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श्री गणेशप्रसाद वर्णी ग्रन्थमाला-२१
श्रीमदमृतचन्दसूरिकृत
तत्त्वार्थसार
सम्पादक राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त, अनेक ग्रन्थोंके संशोधक, सम्पादकएवं टीकाकार
... पण्डित पन्नालाल साहित्याचार्य साहित्याध्यापक, श्री गणेश वि० जैन महाविद्यालय, सागर
श्री गणेशप्रसाद वर्णी ग्रन्थमाला
डुमरावबाग, अस्सी, वाराणसी-५
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प्रकाशकीय सात माह पूर्व सितम्बर १९६९ में 'समयसार-प्रनयन'का और दिसम्बर १९६९ में मेरी जीवनगाथा प्रथम भाग ले सुर्य संस्करगामी नागोकाप्रसाद मर्गी गन्यमाला तारा प्रकाशन हुआ था। आज महावीर-जयन्तीके पुण्यावसरपर 'सस्वायंसार' प्रकट हो रहा है, यह अत्यन्त हर्ष की बात है। ___मूल 'तत्त्वार्थसार' उन्हीं आचार्य अमृतपन्द्रको कृति है जिन्होंने आचार्य कुन्दकुन्दके समयसार, प्रचनसार और पंचास्तिकाय इन ग्रन्धोंपर मार्मिक टीकाएं लिखी हैं तथा 'पुरुपार्थसिद्धधुपाय' जैसा महनीय स्वतंत्र सैद्धान्तिक अनमोल ग्रन्थ रचकर जैन वाङ्मयको समुद्ध बनाया है।
श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्यने प्रस्तुत 'तरवार्थसार' पर अपना मूलानुगामी हिन्दी-रूपान्तर लिखा है । 'तत्त्वार्थसार' स्वयं ही बहुत सरल रचना है । साहित्याचार्यजोने सुबोध हिन्दी रूपान्तर द्वारा उसे और अधिक सरल बना दिया है।
निस्सन्देह इसमें तस्वार्थ-सम्बन्धी सभी विषम सुगमतासे प्रतिपादित हैं। यह स्वाध्यायिओं के लिए ही उपयोगी नहीं है, अपितु जैन तत्त्व-जिज्ञासु जनेतर विद्वानों और छात्रों के लिए भी अतीव लाभप्रद है। कालेजों, विद्यालयों और पाठशालाओंके पाठ्यक्रम में इसका सहायक अन्धके रूपमें अपवा स्वतंत्र रूपमें समावेश किया जा सकता है। ____ आवरणीय अ. राजारामजी भोपाल वाङ्मयके प्रचार और प्रसारके लिए सदा उधत रहते हैं। उनका वाङ्मयानुराग निश्चय ही स्तुत्य है। आपने इस ग्रन्थ के प्रकाशनमें १०००) की सहायता भिजायी है। इतना ही नहीं, कितने ही महानुभावोंको प्रेरित करके ग्रन्थमालाका संरक्षक-सदस्य भी बनाया है और स्वयं बने है। इस अवसरपर हम उनका आदर पूर्वक आभार प्रकट करते हैं।
श्रीमान् पं० कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्री वाराणसोके भी आभारी है जिन्होंने प्राक-कथन लिखनेकी कृपा की है। साहित्याचार्यजी को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रह (सकते। उनके द्वारा सम्पादित अनुवादित यह चौथा अन्य ग्रन्थमालासे प्रकाशम था रहा है। इससे पूर्व 'मेरी जीवन-गाथा' ( दोनों भाग ) और 'समयसार-प्रवचन' उनके द्वारा सम्पादित होकर प्रत्यमालासे प्रकाशित हो चुके है।
अपने समस्त संरक्षक-सदस्योंको भी धन्यवाद है जिनके आर्थिक एवं नैतिक सहयोगमनपर अन्यमाला निरन्तर प्रगति के पथपर आरुद्ध है। ___ महावीर प्रेसके संचालक श्री बाबूलालजी फागुल्ल और उनका परिकर भी ग्रन्थको सुन्दर और आकर्षक छपाईके लिए धन्यवाघाह है। डा. नेमिचन्द्र शास्त्री
डा० दरबारोलाल कोठिया संयुक्त मंत्री
मंत्री चैत्रशुक्ला १३, वि० सं० २०२५
वी. नि. २४९६ १९ अप्रैल, १९५०
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प्राक्कथन
दिगम्बर जैन परम्परामें आचार्य कुन्दकुन्दका स्थान सर्वोपरि है। उनके पश्चात् तत्वार्थ सूत्रकार आचार्य उमास्वामीका स्थान है । ये दोनों आचार्य जिनशासनके महान प्रभावक आचार्य थे। इनमेंसे प्रथमने समयसार, प्रवचनसार और पश्चास्तिकाय जैसे ग्रन्थोंकी रचना करके द्रव्यानुयोगरूपी दीपकको प्रज्वलित किया तो दूसरेने तत्त्वार्थमुत्रकी रचना करके 'गागरमें सागर की कहावत को चरितार्थ किया। जिनशासन में छः द्रव्य, पांच अस्तिकाय, खाद्य तत्व और नौ पदार्थ प्रसिद्ध है। उक्त दोनों आचार्यनेि इन्हींका विवेचन उक्त ग्रन्थों में किया है। यद्यपि छ द्रव्योंमें पाँच अस्तिकाय और नौ पदार्थोंमें सात तस्य गति है फिर भी उनको रोका जो विशिष्ट कारण है वही ज्ञातव्य है | आचार्य कुन्दकुन्दने पचास्तिकाय में प्रायः सभोका विवेचन किया है किन्तु समयसारमें तो पदार्थोंका ही विवेचन किया है और उमास्वामीने तत्त्वार्थसूत्र के अध्यायोंमें सात तस्योंका विवेचन किया है। उन्होंने पुण्य और पापका अन्तर्भाव यासत्र और बन्धमें करके उन्हीं के अन्तर्गत उनका विवेचन किया है। किन्तु इन दोनों विवेचनोंमें जो अन्तर है वह उल्लेखनीय है । वह अन्तर सैद्धान्तिक नहीं है किन्तु एकमें सिद्धान्त शरीरका दियेन है तो दूसरे में उसकी आत्माका । यद्यपि शरीर और आत्मा भिन्न-भिन्न है और उनमें से पहला हेय है और दूसरा उपादेय हैं। फिर भी जब तक संसार है तब तक शरीर के बिना आत्मा रहता नहीं है इसलिए शरीरको हेय माननेवाले आत्माधियों को भी शरीरको चिन्ता करना हो पड़ती है उसके विना आत्माका काम नहीं चलता । इसे ही सिद्धान्तकी आत्मा भी शरीरके बिना नहीं रहती, अतः उसकी मात्मा के अधियोंको वह शरीर भी अपेक्षणीय हो जाता है । भले ही मन्त में वह छूटनेवाला हो । समयसारका विवेचन सिद्धान्तको आत्माका विवेचन है और तस्वार्थ सूत्रका विवेचन उसके कलेवरका विवेचन है । जीवको गतियां, इन्द्रियों काय, योग आदि जीव नहीं हैं, यह बोध हमें समयसारसे प्राप्त होता है किन्तु संसारी जीव इनके साथ ऐसा हिल-मिल गया है कि उनके बिना हम उसे जान नहीं सकते, अतः उनके द्वारा संसारी जीवको विविध दशाओंका ज्ञान हमें तत्त्वार्थ सूत्र से होता है अतः मुमुक्षुके लिए दोनोंकी उपयोगिता निर्बाध है । इसीसे आचार्य कुन्दकुन्दके व्याख्याकार और उन्हें विस्मृतिके गर्भ से निकालकर प्रकाश में लानेवाले प्रवल किन्तु सन्तुलित आध्यात्मिक आचार्य अमृतचन्द्रने उमास्वाति तत्वार्थसूत्रको श्लोकबद्ध करके उसे लत्वार्थसार नाम दिया और इस तरह उसे समादुत किया । समयसारके रहस्यज्ञ होनेपर भी उन्होंने वत्त्वार्थसूत्रको उपेक्षणीय नहीं माना। यही उनकी रहस्मशताका प्रबल प्रमाण हूँ ।
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प्राक्कथन
आचार्य अमृतचन्द्रका वैशिष्ट्य ___जहां तक आचार्य कुन्दकुन्दके ग्रन्थों को व्याख्याका प्रश्न है, हमें तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुन्दकुन्दने ही अमृतचन्द्र के रूपमें पुनर्जन्म धारण किया था। समयसारको उनकी टौका सचमुच में उसपर कलशारोहण है। अध्यात्मका बीज कुन्दकुन्दनै बोया किन्तु उसे अंकुरित, पुष्पित और फलित करने का श्रेय आचार्य अमृतचन्द्रको ही है। जिस तरह वेदान्तदर्शनके सूत्रोंपर वाचस्पति मिश्रने भामती रची उसी प्रकार आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारपर आत्मख्यातिकी रचना की। दोनोंकी शैली और भाषाकी प्राञ्जलतामें समानता है। पुरुषार्थसिद्धयुपाय और तत्त्वार्थसार
इन टीकाओंके अतिरिक्त आचार्य अमृतचन्द्र की दो रचनायें उपलब्ध है---[क पुरुषार्थसिद्धयुपाय और दूसरा तस्वार्थसार । दोनों रचनाओं में अध्यात्मी अमरचन्द्र के वैशिष्यको स्पष्ट छाप है। तुर्थगिका सामानारका गन्थ है। रत्नकरण्डश्रावकाचारके बाद उसफा नम्बर माता है। उसके नाम तो वैशिष्टय है ही, आद्यन्त वर्णनमें भी अपना वैशिष्टय है। उसके आदिमें जो निश्चय और व्यवहार नयको चर्चा है तथा अन्नमें जो रत्नत्रयको मोक्षका ही उपाय कहा है वह सब कथन श्रावकाचारोंको दृष्टि से अछूता है। पुण्यानवको शुभोपयोगका अपराय बतलाना अध्यात्मी अमृतचन्द्रकी अमृतमयो वाणीका निस्यन्द है । उनके कुछ श्लोक तो समस्त जिनशासनको समझनेको कुंजी है ।
इसी तरह उनका तत्त्वार्थसार भी तत्त्वार्थ मूत्रके समग्र सारको लिए हुए होने पर भी अपना पृथक वैशिष्टय रखता है जिसका स्पष्टीकरण अपनी प्रस्तावनामें पं० पन्नालालजीने किया है। उसके अन्त में भी उन्होंने निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्गकी पर्वा की है । वह चर्चा सूक्ष्म ईक्षिकासे चिन्तनीय है। कुछ विशिष्ट पद्य
प्राचार्य अमृतचन्द्र के इन दोनों ग्रन्थरस्नों में कुछ ऐसे सूत्र हैं जो वर्तमान में प्रचलित सैद्धान्तिक विवादोंको सुलझाने में सहायक हो सकते हैं। नीचे उन्हें हम दे देना उचित समझते हैं
मुख्योपचारविवरणनिरस्तदुस्तरविनेयदुर्बोषाः ।
ध्यवहारनिश्चयशाः प्रवर्तयन्ते जगति तीर्थम् ।। ४ ।। मुख्य और उपचार कथनके विवेचन द्वारा शिष्योंके दुनिवार अमानभावको नष्ट करनेवाले तथा व्यवहार-निश्चयके ज्ञाता आचार्य ही जगसमें धर्मतीर्थका प्रवर्तन करते हैं ।।
निश्चर्यामह भूतापं व्यवहारं वर्णयन्त्यभूतार्थम् ।
भूतार्षबोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि संसारः ॥ ५ ॥ यहाँ निपचयनयको भूतार्थ और व्यवहारनयको अभूतार्थ कहते है । प्रायः सारा हो संसार भूतार्यके ज्ञानसे विमुख है। अथवा भूतार्थ के ज्ञानसे विमुख जो अभिप्राय है वह सभी संसाररूप है।
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तत्त्वार्थसार
अनुषस्य शेषनार्थं मुनीश्वरा देशयन्यभूतार्थम् । व्यवहारमेव केवलमति यस्तस्य देशना नास्ति ॥ ६ ॥
मुनीश्वर अज्ञानी जीवको ज्ञान करानेके लिये अभूतार्थं व्यवहारनथका उपदेश करते है । जो जीव केवल व्यवहारनयको ही जानता है, उसके लिये उपदेश नहीं है अर्थात् वह उपदेशका पात्र नहीं है ॥
I
माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगोतसिंहस्य ।
व्यवहार एवं हिता निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य || ७ ||
जैसे सिंहको बिल्कुल न जाननेवाले पुरुषको 'यह बालक सिंह है' ऐसा कहनेपर वह बालकको ही सिंह मान लेता है वैसे ही निश्चयको न जाननेवाला व्यवहारको हो निषय मान लेता है ॥
व्यवहारनिश्चय यः प्रबुध्य तस्वेन भवति मध्यस्थः ।
प्राप्नोति देशनायाः स एव फलमविकलं शिष्यः ॥ ८ ॥
जो व्यवहार और निश्चयको यथार्थ रूप से जानकर मध्यस्थ रहता है-पक्षपात नहीं करता, वही शिष्य उपदेशका सम्पूर्ण फल पाता है |
X
X
X
असग्रं भावयतो रत्नत्रयमस्ति
कर्मबन्धो यः ।
स विपक्षकृतोऽवश्यं मोक्षोपायो न बन्धनोपायः ।। २११ ॥
एकदेश रत्नत्रय की भावना करनेवाले पुरुषको जो कर्मबन्ध होता है वह बच्च विपक्षकृत है रागके कारण होता है। अवश्य ही जो मोक्षका उपाय है वह बन्धनका उपाय नहीं है | रत्नत्रयमिह हेतुनिर्वाणस्यंव भवति नान्यस्य ।
आस्रवति यत्तु पुण्यं शुभोपयोगोऽयममराधः ।। २२० ।।
इस लोक में रत्नत्रय निर्वाणका ही हेतु है, अन्यका नहीं । रत्नत्रय का पालन करते पुण्यका आस्रव होता है वह शुभोपयोगका अपराध है ।
ये सब पुरुषार्थसिद्धयुपायके श्लोक हैं ।
पुण्य-पापके विषय में तत्त्वार्थसारके दो श्लोक बहुत महत्वपूर्ण हैं
हेतुकार्य विशेषाभ्यां
विशेषः पुण्यपापयोः ।
हेतु शुभाशुभ भावों कायें चैव सुखासुखे ।। १०३ ।। संसारकारणत्वस्य
द्वयोविशेषतः ।
हुए
जो
X
न नाम निश्चयेनास्ति विशेष पुण्यपापयोः ॥ १०४ ॥
हेतु और कार्यको विशेषतासे पुण्य और पापमें भेद है । पुण्यका हेतु शुभ भाव है और पापका हेतु अशुभ भाव है। पुण्य का कार्य सुख है और पाप का कार्य दुःख है । किन्तु पुण्य और पाप दोनों हो समानरूपसे संसार के कारण है। अतः निश्चयनयसे पुष्प और पापमें कोई भेद नहीं है ||
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प्राक्कथन
समय
तत्त्वार्थसारमें आचार्य अमृतचन्द्रने अकर्सफदेयके तत्वार्थवातिकका विशेष उपयोग किया है। उसके वातिकोंको श्लोकरूपसे निवद्ध करके तत्त्वार्थसारका महत्त्व बहाया है। तस्वार्थवातिककी ख्याति तत्त्वार्थभाष्यके रूपमें भी रही है 1 आचार्य वीरसेन स्वामीने, अपनी धवला टीकाराम | पु. १, ५, ५) 'उक्त च तत्त्वार्थभाष्ये'। लिखकर तत्त्वार्थबार्तिकका उद्धरण दिया है। उत्तरकालीन आचार्य भास्करनन्दिने अपनी टीका विशेष विस्तारके लिये जिम भाष्यको देखने की प्रेरणा की है वह भाष्य भो अकलंकदेव. मृत तत्त्वार्थवातिक ही है । इसी तरह धर्मभूषणने न्यायदीपिका भाष्यके नामसे जो वाक्य उद्धृत किये है वे भी तत्त्वार्थवातिकके ही वाक्य है। आचार्य समन्तभद्ररचित महाभाष्य था, भाष्य नहीं। किन्तु उसकी स्थितिपर पं. जगलकिशोरजी मुख्तार अच्छा और सप्रमाण प्रकाश डाल गये हैं। अतः उसे विस्मृत कर देना ही ऐतिहासिक दृष्टि से उचित प्रतीत होता है । अस्तु । अतः यह सुनिश्चित है कि अमृतचन्द्र अकलंकदेवके पश्चात् हुए है। किन्तु उनके तत्त्वार्थसारपर आचार्य विद्यानन्दके तत्त्वार्थरलोकवातिकका कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होला ।
आचार्य जयसेनके धर्मरत्नाकरमें पुरुषार्थसिञ्चयुपायके लोक ऊद्धृत होनेसे यह भी सुनिश्चित है कि अमृत चन्द्र वि. सं. १०५५ से पूर्व हुए है क्योंकि धर्मरत्नाकरम उसका रचनाकाल १०५५ दिया हुआ है । आचार्य अमितगति द्वितीयने सुमाषित रन. सन्दोहको वि० सं० १०५० में, पंचसंग्रहको १०७३ और धर्मपरीक्षाको १०७० सं० में पूरा किया था । इनके दादा गुरु नेमिषेणाचार्य के भी गुरु अमितगति प्रथमने योगसारको रचना की थी 1 यह योगसार एक तरह कुन्दकुन्दाचार्य के प्राकृत भाषानिवद्ध समयसारका संस्कृत रूपान्तर है। इसमें भी पुण्य और पापमै भेदाभेद तत्वार्थसारका अनुकरण करते हुए कहा है । यथा
सुखासुखविधानेन विशेषः पुण्यपापयोः । निस्यसौख्यमपश्यद्भिर्मन्यते -मुग्धयि भिः ।। पश्यन्तो जन्मकान्तारे प्रवेशं पुण्यपापतः ।
विशेष प्रतिपद्यन्ते न तयोः शुद्ध बुद्धयः ॥ सत्त्वार्थसारके उन दोनों श्लोकोंके ही अभिप्रायको प्रकारान्तरसे दोहराया गया हैस्व. पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने भी तत्वानुशासनको अपनी प्रस्तावनाम (१. ३४) इस बातको स्वीकार किया है कि 'अमितगति प्रथमके योगसारप्राभूतपर भी अमृतचन्द्र के तत्त्वार्थ सार तथा समयसारादि टीकाओंका प्रभाव लक्षित होता है जिनके समय अमितगति द्वितीयसे कोई ४०-५० वर्ष पूर्वका जान पड़ता है। ऐसी स्थिठिमें अमृतचन्द्र सूरिका समय विक्रमको १० बों शताब्दीका प्रायः तृतीय चरण है ।'
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तस्वार्थसार
श्रीपाल डड्ढ रचित संस्कृत पञ्चसंग्रहका भी एक पत्र धर्मरत्नाकर ( पंचायती मन्दिर देहलीकी प्रतिके पृष्ठ ६७ ) में उद्धृत है । यह पद्य है
बर्हेतुभी रूपः सर्वेन्द्रियभयावहैः ।
जुगुप्साभिश्च वीभत्सेनॅव क्षायिकवृग् चलेत् ॥
और इसी पंचसंग्रह सारके पश्चम अधिकारका ११
प्रकृतिसमुत्कीर्तन नामक द्वितीय संग्रह 'उक्तञ्च' करके तत्वार्थश्लोक उद्धृत है
षोडश कषायाः स्युनकषाया नवोदिताः ।
ईशद्ध यो न भेदोऽत्र कषायाः पञ्चविंशतिः ॥
अतः अमृतचन्द्र धर्मरत्नाकरके कर्ता जयसेन, श्रीपालसुत इड्ढा तथा अमिर्गात प्रथमसे पहले हुए हैं, इतना सुनिश्चित है ।
प्रकृत प्रकाशन
तत्वार्थसारको हमने सर्वप्रथम
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नागर प्रेस
से प्रकाशित प्र ही देखा था। उसके पश्चात् सन् १९१९ में पं० वंशीधरजी के अनुवादके साथ भारतीय जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी संस्थासे उसका प्रकाशन हुआ । आधी शताब्दीके पश्चात् पं पन्नालालजीके हिन्दी अनुवादके साथ श्रीगणेशप्रसादवर्णी ग्रन्थमालासे उसका प्रकाशन हो रहा है। पं० पन्नालालजी एक सिद्धहस्त अनुवादक हैं। उन्होंने जैन पुराणोंके साथ अनेक संस्कृत काव्यों का भी अनुवाद किया है । वे सिद्धान्त के भी पंडित हैं अतः उनके अनुवादका प्रामाणिक और स्पष्ट होना स्वाभाविक जैसा लगता है । किन्तु उन्होंने मूल ग्रन्थका संशोधन किन्हीं हस्तलिखित प्रतियोंसे क्रिया हो, ऐसा कोई निर्देश उनके वक्तव्य
नहीं है । यद्यपि उपलब्ध मूल पाठ प्रायः शुद्ध ही हैं फिर भी उसका मिलान किन्हों मूल प्रतिसे कर लिया आता तो उत्तम होता। अनुवाद तो उनका उत्तम हैं ही फिर भी मुझे एक दो स्थल विचारणीय प्रतीत होते हैं ।
अष्टम अध्यायके ४४ वें श्लोक में प्रश्न किया गया है कि मुक्त जोवकी गति लोकसे बागे क्यों नहीं होती, तो उत्तर दिया गया
धर्मास्तिका यस्याभाषात् स हि हेतुर्गतेः परः ।
धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे । अन्तिम चरणका अर्थ किया है— वास्तव में धर्मास्तिकाय गतिका परम कारण है । यद्यपि पर शब्दका अर्थ परम भी होता है किन्तु यहाँ 'अन्य' या बाह्य अर्थ विवक्षित है। 'परम' शब्द अमृतचन्द्र जोको विवक्षित नहीं हो
सकता ।
इसी प्रकार इस अध्यायके ५२ श्लोक में मुक्तोंके सुखको निरुपम बतलाया हैआगे लिखा है
लिङ्गप्रसिद्धेः प्रामाण्यमनुमानोपमानयोः । अलिङ्ग चाप्रसिद्धं यत्तेनानुपमं स्मृतम् ।। ५३ ।।
रा
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प्राक्कथन पूर्वार्धमें कहा है कि लिङ्ग या हेतुसे अनुमानमें और प्रसिद्धिसे उपमानमें प्रामाण्य आता है। उत्तरार्धका अनुवाद पं० जीने इस प्रकार किया है 'परन्तु मुक्तजीवोंका सुख शलिंग है.--हेतुरहित है तथा अप्रसिद्ध है इसलिये वह अनुमान और उपमान प्रमाणका विषय न होकर अनुपम माना गया है।' शब्दशः अनुबाद ठोक है किन्तु उसका भाव स्पष्ट नहीं हुआ । अनुमान कहते हैं साधनसे साध्यके ज्ञानको। किन्तु मुक्तों के सुखको बतलाने वाला कोई साधन या हेतु नहीं है। प्रसिद्ध अर्थके साधर्म्यसे साध्यका साधन करने वाला उपमान प्रमाण है। जैसे गो प्रसिद्ध है । उसकी समानता देखकर यह जानना कि गौके समान गवम होता है ग्रह उपमान प्रमाण है ऐसा प्रसिद्ध अर्थ कोई नहीं है जिसके साधर्मसे मुक्तोंके सुसको जाना जा सके अतः वह निरूपम है ।' मस्तु ___वर्णी ग्रन्थमालाके अभ्युदयमें उसके मंत्री डॉ. दरबारीलालजो कोठियाको निष्काम सेवा प्रमुख कारण है। हम श्रोफोय्यिाजी तथा पं० पन्नालालजीको इस कृति तथा उसके प्रकाशनके लिये धन्यवाद देते हैं । इस ग्रन्धके अनुवाद तथा प्रकाशनको आवश्यफता थी।
वाराणसी
कैलाशचन्द्र सिद्धान्त शास्त्री, सिद्धान्ताचार्य प्राचार्य, स्थावाद महाविद्यालय
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प्रस्तावना द्रव्य, तत्त्व और पदार्थ
द्रव्य शब्दका उल्लेख जैन और वैशेषिक दर्शनमें स्पष्ट रूपसे मिलता है । जैन दर्शनमें जीव, पद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और कालको द्रव्य कहा है तथा वैशेषिक दर्शनम पृथियी, जल, अग्नि, वायु, आत्मा, आकाश, दिशा, काल और मन इन नौको द्रव्य कहा है । वैशेषिकदर्शन सम्मत पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और मन, शरीरको अपेक्षा पुदगल द्रव्यमें गभित हो जाते हैं और आत्माको अपेक्षा जीवमें गभित रहते है ! आकाश, काल और आत्मा ( जीव ) ये तीन द्रव्य दोनों दर्शनों में स्वतन्त्र रूपसे मान गये है। वैशेषिक दर्शनाभिमत दिशा नामक द्रव्य आकाशका ही विशिष्ट रूप होनेसे उसमें गभित है। इस तरह वैशेषिक सम्मत समस्त दव्य जनोंके जीव, पुद्गल, आकाश और कालम गभित हो जाते है। धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्यको कल्पना वैशेषिक दर्शनमे नहीं है । ये दोनों द्रव्य जैन दर्शन में ही निरूपित है।
छह ग्योंमें जोवद्रव्य चेतन है और शेष पांच द्रध्य अचेतन है । अथवा पुद्गल द्रव्य, दृश्यमान होनेसे सबके अनुभव में आ रहा है। रूप, रस, गन्ध और स्पर्श जिसमें पाया जाता है वह पुद्गलद्रव्य है अत: जो भी वस्तु रूपादिसे सहित होने के कारण दृश्यमान है वह सब पुद्गल द्रव्य है। जीवके साथ अनादिसे लगे हुए कर्म और नोकर्म ( शरीर ) स्पष्ट रूपसे पुद्गलद्रव्य है। जोषद्रव्य अमूर्तिक होनेमे यद्यपि दिखाई नहीं देता तथापि स्वानुभवके द्वारा उसका बोध होता है। जो सुख-दुःखका अनुभव करता है और जिसे स्मृति तथा प्रत्यभिज्ञान आदि होते हैं वह जीवद्रव्य है। ज्ञान-दर्शन इसके लक्षण है। जीवित और मृत मनुष्यके शरीरको चेष्टाको देखकर जीवका अनुमान अनायास हो जाता है।
पुद्गलमें हम भिन्न-भिन्न प्रकारके परिणमन देखते हैं । मनुष्य, बालकसे पुवा और युवासे वृद्ध होता है । यह सब परिण मन काप्लट्रब्यकी सहायतासे होते है, इसलिये पुद्गलको परिणतिसे कालद्रष्यका अस्तित्व अनुभव में आता है। हम देखते हैं कि जीव और पुदगलमें गति होती है-वे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर बरते जाते दिखाई देते है। इसका कारण क्या है ? जब इसके कारणको ओर दृष्टि जाती है तब धर्मद्रव्यका अस्तित्व अनुभवमें आने लगता है। जीव और पुदगल चलते-चलते रुक जाते है-एक स्थानपर ठहर जाते हैं। इसका कारण क्या है ? जब इसपर विचार करते हैं तब अधर्मद्रश्यका अस्तित्व अनुभवमें आये बिना नहीं रहता। जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ये द्रव्य कहाँ रहते है ? निना आधारके किसी भी पदार्थका अस्तित्त्व बुद्धिमें नहीं आता ।
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तत्वार्थसार जब इस प्रकारका विचार उठता है तब श्राकाशका अस्तित्त्व नियमसे अनुभवमें आता है। इस तरह षडदश्यमय लोक है। लोकके अन्दर ऐसा एक भी प्रदेश नहीं, जहाँ जीव पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य अपना अस्तित्व नहीं रखते हों । हो लोकके बाहर अनन्त प्रदेशों वाला मलोक है, जहां जाकाश सिवाय किर्स अप प्रयका अस्तित्व नहीं है।
जीव द्रश्य अनन्त है, पुद्गल उनकी अपेक्षा बहुत अधिक अर्थात् अनन्तानन्त हैं, धर्म .. और अधर्म द्रव्य एक-एक हैं, आकाश भी एक है और काल असंख्यात है। लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर एक-एक कालद्रव्य विद्यमान रहता है। वह स्वयं में परिपूर्ण रहता है न कि किसो द्रव्यका अङ्ग, अवयव या प्रदेशरूप होकर रहता है। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि चूंकि धर्म और अधर्म दृश्यका कार्य आकाशम होता है अतः धर्म और अधम द्रव्यकी कल्पना निरर्थक है, आकाशसे ही उनका कार्य निकल सकता है ? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि उनकी कल्पना निरर्थक नहीं है, सार्थक है। यदि आकाशके ऊपर ही गति और स्पितिका काम निर्भर हो तो लोक और अलोकका विभाग नहीं बन सकेगा, क्योंकि आकाश तो आलोकाकाशमें भो विद्यमान है। उसके विद्यमान रहते जीव और पुद्गलको गति तया स्थिति अलोकाकाशमें भी होने लगेगी, तब लोक और अलोकका विभाग कहाँ हो सकेगा? ___जीवादि छह दध्योंमें अस्तिकाम और अनस्तिकायकी अपेक्षा भी भेद होता है। जिसमें अस्तित्वके रहते हुए बहुत प्रदेश पाये जाते हैं उन्हें अस्तिकाय कहत है। जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश पे पाँच द्रब्य बहादेशी होनेसे अस्सिकाय कहलाते है
और कालव्य एकप्रदेशी होनेसे अनस्तिकाम कहलाता है। पुद्गल द्रम्पका एक भेद परमाणु भी यद्यपि द्वितीयादिक प्रदेशोंसे रहित है तथापि स्कन्धरूप बननेको शक्तिसे युक्त होने के कारण उसे भी अस्तिकाय ही कहते हैं ।
द्रव्यका लक्षण शास्त्रों में 'सद्बमम्', 'उत्पादन्ययनौव्ययुक्तं सत्' और 'गुणपर्ययवद्दव्यम्' कहा है अर्थात् जो सत्ता रूप है वह द्रव्य है । सत्ता, उत्पाद, व्यय और प्रोम्परूप होतो है । अथवा जो गुण और पर्यायोंसे सहित है वह द्रव्य है। पुदगल द्रव्यके उत्पाद व्यय और धोव्य हमारी दुष्टिमै स्पष्ट ही आते है और पुद्गलके माध्यमसे जोवद्रम्यके उत्पाद, व्यय, धौव्य भी अनुभव में आते है। शेष अरूपी द्रव्यों के उत्पाद, व्यय, प्रौव्यको हम आगम प्रमाणसे जानते हैं।
जो द्रव्यके आश्रय रहता हुआ भी दूसरे गुणसे रहित हो उसे गुण कहते हैं । ' सह सामान्य और विशेषकी अपेक्षा दो प्रकारका होता है। अस्तित्त्व, वस्तुत्व, प्रमेमत्य, अगुरुलघुत्व आदि सामान्य गुण हैं तथा चेतनत्व, रूपादिमत्व आदि विशेष गुण है।
१. द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः।-त. सू.। २. तद्भावः परिणामः |--त. सू.
