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________________ आगम (४३) [भाग-३७] “उत्तराध्ययनानि”- मूलसूत्र-४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) अध्ययनं [३६], मूलं [--1 / गाथा ||२१५-२४३|| नियुक्ति : [५५६...], भाष्यं [१५...] प्रत सूत्रांक [२१५ -२४३] उत्तराध्य. तु, उकोसेण वियाहियं । वंतराणं जहमेणं, दसवाससहस्सिया ॥ २१८ ॥ पलिओवममेगं तु, या-14जीवाजीव बृद्धृत्तिः सलक्खेण साहियं । पलिओवमहभागो, जोइसेसु जहनिया ॥ २१९ ।। दो चेव सागराई, उक्कोसेणं वियाहिया । सोहम्मंमि जहन्नेणं, एगं च पलिओवर्म ॥२२०॥ सागरा साहिया दुन्नि, उक्कोसेण वियाहिया। ईसा विभकि. ॥७०॥ मि जहनेणं, साहियं पलिओवमं ॥ २११ ।। सागराणि य सत्तेव, उफोसेण ठिई भवे । सर्णकुमारे जहनेणं, ३६ दुन्नि ऊ सागरोवमा ॥ २२२ ।। सागरा साहिया सत्त, उक्कोसेण वियाहिया । माहिदमि जहमेणं, साहिया दुन्नि सागरा ॥ २२३ ॥ दस चेच सागराई, उक्कोसेण वियाहिया । बंभलोए जहनेणं, सत्त उ सागरोवमा ॥ २२४ ।। चजहस उ सागराइं, उक्कोसेण वियाहिया । लंतगंमि जहनेणं, दस उ सागरोवमा ॥ २२५ ॥ 8 सत्तरस सागराई, उक्कोसेण वियाहिया । महामुक्के जहन्नेणं, चउरस सागरोवमा ॥ २२६ ॥ अट्ठारससागराई, उफोसेण वियाहिया । सहस्सारे जहन्नेण, सत्तरससागरोवमा ॥ २२७ ॥ सागरा अउणवीसं तु, को-18 सेण ठिई भवे । आणयंमि जहन्नेणं, अट्ठारस सागरोवमा ॥२२८॥ वीसंतु सागराइंतु, उक्कोसेण ठिई भवे ।। पाणयंमि जहनेणं, सागरा अउणवीसई ॥२२९ ॥ सागरा इकवीसंतु, उक्कोसेण ठिई भवे । आरणमि | जहन्नेणं, वीसई सागरोवमा ॥२३०॥ बावीससागराई, उकोसेण ठिई भवे । अयंमि जहनेणं, सागरा| ७०३॥ इकवीसई ॥ २३१ ॥ तेवीससागराई, उकोसेण ठिई भवे । पढमंमि जहनेणं, बावीसं सागरोवमा ॥ २३२॥ चिउवीससागराई, उफोसेण ठिई भवे । विइयंमि जहनेणं, तेवीसं सागरोवमा ॥ २३३ ॥पणवीससागरा क, दीप अनुक्रम [१६८०-१७०८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र[४३), मूलसूत्र[४] उत्तराध्ययनानि मूलं एवं शान्तिसूरिविरचिता वृत्ति: ~440
SR No.035037
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 37 Uttaradhyayan Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages466
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size96 MB
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