनेकजीवजीवितव्यपरोपकं 'नास्ति' न विद्यते 'ज्योतिःसमम्' अभितुल्यं | ॥६६॥ शस्यन्ते-हिंस्यन्तेऽनेन प्राणिन इति शस्त्रं-प्रहरणमन्यदिति गम्यते तस्याविसपत्वादसर्वतोधारवादल्पजन्तूपघातक- ध्य. ३५
त्याचेति भायः, सर्वत्र लिङ्गव्यत्ययः प्राग्वत् , यस्मादेवं तस्मात् 'ज्योतिः' वैश्वानरं 'न दीपयेत्' न ज्वालयेत् , अनेन| च पचनस्याग्निज्वलनाविनाभावित्वात्तत्परिहार एव समर्थितः, इत्थं च विशेषप्रक्रमे च सामान्याभिधानं प्रसङ्गतः शीतापनोदादिप्रयोजनेऽपि तदारम्भनिषेधार्थम् , आधाकर्मादिका वा विशुद्धकोटिरनेनैवार्थतः परिहार्योक्ता, तदपरिहारे अवश्यम्भावी पचनानुमत्यादिप्रसङ्ग इति । नन्वेवं जीववधनिमित्तत्वमेव पचनादेनिषेधनिवन्धनं, तब नास्ति क्रयविक्रययोरिति युक्तमेवाभ्यां निर्वहण(मेव)मपि कस्यचिदाशङ्का स्वादतस्तदपनोदाय हिरण्यादिपरिग्रहपूर्वकत्यात्तयोस्तन्निषेधपूर्वकं सूत्रत्रयेण तत्परिहारमाह-'हिरण्यं' कनकं जातरूपं रूप्यं चकारोऽनुक्ताशेषधनधान्यादिसमु
चये 'मनसाऽपि' चित्तेनाप्यास्तां वाचा 'न प्रार्थयेत्' ममामुकं स्यादिति, अपेर्गम्यमानत्वात्प्रार्थयेदपि न, किं पुनः टूपरिगृहीया ?, कीरशः सन् ?-समे-प्रतिबन्धाभावतस्तुल्ये लेष्टुकाञ्चने-मृत्पिण्डखण्डकनके अखेति समलेष्टुकाञ्चनः ॥६६॥
१ ऋणं खो जणं स्तोकं अग्निः स्तोकः कषायः स्तोकश्च ।
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३५], मूलं [--] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [५४८...]
प्रत सूत्रांक [२-२१]
एवंविधश्च सन् भिक्षुः 'विरतः' निवृत्तः स्यादिति शेषः, कुतः-क्रयो-मूल्येनान्यसम्बन्धिनस्त्रथाविधवस्तुनः खीकारो विक्रयश्च तस्यैवात्मीयस्य तथाविधवस्तुजातेनान्यस्य दानं, क्रयश्च विक्रयथ क्रयविक्रयमिति समाहारस्तस्मात्, पञ्चम्यर्थे सप्तमी, विषयसप्तमी चा, तत्र च-क्रयविक्रयविषये, 'विरतः' इति विरतिमानित्यर्थः ।। किमित्येवम् । अत आह-क्रीणानः-परकीयं वस्तु मूल्येनाददानः क्रयोऽस्यास्तीति ऋयिको भवति-तथाविधेतर-14
लोकसरश एव भवति, विक्रीणानश्च-खकीयं वस्तु तथैव परस्य ददरणिगू भवति, वाणिज्यप्रवृत्तत्वादिति भावः, है अत एव च 'क्रयविक्रये' उक्तरूपे 'वर्तमानः' प्रवर्त्तमानो भिक्षुर्भवति न ताशो, गम्यमानत्वाधारशः सूत्राभि-k |हितो भावभिक्षुरिति भावः । ततः किमित्याह-भिक्षितन्यं' याचितव्यं तथाविधं पस्त्विति गम्यते, 'न' नैव 2
'क्रेतव्यं' मूल्येन ग्रहीतव्यं, केन -भिक्षुणा, कीरशा:-भिक्षयैव वृत्तिः-वर्त्तनं निर्वहणं यस्यासौ भिक्षावृत्तिस्तेन, दउक्तं हि-"सर्व से जाइयं होइ नत्धि किंचि अजाइयं "ति, क्रयविक्रयवद्भिक्षाऽपि सदोषैव भविष्यतीति मन्दकधीर्मन्यते, तत आह-क्रयश्च विक्रयश्च क्रयविक्रयं व्यवच्छेदफलत्वादस्य तदेव महादोषमुक्तन्यायतः, लिङ्गव्यत्य
प्रश्च प्राग्वत्, भिक्षया वृत्तिर्भिक्षावृत्तिः शुभ-इहलोकपरलोकयोः कल्याणं सुखं वा तदाबहति-समन्तात्मापय-1 तीति शुभावहा सुखावहा या, अनेन क्रीतदोषपरिहार उक्तः, स चाशेषविशुद्धकोटिगतदोषपरिहारोपलक्षणम् । १ सर्व तस्स याचितं भवति नास्ति किश्चिदयाचितम् ।
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उत्तराध्य.
वृहद्वृत्तिः
॥ ६६७॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [ - ] / गाथा || २-२१|| निर्युक्ति: [५४८...]
अध्ययनं [३५],
मिक्षितव्यमित्युक्तं तथ दानश्राद्धादिवेश्मनि कचिदेकत्रैव स्यादत आह- 'समुदानं' मैक्षं न त्वेकभिक्षामेव तथोल्छमिव उच्छम् - अन्यान्यषेश्मतः खल्पं खल्पमामीलनात् मधुकरवृत्या हि भ्रमत ईदृगेष भवतीत्येवमुक्तम्, 'एषयेत्' गवेषयेत् एतचोत्सूत्रमपि स्यादित्याह – सूत्रम् - आगमस्तदनतिक्रमेण यथासूत्रम् - आगमाभिहितोद्गमेपणाद्यषाधात इत्युक्तं भवति, तत एव 'अनिन्दितं' शिष्टनिन्येन खपरप्रशंसादिहेतुनाऽनुत्पादितं जात्यादिज्जुगुप्सितजनसम्बन्धि वा न भवति, तथा लाभालाभश्व लाभालाभं तस्मिन् संतुष्टः-ओदनादेः प्राप्तावप्राप्तौ च सन्तोषवान् न तु वाञ्छाविधुरितचित्त इति भावः, इह च लाभेऽपि वाञ्छोत्तरोत्तरवस्तुविषयत्वेन भावनीया, पिण्ड्यत इति पिण्डो-भिक्षा तस्य पातः-पतनं प्रक्रमात्पात्रेऽस्मिन्निति पिण्डपातं भिक्षाटनं तत् 'चरेत्' आसेवेत 'मुनिः' इति तपखी, पाठान्तरतश्च पिण्डस्य पातः पिण्डपातस्तं गवेषयेत् उभयत्र च वाक्यान्तरविषयत्वादपौनरुक्त्यम् । इत्थं च पिण्डमवाप्य यथा भुञ्जीत तथाऽऽह-'अलोलः' न सरसान्ने प्राप्ते लाम्पय्यवान्, न 'रसे' खिग्धमधुरादौ 'गृद्धः' प्राप्तावभिकाङ्क्षावान्, कथं चैवंविधः १, यतः 'जिच्मादते' त्ति प्राकृतत्वाद्दान्ता-वशीकृता जिह्वा-रसना येनासौ दास्तजिह्वोऽत एव 'अमूर्च्छितः संनिधेरकरणेन तत्काले वाऽभिष्वङ्गाभावेन, उक्तं हि "नो वामाओ हणुयातो दाहिणं, दाहिणाओ वा वामं चालेइ" एवंविधथ सन् 'न' नैव 'रसद्वाए'त्ति रसार्थ सरसमिदमहमाखादयामीति धातुवि१ न वामात् दनुनो दक्षिणं न दक्षिणाद्वा वामं चालयति
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ध्य. ३५
॥६६७॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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पोवा रसः स चाशेषधातूपलक्षणं ततस्तदुपचयः स्यादित्येतदर्थ 'न भुंजीत' नाम्यवहरेत् , किमर्थं तह-त्याहयापना-निर्वाहः स चार्थासंयमस्य तदर्थं 'महामुनिः' प्रधानतपखी, अनेन पिण्डविशुद्विरुक्ता । तदेवमादौ मूलगुणान् विधेयतयाऽभिधाय तत्परिपालनार्थमाश्रयाहारचिन्ताद्वारेणोत्तरगुणांश्च सम्प्रति तदवस्थित एवात्मन्युत्पन्नबहुमानः कश्चिदर्चनादि प्रार्थयेदिति तनिषेधार्थमाह-अर्चना' पुष्पादिभिः पूजां 'रचना' निषद्यादिविषयां खस्तिकादिन्यासात्मिकां वा 'चः' समुच्चये 'एवः' अवधारणे नेत्यनेन संभन्स्यते 'वन्दनं' नमस्तुभ्यमित्यादि वाचाsभिष्टवनं 'पूजन' विशिष्टवस्त्रादिभिः प्रतिलाभनं 'तथे ति समुच्चये, ऋद्धिश्च-श्रावकोपकरणादिसम्पदामषिध्यादि-21 रूपा या सत्कारच-अर्घप्रदानादिः सन्मानश्च-अभ्युत्थानादिः ऋद्धिसत्कारसन्मानं तन्मनसाऽप्यास्तां वाचा नैव प्रार्थयेत्' ममेदं स्थादित्यभिलपेत् । किं पुनः कुर्यादित्याह-शुक्लध्यानम्' उक्तरूपं यथा भवत्येवं 'ध्यायेत्' चिन्तयेत् 'अनिदानः' अविद्यमाननिदानोऽकिञ्चनः प्राग्वत्, व्युत्सृष्ट इव व्युत्सृष्टः काया-शरीरं येन स तथा विहरेदप्रतिबद्धविहारितयेति गम्यते 'यावदिति मयोंदायां 'कालय' इति मृत्योः 'पजयत्ति' 'पर्यायः' परिपाटी प्रस्ताव इतियावत् , यावन्मरणसमयः क्रमप्राप्तो भवतीति । एवंविधानमारगुणस्थश्च यावदायुर्विहत्य मृत्युसमये यत्कृत्वा यत्फलमवाप्नोति तदाह-णिज्जूहिऊण'त्ति परित्यज्य 'आहारम्' अशनादि, तत्परित्यागश्च संलेखनाक्रमेणैव,
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्रा४३], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: पूज्य
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बृहद्वृत्तिः
॥ ६६८ ॥
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अध्ययनं [३५],
झगिति तत्करणे बहुतरदोषसम्भवात्, तथा चागमः- “ देईम्मि असंलिहिए सहसा धाऊहि विजमाणाहिं । * जायइ अट्टज्झाणं सरीरिणो चरमकालमि ॥ १ ॥ कदा १--' कालधर्मे' आयुःक्षयलक्षणे मृत्युखभावे 'उपस्थिते' प्रत्यासन्नीभूते, तथा 'त्यक्त्वा' अपहाय 'माणुसं'ति मानुषीं मनुष्यसम्बन्धिनीं 'बुन्दि' शरीरं 'प्रभुः' वीर्यान्तरायक्षयतो विशिष्टसामर्थ्यवान् 'दुक्खे'त्ति 'दुःखैः' शारीरमानसैः 'विमुच्यते' विशेषेण त्यज्यते, तन्निबन्धनकर्मापगमत इति भावः । कीदृशः सन् ? इत्याह- 'निर्ममः' अपगतममीकारः 'निरहङ्कारः' अहममुकजातीय इत्याद्यहङ्काररहितः, ईदृक्षः कुतः १, यतो वीतरागः प्राग्वद् विगतरागद्वेषः, तथा 'अनाश्रवः' कर्माश्रवरहितो मिध्यात्वादितद्धेत्वभावात् संप्राप्तः 'केवलज्ञानम्' उक्तरूपं 'शाश्वत' कदाचिदव्यवच्छेदात् 'परिनिर्वृतः' अस्वास्थ्य हेतुकर्माभावतः सर्वथा स्वस्थीभूत इति विंशतिसूत्रभावार्थः । 'इति' परिसमाप्तौ त्रवीमीति पूर्ववत् । गतोऽनुगमो, नयाश्च प्राग्वत् ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्याचार्यविरचितायां शिष्यहितायामनगार मार्गगतिनामकं पञ्चत्रिंशत्तममध्ययनं समाप्तम् ॥ ३५ ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धे श्रीशान्त्याचार्यविहिता शिष्यहितानाम्नी अनगारमार्गगतिनामक पञ्चत्रिंशत्तमाध्ययनवृत्तिः
१ देहेऽसंलिखिते सहसा धातुपु श्रीयमाणेषु । जायते आर्त्तध्यानं शरीरिणश्वरमसमये ॥ १ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अत्र अध्ययनं - ३५ परिसमाप्तं
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[१४४५
-१४६४]
96 ৩% *% *% *
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [-] / गाथा ||२१...||
निर्युक्ति: [ ५४८...], भाष्यं [१-१५ ]
अथ जीवाजीवविभक्तिरितिनाम षटूत्रिंशत्तममध्ययनम् ।
व्याख्यातमनगारमार्गगतिनामकं पञ्चत्रिंशमध्ययनम् अधुना पट्त्रिंशमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः - अनन्तराध्ययने हिंसापरिवर्जनादयो भिक्षुगुणा उक्ताः, ते च जीवाजीवखरूपपरिज्ञानत एवासेवितुं शक्यन्त इति तज्ज्ञापनार्थमिदमारभ्यते, अस्य चोपक्रमादीनि चत्वार्यनुयोगद्वाराणि, तत्र च भाष्यगाथाः - "तस्स अणुओगदारा चत्तारि उबकमे य निक्खेवे । अणुगम नएय तहा उवकमो छबिहो तत्थ ॥ १ ॥ नामं ठवणादविए खेत्ते काले तहेव भावे य । एसो सत्थोवकमो बन्नेयवो जहकमसो ॥ २ ॥ अहवऽणुपुचीणामप्पमाणवत्तत्रया य बोद्धवा । अत्थहिगारे तत्तो छट्ठे व तहा समायारो || ३ || सवे जहकमेर्ण बन्नेऊणं इमो समोयारो । अणुपुवीय उ तहिं उकित्तणपुत्री ओतरह ॥ ४ ॥ सा इह पुषाणुपुत्री पच्छणुपुत्री तहा अणणुपुची। पुचणुपुवी छत्तीसइयं इमं पच्छ पुण पढमे ॥५॥
१ तस्य अनुयोगद्वाराणि चत्वारि उपक्रमच निक्षेपः । अनुगमो नयश्च तथा उपक्रमः षडिधस्तत्र ॥ १ ॥ नाम स्थापना द्रव्यं क्षेत्र कालः तथैव भावश्च । एष शास्त्रीयोपक्रमो वर्णयितव्यो यथाक्रमम् ॥ २ ॥ अथवा आनुपूर्वी नाम प्रमाणं वक्तव्यता व बोद्धव्या । अर्थाधिकारश्च ततः षष्ठश्च तथा समवतारः ॥ ३ ॥ सर्वान यथाक्रमं वर्णयित्वा वयं समवतारः ( कार्यः) । तत्र आनुपूर्वी उत्कीर्तनानुपूर्व्यामवत्तरति ॥ ४ ॥ सेह पूर्वानुपूर्वी पञ्चानुपूर्वी तथा अनानुपूर्वी । पूर्वानुपूर्व्या पत्रिंशत्तमं इदं पचानुपूर्व्यां पुनः प्रथमम् ॥ ५ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः अथ अध्ययनं - ३६ "जीवाजीवविभक्ति" आरभ्यते
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||२१...|| नियुक्ति: [५४८...], भाष्यं [१-१५]
प्रत
सूत्रांक
[२-२१]
उत्तरायलाजणुपुधीर अगाएगुत्तराय सेढीए । छत्तीसगच्छगाए गुणिया अन्नोन्नदुरुपूणा ॥६॥णामे छधिहणामे तत्वविर जीवाजीव
नावे खओक्समिवम्मि । जम्हा बद्दर भावे सघसुर्य खओषसमियंमि ॥७॥ ओयरति पमाणे पुण भावपमाणहत्ति मि तंपि तिविहं तु । गुणणयसंखपमाणं ओयरति गुणपमाणमि ॥ ८॥ तत्यवि णाणे तहियपि आगम लोउत्तरे |
अणंगे थे। कालियसुए य तत्तो अहवाची आगमतियंमि ॥९॥ अचअणंतरपारंपरे य उभयमि तं समोयरई । । ३६
मएसु समोचर्य समोरइ उ संखपरिमाणे ॥१०॥ तत्ववि व कालिवसुए अक्खरपायाइएस् जोवरद । वत्तवय मोसण्णं ससमयवत्तव ओयरति ॥११॥ अत्यहिगारो इत्थं जीवाजीषेहिं होइ जायचो । एमेव समोयरई। जं जत्थ समोयरह दारे ॥ १२॥ निक्खेवावसरो पुण अह अणुपत्तो व तत्व निक्खेवे । णिक्खेपो णासोत्ति य
अनानुपुा त्वेकायेकोत्तरायां श्रेण्याम । पटिशद्वच्छगतायां गुणिता अन्योन्यं द्विरूपोनाः ॥ ६॥ नाग्नि पडिघे नाग्नि तत्रापि भावे Mक्षायोपशामिके। यस्मात् वर्तते भावे सर्व श्रुतं क्षायोपशमिके ॥७॥ अवतरति प्रमाणे पुनर्भावप्रमाणे तदपि त्रिविधं तु । गुणनयसङ्ख्या-11 प्रमाणानि अवतरति गुणप्रमाणे ॥ ८॥सत्रापि शाने तत्रापि आगमे अवतरति लोकोत्तरे अनङ्गे च । कालिकवते च तत्राथवापि आगमत्रिकेला
६६९॥ ॥९॥ मात्मानन्सरपरम्परेषु चोभयस्मिन्नपि तत्समवतरति । न नयेषु समवतरति समवतरति तु संख्यापरिमाणे ॥ १० ॥ तत्रापि च ४ कालिकवते अक्षरपादादिकेष्ववतरति । वक्तव्यतायां प्रायशः स्खसमयवक्तव्यतायामवत्तरति ॥ ११॥ अर्थाधिकारोऽत्र जीवाजीवाभ्यां | भवति ज्ञातव्यः । पवमेव समवतरति यवत्र समवतरति द्वारे ॥ १२ ॥ निक्षेपावसरः पुनरयानुप्राप्तश्च तत्र निक्षेपे । निक्षेपो न्यास इति च
दीप
अनुक्रम [१४४५-१४६४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२-२१]
दीप
अनुक्रम
[१४४५
-१४६४]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) निर्युक्ति: [५४९-५५६], भाष्यं [ १-१५]
अध्ययनं [३६],
मूलं [--] / गाथा ||२१...||
१३
ठवणत्ति व होंति एगट्ठा ॥ स्सवि य सो चउद्दा ॥ | जीवाण य विभत्ती ॥ १५ ॥
१४
॥ सो तिह ओहे णामे सोत्तालावे य होइ बोद्धव्वो । तत्थोहो अविसेसो अज्झयणवण्णेउ जहा विहिणा तयणंतरमित्थ णामणिप्फण्णो । तत्थ य नाम अस्स उ जीवाअत्र च जीवाजीवविभक्तिरिति पदत्रयं वर्त्तत इत्येतन्निक्षेपायाह नियुक्तिकृत्
॥
॥ ५४९ ॥
॥ ५५९ ॥
निक्खेवो जीवंमि अ चउहि दुविह होइ नायो । जाणगभवियसरीरे तबइरिते अ जीवदवं तु । भावंमि दसविहो खलु परिणामो जीवदवस्स ॥५५०॥ निक्खेवो अ (S) जीवंमि चउधिहो दुविह होइ नायवो । जाणगभविषसरीरे तबइरिते अजीवदवं तु । भावंमि दसविहो खलु परिणामो अ ( 5 ) जीवदव्वस्त ५५२ निक्खेव विभत्तीए चउविहो दुविह होइ दमि । | जाणगभवियसरीरा तबइरित्ता य से भवे दुविहा । जीवाणमजीवाण य जीवविभत्ती तहिं दुविहा ५५४
॥ ५५३ ॥
१ स्थापनेति च भवन्त्येकार्थाः ॥ १३ ॥ स त्रिधा ओषः नाम सूत्रालापकञ्च भवति वोद्धव्यः । तत्रौषोऽविशेषः अध्ययनस्यापि च
स
चतुर्थी ॥ १४ ॥ वर्णयित्वा यथाविधि तदनन्तरमत्र नामनिष्पन्नः । तत्र च नामास्य तु जीवाजीवानां च विभक्तिः ।। १५ ।।
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२-२१]
दीप
अनुक्रम
[१४४५
-१४६४]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥ ६७० ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः)
अध्ययनं [ ३६ ],
मूलं [ - ] / गाथा ||२१...||
निर्युक्ति: [५४९-५५६], भाष्यं [ १-१५]
सिद्धाणमसिद्धाण य अज्जीवाणं तु होइ दुविहा उ । रूवीणमरूवीण य विभासिया जहा सुत्ते ॥५५५॥ भावमि विभत्ती खल्लु नायवा छविहंमि भावमि । अहिगारो इत्थं पुण दवविभत्तीइ अज्झयणे ॥५५६॥ निक्खेवेत्यादि गाथा अष्ट व्याख्यातप्राया एव, नवरं तद्व्यतिरिक्तश्च 'जीवद्रव्यं' द्रव्यजीव उच्यत इति प्रक्रमः 'तुः ' विशेषद्योतकः, स चायं विशेष: यथा न कदाचित्तत्पर्यायवियुक्तं द्रव्यं तथाऽपि च यदा तद्वियुक्ततया विवक्ष्यते तदा तद्द्रव्यप्राधान्यतो द्रव्यजीवः, भावे तु दशविधः 'खलुः' अवधारणे दशविध एव परिणामः कर्मक्षयोपशमोदयापेक्षपरिणतिरूपो जीवद्रव्यस्य सम्बन्धी जीवादनन्यत्वेन जीवतया विवक्षितो जीव इति प्रक्रमः, तत्र च क्षायोपशमिकाः षट् पञ्चेन्द्रियाणि षष्ठं मनः औदयिकाः क्रोधादयश्चत्वारो मीलिता दश भवन्ति । एवमजीवनिक्षेपेऽपि यदा पुद्गलद्रव्यमजीवरूपं सकलगुणपर्यायविकलतया कल्प्यते तदा तव्यतिरिक्तो द्रव्याजीवः, भावे चाजीवद्रव्यस्यपुद्गलस्य दशविधः परिणामोऽजीव इति प्रक्रमः, स च शब्दादयः पञ्च शुभाशुभतया भेदेन विवक्षिताः, तथा च सम्प्र| दायः - शब्द स्पर्शरस रूपगन्धाः शुभाश्वाशुभाचे 'ति । तथा विभक्तिनिक्षेपे सति विभक्तिर्भवेत् 'द्विविधा' द्विप्रकारा, ३ ॥ ६७० ॥ | द्वैविध्यं चास्याः सम्बन्धिभेदादेवेति तमाह-जीवानामजीवानां च, कोऽर्थः ? - जीवविभक्तिः - जीवानां विभागेनाबस्थापनम् एवमजीवविभक्तिश्व, उत्तरत्राप्येवमेव सम्बन्धिभेदाद्वेदो व्याख्येयः, 'तर्हि'ति वचनव्यत्ययात् 'तयोः'
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जीवाजीव
विभक्ति०
३६
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१|| नियुक्ति: [१४९-५५६], भाष्यं [१-१५]
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प्रत
जीवाजीवविभक्त्योर्मध्ये द्विविधा सिद्धानामसिद्धानां च, 'अज्जीवाणं तुति 'तुः' अपिशब्दार्थस्ततोऽजीवानामपि भवति 'दुविहा उत्ति, 'तुः' अवधारणे ततो द्विविधैव रूपिणामरूपिणां च 'विभाषितव्या' विशेषेण व्यक्तं वक्तव्या
यथा 'सूत्रे' प्रक्रान्ताध्ययनरूपे, इह तु प्रक्रमायाताऽपि पौनरुत्यप्रासेरसौ न प्रतिपाद्यत इति भावः, 'भावे' भावहै निक्षेपे विभक्तिः 'खलु' निश्चितं ज्ञातव्या 'पडिधे भावे' षट्नकारीदयिकादिभावविषया, आह-एवमनेकविधायां ।
विभक्काविह कयाऽधिकारः१, उच्यते, 'अधिकारः' अधिकृतम् 'अत्रे'ति प्रस्तुते पुनःशब्दो वाक्यान्तरोपन्यासे | 8 'द्रव्य विभक्त्या' जीवाजीवद्रव्यविभागावस्थापनरूपया, तस्या एवात्र प्रदर्श्यमानत्वादिति भाव इति नियुक्तिगाथाFऽएकापयवार्थः । इत्यवसितो नामनिष्पन्ननिक्षेपः, सम्प्रति सूत्रानुगमे सूत्रमुच्चारणीयं, तचेदम्
जीवाजीवविभर्ति मे, सुहेगमणा इओ। जाणिऊण भिक्खू, सम्म जयइ संजमे ॥१॥ जीवाश्च-उपयोगलक्षणा अजीवाश्च-तद्विपरीता जीवाजीवास्तेषां विभजनं विभक्तिः तत्तद्देदादिदर्शनतोऽपि । विभागेनावस्थापनं जीवाजीवविभक्तिस्तां 'मे' मम कथयत इति गम्यते 'शृणुत' आकर्णयत शिष्या इति शेषः, पठन्ति दीच 'सुणेह मित्ति, कथम्भूताः सन्त ?-एक-दर्शनान्तरोक्तजीवाजीवविभक्तावगतत्वेन मनः-चित्तं येषां ते एक
मनसः, इहैव श्रद्धानवन्त इत्युक्तं भवति, 'इतः' इत्यस्मादनन्तराध्ययनादेतद्विषयात् श्रवणाद्वाऽनन्तरं यां जीवा-| जीवविभक्तिं ज्ञात्वा 'भिक्षुः' अनगारः पाठान्तरतः श्रमणो वा सम्यगिति-प्रशंसाओं निपातः, ततश्च सम्यक्-||
दीप अनुक्रम [१४६५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||१|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
बत्तिः
प्रत
सत्रांक
उत्तराध्याही प्रशस्तं यथा भवत्येवं 'यतते' यनषान् भवति, क-संयमे-उक्तरूपसंयमविषय इति सूत्रार्थः ॥ आह-जीवाजी-13जीवाजीव विभक्तिज्ञानमिव लोकालोकविभक्तिज्ञानमपि संयमयतनायां विषयतयोपयुज्यत एवेत्याह
विभकि जीचा चेव अजीचा य, एस लोए वियाहिए । अजीवदेसमागासे अलोए से वियाहिए ॥२॥ ॥७ ॥
'जीयाथैवाजीवाश्च वक्ष्यमाणाः, कोऽर्थः?-जीवाजीवरूपः 'एष'इति प्रतिप्राणि प्रत्यक्षः प्रतीतो लोको विशे-IAL षेणाख्यातः-कथितो व्याख्यातस्तीर्थकृदादिभिरिति गम्यते, जीवाजीवानामेव यथायोगमाधाराधेयतया व्यवस्थितानां लोकत्वाद्, 'अजीच'त्ति, अनेनाजीवसमुदाय उपलक्ष्यते, स च धर्माधर्माकाशपुगलात्मकस्तस्य देश इत्र-1 शोऽजीवदेश आकाशमलोकः स व्याख्यातो,-'धर्मादीनां वृत्तिर्द्रयाणां भवति यत्र तत्क्षेत्रम् । तैव्यैः सह लोक-II स्तद्विपरीत बलोकाख्यम् ॥ १॥" इति भावार्थः ॥ इह च जीवाजीवानां विभक्तिः प्ररूपणाद्वारेणैवेति तां विधित्सुर्यथाऽसौ भवति तथाऽऽह
दब्बओ खित्तओ चेव, कालओ भावओ तहा । परूवणा तेसि भवे, जीवाणमजीवाण य ॥३॥ 'द्रव्यतः' द्रव्यमाश्रित्य इदमियझेदं द्रव्यमिति, क्षेत्रतश्चैव' इदमियति क्षेत्र इति, 'कालतः' इदमेवंविधकालस्थितीति, 'भावतः' इमेऽस्य पर्याया इति तथेति समुच्चये 'प्ररूपणा' यथाखं भेदायभिधानद्वारेण स्वरूपोपदर्शनं
दीप अनुक्रम [१४६५]
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||३|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
|'तेषाम्' इति विभजनीयत्वेन प्रक्रान्तानां भवेत्' स्याज्जीवानामजीवानां चेति सूत्रार्थः ॥ तत्र खल्पवक्तव्यत्वाइव्यतोऽजीवप्ररूपणामाह| रूषिणो चेवरूवी य, अजीवा दुविहा भवे । अरूषी दसहा वुत्ता, रूविणोऽवि चउब्विहा ॥ ४॥ धम्मथिकाए तसे, तप्पएसे य आहिए । अधम्मे तस्स देसे य, तप्पएसे य आहिए ॥५॥आगासे तस्स देसे य, तप्पएसे य आहिए । अद्धासमए चेव, अरूवी दसहा भवे ॥६॥
रूपस्पर्शायाश्रया मूर्तिस्तदेषामेषु वाऽस्तीति रूपिणः 'चः' समुच्चये 'एवेति पुरणे 'रूवी यत्ति अकारप्रश्लेषात्माग्व-13 भादचनव्यत्ययाद्वाऽरूपिणश्च, नैषामुक्तरूपं रूपमस्तीतिकृत्वा, अजीवाः 'द्विविधाः उक्तभेदतो द्विविधाः 'भयेति भवेयुः, तत्रापि 'अरूविति अरूपिणः 'दशधा' दशप्रकाराः 'उक्ताः' प्रतिपादितास्तीर्थकृदादिभिरिति शेषः, पश्चानिर्दि-12 टत्वेऽपि चोक्तन्यायतोऽनन्तरत्वाद्वाऽमीषां प्रथमत उपादानं, रूपिणः 'अपि' पुनरर्थस्ततश्च रूपिणः पुनः 'चतु-४ विधाः' चतुष्प्रकारा उभयत्राजीवा इति प्रक्रमः । तत्रारूपिणो दशविधानाह-धारयति गतिपरिणतजीवपुद्गलास्तत्वभाव इति धर्मः अस्तयश्चेह प्रदेशास्तेषां चीयत इति कायः-सङ्घातोऽस्तिकायस्ततो धर्मश्चासावस्तिकायश्च । धर्मास्तिकायः-सकलदेशप्रदेशानुगतसमानपरिणतिमद्विशिष्टं द्रव्यं, तस्व-धर्मास्तिकायस्य दिश्यते-प्रदेशा-18 पेक्षया समानपरिणतरूपत्वेऽपि देशापेक्षायां असमानपरिणतिमाश्रित्य विशिष्टरूपतया विवक्ष्यते-उपदिश्यत इति
दीप
अनुक्रम [१४६७]
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||४-६|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [४-६]
उत्तराध्यादेश:-त्रिभागचतुर्भागादिस्तद्देशः, तथा तस्येति-धर्मास्तिकायस्यैव प्रकर्षणान्त्यत्वात्प्रदेशान्तराभावतः कचिदप्यनुग- जीवाजीव
तरूपाभावलक्षणेन दिश्यते-प्राग्वदुपदिश्यत इति प्रदेशो-निरंशो भागस्तत्प्रदेशः 'आख्यातः' कथितः, न धारयबृहद्वृत्तिः
है|ति-गतिपरिणतावपि जीवपुद्गलास्तत्वभावतया नावस्थापयति स्थित्युपष्टम्भकत्वात्तस्येत्यधर्मः पदेऽपि पदैकदेशदर्श॥६७२॥ नादधर्मास्तिकायः 'तस्य' इत्यधर्मास्तिकायस्य 'देशश्च' उक्तरूपः 'तत्प्रदेशश्च तथाविध एवाख्यातः, तथा आङिति ।
मयोदया-खखभावापरित्यागरूपया काशन्ते-खरूपेणैव प्रतिभासन्ते तस्मिन् पदार्था इत्याकाशं, यदा त्वभिविधावाङ् तदा आङिति-सर्वभावाभिव्याया काशत इत्याकाशं तदेवास्तिकाय आकाशास्तिकायस्तस्य देशस्तत्प्रदेशश्च प्राग्वत् 'आख्यातः' कथितः, तथाऽद्धा-कालतद्रूपः समयोऽद्धासमयो निर्विभागत्वाचास न देशप्रदेशसम्भवः, आवलिकादयस्तु पूर्वसमयनिरोधेनवोत्तरसमयसद्भाव इति तत्त्वतः समुदयसमित्याद्यसम्भवेन व्यवहारार्थमेव कल्पिता || इतीह नोक्ताः, उपसंहारमाह-अरूपिणः 'दशविधा' इति दशप्रकारा भवेयुः पूर्वत्रिकत्रये एकस्यास्य प्रक्षेपात्, एषां च यथाक्रम गतिस्थित्यवगाहोपष्टम्भकत्वं वर्तना च लक्षणमवगन्तव्यं, तथा चाऽऽससेना-"जीवानां पुद्गलानां च, ग-14] तिस्थित्युपकारिणी । धर्माधर्मों स्थिती व्योम. त्वबगाहनलक्षणम् ॥१॥ कालस्तु वर्तनालिकः" इत्यादीति सूत्रत्र-III यार्थः॥ सम्प्रत्येतानेव क्षेत्रत आह
धम्माधम्मे य दोऽवेए, लोगमिसा वियाहिया। लोगालोगे य आगासे, समए समयखित्तिए ॥७॥
दीप
अनुक्रम [१४६८-१४७०]
॥६७RH
JABERatinintamational
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||७|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
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प्रत
'धर्माधौं' धर्मास्तिकायाधर्मास्तिकायो 'चः' पूरणे द्वावप्येतो 'लोकमात्रौ' लोकपरिमाणी व्याख्याती, ननु । धर्माधर्मावित्युक्ते द्वाविति गतार्थमेव द्वित्वसङ्ख्याया द्विवचनेनैवाभिधानात् , सत्यं, किन्तु गतार्थानामपि रश्यते है एव लोके प्रयोगः, तथा चाह जिनेन्द्रबुद्धि:-"यदि गतार्थानामप्रयोग एव स्यात् पचति देवदत्त इत्यत्र पचतीत्येतद्
ततिडेबैकत्वस्योक्तत्वादू देवदत्त इति सुप एकवचनस्याप्राप्तिरेव स्यादिति, लोकमानत्वं चानयोरेतदवष्टब्धाकाशस्लेव | लोकत्वात् , अलोकव्यापित्वे त्वनयो जीवपुद्गलयोरपि तत्र प्रचारप्रसङ्गेन तस्यापि लोकवावाः, उक्तं च-"धर्मा&धर्मविभुत्वात्सर्वत्र जीवपुद्गलविचारात् । नो लोकः कश्चित्स्यान्न च संमतमेतदार्याणाम् ॥ १॥" तथा चैती लोक
एव नालोक इत्यर्थादुक्कं भवति, तथा 'लोगालोगे य आगासे'त्ति लोकेऽलोके चाऽऽकाशं, सर्वगतत्वात्तस्य, 'समयः' इत्यद्धासमयः समयोपलक्षितं क्षेत्रं समयक्षेत्रम्-अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रास्त द्विषयभूतमस्थास्तीति समयक्षेत्रिकः, तत्पर
तस्तस्थासम्भवात्, समयमूलत्वादावलिकादिकल्पनायाः तेऽप्येतावत्क्षेत्रवर्त्तिन एव, तथा चोक्तम्-"समयावभलिकापक्षमासत्वंयनसम्जित्ताः । नृलोक एव कालस्य, वृत्तिर्नान्यत्र कुत्रचित् ॥१॥” इति सूत्रार्थः ॥ एतानेन । कालत आह
धम्माधम्मागासा, तिनिवि एए अणाइया । अपज्जवसिया चेब, सम्बद्धं तु वियाहिया ॥८॥ समएवि संतई पप्प, एवमेव वियाहिए । आएसं पप्प साईए, सपज्जवसिएवि य ॥९॥
दीप
अनुक्रम [१४७१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[८-९]
दीप
अनुक्रम
[१४७२
-१४७३]
उत्तराध्य.