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प्रस्तावना
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aarat परिणतिको पर्याय कहते हैं । इसके व्यञ्जनपर्याय तथा अर्धपर्यायकी अपेक्षा दो भेद है । प्रदेश व गुणको अपेक्षा किसी आकारको लिये हुए द्रव्य की जो परिणति होती है उसे व्यञ्जनपर्याय कहते हैं और अन्य गुणोंकी अपेक्षा बहुगुणी हानि - वृद्धिरूप जो परिणति होती है उसे अर्थपर्याय कहते हैं । इन दोनों पर्यायोंके स्वभाव और विभाव की अपेक्षा दो-दो भेद होते है । स्वनिमित्तकपर्याय स्वभावर्याय है और परनिमितक पर्याय विभावर्याय है । जीव और पुद्गलको छोड़कर शेष चार द्रव्योंका परिणमन स्वनिमित्तक होता है अतः उनमें सदा स्वभावपर्याय रहती है। जोव और पुद्गलको जो पर्याय परनिमित्तक है वह विभावर्याय कहलाती है और परका निमित्त दूर हो जानेपर जो पर्याय होती है वह स्वभावपर्याय कही जाती है । संसारका प्रत्येक पदार्थ, द्रव्य, गुण और पर्यायसे तन्मयोभानको प्राप्त हो रहा है। क्षणभरके लिये भी द्रव्य, पर्यायसे विमुक्त और पर्याय, द्रव्यसे विमुक्त नहीं रह सकता। यद्यपि पर्याय क्रमवर्ती है तथापि सामान्य रूप से कोई-न-कोई पर्याय प्रत्येक समय रहती है। इसौ द्रव्यपर्यायात्मक पदार्थको दर्शनशास्त्र सामान्य विशेषात्मक कहा जाता है ।
द्रव्य के बाद जैन शास्त्रों में जीव, अजीव, मलव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सात तत्वों का वर्णन आता है । तत्त्व शब्दका प्रयोग जैनदर्शनके सिवाय सांख्यदर्शन में मो हुआ है । सांख्यदर्शनमें प्रकृति, महान् आदि पच्चीस तत्वोंकी मान्यता है । वस्तुतः संसारमें जिस प्रकार जोव और अजोव ये दो ही द्रव्य हैं उसी प्रकार जोन और अजीव ये दो ही तत्व है । जीवके साथ अनादिकालसे कर्म और नोकर्मरूप अजोबका सम्बन्ध हो रहा है और उसी सम्बन्धके कारण जीवकी अशुद्ध परिणति हो रही है। जॉब और जीवका परस्पर संबन्ध होने का जो कारण है वह आस्रव कहलाता हूँ। दोनोंका परस्पर सम्बन्ध होने पर जो एक श्रेयामगारूप परिणमन होता है उसे बन्ध कहते है । आस्रव के रुक जानेको संवर कहते हैं । सत्ता में स्थित पूर्व कर्मोंका एकदेश दूर होना निर्जरा है और सदा के लिये आत्मासे कर्म और नोकर्मका छूट जाना मोक्ष है ।
'तस्य भावस्तत्त्वम्' – जीवादि वस्तुओंका जो भाव है वह तत्त्व कहलाता है । 'तत्त्व' यह भावपरक संज्ञा है । मोक्षमार्गके प्रकरण में ये सात तत्त्व अपना बहुत महत्त्व रखते है । इनका यथार्थ निर्णय हुए बिना मोक्षकी प्राप्ति संभव नहीं है ।
कुन्दकुन्दस्वामीने इन्हीं खास तरयों के साथ पुण्य और पापको मिलाकर नौ पदार्थोंका मिरूपण किया है। जिस प्रकार घट पदका वाच्य कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थविशेष होता हूँ उसी प्रकार जीवादि पदोंके वाच्य चेतनालक्षण जीव, कर्मनो कर्मादिरूप अजांव, कर्मा - गमनरूप मानव, एक क्षेत्रावगाहरूप बन्ध, कर्मागमननिरोधरूप संदर, सप्तास्थित कमौका एकदेश दूर होनेरूप निर्जरा, समस्त कर्म नोकमौका आत्मप्रदेशों से पृथक् होनेरूप मोक्ष, शुभाभिप्राय से निर्मित शुभ प्रवृत्तिरूप पुण्य और अशुभामिप्रायसे निर्मित अशुभ प्रवृत्तिरूप पाप होते हैं। इसीलिये पदार्थ - शब्दार्थ की प्रधानदृष्टिसे ये पदार्थ कहलाते हैं
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तत्त्वार्थसार शब्दब्रह्म और अर्थब्रह्म को अपेक्षा पदार्थ दो प्रकारका भी है अर्थात् संसारकै अन्दर जितने पदार्थ हैं वे किसी-न-किसी पद-शब्दके वाच्य–अर्थ अवश्य है । यहां नौ पदों शब्दोंके द्वारा प्रयोजनभूत तस्वीका ग्रहण किया गया है, इसलिये संसारके सच पदार्थ इन नौ ही पधाोंमें गर्मित हो जाते है। तत्त्वनिरूपणकी विविध शैलियाँ
जिनागममें तत्त्वनिरूपण करनेकी एक प्राच्यशैली भगवन्त पृष्पदन्त और भतबलिके द्वारा प्रचारित रही है, जिसका उन्होंने षटखण्डागममें सत्, संख्या आदि अनुयोगोंके द्वारा जीवादि तत्त्वोंका वर्णन कर प्रारम्भ किया है । इस शैलोमें जीवतत्वका वर्णन बोस' प्रटपणाओं में पारायः गाउहीं बीस रूपणाओंके अन्तर्गत अन्य मजीवादि सस्वोंका वर्णन भी यथाप्रसङ्ग किया जाता है। यह स्ली अत्यन्त विस्तृत होने के साथ दुलह भी है । साधारण क्षयोपशमवाले जीवोंका इसमें प्रवेश होना सरल बात नहीं है।
पीछे चलकर कुन्दकुन्दस्वामीने तत्त्वनिरूपणकी इस कालोमें नया मोड़ देकर उसे सरल बनाने का उपक्रम किया है । उन्होंने विचार किया कि आत्म-कल्याणके लिये प्रयोजनभूत पदार्थ तो नौ हो हैं-जोव, अजोव, पुण्य, पाप, मानव, संवर, निर्जरा, बन्द और मोक्ष । अतः इन्हींके यथार्थ ज्ञानकी ओर मनुष्यको बुद्धिका प्रयास होना चाहिये । अनादिकालसे जीव तथा कर्म-नोकर्मरूप अजीव परस्पर एक दूसरेसे मिलकर संयुक्त अवस्थाको प्राप्त हो रहे हैं। इसलिये इस संयुक्त अबस्थामें 'जोव क्या है' और 'अजीव क्या है' यह समवाना सर्वप्रथम प्रयोजनभूत है। तदन्तर पुण्य-पापका एक बड़ा प्रलोभन है जिसके चक्रमें अच्छे-अच्छे पुरुष आ जाते हैं इसलिये उनके यथार्थ स्वरूपको समझकर उनसे निवृत्त होनेका प्रयास प्रयोजनभूत है। तदनन्तर जीव और अजीवका परस्पर सम्बन्ध क्यों हो रहा है, इसका विचार करते हुए उन्होंने आसवको प्रयोजनभूत बतलाया है। आबका प्रतिपक्षी संवर है अत: उसका परिज्ञान भी अत्यन्त प्रयोजनभूत है । संवरके द्वारा नवीन अजीवका संयोग होना तो दूर हुआ, परन्तु जिसका संयोग पहलेसे चला आ रहा है उसे किस प्रकार दूर किया जावं ? इसको पर्चा करसे हुए निर्जराको बावश्यक बतलाया । उसके बाद जीव और अजीवकी बदशाका विचार करते हुए वन्धको प्रयोजनभूत बतलाया। अन्त में बन्धकी विरोधी दशा मोक्ष है इसलिये साध्यरूपमें उसका निरूपण करना प्रयोजनभूत है। इस तरह जीवादि नौ पदाथोंको प्रयोजनभूत मानकर उनका समयप्राभूत गन्यमें निरूपण किया। इन्हीं नौ पदार्थोका प्रवचनसार तथा पश्चास्तिकाव आदि अन्यों में प्रमुख या गोणरूपसे वर्णन किया है । कुन्दकुन्दस्वामीको यह
१, गुणजोवा पज्जत्ती पाणा सण्णा य मग्गणाओ या
उकओगो वि य कमसो नीसं तु पनवणा भणिदा ||-जी. का.
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प्रस्तावना
शैली जनसाधारणको सरल मालूम हुई जिससे उसका प्रचार बड़ा और उत्तरदती आषार्योंने उसे खूब प्रचारित किया। ___ कुन्दकुन्दस्वामीक बार भी मास्यामः नमः न पापिलाना इत। उन्होंने कुन्द-कुन्दस्वामीकी शैलीको भी परिष्कृत कर उसे और भी सरल बनानेका प्रयास किया। उन्होंने विचार किया कि पुण्य और पाप ये दोनों पदार्थ आघबके हो विशेषरूप है अत: उनका पृथक्से वर्णन करना आवश्यक नहीं है। जीव और अजीव ये दोनों पदार्थ सबके अनुभवमें आ रहे हैं। इनका सम्बन्ध जिन कारणोंसे होता है वे कारण आस्रव है। बालकके बाद जीव और अजीबको बद्धदशाका वर्णन करने के लिये उन्होंने बचतत्वको स्वीकृत किया । आम्रव और वन्ध तत्त्वस जोवको संसारी दशा होती है पर यह जोक सरे मोक्षकी प्राप्तिके लिये पुरुषार्थ कर रहा है इसलिये आस्रवके विरोषो संवर तत्वका निरूपण किया। नये अजीवका सम्बन्ध रुक जानेपर भी पूर्षयक्ष अजीवका संबम्घ जब तक नहीं छूटता तब तक मोक्षको प्राप्ति दुर्लभ है अतः संबरके बाद निर्जरातत्वको स्वीकृत किया और संदरपूर्वक निर्जरा होते-होते जब जोव और अजीवका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है तब मोक्षको प्राप्ति होती है अतः साध्यरूपमें यह प्रयोजनभूत है। इस तरह नौ पदार्थोंके स्थानपर उन्होंने सात तत्वोंको स्थान दिया और कुन्दकुन्दस्वामी के द्वारा अंगीकृत क्रममें भी परिवर्तन कर दिया।
उमास्वामीको यह शंलो जनसाधारणको अत्यधिक रुचिकर हुई । उस समय भारत वर्षमें सूत्ररचनाका प्रवाह चल रहा था। न्याय, साहित्य और व्याकरणादि समस्त विषयोंपर अनेक सूत्र ग्रन्योंकी रचना हो रहो थी और वह भी संस्कृतभाषामें । इसलिये उमास्वामीने भो संस्कृत भाषामें सूत्ररचना की। इसके पूर्वका जिनागम प्राकृतभाषामें निबछु मिलता है । परन्तु उमास्वामीने संस्कृतभाषामें सर्वप्रथम अन्य रचनाकर भाषाविषयक आग्रहको छोड़ दिया और जनकल्याणकी भावनासे जिस समय जो भाषा अधिक जनग्राह्य हो उसी भाषामें लिखना अच्छा समझा 1
उमास्वामीकी यह रचना तत्त्वार्थसूत्रके नामसे प्रसिद्ध है। उत्तरवर्ती प्रन्यकारोंने अपने-अपने ग्रन्थों में तत्त्वार्थ सूत्रके नामसे ही इसका उल्लेख किया है। पोछे चलकर इसका 'मोक्षशास्त्र' नाम भी प्रचलित हो गया, क्योंकि इसमें मोचमार्गका निरूपण किया गया है। यह 'सत्त्वार्यसूत्र' इतना लोकप्रिय ग्रन्थ सिद्ध हुआ कि इसके ऊपर अनेक आचार्योने वृत्ति, वार्तिक तथा भाष्यरूप टीकाएं लिखों। जैसे समन्तभद्रस्वामोने गन्धहस्तिमहाभाष्य, पूज्यपादस्वामीने सर्वार्थसिद्धि, अकलंकस्वामीने तत्वार्थराजवार्तिक
और विद्यानन्दस्वामीने तत्त्वार्यश्लोकवार्तिकभाष्य । श्वेताम्बर सम्प्रदायमें भी इसका बहुत आदर है तथा अनेक टीकाएँ इसपर लिखी गई है। वाचक उमास्वामीका तत्त्वाधिगमभाष्य उनके यहां इसकी प्राचीन टीका मानी जाती है। इसके बाद सिद्धसेनगणो,
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तत्त्वार्थसार हरिमद्र, देवगुप्त, मलयगिरि तथा चिरन्तनमुनि आदिने भी इसपर टीकाएँ लिखी है।
दिगम्बर जैनाचार्योको टीकाओंमें कुछके नाम इसप्रकार है१. स्वामिसमन्तभद्राचार्यकृत गन्धहस्तिमहाभाष्य २. पूज्यपादाचार्यकृत सर्वार्थसिद्धि वृत्ति ३. अकलंकमट्टकृत तत्त्वार्थ राजवातिकालंकार ४. विद्यानन्दस्वामीकृत तत्त्वार्थश्लोकयासिकालंकार ५. भास्करनन्दिकृत सुखबोधिनोटोका ६. विधसेनचन्द्राचार्यकृत तत्त्वार्थटीका ७. योगीन्द्र देवकूत तत्त्वप्रकाशिकाटोका ८. योगदेवमथित सस्वार्थका ९, लक्ष्मीदेवविरचित तत्वार्थटीका १०. अभमनन्दिसूरिकृत तात्पर्यतत्त्वार्थटोका ११. श्रुतसागरसूरिकृत तत्वार्थवृत्ति १२. बालचन्द्रमुनि प्रणीत तत्त्वरत्नप्रदीपिका
इनमें प्रारम्भको ११ टोकाएँ संस्कृत भाषामें है और बालचन्द्र मनि प्रणोत बारहवीं टीका कर्णाटकभाषामें है। इनके सिवाय अनेक विद्वानोंने हिन्दी तथा गुजराती आदि प्रान्तीय भाषाओं में भी इस पर टीकाएं लिखा है। इन टीकाओंमें जिनका उल्लेख किया गया है उनमें स्वामिसमन्तभद्रका मन्महस्तिमहाभाष्म अब तक अप्राप्त है । फिर भी उत्तरवर्ती आचार्योने अपने-अपने अन्यों में उसका नामोल्लेख किया है। अत: उसका मस्तिस्व जाना जाता है । इस विषयके कुछ उल्लेख इस प्रकार है____ भास्करनन्दि आचार्यने चतुर्थाध्यायके ४२ वे सूत्रमें लिखा है.---'अपरः प्रपञ्चः सर्वस्य भाष्ये द्रष्टव्यः' । पश्चमाध्यायके द्वितीय सूत्रमें लिखा है 'अन्यस्तु विशेषो भाष्ये दृष्टव्यः ।'
धर्मभूषणाचार्य विरचित न्यायदीपिकाम
तद्धाष्यं-तत्रास्मभूतमाने रोष्ण्यमनात्मभूतं देवदत्तस्य दण्डः, । 'भाष्यं चसंशयो हि निर्णयविरोधोनत्यवग्रहः इति । तदुक्तं स्वामिभिर्महाभाष्यस्यादावाप्तमीमांसाप्रस्तावे
सूक्ष्मान्तरितदूरा ः प्रत्यक्षाः कस्यचिद्यथा ।
अनुमेयत्वतोऽग्न्यादिरिति सतर्सस्थितिः । इस प्रकार महाभाष्यके वाक्योंको उद्धृत किया गया है।
९७८ ई. में श्रीचामुण्डरायके द्वारा कर्णाटकमाषामें विरचित त्रिषष्टिलक्षण पुराणमें भो समन्तभद्रस्वामोके भाष्यका इस प्रकार स्मरण किया गया है ।
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प्रस्तावना
अभिमतमा गिरे तवार्थभाध्यमं तर्कशास्त्रमं वरे वचोविभवदिनिदेव ममादेकर समाजेवो
॥ ५ ॥
ई० सन् १२३० में गुणवर्म कविके द्वारा कर्णाटकभाषामें विरचित पुष्पदन्तपुराणमें
उल्लेख मिलता है
वित्तरभागे सुत्र तिथि मिमं पण्णिवगत्वहस्ति तोंभत्तसा सरक्वे शिवकोटिय कोटिविपक्षु विद्वतुन्मत्तगजं मदं वस्तु केम्पेगोट्टुवल्ले पेल्वदे मत्ते समन्तभद्रमुनिराजबुदात्तजयप्रशस्तियं ॥ २२ ॥
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इस उल्लेख से गन्वहस्तिमहाभाष्यको श्लोकसंख्या छयानबे हजार प्रमाण है; यह जाना जाता है ।
विक्रान्तकौरव नाटककी प्रशस्ति में उसके कर्ता हस्तिभल्लने भी लिया है
तत्त्वार्थ सूत्रव्याख्यानगन्ध हस्तिप्रवर्तकः ।
स्वामी समन्तभद्रोऽभूद्देवागमनिवेशकः ।। २ ।।
सहस्रीकी टिप्पणी में लघुसमन्तभद्रने भी लिखा है
वह हि खलु पुरा स्वीयनिरवद्यविद्यासंयमसम्पवा गणषरप्रत्येकमुद्धश्रुतकेवलिagaण सूत्रमहर्षीणां महिमानमात्मसात्कुर्वद्भिर्भगवद्भिरुमास्वामिपावराचार्यवयंरसूत्रितस्थ तस्वार्थाधिगमस्थ मोक्षशास्त्रस्य गन्धहस्त्याख्यं महाभाष्यमुपनिबन्बन्तः स्माद्वाविद्यागुरवः श्रीस्वामिसमन्तभाचार्याः ।
यह तो रही टीकाओं को वात, परन्तु उत्तरवर्ती समस्त आचार्योंने अपने ग्रन्थोंमें जहाँ तत्वनिरूपणका प्रसङ्ग आया है वहाँ श्री उमास्वामीको हो शैलीका अपनाया है । जैसे हरिवंशपुराण में उसके कर्त्ता जिनसेनस्वामीने तत्वनिरूपण करते हुए इसी पॉलीको स्वीकृत किया है। कितने ही स्थलों पर तो ऐसा जान पड़ता है मानों सूत्रोंका इन्होंने पद्यानुवाद हो किया हो ।
उमास्वामोने इस नवीन शैलीको अपनाते हुए प्राचीन शैलीको सर्वथा विस्मृत नहीं किया है अपितु 'सत्संख्या क्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैव' इस सूनके द्वारा उसका उल्लेख भी किया है और पूज्यपादस्वामीने सर्वार्थसिद्धिटीका में विस्तार के साथ इस सूत्रको टीका कर सत्संख्यादि अनुयोगोंपर अच्छा प्रकाश डाला है । सर्वार्थसिद्धिटीका, वीरसेनस्वामी द्वारा रचित धवलाटोकासे बहुत प्राचीन है। यदि इसकी अच्छी तरह समझ लिया जावे तो धवला टीकामें प्रवेश करना सरल हो सकता है । परन्तु खेद है कि दुरूह समझ कर इस सूत्रको सर्वार्थसिद्धिगत टीकाको पाठयक्रम से बहिर्भूत कर दिया है जिससे आजका छात्र उस प्राचीन शैलोसे अपरिचित ही रह जाता है । पीछे चलकर इसी प्राचीन शैलीको मल देनेके लिये नेमिचन्द्राचार्यने गोम्मटसार जीवकाण्ड तथा कर्म
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तत्त्वार्थसार काण्डको रचनाएं कों और उनसे उस प्राचीन शैलीको पुनः प्रचारित होनेमें बल प्राप्त
हुआ।
___ श्रीममुतचन्द्रसूरिका 'तत्त्वार्थसार' ग्रन्थ भी उमास्वामोंके तत्त्वार्थसूत्रको शैलोमें लिखा हुवा स्वतन्त्र मन्थ है। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि अमृतचन्द्रसूरिने इसे गद्यके स्थानपर पद्यका हो रूप दिया है परन्तु कितने ही स्थानोंपर इन्होंने नवीन तत्त्वोंका भी संकलन किया है। नवीन तत्त्वोंका संकलन करने के लिये इन्होंने अकलंकस्वामीके तत्त्वार्थ राजवातिकका सर्वाधिक आश्रय लिया है। आम्रव तथा मोक्षके प्रकरणमें लो उन्होंने प्रकरणोपास वातिकोंको पद्यानुवादके द्वारा अपने ग्रंथका अंग ही बना लिया है । उमास्वामीने गुणस्थान और मार्गणाओंके जिस प्रकरणको दुरूह समझकर छोड़ दिया था नसे भी अमृतपन्द्रसूरिने यथाकथंचित् स्वीकृत कर विकसित किया है। उमास्वामी
महदली भाचार्य के समय कालदोषसे मुनियाम अपने-अपने संघका पक्षपात चल पड़ा। उसे देखकर महसलो आचार्यने मुनिक विधि , सेगसंध, वह पल देवता चार संघ स्थापित कर दिये । उनमें भगवान् महावीर के निर्वाणसे लेकर ६८३ वर्ष व्यतोठ होने के बाद दश वर्ष तक गुप्तिगुप्त आचार्य संचाधिपति रहे, उनके बाद चार वर्ष तक माघनंदी, तत्पश्चात् नौ वर्ष तक जिमचन्द्र, तदुपरान्त बावन वर्ष तक नौकुन्दकुन्द स्वामी और पश्चात् चालीस वर्ष आठ दिन तक उमास्वामी महाराज नन्दिसंघके पीठाधिपति रहे। श्रवणबेलगोल के ६५ शिलालेखमें लिखा है
तस्यान्वये भूविविते बभूव यः पननन्दिप्रथमाभिषानः । श्रीकुन्सकुन्दादिमुनीश्वराख्यः सत्संयमाधुगतचारणतः ।।५।। अभूवुमास्वातिमुनीश्वरोऽसावाचार्यशब्दोत्तरगदप्रपिच्छः ।
तदन्वये तत्सशोस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेषपवार्यवेदी ॥६॥ उन जिनचम्न स्वामी के जगत् प्रसिद्ध अन्वयमें 'पद्मनन्दी प्रथम' इस नामको धारण करनेवाले श्रीकुन्दकुन्द नामके मुनिराज हुए । जिन्हें सत्संयमके प्रभावसे चारण ऋद्धिप्रास हुई थी। उन्हीं कुन्दकुन्दस्वामी के अन्वयमें उमास्वाति मुनिराज हुए जो गृद्धपिच्छाचार्य मामसे प्रसिद्ध थे। उस समय गद्भपिच्छाचार्यके समान समस्त पदार्थोका जाननेवाला कोई दूसरा विद्वान नहीं था। श्रवणबेलगोलाके निम्नांकित २५८ वें शिलाप्लेसमें भी लिखा है...
तदीपवंशाकरतः प्रसिखापभूबदोषा यतिरत्नमाला । अभी यवन्तमणिवन्मुनीन्द्रः स कुन्दकुन्योक्तिचण्डबण्डः ॥१०॥ अमृवमास्वातिमुनिः पवित्र बंशे तदीये सकलायवेवी । सूत्रीकृतं येन जिनप्रणीत शास्त्रार्थजातं मुनिपुङ्गायन ॥११॥
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प्रस्तावना
स प्राणिसंरक्षणसावषानो बभार योगी किल गृधपिज्वान् ।
तदा प्रभृत्येव खुषा यमाहुराचार्यशब्बोत्तरगृधपिच्छम् ॥१२॥ उनके वंशरूपी प्रसिद्ध खामसे अनेफ मुनिरूप रत्नोंको माला प्रकट हुई। उसी मुनिरूपी रत्नमालाके बीच में मणिके समान श्रीकुन्दकुन्द नामसे प्रसिद्ध ओजस्वी आचार्य हुए। उन्हीं कुन्दकुन्दस्वामीके पवित्र वंशमें समस्त पदार्थोंके ज्ञाता श्रीउमास्वाति मुनि हए, जिन्होंने जिनागमको सूत्ररूपमें निबद्ध किया। यह समास्थाति महाराज प्राणियों की रक्षामें अत्यन्त सावधान थे, इसलिये उन्होंने ( मयूरपिच्छके गिर जानेपर ) गृनपिछीको धारण किया था । उसी समयसे विद्वान् लोग उन्हें गुपिच्छाचार्य कहने लगे। मसूर प्रान्त के अन्तर्गत नागरप्रान्तके छयालीसवें शिलालेखमें लिखा है--
तत्वार्थसूत्रकारमुमास्वातिमुनीश्वरम् ।
श्रुतकेवलिवेशीयं बन्देऽहं गुणमन्दिरम् ।। में तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता, गुणोंके मंदिर एवं श्रुतकेवलोके तुल्य श्रीउमास्वाति मुनिराजको नमस्कार करता हूँ। ___ मही उमास्वाति आचार्य, उमास्वामी और गृद्धपिच्छाचार्य नामसे भी विख्यात है । घवलाटीका श्रीबोरसेनाचार्य ने कालश्यका वर्णन करते अपग ' गिटापिन्याहारपप्पयासिबतच्चस्थसुत्तेवि' इन शब्दोंके द्वारा तत्त्वार्थ सूत्रके कर्ताको गृपिच्छाचार्य लिखा है । सन् ९४१ में निर्मित कर्णाटक आदिपुराणम महाकवि पम्पने तमास्वामीको "आर्यनुतगधपिच्छाचार्य' लिखा है । इसी तरह सन् १७८ में रचित कर्णाटक विपतिलक्षण पुराणमें उसके कर्ता चामुण्डरायने भी उमास्वामीको गृध्रपिच्छाचार्य लिखा है।'
१९५० ईशबीयके लगभग रचित कर्णाटक पार्श्वपुराणमें उसके रचयिता पाव. पण्डितने तत्यार्थ सूत्रके कर्ताका उमास्वाति नामसे स्तवन किया है।
सन् १३२० के लगभग विरचित कर्णाटकभाषाके समयपरीक्षा ग्रंथम उसके कर्ता ब्रह्मदेव कविने उमास्वामीका गृधपिच्छाचार्य के नामसे उल्लेख किया है।
तत्त्वार्थसूत्रकरिं गद्मपिच्छोपलक्षितम् । धन्वे गोन्द्रसंजामुमास्वामिमुनीश्वरम् ।।
।
१. वसुमतिगे नेगले तत्त्वार्थसूत्रमं वरेद गृध्रपिच्छाचार्यर ।
असदि दिगन्तम मु दिसि जिनशासनद महिमयं प्रकटिसिदर ||३|| १. अनुपमतत्त्वार्थ पुण्यनिबन्धन मप्युदै तु पनदोलने
दृने खेलसियते वेलसिके निशमुभास्वातिपादयति पादयुगम् ।। ३. नगदोलगुस्ल सुतस्वम नगणित मननवभेदभित्रस्थितियम् ।
सुगमदि मरि वन्निरे ये लद गुणाढ्षं गृध्रपिच्छमुनिकेवलने ।
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तत्वार्थसार इस प्रसिद्ध श्लोकमै भी तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताको मुद्धपिच्छत उपलक्षित उमास्वाभर मामसे प्रकट किया गया है।
इन उपरितन उल्लेखोंसे तत्त्वार्थसूत्रके रचयिता उमास्वामी, उमास्वाति और गृह्यपिच्छाचार्य ये तीन नाम हमारे सामने आते हैं। यह बहुत ही प्रसिद्ध तथा जिनागम के पारगामी विद्वान थे । सत्त्वार्थसूत्रके टीकाकार समन्तभद्र , पूज्यपाद, अकलंक तथा विद्यानंद
आदि मुनियोंने बड़े श्रद्धापूर्ण शब्दों में इनका उल्लेख किया है । पूज्यपादस्वामोने सर्वार्थसिद्धिके प्रारम्भमें जो उनका वर्णन किया है वह अत्यन्त मार्मिक है
_ 'मुनिपरिषम्मध्ये सन्निधणं मूर्तमित्र मोकामार्गमवाग्विसर्ग वपुषा निरूपयन्तं युक्स्पा. गमकुशल परहितप्रतिपावनककार्यमार्यनिषेव्यं निर्गन्याचार्यवर्यम्' ___ जो मनिसभाके मध्य में विराजमान थे, जो बिना वचन बोले अपने शरीरसे ही मानो मूर्तिधारी मोक्षमार्गका निरूपण कर रहे थे, युक्ति और बागममें कुशल थे, परहितका निरूपण करना ही जिनका एक कार्य या तथा उत्तमोत्तम आर्यपुरुष जिनकी सेवा करते थे ऐसे दिगम्बराचार्य श्रीउमास्वामी महाराज थे ।
विद्यानन्दस्वामीने आपके साथ भगद्धिः ' इस प्रकार बादरमूचक शब्दोंका प्रयोग किया है । तत्त्वार्थ सूत्रके या अध्यायोंमें जीवादि सात तत्त्वोंका विशद वर्णन है अर्थात् पहलेके चार अध्यायों में जीवका, पांचवें अध्यायमें अजीवका, छठवें और सातवें अव्यायमें आसबका, आठवें अध्यायमें बन्धका, नौवें अध्यायमें संवर और निर्जराका लथा दशवें अध्यायमें मोक्षतत्त्वका वर्णन है । तत्त्वार्थसूत्रकी महिमामें प्रसिद्ध है
वशाध्याये परिचिन्ने तत्त्वार्थे पठिते सति ।
फलं पादुपवासस्य भाषितं मुनिपुङ्गवः ।। दशाध्याय प्रमाण तत्त्वार्थस्त्रका पाठ और अनगम करनेपर मुनियों ने एक उपवासका फल बललाया है अर्थात् एक उपवाससे जितनी निर्जरा होती है उतनी निर्जरा अर्थ समझते हुए तत्वार्थसूचके एक बार पाठ करनेसे होती है । ___ समन्तभद्र, पूज्यपाद, अकलंक और विद्यानन्द जैसे बहुश्रुत आचार्योंने इसपर वृत्ति, पातिक और भाष्य लिखने में अपना गौरव समशा, इसोसे तत्वार्थसूत्रकी महिमा आंको जा सकती है। कुछ टीकाओंका संक्षिप्त परिचय
समन्तभद्रस्वामीका गन्धहस्तिमहाभाष्य उपलब्ध नहीं है अतः उसके विषयमें कुछ नहीं कहा जा सकता है। परन्तु पुज्यपादस्वामीकी सर्वार्थसिद्धिवृत्ति, अकलंकस्वामीका राजवार्तिक, विद्यानन्दस्वामीका श्लोकवार्तिक, भास्करमन्दिकी सुखकोषास्य टीका और अतसागरकी तस्वार्थवृत्ति टीकाएं देखनेका अवसर प्राप्त हुआ है । पूज्यपादस्वामीको सर्वार्थसिद्धिवृत्ति पातालभाष्यकी पद्धतिपर सरल माषामें लिखित उच्चकोटिको वृत्ति
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प्रस्तावना
है। उसके सत् संख्यादि सूत्र में सदादि अनुयोगोंके द्वारा जो तत्वका निरूपण हुया है यह पूज्यपादस्वामीके आगमविषयक ज्ञानकी महत्ता बतलाने के लिए पर्याम है। इन्होंने प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके लक्षण तथा द्रव्यस्वरूपके वर्णनमें दर्शनशास्त्रको पद्धतिको भी अपनाया है । परन्तु उसे इतनी सुगम रीतिसे लिखा है कि पाठकका मन उसे अनायास ग्रहण कर लेता है। पूज्यपाद वैयाकरण तो थे ही, इसलिये जहां तहाँ व्याकरणका भी निर्देश मिलता है। सर्वार्थसिद्धिकी कितनी ही पंक्तियोंको अकलंकस्वामीने राजपातिकमें पातिकका रूप देकर अपने ग्रंथका अङ्ग बना लिया है । ___ अकलंफस्वामी के समय दर्शनशास्त्रका प्रचार अधिक हो गया था, इसलिये तत्त्वार्थ राजवातिकमें हम बीच-बीचमै अन्य दर्शनोंको चर्चाको भी अधिक मात्रा में पाते हैं और उसके कारण तत्वार्थवातिकके कितने ही स्थल दुरूह हो गये हैं परन्तु पार्तिकोंकी वृत्ति लिखते समय उन्होंने जिस सरल भाषाका प्रयोग किया है उससे ग्रंथके प्रति पाठकका
आकर्षण बना रहता है। भारतीय ज्ञानपीठ वाराणसीसे प्रकाशित तत्त्यार्थ राजवातिकके संपादन में उसके संपादक डॉ महेन्द्र कुमारजी न्यायाचार्यन भारी श्रम किया है। उसको परम्परागत अशुद्धियों को दूरकर तथा दार्शनिक स्थलों को स्पष्ट कर इम सर्वसाधारणके लिए सुगम बना दिया है।
विद्यानन्दस्वामीके समय तक दर्शनशास्त्रका इतना अधिक प्रचार हो गया था कि उसने धर्म, व्याकरण तथा साहित्यमें भी प्रवेश पा लिया था । सिवानन्दस्वामी दर्शनशास्त्रके महान् विद्वान् थे। उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रपर जो भाष्य लिखा उसमें दार्शनिक तत्त्वोंका पूर्ण प्रवेश हो गया। अर्थात् दार्शनिक तत्त्वोंके विवचनकी हो प्रचुरता हो गई और धर्मशास्त्रका अंश गौण पड़ गया। दार्शनिक भागकी बहुलतास यह माष्य दुरूह हो गया । और विशिष्ट बुद्धिवाले विद्वानोंके ही गम्म रह गया। प्रसन्नताको बात है कि न्यायशास्त्रके अद्वितीय विद्वान् पं० माणिकचन्द्र जो न्यायात्रार्यने इस महान ग्रन्थकी हिन्दी टीका लिखकर उसे सर्वसुलभ बना दिया है। हिन्दी टोका सहित श्लोक वार्तिकका प्रकाशन कुन्थुसागर ग्रन्थमाला सोलापुरसे चाल है।
भास्करनन्दिको सुखबोध दीका अपने नामके अनुरूप है। इसमें सरलतारी तत्त्वार्थ के स्वरुपका प्रतिपादन किया गया है। पं० शान्तिराजजी न्यायतीर्थके द्वारा संपादित होकर मैसूरसे प्रकाशित हुई है। विद्वान संपादकने भूमिकामें अच्छा विमर्श किया है।
श्रुतसागरकी तस्वार्थवृत्ति अत्यन्त सरल और बहुत प्रमेयोंसे भरी हुई है। धीमान् डॉ. महेन्द्रकुमारजीके द्वारा संपादित होकर मारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित हो चुकी है । भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
अन्य टीकाएँ मेरे देखने में नहीं आई। उनका उल्लेख भास्करनन्दिको सुख बोध टीका सहित तत्त्वार्थसूत्रको प्रस्तावनाके आधार पर किया गया है।।
संस्कृत टीकाकारोंका परिचय समन्तभद्र
समन्तभद्र, क्षत्रिय राजपुत्र थे । उनका जन्मनाम शान्तिवर्मा या किन्तु बादमें आप
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तत्त्वार्थसार 'समन्तभद्र' इस श्रुतिमधुर चामसे लोकमें प्रसिद्ध हर। इनके गुरुका क्या नाम था और इनकी क्या गुरुपरम्परा थी, यह ज्ञात नहीं हो सका। वादी, वाग्मी और कवि होनेके साथ आद्य स्तुतिकार होनेका श्रेय आपको हो प्राप्त है। आप दर्शनशास्वफे तलदृष्टा और विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। एक परिचय-पद्यमें तो आपको देवज्ञ, वैद्य, मान्त्रिक और तान्त्रिक होने के साथ आज्ञासिद्ध तथा सिद्धसारस्वत भी बतलाया है। आपकी सिंह गर्जनासे सभी बाबिजन कांपते थे। आपने अनेक देशों में विहार किया और वादियोंको पराजित कर उन्हें सन्मार्गका प्रदर्शन किया। आपको उपलब्ध कृतियां बड़ो ही महत्त्वपूर्ण, संवि, स्या गंभीर सलामउ.मा । उनले न ३रू प्रकार है
१ बृहत्स्वयंभूस्तोत्र, २ पुश्त्यनुशासन, ३ आप्तमीमांसा, ४ रत्नकरण्डश्रावकाचार और ५ स्तुतिविद्या । इनका समय विक्रमकी २-३ शताब्दी है । पूज्यपाद
थवणवेलगोलाके शिलालेख में० २५४ और ६४ के उल्लेखानुसार आपके देवनन्दी, जिनेन्द्रबुद्धि और पूज्यपाद ये तीन नाम प्रसिद्ध हैं ।२: यह आचार्य अपने समय बहुभुत विद्वान थे। इनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। यही कारण है कि उत्तरवर्ती ग्रन्थकारोंने बड़े सम्मानके साथ आपका संस्मरण किया है। जिनसेनाचार्यने अपने आदिपुराणमें इनका संस्मरण वैयाकरणके रूपमें किया है। वास्तवमें आप अद्वितीय वैयाकरण थे। आपके जैनेन्द्रध्याकरणको नाममालाकार धनंजय कधिने अपश्चिमरत्न कहा है। आप विक्रम संवत् ५२६ से पूर्ववर्ती विद्वान सिद्ध होते हैं। अबतक आरके निम्नाङ्कित ग्रन्थ उपलब्ध हो चुके हैं
१ जैनेन्द्रव्याकरण, २ सर्वार्थसिद्धि, ३ समाधिमन्त्र, ४ इष्टोपदेश और ५ भकिसंग्रह । अकलङ्क भट्ट
यह लघुहब नामक राजाके पुत्र थे और भट्ट इनको उपाधि थी। यह विक्रमकी सातवीं शताब्दी के प्रतिभासंपन्न आचार्य थे। अफलंकदेव जैनन्यायके व्यवस्थापक और दर्शनशास्त्रके असाधारण पण्डित थे। आपकी दार्शनिक कृतियोंका अभ्यास करनसे आपके तलस्पर्शो पाहित्यका पद-पदपर अनुभव होता है। उनमें स्वमतसंस्थापनके साथ १. आचार्योऽहं कबिरहमहं वादिराट् पण्डितोऽहं
देवशोऽहं भिषगहमहं मान्त्रिकस्ताम्बिकोहम् । राजन्नस्यां जलधिवलयामेखलायामिलाया.
