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________________ आगम (४३) [भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [३२], मूलं [-] / गाथा ||१०-२०|| नियुक्ति : [५२६...] प्रत सूत्रांक [१० -२०] रसा पगामं न हु सेवियब्वा, पायं रसा दितिकरा नराणं । दित्तं च कामा समभिवंति, दुर्म जहा साउफलं व पक्खी ॥१०॥ जहा दवग्गी परिंधणे वणे, समारुओ नोवसमं वेइ । एर्विदियग्गीवि पगामभोइणो, न बंभयारिस्स हियाय कस्सई ॥ ११ ॥ विवित्तसिज्जासणजंतियाणं, ओमासणाणं दमिइंदियाणं । न रागसत्तू धरिसेइ चित्तं, पराइओ वाहिरिवोसहेहि ॥ १२ ॥ जहा बिरालावसहस्स मूले, न मूसगाणं वसही पसत्था । एमेव इत्थीनिलयस्स मज्झे, न बंभयारिस्स खमो निवासो ॥ १३॥ न रूबलावण्णविलासहासं, न जंपियं इंगिय पेहियं वा । इस्थीण चित्तंसि निवेसइत्ता, दडे ववस्से समणे तवस्सी ॥१४॥ अदसणं चेच अपत्थणं च, अचिंतणं चेव अकित्सणं च । इत्थीजणस्सारियझाणजुग्गं, हियं सया बंभवए रयाणं ॥ १५ ॥ कामं तु देवीहिं विभूसियाई, न चाइया खोभइ तिगुत्ता । तहावि एगंतहियंति नथा, विविसवासो मुणिणं पसत्थो॥१३॥ मुक्खाभिकंखिस्सवि माणवस्स, संसारभीरुस्स ठिपस्स धम्मे । नेयारिस दुसरमस्थि लोए,जहत्थिओ बालमणोहराओ॥१७॥ एए य संगा समइक्कमित्ता, सुहत्तरा चेव हवंति सेसा।जहा महासागरमुत्तरित्ता, नई भषे अवि गंगासमाणा ॥१८॥ कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं, सब्वस्स लोगस्स सदेवगस्स। काइयं माणसियं च किंचि, तस्संतयं गच्छइ वीयरागो॥१९॥ जहा य किंपागफला मणोरमा, रसेण बनेण य भुजमाणा। ते खाए जीविय पच्चमाणा, एओवमा कामगुणा विधागे ॥२०॥ दीप अनुक्रम [१२५६-१२६६] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~283
SR No.035037
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 37 Uttaradhyayan Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages466
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size96 MB
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