बृहदुतिः
॥६७३ ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||८-९||
निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
arraferari च धर्माधर्माकाशानि त्रीण्यप्येतानि न विद्यते आदिरेषामित्यनादिकानि इत्यतः कालात्प्रभृत्यमूनि प्रवृत्तानीत्यसम्भवात्, न पर्यवसितान्यपर्यवसितान्यनन्तानीतियावत्, न हि कुतश्चित्कालात्परत एतानि न भविष्यन्तीति सम्भवः, चैवौ प्राग्वत्, तथा च 'सर्वाद्धा' सर्वकालं कालात्यन्तसंयोगे द्वितीया, 'तुः' अवधारणेऽतः सर्वदा खखरूपापरित्यागतो नित्यानीतियाबद् 'व्याख्यातानि ' कथितानि, सर्वत्र लिङ्गव्यत्ययः प्राग्वत्, समयोऽपि 'सन्ततिम्' अपरापरोत्पत्तिरूपप्रवाहात्मिकां प्राप्य' आश्रित्य 'एवमेव' अनाद्यपर्यवसितत्वलक्षणेनैव प्रकारेण 'व्याख्यातः' प्ररूपितः, पठन्ति च- 'एमेव संतई पप्प समएवित्ति स्पष्टम्, 'आदेश' विशेषं प्रतिनियतव्यक्तत्यात्मकं 'प्राप्य' अङ्गीकृत्य सादिकः सपर्यवसितः, 'अपिः' समुचये 'चः' पुनरर्थे भिन्नक्रमश्च देशं पुनः प्राप्येति योज्यः, विशेषापेक्षया ह्यभूत्वाऽयं भवति भूत्वा च न भवतीति सादिनिधन उच्यत इति सूत्रद्वयार्थः । इत्थमजीवानामरूपिणां द्रव्यक्षेत्रकालेः प्ररूपणा कृता, सम्प्रति भावप्ररूपणावसरः, तत्र चामूर्त्तत्वेन नामीपां ['प्रन्थाग्रम्' १७००० ] पर्याया रूपिपर्याया इव वर्णादयः प्ररूप्यमाणा अपि संवित्तिमानेतुं शक्याः अनुमानतस्त्वितरथाऽपि द्रव्यस्य पर्यायविकलस्यासम्भवाद्गम्यन्त एवेति तत्प्ररूपणामनादृत्य द्रव्यतो रूपिणः प्ररूपयितुमाह
संधाय खंदेसा य, तप्पएसा तहेव य । परमाणुणो अ बोद्धव्वा, रूविणो अचडव्विहा ॥ १० ॥ स्कन्दन्ति-शुप्यन्ति धीयन्ते च - पोष्यन्ते च पुद्गलानां विचटनेन चटनेन चेति स्कन्धाः 'चः' समुचये स्कन्धानां
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जीवाजीव
विभक्ति०
३६
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॥६७३ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१०|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
%
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प्रत
सुत्रांक
[१०]
%451-5-
देशा-भागाः स्कन्धदेशाः चः प्राग्वत् , तेषां स्कन्धानां प्रदेशा-निरंशा भागास्तत्प्रदेशाः 'तथैव चेति समुचये परमाश तेऽणवश्च परमाणवः-निर्विभागद्रव्यरूपाः 'चः' समुच्चये 'बोद्धव्याः' अवगन्तव्या रूपिणः 'चः' पुनरर्थे ततो
रूपिणः पुनः 'चतुर्विधाः' चतुष्प्रकाराः ॥ इह च देशप्रदेशानां स्कन्धेवेवान्तर्भावात् स्कन्धाः परमाणवश्रेति समासतो दावेव रूपिद्रव्यभेदी, तयोश्च किं लक्षणमित्याह-एकत्वेन' समानपरिणतिरूपेण 'पृथक्त्वेन' परमाण्वन्तरैरसङ्घा
तरूपेण लक्ष्यन्त इति शेषः, के एवम् ? इत्याह-स्कन्धः चस्य भिन्नकमत्वात्परमाणयश्च, स्कन्धा हि संहतानेकपरमाणुरूपाः, परमाणवश्च परमाण्वन्तरैरसंहतिभाजः ॥ अथवा उक्तन्यायतो दैविध्ये कथममी स्कन्धाः परमाणवश्च जायन्ते ? इत्याह-एगण' सूत्रार्द्धम् , एकत्वेन द्वयोश्च त्रयाणां यावदनन्तानामनन्तानन्तानां च पृथग्भूतपरमाणूना-17 मन्योऽन्यसङ्घाततो द्विप्रदेशिकत्वाद्यात्मकसमानपरिणतिरूपैकभावेन, तथा 'पृथक्त्वेन' बृहत्स्कन्धेभ्यो विचटनात्म
केन भेदेन, तथा श्वेतो धावतीतिवदावृत्तिन्यायत एकत्वेन पृथक्त्वेन च, तत्रैकत्वेन कैश्चिदणुभिः संहन्यमानतयैकपघरिणतिरूपेण पृथक्त्वेन च तत्समय एव केषाश्चिदणूनां विचटनाझेदात्मकेन 'स्कन्धाः' द्विप्रदेशादय उत्पद्यन्त इति
शेषः, चशब्दस्य प्राग्यत्सम्बन्धात्परमाणवश्च, एकत्वेनेति तृतीया, तत एकत्येन-असहायत्वेन लक्षितं यत्पृथक्त्वंस्कन्धेभ्यो विचटनात्मकं तेनोत्पद्यन्ते, एकत्वविशेषणं च यत्ससहायानां गणुकादीनां वास्तवं यच्चैकत्वपरिणतावपि देशादीनां बुद्धिपरिकल्पितं स्कन्धेभ्यः पृथक्त्वं न ततः परमाणव उत्पद्यन्त इत्याचष्टे, तथा चाहवाचक:-"संघाताद्
दीप अनुक्रम [१४७४]
8%
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||११|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
जीवाजीव विभक्ति.
बृहद्वृत्तिः
प्रत
३६
[११]
उत्तराध्य.
भेदात् सङ्घातभेदादिति, एभ्यस्त्रिभ्यः कारणेभ्यः स्कन्धा उत्पद्यन्ते, तथा भेदादेव परमाणु"रिति (तत्त्वा० अ० ५ सू०२६-२७ भाष्यम् ) ॥ एतानेव क्षेत्रत आह
एगत्तेण पुहुत्तेणं, खंधा य परमाणु य । ॥६७४॥ लोएगदेसे लोए अ, भइअब्बा ते उ खित्तओ। एत्तो कालविभागं तु, तेसिं चुकलं चउब्विहं ॥११॥
लोकस्य-चतुर्दशरज्ज्वात्मकस्यैकदेशः-एकद्यादिसङ्ख्यातासङ्ख्यातप्रदेशात्मकः प्रतिनियतो भागो लोकैकदेशस्तस्मिन् लोके च 'भक्तव्याः' भजनया दर्शनीयाः 'ते' इति स्कन्धाः परमाणपथ 'तुः' पूरणे क्षेत्रमाश्रित्य, अत्र चाविशेषोकावपि परमाणूनामेकप्रदेश एवावस्थानात्स्कन्धविषयैव भजना द्रष्टव्या, ते हि विचित्रत्वात्परिणतेबहुतरप्रदेशोपचिता!
अपि केचिदेकप्रदेशे तिष्ठन्ति, यदुक्तम्-“एगेणवि से पुण्णे दोहिवि पुण्णे सर्यपि माइजे" सादि, अन्ये तु सङ्खयेयेषु Aच प्रदेशेषु यावत्सकललोकेऽपि तथाविधाचित्तमहास्कन्धवद्भवेयुरिति भजनीया उच्यन्ते, 'अतः' इति क्षेत्रप्ररूपणा४|| तोऽनन्तरमिति गम्यते 'कालविभागं तु' कालभेदं पुनः 'तेषां स्कन्धादीनां वक्ष्ये 'चतुर्विध साधनादिसपर्यवसितापर्यवसितभेदेनानन्तरमेव वक्ष्यमाणेनेति सूत्रार्थः । इदं च सूत्रं षट्पादं गाथेत्युच्यते, तथा च तलक्षणं-"विषमाक्षरपादं वा पादैरसमं दशधर्मवत् । तत्रेऽस्मिन् यदसिद्धं गाथेति तत्पण्डितै यम् ॥१॥” इति, अत्र च दश
१ एकेनापि स पूर्णो द्वाभ्यामपि पूर्णः शतमपि मायात्
दीप
अनुक्रम [१४७५]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१२-१४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक
[१२-१४]
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धर्मवदित्यनेन, "दश धर्म न जानन्ति, धृतराष्ट्र ! नियोधत ॥ मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः, श्रान्तः द्धो बुभुक्षितः ॥ त्वरमाणच भीरुश्च, लुब्धः कामी च ते दश ॥१॥” इति गृात इति, प्रत्यन्तरेषु वन्तपादद्वयं न रयत एव ॥ यथाप्रतिज्ञातमाह
संतई पप्प तेऽणाई, अप्पज्जवसिआचि अ । ठिई पटुच्च साईआ, सप्पज्जवसिआवि अ ॥१२॥ असंखकालमुकोसं, इकं समयं जहन्नयं । अजीवाण य रूवीणं, ठिई एसा विआहिआ॥ १३ ॥ अणंतकालमुक्कोस, इक समयं जहषणयं । अजीवाण य रूबीणं, अंतरेयं विआहि ॥१४॥
'सन्ततिम्' उक्तरूपां प्राप्य' आश्रित्य 'ते' इति स्कन्धाः परमाणवश्व 'अणाई'त्ति अनादयोऽपर्यवसिता अपि च, न हि ते कदाचित्प्रवाहतो न भूता न चा न भविष्यन्तीति, स्थिति प्रतिनियतक्षेत्रावस्थानरूपा 'प्रतीत्य' अशीकत्य सादिकाः सपर्यवसिता अपि च, तदपेक्षया हि प्रथमतस्तथाऽस्थित्वैवावतिष्ठन्ते अवस्थाय च न पुनर्न तिष्ठन्तीत्यभिप्रायः । सादिसपर्यवसितत्वेऽपि कियत्कालमेषामवस्थितिः? इत्याह-'असङ्ग्यकालम्' आगमप्रतीतमुत्कृष्टा, सम-1M यमेकं जघन्यका, अजीवानां रूपिणां पुद्गलानामिति योऽर्थः, स्थितिरेषा व्याख्याता, जघन्यत एकसमया उत्कृष्टतस्वसङ्ख्येयकालम् , असङ्खधेयकालात्परतोऽवश्यमेव विचटनात् । इत्थं कालद्वारमाश्रित्य स्थितिरुक्ता, सम्प्रत्येतदन्तर्गतमेवान्तरमाइ-'अनन्तकालं' समयप्रसिद्धमुत्कृष्टमेकं समयं जघन्य कमजीवानां रूपिणाम् 'अंतरेय'न्ति अन्तरं
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दीप अनुक्रम [१४७६-१४७८]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१५-४६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
विभक्तिः
प्रत सूत्रांक [१५-४६]
उत्तराध्य. विवक्षितक्षेत्रावस्थितेः प्रच्युतानां पुनस्तत्मासेर्व्यवधानमेतद्-उक्तरूपं व्याख्यातं, तेषा हि विवक्षितक्षेत्रावस्थिति- जीवाजीव बृहद्वृत्तिः
प्रच्युतानां कदाचित्समयावलिकादिसङ्ख्यातकालतोऽसंख्यातकालाद्वा पल्योपमादेर्यावदनन्तकालादपि सम्भवतीति
सूत्रत्रयार्थः ॥ एतानेद भावतो विधातुमाह॥६७५||
बन्नओ गंधओचेच, रसओ फासओ तहा। संठाणओ य विनेओ, परिणामो तेसि पंचहा ॥१५॥ वनओ परिणया जे उ, पंचहा ते पकित्तिया। किण्हा नीला य लोहिया, हालिद्दा सुकिला तहा ॥१६॥ गंधओ दीपरिणया जे य, दुविहा ते वियाहिया। सुन्भिगंधपरिणामा, इम्भिगंधा तहेव य ॥१७॥ रसओ परिणया|
जे उ, पंचहा ते पकित्तिया । नित्त कडुयकसाया, अंबिला महुरा तहा ॥१८॥ फासओ परिणया जे उ,
अट्टहा ते पकित्तिया । कक्खडा मउया चेव, गुरुया लहया तहा ॥१९॥ सीया उपहा य निद्धा य, तहा। द लुक्खा य आहिया । इति फासपरिणया एए, पुग्गला समुदाहिया ॥२०॥ संठाणपरिणया जे उ, पंचहा से पकित्तिया । परिमंडला य वहा य, तंसा च उरंसमायया ॥ २१॥ वपणओ जे भवे किण्हे, भइए से उ|
॥६७५॥ १|| गंधओ। रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य॥२२॥ वपणओ जे भवे नीले, भइए से उ गंधओ। है रसओ फासओचेच, भइए संठाणओवि य॥२३॥ वष्णओ लोहिए जे उ, भइए से उ गंधओ । रसओX साफासओ चेव, भइए संठाणओथि य॥ २४ ॥ वपणओ पीअए जे उ, भइए से उगंधओ। रसओ फासओ
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दीप अनुक्रम [१४७९-१५१०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१५-४६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [१५-४६]
पायेब, भइए संठाणोवि अ॥२५॥ वपणओ सुकिले जे छ, भइए से उ गंधओ । रसओ फासओ चेव, लाभाए संठाणओवि अ ॥ २६ ॥ गंधओ जे भवे सुब्भी, भइए से उ वण्णओ । रसओ फासओ चेय, भहए
ठाणओवि अ ॥ २७ ॥ गंधओ जे भवे दुब्भी, भइए से उ वण्णओ। रसओ फासओ चेव, भहए संठाण४ ओवि अ ॥२८॥ रसओ तित्तओ जे उ, भइए से उ वन्नओ । गंधओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि Gय ॥२९॥ रसओ कडुए जे उ, भइए से उ वण्णओ। गंधओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि अ ॥३०॥ रसओ कसाए जे उ, भइए से उ वणओ। गंधओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि अ॥ ३१॥ रसओ अंबिले जे उ, भइए से उ वण्णओ । गंधओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि अ॥ ३२॥ रसओ महुरए जे उ, भइए से उवण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाणओवि य ॥ ३३ ॥ फासओ कक्खडे जे उ,
भइए से उ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाणओवि अ॥३४॥ फासओ मउए जे उ, भइए से उ ४ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाणओवि अ॥ ३५॥ फासओ गुरुए जे उ, भइए से उ वष्णओ। दगंधओ रसओचेव, भइए संठाणओवि य ॥३६॥ फासओ लहुए जे उ, भइए से उ वण्णओ। गंधओरसओ
चेच, भइए संठाणओवि अ॥३७॥ फासओ सीअए जे उ, भइए से उ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव भइए संठाणओवि अ॥ ३८॥ फासओ जणहए जे उ, भइए से उ वपणओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाणओवि अ ॥ ३९ ॥ फासओ निद्धए जे उ, भइए से उ वष्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाण
RASIR
दीप अनुक्रम [१४७९-१५१०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१५
-४६]
दीप
अनुक्रम [१४७९
-१५१०]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [-] / गाथा ||१५-४६||
निर्युक्ति: [ ५५६ ...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य. ? ओवि अ ॥ ४० ॥ फासओ लुक्खए जे उ, भइए से उ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए संठाणओवि अ ॥ ४१ ॥ परिमंडल संठाणे, भइए से ज वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए फासओ वि य ॥ ४२ ॥ संठावृहद्वृतिः ओ भवे वहे भइए से उ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए फासओषि अ ॥ ४३ ॥ संठाणओ भवे तंसे, भइए से उ वण्णओ। गंधओ रसओ चेव, भइए फासओबि अ ॥ ४४ ॥ संठाणओ य चउरंसे, भइए से उ वण्णओ। गंघओ रसओ चेव, भइए फासओवि अ ॥ ४५ ॥ जे आययसंठाणे, भइए से उ वन्नओ । गंधओ रसओ चैव, भइए फासओवि य ॥ ४६ ॥
॥६७६ ॥
गत चैव रसतः स्पर्शतस्तथा संस्थानतश्च, अयमर्थः - वर्णादीन्पञ्चाश्रित्य 'विज्ञेयः' ज्ञातव्यः 'परिणामः' स्वरूपावस्थितानामेव वर्णाद्यन्यथाऽन्यथाभवनरूपः 'तेषाम्' इति परमाणूनां स्कन्धानां च 'पञ्चधा' पञ्चप्रकाराः, भेदहेतोवर्णाद्युपधेः पञ्चविधत्वादिति भावः । प्रत्येकमेषामेवोत्तरभेदानाह - 'वर्णतः परिणताः' वर्णपरिणाम भाज इत्यर्थः 'ये' अण्वादयः 'तुः' पूरणे पञ्चधा ते 'प्रकीर्त्तिताः' प्रकर्षेण सन्देहापनेतृत्वलक्षणेन संशब्दिताः, तानेवाह-कृष्णाः कज्जलादिवत् नीलाः नील्यादिवत् लोहिता हिङलुकादिवत् हारिद्राः हरिद्रादिवत् शुक्काः शङ्खादिवत् 'तथे 'ति समुचये । 'गन्धतो' इत्यादीनि स्पष्टान्येव नवरं 'सुभि' (गन्ध ) ति सुरभिगन्धो यस्मिन् स तथाविधः परिणामो येषां तेऽमी सुरभिगन्धपरिणामाः श्रीखण्डादिवत, 'दुब्भि'त्ति दुरभिर्गन्धो येषां ते दुरभिगन्धा लशुनादिवत्, तिक्ताच कोसात
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१५-४६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [१५-४६]
ACACACK
क्यादिवत् कटुकाश्च सुण्ठ्यादिवत् कपायाच अपककपित्थादिवत्तिक्तकटुकषायाः आम्लाः आम्लवेतसादिवत् मधुराः शर्करादिवत् ककेंशाः पाषाणादिवत् मृदवः हंसरूतादिवत् गुरवः हीरकादिवत् लघवः अतूलादिवत । शीताः मृणालादिवत् उष्णाः वयादिवत् स्निग्धाः घृतादिवत् रूक्षाः भूत्यादिवत्, उपसंहारमाह-'इती यमुना प्रकारेण स्पर्शपरिणताः 'एते' स्कन्धादयः पूरणगलनधर्माणः पुद्गलाः 'समुदाहृताः' सम्यक्प्रतिपादितास्तीर्थकृदादिभिः । संतिष्ठन्त एभिः स्कन्धादय इति संस्थानानि तद्रूपेण परिणताः परिमण्डलादयः प्राग्ययावर्णितखरूपा
एव ७ । सम्प्रत्येषामेव परस्परसंवेधमाह-वर्णतः 'या' स्कन्धादिर्भवेत्कृष्णः 'भइए'त्ति भाज्यः 'से उति स पुनः है'गन्धतः' गन्धमाश्रित्य सुरभिगन्धी दुर्गन्धो वा स्यात् न तु नियतगन्ध एवेति भावः, एवं रसतः स्पर्शतश्चैव
भाज्यः संस्थानतोऽपि च, अन्यतररसादियोग्य एवासौ भवेदिति हृदयम्, अत्र च गन्धौ द्वौ रसाः पञ्च स्पर्शा अष्टौ संस्थानानि पञ्च, एते च मीलिता विंशतिरित्येक एव कृष्णवर्ण एतावतो भङ्गान् लभते २०, एवं नीलोऽपि २०, लोहितोऽपि २०, पीतक इति-हारिद्रः सोऽपि २०, 'सुकिलत्ति शुक्लोऽप्येतावत एव भन्नान् लभत इति २०, एवं पञ्चभिरपि वर्णैर्लब्धं शतम् १०० । गन्धतो यः स्कन्धादिर्भवेत् 'सुम्भित्ति सुरमिर्भाज्यः स तु वर्णतो|ऽन्यतरकृष्णादिवर्णवान् स्वादितिभावः, एवं रसतः स्पर्शतश्चैव भाज्यः संस्थानतोऽपि च, इह च रसादयोऽष्टादश ते च पञ्चभिर्वर्गौलितैनयोविंशतिर्भवन्ति २३, एवं च दुर्गन्धविषया अध्येतावन्त एवं २३, ततश्च गन्धद्वयन
दीप अनुक्रम [१४७९-१५१०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१५
-४६]
दीप अनुक्रम [१४७९
-१५१०]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||१५-४६||
अध्ययनं [ ३६ ],
निर्युक्ति: [ ५५६ ...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
॥६७७॥
लब्धा भङ्गानां षट्चत्वारिंशत् ४६ । १४ । रसतस्तिक्तको यस्तु स्कन्धादिर्भाभ्यः स तु वर्णतो गन्धतः स्पर्शतश्चैव वृहद्वृत्तिः ५ भाज्यः संस्थानतोऽपि च, इह चोक्तन्यायतो विंशतिर्भङ्गास्तिक्तेनावाप्यन्ते २०, एवं कटुकेन २० कषायेण २० आम्लेन २० मधुरेण २० चैतावन्त एवावाप्यन्ते, एवं च रसपञ्चकसंयोगे लब्धं शतम् १००। स्पर्शतः कर्कशो यस्तु स्कन्धादिर्भाज्यः स तु वर्णतो गन्धतो रसतश्चैव भाज्यः संस्थानतोऽपि च, इह चोक्तन्यायतो वर्णादयः सप्तदशेति तद्योगतस्तावत एव भङ्गानवाशोति १७। एवं मृदुः १७ गुरुः १७ लघुः १७ त्रिग्धः १७ रूक्षः १७ शीत १७ उष्णश्च १७ एतावत एव भङ्गानयाप्रोति, एतन्मीलने च जातं पत्रिंशं शतम् १३६ । १७ । परिमण्डलसंस्थाने यो वर्त्तत इति शेषः, भाज्यः स तु सामान्यप्रक्रमेऽपि स्कन्धः, परमाणूनां संस्थानासम्भवात्, वर्णतो गन्धतो रसतश्चैव भाज्यः स्पर्शतोऽपि च, अत्र च वर्णादय उक्तनीत्या विंशतिस्ततस्तद्योगात्परिमण्डलेन विंशतिरेव भङ्गा लभ्यन्ते २०, एवं वृत्तेन २० व्यस्त्रेण २० चतुरस्रेण २० आयतेन च २० प्रत्येकमेतावन्त एव भङ्गाः प्राप्यन्त इति संस्थानपञ्चकभङ्गसंयोगे लब्धं शतम् १००, एवं वर्णरसगन्धस्पर्शसं स्थानानां सकलभङ्गसङ्कलनातो जातानि यशीत्यधिकानि चत्वारि शतानि, अङ्कतोऽपि ४८२, सर्वत्र च जातावेकवचनं । ३२ । परिस्थूरन्यायतश्चैतदुच्यते, अन्यथा प्रत्येकमप्येषां ॥६७७॥ तारतम्यतोऽनन्तत्वादनन्ता एव भङ्गा संभवन्ति, इत्थं चैतत्परिणामवैचित्र्यं केवलागमप्रमाणावसेयमेवेति न खम| तिकल्पित हेतुभिश्चित्तमा कुली कर्त्तव्यमिति द्वात्रिंशत्सूत्रावयवार्थः ॥ सम्प्रत्युपसंहारद्वारेणोत्तरग्रन्थसम्बन्धमाह -
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~388~
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र[ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
Page #389
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||४७|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
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सत्राक
[४७]
एसा अजीवविभत्ती, समासेण वियाहिया । इत्तो जीवविभत्ति, बुच्छामि अणुपुब्बसो ॥४७॥ 'एषा' अनन्तरोक्ताऽजीवविभक्तिर्व्याख्याताऽनन्तरं जीवविभक्तिं वक्ष्यामि 'अणुपुब्बसो'त्ति आनुपूयेति सूत्रा-14 र्थः॥ यथाप्रतिज्ञातमाह
संसारस्था य सिद्धा य, दुविहा जीवा वियाहिया। सिद्धा णेगविहा बुत्ता, तं मे कित्तयओ सुण ॥४८॥ संसरन्युपलक्षणत्वादवतिष्ठन्ते च जन्तवोऽस्मिन्निति संसारो-गतिचतुष्टयात्मकस्तत्र तिष्ठन्तीति संसारस्थाःनरकादिगतिवर्तिनस्ते च सिद्धाश्च प्रागुक्तव्युत्पत्तयः, 'द्विविधाः' उपदर्शितभेदतो द्विभेदा जीवा व्याख्याताः,
तत्र सिद्धाः 'अनेकविधाः' अनेकप्रकारा उक्तास्तमिति सूत्रत्वात्तान, पठन्ति च-दुविहा जीवा भवन्ति तत्थाणेद गविहा सिद्धा तेत्ति, 'मे' मम कीर्तयतः 'सुण'त्ति शृणुत, अल्पवक्तव्यत्वाच पश्चानिर्देशेऽपि प्रथमतः सिद्धभेदाभिजधानप्रतिज्ञानमदुष्टमिति सूत्रार्थः ॥ अनेकविधत्वमेवैपामुपाधिभेदत आह
इत्थीपुरिससिद्धा य, तहेव य नपुंसगा। सलिंगे अन्नलिंगे य, गिहिलिंगे तहेव य ॥४९॥
उकोसोगाहणाए य, जहन्नमज्झिमाइ य । उहूं अहे य तिरियं च, समुदंमि जलंमि य ॥५०॥ 'इत्थीपुरिससिद्ध'त्ति सिद्धशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते ततः खियश्च ते पूर्वपर्यायापेक्षया सिद्धाश्च स्त्रीसिद्धा एवं
दीप अनुक्रम [१५११]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
-५०]
उत्तराध्य. पुरुषसिद्धाश्च, तथैव च 'नपुंसगति, इहोत्तरत्र च प्रक्रमेण सिद्धशब्दयोगानपुंसकसिद्धाः खलिझसिद्धाः खलिङ्गं च जीवाजीव बृहद्वृत्तिः
मुक्तिपथप्रस्थितानां भावतोऽनगारत्वादनगारलिङ्गमेव रजोहरणमुखवस्त्रिकादिरूपम्, अन्यद्-एतदपेक्षया भिन्नं । तञ्च तलिङ्गं चान्यलिङ्गं तस्मिंश्च शाक्यादिसम्बन्धिनि सिद्धाः, 'गृहिलिङ्गे' गृहस्थवेषे सिद्धा मरुदेवीखामिनीवत् ,
विभक्ति. ॥६७८॥ तथैवे' त्युक्तसमुचये चकारस्तु तीर्थातीर्थसिद्धाद्यनुक्तभेदसंसूचकः, इह च ये स्त्रीनिर्वाणं प्रति विप्रतिपयन्ते त एवं
४वाच्या-इह खलु यस्य यत्रासम्भवो न तस्य तत्र कारणावैकल्यं, यथा सिद्धशिलायां शाल्यङ्करस्य, अस्ति च है तथाविधस्त्रीषु मुक्तेः कारणावैकल्यं, न चायमसिद्धो हेतुर्यतोऽस्सासिद्धत्व किं स्त्रीणां पुरुषेभ्योऽपकृष्यमाणत्वेनाहो
खिन्निर्वाणस्थानाद्यप्रसिद्धत्येन निर्वाणसाधकप्रमाणाभावेन वा?, तत्र यदि तावत् पुरुषेभ्योऽपकृष्यमाणत्वेन तदाश तत् किं सम्यग्दर्शनादिरत्नत्रयाभावेन विशिष्टसामर्थ्यासत्वेन पुरुषानभिवन्द्यत्वेन स्मारणायकर्तृत्वेनामहर्दिकत्वेन मायादिप्रकर्षवत्वेन बेति विकल्पाः, तत्र न तावत्सम्यग्दर्शनादिरनत्रयस्थाभावेन यतस्तस्थासौ किमविशिष्टस्य प्रकर्ष-14 पर्यन्तप्राप्तस्य वा?, यद्यविशिष्टस्य तदा किमियं चारित्रस्थासम्भवेनोत ज्ञानदर्शनयोखयाणांवा, यदि चारित्रस्था-12 सम्भवेन तदा सोऽपि कि सचेलत्वेन स्त्रीत्वस्य चारित्रविरोधित्वेन मन्दत्वेन मन्दसत्त्वतया वा ?, यदि सचेलत्वेन तदा चेलस्यापि चारित्राभावहेतुत्वं परिभोगमात्रेण परिग्रहरूपत्वेन वा ?, यदि परिभोगमात्रेण तदा तत्परिभोगोऽपि ॥७॥ तासां तत्परित्यागाशक्तत्वेन गुरूपदिष्टत्वेन वा, न तावत्वत्परित्यागाशक्तत्वेन यतः-"प्राणेभ्यो नापरं प्रियम्"
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
CACAACAR
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
4%-
[४९
-E%
-५०]