माज्ञासिद्धः किमिति बहुधा सिद्धसारस्थतोऽहम् । २. प्रागम्मघायि गुरुणा किल देवनन्दी बुद्धया पुनविपुलया स जिनेन्द्रबुद्धिः ।
श्रीपूज्यपाद इति चैष बुनः प्रचल्ये यत्पूजिते: पदयगे वनदेवताभिः ।। ३. यो देवनन्दिप्रथमाभिधानो बुद्धया महत्या स जिनेन्द्रबुद्धिः ।
ओपूज्यपादोऽजनि देवताभिर्यत्पूजितं पाययुगं यदीयम् ॥
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प्रस्तावना । परमतका अफाटम यक्तियों द्वारा निरसन किया गया है। प्रन्थोंकी शैली अत्यन्त गढ, संक्षिप्त, अर्थबहल और सूत्रात्मक है । इसीसे उत्तरवर्सी हरिभद्रादि आचार्यों द्वारा अकसंकध्यायका संमानपूर्वक उल्लेख किया गया है। इतना ही नहीं, जिनदासगणी महत्तर जैसे विद्वानोंने उनके सिद्धिविनिश्चय' ग्रन्थका अबलोकन करनेकी प्रेरणा भी की है। इन सब कारणोंसे अकलंक भट्टको महत्ताका स्पष्ठ आभास मिल जाता है 1 वर्तमानमें इनको निम्न कृतियाँ उपलब्ध है
१. लघीयस्त्रय, २. न्यायविनिश्चय, ३. सिद्धिविनिश्चय, ४. अष्टशतो ( देवागम टीका ), ५, प्रमाणसंग्रह स्वोपज्ञ भाष्य सहित, ६, तत्त्वार्थ राजवातिक, ७. स्वरूपसबोधन और ८. अकलंक स्तोत्र ।
अकलंकदेवका समय विक्रमको सातवीं शताब्दी है क्योंकि विक्रम संवत ७०० में उनका बौद्धों के साथ महान् विवाद हुआ था, जैसा कि निम्न पद्मसे स्पष्ट है
विक्रमार्फताब्दीयशतसप्तप्रमानुषि ।
कालेऽकलंकमतिनी बौद्धर्वादो महानभूत् ॥ नन्दिसूत्रकी चूर्णिमें प्रसिद्ध श्वेताम्बर विद्वान् श्राजिनदासगणा महत्तरने सिद्धिविनिश्चय' नामके ग्रंथका बड़े गौरवके साथ उल्लेख किया है। जिसका रचनाकाल शकसंवत् ५९८ अर्थात् वि० संवत् ७३३ है। जैम्रा कि उसके निम्न वाक्यसे प्रकट है
करालः परमाणु बमते माक्षिणागु भटनतिए नन्धपनचूणिः समाप्ता।
चणिका यह समय मुनि जिनविजयने ताइपोय प्रतियों के आधारसे ठीक बतलाया है। विद्यानन्द
तत्त्वार्थश्लोकवातिकके कर्ता आचार्य विद्यानन्दस्वामी हैं। ये महान् श्रुतधर आचार्य थे । दर्शनशास्त्रके पारंगत विद्वान् धे, नैयायिक, वैशेषिक, मीमांसक आदि दर्शनोंका प्रगाढ़ अध्ययन आपने किया था। आपके द्वारा निर्मित १, अष्टसहस्री, २ विद्यानन्द महोदय, ३. आप्तपरीक्षा, ४. प्रमाणपरीक्षा, ५. पत्रपरीक्षा, ६ सत्वशासनपरीक्षा और ७. तस्वार्थश्लोकवार्तिक संथ उपलब्ध है। आपका समय शक संवत् ६९७ से शक संवत् ७६२ विक्रम संवत् ८२२ से ८९७ तक माना जाता है। बालचन्द्रमुनि
तत्त्वरत्नप्रदीपिकाफे रचयिता थीबालचन्द्र मुनि है। यह नयकोति सिद्धान्तचक्रघर्तीके शिष्य थे। इन्होंने १२२६ विक्रम संवत्के लगभग तत्त्वरत्नप्रदीपिका टीकाको रचना की है। यह टीका कर्णाटकभाषामें है । वालचन्द्र मुनि कन्नडकवि हैं तथा अनेक प्राकृत और संस्कृत ग्रन्योंके टीकाकार है। भास्करनन्दि
सुखायोषवृत्ति के रचयिता भी भास्करनन्दि है। इन्होंने ग्रंपके अन्त में जो प्रशस्ति दो
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तत्वापंसार है उससे यह सिद्ध होता है कि एक सर्वसाधु नामके पुज्य गुरु ये जिन्होंने अन्त में संन्यास धारण कर शुभ गति प्राप्त की थी उनके संन्यासकी विशेषता बतलाते हुए कहा है कि संन्यासके लिये जबसे उन्होंने पर्यङ्कासन बांधा तबसे न थूका, न सोया, न किसीसे बात की, न किसोसे कहा कि तुम आओ, तुम जाओ, म पारीरको खुजाया, न राविको गमन किया, न रात्रिके समय किसीको जागने दिया, न स्वयं जगाया और न झुके 1 उन्हीं सर्वसाधु गुरुके जिनयन्द्र नामफे शिष्य थे । जो निर्मल सम्यग्दृष्टि थे, सिद्धान्त के पारगामी थे तथा चारित्ररूपी अलंकारसे अलंकृत थे। उन्हीं जिमचन्द्र के शिष्य भास्करनन्दि थे। उन्होंने यह सुखबोध टीका लिखी है'। इस तरह भास्करनन्दिके गुरुका उल्लेख तो प्राप्त है परन्तु वे किस समय हुए इसका उल्लेख प्राप्त नहीं हुआ। तत्वार्थसूत्रको प्रस्तावनामें उसके संपादक श्री पं० शान्तिराजजीने आशंसा प्रकट की है कि श्रवणवलगोलामें स्थित ६९ वें शिलालेख में द्वितीय माघनन्दिके बाद एक जिनचन्द्राचार्यका उल्लेख किया गया है संभवतः भास्करन्दि उन्हीं जिनचन्द्र के शिष्य है। इतिहासज्ञ विद्वान् माषनन्दी द्वितीयका काल १२५० ई. औकते हैं अत. बिनचन्द्रका समय १२७५ ई० होगा और उनके शिष्य भास्करनन्दिका समय १३०० ई. होगा। परन्तु यह एक संभावनामात्र है।
जनसंदेशक शोक १९ में प्रकाशित श्री पं० मिलापचन्द्रजी कटारया केकड़ी के 'भास्करनन्दि और श्रीपालसुत्त हड्ता' शीर्षक लेखसे यह भो प्रतीत हया है कि भास्करनन्दिने अपनी सुखबोधटीकामै श्रीपालसुस्त डड्डाके संस्कृत पद्यमय पञ्चसंग्रह के अनेक पर उद्धृत किये है । यथा
द्विकपोताथ कापोता नौले नीला च मध्यमा ।
नीलाकृष्णे , कृष्णातिकृष्णा रत्नप्रभाविषु ॥ १९८ ॥ पं० सं० इस पद्यको भास्करनन्दिने तत्वार्थ सूत्रके तृतीयाध्यायके तृतीय सूत्रको टीकामें उद्धृत किया है। इसीप्रकार चतुर्याध्यायके सूत्र २ को टीकामें निम्नाङ्कित श्लोक उद्धृत किये है
१. नो निष्ठीवेन्न शेते वदति घन परं हमे हि माहीतु जातु नो कण्डूयेत गाव नजति न निशि नोट्टयेदा न दत्ते ।
नावष्टम्नाप्ति किञ्चद्गुणविधिरिति यो बद्धपर्ययोगः
कृत्वा संन्यासमन्तै शुभगतिरभवत्सर्वसाघु. स पूण्यः ।। तस्यासीत्सुबिशुनदृष्टिविभवः सिद्धान्तपारंगतः शिष्य: श्रीजिनम्वन्द्र नामकलितश्चारित्रभूषान्धितः ।
शिष्यो भास्करनन्दिनामविबुषस्तस्याभवत्तत्त्ववित् । तेनाकारि सुखादिवोपविषया तत्वार्थवृत्तिः स्फुटम् ॥
-प्रशस्ति
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प्रस्तावना
लेण्या योगप्रवृत्तिः स्यात्कषायोदयरजिता । भावसो व्यसोऽङ्गास्यविः षोडोभयो तु सा ॥ १८४ ॥ षडलेश्याङ्गा मतेऽन्येषां ज्योतिष्का भौमभावनाः ।
कापोतमुद्रगोमूत्रवर्णलेश्यानिलागिनः ।। १९० ॥ इस इलोकफो भास्फरनन्दिने 'तदुक्तं सिद्धान्तालापे' इन शब्दोंके साय उद्धृत किया है। इसी प्रकार डड्ढाने मी 'इति सिद्धान्तालापे' ऐसा लिखा है ।
लेश्याश्चतुर्ष षट् षट् व तिस्त्रस्तिस्त्रः शुभास्त्रिषु । गुणस्थानेषु शुक्लका षटसु निर्लेश्यमन्तिमम् ॥ १९५ ।। आद्यास्तिस्रोऽप्यपर्याप्तेश्वसंलपेयाब्बजीविषु । लेश्याः क्षायिकसष्टौ कापोता स्माजघन्यका ।। १९६ ।। षण नतिर्थक्षु तिस्रोग्यास्तेष्वसंख्यातजीविषु ।
एकाक्षविकलासंशिष्याचं लेझ्यात्रयं मतम् ।। १९७ ॥ इसी तरह चतुर्थाध्यायके २२वें सूत्रमें भी निम्नलिखित दो पद्य उद्धत किये है
सौधर्मशानयोः पोता पीतापने द्वयोस्ततः । कल्पेषु षट्स्वतः पद्या पपाशुषले ततो द्वयोः ।। आनतादिषु शुक्लातस्त्रयोदशसु मध्यया।
चतुर्दशसु सोत्कृष्टानुदिशानुप्तरेषु च ।। इन अवतरणोंसे यह सुसिद्ध है कि भास्करनन्दि, डढासे पीछे हए है । भारतीय ज्ञानपोठ वाराणसीसे प्रकाशित पञ्चसंग्रहमें प्राकृत पंच संग्रह सुमति कौतिकृत संस्कृतटोकाके साथ छपा है । यह संस्कृत टीका सुमतिकोतिने वि० सं०१६२० में बनाई है। पश्चसंग्रहके संपादक श्रीमान पं० हीरालालजी शास्त्रीने उसकी प्रस्तावनामें लिखा है कि संदृष्टियोंकि मिलानसे प्रतीत होता है कि श्री हड्ढापर सुमतिकी तिकी संस्कृतटीकाका प्रभाव मालूम होता है। इससे सिद्ध होता है कि भास्करनन्दिका समय डड्वासे परवर्ती है । परन्तु यह निर्णायक अभिमत नहीं है क्योंकि इसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि संस्कृत टीकाकार इड्डासे प्रभावित हों । भास्करनन्दिका बनाया हुआ एक 'ध्यानस्तय' नामका ग्रंथ भी है जो १०. श्लोक प्रमाण है तथा जैनसिद्धान्तभास्कर भाग १२ किरण २ में प्रकाशित हुआ है। इसको प्रशस्तिके अन्तिम तीन श्लोक तत्त्वार्थसूत्रकी प्रशस्तिसे प्रायः मिलते-जुलते हैं। श्रुतसागर
तत्त्वार्थवृत्तिके कर्ता श्रोश्रुतसागरजी मूलसंघ सरस्वतीगच्छ और बलात्कारगणम तुए हैं। इनके गुरुका नाम विद्यानन्दी था। इन्होंने अपनैको बह्म श्रुतसागर या देशति श्रुतसागर लिखा है। विद्यानन्दी देवेन्द्रकोसिके और देवेन्द्रकोति पयनन्दोंके शिष्य एवं
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तत्त्वार्थसार उत्तराधिकारी थे। विशानन्दी के बाद मल्लिभूषण और उनके बाद लक्ष्मीचन्द्र भट्टारक हुए । लक्ष्मीचन्द्र गुर्जर देशो सिंहासनके भट्टारक थे । श्रुतसागर संभवतः पट्टपर अधिछित नहीं हुए। यह बहुश्रुत विद्वान थे। आपके बनाये हुए ग्रन्थों में कुछ के नाम इस प्रकार है
१. यशस्तिलाचम्विका २. तत्त्रावृत्ति ३.औदार्यचिन्तामणि ४. तत्त्वत्रयप्रकाशिका ५. जिनसहस्रनामटीका ६. महाभिषेकटीका ७. षट्प्राभृतटोका। इनके सिवाय व्रतकथाकोप आदि अनेक ग्रन्थ है । आप १६ वीं शताब्दीके विद्वान् है।' अमृतचन्द्र सूरि
तत्त्वार्थसारके कर्ता श्री अमृतचन्द्र सुरि हैं। यह संस्कृत भाषाके महान विद्वान तथा अध्यात्मतत्त्रक अनुपम ज्ञाता थे । कुन्दकुन्द स्वामी के समयसार, प्रवचनसार और पञ्चास्तिकाय ग्रन्थोंपर पाण्डित्यपूर्ण भाषा, टीकाएँ लिखकर इन्होंने कुन्दकुन्दस्वामीके शार्टको पकट मिशा है तथा उनकी निम्मत पताको पुनरुज्जीवित किया है । अमृतचन्द्रस्वामी जहाँ कुन्दकुन्दस्वामीके निश्चयनयप्रधान ग्रन्थों की व्याख्या करते हैं वही वे उन व्याख्या ग्रंथोंके प्रारम्भमें ही अनेकान्तका स्मरणकर पाठकोंको सचेत करते हैं कि अनेकान्त ही जिनागमका जीव-प्राण है-उसके विना यह निर्जीव-निष्प्राण हो जाता है। समयसारके प्रारम्भमें ही आपने लिखा है
अनन्तधमणस्तत्त्वं पश्यन्ती प्रत्यगात्मनः ।
अनेकान्तमयी मूतिनित्यमेव प्रकाशाताम् ।। अर्थात् जो अनन्त धर्मोसे युक्त शुद्ध आत्माके स्वरूपका अवलोकन करती है ऐसी अनेकान्तरूप मूर्ति नित्य ही प्रकाशमान हो । प्रवचनसारके प्रारम्भमें लिखा है
हेलोल्लुप्तं महामोहतमस्तोमं जयस्यदः ।
प्रकाशयजगत्तत्त्वमनेकान्तभयं मह ॥ अर्थात् जिसने महामोहरूप अन्धकारके समूहको अनायास ही लुप्त कर दिया है तथा जो जगस्के तत्वको प्रकाशित कर रहा है ऐसा यह अनेकान्तरूप तेज जयवंत प्रबर्त रहा है। पञ्चास्तिकायके प्रारम्भमें कहा है
दुनिवारनयानीकविरोषध्वंसनौषधिः । ___स्यात्कारजीविता जीयाजमी सिद्धान्तपतिः ।। अर्थात् जो दुनिबार नमसमूहके बिरोधको नष्ट करने के लिये औषवस्वरूप है ऐसी, स्यात्कारसे जीवित जिनेन्द्र भगवानकी सिद्धान्तपद्धति सदा जयवंत रहे ।
१. देखो, 'जनसाहित्य और इतिहास' वितीय संस्करण पृष्ठ ३७५ -
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प्रस्तावना
यही नहीं, समयसारकी व्याख्याके अन्त में स्याद्रादाधिकार, प्रवचनसारके अन्त में स्थाहादायीन ४७ शक्तियों का निरूपण तथा पञ्चास्तिकायके अन्त में ग्रन्थ-तात्पर्य के रूपमें निश्चयाभास, व्यवहाराभास और उभयाभासोंका वर्णन कर स्वादादकी शैलीसे उनका समन्वय भी किया है।
कुन्दकुन्दस्वामीके अन्योंकी टीका लिखने के बाद पुरुपार्थसिद्ध घुयाय ग्रन्यको रचना करते हुए प्रारम्भ में ही उन्होंने अनेकान्तका स्मरण किया है
परमागमस्य जीर्थ निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् ।
सफलमयविलसिताना विरोषमधनं नमाम्यनेकान्तम् ।। अर्थात जो परमागमका जीव—प्राण है, जिसने जन्मान्य मनुष्योंके हस्तिविधानको निषिद्ध कर दिया है और जो समस्त नयविलासोंके विरोधको नष्ट करनेवाला है उस अनेकान्तको मैं नमस्कार करता हूँ।
अन्मान्य मनुष्योंके हस्तिविधानके निषेधका वर्णन करते हुए उन्होंने 'षडन्धा' इस नामसे प्रचलित निम्नाङ्कित प्राचीन कालको ओर पाठकोंका ध्यान आकृष्ट किया है
पुरा षडन्धाः संभूय गजं जातं समुत्सुकाः । प्राप्य हास्तिपकं प्रोचुः सखे पाय नो गजम् ॥ १॥ कोवृशोऽसौ गजो जन्तुर्भहत् तत्र कुन्तलम् । पुरतो वर्तते सोऽयं स्वरं पश्यन्तु सोऽब्रवीत् ॥ २॥ शुण्डां धृत्वा गजस्याथ प्रथमो मुवितोऽवदत् । गजरुपमहो जातं भुजङ्गम समो गजः ॥३॥ परामुश्य द्वितीयस्तु विशालमुवरं ततः ।। अवङ्गितिरूपो हिं गमो भवति निश्चितम् ।। ४ ॥ तृतीयो गजपावं तु वृत्या गर्वथुतोऽववत् । गजः सर्पो न भित्ति; स्तम्भरूपो गजो ह्ययम् ॥ ५ ॥ कर्ण तु व्याततं श्रुत्वा चतुर्थोऽन्धोऽववत्तदा । व्यजनेम समो हस्ती शङ्का मात्र कामन ॥ ६ ॥ रख तोक्षणं करे धृत्वा पञ्चमी विस्मितोऽवदत् । न स्तम्भो व्यजनं नैव शूलरूपो गजो ध्रुवम् ॥ ७॥ लागलं करिणो धुत्वा षष्ठस्तेषु ततोऽशवीत् ।
रज्जुरूपो गजो मूढाः सत्यं जानीय नो कथम् ।। ८ ।। अर्थात पहले कभी हाथोकी जानने के लिये उत्सुक हर छह अन्धे मिलकर महावतके पास गये और बोले, मित्र, हम लोगोंको हामी दिखलाओं। वह हाथी नामका जन्तु फैसा होता है, इस विषय में हमको बड़ा कुतूहल है । महायतने कहा कि वह हापी सामने विद्यमान है । आप लोग अपनो इच्छानुसार देख लें।
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तत्त्वार्थसार
तदनन्तर पहला अन्धा हाथीकी सूँड पकड़कर प्रसन्न होता हुआ बोला - अहो, मैंने हाथी जान लिया, वह सांपके समान होता है । तदनन्तर दूसरे अन्धेनं विशाल पेटका स्पर्श कर कहा कि हाथी निश्चित हो दीवालरूप होता है । तीसरं अन्धेने हाथीका पैद पकड़कर बड़े गर्व से कहा कि हाथी न तो सर्वके समान है और न दीवाल के सदृश है, यह तो खम्भा के समान है। चौथे अन्धेने फैले हुए कानको पकड़कर कहा कि हाथी पद्धा के समान होता है, इसमें कोई शङ्का नहीं करना चाहिए। पांचवें अन्धेने तीक्ष्ण दाँत हाथ में लेकर माश्वर्य चकित हो कहा कि हाथी न खम्भा के समान है और न पङ्खा के समान है किन्तु शूलके समान है। पश्चात् छटवा अन्धा हाथो की पूंछ पकड़कर बोला कि अरे मूर्खो ! हाथी सचमुच ही रस्सीके समान होता है तुम लोग इस सचाईको क्यों नहीं जानते हो ।
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जिसप्रकार उक्त अंधे पुरुष, हाथोंके एक-एक अंगको लेकर उसे पूरा हाथी मानते हैं उसी प्रकार एकान्तवादी मनुष्य वस्तुके एक-एक धर्मको लेकर उसे ही पूरी वस्तु मानते हैं। परन्तु उनका ऐसा मानना भ्रम है। इसलिये अनेकान्त, जन्मान्ध मनुष्यों के हस्ति विधानके समान एकान्तवादको निषिद्ध करता है ।
उमास्वामी महाराजने 'प्रमाणनयैरधिगमः' सूत्रकी रचनाकर यह बताया है कि जीवादि तत्वों का ज्ञान प्रमाण और नयोंके द्वारा होता है। प्रमाण वह है जो कि पदार्थ में रहनेवाले परस्पर विरोधी धर्मोको एक साथ ग्रहण करता है और नय वह है जो कि पदार्थमें रहनेवाले परस्पर विरोधी धर्मोसे एकको प्रमुख और दूसरेको गौण कर विचक्षानुसार ग्रहण करता है । नयोंके द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इसतरह दो भेद हैं। अथवा अध्यात्मभाषा में निश्चय और व्यवहार इस प्रकार दो भेद हैं । निश्वयत्तय वस्तुके स्थापित - स्वनिमित्तक शुद्ध स्वरूपको ग्रहण करता हूँ। जैसे जीब ज्ञानदर्शनादिगुणोंने तन्मय एक खण्ड द्रव्य है। और व्यवहारनय वस्तुके पराश्रित — परके निमित्त होनेवाले भावको ग्रहण करता है, जैसे जोव क्रोधादिमान् है । यद्यपि निश्रयनय वस्तुके शुद्धस्वरूपका प्रस्थापक होने से भूतार्थ – सत्यार्थ है और व्यवहारनय अशुद्धस्वरूपका प्रख्यापक होनेसे अभूतार्थअसत्यार्थ है तथापि वस्तुकी निरूपणा में दोनों नयोंको आवश्यकता होती है क्योंकि नयोंका उपयोग प्रतिपाद्य --- शिष्यको योग्यता के अनुसार होता है। इसलिये अमृत चन्द्रसूरिने पुरुषार्थसिद्धमुपायमें कहा है
tयवहारनिश्चय यः प्रबुध्य तत्त्वेन भवति मध्यस्थः ३
प्राप्नोति वेशनायाः स एव फलमविकलं शिष्यः ॥ ८ ॥ जो शिष्य व्यवहार और निश्चयको यथार्थरूपसे जानकर मध्यस्थ होता है अर्थात् दोनोंमेंसे किसी एक पक्षको नहीं खींचता है किन्तु तत्त्वकी निरूपणाके लिये दोनोंको आ समझता है वही विषय देशनाका पूर्ण फल प्राप्त करता है ।
प्रतिपाद्यकी योग्यता अनुसार नयोका प्रयोग होता है, इसका निर्देश कुन्दकुन्द - स्वामीने समयसारकी निम्न गाथामें बड़े सुन्दर ढंगसे किया है ।
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प्रस्तावना
सुद्धो सुद्धादेलो गायत्रो परमभावदरिसीहिं
यवहारवेसिया पुण जे दु अपरमे विदा भावा ।। १३ ।।
परमभाव — उत्कृष्ट शुद्धस्वभावका अवलोकन करनेवाले पुरुषोंके द्वारा शुद्धस्वरूपका वर्णन करनेवाला शुनय - निश्चयनय जातत्र्य है और जो अपरमभावमें स्थित हैं के महानयसे उपदेश देने के योग्य हैं ।
इस गाथा की आत्मख्याति टीका में श्री अमृत चन्द्रस्वामीने सुवर्णका दृष्टन्त देकर वस्तुस्वरूपको सरलता से समझाया है। इस तरह हम अमृतचन्द्रस्वामीको तस्वनिरूपणकी दिशामें अत्यन्त जागरूक पाते हैं ।
आपके द्वारा रचित निम्नांकित पाँच ग्रन्थ उपलब्ध है -१ समयप्राभृतटीका, २ प्रवचनसारीका ३ पास्तिकायटीका, ४ पुरुषा सिद्धघुपाय और ५ तत्त्वाचार | प्रारम्भके तीन ग्रन्थ कुन्दकुन्दस्वामी के समयसार, प्रवचनसार और पञ्चास्तिकाय इन तीन ग्रन्थों की टीकारूप है । तीनों ग्रन्थों की टीकाओं में आपने जिस उच्चकोटिकी का प्रयोग किया है वह साधारण विद्वानोंके बुद्धिगम्य नहीं है । समयसारकी टोका में तो गद्यसे अतिरिक्त आपने कलश-काव्यों की भी रचना की है जो कि बहुत ही भावपूर्ण और प्रेरणाप्रद है |
I
पुरुषार्थसिद्धघुपाय २२६ श्लोकोंका प्रसादगुणोपेत एक स्वतंत्र ग्रन्थ है, जिसमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका सुन्दर रीतिसे वर्णन किया है। अहिंसाधर्मका जैसा वर्णन पुरुषार्थसिद्धयुपाय में उपलब्ध है वैसा हम अन्यत्र नहीं पाते हैं ।
तत्वार्थसार तत्त्वार्थ सूत्र के आधारपर पल्लवित और विकसित रचना है। तस्वार्थसूत्रका यथार्थ नाम तत्त्वार्थ ही है क्योंकि तस्वार्थराजवार्तिक, तत्त्वार्थ लोकवार्तिक, तत्त्वार्थवृत्ति आदि नामोंसे तत्त्वार्थ नामकी ही पुष्टि होती है । सूत्रमय होनेमे इसे तस्वार्थ सूत्र कहा जाने लगा। प्रकृत ग्रन्थके 'तत्त्वार्थसार' इस नामसे भी यही नाम ध्वनित होता है अर्थात् अमृतचन्द्रस्वामीका यह ग्रन्थ तत्त्वार्थका सार ही है। इसमें तत्वार्थ सूत्रमें प्रतिपादित समस्त तस्योंका सार तो संगृहीत है ही उसके अतिरिक्त पंचसंग्रह, सर्वार्थसिद्धि एवं राजवातिक्रमें प्रतिपादित कितनी ही विशिष्ट बातोंका भी संकलन है ।
अमृतचन्द्रसूरिका आशाघरजीने अपने अनगारधर्मामृतकी भव्यकुमुदचन्द्रिका टीकामें दो स्थानोंपर ठक्कुर नामसे उल्लेख किया है 1 यथा
१ एतदनुसारेणव टक्कुरोऽपीदमपाठीत् — लोके शरस्त्राभासे समयाभासे च देवताभासे । पृ० १६०
२ एतच्च विस्तरेण ठक् कुरामृतचन्द्रसूरिविरचितसमयसारटीकायां द्रष्टव्यम् । पृ० ५८८
यह ठकुर या ठाकुर पद जागीरदारों और ओहदेदारोंके लिये प्रयुक्त होता था । इससे इनको गृहस्थावस्थाको संपन्नता या प्रभुता सूचित होती है ।
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तस्वार्थसार
अमृतमन्द्रसूरि किसके शिष्य थे और किस गुरुपरम्पराके थे, आदिका उल्लेख आपने अपने किसी भी ग्रंथमें नहीं किया है। ये बड़े निलित व्यक्ति थे। जहाँ हम कितने ही ग्रंथकारोंको बड़ी-बड़ी प्रशस्तियों एवं पुष्पिकावाक्यों के रूपमें आत्मप्रशंसाका उद्घोषक पाते हैं वहाँ अमृत चन्द्रसूरि यह भाव प्रकट करते है कि नाना प्रकारके दोंसे पद धन गये, पदोंसे वाक्य बन गये और वाक्योंसे यह बम बन गया, इसमें हमास कमी फर्तत्व नहीं है।' इन सब कारणोंसे इनके सही समयका निर्णय अनिश्चित रूप में चला आ रहा है परन्तु पं. परमानन्दजो शास्त्रीने अनेकान्त वर्ष ८ किरण ४.५ में एक महत्त्वपर्ण सूचना दी है कि धर्मरत्वाकरके कर्ता जयसेन ने अपने धर्मरत्नाकर में अमसचन्द मुरिके परुषार्थसिद्धपायसे ५९ पद्य उद्धत किये हैं। धर्मरत्नाकर एक संग्रहपन्थ है, जिसे अन्धकारने अपने तथा दूसरे अनेक ग्रंथों के पद्योंका संग्रह कर मालाकी तरह रचा है और इसकी सूचना उन्होंने ग्रंथके अन्तिम अवसरमें निम्न प्रकार दी है
'इत्येतरुपनीलचित्र रचनः स्वरम्यदायरपि
भूतोऽवद्यगुणस्तथापि रचिता मालेव सेयं कृतिः । भावसेनके शिष्य जयसेन लाडबागड़संघके है तथा इन्होंने धर्मरत्नाकरको रचना १०५५ वि० संमें पूर्ण बी थी, ऐसा उसकी प्रशस्तिसे स्पष्ट है
वाणेन्द्रियग्योमसोममिसे संवत्सरे शुभे ।
__ ग्रन्थोऽयं सिद्धतां यातः सकलीकरहाटके ।। अर्थात् सकलीकरहाटक नगर में १०५५ शुभ संवत्में यह ग्रन्थ पूर्णताको प्राप्त हुआ।
इस उल्लेखसे तथा जनसंदेगके शोधांक ५ में प्रकाशित श्री पं० कैलाशचन्द्रजी के 'कुछ आचार्योक कालबामपर विचार' शीर्षक लेखसे सिद्ध होता है कि श्रीअमृतचन्द्रमूरि
१. वर्णैः कृतानि यित्रैः पदानि तु पदैः कृतानि वाक्यानि । वाक्यः कृतं पवित्र शास्त्रमिदं न पुनरस्माभिः ।। पु० सि. वर्णाः पदानां कर्तारो वाक्यानां तु पदावलिः । वाक्यानि चास्य शास्त्रस्य कतणि न पुनर्वयम् ।। त० सा० स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वाख्या तैयं समयस्म शब्दैः । स्वरूपगुप्तस्य न किंचिदस्ति कर्तव्यमेवामृतचन्द्रसूरेः ।। स० सा, पंचास्तिकाप व्याख्येयं किल विश्वमात्मसहितं व्याख्यातु गुम्फे गिरी। व्याख्यातामृतचन्द्रसूरिरिति मा मोहाज्जनो वल्गतु । वल्गत्वद्य विशुद्धबोषिकलपा स्यादादविद्याबलात् लम्बेक सकलात्मशाश्वतमिदं स्वं तत्त्वमव्याकुलः ।। प्र० सार
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प्रस्तावना
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१०५५ वि० सं०से पूर्ववर्ती है। साथ ही तत्त्वानुशासनको प्रस्तावना पृष्ठ ३३ पर श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने अमृतचन्द्ररारिका समय दशवीं शताब्दीका उत्तराचं निश्चित करते हुए पट्टावली में उनके पट्टारोहणका समय जो वि. सं. १६२ दिया है उसे ठीक बतलाया है।
