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आगम (४३)
[भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३६], मूलं [-1 / गाथा ||१५-४६|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...]
विभक्तिः
प्रत सूत्रांक [१५-४६]
उत्तराध्य. विवक्षितक्षेत्रावस्थितेः प्रच्युतानां पुनस्तत्मासेर्व्यवधानमेतद्-उक्तरूपं व्याख्यातं, तेषा हि विवक्षितक्षेत्रावस्थिति- जीवाजीव बृहद्वृत्तिः
प्रच्युतानां कदाचित्समयावलिकादिसङ्ख्यातकालतोऽसंख्यातकालाद्वा पल्योपमादेर्यावदनन्तकालादपि सम्भवतीति
सूत्रत्रयार्थः ॥ एतानेद भावतो विधातुमाह॥६७५||
बन्नओ गंधओचेच, रसओ फासओ तहा। संठाणओ य विनेओ, परिणामो तेसि पंचहा ॥१५॥ वनओ परिणया जे उ, पंचहा ते पकित्तिया। किण्हा नीला य लोहिया, हालिद्दा सुकिला तहा ॥१६॥ गंधओ दीपरिणया जे य, दुविहा ते वियाहिया। सुन्भिगंधपरिणामा, इम्भिगंधा तहेव य ॥१७॥ रसओ परिणया|
जे उ, पंचहा ते पकित्तिया । नित्त कडुयकसाया, अंबिला महुरा तहा ॥१८॥ फासओ परिणया जे उ,
अट्टहा ते पकित्तिया । कक्खडा मउया चेव, गुरुया लहया तहा ॥१९॥ सीया उपहा य निद्धा य, तहा। द लुक्खा य आहिया । इति फासपरिणया एए, पुग्गला समुदाहिया ॥२०॥ संठाणपरिणया जे उ, पंचहा से पकित्तिया । परिमंडला य वहा य, तंसा च उरंसमायया ॥ २१॥ वपणओ जे भवे किण्हे, भइए से उ|
॥६७५॥ १|| गंधओ। रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य॥२२॥ वपणओ जे भवे नीले, भइए से उ गंधओ। है रसओ फासओचेच, भइए संठाणओवि य॥२३॥ वष्णओ लोहिए जे उ, भइए से उ गंधओ । रसओX साफासओ चेव, भइए संठाणओथि य॥ २४ ॥ वपणओ पीअए जे उ, भइए से उगंधओ। रसओ फासओ
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दीप अनुक्रम [१४७९-१५१०]
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पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति:
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