अथ च तानपि त्यजन्त्य एता दृश्यन्ते, अथ गुरूपदिष्टत्वेन तथा सति गुरूणामपि चारित्रोपकारित्वेन तासा तदुपदेशः अन्यथा वा', यदि चारित्रोपकारित्वेन किं न पुरुषाणामपि', अधावला एवैता बलादपि पुरुषः परिभुज्यन्त इति तद्विना तासां चारित्रवाधासम्भवो न पुरुषाणामिति न तेषां तदुपदेशः, उक्तं च-"वस्त्रं विना न चरणं तासामित्सईतीच्यत । विनाऽपि पुंसामिति न्यवार्यते"ति, एवं सति न चेलाचारित्रामावस्तदुपकारित्वात्तस्य, तथाहि-यद्यस्योपकारि न तत्तस्याभावहेतुः, यथा घटस्य मृत्पिण्डादि, उपकारि चोक्तनीत्या चारित्रस्य चेलम्, अथान्यथेति पक्षः, अयमपि न क्षमो, यतोऽसौ चेलस्य चारित्रं प्रत्यौदासीन्येन बाधकतया वा?, न चेदमस्मिन्नुभयमप्यस्ति, पुरुषाभिभवरक्षकत्वेन तस्य तासु तदुपकारितया अनन्तरमेवोक्तत्वात्, नापि चेलख परिग्रहरूपत्वेन
चारित्राभावहेतुत्वं, यतो मूव परिग्रह इतीहैव परीपहाध्ययने निर्णीतं, यदि च चेलस्य परिप्रहरूपता तदा तथादिविधरोगोपसर्गादिषु पुरुषाणामपि चेलसम्भवे चारित्राभावेन मुक्त्यभावः स्यात्, उक्तं च-"अर्शीभगन्दरादिषु ।
रहीतचीरो यतिन मुच्येत । उपसर्गे का चीरे" इत्यादि, किञ्च-चेलस्य परिप्रहरूपत्वे-"आमे तालपलंबे भिन्ने
अभिन्ने वा णो कप्पइ णिग्गंथीणं परिग्गदित्तए वा” इत्यादि निर्ग्रन्थ्या व्यपदेशवागमे न श्रूयेत, अतो न सचेदालत्वेन चारित्रासम्भवः, नापि स्त्रीत्वस्य चारित्रविरोधित्वेन यतो यदि स्त्रीत्वस्य चारित्रविरोधः स्यात्तदाऽविशेषेणैव है तासां प्रत्राजनं निषेध्येत, न तु विशेषेण, यथोच्यते-"गन्भिणी बालवच्छा य, पब्बावेउं न कप्पई"त्ति, नापि
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
JAMERatinintamational
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥६७९॥
[४९
-५०]
मन्दसत्त्वतया, यतः सत्त्वमिह व्रततपोधारणविषयमेपितव्यम् , अन्यस्यानुपयोगित्वात् , तथ तास्वप्यनल्सं सुदुर्धर- जीवाजीव शीलवतीपु संभवति, उक्तं च-"ब्राझीसुन्दराजीमतीचन्दनागणधराद्याः । अपि देवमनुजमहिता विख्याताः
विभक्तिः शीलसत्त्वाभ्याम् ॥१॥" अतो न चारित्रासम्भवेन विशिष्टरलत्रयस्याभावः, इत्थं च चारित्रसम्भवे सिद्ध एव ज्ञानदर्शनसम्भवः, तत्पूर्वकत्वात्तस्य, उक्तं हि-"पूर्वद्वयलाभः पुनरुत्तरलाभे भवति सिद्धः" इति, तदभावपक्षोऽपि नाश्रयणीयः, त्रयाभावपक्षस्त्वेवं त्रितयसिद्धावनवसर एव, दृश्यन्ते च सम्प्रत्यपि त्रितयमभ्यस्यन्त्यस्ताः, उक्तं च"जानीते जिनवचनं श्रद्धत्ते चरति चार्यिकाऽशबलम्" इति, अथ प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तस्याभावः, एवं तर्हि तस्याप्यभावः किं कारणाभावेन विरोधिसम्भवेन वा?, न तावत्कारणाभावेन, अविशिष्टरलत्रयाभ्यासस्यैव तन्निबन्धत्वेनागमेऽभिधानात् , तस्य च स्त्रीष्वनन्तरमेव समर्थितत्वात् , नापि विरोधिसम्भवेन, तस्यास्मादशामत्यन्तपरोक्षत्वेन केनचिद्विरोधानिर्णयादिति न रत्नत्रयाभावेन स्त्रीणां पुरुषेभ्योऽपकृष्यमाणत्वम् , अथ विशिष्टसामासत्त्वेन, इदमपि कथमिति वाच्यं ?, किं तावद् असप्तमनरकपृथ्वीगमनत्वेनाहोस्सिद्वादादिलब्धिरहितत्वेनाल्पश्रुतत्वेनानुपस्थाप्यतापाराञ्चितकशून्यत्वेन वा?, तत्र न तावदसप्तमनरकपृथ्वीगमनत्वेन, यतोऽत्र किं सप्तमनरकपृथ्वीगमनाभायो यत्रैव ॥६७९॥ जन्मनि तासां मुक्तिगामित्वं तत्रैवोच्येत सामान्येन वा ?, तत्र ययाद्यो विकल्पस्तदा पुरुषाणामपि यत्र जन्मनि । मुक्तिगामिता न तत्रैव सप्तमपृथ्वीगमनमिति तेषामपि मुक्त्यभावप्रसङ्गः, अथ सामान्येन, अत्र चायमाशयो-यथा
处久久-久久久
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[४९
-५०]
RESERSXXERCELERS
"छडिंच इत्थियाओ मच्छा मणुया य सत्तमी पुढवीं" इत्यागमय चनात्पुरुषाणामेव सप्तमनरकपृथ्वीगमनयोग्यकर्मोपार्जनसामर्थ्यं न स्त्रीणामित्यधोगतौ पुरुषतुल्यसामर्थ्याभावादूर्ध्वगतावपि तासां तदभावोऽनुमीयते ततस्तासां पुरुषेभ्योऽपकृष्यमाणतेति, तदप्ययुक्तं, यतो येषामधोगती तुल्यसामर्थ्याभावस्तेषामूर्ध्वगतावप्यनेन भाव्यमिति न नियमोऽस्ति, तथाहि-"समुच्छिमभुयगखगचउप्पयसप्पित्थिजलचरेहितो । सनरेहितो सत्तसु कमोववजंति | नरएसु ॥१॥" इति वचनाडुजगचतुष्पत्सर्पखगजलचरनराणामधोगतावतुल्यं सामर्थ्यमूर्द्धगती तु "सन्नितिरिक्खेहिंतो सहस्सारंतिएसु देवेसु । उप्पाजंति परेसुवि सब्बेसुवि माणुसेहितो ॥१॥" इति वचनादेषामासहसारान्तोपपातानुल्यमेव सामर्थ्यम् , उक्तं च-"विषमगतयोऽप्यधस्तादुपरिष्टात्तुल्यमासहस्रारम् । गच्छन्ति च तिर्यश्चस्तदधोगत्यूनताऽहेतुः ॥३॥" अतो नासप्तमनरकपृथ्वीगमनत्वेन विशिष्टसामर्थ्यासत्त्वम्, अथ चादादिलब्धिरहितत्वेन, तदप्यचारु, यतो यदि वादादिलब्धिमत्वेन विशिष्ट सामर्थ्य व्याप्तमुपलब्धं भवेत्ततस्तन्निवृत्तौ तस्य । निवृत्तिः स्यात्, न चैवम् , अनयोाप्यव्यापकभावस्य कचिदनिश्चयात् , अल्पश्रुतत्वं तु मुक्त्यवाप्त्याऽनुमितविशिष्टसामध्यमाचतुपादिभिरनैकान्तिकमित्यनुद्घोष्यमेव, यदप्यनुपस्थाप्यतापाराञ्चितकशून्यत्वेनेत्युच्यते, तदप्ययुक्तं,
१ षष्ठीं च स्त्रियो मत्स्या मनुजाश्च सप्तमी पृथ्वीम् । २ समूछिमभुजपरिसर्पख घरचतुष्पदसर्पचीजलचरेभ्यः । समनुष्येभ्यः सप्तम । ४/मादुपपद्यन्ते नरफेषु ।। २ ।। ३ संज्ञितिर्यग्भ्यः सहसारान्तिकेषु देवेषु । उत्पद्यन्ते परेष्वपि सर्वेष्वपि मनुष्येभ्यः ।। ३ ।।
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
जीवाजीव
प्रत
विभक्ति
सूत्रांक
[४९-५०]
उत्तराध्य. ॥ यतो न तनिषेधाद्विशिष्टसामर्थ्याभावः प्रतीयते, योग्यतापेक्षो हि चित्रः शास्त्रे विशुद्धषुपदेशः, यदुक्तम्-"संवरनि-
जररूपो बहुप्रकारस्तपोविधिः शाखे । रोगचिकित्साविधिरिव कस्यापि कथञ्चिदुपकारी ॥१॥" यच पुरुषानभिबृहद्वृत्तिः
वन्द्यत्वं हेतुरुक्तः तदपि सामान्येन गुणाधिकपुरुषापेक्षं वा!, यदि सामान्येन तदाऽसिद्धतादोषः, तीर्थकरजनन्यादयो हि शक्रादिभिरपि प्रणताः किम शेषपुरुषैः । गुणाधिकपुरुषापेक्षं चेगणधरा अपि तीर्थकृद्भिर्नाभिवन्धत द इति तेषामप्यपकृष्यमाणत्वम् , अथ तीर्थशब्दस्याद्यगणधराभिधायित्वात्तीर्थप्रणामपूर्वकत्वाच्चाईद्देशनाया असिद्ध
मेव तदनभिवन्द्यत्वं गणधराणाम्, एवं तर्हि चातुर्वर्णसङ्घस्यापि तदभिधेयत्वात्तदन्तर्भावाच स्त्रीणामहद्भिरपि
वन्द्यत्वे कथं पुरुषानभिवन्द्यत्वेन तासां तेभ्योऽपकृष्यमाणत्वम् ?, अथ स्मारणायकर्तृत्वेन, एवं सति समानेऽपि दरबत्रये शिष्याचार्ययोराचार्यस्यैव मुक्तिः स्थान शिष्यस्य, स्मारणाद्यकर्तृत्वेन तस्य ततोऽपकृष्यमाणत्वात् , न चैत
दागमिक, चण्डरुद्राद्याचार्यशिष्याणामागमे निःश्रेयसश्रवणात्, अथामहर्दिकत्वेन स्त्रीणां पुरुषम्योऽपकृष्यमाणत्वं, तथा सति प्रष्टच्योऽसि-किमाध्यात्मिकीमृद्धिमाश्रित्य बाखां वा?, तत्र न तावदाध्यात्मिकीमुक्तन्यायतो रत्नत्रयस्य तासां समर्थितत्वात, नापि वायाम् , एवं हि महत्या तीर्थकरादिलक्षम्या गणधरादयचक्रधरादिलक्ष्म्याश्चेतरक्ष(रऽक्ष)त्रियादयो न भाजनमिति तेषामप्यमहर्दिकत्वेनापकृष्यमाणत्वान्मुक्तिकारणवैकल्यप्रसङ्गः, यदपि मायादिप्रकर्षवत्वेनेत्युच्यते, तदप्यसत् , तस्योभयोरपि तुल्यत्त्वेन दर्शनादागमे च श्रवणात्, श्रूयते हि चरमशरीरिणामपि
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
॥१८॥
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
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सूत्रांक
-५०]
नारदादीनां मायादिप्रकर्षवत्त्वम् , अतो न तासां पुरुषेभ्योऽपकृष्यमाणत्वेन कारणावैकल्यस्य हेतोरसिद्धता, यदपि। निर्वाणस्थानाद्यप्रसिद्धत्वेनेत्युक्तं, तदप्यसाधकं, यतो न निर्वाणस्थानादिप्रसिद्धिः कारणापैकल्यस्य कारणं ब्यापक वा येन तन्निवृत्ती तस्स निवृत्तिः, अथाऽऽथ यदि स्त्रीणां मुक्तिकारणावकल्पमभविष्यत् मुक्तिरप्युदपत्स्यत, तथा च तत्स्थानादिप्रसिद्धिरपीति, नैवं, तत्स्थानादिप्रसिद्धि प्रति मुक्तेरव्यभिचारित्वाभावात् , अन्यथा हि पुरुषाणामपि येषां मुक्तिस्थानाधप्रसिद्धिस्तेषां तदभावप्रसङ्गः, अर्थतत्साधकप्रमाणाभावेन प्रकृतहेतोरसिद्धता, तत्रापि तत्साधकप्रमाणस्य किं प्रत्यक्षस्थानुमानस्यागमस्य वा, तत्र यदि प्रत्यक्षस्य तदा किं खसम्बन्धिनः सर्वसम्बन्धिनो वा , खसम्बन्धिनोऽपि किं वाचं यद्यथोदितप्रत्युपेक्षणादिरूपं कारणावैकल्यं तद्विषयस्य यदिवाऽऽन्तरं यचारित्रादिपरिणामात्मकं तद्रोचरस्य , न तावदायस्य, खीष्वपि यथोदितप्रत्युपेक्षणादेरक्षणविधानस्वेक्षणात . अथ द्वितीयस्य तदा तदभावस्याग्दृशां पुरुषेष्वपि समानत्वात्तेषामपि कारणावैकल्यस्यासिद्धिप्रसङ्गः, सर्वसम्बन्धिनस्तु प्रत्यक्षस्यासर्वविदा सत्वेनासत्त्वेन (वा) क्वचिनिश्चेतुमशक्यत्वात् , तदभावेन प्रकृतहेतोरसिद्धतेत्यनुद्घोष्यमेव, अथानुमानस्य, तदप्यसत्, तदभावस्य पुरुषेष्वपि समानत्वात, न बर्वाग्दशां स्त्रीषु पुरुषेषु वा तत्त्वतस्तदव्यभिचारि लिङ्गमस्ति येनानुमानं स्यात्, अथास्येव पुरुषेष्वनुमानं, तथाहि-यदुत्कर्षापकर्षाभ्यां यस्यापकर्पोत्कर्षों तस्यात्यन्तापकर्षे तदत्यन्तोकर्पवदृष्टं, यथाऽभ्रपटलापगमे सवितृप्रकाशः, रागाद्युत्कर्षांपकर्षाभ्यामपकर्षोत्कर्षवच चारित्रादि, न च रागाद्यपच
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
बृत्तिः
प्रत सूत्रांक [४९-५०]
॥३८॥
यप्रकर्षस्थासम्भयो यतो यत्प्रकृष्यमाणहानिकं तत्कचित्सम्भविहानिप्रकर्षनिष्ठमपि.रष्एं, यथा हेमनि कालिकाकिट्टादि, जीवाजीव प्रकृष्यमाणहानयश्च रागादयः, तथैव तेषां प्राणिषु प्रतीतत्वात् , नन्वेतत्त्रीष्वपि समानमिति, नाप्यागमस्थ, तस्य प्रस्तुतस्यापि साक्षात्वीनिर्वाणाभिधायित्वेनार्थतस्तत्कारणापैकल्यसाधकत्वात्, न च स्त्रीशब्दस्यान्यार्थत्वं परि
विभक्ति कल्पनीयं, तद्धि लोकरूढितः आगमपरिभाषातो वा भवेत् ?, न तावलोकरूढितः, लोके हि यस्मिन्नर्थे यः शब्दोऽन्वयन्यतिरेकाभ्यां वाचकत्वेन रश्यते स तस्यार्थी, यथा गवादिशब्दानां साखादिमदादयो, न च स्त्रीशब्दस्य स्तनादिमदाकारमर्थमन्तरेणान्यस्यान्वयव्यतिरेकाभ्यां वाच्यत्वेन प्रतीतिरस्ति, उक्तं च-"स्तनजघनादिव्यजये खीशन्दोऽर्थे न तं विहायैषः । रष्टः कचिदन्यत्र त्वग्निर्माणवकवद्गौणः ॥१॥" इति, नाप्यागमपरिभाषातो यतो नागमे कचित्स्त्रीशब्दस्य परिभाषितोऽर्थों यथा व्याकरणे 'वृद्धिरादैजि' (पा.१-१-१)ति वृद्धिशब्दस्यादैची, रश्यते चागमेऽपि लोकरूढ एवार्थे स्त्रीशब्दः "इत्थीओ जंति छट्टि" इत्यादी, न च तत्राप्यर्थान्तरपरिकल्पना, बाधकं विना तदनुपपत्तेः, उक्तं च-"परिभाषितो न शाखे मनुजीशब्दोऽथ लौकिकोऽधिगतः । अस्ति च न तत्र बाधा खीनिर्वाणं ततो न कुतः ॥१॥" अथ दृष्ट एवागमे पुरुषाभिलापात्मनि वेदाख्ये भावे स्त्रीशब्दः, इदमपि कुतो निश्चितं ?,
R६८शा किं तावत्रीशब्द इतिशब्दश्रवणमात्रात्त्रीत्वस्य पल्यशतपृथक्त्वावस्थानाभिधानतो वा', न तावत्खीवेद इति श्रवणमात्रत इति युक्तं, यदीह स्खी चासौ वेदश्च स्त्रीवेद इति समानाधिकरणसमासो भवेत्तदा स्त्रीशब्दस्यार्थान्तरे ।
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[४९
-५०]
की वृत्तिर्भवेत् , तत्सद्भावच बाधकाभावेन वा कल्प्येत समासान्तराभावेन वा!, न तावद् वाधकाभाषेन, तत्र हि स्त्रीशब्दस्य पुरुषाभिलाषात्मको भाव एवार्थों भवेत् , तथा च वीनिर्वाणसूत्रे-किं स एव साक्षादर्थस्तदुपलक्षितं वा शरीर ?, यदि स एव तदा किं तदैव तद्भावो विवक्ष्यते भूतपूर्वगत्सा वा ?, तत्र यदि तदैव तदा निर्वाणावस्थायामपि वेदसम्भवो, न चैतदागमिकम् , अथ भूतपूर्वगत्या तदा देवादीनामपि निर्वाणप्राप्तिः, तथा च "सुरणारएसु चत्तारि होति" इत्याद्यागमविरोधः, तेष्वपि भूतपूर्वगत्या चतुर्दशगुणस्थानसम्भवात्, अथ तदुपलक्षितं वा] पुरुषशरीर तदाऽसौ तदुपलक्षणं तत्र नियतवृत्तिरनियतवृत्तिर्वा ?, यदि नियतवृत्तिस्तदाऽऽगमविरोधः, परिवर्तमानतयैव पुरुपशरीरे वेदोदयस्य तत्राभिधानात्, न चानुभवोऽप्येवमस्ति, अथानियतवृत्तिः कथमसौ तदुपलक्षणम् ?, अथैवंरूपमपि गृहादिषु काकाद्युपलक्षणमीक्ष्यत इत्यत्रापि तथोच्यते, एवं सति स्त्रीशरीरेऽपि कदाचित्पुरुषवेदस्योदयसम्भवात् स्त्रीणामपि निर्वाणापत्तिः, यथा हि पुरुषाणां भावतः स्त्रीत्वमेवं स्त्रीणामपि भावतः पुरुषत्वसम्भवोऽस्ति,
भाव एव च मुख्य मुक्तिकारणं, तथा च यद्यपकृष्टेनापि स्त्रीत्वेन पुरुषाणां निर्वाणमेवमुत्कृष्टेन भावपुरुषत्वेन स्त्रीणाMमपि किं न निर्वाणम् ? इति, न च समासान्तरासम्भवेन खीवेद इत्यत्र समानाधिकरणसमासकल्पनं, स्त्रिया वेदः स्त्रीवेद इति षष्ठीसमासस्यापि सम्भवात् , न चास्य स्त्रीशरीरपुरुषाभिलाषात्मकवेदयोः सम्बन्धाभावेनायुक्तत्वमिति
१ सुरनारकेषु चत्वारि भवन्ति (गुणस्थानानि)
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||४९-५०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥६८२॥
सूत्रांक
[४९-५०]
वाच्यं, यतस्तयोः सम्बन्धाभावः किं भिन्नकर्मोदयरूपत्वेन पुरुषवत्त्रिया अपि स्त्रियां प्रवृत्तिदर्शनेन वा १, न ताव- जीवाजीव निकर्मोदयरूपत्वेन, भिन्नकर्मोदयरूपाणामपि पञ्चेन्द्रियजात्यादीनां देवगत्यादीनां च सदा सम्बन्धदर्शनात्,
विभक्ति नापि पुरुषवत्त्रिया अपि स्त्रियां प्रवृत्तिदर्शनेन, इयं हि पुरुषाप्राप्ती खवेदोदयादपि संभवत्येव, उक्तश्च-“सा खकवेदात्तिर्यग्वदलामे मत्तकामिन्याः" इति, अथ स्त्रीत्वस्य पल्यशतपृथक्त्वावस्थानाभिधानादेवमुच्यते, इदमपि न सुन्दरं, तत्र स्त्रीत्वानुवन्धस्य विवक्षितत्वात् , संभवति हि ख्याकारविच्छिदेऽपि तत्कारणकर्मोदयाविच्छेदः, तदविच्छेदाच पुंस्त्वाद्यव्यवधानेन पुनः स्त्रीशरीरग्रहणमिति, किञ्च-"मणुयगईए चउदस गुणठाणाणि होति" तथा पंचिंदिपसु गुणठाणाणि ९ति चउदस' तथा 'चउदस तसेसु गुणठाणाणि इंति' तथा 'भवसिद्धिगा व सध्वट्ठाणेसु होति" इत्यादि स्त्रीशब्दरहितमपि प्रवचनं स्त्रीनिर्वाणे प्रमाणमस्ति, स्त्रीणामपि पुंवन्मनुष्यगत्यादिधर्मयोगात्, अथ सामान्यविषयत्वान्नेदं स्त्रीविशेषे प्रमाणम् , एवं सति पुरुषाणामपि विशेषरूपताऽस्ति न वा ?, न तावन्नास्ति, मनुष्यगतिविशेषरूपत्वात्तेपाम्, अधास्ति विशेषरूपता, तथा सति तेष्वपि कथमेतत्प्रमाणं!, यथा च तेषु प्रमाणं तथा किं न खीवपीति !, अथ पुरुषेष्वेव तदर्थवदिति स्त्रीषु तस्याप्रवृत्तिः, एवं सति किं न विपर्ययकल्पनापि, ६८२॥ न चैवमपर्याप्तकमनुष्यादीनां देवनारकतिरथां च निर्वाणप्रसङ्गः, तेषामेतद्वाक्याविषयत्वात्, एतदविषयत्वं चाप-31 वादविषयत्वात् , उक्तं हि-"अपवादविषयं परिहत्य उत्सर्गः प्रवर्त्तते" इति, अपवादश्च-"मिच्छादिट्ठी अपज
दीप अनुक्रम [१५१३-१५१४]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[ ४९
-५०]
दीप
अनुक्रम
[१५१३
-१५१४]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||४९-५०|| निर्युक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
तगे' तथा 'सुरनारएसु होंति चत्तारि तिरिएषु जाण पंचेव" इत्यादिरागमः, आह च - " मनुजगतौ सन्ति गुणाचतुर्दशेत्याद्यपि प्रमाणं स्यात् । पुंवत्स्त्रीणां सिद्धौ नापर्यासादिवद्वाधा ॥ १ ॥” इति कृतं विस्तरेण । सम्प्रति सिद्धानेवावगाहनातः क्षेत्रतश्चाह - उत्कृष्टश- सर्वमदती चासौ अवगाहन्तेऽस्यां जन्तव इत्यवगाहना च शरीरमुत्कृष्टावगाहना पञ्चधनुःशतप्रमाणा तस्यां सिद्धाः 'च' समुच्चये 'जहन्न मज्झिमाइ यति अवगाहनायामिति प्रक्रमात्प्रत्येकं योज्यते ततः 'जघन्यावगाहनायां द्विहस्तमानशरीररूपायां सिद्धाः 'मध्यमावगाहनायां च' उक्तरूपोत्कृष्टजघन्यावगाहनान्तरालवर्त्तिन्यां सिद्धाः 'ऊर्द्ध' मित्यूर्द्धलोके मेरुचूलिकादौ सिद्धाः संभवति हि तत्रापि | केषाञ्चित्सिद्धप्रतिमावन्दनाद्यर्थमुपगतानां चारणश्रमणादीनां मुक्त्यवाप्तिः, 'अवश्थ' अधोलोकेऽर्थादधोलौकिकग्रा - मरूपेऽपि सिद्धाः, 'तिरियं च'त्ति 'तिर्यग्लोके च' अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्ररूपे तत्रापि केचित् 'समुद्रे' जलधौ सिद्धाः 'जले च' नयादिसम्बन्धिनि सिद्धाः, भूभूधराद्यशेषास्पदोपलक्षणमेतत्, अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रेषु हि न कचिन्मुक्तयवाप्तिनिषेध इति सूत्रार्थः ॥ इत्थं स्त्रीसिद्धादीनभिदधता श्रीत्वादिपु सिद्धिसम्भव उक्तः सम्प्रति तत्रापि क कियन्तः सिद्ध्यन्ति ? इत्याशङ्कवाह
नपुंस, वी इत्थियासु च । पुरिसेसु य असयं, समएणेगेण सिज्झई ॥ ५२ ॥ चत्तारि य गिहिलिंगे, अनलिंगे दसेव य । सलिंगेण य असयं, समएणेगेण सिजाई ॥ ५३ ॥ उक्कोसोगाहणाए उ,
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः मूल-संपादने मुद्रण- अशुद्धित्वात् अत्र गाथाक्रम || ५१ ||... स्थाने || ५२ ||... इति मुद्रितं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||५२-५५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[५२
उत्तराध्य. सिझंते जुगवं दुवे । चत्तारि जहन्नाए, जवमझडत्तरं सयं ॥ ५४॥ चउरुहुलोए य दुवे समु, तओ जले जीवाजीव बृहद्वृत्तिः दावीसमहे तहेव । सयं च अडत्तर तिरियलोए, समएणेगेण उ सिज्झई धुवं ।। ५५॥
विभक्ति _ 'दश' दशसङ्ख्याश्चशब्द उत्तरापेक्षया समुञ्चये 'नपुंसकेपु' वर्द्धितचिर्पितादिषु विंशतिः 'इत्थीयासु यति खीषु च ॥६८॥ पुरुषेषु चाष्टभिरधिकं शतमष्टशतं 'समयेन' अविभागकालरूपेण 'एकेन' एकसङ्खधेन, प्रकृत्यादित्वात्तृतीया, 'सि
यति' निष्ठितार्थं भवति, चत्वारो गृहिलिङ्गेऽन्यलिङ्गे दशैव च, खलिङ्गेन चाष्टशतं समयेनैकेन सिध्यति । 'उत्कृटावगाहनायां तु' उक्तरूपायां सिध्यतः 'युगपत्' एककालं 'द्वौ' द्विसञ्जयो 'चत्वारः' चतुःसङ्ख्याः 'जहन्नाए'त्ति जघन्यावगाहनायां 'जवमज्झ'त्ति यवमध्यमिव यवमध्या-मध्यमावगाहना तस्याम् 'अष्टोत्तरं शतम्' अष्टोत्तरशतसयाः, यवमध्यत्वं चैषां मध्यमावगाहनायामुत्कृष्टजघन्यावगाहनयोर्मध्यवर्तित्वात् , तदपेक्षया च बहुतरसञ्जया-IN त्वेन स्थूलतयेव भासमानत्वादिति भावनीयमिति । चत्वार ऊर्द्धलोके च द्वौ समुद्रे त्रयो जले विंशतिः 'अधः' इत्यधोलोके 'तथैव' तेनैव प्रकारेण शतं च 'अष्टोत्तरम्' अष्टाधिकं तिर्यग्लोके समयेनकेन तु सिध्यति, तुशब्दश्चशब्दश्च कचित्पूरणे क्वचिच पुनरर्थे व्याख्येयः । एतत्सूत्रस्थाने चान्ये सूत्रद्वयमित्थं पठन्ति-"चउरो उद्दलोगमि, ॥६॥ वीसपहुतं अहे भये । सयं अष्टोत्तरं तिरिए, एगसमएण सिज्झई ॥१॥ दुवे समुद्दे सिझंती, सेसजलेसु ततो जणा। एसा उ सिज्झणा भणिया, पुब्बभावं पडुच उ ॥२॥" एतच्च व्याख्यातप्रायमेवेति सूत्रचतुष्टयाथेः ॥ इत्थं
दीप अनुक्रम [१५१६-१५१९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[५५
-५६]
दीप
अनुक्रम
[१५१९
-१५२०]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा ||५५२-५६ || निर्युक्ति : [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
अध्ययनं [३६],
| पूर्व भावप्रज्ञापनीयनयापेक्षयाऽनेकधा सिद्धानभिधाय सम्प्रति प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापनीयनयापेक्षया तेषामेव प्रतिघा तादिप्रतिपादनायाह
कहिं पहिया सिद्धा ?, कहिं सिद्धा पट्टिया ? । कहिं बुदिं चहत्ता णं, कत्थ गंतॄण सिज्झई १ ॥ ५५ ।। अलोए पहिया सिद्धा, लोयग्गे य पट्टिया । इहं बुंदि चइता णं, तत्थ गंतॄण सिज्झई ।। ५६ ।।
'के' ति कस्मिन् 'प्रतिहताः' स्खलिताः, कोऽर्थः १- निरुद्धगतयः, सिद्धाः, तथा 'क' कस्मिन् सिद्धाः 'प्रतिष्ठिताः' साद्य पर्यवसितं कालं स्थिताः, अन्यथ- क ' बुन्दि' शरीरं त्यक्त्वा कुत्र गत्वा 'सिज्झइ'ति वचनव्यत्ययात् 'सिज्यन्ति' निष्ठितार्था भवन्ति । एतत्प्रतिवचनमाह-'अठोके' केवलाकाशलक्षणे 'प्रतिहताः' स्खलितास्तत्र धर्मास्तिकायस्थाभावेन तेषां गतेरसम्भवात् उक्तं च- "ततोऽप्यूर्द्ध गतिस्तेषां कस्मान्नास्तीति चेन्मतिः । धर्मास्तिकायस्याभावात्, स हि हेतुर्गतेः परः ॥ १ ॥" तथा 'ठोका च' लोकस्योपरि विभागे 'प्रतिष्ठिताः' सदाऽवस्थिताः, आह ऊ गमनाभावेऽप्यधस्तिर्यग्वा गमनसम्भवेन कथं तेषां तत्र प्रतिस्थानम् ?, उच्यते, क्षीणकर्मत्वा तेषां कर्माधीनत्वाबाधस्तिर्यग्गमनयोः, तदुक्तम् - " अधस्तिर्यगथोर्द्ध च, जीवानां कर्मजा गतिः । ऊर्द्धमेव तु ताद्धर्म्याद् भवति क्षीणकर्मणाम् ॥ १ ॥" 'इहे' त्यनन्तरप्ररूपिते तिर्यगुलोकादी 'बुन्दि' शरीरं त्यक्त्वा 'तत्र' इति लोकाग्रे गत्वा 'सिज्झ| ति'त्ति सिध्यति, गत्वेति च मुखं व्यादाय स्वपितीत्यादिवत्क्त्वाप्रत्ययः, पूर्वापरकालविभागस्येहासम्भवात्, यत्रैव हि
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः मूल-संपादने मुद्रण- अशुद्धित्वात् अत्र गाथाक्रम || ५५ || द्वीवारान् मुद्रितं
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||५७-५९|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
जीवाजीच विभक्ति.