अब विचारणीम बात यह है कि तत्त्वार्थसारमें कितने हो श्लोक अमितगतिके संस्कृत पञ्चसंग्रहके छाया-प्रतिच्छायारूप पाये जाते हैं। जैसे
यवनालिमसूररातिमुक्तकेन्द्रसनिभाः । श्रोत्राक्षिप्राणजिम्लाः स्युः स्पर्शनेऽनेकघा कृतिः ॥१४३॥ पंसं. यवनालिमसूरातिमुक्तेन्द्रर्धसमा मात् । श्रोत्राक्षिप्राणजिह्वाः स्युः स्पर्शन नकसंस्थितिः ।। ५० ॥ त. सा: जलूफाशुक्तिशम्बूकगण्ड्रपरकनिकाः जठरकृमिशताधा दीन्द्रिया वेहिनो मताः ।। १४.७ ॥ पं० सं० शम्बूकः शङ्खशुक्तिर्वा गण्डूपवकपदकाः । कुक्षिकृम्यादयश्चते द्वीन्द्रियाः प्राणिनो मताः ॥५३॥ त सा. कुन्थ: पिपीलिका मुभी यूका मत्कुणवृश्चिकाः । मकोटकेन्द्रगोपाद्यास्त्रोन्निया देहिनो मताः ॥१४७॥ पं० सं० कुन्युः पिपीलिका कुम्भी वृश्चिकश्चन्द्रगोपकः । घुणमत्कुणमूकाधास्त्रीन्द्रियाः सन्ति जन्सयः ॥५४॥ त० सा० पतङ्गाः मशका दंशा मक्षिका कोटगर्भुतः । प्रत्तिका चञ्चरीकाधाश्चतुरक्षाः शरीरिणः ।।१४९॥ पं० सं० मथुपः कोटको वंशमशको मक्षिकास्तथा ।
वरटो शलभाद्याश्च भवन्ति चतुरिन्नियाः ।।५५।। त. सा. इसी प्रकार पथिवीके भेद बतलानेवाले श्लोक भो छाया-प्रतिछायारूप है 1 तत्वार्थसारकारके ये इलोक क्या अमितगति के संस्कृत पञ्चसंग्रहसे अनुप्राणित हैं या पश्वसंग्रहके एलोक तत्त्वार्थसारसे अनुप्रापित हैं। पंचसंग्रहके कर्ता अमितगति विक्रमकी ११ वीं शताब्दीके तृतीय चरणके विद्वान् है । तुलनात्मक अध्ययन करनेपर मालूम होता है कि तत्त्वार्थसारके कर्ता अमृत चन्द्र के पुरुषार्थ सिद्ध युपायके कितने ही श्लोकोंसे अस्तिगतिप्रावकाचारके श्लोक अनुप्राणित हैं । अत: अमितगति अमृतचन्द्रसे परवर्ती है, पूर्ववर्ती नहीं । तत्त्वार्थसारके उल्लिखित इलोकोंका सादृश्य अमितगतिके पंचसंग्रहगत श्लोकोंसे जो मिलता है उसका कारण यह है कि ये सभी श्लोक प्राकृतपञ्चसंग्रहके संस्कृत छायारूप है । अमितगतिफे पंचसंग्रहका मूल आधार भी वही प्राकृतपंचसंग्रह है । इन सम
१. देखो, जनसंदेश शोधांक ५ में पं. कैलाशचन्द्रजीका लेख
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तत्त्वार्थसार गाथाओं और तत्त्वार्थसारके इलोकोंका अवतरण मागेके स्तम्भ 'तत्त्वार्थसारका प्रतिपाद्य विषय और उसका मूलाधार' में करेंगे। उससे सिद्ध हो जायगा कि तत्त्वार्थसारके ये श्लोक प्राकृतपंचसंग्रहसे अनुप्राणित है न कि अमितगतिके संस्कृतपंचसंग्रहो । अमितगतिने अपना पनसंग्रह वि० सं० १०७३ में पूर्ण किया है और अमृतरन्द्रका समय विक्रम को १० वीं शताब्दीका उत्तरार्ध है, ऐसा निश्चित समझना चाहिये । तत्त्वार्थसारका प्रतिपाद्य विषय और उसका आधार
(१) प्रथमाधिकारमें तत्त्वार्थसार ग्रंथको अमृत चन्द्रस्वामीने मोक्षका प्रकाश करनेवाला एक प्रमुख दीपक बतलाया है, क्योंकि इसमें युक्ति और आगमसे सुनिश्चित सम्बग्दर्शत, सन्यास या प्रनिगदित किया गया है। सभ्यग्दर्शनादिका स्वरूप बतलाते हुए उन्होंने उनके विषयभूत जीवादि सात तत्त्वोंका विशद वर्णन किया है। उन्होंने कहा है कि जीव, अजीव, आलय, बन्ध, संघर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व है। इनमें जीवतत्त्व उपादेय है और अजीवतत्व हेय है। अजीवका जीवके साथ सम्बन्ध क्यों होता है, इसका कारण बतलानेके लिये आसवका और अजीव का सम्बन्ध होनेसे जीवको क्या दशा होती है, यह बतलाने के लिये बन्धका कथन है। हेग-अजीवतत्वका संबन्ध जीवसे कैसे छुटे, यह बतलाने के लिये संवर और निर्जरा का कथन है और हेय- अजीवका सम्बन्ध छुटनेपर जीवकी क्या दशा होती है, यह बतलाने के लिये मोक्षतत्वका वर्णन है। इन्हीं सात तत्वोंको जानने के लिये उन्होंने नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव ये चार निक्षेप तथा प्रमाण और नयोंका विस्तारसे वर्णन किया है। प्रमाणके वर्णनमें मतिज्ञान थादि पांच सम्यग्ज्ञानोंका विस्तारके साथ निरूपण किया है। प्रथम अधिकारके अन्त में निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान तथा सत्', संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पवहुत्व अनुयोगोंका भी उल्लेख किया है 1 उन्होंने कहा है कि मोक्षमार्गको प्राप्त करनेका इच्छुक मनुष्य नाम, स्थापना, द्रव्य और भावके द्वारा न्यस्त-व्यवहारको प्राप्त एवं स्याद्वादमें स्थित सात तत्वोंके समूह को निर्देशादि उपायोंके द्वारा सबसे पहले जानना चाहिये।
वास्तव में जीवादि तत्त्व ही क्यों, संसारके किसी भो पदार्थको जानने का क्रम निर्देश आदिसे ही शुरू होता है । उदाहरणके लिए किसोके सामने कोई ऐसा पदार्थ रक्खा जावे जिसे उसने आज तक देखा नहीं था। उस पदार्थको देखते हो देखनेवालेके मुखसे सर्वप्रथम यही निकलता है कि यह क्या है ? इस प्रश्नका उत्तर निर्देश देता है अर्थात उस पवार्थका नाम और स्वरूप बतलाता है । देखनेवालेके मुखसे दूसरा प्रश्न यह निकलता है कि यह पदार्थ किसका है ? अर्थात् इसका स्वामी कोन है ? इसका उत्तर स्वामित्व देता है।
१. अथ तस्त्रार्थसारोऽयं मोक्षमार्गकदीपकः ।
मुमुक्षणो हितार्थाय प्रस्पष्टमभिधीयते ॥२॥ त. सा.
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प्रस्तावना
देखनेवालेके मुखसे तोसरा प्रश्न यह निकलता है कि पदार्थ कैसे बनता है ? इसका उत्तर साधन देता है । चौथा प्रश्न निकलता है कि यह पदार्थ कहाँ मिलता है ? इसका उत्तर अधिकरण देता है। पांच प्रश्न होता है कि कब तक मिलता है ? इसका उत्तर स्थिति देती है 1 और रात्री प्रश्न होता है कि यह एक ही प्रकारका है या इसके अन्य प्रकार भी है ? इसका असा विधान देता है।
इसी तरह कपडाका एक व्यापारी कपड़ा खरोदनेके लिये बाजार जाता है। कपड़े की दूकानपर पहुँचते ही उसका सबसे पहला प्रश्न होता है-कपड़ा है क्या ? (सत्) । दुकानमें नमूनाके लिये रखे हुए दो-चार थानोंको देखकर वह दूसरा प्रश्न करता है-- कितना है ? ( संख्या ) । दुकानदार कहता है--बहुत हैं 1 ब्यापारी पूछता है-कहाँ रक्खा है-कपड़ाका क्षेत्र क्या है ? दुकानदार कपड़ेको गोदाममें जाकर माल दिखाता है (क्षेत्र ) । व्यापारी कपड़ेसे भरी हुई गोदाम देखकर पूछता है - भाई यह इतना माल कहासे आता है और कहां खपता है ? दुकानदार कपड़े आने तथा सपने के स्थान बतलाता है (स्पर्शन) । व्यापारो पूछता है कि माल कब तक मिलता रहेगा-दुकान कब तक खुली रहती है ? दुकानदार दुकानका समय बतलाता है ( काल)। व्यापारी पूछता है यदि अभी माल न उठा सवू तो कितने दिन बाद मिले या ? दुकानदार दूसरे माहका कोटा मिलने का समय बताता है। अन्तर ) । व्यापारी पूछता है--कौन माल किस क्लास का है ? दुकानदार कपड़ेको कलास-विशेषता बतलाता है ? (भाव) । व्यापारी इच्छानुसार माल निकलवाकर अलग रखवाता जाता है, पीछे दुकानदार माल संभालकर परचे पर नूद करता है-कौन कपड़ा कितना कम और अधिक है { अल्पबहुत्व )।
इस तरह संसारके प्रत्येक पदार्थ सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहत्यके द्वारा जाने जाते है । वस्तुतः पदार्थोके जानने के उपाय यही है । मोक्षमार्गके प्रकरणमें सद् आदि अनुयोगोंका प्ररूपण मोक्षमार्गके अनुरूप होता है ।
तत्त्वार्थसारका सामान्य आधार उमास्वामी महराजका तत्त्वार्थ सूत्र है और विशिष्ट आषार जहाँ जो होगा उसको चर्चा इसो स्तम्भमें की जाती रहेगी।
(२) द्वितीयाधिकारमें जीवके ओपमिक, क्षायिक, क्षायोपमिक, औदायिक और पारिणामिक इन पाँच स्वतत्वोंका वर्णन जीवका लक्षण बताने के लिये उपयोगका वर्णन किया है। उपयोगके साकार और अनाकारक भेदसे दो भेद बतलाते हुए ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगका वर्णन किया है। पश्चात् जीवके संसारी और मुक्तके भेदसे
दो भेद कर संसारी जीवोंका वर्णन गुणस्थान आदि बीस प्ररूपणाओंके द्वारा किया है। । बान पड़ता है यह सब विषय अमृतचन्द्रसूरिने प्राकृतपश्चसंग्रहसे लिया है क्योंकि
संग्रहकी माथाओके गाय तत्त्वार्थसारके श्लोकोंका अत्यन्त भावसादृश्य है । जैसे
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तत्त्वार्थसार जयगालियामरुरीचंबद्ध अदमुत्तफुल्लतुल्लाई । इपियसंठाणाई फासं पुण गसंठाणं ।। ६६ ॥
यवनालमसूरातिमुक्तेन्द्वर्षसमाः कमात् । श्रोत्राक्षित्राणजिह्वाः स्युः स्पर्शनं नैकसंस्थितिः ।। ५० ।।
___त. सा० अधिकार २ पुढें सुणे सई अपुट्ठ पुण वि परसदे रूवं । फासं रसं च गंषं बद्धं पुठं वियाई ॥ ६८ ॥
पंचसंग्रह रूपं पश्यत्यसंस्पृष्टं स्पष्ट शब्दं शृणोति तु । बई स्पृष्टं च जानाति स्पर्श गन्धं तथा रसम् ।। ४९।।
त. सा० अधिकार २ खल्ला वराड संखा अंश्खणहमरिठगायगंडोला। कुविकिमिसिपिआई या देइविया जीवा ।। ७० ॥
पंचसंग्रह शाम्बका खशक्तिर्वा गण्डपदकपर्वकाः। कुक्षिफूम्यादयश्चते वीन्द्रियाः प्राणिनो मताः॥ ५३ ॥
त० सा० अधिकार ३ कुंथुपिपीलयमंकुविच्छियमूविंचगोकगोम्हीया । उत्तिगमट्टियाई गेया तेईदिया जोबा ॥ ७१ ।।
पंचसंग्रह कुन्थुः पिपीलिका कुम्भो वृश्चिकश्चन्द्रगोपकः । घुणमत्कुणकाद्यास्त्रीन्द्रियाः सन्ति जन्तवः ॥ ५४॥
त. सा. अधिकार २ समसगो य मक्खिय गोमच्छिय भमरकोडमक्कडया। सलहपयंगाईया या चरिबिया जीधा ।। ७२ ॥
पंचसंग्रह मधुपः कोटफो देशमशको मक्षिकास्तथा। यरटो शलभायाश्च भवन्ति चतुरिन्द्रियाः ।। ५५ ॥
___त. सा० अधिकार २ इन्हो संसारी जीवोंका वर्णन करते हुए आपने विग्रहगतिके इषु, पाणिमुक्का, लानलिका और गोमूत्रिका इन चार भेदोंका वर्णन किया है। नौ तथा चौरासी लाख योनियों, उनके स्वामियों तथा कुलकोटियोंका विशद वर्णन किया है। जोवोंकी आयु
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प्रस्तावना
तथा शरीराबगाहनाका वर्णन कर कौन जीव फिस नरक तक आते हैं और वहाँसे आकर वया-क्या होते है यह सब बताया है। इन सबका आधार राजवातिकको निम्न पंक्तियाँ मालूम होती है
'अयोत्पादः व सेवामिति ? अनोच्यते प्रथमायामसंजिन उत्पश्चन्ते, प्रथमाहितीपयोः सरीसृपाः, तिसृषु पक्षिणः, चतसृषूरगाः, पञ्चसु सिंहाः, षट्सु स्त्रियः, सप्तसु मत्स्यमनुष्याः । न च देवा नारका वा नरकेषु उत्पद्यन्ते ।'
ग़जवातिक पृष्ठ १६८ ज्ञानपीठ शर्मामनिनो यान्ति वंशान्तादच सरीसृपाः । मेघान्ताश्च विहङ्गाश्च अञ्जनान्ताश्च भोगिनः ॥ १४६ ॥ तारिष्टां च सिंहास्तु मघन्यतास्तु योषितः । नरा मत्स्याश्च गच्छन्ति माधवी ताश्च पापिनः ॥ १७ ॥
त० मा अधिकार २ इसी जीवतत्त्वका वर्णन करते हुए उसका निवास बतलान के लिये अपोलोक, मध्यलोक और ऊर्वलोकका भी वर्णन किया है । इस तरह तत्त्वार्थसार के द्वितीयाधिकारमै तत्त्वार्थसत्रके द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अध्यायका संपूर्ण त्रिपय संचालित किया गया है सथा उससे संबद्ध अन्य विषय भी सर्वार्थ सिद्धि राजातिको लिये गये हैं।
(३) तृतीयाधिकारमें अजीवतत्वका वर्णन करने द्वारा प्रसंगोपात्त छह द्रव्यों का स्वरूप, उनके प्रदेश, कार्य, पुद्गलोंके भेद, अणु ओर स्कन्धका स्वरूप, पुद्गलद्रव्यको पर्याय तथा स्कन्ध बनने की प्रक्रियाका वर्णन किया गया है। इसमें तत्त्वार्थ नब के पञ्चमाध्यायको आधार बनाया गया है । विशद विवेचना के लिये पूज्यपादस्वामी को सर्वार्षसिद्धि टीकाका भी आधार लिया गया है ।
(४ } चतुर्थाधिकारमें आस्रवतत्त्वका वर्णन है। इसके लिय तत्त्वार्थस्त्रके पष्ठ और सप्तम अध्यायको आधार बनाया गया है। ज्ञानावरणादि कमोंके जो आलव सुत्रकारने बतलाये है उनका व्याख्यान करने के बाद अकलं कस्वामीने तत्त्वार्थ राजवातिकमें सूत्रोपात्त कारणोंके सिवाय अन्य जिन कारणोंका विस्तारसे उल्लेख किया है उन कारणों को तत्वार्थसारकारने भो अंगीकृत किया है जिससे विषय अत्यन्त स्पष्ट हो गया है। शुभास्त्रबके वर्णनमें व्रतोंका भी वर्णन आ गया है ।
(५) पश्चमाधिकारमें बन्धतत्वका विस्तारसे वर्णन किया गया है और उसका बाधार तस्वार्थसुत्र के अष्ठमाध्यायको बनाया गया है। इसमें कोको मूल तथा उत्तर प्रकृतियों के नाम, लक्षण तथा उनको स्थिति आदिका अच्छा दिग्दर्शन हुआ है।
(६) षष्ठाधिकारमें संवरतत्वका वर्णन है । इसके लिए तत्त्वार्यसूत्रके नवमाध्याय
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রাখাই सम्बन्धी प्रारम्भिक भागको आधार बनाया गया है । उसमें संवरका स्वरूप तथा उसके कारणभूत गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चरित्रका वर्णन किया गया है ।
(७) सप्तमाधिकारमें निर्जराका वर्णन किया गया है और उसका आधार तत्त्वार्थसूत्रके नवमाध्यायके उत्तरार्धको बनाया गया है। इसमें निर्जराके भेद तथा निर्जराके कारणभूत तपोंका विस्तारसे वर्णन किया गया है।
(८) अष्टमाधिकारमें मोक्ष का वर्णन है तथा उसका आधार तत्वार्थसूत्रके दशमाहारको बनाया गया। इसमें सोशा लक्षण तथा उसकी प्राप्तिके क्रमका बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है। इस प्रकरणने अमृत चन्द्र स्वामी ने राजवातिकके कितने ही वातिकों को श्लोकोंका रूप देकर अपने ग्रंथका अंग बना लिया है । जैसेभावभावादन्ताभाव इति चेत्, न दृष्टत्वावन्त्यबीजवत्
ता, रा. वा. पृष्ठ ६४१ आधभावान भावस्य कर्मबन्धनसन्ततेः । मन्ताभाषः प्रसज्येत सृष्टत्वादन्ययोजयत् ॥६॥
त. सा. अघि. ८ यही नहीं, राजवातिककारने 'उक्तं च' कहकर
वग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नांकुरः।
कर्मबोजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्कुरः ।। तत्त्वाधिगमभाष्यके इस पाको उद्धृत किया है। उसे तत्वाधंसारमै ग्रन्थका ही अंग बना लिया है या फिर प्रेसकोपी बनाते समय तत्वार्थसारमें 'उक्तंच' पाठ लिखनेसे रह गया है।
बन्यस्याव्यवस्था अश्वादिवदिति चेत्, न, मिथ्यादर्शनाधुच्छेवे कार्यकारणनिवृतः ॥ ४ ॥
त. रा. वा. पृष्ठ ६४२ अव्यवस्था न बन्यस्य गवादीनामिवात्मनः । कार्यकारणविचछेवान्मिथ्यात्वाविपरिक्षये ॥८॥
त. सा० अघि ८ पुनबन्धप्रसङ्गो जानतः पश्यतश्च कारुण्याविति चेत्, न, सर्वास्त्रवपरिक्षयात् ।।५॥
त० रा. वा. पृष्ठ ६४३ जानतः पश्यतश्चोध्वं जगरकारुम्मसः पुनः । तस्य वन्यप्रसङ्गो न सस्त्रियपरिक्षयात् ॥९॥
त. सा. अधिः ८
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अकस्मादिति चेत्, अनिर्मोक्षप्रसङ्गः ।
त. रा. वा. पृष्ठ ६४३ अकस्माच्च न बन्धः स्यादनिर्मोक्षप्रसङ्गतः । बन्धोपपत्तिस्तत्र स्यान्मुक्तिप्राप्तेरनन्तरम् ॥१०॥
त० सा० अधि०८ मात्वा त्,ि न, भारत्वात् ।।७।।
त० रा. वा० पृष्ट ६४३ पातोऽपि स्थानवत्वान्न तस्य नासयतस्वतः । थानवाघानपात्रस्य प्रपातोऽयो प्रवं भवेस् ॥ ११ ॥
तसा० अधि०८ गौरवाभावाच्च ।। ८ ॥
त० रा. वा. पृष्ट ६४३ तथापि गौरवाभावान्न पातोऽस्य प्रसज्जते । वृन्तसम्बन्धविच्छे पतत्याम्रफलं गुरु ॥१२॥
तः सा० अघि०८ परस्परोपरोष इति चेत्, न, अवगाहनशक्तियोगात् ॥ ९॥
त. रा. वा० पृष्ठ ६४३ अल्पक्षेने तु सिद्धानामनन्तानां प्रसज्यते । परस्परोपरोधोऽपि नावगाहनशक्तितः ।। १३ ।। नानाबीपप्रकाशेषु मूप्तिमरस्वपि दृश्यते । न विरोधः प्रदेशेऽल्पे हन्ताभूतषु किं पुनः ।। १४ ।।।
त: सा. अत्रि०८ अमाकारत्वारभाव इति चेत्, न, अतोतानन्तरशरोरानुविधायित्वात् ।। १२ ॥
त. रा. वा पृष्ठ ६४३ आकाराभावतोभावो न च तस्य प्रसज्यते । अनन्तरपरित्यक्तशरीराफारधारिणः ।। १५ ।।
तः सा अघि० ८ शरीरानुविधापिले तदभावाविसर्पणप्रसङ्ग इति चेत्, न, कारगाभावात् ।। १३ ॥
तः रा० वा० पृष्ठ ७४३ शारीरानुविधायित्वे तदभावाद्विसर्पणम् । लोकाकाशनमाणस्य तावनाकारणत्वतः ॥ १६॥
त. सा० अघि०८ नामकर्मसंबन्धात संतरणविसर्पणधर्मत्वं प्रदीपप्रकाशयत् ॥ १४ ॥
त. रा० बा० पृष्ट ६४३
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तत्त्वार्थसार शराबचन्द्रशालाविद्रव्यावष्टम्भयोगतः । अल्पो महांश्च दीपस्य प्रकाश जायते यथा ।। १७ ।। संहारे च विस च तथात्मानात्मयोगप्तः । तबभावात्तु मुक्तस्य न संहारविसपणे ॥ १८ ॥
तसार अधि० ८ दृष्टस्थाच्च निगलादिवियोगे देवदसाद्यवस्थानवत् ॥ १८ ॥
त० रा. वा०प० ६४४ कस्यचिन्छृङ्खलामोक्ष तत्रायस्थानदर्शनात । अवस्याने न मुक्तानामुर्चवज्यात्मकस्वत: ।। १९ ॥
त स्रा० अघि ८ तत्वार्थसूत्र दशमाध्यायके अन्तिम सूत्रमें राजवातिककारने 'उ च' कहकर जो ३३ श्लोक उद्धृत किये हैं उनमें प्रारम्भके १७ श्लोक-सम्यक्त्वज्ञानचारित्रसंयुक्तस्यास्मनो मृशम्-तत्त्वार्थसारके अङ्ग धन गये हैं। ये सब श्लोक कुछ हेरफेरके साथ वाचक उमास्वातिके तत्त्वार्याधिगमभाष्य में भी पाये जाते हैं। जान पड़ता है अकलक स्वामीने 'उक्तं च' कहकर उन्हें अपने ग्रन्थमें उद्धृत किया है और उनमेंसे १७ श्लोकोंको तत्वार्थसारकारने अपने ग्रन्थका अङ्ग बना लिया है। १७ हो नहीं, बोच में 'जानावरणहानान्ते केवलज्ञानशालिनः । दर्शनावरणच्छेदाध केवलदर्शन: ॥' इत्यादि । श्लोक अग्य लिखकर उसके बाद तादात्म्यावृपयुक्तास्ते केवलज्ञानदर्शने'-आदि १२ श्लोक और भी तत्त्वार्थसारके अङ्ग बन गये है। ये ३३ श्लोक जयधवलामें भी पाये जाते हैं, अतः फिससे किसने लिये, इसका निर्णय अपेक्षित है।
(१) नयमाधिकारमें ग्रन्थका उपसंहार करते हुए कहा गया है कि प्रमाण, नय, निक्षेप तथा निर्देश आदिके द्वारा सात तत्त्वोंको जानकर मोक्षमार्गका आश्रय लेना चाहिये । निश्चय और व्यवहारके भेदो मोक्षमार्ग दो प्रकारका है। उनमें निश्चयमोक्षमार्ग साध्य है और व्यवहार मोक्षमार्ग साधन है । अपने शुद्ध आत्माका जो श्रद्धा, ज्ञान तथा उपेक्षण-पागोषसे रहित प्रवर्तन है वह निश्चयमोलमार्ग है और पर आत्माओंका जो श्रद्धान आदि है वह व्यवहारमोक्षमार्ग है 1 व्यवहारमोम्पमार्ग अन्त में चलकर निश्चयमोक्षमार्गमें विलीन हो जाता है और उससे साक्षात् मोक्षको प्राप्ति होतो है, अतः मोक्षप्राप्तिका साक्षात कारण निश्चयमोक्षमार्ग है। म्यवहारमोक्षमार्ग निश्चयमोक्षमार्गका साधक होने के कारण परम्परासे मोक्षमार्ग है। कानी जोद अपने पदके अनुरूप निश्चय और व्यवहार दोनों मोनमागोको अपनाता है। जो केवल निश्चय मोक्षमार्गको ही सारभूत जानकर व्यवहारमोक्षमार्गको छोड़ देता है उसे ममतचन्द्रस्वामोने पुरुषार्थसिद्धयुपायमें बाल-अज्ञानी की संज्ञा दी है । यथा
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निचयमबुध्यमानो यो निश्चयतस्तमेव संश्रयते ।
नाचायति करणचरणं स बहिःकरणालसो बाल: ।। जो निश्चयको न जानता हुआ निश्चयसे उसीका आश्रय लेता है बाह्य क्रियाओंके करनेमें आलसी हुआ यह अज्ञानी प्रतिकृय चारित्रको नष्ट कर देता है। जो एकांतसे निश्चय और व्यवहारको पकड़ कर बैठे हैं वे निश्चयाभासी तथा व्यवहाराभासी है इसी तरह जो निश्चय और व्यवहारके ठोक-ठोक स्वरूपको नसमशकर छानोंको अंगीकृत करते हैं वे भी उभयाभासी है। ये तीनों प्रकारके जोव मोक्षमार्ग से बहिर्भूत हैं।
इस तरह यह तत्वार्थसार ग्रन्थ अल्पकाम होनेपर भी मोक्षमार्गका सांगोपांग वर्णन करनेवाला होने से मोक्षशास्त्र ही है। इसीलिये ग्रन्थान्तमें पुष्पिकावाक्य के द्वारा कहा गया है--'इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरीणां कृतिः तत्त्वार्थसारो नाम मोसशास्त्रं समाप्तम् ।' इस तरह अमृतचन्द्रसुरिकी कृति तत्वार्थसार नामका मोक्षशास्त्र समाप्त हुआ । तत्त्वार्थसारका यह संकरण
तत्त्वार्थसारका यह संकरण प्रथमगुच्छकमें प्रकाशित तत्त्वार्थसारके मूलमात्रसंग्रहसे तैयार किया गया है । यद्यपि उस संग्रहमें परम्परासे कुछ पाठ अशुद्ध हो गये है तथापि उन्हें राजवातिक आदि ग्रन्थोंके तुलनात्मक अध्ययनसे ठीक कर लिया गया है।
श्री. राजारामजी भोपालकी खास प्रेरणासे इसके संपादन और अनुवाद करने में प्रवृत्ति हुई। कार्य पूर्ण होनेपर मैंने पाण्डुलिपि उक्त ब्रह्मचारोजीके पास भेज दी। उन्होंने प्रारम्भमें कुछ पाठभेद श्रीमान 4. वंशीघरजी शास्त्री सोलापुरकी टीकासे लेकर इसमें शंकित किये हैं। मैं पण्डितजीकी टोकाको देखनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं कर सका। ____ मूलानुगामी अनुवाद ही मुझे अधिक पसंद है। अत: मूलानुगामो संक्षिप्त अनुवाद ही मैंने इसमें किया है। जहां विषमको स्पष्ट करने के लिये विस्तारको आवश्यकता मालुम हुई यहाँ गोमटसार, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक मादि ग्रन्थों से सार लेकर भावार्थ में उसे संग्रहीत किया है । तत्त्वार्थसूत्र जन-जनको श्रद्धाका भाजन है क्योंकि उसमें प्रथमानुयोग को छोड़कर तीन अनुयोगोंका सार समाया हुआ है। इसी प्रकार यह तत्वानुसार भी जन-जनको श्रद्धाका भाजन हो, ऐसी आशा है क्योंकि इसमें तत्त्वार्थमूत्रसे भी अधिक सामग्री संकलित है। जिन पदार्थों के लक्षण तत्त्वार्थसुत्रमें नहीं ला सके है उन्हें तत्त्वार्थसारका ने श्लोकोंके द्वारा स्पष्ट किया है। अतः नित्य स्वाध्याय के सिवाय यदि पश्नक्रम में भी इसका समावेश किया जाय तो छात्र सरलतासे वस्तुस्वरूपको समझ सकेंगे। सर्वार्थसिद्धि के विकल्पमें यह रखा जा सकता है ।
परिशिष्टमें श्लोकानुक्रमणीके बाद लक्षणकोष दिया गया है जिससे किस पदार्थका लक्षण कहाँ है इसे पायक अनायास खोज सकेंगे। प्रारम्भमें विस्तृत विषयसूची भी है।
प्रस्तावनामें तस्वार्थ सूत्र तथा उसकी दीकाओं और टीकाकारोंपर प्रकाश डालनेके सिवाय अमृतचन्द्रसूरिका भी परिचय दिया गया है । तस्वार्थसारका प्रतिपाद्य विषय
..
