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________________ आगम (४३) [भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि"- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः) अध्ययनं [३५], मूलं [-] / गाथा ||२-२१|| नियुक्ति: [५४८...] प्रत सूत्रांक [२-२१] गिहवासं परिचज्जा, पव्यज्जामस्सिए मुणी । इमे संगे वियाणिज्जा, जेहि सज्जंति माणवा ॥२॥ तहेव हिंसं अलियं, चोज्नं अव्यंमसेवणं । इच्छाकामं च लोभं च, संजओ परिवजए ॥शामणोहरं चित्सघरं, मल्लधूवणवा-13 सियं । सकवार्ड पंडालोपं, मणसावि न पत्थए ॥४॥ इंदियाणि उ भिक्खुस्स, तारिसंमि उवस्सए । दुफ-1 टू राहं तु धारे] निवारेज, कामरागविवद्हणे ॥५॥ सुसाणे सन्नगारे वा, कक्खमले व इकओ। पहरिके परक-13 डेवा, चासं तत्धऽभिरोयए ॥६॥ फासुपंमि अणाबाहे. इत्थीहिं अणभिए । तस्थ संकप्पए वासं, भिक्खू परमसंजए ॥७॥न सर्य गिहाई कुग्विजा, नेव अन्नेहिं कारप। मिहकम्मसमारंभे, भूयाणं दिस्सए l वहो ॥८॥ तसाणं धावराणं च, सुहुमाणं बायराण य । तम्हा गिहसमारंभ, संजओ परिवज्जए ॥९॥ तहेव भत्तपाणेसु, पयणे पयावणेसु य । पाणभूयदयट्ठाए, न पए ण पयावए ॥ १०॥ जलधन्ननिस्सिया जीवा, पुढवीकट्ठनिस्सिया । हम्मति भत्तपाणेसु, तम्हा भिक्खू न पयाषए ॥ ११ ॥ विसप्पे सध्यओ धारे, बहुपाणविणासणे । नत्थि जोइसमे सत्थे, तम्हा जोई न दीवए ॥ १२॥ हिरणं च जायसवं च, मणसावि न पत्थए । समलिड्छुकंचणे भिक्खू, विरए कयविक्कए ॥ १३ ॥ किणतो कहओ होइ, विक्षिणतो अ वाणिओ। कयविक्षयंमि वट्टतो, भिक्खू हवइ तारिसो॥१४॥ भिक्खियब्वं न केयब्वं, भिक्खुणा भिक्खवित्तिणा । कयविको महादोसो, भिक्खावित्ती सुहावहा ॥१५॥ समुयाणं उछमेसिज्जा, जहासुत्तमणिदिय । लाभालाभंमि) ट संतुढे, पिंडवार्य चरे मुणी ॥ १६ ॥ अलोलो न रसे गिडो, जिम्भादंतो अमुच्छिओ । न रसवाए अॅजिजा, दीप अनुक्रम [१४४५-१४६४] ainatorary.om पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~361
SR No.035037
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 37 Uttaradhyayan Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages466
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size96 MB
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