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सूत्रांक
[५७
-५९]
उत्तराध्य समये भवक्षयस्तस्मिन्नेव मोक्षस्तत्र गतिश्चेति, आह च भगवान् वाचक:-"द्रव्यस्य कर्मणो यद्वदुत्पत्त्यारम्भवीतयः। बृहद्वृत्तिः
समं तथैव सिद्धस्य, गतिमोक्षभवक्षयाः॥१॥" इति सूत्रद्वयार्थः ॥ लोकाग्रे गत्वा सिमन्तीत्युक्तं, लोकाग्रं चेषत्प्रा
म्भाराया उपरीति यावति प्रदेशेऽसौ यत्संस्थाना यत्प्रमाणा यद्वर्णा च तदभिधानायाह॥६८४॥
वारसहिं जोयणेहि, सब्वट्ठस्सुवरि भवे । ईसीपभारनामा ख, पुढवी छत्तसंठिया ॥१७॥ पणयाल सयसहस्सा,जोअणाणं तु आयया । तावइयं चेव विच्छिन्ना, तिगुणो साहिय (तस्सेव) परिरओ॥५८॥ अट्ठजोयणघाहल्ला, सा मझमि चियाहिया । परिहायंती चरिमंते, मच्छीपत्ताउ तणुययरी॥ ५९॥ [ अज्जुणसुवन्नगमई, सा पुढची निम्मला सहावेणं । उत्ताणयछत्तयसंठिया य भणिया जिणवरेहिं ]
संखंककुंदसंकासा, पंडुरा निम्मला सुभा ॥ द्वादशभिर्योजनैः प्रकृत्यादित्वात्तृतीया 'सर्वार्थस्य' सार्थनाम्नो विमानस्य 'उपरि' ऊर्ध्वं भवेत् स्यात् ईषत्प्राग्भारेति नाम यस्याः सा ईषत्प्राग्भारनामा, अनो बहुव्रीहे' (पा०४-१-१२) रिति निषेधानान्तत्वेऽपि डाप् न भवति, ६ ईषदादिनामोपलक्षणं चैतत्, अनेकनामधेयाभिधेयत्वात्तस्याः, उक्तं हि-"ईसीति वा ईसीपम्भारा इ वा तणुइ वा
तणुतणुतीति वा सिद्धीति वा सिद्धालएति वा मुत्ती ति वा मुत्तालएति वा लोयग्गेइ वा लोयग्गथूमियाह वा लोयप
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दीप अनुक्रम [१५२१-१५२३]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||५७-५९|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
F
सूत्रांक
[५७
-५९]
%+
४ारिबुज्झणाति वा सबपाणभूयजीवसत्तसुहावहाति "त्यादि, 'पृथ्वी' भूमिश्छत्रम्-आतपत्रं तत्संस्थितमिय संस्थितंसंस्थानमस्या इति छत्रसंस्थिता, इह च विशेषानभिधानेऽप्युत्तानमेवेदं गृह्यते, आह यतो भगवान् भद्रबाहुः-"उत्ताणयछत्तयसंठियाउ भणियाउ जिणवरेहिंति" । पञ्चचत्वारिंशच्छतसहस्रान् योजनानां 'तुः पूरणे 'आयता' दीर्घा 'तावड्यं चेय'त्ति तावतश्चैव प्रक्रमाच्छतसहवान् 'विस्तीर्णा' विस्तरतोऽपि, पञ्चचत्वारिंशच्छतसहस्रप्रमाणेति भावः त्रिगुणः 'तस्सेव'त्ति प्राग्वत् 'तस्माद्' उक्तरूपादायामात् 'परिरयः' परिधिः, इह च त्रिगुण इत्यभिधानेऽपि विशेपाधिक्यं द्रष्टव्यं “सर्व वर्ल्ड तिगुणं सविसेस मिति वचनात्, अन्यथा हि पञ्चत्रिशल्लक्षाधिकयोजनकोटिरेवैतत्परि
माणं स्यात् , तथा च सूत्रान्तरविरोधो, यतस्तत्रोक्तम्-“एगा जोयणकोडी पायालीसं भवे सयसहस्सं । तीसं चेय ४ सहस्सा दो चेय सया अउणपन्ना ॥१॥" इति, पठन्ति च-'तिउणसाहियपडिरय'ति । अष्टो-अष्टसङ्खयानि योजहै नानि बाहल्यं-स्थौल्यमस्या इसष्टयोजनवाहल्या 'से' तीपत्प्रारभारा, किं सर्वत्राप्येवम् ? इत्साह-'मध्ये मध्यप्र
देशे ब्याख्याता, किमित्येवम् ? अत आह-परि-समन्ताद्धीयमाना परिहीयमाना 'चरमंते'ति 'चरमान्तेषु' सकलदिग्भागवर्त्तिषु पर्यन्तप्रदेशेषु मक्षिकायाः पत्रं-पक्षो मक्षिकापत्रम् , अपिशब्दस्य गम्यमानत्वात्तस्मादपि तनुतरी ४ अतिपरिकृशेतियावत्, हानिचात्र विशेषानभिधानेऽपि प्रतियोजनमङ्गुलपृथक्त्वं द्रष्टव्या, तथा चान्यत्रावाचि१ एका योजनानां कोटी द्वाचत्वारिंशत् भवेयुः शतसहस्राणि । त्रिंशदेव सहस्त्राणि द्वे एव शाते एकोनपञ्चाशत् ॥ १॥
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दीप अनुक्रम [१५२१-१५२३]]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[६०]
दीप
अनुक्रम
[१५२४]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः
॥ ६८५||
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||६०|| निर्युक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
"गंतूण जोयणं तु परिहायइ अंगुलपुडुत्तं" ति । अत्र च केचित्पठन्ति - "अज्जुणसुवन्नगमई सा पुढवी निम्मला सहावेणं । उत्ताणगछत्तगसंठिया य भणिया जिणवरेहिं ॥ १ ॥" तत्र चार्जुनं शुक्लं तथ तत्सुवर्णकं चार्जुनसुवर्णकं तेन निर्वृत्ताऽर्जुन सुवर्णकमयी 'सा' इतीपत्प्राग्भारा 'निर्मला' खच्छा, किमुपाधिवशतः १ इत्याह-'खभावेन' स्वरूपेण उत्तानकम् ऊर्द्धमुखं यच्छत्रमेव छत्रकं तत्संस्थिता च 'भणिता' उक्ता जिनवरैः, प्राकू सामान्यतश्छत्रसंस्थितेत्युकमिह तूत्तानत्वं तद्विशेष उच्यत इति न पौनरुक्त्यम् । शङ्खाङ्ककुन्दानि प्रतीतानि तत्सङ्काशा - वर्णतस्तादृशी अत एव 'पंडुरे 'ति 'पाण्डुरा' श्वेता 'निर्मला' निष्कलङ्का 'शुभा' अत्यन्तकल्याणावहा 'सुखा वा' सुखहेतुत्वेनेति सार्द्धसूत्रत्रयार्थः ॥ यदीदृशी सा पृथ्वी ततः किमित्याह
सीआए जोअणे तत्तो, लोयंतो उ विवाहिओ ॥ ६० ॥
'सीतायाः' सीताभिधानायाः पृथिव्या उपरीति शेषः, योजने 'ततः' इति तस्था उक्तरूपायाः 'लोकान्तः ' लोकपर्यन्तः 'तुः' पूरणे व्याख्यात इति सूत्रार्द्धार्थः ॥ ननु यदि योजने लोकान्तस्तत्किं तत्र सर्वत्र सिद्धास्तिष्ठन्त्युता
| न्यथा ? इत्याह-
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१ गत्वा योजनं तु परिहीयतेऽङ्गुलपृथक्त्वं
For False
जीवाजीव
विभक्ति०
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||६१|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सत्राक
जोअणस्स उ जो तत्थ, कोसो उबरिमो भवे । तस्स कोसस्स छन्भाए, सिद्धाणोगाहणा भवे ॥११॥
योजनस्य 'तुः' वाक्यालङ्कारोपन्यासे यः 'तत्रे' येवं व्यवस्थिते सुव्यत्ययेन वा 'तत्थ'त्ति 'तस्य' इषत्प्राग्भारोपरिवर्तिनः पठन्ति च-'तस्स'त्ति, 'क्रोशः' गव्यूतम् 'उवरिम'त्ति उपरिवर्ती भवेत् 'तस्येति प्रक्रान्तस्य क्रोशस्य 'पडागे' सत्रिभागत्रयस्त्रिंशदधिकधनुःशतत्रितयरूपे सिद्धानाम् 'अवगाहना' अवस्थितिर्भवेदिति सूत्रार्थः ॥ अवगा-1 हना च ततश्चलनसम्भवेऽपि परमाण्यादीनामियैकादिप्रदेशेषु भवेदत आह-तत्थ सूत्रम् । केचिदनन्तरसूत्रोत्तरार्द्धमधीयते-'कोसस्सवि य जो तत्थ, छब्भागो उपरिमो भवे'त्ति स्पष्टं । तत्र च किम् ? इत्याह
तत्थ सिद्धा महाभागा, लोगग्गंमि पइद्विया । भवपवंचउम्मुक्का, सिद्धिं वरगई गया ॥२॥ 'तो' त्यनन्तरमुपदर्शितरूपे 'सिद्धाः' उक्तरूपाः 'महाभागाः' अतिशयाचिन्त्यशक्तयो लोकाने 'प्रतिष्ठिताः' सदावस्थिताः, एतच कुतः१ इत्याह-भवा-नरकादयस्तेषां प्रपञ्चो-विस्तरस्तेनोन्मुक्ताः-त्यक्ताः सन्तः 'सिद्धि' सिद्धिनानी ४/वरा चेतरगत्यपेक्षया गतिश्च गम्यमानतया वरगतिस्तां गताः-प्राप्ताः, अयमाशयः-भवप्रपञ्च एव-चलने हेतुःस |च सिद्धानां नास्तीति कुतस्तेषां तत्सम्भवः' इति सूत्रार्थः ॥ तत्र गतीनां कस्य कियत्यवगाहना ? इत्याह
उस्सेहो जस्स जो होइ, भवंमि चरमंमि उ । तिभागहीणा तत्तो य, सिद्धाणोगाहणा भवे ॥६॥ 'उत्सेधः' उच्छूयः प्रक्रमाच्छरीरस्य 'जस्स'त्ति 'येषां सिद्धानां 'यः' इति यत्परिमाणो भवति 'भवे' जन्मनि चरमे।
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||६३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
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उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः
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॥६८६॥
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पर्यन्तयर्तिनि 'तु' विशेषणे इदमपि प्राग्भावप्रज्ञापनीयनयापेक्षयेति विशेषयति, 'त्रिभागहीना'त्रिभागोना 'ततथे ति ततः पुनश्चरमभवोत्सेधात्सिद्धानां यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धात्तेषामवगाहन्तेऽस्यामिति अवगाहना-स्वप्रदेशसन्निचितिः, निश्चयाभिप्रायेण सर्वस्य स्वनिष्ठत्वात्, इयं च शरीरविवरापूरणत एतावतीत्यवगन्तव्यम्, उक्तं हि-"देहतिभागो झुसिरं तत्पूरणतो तिभागहीण"त्ति, इति सूत्रार्थः ॥ एतानेक कालतः प्ररूपयितुमाह____एगत्तेण साइया, अपज्जवसियावि य । पुत्तेण अणाइया, अपजवसियाधि य ॥ ६४ ॥
'एकत्येन' असहायत्वेन विवक्षिताः सादिका अपर्यवसिता अपि च, यत्र हि काले ते सिध्यन्ति स तेषामादिरस्ति । न तु कदाचिन्मुक्तेर्धस्वन्तीति न पर्यवसानसम्भवः 'पृथक्त्वेन' महत्त्वेन बहुत्वेन सामस्त्यापेक्षयेतियावत् , किमित्याहअनादिका अपर्यवसिता अपि च, न हि कदाचिते नाभूवन् न भविष्यन्ति चेति सूत्रार्थः ॥ सम्प्रत्येषामेवोपाघिनिरपेक्षं खरूपमाह
अरूविणो जीवघणा, नाणदंसणसन्निया । अउलं सुहसंपत्ता, ज्वमा जस्स नत्थि उ ॥ ३५॥ रूपिणः-उक्तन्यायेन रूपरसगधस्पर्शवन्तः तद्विपरीता अरूपिणस्तेषां रूपाद्यभावात् , उक्त यागमे-"से ण किण्हे ण नीले"इत्यादि, जीवाश्च ते सततोपयुक्ततया घनाश्च-शुषिरपूरणतो निरन्तरनिचितप्रदेशतया जीवधना गमक१ देहविभागः शुधिरं तत्पूरणात् त्रिभागहीनेति
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॥१८॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
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अनुक्रम
[१५२९]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||६५|| निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
त्वाद्विशेषणस्य परनिपातः ज्ञानदर्शने उक्तरूपे ते एव सज्ञा- सम्यग्बोधरूपा सञ्जातैषामिति तारकादेराकृतिगणत्वादितचि ज्ञानदर्शनसञ्ज्ञिताः - ज्ञानदर्शनोपयोगवन्तो न विद्यते तुठेव तुला- इयत्ता परिच्छेदहेतुरस्येति अतुलम्, अपरिमितत्वात् उक्तं हि "सिद्धस्स सुहों रासी सङ्घद्वापिंडितो जर हवेजा । सोऽणंतवग्भइतो सबागासे न माइजा ॥ १ ॥” इति, सुखं शर्म समित्येकीभावेन दुःखलेश कलङ्कितत्वलक्षणेन प्राप्ताः, सुखमेव पुनर्विशिनष्टि - उपमा यस्य 'नास्ति तु' न विद्यत एव यदुक्तम्- "लोके तत्सदृशो वर्थः कृत्स्नेऽप्यन्यो न विद्यते। उपमीयेत तद्येन, तस्मान्निरुपमं स्मृतम् ॥ १ ॥" न च विषयाभावतस्तत्र सुखशब्दाभिधेयाभाव एवेत्याशङ्कनीयं चतुरर्थत्वात्तस्य, उक्तं हि लोके चतुविहार्थेषु, सुखशब्दः प्रयुज्यते । विषये वेदनाऽभावे, विपाके मोक्ष एव च ॥ १ ॥ सुखो वह्निः सुखो वायुर्विषयेष्विह कथ्यते । दुःखाभावे च पुरुषः, सुखितोऽस्मीति मन्यते ॥ २॥ पुण्यकर्मविपाकाच, सुखमिष्टेन्द्रियार्थजम् । कर्मक्लेशविमोक्षाच, मोक्षे सुखमनुत्तमम् ॥ ३ ॥” ततक्ष मोक्षस्यैव तत्र सुखशब्दाभिधेयत्वादसम्भव एवाशङ्कायाः, इह च जीवधना इत्यनेन सौगताभिमतमभावरूपत्वं मुक्तेः उत्तरविशेषणद्वयेन च 'सुखदुःखबुद्धीच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्कारा नवात्मगुणास्तेषामत्यन्तोच्छित्तिर्निःश्रेयस' मिति वचनादचेतनत्वामुखित्वे च सिद्धस्य नैयायिकाद्यभिमते निराकुरुते, अभावरूपत्ये हि मुक्तेरर्थक्रियासामर्थ्य लक्षणत्वाद्वस्तुनोऽन्त्यक्षणस्य क्षणान्तराजनना१ सिद्धस्य सुखराशिः सर्वाद्धापिण्डितो यदि भवेत्। सोऽनन्तवर्गभक्तः सर्वाकाशे न मायात् ॥ १ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||६७|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
३६
प्रत
u૬૮૭
सुत्राक
[६७]
दवस्तुत्वं, तदवस्तुत्वे चावस्तुनो जन्यत्वायोगात्तत्पूर्वस्यापि क्षणस्य एवं पूर्वपूर्वक्षणानामपि सौगतस्याभावरूपतैव । जीवाजीव बृहद्वृत्तिः
ट प्राप्तेति पूर्वसन्तानमिच्छतो मुक्तेरपि भावरूपता बलादायाति, तथा सर्वथाऽऽत्मगुणोच्छित्तिरूपतायां निःश्रेयस-विभक्तिः
स्थात्मनोऽप्यभावप्रसक्तिः, सर्वथा गुणाभाये हि गुणिनोऽप्यभाव एव, अशेषरूपाद्यभाव इव घटादेरिति सूक्ष्मधिया I ४ भावनीयमिति सूत्रार्थः ॥ उक्तग्रन्थेनावगतमपि विप्रतिपचिनिराकरणाथै पुनः क्षेत्रं स्वरूपं च तेषामाह
लोएगदेसे ते सब्बे, नाणदसणसन्निया । संसारपारनिच्छिन्ना, सिद्धिं वरगई गया ।। ६७॥ लोकैकदेशे पाठान्तरतो लोकाग्रदेशे वोक्तरूपे 'ते' इति सिद्धाः, अनेन 'मुक्ताः सर्वत्र तिष्ठन्ति, व्योमवत्तापवर्जिताः' इत्यपास्तं भवति, सर्वगतत्वे यात्मनामेतद्भवेत् , तथात्वे च सर्वत्र सर्वदा वेदनादिप्रसङ्गः, तथा 'सर्वेनिरपशेषा ज्ञानदर्शनसज्ञिताः संसारस्य पारः-पर्यन्तस्तं निस्तीर्णाः-पुनरागमनाभावलक्षणेनाधिक्येनातिक्रान्ताः * सिद्धिं वरगतिं गताः इति प्राग्वत् , इह चायेन विशेषणेन मा भूत्केषाश्चिज्ज्ञानसज्ञा परेषां दर्शनस व केवला, |किन्तूभे अपि सर्वेपामिति, द्वितीयेन-"ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य, कर्तारः परमं पदम् । गत्वाऽऽगच्छन्ति भूयोऽपि,
॥६८७॥ भवं तीर्थनिकारतः॥१॥” इति मते तेषामनिष्ठितार्थदोपप्रसझेन पुनरावृत्तिरिति, तृतीयेन तु क्षीणकर्मत्वेन खवशत्वादिविशेषणवत्त्वेऽप्येषा खबशस्यानभिसन्धिः कृतकृतत्यस्य च यथाखभावेनास्योपयोग इष्टः, 'तथागतिः स्यात्खभावेने ति वचनादुत्पत्तिसमये सक्रियत्वमप्यस्तीति ख्याप्यते, इदं च सूत्रं यत्र दृश्यते तत्रेत्थं नेयं, प्रत्यन्तरेषु च न
दीप
अनुक्रम
[१५३१]
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vपूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३], मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: गाथा क्रमांकने मुद्रणदोषात् अत्र ||६६|| क्रमांक न दृश्यते
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[६८]
दीप
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||६८||
अध्ययनं [३६],
निर्युक्ति: [ ५५६ ...], भाष्यं [१५...]
दृश्यत एवेति सूत्रार्थः ॥ इत्थं यदुक्तं "संसारत्या य सिद्धा य, दुविहा जीवा वियाहिय" ति तत्र सिद्धा उक्ताः, साम्प्रतं संसारिण आह
संसारत्था उ जे जीवा, दुविहा ते वियाहिया । तसा य थावरा चेव, धावरा तिविहा तहिं ॥ ६८ ॥ संसारस्था इति प्राग्यतुशब्दः सिद्धेभ्यः सङ्ख्याकृतविशेषद्योतको ये जीवा द्विविधास्ते व्याख्याताः, द्वैविध्यमेवाह-साथ स्थावराश्चैव, स्थावराः 'त्रिविधाः' त्रिप्रकाराः 'तस्मिन्' इति द्वैविध्ये सति, अल्पवक्तव्यत्वाच पश्चानिर्देशेऽपि प्रथमतः स्थावराभिधानमिति सूत्रार्थः ॥ तत्रैविध्यमेवाह
पुढवी आउजीवा य, तहेब य वणस्लई । इबेए थावरा तिविहा, तेसिं भेए सुणेह मे ॥ ६९ ॥ 'पुढवी आउजीवा य'त्ति जीवशब्दः प्रत्येकमभिसंबध्यते ततः पृथिव्येव जीवाः पृथिवीजीवाः आपो-जलं ता एव जीवा अब्जीवाथ, तथैव च 'वणस्सइ'त्ति प्रक्रमाद्वनस्पतिजीवाः, ननु पृथिव्यादीनि जीवशरीराणि न त्वेतान्येव जीवाः, काठिन्यादिलक्षणानि समूनि जीवाः पुनरुपयोगलक्षणास्तत्कथं पृथिव्यादीन्येव जीवा इत्युक्तम् ?, उच्यते, जीवशरीरयोरन्योऽन्यानुगतत्वेन विभागाभावादेवमुक्तं, न चैतदनाएँ, यत उक्तम्- "अन्नोऽन्नाणुगयाणं इमं च तं चति विभयणमजुत्तं" इत्यादि 'इति' इत्युक्तप्रकारेण 'एते' पृथिव्यादयः स्थावरास्त्रिविधाः । उत्तरग्रन्थसम्बन्धनार्थ१ अन्योऽन्यानुगतयोरिदं च तथेति विभजनमयुक्तं
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||६९|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
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ཙྪཱ ཟླ་
प्रत
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[६९]
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उत्तराध्य. माह-'तेषाम्' इति पृथिव्यादीनां भेदान्' विकल्पान् 'शृणुत' आकर्णयत 'मे' मम कथयत इति शेष इति सूत्रार्थः ।।
जीवाजीव 'यथोद्देशं निर्देश' इतिन्यायतः पृथिवीभेदानाहवृहद्वृत्तिः | दुविहा पुढविजीवा उ, सुहमा बायरा तहा । पजत्तमप्पजत्ता, एवमेव दुहा पुणो ॥ ७० ॥ यायरा जे |
विभक्ति. ६cenपजत्ता, दुविहा ते वियाहिया । सहा खरा य बोद्धव्वा, सण्हा सत्तविहा तर्हि ॥ ७१ ॥ किण्हा नीला या ३६
रुहिरा य, हालिदा सुकिला तहा । पंडपणगमट्टिया, खरा छत्तीसई विहा ।। ७२ ॥ पुढेवी य सकरा वालुया सय उवले सिलो य लोणूसे । अयतयतंबसीसंगरुपसुवन्ने य वैहरे य॥७३॥ हरियाले हिंगुलए मैणोसि-1
लासासगंजणपाले । अन्भपडलऽम्भवालुयें वायरकाए मणिविहाणा ॥७४ ॥ गोमिजऐ य कर्यगे अके ४ फलिहे प लोहियखे य । मरगयमसारगेल्ले भुयमोयर्ग इंदनीले य ॥७५॥ चंदणगेरुयहंसगन्भं पुलए सो-18 द गंधिर य पोद्धव्ये । चंदप्पभवेलिए जैलकते संरकते य ॥७॥
'द्विविधाः' द्विभेदाः पृथिवीजीवाः 'तुः प्राग्वत् 'सूक्ष्माः' सूक्ष्मनामकर्मोदयाद् 'बादराः' बादरनामकर्मोद४ यात्, तथा 'पजत्तमपजत्त'त्ति तत्र 'पर्याप्ताः' आहारशरीरेन्द्रियोच्छ्रासवायनोऽभिनिवृत्तिहेतुस्तथाविधदलिक B an पर्याप्तिः, यत उक्तम्-"आहारसरीरेंदियउस्सासवओमणोऽभिणिवत्ती। होइ जओ दलियाओ करणं पर सा उप
आहारशरीरेन्द्रियोच्यासवचोमनोऽभिनिर्वृत्तिः । भवति यतो दलिकात् करणं प्रति सैव पर्याप्तिः ॥१॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
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प्रत सूत्रांक
[ ७०
-७६]
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अनुक्रम
[१५३४
- १५४०]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||७०-७६ || निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
जत्ती ॥ १॥ " साऽस्त्येपामित्यर्शआदराकृतिगणत्वादचि पर्याप्तास्तद्विपरीताश्चापर्याप्ताः, 'एवं' इत्यनेन पर्याप्तापर्यासभेदेन 'एते' सूक्ष्मा बादराश्थ, पठन्ति च- 'एगमेगे'त्ति एकेके द्विविधाः पुनः प्रत्येकमिति भावः । पुनरेषामेवोत्तरमेदानेवाह- 'वायरा जे'ति बादरा ये पुनः पर्याप्ता द्विविधास्ते व्याख्याताः कथम् १ इत्याह-'श्लक्ष्णा' इह चूर्णितलोटकल्पा मृदुः पृथिवी तदात्मका जीवा अप्युपचारतः श्रक्ष्णा एवमुत्तरत्रापि, 'खराः' कठिनाः 'च' समुथये 'बोद्धव्याः' अवगन्तव्याः, लक्ष्णाः सप्तविधाः 'तस्मिन्' इत्युक्तरूपभेदद्वये । यथा चामी सप्तविधास्तथाऽऽह - कृष्णा नीलाच 'रुधिराश्च' इति लोहिता रक्ता इतियावत् 'हारिद्राः' पीताः शुक्काः 'तथे 'ति समुचये 'पंड' ति पाण्डवः - आपाण्डुः - आईपण्युभ्रत्वभाज इतियावत् इत्थं वर्णभेदेन पडियत्वम्, इह च पाण्डुरग्रहणं कृष्णादिवर्णानामपि खस्थानभे| देन भेदाद्भेदान्तरसम्भवसूचकं, पनकः - अत्यन्तसूक्ष्मरजोरूपः स एव मृत्तिका पनकमृत्तिका, पनकस्य च नभसि विवर्त्तमानस्य लोके पृथिवीत्वेनारूढत्वात्पूर्व मे दस महे ऽपि भेदेनोपादानं, तत एव च मृत्तिकेति पृथ्वीपर्यायाभिधानमपि, अन्ये त्वाहु:-पनकमृत्तिका मरुषु पर्पटिकेति रूढा, यस्याश्चरणाभिघाते झगित्युज्जृम्भणं, खरपृथिवीभेददर्शनोपक्रममाह-'खराः' प्रक्रमाद्वादरपृथिवीजीवाः 'पटूत्रिंशद्विषाः' पत्रिंशद्भेदाः । तानेवाह - 'पृथिवी 'ति भामा सत्यभामावच्छुद्ध पृथिवी शर्करादिरूपा या न भवति, चशब्द उत्तरभेदापेक्षया समुच्चये, 'शर्करा' लघूपलस कलरूपा, 'वालुका च' प्रतीता, 'उपलः' गण्डशैलादिः, 'शिला च' दृषत् 'लोणूसे अयतंत्र तय सीसयरूप्प सुवण्णे यति लवणं
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||७०-७६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
*
प्रत
*
उत्तराध्य बृहद्वृत्तिः ॥६८९॥
सूत्रांक
*
३६
७०
-७६]
च-समुद्रलवणादि ऊषश्च-क्षारमृत्तिका लवणोषी अयस्ताम्रत्रपुकसीसकरूप्यसुवर्णानि च प्रतीतानि, नवरमेषा सम्ब- जीवाजीव |न्धिनो धातव एवैवमुक्ताः, सदा तेषु तत्सत्तादर्शनार्थ चैवमभिधानं, तेषु ह्यमूनि प्रागपि सन्त्येव, केवलं मलविगमा-18
विभक्ति | दाविर्भवन्ति, 'वज्रश्च' हीरकः । हरितालो हिङ्गलको मनःशिलेति च प्रतीता एव, 'सासगंजणपवाले'त्ति, सासकश्चधातुविशेषोऽञ्जन-समीर प्रवालकं च-विद्रुमः सासकाअनप्रवालानि, 'अब्भपडलऽभवालुयत्ति अभ्रपटलंप्रसिद्धम् अभ्रवालुका-अभ्रपटलमिश्रा वालुका 'बादरकायें' इति बादरपृथ्वीकायेऽमी भेदा इति शेषः 'मणिविहाणेत्ति चस्स गम्यमानत्वात् 'मणिविधानानि च' मणिभेदाः । कानि पुनस्तानि? इत्याह-गोमेजकश्च रुचकोऽङ्कः स्फटिकश्च लोहिताक्षश्च 'मरगयत्ति मरकतो मसारगल्लः 'भुयमोयग'त्ति भुजमोचक इन्द्रनीलश्च ६ । चंदणगेरुयहंसगब्भ'ति चन्दनो गेरुगो हंसगर्भः पुलकः सौगन्धिकश्च बोद्धन्यः 'चंदप्पह'त्ति चन्द्रप्रभो पैदूर्यो जलकान्तः सूरकान्तश्च । इह च पृथिव्यादयश्चतुर्दश हरितालादयोऽष्टौ गोमेजकादयश्च कचित्कस्यचित्कथश्चिदन्तर्भावाचतुर्दशेत्यमी मीलिताः पत्रिंशद् भवन्तीति सूत्रसप्तकार्थः॥ सम्प्रति प्रकृतोपसंहारपूर्वक सूक्ष्मपृथिवीकायप्ररूपणामाहएए खरपुढचीए, भेया छत्तीसमाहिया । एगविहमनाणसा, मुटुमा तत्थ वियाहिया ॥७७ ॥
॥६८९॥ एते खरपृथिव्यास्तदविभागाच्च तत्स्थजीवानां भेदाः षट्त्रिंशदाख्याताः, 'एगविहमणाणत्त'त्ति आर्षत्वादेकविधाः,
दीप अनुक्रम [१५३४-१५४०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[७७]
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अनुक्रम
[१५४१]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||७७||
निर्युक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
किमित्येवंविधाः १- यतोऽविद्यमानं नानात्वं-नानाभावो भेदो येषां तेऽमी अनानात्वाः सूक्ष्माः 'तत्रे'ति तेषु सूक्ष्मबादरपृथिवीजीयेषु मध्ये व्याख्याता इति सूत्रार्थः ॥ एतानेव क्षेत्रत आह
सुहमा य सव्वलोगंमि, लोगदेसे य बायरा ।
सूक्ष्माः 'सर्वलोके' चतुर्दशरज्ज्वात्मके तत्र सर्वदा तेषां भावात्, लोकस्य देशो-विभागो लोकदेशस्तस्मिन् 'चः ' पुनरर्थे वादरास्तेषां क्वचित्कदाचिदसत्त्वेन सकलव्याप्त्यसम्भवात् ॥ अधुनैतत्कालतोऽभिधित्सुः प्रस्तावनामाहएसो कालविभागं तु, तेसिं वुच्छं चउन्विहं ॥ ७८ ॥ प्राग्वदिति सूत्रार्थः ॥ यथाप्रतिज्ञातमाह
संत पप्पाईया, अपज्जवसिया विय। ठिहं पहुच साईया, सपज्जवसियाविय ॥ ७९ ॥ बावीससहस्साई, वासाणुकोसिया भवे । आउठिई पुढवीणं, अंतोमुद्दत्तं जहन्निया ॥ ८० ॥ असंखकालमुकोसा, अंतोमुहतं जहन्नयं । कायठिई पुढवीणं, तं कार्यं तु अमुंचभो ॥ ८१ ॥ अनंतकालमुकोसं, अंतोमुद्दत्तं जहन्नयं विजमि सए काए, पुढविजीवाण अंतरं ॥ ८२ ॥
'सन्तति' प्रवाहं प्राप्यानादिका अपर्यवसिता अपि च, तेषां प्रवाहतः कदाचिदप्यभावासम्भवात् 'स्थिति' भवस्थितिरूपां 'प्रतील' आश्रित्य सादिकाः सपर्यवसिता अपि च, द्विविधाया अपि तस्या नियतकालत्वात् । यथा
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||७९-८२|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
जीवाजीव विभकि.
बृहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक
३६
७९
-८२]]
चैतत्तथाऽऽह-द्वाविंशतिसहस्राणि वर्षाणाम् 'उक्कोसिय'त्ति उत्कृष्टा भवेत् , काऽसौ ? इत्याह-आयुः-जीवितं तस्य उत्तराध्य.