.
.
in
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तत्त्वार्थसार
और उसके आधारोंका यथाशक्य निरूपण किया है। लेख-विस्तारके मयसै आधारोंके समस्त अवतरण नहीं दिये जा सके है, इसलिये मूल ग्रन्थों से उनका अध्ययन अपेक्षित है यहाँ सकेत मात्र किया गया है। प्रस्तावनामें जिन ग्रंथों अथवा पत्र-पत्रिकाओंसे सहायता ली गई है उन सबका निर्देश पृथक से किया गया है। में उन सभी विद्वानोंके प्रति नम्र आभार प्रकट करता हूँ।
ग्रंथका प्रकाशन श्रीगणेशप्रसाद वी ग्रंथमाला वाराणसीकी ओरसे हो रहा है । इसलिये उसके मंत्री डॉ. दरबारीलालजी कोठिया एवं अन्यान्य अधिकारी धन्यबादके पात्र है। साहित्यसेवाका मुझे व्यसन है इसलिये दिन-रातमें जब कभी भी समय मेरे पास नित्यकर्मोसे बनता है उसका उपयोग साहित्य-निर्माणमें हो होता है ।। अन्तमें अल्पज्ञलाके कारण रही ग्रुटियोंके लिये विद्वानोंसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।
विनीत सागर
पन्नालाल जैन
प्रस्तावना जपयुक सामग्री १. तत्त्वार्थसूत्र-मास्करनन्दिको सुखबोध टीकासहित ।
संपादक श्री पं० शान्तिराजजी न्यायतोर्थ । २. राजवातिक-भारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित, संपादक डॉ. महेन्द्रकुमारजी ३. लोकवातिक-कुन्धुसागर संथमालासे प्रकाशित संपादक पं. माणिकचन्द जी । ४. तस्वार्षवृत्ति-भारतीय ज्ञानपीठ, संपादक डॉ० महेन्द्रकुमारजी। ५. तत्त्वानुशासन-वीरसेवामन्दिर, संपादक पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार । ६. जनसाहित्य और इतिहास-ले. पं० नाधूरामजी प्रेमी । ७. जनसंदेशके शोधक, लखनऊ। ८. अनेकान्त-बीरसेवामन्दिरका मुखपत्र। ९. सर्वार्थसिद्धि--भारतीय ज्ञानपीठ, संपादक पं फूलचन्द्र जी शास्त्री । १०, पुरुषार्थसिद्धयुपाय-रायचन्द्रग्रंथमाला, संपादक पं. माथूरामजी प्रेमी । ११. समयसार-अहिंसामन्दिर बिल्ली । १२. प्रवचनसार-रायचन्द्र ग्रंथमाला बम्बई । १५. पश्चास्तिकाय-रायचन्द्रग्रंथमाला बम्बई । १४. पंचसंग्रह-भारतीय ज्ञानपीठ, संपादक पं. हीरालालजी शास्त्री। १५. संस्कृतपंचसंग्रह-माणिकचन्द्र ग्रंथमाला बम्बई। आदि ।
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विषयानुक्रमणिका प्रथमाधिकार
श्लोक संख्या पृष्ठ मङ्गलाचरण ग्रंथकारकी प्रतिज्ञा मोक्षका मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और राम्यक नारित्रका स्वरूप सर्वप्रथम तन्वार्थ ही जानकार है सात तत्त्वार्थोके नाम सात तत्त्वार्थोम हेय और उपादेयका वर्णन चार निक्षेप नामनिक्षेपका लक्षण स्थापनानिक्षेपका लक्षण द्रब्यनिक्षेपका लक्षण भावनिक्षेपका लक्षण प्रमाण और नसके द्वारा जीवादि पदार्थो का बोध होता है प्रमाणका लक्षण और उसके भेद परोक्षप्रमाणका लक्षण प्रत्यक्षप्रमाणका लक्षण सम्यग्ज्ञानका स्वरूप और उसके भेद मतिज्ञानके भेद और उसकी उत्पत्तिके कारण
१९-२० मतिज्ञानके अन्य भेद
२४ श्रुतज्ञानका स्वरूप तथा भेद अवधिज्ञानका स्वरूप तथा भेद
२५-२७ मनःपर्ययज्ञानका लक्षण और भेद
२८ ऋजुमति और विपुलमतिमें विशेषता
२९ केवलज्ञानका लक्षण मतिज्ञानादि पांच ज्ञानोंका विषय-निवन्ध एक जीवमें एक साथ कितने ज्ञान हो सकते है ? मियाज्ञान तथा उनकी अप्रमाणता नयका लक्षण और उसके भेद द्रव्यार्षिक और पर्यायाथिकनयका स्वरूप
३८-४०
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४२-४३
४८
~
तत्त्वार्थसार ख्याधिकनयके भेद पर्यायाधिकमयके भेद और अर्थ नय तथा शब्दनयका विभाग नंगमनयका लक्षण संग्रहनयका लक्षण व्यवहारमयका लक्षण ऋजसूत्रनयका लक्षण पाब्दनयका लक्षण समभिरुवनयका लक्षण एवम्भूतनयका लक्षण नयोंकी परस्पर सापेक्षता पदार्थों के जानने के उपाय-निर्देश, स्वामित्व आदि सत्चोंके जाननेके अन्य उपाय-सत्, संख्या आदि सात तत्वोंके जानने की प्रेरणा
द्वितीय अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य जीवका लक्षण औपशमिक आदि पांच भावोंके नाम भोपशामिकभावके भेद क्षायोपमिकभावके भेद सायिकभात्रके भेद बौदायिकभाबके भेद पारिणामिकमावके भेद जोयका लक्षण उपयोगके भेद जीवोंके भेद गुणस्थानोंके नाम मिथ्याल गुणस्थानका स्वरूप सासादन गुणस्थानका स्वरूप मिश्र गुणस्थामका स्वरूप असंयतसम्यग्दृष्टिका स्वरूप देशसयत गुणस्थानका स्वरूप प्रमत्तसंयत गुणस्थानका स्वरूप अप्रमत्तसंयत गुणस्थानका स्वरूप
४.५
१०-१३
२०
३.
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३२-३३
13
३
३.
४७
४७
Ka
४७
४८
विषयानुक्रमणिका अपूर्वकरण गुणस्थानका स्वरूप अनिवृत्तिकरण गुणस्थानका स्वरूप सुक्ष्मसांपराय गुणस्थानका स्वरूप उपशान्तकपाम और क्षीणकषाय गुणस्थानका स्वरूप सयोगकेवली और अयोगकेवली गुणस्थानका स्वरूप चौदह जीवस्थान-जीवसमासोंका वर्णन यह पर्यापियों के नाम और उनके स्वामी दश प्राणों के नाम तथा उनके स्वामी चार संज्ञाओंके नाम चौदह मार्गणाओंके । गतिमार्गणाका स्वरूप और भेद इन्द्रियमार्गणा और उसके भेद द्रव्येन्द्रियका निरूपण अन्तरङ्गनिवृत्तिका लक्षण बामनिर्वृत्तिका लक्षण आभ्यन्तर और बाह्य उपकरण भावेन्द्रिय और लब्धिका लक्षण उपयोगका लक्षण और भेद इन्द्रियों के नाम और क्रम पोच इन्द्रियों तथा मनका विषय इन्द्रियाँ अपने विषयको किस प्रकार ग्रहण करती है ? इन्द्रियोंकी आकृतियाँ इन्द्रियोंके स्वामी एकेन्द्रिय अथवा स्थावरोंके नाम हीन्द्रिय जीवोंके नाम श्रीन्द्रिय जीवोंके नाम चतुरिन्द्रिय जीवोंके नाम पक्चेन्द्रिय जीवोंके नाम पृथिवीकायिक आदि जीयोंका आकार पृथिवीकायिक जीवोंके छत्तीच भेद जलकायिक जीवोंके भेद अग्निकायिक जीचोंके भेद वायुकायिक जीवोंके भेद
४८
४८
४८
४७
४८
४८
४९
५०
५८-६२
२
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तत्त्वार्थसार
७२-७३
७९-८१
वनस्पतिकायिक जीवोंके भेद योगका लक्षण योगके पन्द्रह भेद मनोयोगके चार भेद वञ्चनयोगके चार भेद काययोगके सात भेद औदारिकादिशरीरोंको सूक्ष्मता और प्रदेशों का वर्णम तेजस और कार्मण शरीरको विशेषता लब्यिप्रत्यय तेजस और वैक्रियिकशरीरका वर्णन औदारिक और वैक्रियिक शरीरके जन्मका वर्णन आहारफशरीरका लक्षण वेदमार्गणाका वर्णन कषायमार्गणाका वर्णन ज्ञानमार्गणाका वर्णन संयममार्गणाका वर्णन दर्शनमार्गणाका वर्णन लेण्यामागंणाका वर्णन भव्यत्वमार्गणाका वर्णन सम्यक्त्वमार्गणाका वर्णन संशोमार्गणाका वर्णन आहारमार्गणाका वर्णन माहारक कौन होते हैं ? विग्रगतिका लक्षण और उसकी विशेषता जन्मके भेद और उनके स्वामी नौ योनियों तथा उनके स्वामियोंका वर्णन चौरासीलाख्न योनियोंका विवरण कुलकोदियोंका विवरणा तिर्यञ्चों तथा मनुष्योंकी उत्कृष्ट आयुका वर्णन नारकियोंकी उत्कृष्ट और जघन्य आयुका वर्णन भवनवासोदेवोंको उत्कृष्ट तथा जघन्य आमु ध्यन्तरदेवोंकी उत्कृष्ठ तथा जघन्य आयु ज्योतिष्कदेवोंकी उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु वैमानिकदेवोंकी उत्कृष्ट और जघन्य आयु
८४-८५ ८६-८७ ८८-८९
९६-१०२ १०३-१०४ १०५-१०१ ११०-१११ ११२-११६ ११७-१२२ १२३-१२५
१२६
१२७
१२८ १२९-१३३
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________________
१३४ १३५
१३६ १३७-१३८
१३९
१४०-१४२
१४३
१४५ १४६-१४७ १४८-१५२
१६२-१६८ १६९-१७५
१७६
विषयानुक्रमणिका तिर्यश्च और मनुष्योंकी जघन्य आयुका सामान्य वर्णन अपमृत्यु किमकी नहीं होती? नरकोंमें शरीरकी ऊंचाईका वर्णन मनुष्यों के शरीरकी ऊँचाईका वर्णन मन्तर, ज्योतिष्क और भवनबासीदेवोंकी ऊँचाईका वर्णन वैमानिकदेवोंकी ऊँचाईका वर्णन एकेन्द्रियादि तिमंचोंकी उत्कृष्ट अवगाहना एकेन्द्रियादिक जीवोंकी जयन्य अवगाहना कौन जीव नरकोंमें कहाँ तक जाते है ? भरकोंसे निकले हुए जीव क्या होते है ? किसका जन्म कहा होता है ? देवोंमें कौन उत्पन्न होते हैं ? देवगतिसे आकर जीव क्या क्या होते है ? लोकका वर्णन लोकके भेद,और आक्रार लोकका विभाग अबोलोकका वर्णन पृथिवियोंमें बिलोंकी संख्या नरकोंके दुःस्त्रोंका वर्णन मध्यलोकका वर्णन जम्बूद्वीपके सात क्षेत्रोंके नाम जम्बूद्वीपके कुलाचलोंका वर्णन कुलाचलोंपर स्थित सरोवरोंका वर्णन चौदह महानदियोंका वर्णन क्षेत्र तथा पर्वतोंके विस्तारका वर्णन कालचक्रका परिवर्तन कहाँ होता है ? धातकोखण्ड और पुष्करद्वीपका वर्णन मनुष्योंके भेद देवलोकका वर्णन, देवोंके पार निकाय देवोंके अवान्तर भेद यस प्रकारके भवनवासी देव आठ प्रकार के व्यन्तर देव ज्योतिष्क देवोंके पांच भेद
१७९-१८१ १८२-१८३ १८४-१८६ १८७-१९२
१९४-१९६ १९७-२०१ २०२-२०५ २०६-२०७
२०८ २०९-२११
२१२
२१५
२१६
२१७
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वस्वार्थसार
२१८ २१८-२२०
२२२-२२४ २२५-२३३ २३४-२३७
२३८
वैमानिक देवोंके दो भेद देवोंमें इन्द्र आदि भेदोंका वर्णन देवोंमें कामसुखका वर्णन भवनत्रिकदेवोंका निवास कहाँ है? वैमानिकदेवोंके निवासका वर्णन जीवोंके भेद श्रीवतत्वको श्रद्धा आदिसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन
तृतीय अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य पांच अजीयोंके नाम छह द्रव्योंका निरूपण पश्चास्तिकायका वर्णन द्रश्यका लक्षण उत्पादका लक्षण व्ययका लक्षण नौव्यका लक्षण गुण और पर्यायका लक्षण गुण और पर्याय के पर्यायवाचक शब्द गुण और द्रव्यमें अभेद है द्रव्य और पर्यायकी अभिन्नता पर्याय ही उत्पाद-व्ययके झरनेवाले है द्रव्योंकी नित्यताका वर्णन द्रव्योंके अवस्थितपनेका वर्णन वयोंके रूपी और अरूपोपनेका वर्णन द्रव्योंकी संख्याका वर्णन द्रव्योंमें सक्रिय और निष्क्रियपनेका विभाग द्रव्यों के प्रदेशोका वर्णन द्रव्योंके अवगाहका वर्णन द्रव्यों के उपकारका वर्णन धर्मवष्यका लक्षण अधर्मद्रव्यका लक्षण आकाशद्रक्ष्यका लक्षण
१९-२१ २२-२९
३५ ३६ ३७-३८
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विषयानुक्रमणिका
धर्म-अधर्म आदि द्रव्य स्वयं निष्क्रिय होकर भी क्रिया में हेतु हैं
कालद्रव्यका लक्षण
वर्तमाका लक्षण कालद्रव्यकी हेतुकर्तृताका वर्णन कालद्रभ्यको हेतुकर्तृताका समर्थन काला किस प्रकार कहाँ स्थित है ?
व्यवहारकालके परिचायक ज
परिणामका लक्षण
क्रियाका लक्षण
परत्व और अपरत्वका लक्षण
यवहारकालका विभाग मनुष्यक्षेत्र में होता है
कालके भेद
दृष्टान्त के द्वारा कालके तीन भेदोंका समर्थन
पुद् गलका लक्षण
पुगलोंके भेद
स्कन्ध, देश और प्रदेखके लक्षण
स्कन्ध और अणुकी उत्पत्ति के कारण
परमाणुका लक्षण
परमाणु की अन्य विशेषता पुद्गलको पर्यायोंका वर्णन
शब्द भेद
संस्थानके भेद
सूक्ष्मत्व के भेद
होय के भेद
बचके भेद
तमका लक्षण
छायाका लक्षण
आतप और उद्योतका लक्षण
भेदके भेद
किन परमाणुओं का परस्परमें बन्ध होता है ? पुद्गलकी बन्धपर्यायें अनन्त हैं
अजीत के श्रद्धानादिका फल
३९
**
४१
४२
४३
४४
= 5
४६
४७
४८
४९
५०
५१-५४
५५
५६
५७
५८
५९
६०-६१
६२
६३
६४
६५
६६
६७
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६९-७०
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७२
७३-७५
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१०९
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२-४
११०
११०
१११
१११
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११३
११३
१० -१२ १३-१६
११५
२०-२४ २५-२६ २७-२८
११६ ११७ ११७ ११८ ११८
११९
तत्त्वार्थसार
चतुर्थ अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञा आमवका लक्षण बालवके सोपरायिक और ईपिथ भेद साम्परायिक आस्रवका कारण मानवमें होनेवाली विशेषताके कारण अधिकरण के भेद ज्ञानावरणके आसबके हेतु दर्शनावरणकर्मके आम्रवके हेतु असातावदनीयकर्म के आस्रवके हेतु साचावेदनीयके आरवके हेतु दर्शनमोहनीयके आस्रवके हेतु चारित्रमोहनीयकर्मक आस्रावफे हेतु नरकायुके आस्रवके हेतु तिर्यश्च आयुके आसपके कारण मनुष्यायुके आनषके कारण देवायुके आस्रवके हेतु अशुभ नामकर्मके आसबके हेतु शुभ नामकर्मके आस्रवके हेतु तीर्थकरनामकर्मके आरवके हेतु मीच गोत्रकर्मने मानवके हेतु उच्च गोत्रकर्मके आस्रवके हेतु अन्तरायक्रमके आसबके हेतु प्रत और अव्रतके निरूपणकी प्रतिज्ञा व्रतका लक्षण महाव्रत और गणुव्रतका लक्षण प्रतोंकी पांच-पांच भावनाओंके कहने की प्रतिज्ञा अहिंसावतकी पांच भावनाएं सस्थतकी पांच भावनाएं अचौर्यवतकी पांच भावनाएं अन्यचर्यव्रतकी पांच भावनाएं अपरिग्रह्मतको पांच भावनाएं हिंसादि पापोंके विषयमें सा विचार करना चाहिए?
३०-३४ ३५-३९ ४०-४१ ४२-४३ ४४-४७
१२०
१२०
४९-५२
१२१
१२२
५५-५८
१२३
१२३
१२३
१२४ १२४ १२४ १२५
३
૬૪
१२६
६८
१२६ १२७
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विषयानुक्रमणिका
७२
१२७ १२७
७३
७४
१२८ १२८
७५
७६
१२८ १२८
७७
७८
१२८
७९
१३१
१३१
१३२
१३२
मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्यभावना संसार और शरीरके स्वभावका विचार हिंसापापका लक्षण असत्यपापका लाण चोरीपापका लक्षण मैथुनपापका लक्षण परिग्रहपापका लक्षण प्रतीका लक्षण प्रतीके भेद बारह व्रतोंके नाम सल्लेखनायतका वर्णन अतिचारोंके वर्णनको प्रतिज्ञा सम्यक्त्वके पांच अतिचार अहिंसाणुव्रतके पांच अतिचार सत्याणुवतके पांच अतिचार मचौर्याणुशतके पांव अतिचार ब्रह्मचर्याणुव के पांच अतिचार परिग्रहपरिमाणाणुयतके पांच अतिचार भिवतके पनि अतिचार देशव्रतके पांच अतिचार अनर्थदण्डनतके पांच अतिचार सामायिकशिक्षाव्रतके पांच अतिचार प्रोषधोपबास शिक्षाव्रतके पांच अतिचार भोगोपभोगपरिमाणप्रतके पांच अतिचार अतिथिसंविभागमतके पाँच अतिचार सल्लेखनावतके पांच अतिचार दानका लक्षण दानमें विशेषताके कारण पुण्यानवका कारण पापानवका कारण पुण्य-पापकी विशेषता पुण्य और पापकी समानता मानवतत्वको जाननेका फल
८८-८९
९०
१३५
१३५
१३७ १३७
१००
१०२
१०३
१३७ १३८ १३८ १३८
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तत्त्वापंसार
१४
१४०
१४०
१४२
१४२
पक्रम अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य बन्धक पांच हेतु मिथ्यास्वके पांच भेद ऐकान्ति कमिथ्यात्वका लक्षण सोशथिमिथ्यात्वका लक्षण विपरीतमिथ्यात्वका लक्षण आज्ञानिकमिथ्यात्वका लक्षण वैन विकमिथ्यात्वका लक्षण बारह प्रकारका असंयम प्रमावका लक्षण पच्चीस कषाय पन्द्रह योग बन्धका लक्षण कर्म आत्माका गुण नहीं है कर्मोंका मूर्तिकपना किस तरह है ? मतिक काँका अमतिक मात्माके साथ बन्ध किस प्रकार होता है ? १६-२० बन्धके चार भेद कोको आठ मूलप्रकृतियाँ कोंकी एकसौ अड़तालीस उत्तरप्रकृतियां ज्ञानावरणकी पांच प्रकृप्तियाँ दर्शनावरणको नौ प्रकृतियाँ
२५-२६ वेदनीयकर्मको दो प्रकृतियाँ मोहनीयकर्मको अट्ठाईस प्रकृतियां
२७-२९ आयुकर्मको चार प्रकृतियां नामकर्मकी तेरानवें प्रकृतियाँ
३१-३९ गोत्रकर्मकी दो प्रकृतियाँ अन्तरायकर्मके पांच भेद बन्धयोग्य प्रकृतियाँ
४१-४२ कमौका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध
४३-४४ कर्माका अघन्य स्थितिबन्ध
४५-४६ अनुभवबन्धका लक्षण प्रदेशबन्धका स्वरूप
४७-५०
२२
२७
१४७
३०
१५४
१५४
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१५८
१५८
१५९
१६१
A
१६१
१३२
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विषयानुक्रमणिका कर्मोमें पुण्य और पापकर्मका भेद पुण्यकर्म कौन-कौन है? पापप्रकृतियां कौन-कौन हैं? बन्धतत्वका उपसंहार
षष्ठ-अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञाशाक्य संवरका लक्षण संबरफे हेतु गुप्तिका लक्षण गुप्तिसे शीघ्र ही संबर होता है समितियों के नाम ईसिमितिका लक्षण भाषासमितिका लक्षण एषणासमिसिका लक्षण आदाननिक्षेपणसमितिका लक्षण उत्सर्गसमितिका लक्षण समितिका फल दश धोके नाम धमाधर्मका लक्षण मार्दधर्मका लक्षण आर्जवधर्मका लक्षण शीवधर्मका लक्षण सत्यधर्मका लक्षण संयमधर्मका लक्षण सपोधर्मका अभण स्यागधर्मका लक्षण माक्रिजन्यधर्मका लक्षण ब्रह्मचर्यधर्मका लक्षण धर्मसे संवरकी सिद्धि बाईस परीपहोंके नाम परीषहजय संघरका कारण है तप, संवर और निर्जरा दोनोंका कारण है बारह अनुप्रेक्षाओंके नाम अनित्यभावना
::::.
१६३ १६३ १६३ १६४
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ASIA
१६-१७
१६५
१६५
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२२
२३-२५
१६६
२७-२८ २९-३०
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तत्वार्थसार
१७०
१७०
१७१
१७१
१७२ १७२ १७२ १७२
१७३ १७३ १७४
अशरणभावना संसारभावमा एकत्वभावना दायत्वभावना अशुचित्वभावना आस्रवभावना संघरभावना निर्जराभावना लोकभावना बोघिदुर्लभभावना धर्मस्वाख्यातत्त्वभावना अनुप्रेक्षासे संवरकी सिद्धि पोच प्रकारका चारित्र सामायिकचारित्रका लक्षण छेदोपस्थापनाचारित्रका लक्षण परिहारविशुद्धिसंयमका लक्षण सूक्ष्मसापरायसंयमका लक्षण यथाख्यातमारित्रका लक्षण सम्यकचारित्रसे संवर होता है तप भी संवरका कारण है संबरतत्तका उपसंहार
सप्तम-अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य निर्जराका लक्षण और भेद विपाकजा निर्जराका लक्षण अबिपाकजा निर्जराका लक्षण और दृष्टान्त विपाकजा और अविनाकजा निर्जराके स्वामो तपके भेद वायतपके छह भेद अवमौवर्षतपका लक्षण उपवासतपका लक्षण रसपरित्यागतषका लमण वृत्तिपरिसंख्यामतपका लक्षण कायक्लेशतपका लक्षण
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१७६
१७६
१७७
७
१७७
१७७
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१७८
१७९
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१६
१७९
१७९ १८ १८०
१८० १९ १८० २०१८. २१-२२ १८० २२ १८०
विषयानुक्रमणिका विविक्तशग्यासनतपका लक्षण अभ्यन्तर तपके छह भेद स्वाध्यायतपके भेद वाचनास्वाध्यायका लक्षण प्रच्छनास्वाध्यायका लक्षण आम्नायस्वाध्यता लक्षण धर्मोपदेशस्वाध्यायका लक्षण अनुप्रेक्षास्वाध्यायका लक्षण प्रायश्चित्ततपके नौ भेद आलोचनाका लक्षण प्रतिक्रमण और तदुभयका लक्षण तप और व्युत्सर्गका लक्षण विवेक और उपस्थापनाका लक्षण परिहार और छेदका लक्षण वैयाबुत्त्यतपका लक्षण व्युत्सगतपके दो भेद बिनयतपके चार भेद दर्शनविनयका लदाण ज्ञानविनयका लक्षण चारित्रविनयका लक्षण उपचारविनयका लक्षण ध्यानके चार भेद आर्तध्यानका लक्षण और भेद रौद्रध्यानका लक्षण और भेद ध्यानका लक्षण धर्म्यध्यानका लक्षण आज्ञाषिचम घHध्यानका लक्षण अपायविचय घHध्यानका लक्षण विपाकविचय धर्माध्यामका लक्षण संस्थानविचय घयं ध्यानका लमण शुक्लध्यानके चार भेद पृथक्त्यशुक्लध्यानका लक्षण पृथक्त्रशुक्लध्यानकी विशेषता एकत्व शुक्लण्यानका लक्षण
२४ १८१ २५ १८१
१८१ २७-२८ १८१
१८२ १८२
१८३
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१८३ १८३
१८३
१८३ १८४
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१८४
१८४
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१८५ ४२१८५
१८६
१८६
४६-४७
४८
१८७
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४२-५० ५१.५२
१८७
५५-५७
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१९२
११२
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तत्त्वार्थसार एकस्वशुक्लध्यानको विशेषता सूक्ष्मक्रियशुक्लध्यानका लक्षण व्युपरतक्रिय शुक्लध्यानका लक्षण गुणशेणीनिर्जराके दशा स्थान पांच प्रकारके निम्रन्थ मुनि पांगारके निजी समानिक निर्जरातत्त्वका उपसंहार
अष्टम-अधिकार मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य मोक्षका लमाण मोक्ष किस प्रकार होता है ? मोक्षमें किन-किन गुणों का अभाव तथा सद्भाव रहता है कर्मबन्धका अन्त होता है पुनः कर्मबन्धको आशङ्का नहीं है जानना देखना बन्धका कारण नहीं है कारणके विना बन्ध संभव नहीं है स्थानसे युक्त होनेके कारण मुक्सजीवका पतन नहीं होता गौरवका अभाव होनेसे भी जोवका पतन नहीं होता सिद्धोंमें परस्पर उपरोध-रुकावट नहीं है आकारका अभाव होने से मुक्त जीवों का अभाव नहीं होता शरीरफा अभाव होने से आत्मा सर्वत्र फैलता नहीं है दृष्टान्त द्वारा इसोका समर्थन मुक्तजीब ऊटुंगगन करते है कर्मक्षयका क्रम मुक्तजीवोंके ऊर्ध्वगमन स्वभावका दृष्टान्तों द्वारा समर्थन कर्मक्षय और कार्यगमन साथ ही साथ होता है सिद्ध भगवानक किस कर्मके अभावमें कौन गुण प्रकट होता है सिद्धोंमें विशेषताके कारण क्या हैं ? सिखोंकी अन्य विशेषता सिद्धोंके सुखका वर्णन शरीररहित सिद्धोंके सुख किस प्रकार होता है? मुक्तजीबोंका सुख सुषुप्त अवस्थाके समान नहीं है मुक्त जीवोंका सुख निरुपम है। अर्हन्त भगवानको आज्ञासे मुक्तजीवोंका सुख माना जाता है। मोक्षतत्त्वका उपसंहार
१९४ १९४
१७-१८ १९६
२०-२६ १९७ २७-३४ १९८
३७-४० २०० ४१-४२ २०० ४३-४४ २०४ ४५ २०५ ४६-४९ २०५ ५०-५१ २०६ ५२-५३ २०७
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उपसंहार
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मोक्षमार्गको द्विविधता निश्चयमोक्षमार्गका कथन व्यवहारमोक्षमार्गका निरूपण व्यवहारी मनिका लक्षण निश्चयी मुनिका लक्षण अभदे विवक्षासे षटकार कोंका वर्णन पर्यायाधिक और निश्शयनयस मोनाएका यन तत्वार्थसार ग्रन्थका फल प्रन्धक की निरभिमानता टीकाकर्तृ निवेदन
२२
२१२
२१२
२१॥
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नमः सिद्धेभ्यः श्रीमदमृतचन्द्रमूरिकृतः तत्वार्थसारः
मङ्गलाचरण जयत्यशेषतवार्थप्रकाशि प्रथितश्रियः ।
मोहध्वान्तौघनिभेदि ज्ञानज्योतिर्जिनेशिनः ॥१॥ अर्थ-जिनकी अनन्तचतुष्टयरूप अन्तरङ्गलक्ष्मी और अष्टप्रातिहार्यरूप बहिरङ्गालक्ष्मी प्रसिद्ध है ऐसे जिनेन्द्रभगवान्की वह ज्ञानरूप ज्योति जयवन्त हैसर्वोत्कृष्टरूपसे विद्यमान है जो कि समस्त समीचीन तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाली है तथा मोहरूपी अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाली है। ___भावार्थ-यहाँ अरहन्त भगवान्के केवलज्ञानका जयघोष किया गया है। चार घातियाकर्मोको नष्ट करनेगे जिन्हें अनन्तज्ञान, अनन्तदान, अनन्तसुख और अनन्तबलरूपी अन्तरङ्गालक्ष्मी प्राप्त होती है तथा अमोक्रवक्ष आदि अष्टप्रातिहार्य जिनके समवसरणकी शोभा बढ़ाते हैं ये अरहन्त कहलाते है । दशम गुणस्थानके अन्तम मोहकर्मका सर्वथा क्षय करनेसे तथा वारहवें गुणस्थानके अन्तमें शेप तीन घातियाकर्मोका क्षय होनेसे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त होता है। यह केवलज्ञान, मोहरूपी अन्धकारके समुहको सर्वथा नष्ट करनेवाला है तथा समस्त पदाथोंके यथार्थ स्वरूपको प्रकाशित करनेवाला है। जिनागमको प्रामाणिकता सर्वज्ञकी वाणीसे है इसलिये मंगलाचरणके रूपमें यहाँ सर्वज्ञताको मूल कारण जो केवलज्ञान है उसका जयकार किया गया है ।। १॥
प्रन्थकारको प्रतिज्ञा अथ तत्वार्थसारोऽयं मोलमार्गकदीपकः ।
मुमुक्षूणां हितार्थाय प्रस्पष्टमभिधीयते |॥ २॥ अर्थ-अब मोक्षाभिलाषी जीवोंके हित के लिये मोक्षमार्गको दिखलाने हेतु प्रमुख दीपकस्वरूप यह तत्त्वार्थसार नामका ग्रन्थ अत्यन्त स्पष्टरूपसे कहा जाता है ।।२॥
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तत्त्वार्थसार
मोक्षका मार्ग स्यात्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयात्मकः ।
मार्गो मोक्षस्य भव्यानां युक्यागमसुनिश्चितः ।। ३ ।। अर्थ-भव्यजीवोंके मोक्षका मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंके समूहरूप है जो युक्ति और आगमसे अच्छी तरह निश्चित है।
भावार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंकी एकरूपता ही मोक्षका मार्ग है अर्थात् ये तीनों मिलकर ही मोक्षके मार्ग हैं, एक-एक अथवा एक-दो मोक्षके मार्ग नहीं है. यह मोक्ष भल्य जोलोको दी होता है अभव्य जीवोंको नहीं, इसलिये ग्रन्थकारने 'भव्याना' पदके द्वारा मोक्षके अधिकारी जीवोंका वर्णन किया है। जिस प्रकार औषधके श्रद्धान, यथार्थज्ञान और विधिपूर्वक सेवन करनेसे रोगका नाश होता है, एक या दोसे नहीं। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन आदि तीनोंके मिलनेसे मोक्ष होता है, इस यत्तिसे तथा सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' इत्यादि आगमसे यह बात अच्छी तरह निश्चित है ।। ३ ।।
सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका स्वरूप श्रद्धानं दर्शनं सम्यग्ज्ञानं स्यादत्रयोधनम् ।
उपेक्षणं तु चाग्निं तत्त्वार्थानां सुनिश्चितम् ।।४।। अर्थ-तत्त्व-अपने-अपने यथार्थ स्वरूपसे महित जीव, अजीव आदि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन, उनका ज्ञान होना सम्यग्ज्ञान और रागादिभावोंकी निवृत्तिरूप उपेक्षा होना सम्यक्चारित्र सुनिश्चित है ।। ४ ॥
___ सर्वप्रथम तत्त्वार्थ हो जाननेके योग्य हैं श्रद्धानाधिगमोपेक्षाविषयत्वमिता ह्यतः।
बोध्याः प्रागेव तत्वार्था मोक्षमार्ग बुभुत्सुभिः ॥५॥ अर्थ-मोक्षमार्गको जाननेके इच्छुक जीवोंको सबसे पहले, सम्यग्दर्शन, सम्याज्ञान और सम्यक्चारित्रके विषयभूत तत्त्वार्थ जानने के योग्य हैं ।। ५ ॥
सात तत्त्वार्थोंके नाम जीवोऽजीवासयौ बन्धः संवरो निर्जरा तथा । मोक्षश्च सप्त तत्वार्था मोक्षमागैषिणामिमे ।।६।।
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प्रथम अधिकार
अर्थ-मोक्षमार्गकी इच्छा करनेवाले जीवोंके लिये जीव, अजीव, आसव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्वार्थ जाननेके योग्य हैं। ___ भावार्थ-मोक्षमार्ग में प्रयोजनभूत सात तत्त्वार्थ हैं। इनका संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है
जीव-जो चेतना अथवा ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगसे सहित हो उसे जीव कहते हैं। अजीव-जो बेतना अथवा ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगसे रहित हो वह अजीव है । आत्रव-आत्मामें नबीन कर्मोके प्रवेशको आस्रव कहते हैं । बन्ध-आत्माके प्रदेशोंके साथ कर्मपरमाणुओंका नोरशोरके समान एकक्षेत्रावगाहरूप होकर रहना बन्ध है। संघर-आस्रबका रुक जाना संवर कहलाता है। निर्जरा-पूर्वबद्ध कर्मोंका एकदेश क्षय होना निर्जरा है। मोक्ष-समस्त कर्मोंका आत्मासे सदाके लिये पृथक् हो जाना मोक्ष कहलाता है ।। ६ ।
सात तत्त्वार्थोंमें हेय और उपादेयताका वर्णन उपादेयतया जीवोऽजीवो हेयतयोदितः । हेयस्यास्मिन्नुपादानहेतुत्वेनास्त्रवः स्मृतः ॥ ७ ॥ हेयस्यादानरूपेण बन्धः स परिकीर्तितः । संवरो निर्जरा हेयहानहेतुतयोदितौ । हेयप्रहाणरूपेण मोक्षो जीवस्य दर्शितः ।। ८ ।।
(षट्पदम् } अर्थ-इन सात तत्त्वोंमें जीवतत्व उपादेयरूपसे और अजीवतत्व हेयरूपसे कहा गया है अर्थात् जीवतत्त्व ग्रहण करने योग्य और अजीवतत्त्व छोड़ने योग्य बतलाया गया है। छोड़ने योग्य अजीवतत्त्वके ग्रहणका कारण होनेसे आस्रवतत्त्व कहा गया है तथा छोड़ने योग्य अजीवतत्त्वके ग्रहणरूप होनेसे बन्धतत्त्वका निर्देश हआ है। संबर और मिर्जरा ये दो तत्त्व, अजीवतत्त्वके छोड़ने कारण होनेसे कहे गये हैं और छोड़ने योग्य अजीवतत्त्वके छोड़ देनेसे जीवकी जो अवस्था होती है उसे बतलानेके लिये मोक्षलत्त्व दिखाया गया है। ___भावार्थ-जीव और अजीब ये दो मूल तत्त्व हैं। इनमें जीव उपादेय है
और अजीव छोड़ने योग्य है, इसलिये इन दोनोंका कथन किया गया है। जीव अजीवका ग्रहण क्यों करता है, इसका कारण बतलानेके लिये आस्रवतत्त्वका कथन किया गया है। अजीवका ग्रहण करनेसे जीवकी क्या अवस्था होती है, यह बतलानेके लिये बन्धतत्त्वका निर्देश है। जीव अजीवका सम्बन्ध कैसे छोड़
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चार
तस्वार्थसार सकता है, यह समझानेके लिये संवर और निर्जराका कथन है तथा अजीवका सम्बन्ध छूट जानेपर जीवकी क्या अवस्था होती है, यह बतानेके लिये मोक्षका वर्णन किया गया है। सात तत्त्वोंमें जीव और अजीत्र ये दो मूल तत्त्व हैं और शेष पाँच तत्व उन दो तत्त्वोंके संयोग तथा वियोगसे होनेवाली अवस्थाविशेष हैं। ७-८ ॥
चार निक्षेप तत्त्वार्थाः 'सन्त्यमी नामस्थापनाद्रव्यभावतः ।
न्यस्यमानतयादेशात् प्रत्येक स्युश्चतुर्विधाः ।।२।। अर्थ-ये सातों तत्त्वार्थ नाम, स्थापना, द्रव्य और भावनिपेक्षके द्वारा व्यवहारमें आते हैं, इसलिए प्रत्येक तत्त्वार्थ चार-चार प्रकारका होता है। जैसे कामगोव, स्थापना जी, दयनीय और भावना आदि ।। ९ ॥
नामनिक्षेपका लक्षण या निमित्तान्तरं किश्चिदनपेक्ष्य विधीयते ।
द्रव्यस्य कस्यचित्संज्ञा तन्नाम परिकीर्तितम् ||१०|| अर्थ-जाति, गुण, क्रिया आदि किसी अन्य निमित्तको अपेक्षा न कर किसी द्रव्यकी जो संशा रखी जाती है वह नामनिपेक्ष कहा गया है ।। १० ।।
स्थापनानिक्षेपका लक्षण सोऽयमित्याकाष्ठादेः सम्बन्धेनान्यवस्तुनि ।।
यद्वयवस्थापनामात्र स्थापना साभिधीयते ।।१।। अर्थ-पांसा तथा काष्ठ आदिके सम्बन्धसे 'यह वह है' इस प्रकार अन्य वस्तुमें जो किसी अन्य वस्तुकी व्यवस्था की जाती है वह स्थापनानिक्षेप कहलाता है।
भावार्थ-किसीमें किसी अन्यकी कल्पना करनेको स्थापना कहते हैं। इसके दो भेद हैं—१. तदाकार स्थापना और २. अतदाकार स्थापना। जैसा आकार है उसमें उसी आकारवालेकी कल्पना करना तदाकार स्थापना है, जैसे पार्श्वनाथकी प्रतिमा में पार्श्वनाथ भगवान्को स्थापना करना। और भिन्न आकारवालेमें भिन्न आकारवालेकी कल्पना करना अतदाकार स्थापना है, जैसे शतरंजकी गोटोंमें बजीर, बादशाह आदिको कल्पना करना ॥११ ।। . १ खल्वमी' पाठान्तरम्। २ 'सोध्यमित्यक्षकाष्ठादौ सम्बन्धेलान्य वस्तुनः' पाठान्तरम् ।
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प्रथम अधिकार
द्रानक्षेपका लक्षण भाविनः परिणामस्य यत्प्राप्ति प्रति कस्यचित् ।
स्याद्गृहीताभिमुख्यं हि तव्यं ब्रुवते जिनाः ॥१२॥ अर्थ-किसी द्रव्यको, आगे होनेवाली पर्यायकी अपेक्षा वर्तमानमें ग्रहण करना द्रव्यनिक्षेप हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं ! ___भावार्थ-द्रव्यकी जो पर्याय पहले हो चुकी है अथवा आगे होनेवाली है उसकी अपेक्षा द्रव्यका ग्रहण करना अर्थात् उसे भूतपर्यायरूप अथवा भविष्यत् पर्यायरूप वर्तमानमें ग्रहण करना सो द्रव्यनिक्षेप है 11 १२ ।।
भावनिक्षेपका लक्षण वर्तमानम यत्नेन यायेमोपलक्षितम् ।
द्रव्यं भवति भावं तं वदन्ति जिनपुङ्गवाः ॥१३॥ ___ अर्थ-वर्तमान पर्यायसे उपलक्षित द्रव्यको जिनेन्द्र भगवान् भावनिक्षेप कहते हैं। ___ भावार्थ-जो पदार्थ वर्तमानमें जिस पर्यायरूप है उसे उसी प्रकार कहना भावनिक्षेप है ।। १३ ।।
प्रमाण और नयके द्वारा जीयावि पदार्थोंका बोध होता है
तच्चार्थाः सर्व एवैते सम्यम्बोधप्रसिद्धये ।
प्रमाणेन प्रमीयन्ते नीयन्ते च नयैस्तथा ॥१४॥ अर्थ-सभी तत्त्वार्थ सम्यग्ज्ञानकी प्रसिद्धिके लिये प्रमाणके द्वारा प्रमित होते हैं और मयोंके द्वारा नीत होते हैं अर्थात् प्रमाण और नयोंके द्वारा जाने आने हैं ।। १४ ॥
प्रमाणका लक्षण और उसके भेद सम्यग्ज्ञानात्मकं तत्र प्रमाणमुपर्णितम् ।
तत्परोक्षं भवत्येक प्रत्यक्षमपरं पुनः ।।१५।। अर्थ-उन प्रमाण और नयोंमें प्रमाणको सम्यग्ज्ञानरूप कहा है अर्थात् समीचीनजानको प्रमाण कहते हैं। उसके दो भेद हैं-एक परोक्ष प्रमाण और दूसरा प्रत्यक्षप्रमाण ।
भावार्थ-प्रमीयतेऽनेनेति प्रमाणम्'–जिसके द्वारा जाना जाके उसे प्रमाण कहते हैं, इस व्युत्पत्तिको आधार मानकर कितने ही दर्शनकार इन्द्रियोंको तथा
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तस्वार्थसार
पदार्थोके साथ होनेवाले उनके सन्निकर्षको प्रमाण मानते हैं परन्तु जैनदर्शनमें जाननेका मूल साधन होनेके कारण ज्ञानको ही प्रमाण माना गया है । इसके अभावमें इन्द्रियाँ और सन्निकर्ष अपना कार्य करने में असमर्थ रहते हैं ।। १५ ।।
परोक्षप्रमाणका लक्षण समुयासानुपात्तस्य प्राधान्येन परस्य यत् ।
पदार्थानां परिज्ञानं तत्परोक्षमुदाहृतम् ॥१६॥ अर्थ-गृहीत अथवा अगृहीत परकी प्रधानतासे जो पदार्थोंका ज्ञान होता है उसे परोक्षप्रमाण कहा गया है।
भाषार्थ---जो ज्ञान परकी प्रधानतासे होता है उसे परोक्ष प्रमाण कहते हैं । परके दो भेद हैं-१. समुपात्त और २. अनुपात्त । जो प्रकृतिसे ही गृहीत है उसे समुपात कहते हैं, जैसे स्पर्शनादि इन्द्रियाँ । तथा जो प्रकृतिसे गृहीत न होकर पथक रहता है उसे अनुपात्त कहते हैं, जैसे प्रकाश आदि । इस तरख इन्द्रियादिक गृहीत कारणों और प्रकाश आदि अगृहीत कारणोंस जो ज्ञान होता है वह परोक्षप्रमाण कहलाता है ।। १६ ।।।
प्रत्यक्षप्रमाणका लक्षण इन्द्रियानिन्द्रियापेक्षामुक्तमव्यभिचारि च |
साकारग्रहणं यत्स्यासत्प्रत्यक्ष प्रचक्ष्यते ||१७|| अर्थ-इन्द्रिय और मनकी अपेक्षासे मुक्त तथा दोषोंसे रहित पदार्थका जो सविकल्पज्ञान होता है उसे प्रत्यक्षप्रमाण कहते हैं।
भावार्थ-साकार और अनाकारके भेदसे पदार्थका ग्रहण दो प्रकारका होता है । जिसमें घट-पटादिका आकार प्रतिफलित होता है उसे साकारग्रहण कहते हैं और जिसमें किसी वस्तुविशेषका आकार प्रतिफलित न होकर सामान्य ग्रहण होता है उसे अनाकारग्रहण कहते हैं। साकारग्रहणको ज्ञान और अनाकारग्रहणको दर्शन कहते हैं । जिस ज्ञानमें इन्द्रिय और मनकी सहायता आवश्यक नहीं होती, जो विशदरूप होनेके कारण दोषरहित होता है तथा जिसमें पदार्थोंके आकार विशेषरूपसे प्रतिभासित होते हैं उसे प्रत्यक्षप्रमाण कहते हैं ।। १८ ।।
सम्पमानका स्वरूप और उसके भेद सम्यग्ज्ञानं पुनः स्वार्थव्यवसायात्मकं विदुः । मतिश्रुतावधिज्ञानं मनःपर्ययकेवलम् ।।१८|
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MumAAM
प्रश्रम अधिकार अथ-जी स्थपरको जानता है उसे सन्यज्ञान कहते हैं। इसके पांच भेद हैं-१ मतिज्ञान, २ श्रुतज्ञान, ३ अवधिज्ञान, ४ मनःपर्य यज्ञान, और ५ केवलज्ञान ।।१८।।
मतिज्ञानके भेव ओर उसकी उत्पत्ति के कारण स्वसंवेदनमक्षोत्थं विज्ञानं स्मरणं तथा । प्रत्यभिज्ञानमूहश्च स्वार्थानुमितिरेव वा ॥१९।। बुद्धिर्मेधादयो याश्च मतिज्ञानभिदा हि ताः ।
इन्द्रियानिद्रियेभ्यश्च मतिज्ञानं प्रवर्तते ॥२०॥ अर्थ-स्वसंवेदनज्ञान, इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान, स्मरण, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, स्वार्थानुमिति, बुद्धि और मेधा आदि जो ज्ञान हैं वे मतिज्ञानके भेद हैं। यह मतिज्ञान इन्द्रिय और मनसे प्रवृत्त होता है।
भावार्थ-शरीरके भीतर रहनेवाला, ज्ञान-दर्शन लक्षणसे युक्त 'मैं' एक पृथक पदार्थ है, ऐसा जो अपने आप ज्ञान होता है उसे स्वसंवेदन कहते है। स्पर्शनादि इन्द्रियों के द्वारा उनके विषयोंका जो ज्ञान होता है वह इन्द्रियोस्थ विज्ञान कहलाता है। इसे ही मति कहते हैं । अतीत वस्तुको स्मृतिको स्मरण कहते हैं । 'यह वह है' इस प्रकार प्रत्यक्ष और स्मतिके योगरूप जो ज्ञान होता है उसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। 'जहाँ-जहाँ धम होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है' इस प्रकारके व्याप्तिज्ञानको ऊह या तर्क कहते हैं। साधनके द्वारा साध्यका स्वयंको ज्ञान होना स्वार्थानुमिति है किसी पदार्थको देखते ही उसको विशेषताको ग्रहण करनेवाले ज्ञानको बुद्धि कहते हैं और किसी पदार्थको इस तरह ग्रहण करना कि उसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाये उसे मेघा कहते हैं। स्वसंवेदनको आदि लेकर ये ज्ञानके जितने रूप हैं वे सब मतिज्ञानके भेद हैं। यह मतिज्ञान इन्द्रिय और मनकी सहायतासे उत्पन्न होता है। संज्ञीपञ्चेन्द्रिय जीवके पांचों इन्द्रियों और मनके निमित्तसे होता है तथा अन्य जीवोंके जितनी इन्द्रियां होती है उन्हीं के निमित्तसे होता है ।। १९-२० 11
__ मतिज्ञानके अन्य भेड अवग्रहस्ततस्त्वीहा ततोऽत्रायोऽथ धारणा । बहोर्बहुविधस्यापि शिप्रस्यानिःसृतस्य च ॥२१॥ अनुक्तस्य ध्रुवस्येति सेतराणां तु ते मताः ।
व्यक्तस्यार्थस्य विधेयाश्चत्वारोऽवग्रहादयः ॥२२॥ १. 'ध्रुवस्यात् पाठान्तरम् ।
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तत्त्वार्थसार व्यञ्जनस्य तु नेहाया एक एव अवग्रहः । अप्राप्यकारिणी चक्षुर्मनसी परिवर्ण्य सः ॥२३॥
चतुर्भिरिन्द्रियैरन्यैः क्रियते प्राप्यकारिभिः । अर्थ-मतिज्ञानमें सबसे पहले अवग्रह होता है, उसके बाद ईहा होती है, उसके पश्चात् अवाय होता है और उसके बाद धारणा होती है । अर्थात् अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये मतिज्ञानके क्रमसे विकसित होनेवाले भेद हैं । ये चार भेद बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त और अध्रुव तथा इनसे विपरीत एक, एकविध, अक्षिण, निःसृत उक्त और ध्रुव इन बारह प्रकारके पदार्थ के होते हैं। इनमेंसे व्यक्त अर्थात् स्पष्ट पदार्थके अवग्रह आदि चारों ज्ञान होते हैं परन्तु व्यञ्जन अर्थात् अस्पष्ट पदार्थ के ईहा आदि तीन ज्ञान नहीं होते, मात्र अवग्रह ही होता है। व्यजनावग्रह दूरसे पदार्थको जाननेवाले चक्षु और मनको छोड़कर शेष चार इन्द्रियोंसे होता है। चक्षु और मनके सिवाय शेष इन्द्रियां प्राप्यकारी हैं अर्थात् पदार्थसे सम्बद्ध होकर पदार्थको जानती हैं।
भावार्थ-योग्य क्षेत्रमें स्थित पदार्थके साथ इन्द्रियका सन्निपात होनेपर दर्शन होता है और दर्शनके बाद जो प्रथम ग्रहण होता है उसे अवग्रह कहते हैं, जैसे चक्षु इन्द्रियके द्वारा 'यह शुक्ल रूप है ऐसा ग्रहण होना अवग्रह है । अवग्रहके द्वारा जाने हुए पदार्थमें उसकी विशेषताको जाननेका जो व्यापार है उसे ईहा काहते हैं, जैसे अवग्रहके द्वारा जाना हुआ शुक्लरूप वलाकाका है या पताकाका । ईहाके द्वारा जाने हुए पदार्थका विशिष्ट चिह्नोंसे निश्चय हो जाना अवाय है, जैसे उत्पतन और निपतनके द्वारा पूर्व उदाहरणमें निश्चय हो जाना कि यह वलाका ही है अथवा फहरानेकी क्रिया देखकर निश्चय होना कि यह पताका हो है । अवायके द्वारा निश्चित पदार्थको कालान्तरमें नहीं भूलना-उसकी स्मृति रखना धारणा है । अवग्रहादि वार ज्ञान क्रमसे होते हैं। जब किसी नवीन पदार्थको देखते हैं तब इनकी क्रमिक उत्पत्ति स्पष्ट ही अनुभवमें आती है और जन्न किसी पूर्वानुभूत पदार्थको देखते हैं तब इनकी उत्पत्ति शीनतासे होनेके कारण अनुभवमें नहीं आती । अवनह आदि चार प्रकारके ज्ञान बहु आदि पदार्थोके होते हैं। बहुत संख्या अथवा बहुत प्रमाणवाली वस्तुको बहु कहते हैं । इससे विपरीतको एक कहते हैं। बहुत प्रकारकी वस्तुओंको बहुविध कहते हैं और एक प्रकारको वस्तुकी एकविध कहते हैं। शीघ्रतासे परिवर्तित होनेवाली वस्तुको क्षिप्र कहते हैं । इससे विपरीतको अक्षिप्त कहते हैं । तालाब आदिसे बाहर नहीं निकले हुए पदार्थको अनि:सृत कहते हैं और बाहर निकले हुए पदार्थको निःसृत कहते हैं । विना कहे हुए पदार्थको अनुक्त कहते हैं और कहे हुए पदार्थको
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मम अविर । उक्त कहते हैं । पर्वतादिक स्थिर पदार्थको ध्रुव कहते हैं और गतिशील पदार्थको
अध्रुव कहते हैं । इन बहु आदि बारह प्रकारके पदार्थोंके अवग्रह आदि चार
ज्ञान होते हैं | इसलिये बारहमें चारका गुणा करनेपर अड़तालीस भेद होते हैं। । ये अड़तालीस भेद पाँच इन्द्रियों तथा मनसे होते हैं, इसलिये अड़तालीसमें छहका
गुणा करनेपर दो सौ अठासी भेद होते हैं । इनमें व्यञ्जनावग्रहके अड़तालीस भेद मिलानेपर मतिज्ञानके कुल तीनसौं छत्तीस भेद होते हैं। ___व्यक्त अर्थात् स्पष्ट पदार्थके अवग्रह आदि चारों ज्ञान होते हैं परन्तु व्यञ्जन अर्थात् अस्पष्ट पदार्थके ईहा, अवाय और धारणा ये तीन ज्ञान नहीं होते, मात्र अवग्रहजान होता है और वह भी चक्षु और मनको छोड़कर शेष चार इन्द्रियोंसे होता है। चक्षु और मनसे न होनेका कारण यह है कि ये दोनों इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी हैं अर्थात् पदार्थसे असम्बद्ध रहकर उसे जानती हैं। चक्षु
और मनको छोड़कर शेष चार इन्द्रियाँ प्राप्यकारी हैं क्योंकि पदार्थसे सम्बद्ध । होकर उसे जानती हैं। तीन सौ छत्तीस भेदोंमें अवग्रहके ७२ + ४८ = १२० भेद हैं तथा शेष तीन ज्ञानोंके बहत्तर बहत्तर भेद हैं ॥ २१-२३ ॥
___ श्रुतज्ञानका स्वरूप तथा भेद मतिपूर्व श्रुतं प्रोक्त मविस्पष्टार्थतर्कणम् ॥२४॥
तत्पर्यायादिभेदेन व्यासाविंशतिधा भवेत् । अर्थ-मतिज्ञामके बाद अस्पष्ट अर्थको तर्वाणाको लिये हुए जो ज्ञान होता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं। विस्तारको अपेक्षा पर्याय आदिके भेदसे श्रुतज्ञान बीस तरहका होता है।
भावार्थ-श्रुतज्ञानकी उत्पत्ति मतिज्ञानपूर्वक होती है अर्थान् मतिज्ञान पहले होता है और श्रुतज्ञान उसके बाद होता है। श्रुतज्ञानमें इन्द्रिय और मनका आलम्बन रहता है इसलिये यह परोक्षप्रमाण कहलाता है । इसमें
पदार्थको तर्कणा प्रत्यक्षज्ञानकी तरह स्पष्ट नहीं रहती। क्रमिकवृद्धिको अपेक्षा । इसके १ पर्याय, २ पर्यायसमास, ३ अक्षर, ४ अक्षरसमास, ५ पद, ६ पदसमास, 1. संघात, ८ संघातसमास, ९ प्रतिपत्तिक, १० प्रतिपत्तिकसमास, ११ अनुयोग, । १२ अनुयोगसमास, १३ प्राभृतप्राभृत, १४ प्राभूतप्राभूतसमास, १५ प्राभृत,