द स्थिति:-अवस्थानमायुःस्थितिः 'पृथिवीना'मिति पृथिवीजीवानामन्तर्मुह जघन्यिका, असङ्ख्यकालमुत्कृष्टा अन्तर्मुहूर्त
जयन्यिका, काऽसी?-काय इति-पृथिवीकायस्तस्मिन् स्थितिः-ततोऽनुद्वत्तेनेनावस्थानं कायस्थितिः'पृथिवीना' पृथ्वी॥६९॥
जीवानां 'तम्' इति पृथ्वीरूपं 'कार्य' निकायं 'तुः' अवधारणे भिन्नक्रमश्च ततः 'अमुचतो त्ति 'अमुञ्चतामेय' अत्यजताम् , इत्थं द्विविधाया अपि स्थिते यत्यदर्शनेन सादिसपर्यवसितत्वमेपा, सामर्थ्यकालस्य प्रक्रान्तत्वादन्तरकालमाहअनंतकालमुत्कृष्टमन्तर्मुहूर्त जघन्य 'विजमित्ति त्यक्ते 'खके' खकीये 'काये' निकाये पृथ्वीजीवानामन्तरं, किमुक्त भवति :-यत्पृथिवीकायादुद्वर्त्तनं या च पुनस्तत्रैवोत्पत्तिरनयोर्व्यवधानमिति सूत्रचतुष्टयार्थः । एतानेव भावत आह
एएसिं पन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥८३॥ हा नवरं वर्णादीनां भावरूपत्वात्तेषां च संवयाभेदेनाभिधीयमानत्वादस्य भावाभिधायिता, उपलक्षणं चेह सहन
इति, वर्णादितारतम्यस्य बहुतरभेदत्वेनासयभेदताया अपि सम्भवादिति सूत्रार्थः ॥ इत्थं पृथ्वीजीपानभिधाया४जीवानाह६ दुविहा आउजीवा उ, सुहुमा बायरा तहा । पज्जत्तमपजसा, एवमेव दुहा पुणो ॥ ८४ ॥ बायरा जे उ
पज्जत्ता, पंचहा ते पकित्तिया । सुद्धोदए य उस्से, हरयणु महिया हिमे ॥ ८५॥ एगविहमनाणसा, सुहमा
दीप अनुक्रम [१५४३-१५४६]
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JABERam
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||८३-९१|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
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सूत्रांक
-९१]
तस्थ वियाहिया । मुहमा सबलोगंमि, लोगदेसे य बायरा ॥८६ ॥ संतई पप्पणाईया, अपजवसियावि या ठिई पडच साईया, सपज्जवसियावि य ॥ ८७ ॥ सत्सेव सहस्साई, वासाणुकोसिया भवे। आउठिई आऊणं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ।। ८८॥ असंखकालमुकोसा, अंतोमुहुर्त जहनयं । कायठिई आऊणं, तं कायं तु अमुंचओ ॥ ८९ ॥ अर्णतकालमुक्कोसं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं । विजदमि सए काए, आउजीवाण अंतरं ॥९॥ एएसिं वन्नओ चेच, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्सओ ॥११॥
सूत्राष्टकं व्याख्यातप्रायमेव नवरं 'सुद्धोदकं' मेघमुक्तं समुद्रादिसम्बन्धि च जलम् 'ओसे'त्ति अवश्यायः शरदादिषु प्राभातिकसूक्ष्मवर्षः 'हरतनु' प्रातः सस्नेहपृथिव्युद्भवस्तृणाग्रजलचिन्दुः 'महिका' गर्भमासेषु गर्भसूक्ष्मवर्षा 'हिम प्रतीतमेव, सप्तैव सहस्राणि वर्षाणामुत्कृष्टिका भवेत्, काऽसौ ?-आयुःस्थितिः 'अपाम्' इत्यजीवानामिति सूत्राष्टकार्थः ॥ उक्ता अब्जीवाः, सम्प्रति वनस्पतिजीवानाह* दविहा वणस्सईजीवा, मुहमा वापरा तहा । पज्जत्तमपज्जत्ता, एवमेष दुहा पुणो ।। ९२ ॥ बायरा जे उ
पज्जत्ता, दुविहा ते वियाहिया । साहारणसरीरा य, पत्तेगा य तहेव य ।। ९३ ॥ पत्तेयसरीरा उ, गहा ते दापकित्तिया । रुक्खा गुच्छा य गुम्मा य, लया वल्ली तणा तहा ।। ९४ ॥ वलय पव्वया कुहणा, जलकहा ओ-IX
सही तिणा । हरियकाया उ पोद्धब्बा, पत्तेया इति आहिया ।। १५ ।। साहारणसरीरा उ, गहा ते पकि-14
A5
दीप अनुक्रम [१५४७-१५५५]
JABERatinintamational
Minatandionary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[९२
-१०५]
दीप
अनुक्रम
[१५५६
-१५६९]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥ ६९१॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||९२-१०५||
निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
तिया। आलुए मूलए चेव, सिंगबेरे तहेव य ॥ ९६ ॥ हिरिली सिरिटी सिस्सिरीली, जावई केयकंदली । पलं लसणकंदे य, कंदली य कुहध्वये ॥९७॥ लोहिणीहूयथीहू य, तुहगा प तहेव य । कण्हे य वज्जकंदे य | कंदे सूरणए तहा ||१८|| अस्सकन्नी य बोद्धव्वा, सीहकन्नी तहेब य । मुसुंदी य हलिद्दा य, णेगहा एवमा ओ ॥ ९९ ॥ एगविहमणाणत्ता० ॥ १०० ॥ संतई पप्पडणाईआ० ॥ १०१ ॥ दस चेव सहस्साई, वासाणुक्कोसिया भवे । वणस्सईण आउं तु, अंतोमुत्तं जनयं ॥ १०२ ॥ अनंतकालमुकोसा, अंतोमुद्दत्तं जहनयं । कायठिई पणगाणं, तं कार्यं तु अमुंचओ ॥ १०३ ॥ अनंतकालमुकोसा, अंतोमुद्दत्तं जहन्नयं । विजदंमि सए काए, पणगजीवाण अंतरं ॥ १०४ ॥ एपर्सि वण्णओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणारं सहस्ससो ॥ १०५ ॥
सूत्राणि चतुर्दश, प्रायो व्याख्यातान्येव, नवरं साधारणम् - अनन्तजीवानामपि समानमेकं शरीरं येषां तेऽमी साधारणशरीराः, उपलक्षणं चैतदाहारानपानग्रहणयोरपि तेषां साधारणत्वात्, उक्तं हि "साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च । साहारणजीवाणं साहरणलक्खणं एयं ॥ १ ॥” 'पत्तेगा य'त्ति 'प्रत्येकशरीराव' एकमेकं प्रति प्रत्येकम् - एकैकशो विभिन्नं शरीरमेषामिति प्रत्येकशरीराः, तेषा हि यदेकस्य शरीरं न तदन्यस्येति, यदुक्तम्
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जीवाजीव
विभक्ति ०
३६
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॥ ६९१॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||९२-१०५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[९२-१०५]
“जह सगलसरिसवाणं सिलेसमिस्साण घट्टिया बत्ती । पत्तेयसरीराणं तह होंति सरीरसंघाया ॥१॥जह पा तिलसकलिया पहुएहि तिलेहिं मेलिया संती । पत्तेयसरीराणं तह होंति सरीरसंघाया ॥२॥"प्रक्रमाजीवा ये इति शेषः अनेकधा ते प्रकीर्तिताः, पठन्ति च-'बारसविहभेएणं पत्तेया उ वियाहिय'त्ति, 'वृक्षाः' चूतादयः 'गुच्छाः' वृन्ताकीप्रभृतयः 'गुल्माश्च' नवमालिकादयः 'लताः' चम्पकलतादयः 'वल्लयो' त्रपुष्यादयः 'तृणानि' जुजुका
र्जुनादीनि 'लतावलयानि' नालिकेरीकदल्यादीनि भण्यन्ते, तेषां च शाखान्तराभावेन लतारूपता त्वचो वलया-17 सकारत्वेन च वलयता, पर्याणि-सन्धयस्तेभ्यो जाताः पर्वजाः पाठान्तरतः पर्वगा वा इक्ष्वादयः 'कुहणाः' भूमिस्फो-16 टकविशेषाः सर्पच्छत्रकादयो, जले रुहन्तीति जलरुहाः-पद्मादयः औषधयः-फलपाकान्तास्तद्रूपाणि तृणानि । औषधितृणानि-शाल्यादीनि हरितानि-तन्दुलेयकादीनि तान्येव कायाः-शरीराण्येषामिति हरितकायाः, चशब्द एषामेव खगतानेकभेदसंसूचकः । 'साधारणशरीरास्त्विति तुशब्दस्यापिशब्दार्थत्वात् साधारणशरीरा अपि न केवलं प्रत्येकशरीरा इत्यपिशब्दार्थः, आलूकमूलकादयः हरिद्रापर्यन्ताः प्रायः कन्दविशेषास्तत्तद्देशप्रसिद्धाः 'एवमादयः'
१ यथा सकलसर्पपाणां श्लेपमिश्राणां वर्तिता वर्तिः । प्रत्येकशरीराणां तथा भवन्ति शरीरसंघाताः ॥ १॥ यथा वा तिलशकुलिका | बहुमिस्तिलैर्मेलिता सन्ती० ॥२॥
दीप अनुक्रम [१५५६-१५६९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||९२-१०५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.]
जीवाजीव विभक्ति
प्रत
बृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥६९२॥
[९२
-१०५]
इत्येवंप्रकारा येषामिदं साधारणशरीरलक्षणमस्ति, तद्यथा-"चक्कागं भजमाणस्स, गंठी चुण्णघणो भवे । पुढवीसरि- सेण भेएण, अणतजीवं वियाणाहि ॥१॥ गूढच्छिरागं पत्तं सच्छीर जंच होइ निच्छीरं । जंपि य पणट्ठसंधि, अणंतजी बियाणाहि ॥२॥" इत्यादि । पनका-उलिजीवाः, इह च तदुपलक्षिताः सामान्येन वनस्पतयो गृह्यन्ते, तथा चान्ये पठन्ति-'वणप्फईण आउं तु'त्ति, प्रत्येकशरीरापेक्षया चोत्कृष्टं दशवर्षसहस्त्रमानमायुरुक्तं, साधारणाना जघन्यत उत्कृष्टतश्चान्तर्मुहूर्त्तायुष्कमानं, उक्तं च-"निओयेस्स णं भंते ! केवइयं कालं ठिइपन्नत्ता ?, गोयमा! जह-| नेण अंतोमुहुर्त उकोसेणवि अंतोमुहुत्तं" कायस्थितिः पनकानाम् , इहापि सामान्येन वनस्पतिजीवानाम् , अत एवासौ सामान्येन वनस्पतिजीवान्निगोदान् वाऽपेक्ष्योत्कृष्टतोऽनन्तकालमुच्यते, विशेषापेक्षायां हि प्रत्येकवनस्पतीनां तथा निगोदानां बादराणां सूक्ष्माणां चासङ्ख्येयकालोऽवस्थितिः, यदुक्तम्-"पत्तेयसरीरवादरवणप्फईकाइयाणं भंते ! केवइयं कालं कायठिई पन्नत्ता ?, जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेण सत्तरि सागरोवमकोडाकोडीओ | १ समभागं भज्यमानस्य अन्थिशूर्णपनो भवेत् । पृथ्वीसदृशेन भेदेनानन्तकार्य विजानीहि ।। १।। गूढशिराक पत्रं सक्षीरं यच्च भवति निक्षीरम्। यदपि प्रणष्टसन्धिकं ॥२॥ २ निगोदस्य भदन्त ! कियत्कालं स्थितिः प्रज्ञप्ता ?, गौतम! जघन्येनान्तर्मुहूर्तमुत्कृष्टतोऽपि अन्तर्मुहूर्तम् | ३ प्रत्येकशरीरबादरवनस्पतिकायिकानां भवन्त ! कियन्तं कालं स्थितिः प्रज्ञता ? जघन्येनान्तर्मुहूर्जमुत्कर्षेण सप्ततिः सागरोपमकोटीकोट्यः ।
दीप अनुक्रम [१५५६-१५६९]
६९॥
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [--] / गाथा ||९२-१०५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[९२
-१०५]
दणिओए णं भंते ! णिओदेत्ति कालओ केचिरं होइ ?, जहणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं अणंतकालं अणंताओ ओस
प्पिणीओ खेत्तओ अड्डाइजा पोग्गलपरियट्टा वा । बायरनिओयपुच्छा, जहणेणं अंतोमुहुर्त उक्कोसेणं सत्तरिसागरोवमकोडाफोडीओ । सहमनिगोयपुच्छा, जहणणं अंतोमुडुत्तं उकोसेणं असंखेज कालं"ति । तथाऽसमयकाल-11 मुत्कृष्टं पनकजीवानामन्तरं, तत उदृत्य हि पृथिव्यादिपूत्पत्तव्यं, तेषु चासङ्खयेयकालैब कायस्थितिरिहापि तथा:भिधानादिति चतुर्दशसूत्रार्थः ॥ प्रकृतमुपसंहरन्नत्तरप्रन्धं च सम्बन्धयितुमिदमाह
इचेए थावरा तिथिहा, समासेण वियाहिया । इत्तो उ तसे तिविहे, चुच्छामि अणुपुष्वसो ॥१०६॥ 'इति' इत्येपंप्रकाराः 'एते' पृथिव्यादयः स्थानशीलाः स्थावराः 'त्रिविधाः' त्रिप्रकाराः, प्रयाणामप्यमीषां खयमपस्थितिखभावत्वात् , 'समासेन' सङ्केपेण व्याख्याताः, विस्तरतो शमीषां बहुतरा भेदाः । 'अतः' स्थावरविभक्तेरनन्तरं 'तुः पुनरर्थः सांविविधान् वक्ष्यामि अणुपुषसो त्ति आनुपूयति सूत्रार्थः॥
तेऊ वाऊ य बोद्धव्या, ओराला य तसा तहा। इच्चेए तसा तिथिहा, तेर्सि भेए सुह मे ॥ १०७॥ | १ निगोदो भदन्त ! निगोद इति कालतः कियश्चिरं भवति ?, जघन्येनान्तर्मुहर्तमुत्कर्षणानन्तं कालं अनन्ता अवसर्पिण्यः क्षेत्रतोऽर्धततीयाः पुद्रलपरावर्ता वा । बादरनिगोदे पृच्छा अपन्यनान्तर्मुहूर्तमुत्कर्षतः सप्ततिः सागरोपमकोटीकोटयः । सूक्ष्मनियोदे पृच्छा, जपन्येनान्तर्मुहूर्त्तमुत्कर्षतोऽसंख्येयं कालं
दीप अनुक्रम [१५५६-१५६९]
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१०७|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
बहद्वृत्तिः
प्रत सूत्रांक [१०७]]
उत्तराध्य. 'तेउ'त्ति तेजोयोगातेजांसि-अ[त्रा प्रयतद्वार्त्तिनो जीवा अपि तथोक्ताः, एवं 'याऊ'त्ति यान्तीति याययो-या- जीवाजीव दतास्ते च बोद्धव्याः, 'ओराल'त्ति 'उदाराः' एकेन्द्रियापेक्षया प्रायः स्थूला द्वीन्द्रियादय इतियावत् 'चः' समुच्चये साः 'तथेति तेनागमोक्तेन प्रकारेण, उपसंहारमाह-'इती'त्यनन्तरोक्तास्त्रस्यन्ति-चलन्ति देशाद्देशान्तरं संक्राम
विभक्ति ॥६९॥ न्तीति प्रसाः 'त्रिविधाः' त्रिप्रकाराः, तेजोवाय्बोश्च स्थावरनामकर्मोदयेऽप्युक्तरूपं त्रसनमस्तीति प्रसत्वं, द्विधा हि|
३६ तत्-गतितो लब्धितश्च, यत उक्तम्-“दुविहा खलु तसजीवा-लद्धितसा चेव गतितसा चेव"त्ति, ततश्च तेजोवाय्वोर्गतित उदाराणां च लब्धितोऽपि त्रसत्वमिति, उत्तरप्रन्धसम्बन्धनायाह-'तेषा'मिति तेज:प्रभृतीनां भेदान् शृणुत 'मे' मम कथयत इति सूत्रार्थः ॥ तत्र तावत्तेजोजीवानाह| दुविहा तेउजीचा उ, सुटुमा वापरा तहा । पज्जसमपज्जत्ता, एवमेव दहा पुणो ॥१०८॥ वापरा जे उ| पज्जसा, गहा ते वियाहिया। इंगाले मुम्मुरे अगणी, अचिं जाला तहेव य॥१०९॥ उक्का विजू य यो
ब्वा, गहा एवमायओ। एगविहमनाणत्ता, सुहमा ते वियाहिया ॥११०॥ सहमा सव्वलोगंमि, लो-18 गदेसे य बायरा । इत्तो कालविभागं तु, तेसिं वुच्छं चउन्विहं ॥ १११ ॥ संतई पप्पडणाईया, अपज्जवसि-४६९३|| यावि य । ठिई पडुच्च साईया, सपज्जवसियावि य ॥११२ ।। तिन्नेव अहोरत्ता, उक्कोसेण वियाहिया । आउ१ द्विविधाः खलु त्रसजीवा:-लब्धित्रसाश्चैव गतित्रसाधैव
दीप अनुक्रम [१५७१]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१०८-११६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [१०८११६]
ठिई तेऊणं, अंतोमुहत्तं जहन्नयं ॥ ११३ ॥ असंखकालमुकोसा, अंतोमुहुरा जहन्नयं । कायठिई तेऊणं, तं ६ कार्य तु अमुचओ ॥ ११४ ॥ अर्णतकालमुक्कोस, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । विजदमि सए काए, तेउजीवाण अ-1 तरं ॥ ११५ ।। एएसि बन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो।।११।।
दुविहेत्यादिसूत्राणि नव प्रायः प्राग्वत्, नवरम् 'अङ्कारः' विगतधूमज्वालो दह्यमानेन्धनात्मकः 'मुर्मुरः' भस्ममिश्रामिकणरूपः 'अमिः' इहोक्तभेदातिरिक्तो बहिः 'अर्चिः' मूलप्रतिबद्धा ज्वलनशिखा, दीपशिखेत्यन्ये, 'ज्वाला' छिन्नमूला ज्वलनशिखैवेति सूत्रनवकार्थः ॥ उक्तास्तेजोजीवाः, वायुजीवानाह| दुविहा वाउजीवा प, मुटुमा बायरा तहा । पज्जत्तमपजत्ता, एवमेव दहा पुणो ॥ ११७ ॥ पायरा जे उ| पजत्ता, पंचहा ते पकित्तिया। उपलियामंडलियाघणगुंजासुद्धयाया य ॥ ११८ ॥ संवगवाए य, णे
गहा एवमाअओ। एगविहमणाणत्ता, सहमा तत्थ वियाहिया ॥ ११९॥ सुहमा सव्वलोगंमि, लोगदेसे । ४ाय बायरा । इत्तो कालविभागं तु, तेसिं वुच्छं चउम्विहं ॥ १२०॥ संतई पप्पऽणाईया, अपज्जवसियावि य। ठिई पडच साईया, सपजवसियावि य॥१२१ ॥ तिन्नेव सहस्साई, वासाणुकोसिया भवे। आउठिई वाऊणं, अंतोमुटुत्तं जहन्नयं ॥ १२२ ॥ असंखकालमुकोसा, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । कायठिई वाऊणं, तं कायं तु अमुं
दीप अनुक्रम [१५७२-१५८०]
JABERatinintamational
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||११७-१२४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य. बृहद्वृत्तिः ॥६९४॥
जीवाजीव विभक्तिः
प्रत सूत्रांक [११७१२४]
चओ ॥ १२२ ॥ अणंतकालमुक्कोसं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं । विजढंमि सए काए, वाउजीवाण अंतरं ॥ १२३ ॥ एएसिं वन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥ १२४ ॥
दुविहेत्यादि सूत्रनवकं प्राग्वत् । 'पञ्चधे' त्युपलक्षणम् , अत्रैवास्यानेकधेत्यभिधानात्, 'उकलियामंडलिया- घणगुंजासुद्धवाया य' वातशब्दस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धादुत्तलिकावाता ये स्थित्वा स्थित्वा पुनर्वान्ति मण्डलिका- वाता-वातोलीरूपाः धनवाता-रत्नप्रभाद्यधोवर्त्तिनां धनोदधीनां विमानानां पाऽऽधारा हिमपटलकल्या बायको गुञ्जावाता-ये गुञ्जन्तो वान्ति शुद्धवाता-उत्कलिकायुक्तविशेषविकला मन्दानिलादयः, 'संवगवाए यति संवर्तकवाताच-ये बहिःस्थितमपि तृणादि विवक्षितक्षेत्रान्तः क्षिपन्तीति सूत्रनवकार्थः ॥ इत्थं तेजोवायुरूपांत्रसानभिधायोदारत्रसाभिधित्सयाऽऽह
ओराला तसा जे उ, चउहा ते पकित्तिया । येइंदिय तेइंदिय, चउरो पंचिंदिया चेव ॥ १२५ ॥ उदाराखसाः 'ये तु' इति ये पुनः 'चतुर्धा' चतुष्प्रकारास्ते प्रकीर्तिताः, यथा चैषां चतुर्द्धात्वं तथाऽऽह-'बेईदिय'त्ति द्वे इन्द्रिये-स्पर्शनरसनाख्ये येषां तेऽमी द्वीन्द्रियाः, एतच निवृत्युपकरणाख्यं द्रव्येन्द्रियमभिप्रेत्योच्यते, भावेन्द्रियापेक्षयकेन्द्रियाणामपीन्द्रियपञ्चकस्यापि सम्भवात् , तथा च प्रज्ञापना-"देर्षिदियं पहुच एगिदिया जीवा १ द्रव्येन्द्रियं प्रतीत्य एकेन्द्रिया जीवा एकेन्द्रिया भावेन्द्रियं प्रतीत्य एकेन्द्रिया अपि जीवा द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रियाग्मतुरिन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियाः
दीप अनुक्रम [१५८१-१५८९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||११७-१२४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [११७
१२४]
एगेंदिया भावें दियं पडुच एगेन्दियावि जीवा बेदिया तेइंदिया चउरिंदिया पंचिंदिय"त्ति, एवं शेषेष्वपि, तथैव 'तेइंदिय'त्ति त्रीन्द्रियाः-येषां वे ते एव तृतीयं ब्राणं, 'चउरी'त्ति प्रक्रमाचतुरिन्द्रियाः येषां त्रीण्युक्तरूपाणि चतुर्थं चक्षुः, पञ्चेन्द्रियाश्चैव-येपामेतान्येव चत्वारि पञ्चमं श्रोत्रमिति सूत्रार्थः ॥ सत्र तावद् द्वीन्द्रियवक्तव्यतां प्रतिपिपादयिपुरिदमाह। बेइंदिया उ जे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पजत्तमपज्जत्ता, तेर्सि भेए सुणेह मे ॥ १२६ ॥ किमिणो
सोमंगला चेव, अलसा माहवाहया । वासीमुहा य सिप्पीया, संखा संखणगा तहा ॥१२७ ।। पल्लोयाणु-| दिल्लपा चेव, तहेव य वराडगा । जलूगा जालगा चेव, चंदणा य तहेव प॥१२८॥ इति बेइंदिया एए.
गहा एवमायओ। लोएगदेसे ते सव्वे, न सव्वत्थ वियाहिया ॥ १२९ ।। संतई पप्पडणाईया, अपज्जब18/सियाचि य । ठिई पडच साईया, सपज्जवसियावि य॥१३० ॥ वासाई पारसेव उ, उफोसेण वियाहिया ।।
बेईदियआउठिई, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ॥ १३१ संखिजकालमुक्कोसा, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं । बेइंदियकायठिई, सतं कार्य तु अमुंचओ॥ १३२॥ अणंतकालमुकोसं, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । इंदियजीवाणं, अंतरेयं वियाहियं । 18॥१३३ ॥ एएर्सि वन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥ १३४॥
बेइंदिया इत्यादि सूत्रनवकम् , इदमपि प्रायस्तथैव, नवरं द्वीन्द्रियाभिलापः कर्त्तव्यः, तथा 'कमयः' अशुच्यादि
दीप अनुक्रम [१५८१-१५८९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||१२६-१३४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
A
[१२६
१३४]
उत्तराध्य. सम्भयाः 'अलसाः' प्रतीताः 'मातृवाहकाः' ये काष्ठशकलानि समोभयाग्रतया संघान्ति, वास्याकारमुखा पासी-II
मुखाः, 'सिप्पिय'त्ति प्राकृतत्वात् शुक्तयः 'शङ्खाः' प्रतीताः 'शङ्खनकाः' तदाकृतय एवात्यन्तलघवो जीवाः 'वरा-3 बृहद्वृत्तिः
टकाः' कपर्दकाः 'जलौकसः' दुष्टरक्काकर्षिण्यः चन्दनका-अक्षाः, शेपास्तु यथासम्प्रदायं वाच्याः, वर्षाणि द्वादशैव विभक्तिः ॥६९५|| विति सूत्रनवकार्थः ॥ त्रीन्द्रियवक्तव्यतामाह
तेइंदिया य जे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पज्जत्तमपज्जत्ता, तेर्सि भेए सुणेह मे ॥ १३५॥ कुंथुपिवीलिउहंसा, उक्कलुहिया तहा। तणहारा कट्ठहारा य, मालूगा पत्तहारगा ॥ १३६॥ कप्पासिद्धिमिजा य, |र्तिदुगा तउसर्मिजगा । सदावरी य गुम्मी य, बोद्धव्वा इंदगाइ य ॥ १३७ ॥ इंदगोवसमाइया, गहा एव-12
मायओ। लोएगदेसे ते सव्वे, न सम्वत्थ वियाहिया ॥ १३८॥ संतई पपडणाईया, अपज्जवसियावि य ।। दाठिई पडुच साईया, सपज्जवसियावि य ॥ १३९ ॥ एगूणवन्नऽहोरत्ता, उक्कोसेण वियाहिया | तेइंदिय आउठिई, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ॥ १४० ॥ संखिजकालमुक्कोसा, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । तेइंदियकायठिई, तं कायं तु अमुंचओ॥१४१॥ अर्णतकालमुक्कोसं, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । तेइंदियजीचाणं, अंतरेयं वियाहियं ॥१४२।। एएसिं| | वनओ चेव, गंधो रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो॥१४३ ॥
| ॥६९५॥ । तेंदिएत्यादि सूत्रनवकम् , एतदपि पूर्ववत् , नवरं त्रीन्द्रियोचारणं विशेषः । तथा कुन्थवः-अनुद्धरिप्रभू-|
दीप अनुक्रम [१५९१-१५९९]]
Siwanmorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१३५
-१४३]
दीप
अनुक्रम [१६००
-१६०८]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||१३५ - १४३ ||
निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [ १५...]
तयः पिपीलिकाः- कीटिकाः गुंमी-शतपदी, एवमन्येऽपि यथासम्प्रदायं वाच्याः, एकोनपञ्चाशदहोरात्राण्यापुः| स्थितिरिति सूत्रनवकार्थः ॥ चतुरिन्द्रियवक्तव्यतामाह
रिंदिया उजे जीवा, दुविहा ते पकित्तिया । पजत्तमपजन्ता, तेर्सि भेए सुणेह मे ॥ १४४ ॥ अंधिया पुत्तिया चेव, मच्छिया मसगा तहा। भमरे कीडपयंगे य, ढिंकणे कुंकणे तहा ॥ १४५ ॥ कुकडे सिंगिरीडी य, नंदावत्ते य विच्छिए । डोले भिंगिरिडिओ, विरिली अच्छिवेह ॥ १४६ ॥ अच्छिरे माहले अच्छि - [[रोर], विश्विते चित्तपत्तए । ओहिंजलिया जलकारी, य नीया तंबगाइ या ॥ १४७ ॥ इइ चरिंदिया एए, गहा एवमायओ। लोगस्स एगदेसंमि, ते सव्वे परिकित्तिया ॥ १४८ ॥ संतई पप्पऽणाईया, अपज्जवसियावि य ठिई पडच साईया, सपञ्जवसियावि य ॥ १४९ ॥ छचैव य मासाऊ, उद्योसेण वियाहिया । चरिंदिय आउठिई, अंतोमुद्दत्तं जहन्नयं ॥ १५० ॥ संखिज्नकालमुकोसं, अंतोमुद्दत्तं जहन्नयं । चउरिंदियकायठिई, तं | कार्य तु अर्मुचओ ॥ १५१ ॥ अनंतकालमुकोसं, अंतोमुहुत्तं जहन्नथं । विजढंमि सए काए, अंतरेयं वियाहियं ॥ १५२ ॥ एएसिं वनओ चेव, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥ १५३ ॥ चरिदिएत्यादि सूत्रदशकम्, इदमपि तथैव चतुरिन्द्रियाभिलाप एव विशेषः । एतद्भेदाथ केचिदप्रतीता एवान्ये तु तत्तद्देशप्रसिद्धितो विशिष्टसम्प्रदायाच्चाभिधेयाः, तथा षडेव मासानुत्कृष्टैषां स्थितिरिति सूत्रदशकार्थः ॥ | पञ्चेन्द्रियवक्तव्यतामाह
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||१४४-१५४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
वृहद्वृत्तिः
सूत्रांक
॥६९६॥
[१४४
KRICA
१५४]
उत्तराध्य.
पचिंदिया उ जे जीवा, चउविहा ते चियाहिया। नेरइय तिरिक्खा य, मणुया देवा य आहिया ॥ १५४ ॥ जीवाजीव दि पञ्चेन्द्रियास्तु ये जीवाश्चतुर्विधास्ते व्याख्याताः, तद्यथा-'णेरइय तिरिक्खा यत्ति नैरयिकास्तिर्यश्चश्च मनुजा देवाश्च 'आख्याताः' कथितास्तीर्थकरादिभिरिति सूत्रार्थः ॥ तत्र तावन्नैरयिकानाह
नेरइया सत्तविहा, पुढवीसू सत्तम् भवे । रयणाभसकराभा, वालुयाभा य आहिया ॥ १५५ ॥ पंकाभा । धूमाभा, तमा तमतमा तहा । इइ नेरइया एए, सत्तहा परिकित्तिया ॥१५६ ॥ लोगस्स एगदेसंमि, ते सब्वे उ वियाहिया । इत्तो कालविभागं तु, तेसिं वुच्छ चाउम्विहं ॥१५७ ॥ संतई पप्पडणाईया, अपज्जबसियावि य । ठिई पडच साईया, सपनवसियावि य ॥ १५८ ॥ सागरोवममेगं तु, उकोसेण वियाहिया ।
पढमाइ जहन्नेणं, दसवाससहस्सिया ।। १५९॥ तिन्नेव सागराऊ, उकोसेण वियाहिया। दुचाए जहन्नेणं, ताएग तू सागरोवमं ॥१६०॥ सत्तेव सागराऊ, उक्कोसेण वियाहिया । तईयाए जहम्नेणं, तिनेव उ सागरोघमा ॥ ११॥ दससागरोवमाऊ, उकोसेण वियाहिया । चउत्थीइ जहनेणं, सत्तेव उ सागरोवमा ॥१२॥ सत्तरससागराऊ, उक्कोसेण वियाहिया। पंचमाए जहन्नेणं, दस चेव उ सागरा ॥१६३ ॥ यावीससागराऊ.
॥६९६॥ |उक्कोसेण वियाहिया । छट्ठीद जहन्नेणं, सत्तरस सागरोवमा ॥१४॥ तित्तीससागराऊ, उकोसेण वियाहिया। र सत्तमाए जहन्नेणं, घावीसं सागरोवमा ॥ १३५ ॥ जा चेव उ आउठिई, नेरहयाणे वियाहिया । सा तेसि ||
दीप अनुक्रम [१६०९-१६१९]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१५५
१६८]
दीप
अनुक्रम [१६२०
-१६३३]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [--] / गाथा ||१५५ - १६८ ||
अध्ययनं [ ३६ ],
निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [ १५...]