१६ प्राभृतसमास, १७ वस्तु, १८ वस्तुसमास, १९ पूर्व और २० पूर्वसमास ये बस भेद होते हैं। इनका संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है
१ पर्याय-सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें स्पर्शन इन्द्रियसम्बन्धी मतिज्ञानपूर्वक जो लब्ध्यक्षर नामका सर्वजघन्य धुतज्ञान होता है उसे पर्यायझान कहते हैं।
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तत्वार्थसार २ पर्यापसमास-पर्यायज्ञानके ऊपर तथा अक्षरज्ञानके पूर्व सक असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानोंको वृद्धिको लिये हुए जो श्रुतज्ञान होता है उसे पर्यायसमास कहते हैं। __३ अक्षर-उत्कृष्ट पर्यायसमाराझानसे अनन्तगुणा अक्षर नामका श्रुतज्ञान 'होसा है।
४ अक्षरसमास-अक्षरज्ञानके ऊपर और पदज्ञानके पहलेके ज्ञानको अक्षरसमास श्रुतज्ञान कहते हैं।
५ पर- अक्षरज्ञानके ऊपर क्रमस एक-एक अक्षरकी वृद्धि होते-होते जब संख्यात अक्षरोंकी वृद्धि हो जाती है तब पदनामका श्रुतज्ञान होता है। सोलह सो चौंतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ सौ अठासी अक्षरोंका एक मध्यमपद होता है।
६ पदसमास- एकपदके ऊपर और संघातनामक श्रुतज्ञानके पूर्व जो ज्ञान होता है उसे पदसमास कहते हैं।
७ संघात-एकपदके आगे क्रमसे एक-एक अक्षरकी वृद्धि होते-होते जब संख्यात हजार पदकी वृद्धि हो जावे तब संघात नामका श्रुतज्ञान होता है ! संघात नामक श्रुत्तज्ञानका इतना विस्तार हो जाता है कि उससे चारगतियोंमसे एकगतिका वर्णन होने लगता है ।
८ संघातसमास-संघात्तशानके ऊपर और प्रतिपत्तिकज्ञानके पहले जो ज्ञानके विकल्प हैं वे संघातसमास कहलाते हैं।
१ प्रतिपत्तिक-संघात श्रुतज्ञानके ऊपर क्रमसे एक-एक अक्षरको वृद्धि होते-होते जब संख्यात हजार संघातोंकी वृद्धि हो जावे तन्त्र प्रतिपत्तिक नामका श्रुतज्ञान होता है । इससे नरकादि चारों गतियोंका विस्तृत स्वरूप जाना जाता है।
१० प्रतिपत्तिकसमास-प्रतिपत्तिकज्ञानके ऊपर तथा अनुयोगज्ञानके पहले जो ज्ञानके विकल्प हैं उन्हें प्रतिपत्तिकसमास श्रुतज्ञान कहते हैं ।
११ अनुयोग-प्रतिपत्तिकज्ञानके ऊपर क्रमसे एक-एक अक्षरकी वृद्धि होतेहोते जब संख्यात हजार प्रतिपत्तिको वृद्धि हो जाये तब अनुयोग नामका श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञानके द्वारा चौदह मार्गणाओंका विस्तृत स्वल्प जाना जाता है।
१२ अनुयोगसमास-अनुयोगज्ञानके ऊपर प्राभृतप्राभृतज्ञानके पूर्व तक ज्ञानके जितने विकल्प हैं उन्हें अनुयोगसमास कहते हैं।
१३ प्राभूतप्राभूल-अनुयोगज्ञानके ऊपर क्रमसे एक-एक अक्षरको वृद्धि होतेहोते जब चतुरादि अनुयोगोंको वृद्धि हो जाये तब प्राभृतप्राभृत नामका श्रुतज्ञान होता है। वस्तु नामक श्रुतज्ञानके एक अधिकारको प्राभृत और प्राभृतके अधिकारको प्राभृतप्राभृत कहते हैं ।
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प्रथम अधिकार १४ प्राभूतप्राभूतसमास-प्राभृतप्राभृतज्ञानके ऊपर और प्राभृतज्ञानके पहले जानके जितने विकल्प हैं वे प्राभृतप्राभृतसमास कहलाते हैं।
१५ प्राभूत-प्राभूतप्राभृतज्ञानके कपर क्रमसे एक-एक अक्षरको वृद्धि होतेहोते जब चौबीस प्राभूतप्राभृतकी वृद्धि हो जावे तब प्राभृत नामका श्रुतज्ञान होता है।
१६ प्राभूतसमास-प्राभूतज्ञानसे ऊपर और बस्तुज्ञानके पहले ज्ञानके जितने विकल्प हैं वे प्राभृतसमास कहलाते हैं।
१७ वस्तु-प्राभृतज्ञानके ऊपर क्रमसे एक-एक अक्षरकी वृद्धि होते-होते जब बीस प्राभृतकी वृद्धि हो जावे तब वस्तु नामका श्रुतज्ञान होता है । एक-एक वस्तु अधिकारमें बीस-बीस प्राभृत होते हैं और एक-एक प्राभूतमें चौबीस-चौबीस प्राभृतप्राभूत होते हैं।
१८ वस्तुसमास-वस्तुज्ञानके ऊपर और पूर्वज्ञानके पहले जो ज्ञानके विकल्प हैं उन्हें वस्तुसमास श्रुतज्ञान कहते हैं ।
१९ पूर्व-वस्तुज्ञानके ऊपर एक-एक अक्षरकी वृद्धि होते-होते जब पदसंघात आदिकी वृद्धि हो चुकती है तब पूर्व नामका धुतज्ञान होता है । इसके उत्पाद, आग्नाचणीय, वीर्यप्रवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्रवाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद, प्रत्याख्यान, वीर्यानुवाद, कल्याणवाद, प्राणवाद, क्रियाविशाल और लोकबिन्दुसार ये चौदह भेद हैं। इनके कमसे दश, चौदह, आठ, अठारह, बारह, बारह, सोलह, बोस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश, दश, वस्तु नामक अधिकार हैं।
२० पूर्वसमास-पूर्वज्ञानके ऊपर और उत्कृष्ट श्रुतज्ञानके पहले ज्ञानके जितने विकल्प हैं वे पूर्वसमास नामक धुतज्ञान कहलाते हैं।
इन बीस भेदोंके सिवाय श्रुतज्ञानके अङ्गबाह्य और अङ्गप्रविष्टको अपेक्षा दो भेद और होते हैं। जिनमें अङ्गबाह्यके अनेक भेद हैं और अङ्गप्रविष्टके १ आचाराङ्ग, २ सूत्रकृताङ्ग, ३ स्थानाङ्ग, ४ समवायाङ्ग, ५ व्याख्याप्रज्ञप्ति, ६ धर्मकथान, ७ उपासकाध्ययनाङ्ग, ८ अन्तःकृद्दशाङ्ग, ९ अनुत्तरौपपादिकदशाङ्ग, १० प्रश्नव्याकरणाङ्ग, ११ विपाकसूत्राङ्ग और १२ दृष्टिवादाङ्ग ये बारह भेद हैं। __ अङ्गवाह्यके, १ सामायिक, २ चतुर्विशस्तव, ३ वन्दना, ४ प्रतिक्रमण, ५ वैनयिक, ६ कुतिकर्म, ७ दर्शवैकालिक, ८ उत्तराध्ययन, ९ कलपव्यवहार, १० कल्पाकल्य, ११ महाकल्प, १२ पुण्डरीक, १३ महापुण्डरोक, और १४ निषिद्धिका ये चौदह भेद है।
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१२
तस्वार्थसार
इनके अवान्तरभेद तथा स्वरूप आदिका वर्णन गोम्मटसार जीवकाण्डकी श्रुतज्ञानप्ररूपणासे जानना चाहिये ।। २४-२५ ।।
अयविज्ञानका स्वरूप तथा उसके भेद
परापेक्षां विना ज्ञानं रूपिणां भणितोऽवधिः ||२५|| अनुगोऽननुगामी च तदवस्थोऽनवस्थितिः | वर्धिष्णुयमानश्च षविकल्पः स्मृतोऽवधिः ||२६|| देवानां नारकाणां च स भवप्रत्ययो भवेत् । मानुषाणां तिरश्चां च क्षयोपशमहेतुकः ||२७||
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अर्थ- इन्द्रियादिक परपदार्थोकी अपेक्षाके विना रूपी पदार्थोंका जो ज्ञान होता है वह अवधिज्ञान कहा गया है। अनुगामी, अननुगामी, अवस्थित, अनवस्थित, वर्धमान और हीयमानके भेदसे वह अवधिज्ञान छह प्रकारका स्मरण किया गया है। इनके सिवाय अवधिज्ञानके भवप्रत्यय और क्षयोपशमहेतुक इस प्रकार दो भेद और माने गये हैं। इनमें देव और नारकियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान होता है तथा मनुष्य और तिर्यञ्चोंके क्षयोपशमहेतुक अवधिज्ञान होता हैं ।
भावार्थ - अवधिज्ञान प्रत्यक्षज्ञानों में सम्मिलित है। इसको उत्पत्ति बाह्य निमित्तों की अपेक्षा के विना होती हैं । यह अवधिज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल. भावको मर्यादा लिये हुए रूपीद्रव्योंको जानता है । यहाँ रूपीद्रव्यसे पुद्गलद्रव्य तथा संसारी जीवद्रव्यका ग्रहण है। यह अवधिज्ञान भवप्रत्यय तथा क्षयोपशमहेतुकके भेदसे दो प्रकारका होता है। जो किसी भवका निमित्त पाकर नियमसे प्रकट होता है वह भवप्रत्यय कहलाता है। यह देव और नारकियोंके नियमसे होता है । क्षयोपशमहेतुक अवधिज्ञानके अनुगामी, अननुगामी, अवस्थित, अनवस्थित, वर्धमान और हीयमानको अपेक्षा छह भेद हैं। जो एक पर्यायसे दूसरी पर्याय में अथवा एक क्षेत्रसे दूसरे क्षेत्र में साथ जावे उसे अनुगामी कहते हैं। जो साथ न जावे उसे अननुगामी कहते हैं । जो एक-सा रहे न घटे न बढ़े उसे अबस्थित कहते हैं । जो एक-सा न रहे, कभी घटे कभी बढ़े उसे अनवस्थित कहते हैं । जो उत्पत्ति समयसे लेकर आगे बढ़ता रहे उसे वर्धमान कहते हैं और जो उत्पत्ति के समय से लेकर घटता रहे उसे हीयमान कहते हैं ।
इन भेदोंके सिवाय अवधिज्ञानके देशावधि, परमावधि, और सर्वावधि, ये तीन भेद भी आगममें बताये गये हैं । इनमें देशावधि चारों गतियोंमें होता है परन्तु परमावधि और सर्वाविधि मनुष्यगति में मुनियोंके ही होते हैं ।। २५-२७ ॥
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प्रथम अधिकार
मनापर्ययज्ञानका लक्षण और भेद परकीयमनास्थार्थज्ञानमन्यानपेक्षया ।
स्यान्मनःपर्ययो भेदौ तस्यर्जुविपुले मती ॥२८॥ अर्थ--अन्य पदार्थों की अपेक्षाके विना दूसरेके मनमें स्थित पदार्थको जानना मनःपर्यय ज्ञान है। इसके ऋजुमति और विपुलमति इस प्रकार दो भेद हैं। ___भावार्थ-जो किसी बाह्य पदार्थकी सहायताके विना-ही दुसरेके मनमें स्थित रूपीपदार्थको जाने उसे मनःपर्यय ज्ञान कहते हैं। इसके दो भेद हैं१ ऋजुमति और विपुलमांत । इनका स्वरूप इस प्रकार है
ऋजुमति-सरल मन-वचन-कायसे चिन्तित दुसरेके मनमें स्थित रूपी पदार्थको जो जाने उसे ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
विपुलमति-सरल तथा कुटिल मन-वचन-कायसे चिन्तित दूसरेके मनमें स्थित पदार्थको जाने उसे विपुलमति मनःपर्ययज्ञान कहते हैं।
पुद्गलद्रव्य त्रिकालविषयक है। उसमें वर्तमान जीवके द्वारा जिसका चिन्तन किया जा रहा है ऐसे पुद्गलद्रव्यको ऋजुमतिज्ञान जानता है और भूतकालमें जिसका चिन्तन किया हो, भविष्यकालमें जिसका चिन्तन किया जावेगा और वर्तमान कालमें जिसका चिन्तन किया जा रहा हो उसे विपुलमति जानता है ।। २८ ।। ऋजुमति और विपुलमतिमें तथा अवधि और मन:पर्ययज्ञानमें विशेषता
विशुद्धधप्रतिपाताभ्यां विशेषश्चिन्त्यतां तयोः । स्वामिक्षेत्रविशुद्धिभ्यो विषयाच्च सुनिश्चितः ॥२९॥
स्थाद्विशेषोऽवधिज्ञानमनःपर्ययबोधयोः । अर्थ-विशुद्धि और अप्रतिपातकी अपेक्षा ऋजुमति तथा विपुलमतिमें विशेषता जाननी चाहिये । और स्वामी, क्षेत्र, विशुद्धि तथा विषयकी अपेक्षा अवधि और मनःपर्ययज्ञानमें विशेषता सुनिश्चित है।
भावार्थ-ऋजुमतिज्ञानकी अपेक्षा विपुलमतिज्ञानमें विशुद्धता अधिक है। इसके सिवाय ऋजुमति प्रतिपाती है अर्थात् ऐसे जीवोंको भी हो जाता है जो उपरितन गुणस्थानोंस पतित होकर नीचे आ जाते हैं परन्तु विपुलमति उन्हीं जीवोंको होता है जो उपरितन गुणस्थानोंसे नीचे नहीं आते । तात्पर्य यह है कि ऋजुमति उपशमक और क्षपक दोनों श्रेणीवाले मुनियोंके होता है जबकि विपुलमति क्षपकनेणीवाले मुनिके ही होता है। यद्यपि सामान्यरूपसे दोनों
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सत्त्वार्थसार प्रकारके मनःपर्यायज्ञान मुनियोंके ही होते हैं तो भी विपुलमति उन्हीं मुनियोंके होता है जिनका चारित्र उत्तरोत्तर बढ़ रहा है तथा जो किसी ऋद्धिके धारक होते हैं। विषयकी अपेक्षा भी दोनों में विशेषता है। विषयका वर्णन द्रव्य-क्षेत्रकाल और भाव इन चारकी अपेक्षा होता है। जैसे ऋजुमतिके जघन्य द्रव्यका प्रमाण औदारिक शरीरके निर्जीणं समयप्रबद्धप्रमाण है और उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण चक्षुरिन्द्रियके निर्जराद्रव्यप्रमाण है। अर्थात् समूचे औदारिक शरीरसे जितने परमाणुओंका प्रचय प्रत्येक समय खिरता है उसे जघन्य ऋजुमति जानता है और चक्षुरिन्द्रियसे जितने परमाणुओका प्रचय प्रत्येक समय दिरता है उसे उत्कृष्ट ऋजुमति जानता है। ऋजुमतिके उत्कृष्ट द्रव्यमें मनोद्रव्यवर्गणाके अनन्तवें भागका भाग देनेपर जो द्रव्य बचता है उसे जघन्य विपुलमति जानता है । विस्रसोपचयसे रहित आठ कर्मोके समयप्रबद्धका जो प्रमाण है उसमें एकबार ध्रवहारका भाग देनेपर जो लब्ध आता है उतना विपुलमतिके द्वितीय द्रव्यका प्रमाण होता है । इस द्वितीय द्रव्य के प्रमाणमें असंख्यातकल्पोंके जितने समय हैं उतनी बार ध्रुवहारका भाग देनेपर जो द्रव्य शेष बचता है वह विपुलमतिका उत्कृष्ट द्रष्य है । क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्य ऋजुमतिज्ञान दो तीन कोश और उत्कृष्ट ऋजुमतिज्ञान सात-आठ योजनकी बातको जानता है । तथा जघन्य-विपुल मतिज्ञान आठ-नव योजन और उत्कृष्ट विपुलमतिज्ञान पैंतालीसलाख योजन विस्तृत अढ़ाई द्वीपकी बातको जानता है । मानुषीत्तरपर्वत तकके क्षेत्रको अढ़ाई द्वीप कहते हैं परन्तु विपुलमतिज्ञान मानुषोत्तरपर्वतके बाहर कोणोंमें स्थित पदार्थको भी जानता है, इतनी विशेषता जाननी चाहिये। मनःपर्ययज्ञानका विषयक्षेत्र गोल न होकर समचतुरस्रघनप्रतररूप पैंतालीस लाख योजन प्रमाण है। कालकी अपेक्षा जघन्य ऋजुमति दो-तीन भव और उत्कृष्ट ऋजुमति सात-आठ भवको बात जानता है तथा जघन्य विपुलमतिज्ञान आठ-नौ भव तथा उत्कृष्ट विपुलमत्तिज्ञान पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण कालकी बातको जानता है। भावकी अपेक्षा यद्यपि ऋजुमतिका जघन्य और उत्कृष्ट विषय आवलिके असंख्यात भाग प्रमाण है तो भी जघन्य प्रमाणसे उत्कृष्ट प्रमाण असंख्यातगुणा है। विपुलमतिका जघन्य प्रमाण ऋजुमतिके उत्कृष्ट विषयसे असंख्यातगुणा है और उत्कृष्ट विषय असंख्यातलोक प्रमाण है। इस प्रकार मनःपर्ययज्ञानके दोनों भेदोंमें परस्पर अन्तर है ! अब अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें विशेषता बताते हैं । अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें स्वामी, क्षेत्र, विशुद्धि और विषयकी अपेक्षा विशेषता है। जैसे अवधिज्ञान तो चारों गतियोंके जीवोंके हो सकता है परन्तु मनःपर्यवज्ञान मनुष्यगति में छठवें गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक्रके जीवोंके ही होता है | अवधिज्ञान उत्कृष्टताकी अपेक्षा असंख्यात लोककी बात
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प्रथम अधिकार जान सकता है परन्तु मनःपर्ययज्ञान पैंतालीस लाख योजनको ही बात जानता है। अबधिज्ञानमें जितनी विशुद्धता है उससे मनःपर्ययज्ञानको विशुद्धसा कई गुणी है । अवधिज्ञानका उत्कृष्ट विषय एक परमाणु है, पर मनःपर्ययज्ञानका विषय परमाशुका अनन्तवाँ भाग है ॥ २९३ ॥
केवलज्ञानका लक्षण असहायं स्वरूपोत्थं निराकरणमक्रमम् ॥३०॥
घातिकर्मक्षयोत्पमं केवलं सर्वभावगम् । अर्थ जो किसी बाह्य पदार्थको सहायतासे रहित हो, आत्मस्वरूपसे उत्पन्न हो. आवरणसे रहित हो, क्रमरहित हो, घातियाकर्मोके क्षयसे उत्पन्न हुआ हो तथा समस्त पदाथोंको जानने वाला हो, उसे केवलज्ञान कहते हैं ।। ३०३ ।।
मतिज्ञानादि पांच ज्ञानोंका विषयनिवन्ध भतेविषयसम्बन्धः श्रतस्य च निबुध्यताम् ।।३।। असर्वपर्ययेष्वत्र सर्वद्रव्येषु धीधनः । असर्वपर्ययेष्विष्टो रूपिद्रव्येषु सोऽवधेः ॥३२॥ स मनःपर्ययस्येष्टोऽनन्तांशेऽयधिगोचरात् ।
केवलस्याखिलद्रव्यपर्यायेषु स सूचितः ||३३॥ अर्थ-मत्तिज्ञान और श्रुतज्ञानका विषय सम्बन्ध समस्त पर्यायोंसे रहित समस्त द्रव्योंमें बुद्धिमानोंको जानना चाहिये । अवधिज्ञानका विषय सम्बन्ध समस्त पर्यायोंसे रहित रूपीद्रव्यों-पुद्गल और संसारी जीवाम है। मनःपर्ययज्ञानका विषय सम्बन्ध अवधिज्ञानके विषयसे अनन्त भाग है और केवलज्ञानका विषय सम्बन्ध समस्त द्रव्यों और उनकी समस्त पर्यायोंमें कहा गया है। ___भावार्थ-मतिज्ञान और श्रुतज्ञान जानते तो समस्त द्रव्योंको हैं परन्तु उनकी कुछ पर्यायोंको ही जानते हैं, समस्त पर्यायोंको नहीं । ये दोनों ज्ञान अरूपी द्रव्योंको अनुमान तथा आगमके द्वारा जानते हैं। अवधिज्ञान रूपीद्रव्योंको जानता है परन्तु उनकी सब पर्यायोंको नहीं जानता। पुद्गलद्रव्य तो रूपी हैं ही, परन्तु उपचारसे संसारी जीवोंको भो रूपी कहा गया है। सूक्ष्मताकी अपेक्षा अवधिज्ञानका सर्वोत्कृष्ट भेद सर्वावधिज्ञान परमाणु तकको जानता है । मनःपर्ययज्ञानका विषय अवधिज्ञानके विषयसे अनन्तवें भाग है अर्थात् अबधिज्ञान
१ 'विबुध्यताम्' पाठान्तरम् ।
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तत्त्वार्थसार परमाणुको जानता है तो मनःपर्ययज्ञान परमाणुके भी अनन्त भागको जानता है। यद्यपि परमाणु स्वयं अविभागी एकप्रदेशी द्रव्य है लथापि मूक्ष्मताको बललानेके लिये उसमें अनन्तभागोंकी कल्पना की गई है। यदि परमाणुके अनन्तभाग किये जावे तो उनमेंसे एक भागको मनःपर्ययज्ञान जान मकता है । केवलज्ञान समस्त द्रव्योंकी समस्त पर्यायोंको एक साथ जानता है। एक-एक द्रव्यकी अनन्त पर्याय हो चुकी हैं, अनन्तानन्त आगे होनेवाली हैं और वर्तमानमें एक पर्याय है, इन सबके समूहको केवलनान एक-साथ जामना है।। ३०-३३ ।।
एक जीवमें एक साथ कितने ज्ञान हो सकते हैं ? जीवे युगपदेकस्मिन्नेकादीनि विभावयेत् ।
ज्ञानानि चतुरन्तानि न तु पञ्च कदाचन ।। ३४ ।। अर्थ–एक जीवमं एकसाथ एकको आदि लेकर चार तक ज्ञान हो सकते हैं । पाँच ज्ञान एक साथ कभी नहीं होते।
भावार्थ-मति आदि पाँच ज्ञानोंमें प्रारम्भके चार ज्ञान क्षायोपशामक ज्ञान हैं और केवलज्ञान क्षायिकज्ञान है। क्षायिकज्ञान ज्ञानावरणके क्षयम होता है तथा वह अकेला ही रहता है अर्थात उसके प्रकट होनेपर ज्ञानमें मतिज्ञानादि चारका व्यवहार मष्ट हो जाता है। एक जीवके एकसाथ एकसे लेकर चार तक ज्ञान हो सकते हैं, जैसे एक ज्ञान हो तो केवलज्ञान, दो हों तो मति और श्रुत, तीन हों तो मति, श्रुत और अवधि अथवा मति, श्रुत और मनःपर्यय और चार हों तो मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ।। ३४ ।।
मिथ्याज्ञान तथा उसको अप्रमाणता मतिः श्रुतावधी चैव मिथ्यात्वसमवायिनः । मिथ्याज्ञानानि कथ्यन्ते न तु तेषां प्रमाणता ।।३।। अविशेषात्सदसतोरुपलब्धेयदृच्छया ।
यत उन्मत्तवज्ज्ञानं न हि मिथ्यादृशोऽञ्जसा ।।३६।। अर्थ-मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान यदि मिथ्यात्वके साथ सम्बन्ध रखने वाले हैं तो मिथ्याज्ञान कहे जाते हैं और उस दशामें उनमें प्रमाणता नहीं मानी जाती। मिथ्यादष्टि जीवको सत् और असत् वस्तुका ज्ञान पागल मनुष्यके समान स्वेच्छानुसार समानरूपसे होता है, इसलिये उसका ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं कहलाता है।
भावार्थ-मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान मिथ्याज्ञान और सम्यग्ज्ञान
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प्रथम अधिकार दोनों रूप होते हैं। जब सम्यग्दृष्टि जीवके होते हैं तब सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं और उस दशा में प्रमाण माने जाते हैं परन्तु जब मिथ्यादृष्टि जीवके होते हैं तब मिध्याज्ञान माने जाते हैं और उस दशामें अप्रमाण माने जाते हैं । यद्यपि ज्ञान न मिथ्या होता है और न सम्यग, तो भी पात्रकी विशेषतासे उसमें मिथ्या और सम्यगका व्यवहार होता है । जिस प्रकार पात्रको विशेषतास दूध कडुआ कहा जाता है उसी प्रकार मिथ्यादष्टि पात्रकी विशेषतासे ज्ञान मिथ्याशान कहा जाता है । यद्यपि मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि जीवोंको पदार्थका प्रतिभास सामान्यरूपसे एक समान होता है तो भी मिथ्याष्टिका ज्ञान मिथ्याज्ञान हो रहता है क्योंकि उसे सल और असत् पदार्थमें कोई विशेषता नहीं रहती, वह अपनी इच्छासे दोनों पदार्थों को समानरूपसे ग्रहण करता है। जैसे पागल मनुष्य कभी स्त्रीको स्त्री और माताको माता जानता है परन्तु उसके वैसे जानने में कि नहीं रहा, इसलिये
पाना ...! .म्यग्ज्ञान नहीं कहा जाता। मनःपर्य यज्ञान छठवं गुणस्थानसे लेकर बारहवं गुणस्थान सकके मुनियोंके ही होता है और केवलज्ञान अरहन्त, सिद्ध अवस्था में ही होता है इसलिये ये दोनों सदा सम्यग् ही होते हैं उनमें मिथ्यापना नहीं रहता ।। ३५-३६ ।।
नयका लक्षण और उसके भेद वस्तुनोऽनन्तधर्मस्य प्रमाणव्यजितात्मनः ।
एकदेशस्थ नेता यः स नयोऽनेकधा मतः ||३७।। अर्थ-प्रमाणके द्वारा जिसका स्वरूप प्रकट है ऐसी अनन्तधर्मात्मक वस्तुके एक देशको जो जानता है वह नय है। नय अनेक प्रकारका माना गया है।
भावार्थ---संसारका प्रत्येक पदार्थ नित्य-अनित्य, एक-अनेक, भेद-अभेद आदि परस्पर विरोधी अनेक धर्मोका भण्डार है ऐसा प्रमाणज्ञानके द्वारा अनुभव में आता है। उन अनन्त धर्मो से जो किसी एकधर्मको जानता है बह नय काहलाता है । इस नयके अनेक भेद हैं ॥ ३७ ।।
द्रध्यार्थिक और पर्यायाथिक नयका स्वरूप द्रव्यपर्यायरूपस्य सकलस्यापि वस्तुनः । नयावंशेन नेतारौ द्वौ द्रव्यपर्यायार्थिको ||३८॥ अनुप्रवृत्तिः सामान्यं द्रव्यं चैकार्थवाचकाः । नयस्तद्विषयो यः स्याज्ञयो द्रव्यार्थिको हि सः ॥३९॥ व्यावृत्तिश्च विशेषश्च पर्यायश्चकवाचकाः । पर्यायविषयो यस्तु स पर्यायार्थिको मतः ॥४०॥
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तत्त्वार्थसार अर्थ--संसारकी सभी वस्तुएं द्रव्य और पर्यायरूप है । वस्तुकी इन दोनों रूपताको एक अंशसे ग्रहण करनेवाले द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय है। अर्थात् जब वस्तुकी द्रव्यरूपताको ग्रहण किया जाता है तब द्रव्याथिकनयका उदय होता है और जब पर्यायरूपताको ग्रहण किया जाता है तव पर्यायार्थिकनयका उदय होता है । अनुप्रवृत्ति, सामान्य और द्रव्य ये तीनों शब्द एकार्थवाची हैं अर्थात् सोनोगा एक ही भई होगा है। होना इन्हें विसापर करता है वह द्रव्याथिक नय है । ब्यावृत्ति, विशेष और पर्याय ये तीनों शब्द एकार्थवाची हैं । जो नय पर्यायको विषय करता है वह पर्यायाथिकनय कहलाता है।
भावार्य-जीवद्रव्य और नारक,तिर्यञ्च, मनुष्य, देवपर्याय, पुङ्गलद्रव्य और घट-पटादि पर्याय इस तरह संसारके समस्त पदार्थ द्रव्य और पर्यायरूप अनुभव आते हैं। जब पर्याय अशंको गौणकर मुख्यरूपसे द्रव्य अंशको जाना जाता है तब द्रव्याथिकनय होता है और जब द्रव्य अंशको गौणकर मुख्यरूपसे पर्याय अंशको जाना जाता है तब पर्यायाथिकनय होता है। अनुप्रवृत्ति, सामान्य और द्रव्य इन तीनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है । जो ज्ञान अनुप्रवृत्ति, सामान्य या द्रव्यको जानता है वह द्रव्याथिकानय कहलाता है। इसी प्रकार व्यावृत्ति, विशेष
और पर्याय ये तीनों शब्द एक अर्थक वाचक हैं जो नय पर्यायको विषय करता है वह पर्यायार्थिकनय है ।। ३८-४० 11
व्याथिकनयके भेद शुद्धाशुद्धार्थसंग्राही त्रिधा द्रव्यार्थिको नयः ।
नैगमसंप्रहश्चैव व्यवहारश्च संस्मृतः ।।४।। अर्थ-शुद्ध और अशुद्ध अर्थको ग्रहण करनेवाला द्रव्यापिकनय तीन प्रकारका माना गया है--१ नैगम, २ संग्रह और व्यवहार ।
भावार्थ-द्रव्याथिकनय न केवल शुद्ध द्रव्यको ही ग्रहण करता है किन्तु अशुद्ध द्रव्यको भी ग्रहण करता है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चार द्रव्य सदा शुद्ध ही रहते हैं और जीव तथा पुद्गल ये दो द्रव्य शुद्ध तथा अशुद्ध दोनों प्रकारके होते हैं। कर्म-नोकर्मके सम्बन्धसे रहित जीवद्रव्यका जो मुक्त अवस्था में परिणमन है वह शुद्ध जीवद्रव्यका परिणमन है और संसारी अवस्थाम जोवका जो परिणमन है वह अशुद्ध जीवद्रव्यका परिणमम है। इसी प्रकार जीवके रागादिभावोंका निमित्त पाकर पुद्गलद्रव्यमें जो कर्मरूप परिणमन हैं वह अशुद्ध पुद्गलका परिणमन है और जीवनिरपेक्ष पुदगलका जो परिणमन हैं वह शुद्ध पुद्गलका परिणमन है । अथवा पुद्गलका जो अणुरूप परिणमन है वह शुद्ध परिणमन हैं और द्वयणुक आदि स्कन्धरूप जो परिणमन है वह अशुद्ध
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प्रथम अधिकार परिणमन है । एक द्रव्य अनेक शुद्ध-अशुद्ध पर्यायाका समूह है इसालय द्रव्यार्थिक नय शुद्ध-अशुद्ध दोनों द्रव्योंको ग्रहण करनेवाला कहा गया है । नेगम, संग्रह और व्यबहारके भेदसे इसके तीन भेद हैं ।। ४१ ।। पर्यायाथिकनयके भेद और अर्थनय तथा शब्दनयका विभाग
चतुर्धा पर्यायार्थः स्यादृजुशब्दनयाः परे । उत्तरोत्तरमत्रैषां सूक्ष्मसूक्ष्मार्थभेदता । शब्दः समभिरूढेवंभृतौ ते शब्दभेदगाः ॥४२॥
(षट्पवम् ) चत्वारोऽर्थनया आधास्त्रयः शब्दनयाः परे।
उत्तरोत्तरमत्रैषां सूक्ष्मगोचरता मता ॥४३॥ अर्थ-पर्यायाथिक नयके चार भेद हैं.–१ ऋजुसूत्रनय, २ शब्दनय, ३ समभिरूदनय और ४ एवंभूतनय । इन नयोंमें उत्तरोत्तर अर्थको सूक्ष्मता रहती है। अथवा प्रारम्भके चारनय अर्थनय हैं और आगेके तीन नय शब्दनय हैं । इन नयोंमें भी उत्तरोत्तर विषयकी सूक्ष्मता मानी गई हैं।। ४२-४३ ।।
नैगमनयका लक्षण अर्थसंकल्पमात्रस्य ग्राहको नैगमो नयः ।
प्रस्थौदनादिजस्तस्य विषयः परिकीर्तितः ।।४४॥ अर्थ-जो नय पदार्थके संकल्पमात्रको ग्रहण करता है वह नैगमनय है। जैसे कोई मनुष्य जंगलको जा रहा था, उससे किसीने पूछा कि-जंगल किसलिये जा रहे हो ? उसने उत्तर दिया कि प्रस्थ लाने जा रहा हूँ | प्रस्थ एक परिमाणका नाम है । जंगलमें प्रस्थ नहीं मिलता है। वहाँसे लकड़ी लाकर प्रस्थ बनाया जावेगा, परन्तु जंगल जानेवाला व्यक्ति उत्तर देता है कि---प्रस्थ लानेके लिये जा रहा हूँ । यहाँ प्रस्थके संकल्पमात्रको ग्रहण करनेसे नैगमनयका वह विषय माना गया है । दूसरा दृष्टान्त ओदनका है । कोई मनुष्य लकड़ी, पानी, आगी आदि एकत्रित कर रहा था। उससे किसीने पूछा-क्या कर रहे हो? उत्तर दिया, ओदन अर्थात् भात बना रहा हूँ। यद्यपि उस समय वह भात नहीं बना रहा था, सिर्फ सामग्नी एकत्रित कर रहा था तो भी भातका संकल्प होनेसे उसका वह उत्तर नैगमनयका विषय स्वीकृत किया गया है॥ ४४ ।।