कायठिई, जहनुकोसिया भवे ॥ १६६ ॥ अनंतकालमुकोर्स, अंतोमुद्दत्तं जहन्नयं । विजमि सए काए, नेरइयाणं तु अंतरं ॥ १६७ ॥ एएसिं वन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥ १६८ ॥
नेरइएत्यादि चतुर्दश सूत्राणि । नैरयिकाः 'सप्तविधाः ' सप्तप्रकाराः, किमिति ?, यतः पृथ्वीषु सप्तसु 'भवे'त्ति भवेयुः, ततस्तद्भेदात्तेषां सप्तविधत्यमिति भावः, काः पुनस्ताः सप्त ? इत्याह- 'रयणाभ'त्ति रत्नानां - वैडूर्यादीनामामानमाभास्वरूपतः प्रतिभासनमस्यामिति रत्नाभा, इत्थं चैतत्, तत्र रत्नकाण्डस्य भवनपतिभवनानां च विविधरत्नवतां सम्भवात् एवं सर्वत्र, नवरं शर्करा - शुक्ष्णवापाणशकलरूपा तदाभा, 'धूमाभेति यद्यपि तत्र धूमासम्भवस्तथाऽपि तदाकारपरिणतानां पुद्गलाना सम्भवात्, तमोरूपत्वाच्च तमः, प्रकृष्टतरतमस्त्वाच्च तमस्तमः, 'इति' इत्यमुना पृथिवीसप्तविधत्वलक्षणेन प्रकारेण नैरयिका एते सप्तधा प्रकीर्त्तिताः । 'लोगस्से'त्यादिसूत्रद्वयं क्षेत्रकालाभिधायि प्राग्वत् । सादिसपर्यवसितत्वं द्विविधस्थित्यभिधानद्वारतो भावयितुमाह-सागरोपममेकं तुत्कृष्टेन व्याख्याता 'प्रथमायां' प्रक्रमान्नरकपृथिव्यां जघन्येन दश वर्षसहस्राणि यस्यां सा दशवर्षसहस्रिका प्रस्तावादायुः स्थितिर्नैरयिकाणामितीहोत्तरसूत्रेषु च द्रष्टव्यम् । त्रीण्येव 'सागरे'ति सागरोपमाणि 'तुः' पूरणे उत्कृष्टेन व्याख्याता द्वितीयायां, 'जहण्णेणं'ति उत्तरत्र तुशब्दस्य पुनः शब्दार्थस्य भिन्नक्रमत्येनेह सम्बन्धाजघन्येन पुनरेकं सागरोपमम्
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१५५-१६८|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
उत्तराध्य. बृहद्धृत्तिः ॥६९७॥
जीवाजीव विभकि०
सूत्रांक
[१५५
१६८]
*-trailo k
सप्तव सागरोपमाणि तूत्कृष्टेन व्याख्याता तृतीयायां, जघन्येन पुनस्त्रीण्येव सागरोपमाणि, दश सागरोपमाणि तूत्कृष्टेन व्याख्याता चतुर्थी, जघन्येन सप्तैव तु सागरोपमाणि । सप्तदश सागरोपमाणि तूत्कृष्टेन व्याख्याता पञ्चम्यां, जघन्येन दश चैव तु सागरोपमाणि द्वाविंशतिः सागरोपमाणि तूत्कृष्टेन व्याख्याता पष्ठयां, जघन्येन सप्त- दश सागरोपमाणि । त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि तृत्कृष्टेन व्याख्याता सप्तम्यां नरकपृधियां, जघन्येन द्वाविंशतिः सागरोपमाणि ॥ आयुःस्थितिरुवा, कायस्थितिमाह-'या चेति चशब्दो वक्तव्यतान्तरोपन्यासे 'एवेति भिन्नक्रमः |'चः पुनरर्थः, ततो यैव च पुराऽऽयुःस्थिति रयिकाणां व्याख्याता 'सि'त्ति एवकारस्य गम्यमानत्वात्सैव तेषां कायस्थितिर्जघन्योत्कृष्टा भवेत् , इत्थं चैतत् , तत उवृत्तानां पुनस्तत्रैवानुपपत्तेः, ते हि तत उदृत्य गर्भजपर्याप्सकसयेयवर्षायुष्ष्वेवोपजायन्ते, यत उक्तम्-"णरगाओ उबट्टा गम्भे पजत्तसंखजीवीसु । णियमेण होइ वासो" इत्यादि। अन्तरविधानाभिधायि सूत्रद्वयं प्राग्वत् , नवरमन्तर्मुहूर्त जघन्यमन्तरं, यदाऽन्यतरनरकादुदृत्य कश्चिजीवो गर्भजपर्याप्सकमत्स्यादिपूत्पद्यते, तत्र चातिसंक्लिष्टाध्यवसायोऽन्तर्मुहूर्त्तमानायुः प्रतिपाल्य मृत्वाऽन्यतमनरक एवोपजायते तदा लभ्यत इति भावनीयमिति चतुर्दशसूत्रार्थः ॥ इत्थं नैरयिकानभिधाय तिरश्च आहपचिंदियतिरिक्खा उ, दुचिहा ते वियाहिया । समुच्छिमतिरिक्खा उ, गन्भवतिया तहा ॥१६९ ।। १ नरकाढुहृत्तानां गर्भजेषु पर्याप्तसंख्यजीविषु नियमात् भवति वासः ।
दीप अनुक्रम [१६२०-१६३३]
॥६९७॥
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१६९-१९२|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक
[१६९१९२]
दुविहावि ते भवे तिषिहा, जलयरा धलयरा तहा। खहयरा य योद्धब्वा, तेर्सि भेए सुणेह मे ॥१७०॥ मच्छा काय कच्छभा य, गाहा य मगरा तहा । सुसमारा य बोद्धव्वा. पंचहा जलयराहिया ॥ १७१ ॥ लोएगदेसे ते सब्चे, न सव्वत्थ वियाहिया । इत्तो कालविभागं तु, तेर्सि बुच्छ चाउम्विहं ॥ १७२ ॥ संतई पप्पडणाईया, अपजवसियावि य । ठिई पडुच्च साईया, सपञ्जवसियावि य ॥१७३ ॥ इकाय पुब्चकोडीओ, उक्कोसेण वियाहिया । आउठि जलयराण, अंतोमुहत्तं जहन्नयं ॥ १७४ ।। पुब्बकोडीपुरतं तु, उक्कोसेण विवाहिया। कायठिई जलयराणं, अंतोमुहत्तं जहन्नपं ॥ १७५ ॥ अणंतकालमुफोसं, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । विजदंमि सए काए, जलयराणं तु अंतरं ॥ १७६ ॥ एएसि बन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ।। १७७ ।। चउप्पया य परिसप्पा, दुविहा थलयरा भवे । चप्पया चविहा उ, ते मे |कित्तयओ सुण ॥ १७८ ॥ एगखुरा दुखुरा चेव, गंडीपयसनष्फया । हयमाह गोणमाई, गयमा सीहमाइणो ॥ १७९ ॥ भुओरगपरिसप्पा, परिसप्पा दुविहा भवे । गोहाई अहिमाईया, इकिका गहा भये
॥१८॥ लोएगदेसे ते सव्वे, न सब्बत्थ वियाहिया । इत्तो कालविभागं तु, तेसिं बुच्छं चम्विहं ॥ १८१॥ दि संतई पप्पणाईया, अपजवसियावि य । ठिई पहुच साईया, सपजवसियाचि य॥ १८२॥ पलिओचमा उ| |तिन्नि उ, उकोसेण वियाहिया । आउठिई थलयराण, अंतोमुहत्तं जहन्नयं ॥१८३ ॥ पलिओवमा उ तिन्नि ज, उकोसेणं वियाहिया । पुब्दकोडीपुहतं तु, अंतोमुहत्तं जहन्नयं ॥ १८४ ॥ कापठिई थलयराणं, अंतरंगा
दीप अनुक्रम [१६३४-१६५७]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||१६९-१९२|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
प्रत
सूत्रांक
[१६९
१९२]
तेसिमं भवे । कालं अणतमुकोस, अंतोमुहत्तं जहन्नयं ॥ १८५॥ विजदंमि सए काए, थलयराणं तु अंतरं। जीवाजीव चम्मे उ लोमपक्खी या, तझ्या समुग्गपक्खिया ॥ १८६॥ विययपक्खी य बोद्धब्बा, पक्खिणो य चउ-INI विहा । लोएगदेसे ते सम्बे, न सम्बत्थ वियाहिया ॥ १८७ ।। संतई पप्पऽणाईया, अपजवसियावि य । ठिई 5 पहुंच साईया, सपजवसियावि य ॥ १८८॥ पलिओवमस्स भागो, असंखिजामो भवे । आउठिई खहयराणं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ॥ १८९ ॥ असंखभागो पलियस्स, उक्कोसेण उ साहिओ । पुव्वकोडीपुटुत्तेणं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ॥१९०॥ कापठिई वहयराणं, अंतरं ते रेय)वियाहियं । कालं अणंतमुकोसं, अंतोमुहुतं । जहन्नयं ॥ १९१॥ एएसिं वन्नओ चेव, गंधओरसफासो । संठाणादेसओ बावि, विहाणाई सहस्ससो १९२
पञ्चेन्द्रियेत्यादि सूत्राणि पञ्चवि(चतुर्विशतिर्व्याख्यातप्रायाण्येव, नवरमायसूत्रद्वयमुद्देशतो भेदाननन्तरप्रन्थस|म्बन्धं चाभिदधाति, अत्र संमूर्छनं संमूर्छा-अतिशयमूढता तया निवृत्ताः संमूछिमाः, यदिवा समित्युत्पत्तिस्थानपुद्गलैः सहकीभावेन मूर्च्छन्ति-तत्पुद्गलोपचयात्समुच्छ्रिता भवन्तीयौणादिक इम्प्रत्यये संमूछिमास्ते च ते तिर्यश्चः | |संमूछिमतियञ्चो ये मनःपर्याप्त्यभावतः सदा संमूलिता इचावतिष्ठन्ते, तथा गर्ने व्युत्क्रान्तिर्येषां तेऽमी गर्भव्यु- १९८॥ क्रान्तिकाः । जले चरन्ति-गच्छन्ति चरेर्भक्षणमित्यर्थ इति भक्षयन्ति चेति जलचराः, एवं स्थलं-निर्जलो भूभागस्तस्मिंश्चरन्तीति स्थलचराः, तथा 'खहयर'त्ति सूत्रत्वात्खम्-आकाशं तस्मिंश्चरन्तीति खचराः। 'यथोद्देशं निर्देश
EN
दीप
अनुक्रम [१६३४-१६५७]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१६९
१९२]
दीप
अनुक्रम
[१६३४
-१६५७]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||१६९ - १९२||
निर्युक्तिः [ ५५६...], भाष्यं [ १५...]
इति जलचर भेदानाह-- 'मत्स्याः' मीनाः 'कच्छपाः' कूर्माः गृहन्तीति ग्राहाः - जलचरविशेषा मकराः सुमारा अपि तद्विशेषा एव । 'लोएगदे से' त्यादिसूत्राणि षट् क्षेत्रकालभावाभिधायीनि, तथेह पृथक्त्वं द्विप्रभृत्यानवान्तम् । स्थलचरभेदानाह-परि-समन्तात्सर्पन्ति गच्छन्तीति परिसर्पाः, एकखुरादयश्च हयादिप्रभृतिभिर्यथाक्रमं योज्यन्ते, तत एकः खुरः-- चरणे येषामधोवर्त्यस्थिविशेषो येषां ते एकखुराः- दयादयः एवं 'द्विखुरा:' गवादयो गण्डी- पद्मकर्णिका तद्वद्वृत्ततया पदानि येषां ते गण्डीपादाः - गजादयः 'सणम्फ'ति सूत्रत्वात्सह नखैःनखरात्मकैर्वर्त्तन्त इति सनखानि तथाविधानि पदानि येषां ते सनखपदाः - सिंहादयः । 'भुओरगपरिसप्पा यत्ति | परिसर्पशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते, ततो भुजा इव भुजाः - शरीरावयवविशेषास्तैः परिसर्पन्तीति भुजपरिसर्पाः, उरो वक्षस्तेन परिसर्पन्तीत्युरः परिसर्पाः, तस्यैव तत्र प्राधान्यात्, गोधादयः अहिः - सर्पस्तदादय इति यथाक्रमं योगः, एते च 'एकैके' इति प्रत्येकम् 'अनेकधा' अनेकभेदाः, गोधेरकनकुलादिभेदतो गोणसहाचप्रलापादिभेदतः । पल्योपमानि तु त्रीण्युत्कृष्टेन तु साधिकानि पूर्वकोटीपृथक्त्वेन-उक्तरूपेण, पल्योपमायुषो हि ते न पुनस्तत्रैवोत्पद्यन्ते, ये तु पूर्वकोयायुषो मृत्वा तत्रैवोपजायन्ते तेऽपि सप्ताष्ट वा भवग्रहणानि यावत् पञ्चेन्द्रियनरतिरश्चामधिकनिरन्तर भवान्तरासम्भवात् उक्तं हि - "सत्तः भवा उ तिरिमणुगति, अत एतावत एवाधिकस्य १ सप्ताष्ट्रभवान् तिर्यग्मनुष्याः
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१६९-१९२|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[१६९
१९२]
उत्तराध्य. सम्भव इति भावना । खचरानाह-'चम्मे उ'त्ति प्रक्रमात् 'चर्मपक्षिणः' चर्मचटकाप्रभृतयः, चर्मरूपा एव हि जीवाजीव
तेषा पक्षा इति, तथा रोमप्रधानाः पक्षा रोमपक्षास्तद्वन्तः रोमपक्षिणः-राजहंसादयः 'समुद्गपक्षिणः' समुद्का-| बृहपृत्तिः कारपक्षवन्तः, ते च मानुषोत्तराहि-पवर्तिनः, 'विततपक्षिणः' ये सर्वदा विस्तारिताभ्यामेव पक्षाभ्यामासते। हा
विभक्ति ॥६९९॥ इह च यत्क्षेत्रस्थित्यन्तरादि प्रत्येकं प्राक्तनेन सदृशमपि पुनः पुनरुच्यते न पुनरतिदिश्यते तत्प्रपञ्चितज्ञविनेयानुन-AT
हार्थमेवंविधा अपि प्रज्ञापनीया एवेति ख्यापनार्थ चेत्यदुष्टमेवेति भावनीयमिति पञ्चविं(चतुर्विंशतिसूत्रार्थः ॥ इत्थं तिरथोऽभिधाय मनुजानभिधातुमाह| मणुया दुविहभेया उ, ते मे कित्तयओ सुण । समुच्छिमाइ मणुया, गन्भवतिया तहा ॥ १९३ ॥ गन्भ
वतिया जे उ, तिविहा ते वियाहिया । अकम्मकम्मभूमा य, अंतरद्दीवगा तहा ॥ १९४ ॥ पनरस तीस-17 साइविहा, भेआ अट्ठावीसई । संखा उ कमसो तेसिं, इह एसा वियाहिया ॥१९॥ संमुफिछमाण एसेव, भेओर होइ आहिओ। लोगस्स एगदेसंमि, ते सव्वेवि वियाहिया ॥ १९६ ॥ संतई पप्पणाईया, अपज्जवसिया-14
॥६९९|| |विय । ठिई पद्धच साईया, सपजवसियावि य॥१९७ ॥ पलिओवमाई तिनि य, उकोसेण वियाहिया ।।
आउठिई मणुयाणं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं ॥१९८ ॥ पलिओवमाई तिन्नि उ, उक्कोसेण वियाहिया । पुष्वकोडिपुष्टुत्तेणं, अंतोमुत्तं जहन्नयं ॥ १९९॥ कायटिई मणुयाणं, अंतरं तेसिमं भवे । अर्णतकालमुक्कोस,
दीप अनुक्रम [१६३४-१६५७]]
JABERatinintamational
wwsainatorary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१९३-२०१|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[१९३
२०१]
अंतोमुटुत्तं जहन्नयं ॥ २०० ॥ एपसिं वन्नओ चेव, गंधओ रसफासओ। संठाणादेसओ वावि, विहाणाई |
सहस्ससो॥ २०१॥ & मणुएत्यादि सूत्रनवकं प्राग्वत् , नवरम् 'अकम्मकम्मभूमा यत्ति भूमेत्यस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धात्सूत्रत्वाचाकर्मभूमौ |
भवा अकर्मभूमा एवं कार्मभूमाश्च, अन्तरम्-इह समुद्रमध्यं तस्मिन् द्वीपा अन्तरद्वीपास्तेषु जाता अन्तरद्वीपजाः। || पनरसतीसइविह'त्ति विधशब्दस प्रत्येकमभिसम्बन्धात्पञ्चदशविधाः कार्मभूमाः, कर्मभूमीनां पञ्चदशसश्यत्वात्,IPI
तद्भेदे चामीषामिह भेदस्थाभिधित्सितत्वात् , पञ्चदशसङ्ख्यात्वं च भरतैरावतविदेहानां प्रयाणां प्रत्येकं पञ्चसंख्य-18 मत्वात् , त्रिंशद्विधा अकर्मभूमाः, अत्राप्यकर्मभूमीनामेतावत्सझयत्वं हेतुः, ता हि हैमवतहरिवरम्यकहरण्यवतदेव-13
कुरूत्तरकुरुरूपाः षट् प्रत्येकं पञ्चसङ्ख्यत्वेन त्रिंशद्भयन्ति, इह च क्रमत इत्युक्तावपि पश्चानिर्दिष्टानामपि कार्मभूमानां मुक्तिसाधकत्वेन प्राधान्यतः प्रथमं भेदाभिधानं, पठन्ति च-तीसंपन्नरसविहे'ति, तत्र च यथोद्देशं सम्बन्धो, भेदाश्चाष्टाविंशतिरन्तरद्वीपजानामिति विभक्तिपरिणामेन सम्बन्धनीयम् , इत्थं चैतत्तत्सङ्ख्यत्वादन्तरद्वीपानां, ते हि हिमवतः पूर्वापरप्रान्तविदिक्रप्रसृतकोटिषु त्रीणि त्रीणि योजनशतान्यवगाव तावन्त्येव योजनशतान्यायामवि४ स्तराभ्यां प्रथमेऽन्तरद्वीपाः, ततोऽप्येकैकयोजनशतवृद्धावगाहनया योजनशतचतुष्टयायायामविस्तरा द्वितीयादयः
पद, तेषां च पूर्वोत्तरादिक्रमात्प्रादक्षिण्यतः प्रथमस्थ चतुष्कस्य एकोरुक १ आभाषिको २ लालिको ३ वैपाणिक ४ा
दीप अनुक्रम [१६५८-१६६६]
JABERatinintamational
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[१९३
२०१]
दीप
अनुक्रम
[१६५८
-१६६६]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्ति:
॥७०० ||
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||१९३-२०१|| निर्युक्ति: [५५६...]., भाष्यं [१५...]
इति नाम, द्वितीयस्य हयकर्णी १ गजकर्णी २ गोकर्णः ३ शष्कुली कर्णः ४, तृतीयस्य आदर्शमुखो १ मेषमुखो २ हयमुखो ३ गजमुखः ४, चतुर्थस्याश्वमुखो १ हस्तिमुखः २ सिंहमुखो ३ व्याघ्रमुखः ४, पञ्चमस्याश्वकर्णः १ सिंहकर्णः २ गजकर्णः ३ कर्णप्रावरणः ४, पछस्योल्कामुखो १ विद्युन्मुखो २ जिह्वामुखो ३ मेघमुखः ४, सप्तमस्य घनदन्तो १ गूढदन्तः २ श्रेष्ठदन्तः ३ शुद्धदन्त ४ इति, एतन्नामान एव चैतेषु युगलधार्मिकाः प्रतिवसन्ति, तच्छ| रमानाद्यभिधायि चेदं गाथायुगलम् - "अंतरदीवेसु णरा धणुसय अहूसिया सया मुइया । पा ंति मिहुणभावं पलस्स असंखभागाऊ ॥ १ ॥ चउसट्टी पिट्ठकरंडयाण मणुयाण तेसिमाहारो । भत्तस्स चउत्थस्स अउणसीइदिजाण पालणया ॥ २ ॥” एतेऽपि शिखरिणोऽपि पूर्वापरप्रान्तविदिक्प्रसृतकोटिपू कन्यायतोऽष्टाविंशतिः सन्ति, पूर्वस्माचैषां भेदेनाविवक्षितत्वान्न सूत्रेऽष्टाविंशतिसङ्ख्यविरोध इति भावनीयम् । संमूर्तिमानाम् 'एष एव' इत्यकर्मभूमादिगर्भजानां य उक्तः 'भेदः' नानात्वं भवत्याख्यातः, ते हि तेषामेव वान्तपित्तादिषु संभवन्ति, तथा चागमः"ब्भवतियमणुस्ताणं चैव उच्चारेसु वा पासवणेसु वा खेलेसु वा सिंघाणेसु वा वंतेसु वा पित्तेसु वा पूएस बा
१ अन्तरद्वीपेषु नरा धनुःशताष्टोच्छ्रिताः सदा मुदिताः पालयन्ति मिथुनभावं पल्वस्यासंख्यभागायुषः ॥ १ ॥ चतुःषष्टिः पृष्ठकरण्डकानां मनुजानां तेषामादारः । भक्तेन चतुर्थेन एकोनाशीतिदिनानि पाठनम् ॥ २ ॥ २ गर्भव्युत्क्रान्तिकमनुष्याणामेव उच्चारेषु वा प्रभवणेषु वा लेष्मसु वा सिद्धाणेषु वा वान्तेषु वा पितेषु वा पूयेषु वा
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जीवाजीव
विभक्ति० ३६
~434~
॥७००॥
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||१९३-२०१|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[१९३
२०१]
सोणिएसु वा सुक्केसु वा सुकपुग्गलपरिसाडेसु वा विगयकडेवरेसु वा धीपुरिससंजोएसु वा गामनिद्धमणेसु वा बाणगरणिद्धमणेसु वा सबेसु चेव असुइठाणेसु इत्थ णं संमुच्छिममणुस्सा संमुच्छंति अंगुलस्स असंखेजाइभागमेचाए :
ओगाहणाए" इत्यादि, पल्योपमानि त्रीण्यायुःस्थितिरिति युगलधार्मिकापेक्षया । कायस्थितिश्च पल्योपमानि त्रिीणि पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाधिकानीति गम्यते, एतच तिर्यकायस्थित्यभिहिताभिप्रायेण विज्ञेयम् , अन्तरस्य चानन्तकालत्वं साधारणवनस्पतिकायस्थित्यपेक्षयेतिसूत्रनवकार्थः ॥ इत्थं मनुष्यानभिधाय देवानाह
देवा चउब्विहा वुत्ता, ते मे कित्तयओ सुण । भोमिजवाणमंतर जोइस वेमाणिया तहा ॥ २०२॥ * 'देवाः' उक्तनिरुक्ताः 'चतुर्विधाः' चतुष्प्रकारा उक्तास्तीर्थकरादिभिरिति गम्यते, 'ते' इति तान् देवान् 'मे'
मम 'कीर्तयतः' प्रतिपादयतः 'शृणु' आकर्णय, शिष्यं प्रतीदमाह, तत्कीर्तनं च न भेदाभिधानं विनेति तद्भेदा-BI नाह-'भोमिज'त्ति भूमी-पृथिव्यां भवाः भौमेयकाः-भवनवासिनो, रत्नप्रभापृथिव्यन्तभूतत्वात्तद्भवनानाम्, उक्त /X हि-"इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए असीउत्तरजोयणसयसहस्सवाहलाए उवरिं एग जोयणसहस्सं ओगाहित्ता हेहा
१ शोणितषु वा शुक्रेषु वा शुक्रपुद्रलपरिशाटेषु वा विगतकलेवरेषु वा श्रीपुरुषसंयोगेषु वा ग्रामनिर्धमनेषु वा नगरनिर्धमनेषु वा सर्वेष्वेवाशुचिस्थानेषु अत्र संमूच्छिममनुष्याः संमूर्च्छन्ति अङ्गुलस्यासंख्यावतमभागमात्रयाऽवगाहनया २ अस्या रसप्रभायाः पृथ्ख्या अशीत्युत्तरयोद जनशतसहस्रबाहल्याया उपर्येकं योजनसहवं भवगायाधस्ता
दीप अनुक्रम [१६५८-१६६६]
wwjanatarary.om
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||२०२|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
बृहद्भुत्तिः
प्रत सूत्रांक [२०]
उत्तराध्य. चेगे' जोयणसहस्सं वजेत्ता मज्झे अट्ठहत्तरजोयणसयसहस्से, एत्थ णं भवणयासीणं देवाणं सत्त भवणकोडीओजीवाजीव वायत्तरि च भवणावाससयसहस्सा हवंतीति मक्खाय" 'वाणमंतर'त्ति भाषेत्वाद् विविधान्यन्तराणि-उत्कर्षा
विभक्ति पकर्षात्मकविशेषरूपाणि निवासभूतानि वा गिरिकन्दरविवरादीनि येषां तेऽमी व्यन्तराः, उक्तं हि "ते अधस्तिर्य-४ ॥७०शा गूर्व च त्रीनपि लोकान् स्पृशन्तः खातन्यात्पराभियोगाच प्रायेण प्रतिपतन्त्यनियतगतिप्रचारान्मनुष्यानपि कचि
मृत्यबदुपचरन्ति, तथा विविधेषु च शैलकन्दरान्तरवनविवरादिषु प्रतिवसन्त्यतो व्यन्तरा इत्युच्यन्ते," 'जोइसत्ति, दद्योतयन्तीति ज्योतींषि-विमानानि तन्निवासित्वाइवा अपि ज्योतींषि, ग्रामः समागत इत्यादौ तन्निवासिजनमा-8 *मवत् , विशेषेण मानयन्ति-उपभुञ्जन्ति सुकृतिन एतानीति विमानानि तेषु भवा वैमानिकाः, 'तथेति समुचये इति सूत्रार्थः । एषामेवोत्तरभेदानाह
दसहा उ भवणवासी, अट्टहा वणचारिणो । पंचविहा जोहसिया, दविहा वेमाणिया तहा ॥२०॥४ 'दशधा वि'ति दशधैव 'भवणवासित्ति भवनेषु वस्तुं शीलमेषामिति भवनवासिनः 'अष्टधा' अष्टप्रकारा पनेपु-विचित्रोपवनादिषूपलक्षणत्वादन्येषु च विविधास्पदेषु क्रीडैकरसतया चरितुं शीलमेषामिति वनचारिणः-व्यन्तराः ॥७०१॥
१कं योजनसहस्रं वर्जयित्वा मध्येऽष्टसप्ततियोजनशतसहस्रे, अत्र भवनवासिनां देवानां सप्त भवनकोटयो द्वासप्ततिश्च भवनावासशतसहस्राणि (च) भवन्ति इत्याख्यातं
दीप अनुक्रम [१६६७]]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||२०३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
SC
प्रत सूत्रांक [२०३]
'पञ्चधा' पञ्चप्रकाराः 'जोइसिय'त्तिज्योतिष्णु-विमानेषु भवा ज्योतिष्का ज्योतीष्येव वा ज्योतिष्काः, द्विविधा पैमानिकास्तथेति सूत्रार्थः ॥ एतानेव च नाममाहमाह| असुरा नागमुवण्णा, विज्जू अग्गी अ आहिया । दीवोदही दिसा वाया, धणिया भवणवासिणो|
॥२०४ ॥ पिसाय भूया जक्खा य रक्खसा किन्नरा य किंपुरिसा । महोरगा य गंधब्वा अहविहा वाणसे मंतरा ॥ २०५ ॥ चंदा सूरा य नक्षत्ता, गहा तारागणा तहा । दिसाविचारिणो चेच, पंचहा। जोइसालया ।। २०६॥ वेमाणिया उ जे देवा, दुविहा ते पकित्तिया । कप्पोवगा य बोद्धव्वा, कप्पाईया तहेव य॥२०७॥ कप्पोवगा बारसहा, सोहम्मीसाणगा तहा । सणंकुमारमाहिंदा, बंभलोगा य लंतगा ॥ २०८ ॥ महासुका सहस्सारा, आणया पाणया तहा। आरणा अञ्चुया चेव, इइ कप्पोवगा सुरा ॥२०९।। कप्पाइया उजे देवा, दुविहा ते वियाहिया । गेविजगाणुत्तरा चेव, गेविजा नवविहातहिं ॥२१०॥हिहिमा हिहिमा चेव, हिडिमा मज्झिमा तहा । हिडिमा उधरिमा चेच, मजिसमा हिडिमा तहा ॥ २११ ॥ मजिसमा मज्झिमा चेव, मज्झिमा उवरिमा तहा । उवरिमाहिडिमा चेव, उवरिमा मज्झिमा तहा ॥ २१२॥ उपरिमा |उवरिमा चेव, इइ गेविज्जगा सुरा । विजया वेजयंता य, जयंता अप्पराजिया ॥२१३॥ सव्वट्ठसिद्धगा चेव, झापंचहाणुत्तरा सुरा । इह चेमाणिया एए, णेगहा एवमायओ।। २१४ ॥
दीप अनुक्रम [१६६८]
K4
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||२०४-२१४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
बृहदृत्तिः
३६
प्रत सूत्रांक [२०४-२१४]
असुरेत्यादिसूत्राण्येकादश प्रायः प्रतीतान्येव, नवरम् 'असुराः' इत्यसुरकुमाराः, एवं नागादिष्वपि कुमारशब्दः जीवाजीव दिसम्वन्धनीयः, सर्वेऽपि हमी कुमाराकारधारिण एव, यथोक्तं-"कुमारवदेव कान्तदर्शनाः सुकुमाराः मृदुमधुरललितगतयः शृङ्गाराभिजातरूपविक्रियाः कुमारवचोद्भूतरूपवेषभाषाभरणप्रहरणावरणयानवाहनाः कुमारवचोख--
विभकि. ७०२॥
णरागाः क्रीडनपराश्चेत्यतः कुमारा इत्युच्यन्ते"। 'तारागणाः' इति प्रकीर्णकतारकसमूहाः, दिशासु विशेषेणटू मेरुपादक्षिण्यनित्यचारितालक्षणेन चरन्ति-परिभ्रमन्तीत्येवंशीला दिशाविचारिणः, तद्विमानानि सेकाद
शभिरेकर्विशैयोजनशतैमरोश्चतसृष्वपि दिवबाधया सततमेव प्रदक्षिणं चरन्तीति तेऽप्येवमुक्ताः, ज्योतीषि-उक्तन्यायतो विमानान्यालया-आश्रया येषां ते ज्योतिरालयाः । कल्प्यन्ते-इन्द्रसामानिकत्रायविंशादिदाप्रकारत्वेन देवा एतेष्विति कल्पा-देवलोकास्तानुपगच्छन्ति-उत्पत्तिविषयतया प्रामुवन्तीति कल्पोपगाः, कल्पान्-उक्तरूपानतीताः-तदुपरिवर्तिस्थानोत्पन्नतया निष्क्रान्ताः कल्पातीताः। 'सोहम्मीसाणगति सुधर्मा नाम शक्रस्य समा(सा)sस्मिन्नस्तीति सौधर्मः कल्पः स एषामवस्थितिविषयोऽस्तीति सौधर्मिणः, तथेशानो नाम द्वितीयदेवलोकस्तन्नि
वासिनो देवा अपि ईशानास्त एवेशानकाः एवमुत्तरत्रापि व्युत्पत्तिः कार्याः । प्रीवेव ग्रीवा लोकपुरुषस्य त्रयोदशद्र रज्जूपरिवर्ती प्रदेशस्तस्मिन्निविष्टतयाऽतिभ्राजिष्णुतया च तदाभरणभूता अवेया-देवावासास्तन्निवासिनो देवा अपि
अवेयाः, न विद्यन्ते उत्तराः-प्रधानाः स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्यादिभिरेभ्योऽन्ये देवा इत्यनुत्सराः, 'देहिम'त्ति
दीप अनुक्रम [१६६९-१६७९]
★७०२॥
33
JAMERatinintamational
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२०४-२१४|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२०४-२१४]
अधस्तना उपरितनपकापेक्षया प्रथमात्रयस्तेष्वपि 'हेटिम'त्ति' अधस्तनाः अधस्तनाधस्सनाः-प्रथमत्रिकाधोपर्तिनः 'हेडिमा मज्झिमा तह'त्ति 'अधस्तनमध्यमाः' प्रथमत्रिकमध्यवर्तिनः, हिद्विमा उचरिमा चेव'त्ति 'अधस्तनोपरितनाः' प्रथमत्रिकोपरिवर्तिनः, मध्ये भवा मध्यमा-मध्यमत्रिकवर्तिनस्तेष्वध्यधस्तना मध्यमाधस्तनाः, एवं मध्यममध्यमा मध्यमोपरितनाः, उपरितना-उपरिवर्तित्रिकवर्तिनस्तेष्वधस्तना उपरितनाधस्तनाः, एवमुपरितनमध्यमा उपरितनोपरितनाः, 'इति' भेदसमासौ, तत एतावद्भेदा एव अवेयकाः सुराः, अभ्युदयविघ्नहेतून् विजयन्त इति विजयास्तथैव वैजयन्ताः, 'उणादयो बहुल मिति (पा-३-३-१) बहुलवचनात् घञ्प्रत्यये उपसर्गेकारस्यैकारः, एवं जयन्ताः परैः-अन्यैरभ्युदयविघ्नहेतुभिरजिता-अनभिभूताः अपराजिताः, सर्वेऽर्थाः सिद्धा इव सिद्धा येषां ते सर्वार्थसिद्धाः, ते हि विजितप्रायकर्माणः, उपस्थितभद्रा एव तत्रोत्पत्तिभाजः, इतीत्यादि निगमनम् , अत्र चा वैमानिका इति वैमानिकभेदाः, सामान्यविशेषयोः कथञ्चिदनन्यत्वाद्, एवमादय इत्यादिशब्दस्य प्रकारवचनत्वादेवंप्रकारा इत्येकादशसूत्रार्थः ॥ M लोगस्स एगदेसंमि, ते सब्वे परिकित्तिया । इत्तो कालविभागं तु, तेसिं तुच्छं चउब्बिई ॥ २१५ ॥ संतई पच्पडणाईया, अपज्जवसियाचि य । ठिई पडुच्च साईया, सपजावसियावि य ॥ २१६ ॥ साहीय सागरं इक, उक्कोसेण ठिई भवे । भोमिजाण जहन्नेणं, दसवाससहस्सिया ॥ २१७ ।। पलिओवममेगं
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1BA%BA
दीप अनुक्रम [१६६९-१६७९]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||२१५-२४३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक
[२१५
-२४३]
उत्तराध्य.
तु, उकोसेण वियाहियं । वंतराणं जहमेणं, दसवाससहस्सिया ॥ २१८ ॥ पलिओवममेगं तु, या-14जीवाजीव बृद्धृत्तिः
सलक्खेण साहियं । पलिओवमहभागो, जोइसेसु जहनिया ॥ २१९ ।। दो चेव सागराई, उक्कोसेणं वियाहिया । सोहम्मंमि जहन्नेणं, एगं च पलिओवर्म ॥२२०॥ सागरा साहिया दुन्नि, उक्कोसेण वियाहिया। ईसा
विभकि. ॥७०॥ मि जहनेणं, साहियं पलिओवमं ॥ २११ ।। सागराणि य सत्तेव, उफोसेण ठिई भवे । सर्णकुमारे जहनेणं,
३६ दुन्नि ऊ सागरोवमा ॥ २२२ ।। सागरा साहिया सत्त, उक्कोसेण वियाहिया । माहिदमि जहमेणं, साहिया दुन्नि सागरा ॥ २२३ ॥ दस चेच सागराई, उक्कोसेण वियाहिया । बंभलोए जहनेणं, सत्त उ सागरोवमा
॥ २२४ ।। चजहस उ सागराइं, उक्कोसेण वियाहिया । लंतगंमि जहनेणं, दस उ सागरोवमा ॥ २२५ ॥ 8 सत्तरस सागराई, उक्कोसेण वियाहिया । महामुक्के जहन्नेणं, चउरस सागरोवमा ॥ २२६ ॥ अट्ठारससागराई, उफोसेण वियाहिया । सहस्सारे जहन्नेण, सत्तरससागरोवमा ॥ २२७ ॥ सागरा अउणवीसं तु, को-18 सेण ठिई भवे । आणयंमि जहन्नेणं, अट्ठारस सागरोवमा ॥२२८॥ वीसंतु सागराइंतु, उक्कोसेण ठिई भवे ।। पाणयंमि जहनेणं, सागरा अउणवीसई ॥२२९ ॥ सागरा इकवीसंतु, उक्कोसेण ठिई भवे । आरणमि | जहन्नेणं, वीसई सागरोवमा ॥२३०॥ बावीससागराई, उकोसेण ठिई भवे । अयंमि जहनेणं, सागरा|
७०३॥ इकवीसई ॥ २३१ ॥ तेवीससागराई, उकोसेण ठिई भवे । पढमंमि जहनेणं, बावीसं सागरोवमा ॥ २३२॥ चिउवीससागराई, उफोसेण ठिई भवे । विइयंमि जहनेणं, तेवीसं सागरोवमा ॥ २३३ ॥पणवीससागरा क,
दीप अनुक्रम [१६८०-१७०८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२१५-२४३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
MAS
सूत्रांक
[२१५-२४३]
उकोसण ठिई भवे । तहमि जहन्नेणं, चउवीसं सागरोवमा ॥ २३४ ॥ छब्बीससागराई, उकोसेण ठिी भवे। चउत्थयंमि जहनेणं, सागरा पणवीसई ।। २३५ ।। सागरा सत्तवीसं तु, उक्कोसेण ठिई भवे । पंचमंमि जहनणं, सागरा उ छवीसई ॥ २३६ ॥ सागरा अट्ठवीसं तु, उक्कोसेण ठिई भवे । छटुंमि जहन्नेणं, सागरा सत्तवीसई ॥ २३७ ।। सागरा अउणतीसं तु, उकोसेण ठिई भवे । सत्तमं जहन्नेणं, सागरा अट्ठवीसई ॥ २३८ ॥ तीसं तु सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । अट्ठमंमि जहन्नेणं, सागरा अउणतीसई ॥२३९॥ सागरा इकतीसंग तु, उक्कोसेण ठिई भवे । नवमंमि जहन्नेणं, तीसई सागरोवमा ॥ २४॥ तित्तीससागरा ऊ, उक्कोसेण ठिई भवे । चउरॉपि विजयाईसुं, जहन्ना इकतीसई ॥ २४१ ॥ अजहन्नमणुकोसं, तित्तीसं सागरोवमा । महाविमाणसम्बहे, ठिई एसा वियाहिया ॥ २४२ ॥ जा चेव उ आउठिई, देवाणं तु वियाहिया । सा तेर्सि कायठिई, जहन्नमुक्कोसिया भवे ॥ २४ ॥
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दीप अनुक्रम [१६८०-१७०८]
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ES
है| क्षेत्रकालाभिधायि सूत्रद्वयं प्राग्वत्, सादिसपर्यवसितत्वभावनाथ साहीयमित्यादि सप्तविंशतिः सूत्राणि प्रायो। निगदसिद्धान्येव, नवरं 'साहीय'त्ति प्राकृतत्वात्साधिकं 'सागर'मिति सागरोपममेकमुत्कृष्टेन स्थितिर्भवेद् 'भौमेयकाना' भवनवासिनाम् , इयं च सामान्योक्तावप्युत्तरनिकायाधिपस्य बलेरेवावगन्तब्या, दक्षिणनिकाये विन्द्र
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Swjanmorary on
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२१५
-२४३]
दीप
अनुक्रम
[१६८०
-१७०८]
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२१५ - २४३ || निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
उत्तराध्य.
स्यापि सागरोपममेव, उक्तं हि – “चमरबलि सारमहियं" "सेसाणं'ति, जघन्येन दशवर्षसहस्राणि प्रमाणमस्या दशवर्षसहस्रिका, इयमपि सामान्योक्तावपि किल्विषिकाणामेव स्थितिः, स्थितिप्रभावादीनां देवेषु सहैव हासादिति, बृहद्वृत्तिः उत्तरत्रापि भावनीयम् । तथा पल्योपमं वर्षलक्षाधिकमिति ज्योतिषामुत्कृष्टस्थित्यभिधानं चन्द्रापेक्षं, सूर्यस्य तु ||७०४ || ६ वर्षसहस्राधिकं पल्योपममायुः, प्रहाणां तदेव अ (न) तिरिक्तं, नक्षत्राणां तस्यैवार्द्ध, तारकाणां तचतुर्भागः तथा परयोपमाष्टभागो ज्योतिष्षु जघन्यस्थितिरित्यपि तारकापेक्षमेव, शेषाणां पल्योपमचतुर्भागस्यैव जघन्यस्थितित्वात्, यत उक्तं 'चतुर्भागः शेषाणा' मिति (तत्त्वा-अ० ४ सू० ५३) । इह च सर्वत्रोक्तरूपयोरुत्कृष्टजघन्यस्थित्योरपान्तरालब|र्त्तिनी मध्यमा स्थितिरिति द्रष्टव्यम् । तथा 'प्रथमे' इति प्रक्रमाद् ग्रैवेयकेऽधस्तनाधस्तने, एवं द्वितीयादिष्वपि ग्रैवेयक इति सम्बन्धनीयम् । अविद्यमानं जघन्यमिति - जघन्यत्वमस्यामित्यजघन्या तथा अविद्यमानमुत्कृष्टमित्युत्कृष्टत्वमस्यामित्यनुत्कृष्टा अजघन्या चासावनुत्कृष्टा चाजघन्यानुत्कृष्टा, मकारोऽलाक्षणिकः, महच तदायुः स्थित्याद्यपेक्षया विमानं च महाविमानं तच तत्सर्वे — निरवशेषा अर्थ्यमानत्वादर्था: --- अनुत्तरसुखादयो यस्मिंस्त (तथा तञ्च तत्सर्वार्थं च महाविमानसवर्थ तस्मिन् स्थितिरिति सर्वत्रायुः स्थितिरेव, काय स्थितित्वाभिधाने तत्रानन्तरमनुत्पत्तिरेवेत्यभिप्राय इति सप्तविंशतिसूत्रार्थः ॥
१ चमरवल्योः सागरोपममधिकं (च) शेषाणां
Education intemational
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जीवाजीव
विभक्ति०
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॥७०४ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२४४-२४६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२४४
*5*6*5*524
-२४६]]
RAKASARAMECE
अणतकालमुकोस, अंतोमुहुसं जहन्नयं । विजदंमि सए काए, देवाणं हुज अंतरं ॥ २४४ ॥
एएसि वन्नओ चेव, गंधओ रसफासभो । संठाणादेसओ वावि, विहाणाई सहस्ससो ॥२४॥ ४| अन्तरविधानाभिधायि च सूत्रद्वयं पूर्ववयाख्येयम् ॥ इत्थं जीवानजीवांच सविस्तरमुपदय निगमयितुमाह
संसारस्था प सिहाय, इइ जीवा वियाहिया । रूविणो चेवरूवी य, अजीवा दुविहावि य ॥२४॥ संसारस्थाश्च सिद्धाश्च 'इति' इत्येवंप्रकारा जीवाः 'व्याख्याताः' विशेषण-सकलभेदाभिव्यात्या प्रकथिताः, रूपिणथैव 'रूपी य'त्ति अकारप्रश्लेषादरूपिणश्चाजीवा द्विविधा अपि व्याख्याता इति योग इति सूत्रार्थः ॥ यदुक्तं जीवाजीवविभक्तिं शृणुतैकमनस' इति तत्र जीवाजीवविभक्तिमभिधाय 'शृणुतैकमनस' इति वचनात् कचि(कथित् श्रवणश्रद्धानमात्रेणैव कृतार्थतां मन्येतातस्तदाशङ्कापनोदार्थमाह
इइ जीवमजीवे य, सुचा सहहिऊण य । सवनयाण अणुमए, रमिज्जा संजमे मुणी ॥ २४७ ॥ RI 'इति' इत्येवंप्रकारान् 'जीवमजीवेय'त्ति जीवाजीवान् एतान्' अनन्तरोक्तान् 'श्रुत्वा' अवधार्य 'श्रद्धाय च तथेति
प्रतिपय सर्वे च ते नयाश्च सर्वनया-ज्ञानक्रियानयान्तर्गता नैगमादयस्तेषामनुमतः-अभिप्रेतस्तस्मिन् , कोऽर्थःज्ञानसहितसम्यश्चारित्ररूपे 'रमेत' रतिं कुर्यात्, क्व?-सम्यग्यमनं-पृथिव्यादिजीवोपमर्दतस्तृणपञ्चकाद्यजीवोपादानादेश्वोपरमणं संयमस्तस्मिन् 'मुनिः' उक्तरूप इति सूत्रार्थः ॥ संयमरतिकरणानन्तरं यद्विधेयं तदाह
दीप अनुक्रम [१७०९-१७११]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||२४८|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत सूत्रांक [२४८]
उत्तराध्य.
तओ याहणि वासाणि, सामन्नमणुपालिया। इमेण कमजोगेणं, अप्पाणं संलिहे मुणी ॥ २४८ ॥ जीवाजीव बृहद्वृत्तिः
'ततः' तदनन्तरं 'बहुनि' अनेकानि वर्षाणि 'श्रामण्यं श्रमणभावम् 'अनुपास्य' आसेव्य 'अनेन' अनन्तरमेव विभक्तिः
वक्ष्यमाणेन क्रमः-परिपाटी तेन योगः-तपोऽनुष्ठानरूपो व्यापारः क्रमयोगस्तेनात्मानं 'संलिखेत्' द्रव्यतो भाव[७०५॥ तश्च कृशीकुर्यान्मुनिः, इह च बहूनि वर्षाणि श्रामण्यमनुपाल्येत्यभिदधता न प्रत्रज्याप्रतिपत्त्यनन्तरमेवैतद्विधिरि
त्युपदर्शितम् , उक्तं हि-“परिपालितो य दीहो परियाओ वायणा तहा दिण्णा । णिफाइया य सीसा सेयं मे अप्पणो काउं॥१॥” इति सूत्रार्थः ।। सम्प्रति यदुक्तम्-'अनेन क्रमयोगेन संलिखेदिति, तत्र कोऽसौ क्रमयोगः १ इति प्रश्नसम्भये संलेखमाभेदाभिधानपूर्वकं तमाह| बारसेव उ वासाई, संलेहकोसिया भवे । संवच्छर मज्झिमिया, छम्मासा य जहनिया ॥ २४९ ॥ पढमेम वासचउमि विगई (वित्ति) निज्जहणं करे । बिइए वासच उकमि, विचित्तं तु तव चरे ॥ २५० ॥ एगंतर
मायाम, कट्ट संवच्छरे दुवे । तओ संवच्छरऽद्धं तु, नाइविगिटुं तवं चरे ॥२५१॥ तओ संवच्छरद्धं तु, G|विगिटुं तु तवं चरे। परिमियं चेव आयाम, तमि संवच्छरे करे ॥ २५२॥ कोडीसहियमायाम, कटु संबकछरे|
॥७०५॥ मुणी । मासद्धमासिएणं तु, आहारेणं तवं चरे ॥ २५३ ॥
१ परिपालितश्च दीर्घः पर्यायो वाचना प तथा दत्ता । निष्पादिताव शिष्याः यो मे आत्मनः कर्तुम् ॥ १॥
दीप अनुक्रम [१७१३]]
27-१
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२४९-२५३|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२४९-२५३]
बारसेत्यादि सूत्रपञ्चकम् । द्वादशैव न तु न्यूनान्यधिकानि वा 'तुः' पूरणे 'वाणि' संवत्सरान् संलेखन-द्रव्यतः शरीरस्य भावतः कपायाणां कृशताऽऽपादनं संलेखा, संलेखनेति योऽर्थः, 'उक्कोसिय'त्ति उत्कृष्टा सर्वगुर्वी भयेत्, 'संवच्छर'ति संवत्सरं-वर्ष मध्यमैव मध्यमिका, षण्मासान् 'चः' पुनरर्थे भिन्नक्रमस्ततो जघन्यैव जपन्थिका पुनः पठन्ति च-'उकोसिया' इत्यत्र 'उकोसतो'त्ति, अन्यत्र तु 'मज्झिमउत्ति जद्दण्णतो'त्ति । इत्थं संलेखनायाखैविध्ये उत्कृष्टायाः क्रमयोगमाह-'प्रथम' आये 'वर्षचतुष्के' संवत्सरचतुष्टये वर्त्तनं वृत्तिनिर्वहणमित्यर्थः प्रस्तावात्क्षी-४ रादिविकृतिस्तस्या निर्ग्रहणम्-आचामाम्लस्य निर्विकृतिकस्य वा तपसः करणेन परित्यागो वृत्तिनिर्ग्रहणमनु (णं तत्) कुर्यात् , पठ्यते च–'विगईनिज्जूहणं करे ति स्पष्टम् , इदं च विचित्रतपसः पारणके, यदाह निशीथचूर्णिकृत्-'अन्ने। ४ चत्वारि बरिसे विचित्तं तवं काउं आयंबिलेण पारेइ निविएण वा पारेइ"त्ति, केवलमनेन नियुक्तिकृता च द्वितीये।
वर्षचतुष्टये एतदुक्तम् , अत्र च सूत्रे प्रथम दृश्यत इत्युभयथापि करणे दोषाभावमनुमिमीमहे, तयोरस्य च प्रमाणभूतत्वात् , द्वितीय वर्षचतुष्के 'विचित्रं तु' इति विचित्रमेव चतुर्थषष्ठाटमादिरूपं तपश्चरेत् , अत्र च पारण के सम्प्र
दाय:--"उग्गम विसुद्धं सर्व कप्पणिज पारेति"त्ति । एकेन-चतुर्थलक्षणेन तपसाऽन्तर–व्यवधानं यस्मिंस्तदेकाद्वन्तरम् 'आयामम्' आचाम्लं 'कट्टत्ति कृत्वा संवत्सरी द्वौ, 'ततः' तदनन्तरं 'संवत्ससई मासपई 'तुः' पूरणे 'न'
१ अन्यानि चत्वारि वर्षाणि विचित्रं तपः कृत्वाऽऽचाम्लेन निर्विकृतिकेन वा पारयति २ उद्गमविशुद्ध सर्व कल्पनीयं पारयति
दीप अनुक्रम [१७१४-१७१८]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२४९
-२५३]
दीप
अनुक्रम [१७१४
-१७१८]
उत्तराध्य.
वृतिः ॥७०६ ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२४९ - २५३ ||
निर्युक्तिः [ ५५६...], भाष्यं [ १५...]
नैव 'अतिविकृष्टम्' अष्टमद्वादशादि तपः 'चरेत्' आसेवेत् । ततः 'संवत्सरार्द्ध' पुनः पण्मासलक्षणं 'विकृष्टम्' उक्तरूपं 'तुः' एवकारार्थी विकृष्टमेव तपश्धरेत्, अत्रैव विशेषमाह - 'परिमियं चेव'त्ति, 'चः' पूरणे ततः परिमितमेव, द्वादशे हि वर्षे कोटीसहितमायामम्, इह तु चतुर्थादिपारणक एवेत्येवमुक्तम्, आयाम - आचाम्लं तस्मिन्ननन्तरं द्विधा विभज्योपदर्शिते संवत्सरे कुर्यात्, पठन्ति च "परिमियं चेच आयामं, गुणुकस्सं मुणीचरे । तसो संवच्छरद्धऽण्णं, विगिद्धं तु तवं चरे ॥ १ ॥ इत्थमेकादशसु वर्षेष्वतिक्रान्तेषु द्वादशे वर्षे किमसौ विदध्यात् ? इत्याहकोट्यो - अग्रे प्रत्याख्यानाद्यन्तकोणरूपे सहिते - मिलिते यस्मिंस्तत्कोटीसहितं किमुक्तं भवति ? - विवक्षितदिने प्रातराचाम्लं प्रत्याख्याय तचाहोरात्रं प्रतिपाल्यं, पुनर्द्वितीयेऽह्नि आचाम्लमेव प्रत्याचष्टे, ततो द्वितीयस्यारम्भकोटिराद्यस्य तु पर्यन्तकोटिरुमे अपि मिलिते भवत इति तस्कोटीसहितमुच्यते, अन्ये त्वादुः- आचाम्लमेकस्मिन् | दिने कृत्वा द्वितीयदिने च तपोऽन्तरमनुष्ठाय पुनस्तृतीयदिन आचाम्लमेव कुर्वतः कोटीसहितमुच्यते, उभयार्थसंवादिनी चेयं गाथा - "पेटुवणओ य दिवसो पचक्खाणस्स गिट्ठवणओ य । जहियं समिति दुन्नि उ तं भष्णह कोडिसहियं तु ॥ १ ॥" इत्यमुक्तरूपं कोटीसहितमाचामाम्लं कृत्वा 'संवत्सरे' वर्षे प्रक्रमाद् द्वादशे 'मुनिः' साधुः 'मास' ति सूत्रत्वान्मासं भूतो मासिकस्तेनैवमार्द्धमासिकेन 'आहारेण'न्ति, उपलक्षणत्वादाहारत्यागेन, पाठान्तर९ प्रस्थापको दिवसः प्रत्याख्यानस्य निष्ठापका । यत्र समितः द्वौ तु तद्भण्यते कोटीसहितमेव ॥ १ ॥
Education intimation
For Patenty
जीवाजीव
विभक्ति० ३६
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॥७०६ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२४९-२५३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२४९-२५३]
Pातश्च क्षपणेन 'तपः' इति प्रस्तावाद्भक्तपरिज्ञानादिकमनशनं 'चरेत्' अनुतिष्ठेत् , निशीथचूर्णिसम्प्रदायश्चात्र-“अन्नेचि
दोवि वरिसे चउत्थं काउं आयंबिलेण पारेद, एक्कारसमे य बरिसे पढम छम्मासं अविगिट्ट तवं काउं कजिएण पारेइ, वितिए छम्मासे विगिटुं तवं काउं आयंबिलेण पारेइ, दुवालसमं बरिसं निरंतरं हीयमाणं उसिणोदएण आयंबिलं करेति, त कोडीसहियं भणंति जेणायंबिलस्स कोडी कोडीए मिलइ, जहा य दीवस्स बत्ती तेलं च समं । गिट्ठाइ तहा बारसमे वरिसे आहारं परिहावेइ जहा आहारसंलेखना आउयं च समं णि?वति, इत्थं वारसगस्स वासस्स पच्छिमा जे चत्तारि मासा तेसु तेलगडूसे णिसट्टे धरितु खेलमलगे णित्रुहइ मा अतिरुक्खत्तणओ मुहज
तविसंवाओ भविस्सइ, तस्स य विसंवादे णो संमं णमोकार साहेति" इति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ इत्थं प्रतिपन्ना18/नशनस्थाप्यशुभभावनानां मिथ्यादर्शनानुरागादीनां च परिहार्यतां तद्विपर्ययाणामासेव्यतां च ज्ञापयितुं यथाक्रमम-I नर्थहेतुतामर्थहेतुतां च दर्शयन्नाह
१ अन्ये अपि द्वे वर्षे चतुर्थ कृत्वाऽऽचामाग्लेन पारयति, एकादशे च वर्षे प्रथम षण्मासान् अविकृष्टं तपः कृत्वा काचिकेन पारयति, 18 द्वितीयेषु षट्सु मासेषु विकृष्टं तपः कृत्वाऽऽचामान्लेन पारयति, द्वादशे तु वर्षे निरन्तरं हीयमानमुष्णोदकेनाचामाम्लं करोति, तत्को-||
टीसहित भण्यते येनाचामाम्लस्य कोटी कोट्या मिलति, यथा च दीपस्य वर्ती तैलं च समं निस्तिष्ठतः तथा द्वादशे वर्षे आहार परिहापयति | यथाऽऽहारसंलेखना आयुश्च समं निस्तिष्ठतः, अत्र द्वादशस्य वर्षस्य पश्चिमा ये चत्वारोमासानेषु तैलगण्डूषान निसृष्टं (अतिशयेन) धृत्वा मेष्ममल्लके निक्षिपति, माऽतिरूक्षत्वात् मुखयत्राविसंवादो भूदिति, तस्य च विसंवादे न सम्यक् नमस्कारं साधयेत् (पठेन्)
दीप अनुक्रम [१७१४-१७१८]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२५४
-२५७]
दीप
अनुक्रम
[१७१९
-१७२२]
उत्तराध्य.
वृत्तिः
॥ ७०७ ॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२५४-२५७ || निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
कंदष्पमाभिभगं किञ्चिसि मोहमासुरतं च । एयाओ दुग्गईओ मरणंमि विराहया हुंति ॥ २५४ ॥ मिच्छादंसणरत्ता, सनियाणा हु हिंसगा । इय जे मरंति जीवा, तेसिं पुण दुलहा बोही ॥ २५५ ॥ सम्म हंसणरस्ता अनियाणा सुक्कलेसमोगाढा । इय जे मरंति जीवा सुलभा तेसि भवे वोही ॥ २५६ ॥ मिच्छा दंसणरत्ता सनियाणा कण्हलेसमोगाढा । इय जे मरंति जीवा तेसिं पुण दुल्लहा बोही ।। २५७ ।।
'कंदप्प'ति कन्दर्पभावना प्राग्वत्, पदेऽपि पदेकदेशस्य दर्शनात् एवमभियोग्यभावना किल्विषभावना मोहभावना 'आसुरतं च'त्ति आसुरत्वभावना च एताः कन्दर्पादिभावना दुर्गतिहेतुतया दुर्गतयो 'नडलोदकं पादरोग' इति न्यायात्, दुर्गतिश्चेहार्थादेवदुर्गतिः, तद्वशतो हि संव्यवहारतचारित्रसत्तायामप्येतद्विधनिकायोत्पत्तिरेव, चरविकलतायां तु नानागतिभाजनतैव, उक्तं हि "जो संजओवि एयासु अप्पसत्यासु भावणं कुणइ । सो तबिहेसु गच्छति सुरेस भइओ चरणहीणो ॥ १ ॥" कदा? इत्याह-'मरणे' मरणसमये कीदृश्यः सत्यः १ इत्याहविराधिकाः सम्यग्दर्शनादीनामिति गम्यते 'भवन्ति' जायन्ते, इह च मरण इत्यभिधानं पूर्वमेतत्सन्तायामप्युत्तरकालं शुभभावे सुगतेरपि सम्भवात् । मिथ्यादर्शनम् अतत्त्वे तत्त्वाभिनिवेशरूपं तस्मिन् रक्ताः- आसक्ता मिथ्यादर्शनरक्ताः, सम्यक्त्वादिविराधनायां क्षेतदासक्तिरेव भवति, सह निदानेन साभिष्वङ्गप्रार्थना रूपेण वर्त्तन्त इति सनिदानाः 'हुः' १ यः संयतोऽपि एताभिरप्रशस्तामिः भावनां करोति । स तद्विभेषु गच्छति सुरेषु भक्तधरणहीनः ॥ १ ॥
Education intimatio
Fürsten
जीवाजीव
विभक्ति० ३६
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॥७०७॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२५४-२५७|| नियुक्ति: [५५६...], भाष्यं [१५...]
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सूत्रांक
9
[२५४
-२५७]
पूरणे 'हिंसकाः' प्राण्युपमर्दकारिणः 'इति' इत्येवंरूपा ये नियन्ते' प्राणांस्त्यजन्ति जीवास्तेषां पुनर्दुर्लभा 'बोधिः'
प्रेत्य जिनधर्मावाप्तिः । सम्यग्दर्शनम्-उक्तस्वरूपं तस्मिन् रक्ताः सम्यग्दर्शनरताः अनिदानाः 'शुक्ललेश्याम्' उक्तलदक्षणाम् 'अवगाढाः' प्रविष्टा इति, ये नियन्ते जीवाः सुलभा तेषां भवेद्बोधिः । मिच्छासूत्र प्राग्वत् , ननु पुनरुक्त
वादनर्थकमिदं सूत्र, कृष्णलेश्यावगाहनमपि हिंसकत्वेन पञ्चाश्रवप्रमत्तत्वादितल्लक्षणाभिधानादर्थत उक्तमेवेति, अत्रोच्यते, नैवं, विशेषज्ञापनार्थत्वादस्य, उक्तं हि-"पुषभणियं तु पुच्छा जंभण्णति तत्थ कारणं वेति । पडिसहो य ४ अणुन्ना करण (हेउ) बिसेसोवलंभा वा ॥१॥" विशेषश्च सर्वत्र तथाविधसंक्लिष्टपरिणामरूपता द्रष्टव्या, अन्यथा हि
सामान्येनैतद्विशेषणविशिष्टानामपि तद्भवे भवान्तरे वा बोधिदर्शनाद्यभिचार्येदं भवेदिति । इह चायेन सूत्रेण कन्दर्प-14 भावनादीनां दुर्गतिरूपानर्थस्य निवन्धनत्वमुक्तमर्थाच्च तद्विपरीतभावनानां सुगतिखरूपार्थस्य द्वितीयेन मिथ्यादर्शनरक्तत्यादीनां दुर्लभवोधिलक्षणानर्थस्य तृतीयेन सम्यग्दर्शनरक्तत्वादीनां सुलभबोध्यात्मकार्थस्य चतुर्थेन उक्तनीया मिथ्यादर्शनरक्तत्वादीनामेव विशेषज्ञापनमिति सूत्रचतुष्टयार्थः ॥ अन्यच-जिनवचनाराधनामूलमेव सकलं संलेखनादि श्रेयोऽतस्तत्रैवाऽऽदरख्यापनायान्वयव्यतिरेकाभ्यां तन्माहात्म्यमाह| १ पूर्वभणितमपि यत्पश्चागण्यते तत्र कारणं ब्रुवति । प्रतिवेधश्चानुज्ञा कारणविशेषोपलम्भो वा ॥ १ ॥
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दीप अनुक्रम [१७१९-१७२२]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२५८
-२५९]
दीप
अनुक्रम
[१७२३
-१७२४]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥७०८॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२५८- २५९ || निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
जिणवणे अणुरत्ता जिणवयणं जे करेंति भावेणं । अमला असंकिलिङ्का ते हुति परित्तसंसारा || २५८ || बालमरणाणि बहुसो अकाममरणाणि चैव बहुयाणि । मरिहंति ते वराया जिणवयणं जे न याति २५९ for हाकृतस्तेषामुच्यत इति वचनम् - आगमो जिनवचनं तस्मिन् 'अनुरक्ताः' सततं प्रतिबद्धाः, तथा 'जिनवचनम्' इति वाच्यवाचकयोरमेदोपचाराज्जिनवचनाभिहितमनुष्ठानं ये 'कुर्वन्ति' अनुतिष्ठन्ति 'भावेन' आन्तरपरिणामेन न तु बहिर्वृत्यैव तत एवाविद्यमानो मल इति भावमलस्तदनुष्ठानमालिन्यहेतुर्मिथ्यात्वादिरेपामित्यमलाः, तथा 'असंक्लिष्टाः' रागादिसङ्क्लेशरहितास्ते भवन्ति' जायन्ते परितः समस्तदेवादिभवाल्पतापादनेन समन्तात्खण्डितः परिमित इतियावत् स चासौ संसारथ स विद्यते येषां तेऽमी परीतसंसारिणः कतिपयभवाभ्यन्तरमुक्तिभाज इति योऽर्थः सूत्रे च प्राकृतत्वाद्वचनव्यत्ययः । 'बालमरणैः' विषभक्षणोद्बन्धननिबन्धनैः 'बहुशः' अनेकधा 'अकाममरणानि' यान्यत्यन्तविषयगृभुत्वेनानिच्छतां भवन्ति तैश्थ, उभयत्र सुन्व्यत्ययः प्राग्वत्, 'एव चेति पूरणे 'बहूनि' अनेकानि मरिष्यन्ते ते 'बराकाः' बहुदुःखभाजनतयाऽनुकम्पनीयाः 'जिनवचनम् ' उक्तरूपं ये ' न जानन्ति' नावबुध्यन्ते ज्ञानफलत्वादनुष्ठानस्य न चानुतिष्ठन्तीति सूत्रद्वयार्थः ॥ यतश्चैवमतो जिनवचनं भावतः कर्त्तव्यं तद्भावकरणं चालोचनया, सा च न तच्छ्रवणान् विना, ते च न हेतुव्यतिरेकेणेति यैर्हेतुभिरमी भवन्ति तानाह
Ja Education infamational
For Parts Only
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जीवाजीव
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||२६०|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक [२६०]
बहु आगमविन्नाणा समाहिउप्पायगा य गुणगाही। एएण कारणेणं अरिहा आलोयणं सोउं ॥ २६०॥ बहुः-अङ्गोपाङ्गादिवहुभेदतया बर्थतया वा स चासावागमश्च-श्रुतं वागमतस्मिन् विशिष्टज्ञानम्-अवगम एपामिति बहागमविज्ञानाः 'समाहि'त्ति समाधेः-उक्तरूपस्योत्पादका-जनकाः, किमुक्तं भवति :-देशकाला-II १ शयादिविज्ञतया समाधिमेव मधुरगम्भीरभणितिप्रभृतिभिरालोचनादातॄणामुत्पादयन्ति, चशब्दो भिन्नक्रमस्ततः 'गुणग्गाहि यत्ति गुणग्राहिणश्च उपबृंहणार्थं परेषां सम्यग्दर्शनादिगुणग्रहणशीलाः 'एएण कारणेण'न्ति 'एतैः' अनन्तरमेव विशेषणतयोपात्तैर्बहागमविज्ञानत्वादिभिः 'कारण' हेतुभिः 'अर्हाः' योग्या भवन्त्याचार्यादय इति गम्यते 'आलोचना' विकटनामर्थात्परैर्दीयमानां 'श्रोतुम्' आकर्णयितुम्, एते बालोचनाश्रवणफलं परेषां विशुद्धिलक्षणं सम्पादयितुमीशते, व्यत्ययश्च सर्वत्र प्राग्वदिति सूत्रार्थः । इत्थमनशनस्थितेन यत्कृत्यं तत्सप्रसामुपदर्य A सम्प्रति कन्दर्पादिभावनानां यत्परिहार्यत्वमुक्तं तत्र यत्कुर्वता ता भवन्ति तत्परिहारेणैव तासां परिहारो न चाज्ञातसायमिति ज्ञापनार्थमाह४ी कंदप्पकोईया तहसीलसहावहासविगहाहिं । विम्हावितो य परं कंदप्पं भावणं करइ ॥ २६१ ॥ धिमंताजोगं काउं भूईकम्मं च जे पउंजंति । सायरसइतिहेउ अभिओगं भावणं कुणइ ॥२६२॥ नाणस्स केवलीणं kधम्मायरियस्स संघसारणं । माई अवन्नवाई किब्धिसियं भावणं कुणइ ॥ २६३ ॥ अणुबद्धरोसपसरो तह यk
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दीप अनुक्रम [१७२५]
CA
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२६१-२६५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२६१-२६५]
उत्तराध्य निमित्तंमि होइ पडिसेबी। एएहि कारणेहिं आसुरियं भावणं कुणइ ॥ २६४ ॥ सत्थरगहणं विसभक्षणं जीवाजीव
|च जलणं च जलपवेसो य । अनयारभंडसेवी जम्मणमरणाणि बंधति ॥ २६५॥ बृहद्वृत्तिः || 'कंदप्पकोकुईया' इति, कन्दर्पः-अट्टहासहसनम् अनिभृतालापाश्च गु/दिनाऽपि सह निष्ठरवक्रोक्त्यादिरूपाः
विभक्तिः ॥७०९॥ कामकथोपदेशप्रशंसाश्च कन्दर्पो, यत उक्तम्-"कहकहकहस्स हसणं कंदप्पो अणिहुया य संलावा । कंदप्पकहाक
हणं कंदप्पुवएससंसा य ॥१॥" कौकुव्यं द्विधा-कायकोच्यं वाकौकुच्यं च, तत्र कायकौकुच्यं यत्स्वयमह|सन्नेय भ्रूनयनवदनादि तथा करोति यथाऽन्यो हसति, उक्तञ्च-" मनयणदसनच्छएहिं करचरणकण्णमाईहिं । तं तं करेइ जह जह हसद परो अत्तणा अहसं ॥२॥" यत्तु तजल्पति येनान्यो हसति तथा नानाविधजीवविरुतानि मुखातोद्यवादितां च विधत्ते तद्वाकौकुच्यम् , उक्तं हि-"वायाए कुकुइओ तं जपइ जेण हस्सए अन्नो । णाणावि-14 हजीवरुए कुबइ मुहतूरए चेव ॥३॥" ततः कन्दर्पश्च कौकुच्यं च कन्दर्पकौकुच्ये कुर्वन्निति शेषः 'तहत्ति येन प्रकारेण परस्य विस्मय उपजायते तथा यच्छीलं च-फलनिरपेक्षा वृत्तिः स्वभावश्च-परविस्मयोत्पादनाभिसन्धिनैव ।
१ कहकहकहब हसनं कन्दोऽनिभृताचोल्लापाः । कन्दर्पकथाकथनं कन्दर्पोपदेशप्रशंसा च ॥ शासनयनदशनच्छदैः करचरणकर्णादिभिः । तत्तत्करोति यथा यथा हसति पर आत्मनाऽहसन् ॥ २ ॥ ३ वाचा कुकोचिकस्तज्जपति येन हसत्यन्यः । नानाविधजीवरुतान, करोति मुखतूर्याणि वा ॥३॥
दीप अनुक्रम [१७२६-१७३०]
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२६१-२६५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२६१
-२६५]
तत्तन्मुखविकारादिकं हसनं च-अट्टहासादि विकथाश्च-परविस्माषकविविधोल्लापरूपाः शीलखभावहसनविकथाताभिः 'विस्मापयन्' सविस्मयं कुर्वन् ‘परम्' अन्यं 'कंदप्पंति कन्दर्पयोगात्कन्दर्पास्ते च प्रस्तावाद्देवास्तेषामियमुक्तनीत्या तेषत्पत्तिनिमित्ततया कान्दी तां भाव्यते-आत्मसान्नीयतेऽनयाऽऽत्मेति भावना-तद्भावाभ्यासरूपा तां 'करोति' विधत्ते, एतदनुसारेणोत्तरत्रापि भावनीयम् । मन्त्राः-प्रागुक्तरूपास्तेषामायोगो-यापारणं मन्त्रायोगसं 'कृत्वा' विधाय, यदिवा 'मंतायोग'ति सूत्रत्वान्मत्राश्च योगाश्च-तथाविधद्रव्यसम्बन्धा मन्त्रयोग तत् 'कृत्वा' व्यापार्य 'भूत्या' भस्मनोपलक्षणत्वान्मृदा सूत्रेण वा कर्म-रक्षार्थ वसत्यादेः परिवेष्टनं भूतिकर्म, यथोक्तम्-"भूईए मट्टियाए व सुत्तेण व होइ भूइकम्मं तु । वसहीसरीरभंडगरक्ख"त्ति, चशब्दात्कौतुकादि च 'जे पउंजंति' प्राकृतत्याद्यः प्रयुक्त, किमर्थ ?, सात-सुखं रसा-माधुर्यादयः ऋद्धि:-उपकरणादिसम्पदेता हेतयो-निमित्तानि यस्मिंस्तत्सातरसर्द्धिहेतुः, कोऽभिप्रायः?-साताद्यर्थम् , 'अभियोग'ति आभियोगी भावनां करोति, इह च सातरसचिहेतोरित्यभिधानं निःस्पृहस्थापवादत एतत्प्रयोगे प्रत्युत गुण इति ख्यापनार्थम् , उक्तं हि-"एयाणि गारवट्ठा कुणमाणो आभियोगिय वंधे । बीयं गारवरहिओ कुवइ आराहगो चेव ॥२॥" 'ज्ञानस्य' श्रुतज्ञानादेः 'केवलिनां' केवलज्ञानवतां धर्मोपदेष्टा
१ भूत्या मृत्तिकया वा सूत्रेण वा भवति भूतिकर्म तु । वसतिशरीरभाण्डकरक्षेति । २ एतानि गौरवार्थ पूषन्नाभियोगिक पनाति । बीज (द्वितीये पदे) गौरवरहितः करोति आराधक एवं ॥२॥
दीप अनुक्रम [१७२६-१७३०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२६१-२६५|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक
[२६१-२६५]
उत्तराध्य.च-आचार्यस्तस्य च सङ्घः प्रतीतः साधवश्च सङ्घसाधवस्तेषामवर्णवादीति सम्बन्धः, तथाऽवर्णः-अश्लाघात्मकः,
स जीवाजीव चायं श्रुतज्ञानस्य-पुनः पुनस्त एव कायास्तान्येव ब्रतानि तावेय च प्रमादाप्रमादाविहाभिधेयी, मोक्षाधिकारिणांकित बृहद्वृत्तिः
च किं ज्योतियोनिपरिज्ञानेनेत्यादि भापते, उक्तश्च-"काया वया य ते चिय ते चेव पमाय अप्पमाया य । मोक्खा१७१०॥ हिगारियाणं जोइसजोणीहिं किं च पुणो? ॥१॥" केवलिनां च किमेषां ज्ञानदर्शनोपयोगी क्रमेण भवत उत युग-131
पत् !, यदि तावत्क्रमेण तदा ज्ञानकाले न दर्शनं दर्शनकाले च न ज्ञानमिति परस्परावरणतैव प्रासा, अथ युगपचत एककालत्वाद् द्वयोरप्यैक्यापत्तिः, उक्तञ्च-"ऐगतरसमुप्पाए अन्नोऽन्नावरणया दुवेण्हंपि । केवलदंसणणाणाणमेगकाले य एगतं ॥२॥" धर्माचार्यस्य जात्यादिभिरधिक्षेपणादि, उक्तश्च-"जैचाइहिं अवन्नं विहसइ वट्टइ णयावि उववाए । अहिजो छिद्दप्पेही पगासवादी अणणुकूलो ॥३॥" सङ्घस्य च बहवः श्वश्गालादिसङ्कास्तकोऽय|मिह सङ्घः १, साधूनां च-नामी परस्परमपि सहन्ते, तत एव देशान्तरयायिनः, अन्यथा त्वेकत्रैव संहत्या तिष्ठे
१ काया व्रतानि च तान्येव तावेव प्रमादाप्रमादौ च । मोक्षाधिकारिणां ज्योतियोनिभिः किं च पुनः॥१॥२ एकतरसमुत्पादे ||१७१०॥ है अन्योऽन्यावरणता द्वयोरपि । केवलदर्शनज्ञानयोरेककाले चैकत्वम् ।। २ ॥ ३ जात्यादिमिरवर्ण (करोति) उपहसति वर्तते न चाप्युपपाते ।
अहितश्छिद्रपेक्षी प्रकाशवाद्यननुकूलः ॥ ३ ॥
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दीप अनुक्रम [१७२६-१७३०]
ACCkAR
पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२६१-२६५|| नियुक्ति: [१५६...], भाष्यं [१५...]
प्रत
सूत्रांक [२६१
-२६५]
४ युरत्वरितगतयो-मन्दगतयस्ततो बकवृत्तिरियमेषामित्यादि, यथोक्तम्-"अविसहणाऽतुरियगती अणाणुवित्तीय
अपि गुरूणंपि । खणमित्तपीइरोसा गिहिवच्छलगा य संजयग ॥१॥"त्ति, एवंविधमवर्ण वदितुम्-अभिधातुं शीलमस्पेसवर्णवादी, माया-शाट्यमस्य वखभावविनिगृहनादिनाऽस्तीति मायी, यथोक्तम्-"गृहेड आयसहावं घायइ य गुणे परस्स संतेवि । चोरोष सघसंकी गूढायारो वितहभासि ॥२॥"त्ति किल्विपिकीभावनां करोति ।। इदानीं विचित्रत्वात्सूत्रकृतेर्मोहीप्रस्तावेऽपि यत्कुर्वताऽऽसुरी कृता भवति तदाह-अनुबद्धः-सन्ततः, कोऽर्थःअव्ययच्छिन्नो रोषस्य-क्रोधस्य प्रसरो-विस्तारोऽस्येति अनुबद्धरोपप्रसरः, सदा विरोधशीलतया पश्चादननुतापि-12
तया क्षमणादावपि प्रसत्यप्राप्त्या वेत्यभिप्रायः, तथा चोक्तम्-"णिचं योग्गहसीला काऊण ण याणुतप्पए पच्छा। &ण य खामिओ पसीयइ अपराहीणं दुवेण्डंपि ॥३॥" 'तथेति समुचये 'चः' पूरणे निमित्तमिह ज्ञेयपरिच्छित्तिकारणं, उतचातीतादित्रिविधकालभेदात्रिधा, उक्तं हि-"तिविहं होइ निमित्तं तीयपडुप्पण्णऽणागयं चेव । तेण विणा उ ण णेयं णजइ तेणं णिमित्तं तु ॥४॥" तद्विषये 'भवति' जायते 'प्रतिसेवी' इत्यवश्यंप्रतिसेवकोऽपुष्टालम्बनेऽपि
१ असहनारवरितगतयोऽनानुनृपयाचापि गुरूणामपि । क्षणमात्रप्रीतिरोषाः गृहिवत्सलाच संयताः ॥ १॥ २ गृहयत्यात्मस्वभाव घातयति च गुणान् परस्य सतोऽपि । चौर इव सर्वशङ्की गूढाचारो वितथभाषी ॥२॥ ३नियं व्युदहशीलाः कृत्वा न चानुतपति पश्चात् । न च क्षमितः प्रसीदति अपराधिना (उपरि) द्वयोरपि ।।३॥४त्रिविधं भवति निमित्तं अतीतप्रत्युत्पन्नानागतमेव । तेन विना तु न ज्ञेयं ज्ञायते तेन निमित्तं तु ॥४॥
5925
दीप अनुक्रम [१७२६-१७३०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम
(४३)
प्रत सूत्रांक
[२६१
-२६५]
दीप
अनुक्रम
[१७२६
-१७३०]
उत्तराध्य
वृहद्वृत्तिः
॥७११॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२६१ - २६५||
निर्युक्तिः [ ५५६...], भाष्यं [ १५...]
तदासेवनात् 'एताभ्याम्' अनन्तरोक्ताभ्याम् ' आसुरियं'ति आसुरी भावनां करोति । शस्यतेऽनेनेनि शखं खमक्षुरिकादि तस्य ग्रहणं खीकरणमुपलक्षणत्वादस्यात्मनि वधार्थं व्यापारणं शस्त्रग्रहणं, वेवेष्टि - व्याप्नोति झगित्यात्मानमिति विषं तालपुटादि तस्य भक्षणम्-अभ्यवहरणं विषभक्षणं, चशब्द उक्तसमुच्चयार्थः पर्यन्ते योक्ष्यते, 'ज्वलनं' दीपनमात्मन इति गम्यते, जले प्रवेशो- निमज्जनं जलप्रवेशः, चशब्दोऽनुक्तभृगुपातादिपरिग्रहार्थः, आचारः - शास्त्रविहितो व्यवहारस्तेन भाण्डम् उपकरणमाचारभाण्डं न तथाऽनाचारभाण्डं तस्य सेवा - हास्यमोहादिभिः परिभोगोऽनाचारभाण्डसेवा, गम्यमानत्वादेतानि कुर्वन्तो यतयः किमित्याह -- जन्ममरणान्युपचारात्तन्निमित्तकर्माणि 'वन्ति' | आत्मना लेपयन्ति, संक्लेशजनकत्वेन शस्त्रग्रहणादीनामनन्तभवहेतुत्वात् अनेन चोन्मार्गप्रतिपत्त्या मार्गविप्रतिपत्तिराक्षिप्ता, तथा चार्थतो मोही भावनोक्ता, यतस्तलक्षणम् - "उम्मग्गदेसओ मग्गनासओ मग्गविप्पडिवत्ती । मोहेण य मोहित्ता संमोहं भावणं कुणइ ॥ १ ॥ त्ति, ननु पूर्व तद्विधदेवगामित्वं भावनाफलमुक्तमिह त्वन्यदेवास्या इति न कथं विरोधः १, उच्यते, अनन्तरफलमाश्रित्य तदुदितमिदं [दमेव चूर्ण्य दृश्यते, तत्रैव जीवेत्यादि ] तु पर| म्पशफलं सर्वभावनानामिति भावनार्थमित्थमुपन्यासः, तथा चोक्तम्- “ऐयाओ भावणाओ भाविता देवदुग्गई १ उन्मार्गदेशको मार्गनाशको मार्गविप्रतिपत्तिः । मोहेन च मोहयित्वा संमोदी भावनां करोति ॥ १॥ २ एता भावना भावयित्वा देवदुर्गति
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जीवाजीव
विभक्ति०
~456~
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॥७११॥
पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२६१
-२६५]
दीप
अनुक्रम
[१७२६
-१७३०]
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[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि ” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [ ३६ ], मूलं [--] / गाथा ||२६१-२६५ || निर्युक्ति: [ ५५६...], भाष्यं [१५...]
जंतिं । ततो य चुया संता परिंति भवसागरमणंतं ॥ १ ॥” इति सूत्रपञ्चकार्थः ॥ इह च देववक्तव्यताऽनन्तरसूत्रकदम्वस्थाने सूत्रद्वयमेव चूपय दृश्यते, तत्रैकं "जीवमजीवे "त्यादि प्राग्वद् व्याख्यातमेव, तथा - "पसत्थसज्झागोवगए, कालं किच्चा ण संजए । सिद्धे वा सासए भवति, देवे वावि महहिए ॥ १ ॥ ति । सम्प्रत्युपसंहारद्वारेण शास्त्रमाहात्म्यं ख्यापयितुमाह
इति पाउकरे बुद्धे, नायए परिनिब्युए । छत्तीसं उत्तरज्झाए, भवसिद्धीयसंम ॥ २६६ ॥ तिमि ॥ ॥ जीवाजीव विभक्ती ॥ ३६ ॥ उत्तरज्झयणसुयक्संधो समन्तो ॥ 'इतिः' उपदर्शने 'इति' इत्यनन्तरमुपवर्णितान् 'पाउकरे' ति सूत्रत्वात् 'प्रादुष्कृत्य' कांश्चिदर्थतः कांश्चन सूत्रतोऽपि प्रकाश्य, कोऽर्थः ? – प्रज्ञाप्य, किमित्याह - 'परिनिर्वृतः' निर्वाणं गत इति सम्बन्धनीयम् कीदृशः सन् क इत्याह- 'बुद्ध:' केवलज्ञानादवगतसकलवस्तुतत्त्वः 'ज्ञातको ज्ञातजो वा-ज्ञातकुलसमुद्भवः, स चेह भगवान् वर्द्धमानखामी 'पत्रिंशद्' इति षट्त्रिंशत्सङ्ख्या उत्तराः - प्रधाना अधीयन्त इत्यध्याया - अध्ययनानि तत उत्तराश्च तेऽध्यायाश्चोत्तराध्यायास्तान् विनयश्रुतादीन् 'भवसिद्धियसंमए'ति भवसिद्धिका - भव्यास्तेषां समिति — भृशं मता -- अभिप्रेता भवसिद्धिकसंमतास्तान् पठन्ति च 'भवसिद्धीयसंवुडे' त्ति भवे - तस्मिन्नेव मनुष्यजन्मनि सिद्धि१ यान्ति । ततश्च च्युताः सन्तः पर्यदन्ति भवसागरभनन्तम् ॥ २ ॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र [४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
~ 457 ~
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________________
आगम
(४३)
प्रत
सूत्रांक
[२६६]
दीप
अनुक्रम
[१७३१]
उत्तराध्य.
बृहद्वृत्तिः
॥७१२॥
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि” - मूलसूत्र - ४ ( मूलं+निर्युक्तिः+वृत्तिः) मूलं [-] / गाथा || २६६ || निर्युक्ति: [५५७-५५८],
अध्ययनं [ ३६ ],
| रस्येति भवसिद्धिकः स चासौ संवृतश्वाश्रवनिरोधेन भवसिद्धिकसंवृतः ज्ञातविशेषणमेतत्, अथवा 'पाउकरे' ति 'प्रादुरकार्षीत्' प्रकाशितवान् शेषं पूर्ववत् नवरं 'परिनिर्वृतः क्रोधादिदहनोपशमतः समन्तात्स्वस्थीभूतः, एतेन “सत्यानृतत्व संदेहैः, सर्वमेव वचस्त्रिधा " इति प्रसिद्धेस्त्रैविध्यसम्भवेऽपि वचनरूपत्वेनोत्तराध्ययनानां वक्तृदोषहेतुकत्वादनृतत्व सन्देह योक्तृदोषाभावख्यापनेनैकान्तसत्यत्वलक्षणं माहात्म्यमाहेति सूत्रार्थः ॥ नियुक्तिकारोऽप्येत
न्माहात्म्यख्यापनायाह-
जे किर भवसिद्धीया परित्तसंसारिआ य भविआ य । ते किर पढंति धीरा, छत्तीसं उत्तरज्झयणे ॥ जे हुंति अभवसिद्धीया गंधिअसत्ता अनंतसंसारा । ते संकिलिट्टकम्मा अभविय उत्तरज्झाए ॥ ५५८ ॥
'ये' इत्यनिर्दिष्टनिर्देशे 'किल' इति सम्भावने 'भवसिद्धिकाः ' भव्याः परीतः प्राग्वत् परिमितः स चासौ संसारथ तद्वन्तः परीत्तसंसारिकाः 'जत इनिठना 'विति ( पा० ५-२-११५) मत्वर्थीयष्ठन् कोऽर्थः १ - तथाभव्यत्याक्षिप्तप्रत्यासन्नीभूतमुक्तयः 'भव्याः' सम्यग्दर्शनादिगुणयोग्या भिन्नग्रन्थय इति योऽर्थः उभयत्र 'चः' समुच्चये इति, व्यवच्छेदफलत्वाद्वा वाक्यस्य त एव, 'किल' इति परोक्षाप्तसूचकः, 'पठन्ति' अधीयते धीराः प्राग्वत्, कानि ? इत्याह- 'छत्तीसं 'ति पत्रिंशद् 'उत्तराध्ययनानि' विनयश्रुतादीनि भवसिद्धिकादीनामेतत्पाठफलस्य सम्यग्ज्ञानादेः
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जीवाजीव
विभक्ति०
३६
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॥७१२॥
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पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित.. आगमसूत्र [ ४३] मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:)
अध्ययनं [३६], मूलं [-] / गाथा ||२६६|| नियुक्ति: [५५९],
प्रत सूत्रांक [२६६]
*45* 5555
सद्भावेन निश्चयतस्तत्पाठसम्भवः, अन्येषां व्यवहारत एवेत्येवमभिधानम् ॥ उक्तमेवार्थ विनेयानुग्रहाय व्यतिरेकत आह-ये भवन्ति 'अभवसिद्धयः' अभव्याः प्राग्वद्वचनव्यत्ययः, प्रन्थिः-उक्तरूपस्तद्योगाद्वन्थयस्त एव प्रन्थिकास्ते |च ते सत्त्वाश्च प्रन्धिकसत्त्वाः, अभिन्नग्रन्थय इत्यर्थः, तथाऽनन्तः-अपर्यवसितः संसार एषामित्यनन्तसंसारा-ये
न कदाचिन्मुक्तिसुखमवाप्स्यन्ति अभव्याः "भवावि ते अणंते" त्यादिवचनतो भव्या वा ते संक्लिष्टानि-अशुभानि ६ कर्माणि-ज्ञानावरणीयादीनि एपामिति संक्लिष्टकर्माण इत्याह, 'अभविय'त्ति सूत्रत्वाद् अभव्याः' अयोग्याः 'उत्तर-८ | ज्झायति वचनव्यत्ययादुत्तराध्यायेषूत्तराध्यायविषयेऽध्ययन इति गम्यते, यद्वा 'उत्तर'त्ति प्राग्वत्पदैकदेशेऽपि पददर्शनादुत्तराध्ययनानि तेषामध्यायः-पाठ उत्तराध्यायस्तस्मिन् , तदनेन विशिष्टयोग्यतायामेव तात्त्विकैतदध्ययनस-16 दावलक्षणं माहात्म्यमुक्तमिति गाथाद्वयार्थः ॥ यतश्चैवमतिमाहात्म्यवन्त एवं उत्तराध्यायास्ततो यद्विधेयं तदाह| तम्हा जिणपन्नत्ते अणंतगमपज्जवेहि संजुत्ते । अज्झाएँ जहाजोगं गुरूपसाया अहिज्झिज्जा ॥५५१॥
॥ इति श्री उत्तराध्ययननियुक्तिः श्री भद्रबाहुस्वामिभिः कृता समासा ॥ तस्माजिन:-श्रुतजिनादिभिः प्ररूपिता:-प्रजसास्तान, अनन्ताश्च ते गमाच-अर्थपरिच्छित्तिप्रकाराः पर्यवाश्च-14 शब्दपर्यवार्थपर्यवरूपा अनन्तगमपर्यनास्तैः, समिति-सम्यग भृशं वा युक्ताः-संयुक्तास्तान् 'अध्यायान' प्रक्रमादु|त्तराध्यायान् 'जहाजोग'ति योग-उपधानादिरुचितव्यापारस्तदनतिक्रमेण यथायोग गुरूणां प्रसाद:-चित्तप्रसन्नता
दीप अनुक्रम [१७३१]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः )
अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||२६६|| नियुक्ति: [५५९),
जीवाजीव
उत्तराध्य.
गुरुप्रसादस्तस्माद्धेतोः 'अधीयेत्' पठेत् , न त्वेतदध्ययनयोग्यतावाप्तौ प्रमादं कुर्यादिति भावः, गुरुप्रसादादिति चामि
धानमध्ययनार्थिनाऽवश्यं गुरवः प्रसादनीयाः तदधीनत्वात्तस्येति ख्यापनार्थमिति गाथार्थः । 'इति' परिसमाप्तौ, बृहद्वृत्तिः
ब्रवीमीति पूर्ववत् । उक्तोऽनुगमः, सम्प्रति नयाः, तेऽपि प्राग्वदेव ॥ इत्युत्तराध्ययनश्रुतस्कन्धटीकायां श्रीशान्त्या॥७१३॥
दाचार्यविरचितायां शिष्यहितायां जीवाजीवविभक्तिनामक पत्रिंशमध्ययनं समासमिति ॥ ३६ ॥
विभक्ति
३६
प्रत सूत्रांक [२६६]
॥ इति श्रीउत्तराध्ययनसूत्रं श्रीशान्त्याचार्यायशिष्यहिताख्यव्याख्योपेतं समाप्तम् ॥
दीप अनुक्रम [१७३१]
SACRECE
|॥७१३॥
JABERatinintamational
in
the s
ection
अध्ययनं- ३६ परिसमाप्तं
Fil पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३) मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्तिः [भाग-३७] 'उत्तराध्ययनानि'-मूलसूत्र [४/१] मूलं एवं शान्त्याचार्यजी रचिता टीका परिसमाप्ता:
मूल संशोधकः सम्पादकश्च पूज्य आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब किंचित् वैशिष्ट्य समर्पितेन सह पुन: संकलनकर्ता मुनि दीपरत्नसागरजी M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि]
भाग 37
~460
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भाग
01
02
03
04
05
06
07
08
09
10
सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा?
इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम
आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति भाग - १ श्रुतस्क्न्ध-१, अध्ययन- १,२
आगम ०१ आचार मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग - १ | आगम ०२ सूत्रकृत मूलं एवं वृत्ति, भाग-२ आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, भाग-१
भाग-२
| आगम ०३ स्थान मूलं एवं वृत्ति, | आगम ०४ समवाय मूलं एवं वृत्ति.
| आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति,
| आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति,
श्रुतस्कन्ध-१, अध्ययन- ३ से ९, श्रुतस्कन्ध- २ श्रुतस्कन्ध-१, अध्ययन- १ से १३
श्रुतस्कन्ध- १, अध्ययन १४ से १६, श्रुतस्कन्ध-२ स्थान- १ से ४
स्थान- ५ से १० संपूर्ण
भाग-१ शतक- १ से ६
भाग-२ शतक- ७ से ११
| आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति,
| आगम ०५ भगवती मूलं एवं वृत्ति,
आगम ०६ ज्ञाताधर्मकथा मूलं एवं वृत्ति.
आगम-७,८,९,१० उपासकदशा, अंतकृतदशा, अनुत्तरोपपातिकदशा, प्रश्नव्याकरण मूलं एवं वृत्ति.
भाग-३ शतक- १२ से २०
भाग-४ शतक - २१ से ४१ संपूर्ण
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| आगम १४ जीवाजीवाभिगम भाग - २ मूलं एवं वृत्ति. [ प्रतिपत्ति-३ - अतर्गत ] सूत्र - १३९ से प्रतिपत्ती - १० संपूर्ण
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आगम १५ प्रज्ञापना भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. पद- १ से ५
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आगम १५ प्रज्ञापना भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. पद- ६ से २२
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आगम १५ प्रज्ञापना भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. पद- २३ से ३६ पूर्ण
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| आगम १६ सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति.
आगम-११, १२, विपाक, उववाई मूलं एवं वृत्ति.
| आगम १३ राजप्रश्नीय मूलं एवं वृत्ति.
आगम १४ जीवाजीवाभिगम भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. [ प्रतिपत्ति ३ अतर्गत सूत्र- १ से १३८
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कुलपृष्ठ
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कुलपृष्ठ ६१४
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३४४
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सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि भाग १ से ४० में कहां क्या मिलेगा? भाग
इस भागमे समाविष्ट आगम के नाम और आगम-क्रम आगम १७ चन्द्रप्रज्ञप्ति मूलं एवं वृत्ति. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-१ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- १ एवं २. | आगमा८ जंबूदविपप्रज्ञप्ति भाग-२ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ३ एवं ४. आगम१८ जंबूद्विपप्रज्ञप्ति भाग-३ मूलं एवं वृत्ति. वक्षस्कार- ५ से ७. आगम १९-३२ निरयावलिका, कल्पवतंसिका, पुष्पिका, पृष्पचूलिका, वृष्णिदशा, चतुःशरण, आतुरपरत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान,
___ भक्तपरिज्ञा, तंदलवैचारिक, संस्तारक, गच्छाचार, गणिविदया, देवेन्द्रस्तव मलं एवं छाया आगम ३३ थी ३९ मरणसमाधि मूलं एवं छाया, निशीथ, बुहत्कल्प, व्यवहार, दशाश्रुतस्कंध, जीतकल्प/पंचकल्प, महानिशीथ मूलं एव 28 आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, नियुक्ति-१ से ५२१ 29 आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-२, नियुक्ति- ५२२ से ९५१
आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-३ नियुक्ति- ९५२ से १२७३ अपूर्ण, [अध्ययन- १ से ४ अपूर्ण] आगम ४० आवश्यक मूलं एवं वृत्ति, भाग-५ नियुक्ति- १२७३ अपूर्ण से १६२३, [अध्ययन-४ अपूर्ण से ६ संपूर्ण) | आगम ४१/१ ओघनियुक्ति मूल एवं वृत्ति.
आगम ४१/२ पिंडनियुक्ति मूलं एवं वृत्ति. | आगम ४२ दशवैकालिक मूलं एवं वृत्ति. 35 आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-१, अध्ययन- १ से ५ 36 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूल एवं वृत्ति, भाग-२, अध्ययन- ६ से २१ 37 | आगम ४३ उत्तराध्यन मूलं एवं वृत्ति, भाग-३, अध्ययन- २२ से ३६
| आगम ४४ नन्दिसूत्र मूलं एवं वृत्ति. 39 | | आगम ४५ अनुयोगद्वार मूलं एवं वृत्ति. 40 | कल्प[बारसा]सूत्र... चतुःशरण, तन्दुलवैचारिक, गच्छाचार मूलं एवं वृत्ति.
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ਸਹਾਸ ਭਾਗ ਨੂੰ ਹੁਸ 40 ਸ
ਸ
ਸ
ਸ
ਸ .
ਨੂੰ
ਡਾਗਸ ਰਸ ਕਰੂ ਨੂੰ
ਮਹਿਸ ਸ਼ ਸੂਰਤ
ਸ਼
ਹਾਲ ਵਾਸ ਕਰ ਕਰ
ਤਸਵੀਰ ਦੇ ਤਸ਼ , ਤਕ ਬਰਨ ਕਰ
-
.
आगम
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नमो नमो निम्मलदसणस्स
सवृत्तिक-आगम-सुत्ताणि मूल संशोधक
मूल संशोधक
अभिनव संकलनकर्ता
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पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराज
आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि]
प्रत-प्राप्ति और पेज-सेटिंग कर्ता : के चेरमन श्री प्रवीणभाई शाह, अमेरिका
मुद्रक : नवप्रभात प्रिन्टींग प्रेस अमदावाद Mo 9825598855/9825306275
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ईस प्रोजेक्ट के संपूर्ण-अनुदान-दाता
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श्री आगम मंदिर
पालिताणा
HOSHOTEO
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________________ आ आजमा मूल संशोधक मूल सशाधकथाजामा - पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य आ श्री आनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजसाहेब आम आजम आगम आगम् आजम आगम आज आगम 43 "उत्तराध्ययनानि” मूलं एवं वृत्ति: [3] लनकतोसार आगम आगर अभिनव-संकलनकर्ता आगम दिवाकर मुनिश्री दीपरत्नसागरजी _ [M.Com., M.Ed., Ph.D., श्रुतमहर्षि] आजम आगम आणम् आगम आजम आजम ~4660