संग्रहनयका लक्षण भेदेनैक्यमुपानीय स्त्रजातरविरोधतः ।
समस्तग्रहणं यस्मात्स नयः संग्रहो मतः ||४५|| १ 'भेदेऽप्यक्य' पाठान्तरम् ।
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तत्त्वार्थसार अर्थ-अपनी जातिका विरोध न करते हुए भेद द्वारा एकत्वको प्राप्त कर समस्त पदार्थोंका ग्रहण जिससे होता है वह संग्रहनय माना गया है। जैसे सत्, द्रव्य और घट आदि । अर्थात् सत्के कहनेसे समस्त सतोंका ग्रहण होता है, द्रव्यके कहने से समस्त द्रव्योंका संग्रह होता है और घटके कहनेसे समस्त घटोंका बोध होता है। संग्रहनयमें अवान्तर विशेषताओंको गौण कर सामान्यको विषय किया जाता है ।। ४५ ॥
व्यवहारनयका लक्षण संग्रहेण गृहीतानामर्थानां विधिपूर्वकः ।
व्यवहारो भवेद्यस्माद् व्यवहारनयस्तु सः ।।४६॥ अर्थ—संग्रहनयके द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थोंमें विधिपूर्वक भेद करना । व्यवहारनय है। जैसे सत्के दो भेद हैं-द्रव्य और गुण । द्रव्यके दो भेद हैंजीवद्रव्य और अजीवद्रव्य | घटके दो भेद हैं पार्थिव (मिट्टीका) और अपार्थिव ( मिट्टीसे भिन्न धातुओंसे निर्मित ) ॥ ४६ ।।
ऋजु सूत्रनयका लक्षण ऋजुसूत्रा स विज्ञेयो येन पर्यायमात्रकम् ।
वर्तमानैकसमयविषयं परिगृह्यते ॥४७|| अर्थ—जिसके द्वारा वर्तमान एक समयको पर्याय ग्रहण की जावे उसे ऋजुसूत्रनय कहते हैं ।। ४७ ॥
शम्दनयका लक्षण लिङ्गसाधनसंख्यानां कालोपग्रहयोस्तथा ।
व्यभिचारनिवृत्तिः स्याछतः शब्दनयो हि सः ॥४८॥ अर्थ-जिससे लिङ्ग, साधन, संख्या, काल और उपग्रहके व्यभिचारको निवृत्ति होती है वह शब्दनय है। लिङ्ग-व्यभिचार—जैसे 'पुष्यः तारका और नक्षत्रम् ।' ये भिन्न-भिन्न लिङ्गके शब्द हैं, इनका मिलाकर प्रयोग करना लिमव्यभिचार है। साधन-व्यभिचार---जैसे, 'सेना पर्वतमाधिवसति' सेना पर्वत पर है, यहाँ अधिकरण कारकमें सप्तमी विभक्ति होनी चाहिये, पर 'अधि' उपसर्ग पूर्वक वसधातुका प्रयोग होनेसे द्वितीया विभक्तिका प्रयोग किया गया है। संख्याव्यभिचार-जैसे, 'जलं, आपः, वर्षाः ऋतुः, आम्राः बनम्, बरणाः नगरम्' । यहाँ एकवचनान्त और बहुवचनान्त शब्दोंका विशेषण विशेषरूपसे प्रयोग किया गया है। कालव्यभिचार-जैसे, 'विश्वदृश्वास्य पुत्रो जनिता' इसका पुत्र
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प्रथम अधिकार विश्वदृश्वा होगा । जिसने विश्वको देख लिया है वह विश्वदृश्वा कहलाता है यहाँ 'विश्वदृश्वा' इस भूतकालिक कर्ताका 'जनिता' इस भविष्यत्कालिक क्रियाके साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है। जैसे-'संतिष्ठते, प्रतिष्ठते, बिरमति, उपरमति आदि' यहाँ परस्मैपदी 'स्था' धातुका 'सम्' और ' उपसर्गके कारण आत्मनेपदमें प्रयोग हुआ है तथा 'रम' इस आत्मनेपदी धातुका 'वि' और 'उप' उपसर्गके कारण परस्मैपदमें प्रयोग हुआ है। लोकमें यद्यपि ऐसे प्रयोग होते हैं तथापि इस प्रकारके व्यवहारको शब्दनय अनुचित मानता है ।। ४८ ॥
समभिरूढनयका लक्षण ज्ञेयः समभिरूढोऽसौ शब्दो यद्विपयः स हि ।
एकस्मिन्नभिरूढोऽर्थे नानार्थान् समतीत्य यः ।।४।। ___ अर्थ जहाँ शब्द नाना अर्थोंका उल्लङ्घन कर किसी एक अर्थमें रूढ होता हैं उसे समभिरूढनय जानना चाहिये। जैसे 'गौः' यहाँ गो शब्द, वाणी आदि अर्थीको गौणकर गाय अर्थमें रूढ हो गया है ॥ ४९॥
एवम्भूतनयका लक्षण शब्दो येनात्मनाभूतस्तेनैवाध्यवसाययेत् ।
यो नयो मुनयो मान्यास्तमेवंभृतमभ्यधुः ॥५०॥ अर्थ-शब्द जिस रूपमें प्रचलित है उसका उसी रूपमें जो नय निश्चय कराता है माननीय मुनि उसे एवम्भूतनय कहते हैं। जैसे इन्द्र शब्दका व्युत्पत्त्यर्थ 'इन्दतीति इन्द्र' ऐश्वर्यका अनुभव करनेवाला है इसलिये यह नय इन्द्रको उसी समय इन्द्र कहेगा जब कि वह ऐश्वर्यका अनुभव कर रहा होगा, अभिषेक या पूजन करते समय इन्द्रको इन्द्र नहीं कहेगा। तात्पर्य यह है कि समभिरूवनय शब्दके वाच्यार्थको ग्रहण करता है और एवंभूतनय निरुक्त अर्थको ॥५०।।
नयोंको परस्पर सापेक्षता एते परस्परापेक्षाः सम्यग्ज्ञानस्य हेतवः । 'निरपेक्षाः पुनः सन्तो मिथ्याज्ञानस्य हेतवः ॥५१॥
१ 'निरपेक्षा नया मिश्याः, सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत'। --आप्तमीमांसा २ य एवं नित्यक्षणिकादयो नया मिथोनपेक्षाः स्वपरप्रणाशिनः । त एक सत्त्वं विमलस्य ते मुनेः परस्परेक्षाः स्वपरोपकारिणः ॥
-स्वयंभूस्तोत्र
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तत्त्वार्थसार
अर्थ - ये नय यदि परस्पर सापेक्ष रहते हैं तो सम्यग्ज्ञानके हेतु होते हैं और निरपेक्ष रहते हैं तो मिथ्याज्ञानके हेतु होते हैं ।
२२
भावार्थ- परस्पर विरोधी नयोंमें जब एकको मुख्य किया जाता है तब दूसरेको गौण किया जाता है इस तरह मुख्य और गौणकी पद्धतिसे उनमें परस्पर सापेक्षता बनी रहती है तथा वे वस्तुके यथार्थ स्वरूपका प्रतिपादन करते समय दूसरे नयको सर्वथा छोड़ दिया जाता है तब वे नय परस्पर निरपेक्ष हो जाते हैं और वस्तुका यथार्थ स्वरूप कहने में असमर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि परस्पर सापेक्ष नयोंको सम्यग्ज्ञानका और परस्पर निरपेक्ष नवोंको मिथ्याज्ञानका हेतु कहा गया है ।। ५१ ॥
पदार्थोंको जानने के उपाय आर्याछन्दः
निर्देश: स्वामित्वं साधनमधिकरणमपि च परिचिन्त्यम् । स्थितिरथ विधानमिति पद् तत्वानामधिगमोपायाः ||२२||
अर्थ – निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान तत्त्वोंको जानने के ये छह उपाय हैं ।
भावार्थ -- निर्देश वस्तुके स्वरूपका कथन करना निर्देश कहलाता है । स्वामित्व — वस्तुके अधिकारको स्वामित्व कहते हैं । साधन - वस्तुकी उत्पत्ति कारणोंको साधन कहते हैं । अधिकरण- वस्तुके आधारको अधिकरण कहते हैं । स्थिति-वस्तु के अस्तित्व कालको स्थिति कहते हैं । विधान - वस्तुके भेदोंको विधान कहते हैं ।
किसी नवीन वस्तुके दिखनेपर सबसे पहले देखनेवालेके मनमें यह जिज्ञासा होती है कि यह क्या है ? इस जिज्ञासाकी पूर्ति करनेवाला निर्देश है। इसके बाद दूसरी जिज्ञासा होती हैं कि यह वस्तु किसकी है ?-- इसका स्वामी कौन है ? इस जिज्ञासाका समाधान करनेवाला स्वामित्व है। इसके अनन्तर जिज्ञासा होती है कि वस्तु किन साधनोंसे बनती है ? इसका उत्तर देनेवाला साधन है । इसके पश्चात् जिज्ञासा होती है कि यह वस्तु मिलती कहाँ है ? इसका उत्तर देनेवाला अधिकरण है । तदनन्तर जिज्ञासा होती है कि यह वस्तु कितने समयतक टिकती है - इसको ग्यारंटी क्या है ? इसका उत्तर देनेवाला स्थिति नामका उपाय है और उसके पश्चात् जिज्ञासा होती है कि यह कितने प्रकारका है ? इसका उत्तर देनेवाला विधान है। इस तरह संसारके प्रत्येक पदार्थोंको जाननेके
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प्रथम अधिकार
२३ लिये निर्देश आदि छह उपाय प्रयोगमें लाये जाते हैं । यहाँ सम्यग्दर्शनके विषयमें इन छह उपायोंको स्पष्ट किया जाता है ! जैसे
प्रश्न-सम्यग्दर्शनका निर्देश क्या है ? उत्तर-तत्त्वार्थका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। प्रवन–सम्यग्दर्शनका स्वामी कौन है ?
उत्तर–सामान्यरूपसे सम्यग्दर्शन संज्ञी पञ्चेन्द्रिय चातुर्गतिक भव्य जोवके होता है। विशेषरूपसे गतिकी अपेक्षा नरकतिमें सभी पृथिवियोंके पर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन हैं। प्रथम पृथिवीमें पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनोंके क्षायिक और क्षायोपामिक सम्यग्दर्शन होते हैं । तिर्यञ्चतिमें पर्याप्तकतिर्यञ्चोके औषमिक सम्यग्दर्शन है और क्षायिक तथा क्षायोपमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनोंके होते हैं । तिरश्चियोंके क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता, क्योंकि कर्मभूमिज मनुष्यके ही दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ होता है और क्षपणाके पूर्व तिर्यञ्च आयका बन्ध करनेवाला मनुष्य भोगभूमिके पुरुषवेदी तिर्यञ्चोंमें ही उत्पन्न होता है स्त्रीवेदी तिर्यञ्चोंमें नहीं 1 नबीन उत्पत्तिको अपेक्षा पर्याप्तकतिरश्चियोंके औपशमिक और क्षायोपमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं। मनुष्यगलिमें पर्याप्तक और अपर्याप्तक मनुष्योंके क्षायिक और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं। औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तक मनुष्योंके ही होता है अपर्याप्तक मनुष्योंके नहीं । मानुषीस्त्रीवेदी मनुष्योंको पर्याप्तक अवस्थामें तीनों होते हैं परन्तु अपर्याप्तक अवस्थामें एक भी नहीं होता। क्षायिकसम्यग्दर्शन भाववेदकी अपेक्षा ही होता है द्रव्यवेदकी अपेक्षा नहीं । देवगतिमें पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोभाके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । उपशम सम्यग्दष्टि जीव मरकर देवोंमें उत्पन्न होते हैं । इस अपेक्षा दहां अपर्याप्सक अवस्थामें भी औपशभिक सम्यक्त्वका सदभाव बनता है। भवनवासी ध्यन्तर और ज्योतिष्क देव, उनको देवाङ्गनाओं तथा सौधर्मशान स्वर्गकी देवाङ्गनाओंके अपर्याप्तक अवस्थामें एक भी सम्यग्दर्शन नहीं होता, किन्तु उनके पर्याप्तक अवस्थामें औपमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होते हैं।
प्रश्न-सम्यग्दर्शनका साधन क्या है ?
उत्तर-साधनके अन्तरङ्ग और बहिरङ्गकी अपेक्षा दो भेद हैं । सम्यग्दर्शनका अन्तरङ्गसाधन, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति तथा अनन्तानुबन्धी, क्रोध-मान-माया-लोभ इन सात प्रकृतियोंका उपशम, क्षय और क्षयोपशम है.। बहिरमसाधन, नरकगतिमें चौथी पृथिवीके पहले अर्थात् तीसरी पृथिवीतक किसीके जालिस्मरण, किसीके धर्मश्रवण और किसीके तीव्रवेदनाका अनुभव है। चौथी पृथिवीसे सातवी पृथिवीतक जातिस्मरण और तीव्रवेदनाका
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तत्त्वार्थसार
अनुभव है । तिर्यञ्चगति में किन्हीं के जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण और किन्हींके जिनबिम्बदर्शन है। मनुष्यगतिमें भी इसी प्रकार तीनों बाह्यसाधन हैं । देवगतिमें आनतस्वर्गके पहले-पहले किन्होंके जातिस्मरण, किन्हीके धर्मश्रवण, किन्हीके जिनकल्याणकदर्शन और किन्हीं के देवदर्शन है । आनतप्राणत आरण और अच्युत स्वर्गके देवोंके देवद्धिदर्शनको छोड़कर तीन साधन है | नवग्रेबेकवासी देवोंके किन्होंके जातिस्मरण और किन्होंके धर्मश्रवण साधन है। अनुदिश और अनुत्तर विमानोंमें नियमसे सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं इसलिये वहाँ साधनोंकी चर्चा नहीं है ।
प्रश्न- सम्यग्दर्शनका अधिकरण क्या है ?
उत्तर - अधिकरण के भी बाह्य और आभ्यन्तरकी अपेक्षा दो भेद हैं । आभ्यन्तर अधिकरण स्वस्वामिसम्बन्ध के योग्य आत्मा ही है और बाह्यअधिकरण एकराजू चौड़ी तथा चोव्हराजू लम्बी लोकनाड़ी है ।
प्रश्न- सम्यग्दर्शनकी स्थिति क्या है ?
उत्तर – औपशमिक सम्यग्दर्शनकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है । क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट छयासठसागर प्रमाण है । क्षायिक सम्यग्दर्शन उत्पन्न होकर नष्ट नही होता, इसलिये इस अपेक्षा उसकी स्थिति सादि-अनन्त है परन्तु संसारमें रहनेको अपेक्षा जघन्यस्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्तसहित आठवर्ष कम दो करोड़वर्ष पूर्व तथा तेतीससागरकी है ।
प्रश्न- सम्यग्दर्शनका विधान --- भेद क्या है ?
उसर — सम्यग्दर्शनके निसर्गज और अधिगमजकी अपेक्षा दो भेद होते हैं । अथवा औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिकको अपेक्षा तीन भेद हैं ।
इसी तरह सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र तथा जीव अजीव तत्त्वोंके विषयमें भी निर्देश आदि छह उपायोंकी योजना करनी चाहिये ॥ ५२ ॥
तत्त्वोंको जाननेके अन्य उपाय आर्याछन्द
अथ सत्संख्या क्षेत्र स्पर्शनकालान्तराणि भावश्च । अल्पबहुत्वं चाष्टावित्यपरेऽप्यधिगमोपायाः ||५३॥
अर्थ - इसके अनन्तर सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व ये आठ अनुयोग भी तत्त्वोंके जाननेके उपाय हैं ।
भावार्थ- सद् आदि आठ अनुयोगोंके द्वारा भी जीवादि तत्त्वोंका ज्ञान होता है । इनका सामान्य स्वरूप इस प्रकार है ।
सत् — वस्तुके अस्तित्वको सत् कहते हैं ।
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प्रथम अधिकार
संख्या-वस्तुकी गणनाको संख्या कहते हैं। क्षेत्र-वस्तुके वर्तमान निवासको क्षेत्र कहते हैं। स्पर्शन-वस्तुके त्रिकाल-सम्बन्धी निवासको स्पर्शन कहते हैं । काल–वस्तुके अस्तित्वके समयको काल कहते हैं।
अन्तर-वस्तुके नष्ट होनेपर पुनः उसकी उत्पत्तिमें जो व्यवधान पड़ता है उसे अन्तर कहते हैं।
भाव-वस्तुके गुणोंको भाव कहते हैं । जैसे जीवके औपशमिकादि भाव । अल्पबहुत्व वस्तुके भेदोंमें होनाधिकताको अल्पबहुत्व कहते हैं ।
इन आठ अनुयोगोंका गुणस्थान और मार्गणाओंकी अपेक्षा विशद वर्णन धवलादि गन्थों में देखना चाहिये ! ५३ ।
सप्त तत्त्वोंको जानने की प्रेरणा
शालिनी छन्द सम्यग्योगो मोक्षमार्ग पप्रिन्सुयस्ता नामस्थापनाद्रव्यभावैः । स्याद्वादस्थांप्राप्य तैस्तैरुपायैः प्राग्जानीयात्सप्ततची क्रमेण ॥५४॥
अर्थ-मोक्षमार्गको प्राप्त करनेका इच्छुक मनुष्य, अपने मन-वचन-कायरूप योगोंको ठीक कर नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव निक्षेपके द्वारा व्यवहृत तथा स्याद्वाद सिद्धान्तमें निरूपित सात तत्त्वोंके समूहको पूर्वोक्त उपायों द्वारा सबसे पहले यथाक्रमसे जाने ।
भावार्थ---जीव,अजीब, आसब, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व सम्यग्दर्शनके मूल विषय हैं । इसलिये मोक्षमार्ग में प्रवेश करनेके इच्छुक मनुष्यको इन सात तत्त्वोंको सबसे पहले अच्छी तरह जान लेना चाहिये । इन सात तत्त्वोंका न्यास अर्थात् व्यवहार नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव इन चार निक्षेपोंके द्वारा होता है तथा उनके जानने के उपाय प्रमाण, नय, निर्देश तथा सत्, संख्या आदि अनुयोगों के रूपमें ऊपर दिखाये जा चके हैं ।। ५४ ।।
इस प्रकार अमृतचन्द्राचार्यद्वारा विरचित तत्त्वार्थसारमें सात तत्त्वोंका वर्णन
करनेवाला पीठिकावन्ध नामका प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।
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द्वितीयाधिकार जीवतत्त्वनिरूपण
मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञायाक्य अनन्तानन्तजीवानामेकैकस्य प्ररूपकान् ।
प्रणिपत्य जिनान्मृनो जीवतत्वं प्ररूप्यते ॥ १ ॥ अर्थ-अनन्तानन्त जीवों से एक-एक जीवका निरूपण करनेवाले जिनेन्द्र भगवानको शिरसे प्रणाम कर जीवतत्त्वका निरूपण किया जाता है ॥१॥
जीवका लक्षण अन्यासाधारणा भावाः पञ्चोपचमिकादयः ।
स्वं तत्त्वं यस्य तत्वस्य जीवः स व्यपदिश्यते ।। २ ।। अर्थ-जीवको छोड़कर अन्य द्रव्योंमें नहीं पाये जाने वाले औपशमिक आदि पांच भाव जिस तत्त्चके स्वतस्व हैं वह जीव कहा जाता है ।। २॥
____औपशमिकादि पांच भावोंके नाम स्यादौपशमिको भावः क्षायोपमिकस्तथा ।
क्षायिकश्चाप्यौदयिकस्तथान्यः पारिणामिकः ।। ३ ।। अर्थ-औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक, औदयिक और पारिणामिक ये जीवके स्वतत्त्व है। ___ भावार्थ औपशमिकादि भाव जीवके स्वतत्त्व इसलिये कहे जाते हैं कि ये जीवको छोड़कर अन्य द्रव्योंमें नहीं पाये जाते। परन्तु स्वतत्त्व होने मात्रसे ये जीवके लक्षण नहीं हो सकते, क्योंकि लक्षण बही हो सकता है जो समस्त लक्ष्यमें पाया जावे, अलक्ष्यमें न पाया जावे तथा असंभव दोपसे रहित हो । औपशमिक, क्षायोपशमिक, झायिक और औदयिक भाव सब जीवोंमें नहीं पाये जाते, मात्र पारिणामिक भावोंमें जीवत्व नामका पारिणामिक भाव सब जीबोंमें पाया जाता है। अब इन भावोंके लक्षण लिखते हैं
१ औपशामिक भाव द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावके कारण अन्तमहर्तके लिये कर्मोकी फल देनेकी शक्तिका प्रकट नहीं होना उपशम कहलाता है । इस उपशमके समय जो भाव होता है उसे औपशमिकभाव कहते हैं ।
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द्वितीयाधिकार २क्षायोपशमिकभाष–वर्तमानकालमें उदय आनेवाले सर्वघातिस्पर्द्धकोके निषेकोंका उदयाभावी क्षय तथा आगामी कालमें उदय आनेवाले निषेकोंका गानाथारूप उपशम राम बाशिका संदरः रहोपर जो भाव होता है उसे क्षायोपशमिकभाव काहते हैं । इसीका दूसरा नाम मिश्रभाव है।
क्षायिकभाव-आत्मासे कर्मोका सर्वथा दुर होना क्षय कहलाता है। क्षयके समय जो भाव होता है उसे क्षायिक भाव कहते हैं।
४ औदयिकभाव-द्रव्यादि निमित्तके वशसे कर्मोका फल प्रास होना उदय कहलाता है। उदयके समय जो भाव होता है उसे औदयिकभाव कहते हैं।
५ पारिणामिकभाव-कर्मोंके उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशमसे निरपेक्ष जीवका जो भाव है उसे पारिणामिकभाव कहते हैं ।। ३ ।।
औपशमिकभावके भेद भेदौ सम्यक्त्वचारित्रे द्वावापशमिकस्य हि । अर्थ-औपमिकभावके दो भेद हैं-१ औपशमिक सम्यक्त्त्व और औपशमिक चारित्र। ___ भावार्थ-उपशम अवस्था सिर्फ मोहनीयकर्ममें होती है। मोहनीय कर्मके दो भेद हैं-दर्शनमोहनीय और चरित्रमोहनीय। इन दोनों भेदोंके उपशमसे दो भाव प्रकट होते हैं-१ औपमिकसम्यक्रत्व और २ औपशमिकचरित्र । इनके लक्षण इस प्रकार है
१. औपशामिकसम्यक्त्व-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति और अनन्तानृबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात प्रकृतियोंके उपशमसे श्रद्धागुणकी जो पर्याय प्रकट होती है उसे औपशमिक सम्यग्दर्शन कहते हैं । औपशमिक सम्यग्दर्शनके दो भेद हैं.-१ प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन और २ द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन | प्रथमोपशम सम्यग्दर्शनका लक्षण पर कहा जा चुका है। उपशम श्रेणी चढ़नेके सम्मुख क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव जव अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी विसंबोजना-अप्रत्याख्यानावरणादिरूप परिणति करता है तब उसके द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन चतुर्थसे लेकर सप्तम गुणस्थान तक होता है और द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन चतुर्थ से ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। यद्यपि इसकी उत्पत्ति सप्तम मुणस्थानमें होती है तथापि उपशम श्रेणीवाला जोव उपरितन गुणस्थानोंसे पतन कर जब नीचे आता है तब चतुर्थादि गुणस्थानोंमें भी इसका सद्भाव रहता है। अनादि मिथ्याष्टि जीवको जब सम्यग्दर्शन होता है तब सर्व प्रथम औपशर्मिक सम्यग्दर्शन हो होता है।
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तत्त्वार्थसार २. औपशमिक्षचारित्र-चारित्रमोहनीयकी समस्त प्रकृतियोंका उपशम होनेपर जो चारित्र प्रकट होता है उसे औपमिकचारित्र कहते हैं। यह ग्यारहवें गुणस्थानमें ही होता है। अन्तमुहूर्त के बाद इसका पतन नियम हो जाता है।
क्षायोपशमिकभावके भेव अज्ञानत्रितयं ज्ञानचतुष्कं पञ्चलब्धयः ।। ४ ।। देशसंयमसम्यक्त्वे चारित्रं दर्शनत्रयम् ।
क्षायोपशमिकस्यैते भेदा अष्टादशोदिताः ॥५ अर्थ कुमति, कुश्रुत और कुअवधि ये तीन अज्ञान मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चार ज्ञान, दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पाँच लब्धियाँ, देशसंयम, क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन, क्षायोपशमिकचारित्र तथा चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधिदर्शन ये तीन दर्शन सब मिलाकर क्षायोपशमिकभावके अठारह भेद कहे गये हैं।
भावार्थ-क्षयोपशम अवस्था ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चार धातियाकोंकी होती है। इन्हीं कमोंके क्षयोपशमसे ऊपर कहे हुए अठारह भाव प्रकट होते हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं
अज्ञानत्रय-मिथ्याल्बके उदयसे दूषित मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान, अज्ञानत्रय कहलाते हैं। इनके नाम कुमति, कुश्रुत और कुअवधि । दूसरेके उपदेशके बिना विष, यन्त्र, कूट, पञ्जर तथा बन्ध आदिक विषयमें जो प्रवृत्ति होती है उसे कुमतिज्ञान--मत्यज्ञान कहते हैं 1 वेद, भारत तथा रामायण आदिके परमार्थशून्य उपदेशको कुश्रुतज्ञान अथवा थुताज्ञान कहते हैं । मिथ्यादृष्टि जीवके अवधिज्ञानको कुअवधिज्ञान अथवा विभङ्गज्ञान कहते हैं। इसके भवप्रत्यय विभङ्ग और क्षायोपशमिक विभङ्गके भेदसे दो भेद हैं। भवप्रत्ययविभङ्ग देव और नारकियोंके होता है तथा क्षायोपशमिक विभङ्ग मनुष्य और तिर्यञ्चोंके होता है । इस विभङ्गके ज्ञान द्वारा दूसरोंके अपकारको जानकर मारकी आदि जीव परस्परको कलहमें प्रवृत्त होते हैं।
ज्ञानचतुष्क-सम्यग्दृष्टि जीवके मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ये चार ज्ञान ज्ञानचतुष्क कहलाते हैं। इनके लक्षण पहले लिखे जा चुके हैं। मतिज्ञानावरण, शुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण और मनःपर्ययज्ञानाबरणके क्षयोपशमसे ये चार ज्ञान प्रकट होते हैं । मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान ये तीन ज्ञान चतुर्थसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक होते हैं और मनःपर्ययज्ञान पष्ठ गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक होता है ।
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द्वितीयाधिकार
. .ना
पञ्चलब्धियाँ-दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य ये पांच लब्धियां कहलाती हैं। दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे ये प्रकट होती हैं। ये लब्धियाँ मिथ्यादष्टि तथा सम्यग्दृष्टि दोनोंके होती हैं।
वेशसंयम-अनन्तानबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण क्रोध,मान,माया, लोभ इन या प्रकृतियोंके स्नाभाती क्षण तथा सटवस्थारूप उपशम होनेसे और प्रत्याख्यानावरणचतुष्क तथा संज्वलनचतुष्कका उदय होनेपर एवं हास्य आदि नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो एकदेशसंयम प्रकट होता है उसे देशसंयम अथवा संयमासंयम कहते हैं। इस संयममें असहिसा आदि सूक्ष्म पापोंसे निवत्ति न होनेके कारण अविरत अवस्था रहती है। यह देशसंयम सिर्फ पञ्चम गुणस्थानमें होता है | इसके दर्शनप्रतिमा आदि ग्यारह अवान्तर भेद होते हैं।
क्षायोपशमिकसम्यक्त्व-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धीचतुष्क इन छह सर्वघाती प्रकृतियोंके वर्तमानकालमें उदय आनेवाले निषेकोंका उदयाभावी क्षय तथा आगामी कालमें उदय आनेवाले निषेकोंका सदवस्थारूप उपशम तथा सम्यक्त्वप्रकृति नामक देशघातिप्रवृत्तिका उदय रहते हए जो सम्यग्दर्शन प्रकट होता है उसे क्षायोपशमिकासम्यक्त्व कहते हैं। यह चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सातवें गुणस्थान तक होता है । इसीका दूसरा नाम वेदकसम्यग्दर्शन है।
क्षायोपशभिकचारित्र-अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्यख्यानावरणचतुष्क सम्बन्धी बारह सर्वघाति प्रवृतियोंके वर्तमानकालमें उदय आनेवाले निषेकोंका उदयाभावी क्षय और आगामी कालमें उदय आनेवाले निषेकोंका सदवस्थारूप उपशम, संज्वलनचतुष्कमेंसे किसी एक देशतिम्पर्द्धकका उदय एवं हास्यादि नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय रहनेपर जो निवृत्तिरूप परिणाम होता है उसे क्षायोपमिकचारित्र' कहते हैं । यह चारित्र छठवें गुणस्थानसे लेकर दशवें गुणस्थान तक होता है। ___ दर्शनश्य-चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधिदर्शन ये तीन दर्शनत्रय कहलाते हैं। चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण तथा अवधिदर्शनावरण इन तीन कर्मप्रकृतियोंके क्षयोपशमसे क्रमशः प्रकट होते हैं। चक्षु इन्द्रियसे होनेवाले ज्ञानके पहले पदार्थका जो सामान्य अबलोकन होता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं । चक्षु इन्द्रियके सिवाय शेष इन्द्रियों तथा मनसे होनेवाले ज्ञानके पहले जो सामान्य अवलोकन होता है उसे अचक्षुर्दर्शन कहते हैं तथा अवधिज्ञानके पहले होनेवाले सामान्य अबलोकनको अवधिदर्शन कहते हैं । चक्षुर्दर्शन और अचक्षुदर्शन
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३०
तत्त्वार्थसार प्रथम गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक होते हैं तथा अवधिदर्शन चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थान तक होता है ।। ४-५ ।।
सायकमायके मेध सम्यक्त्वज्ञानचारित्रवीर्यदानानि दर्शनम् ।
भोगोपभोगौ लाभश्च क्षायिकस्य नवोदिताः ।।६।। अर्थ-सायिकसम्यक्त्व, क्षायिकज्ञान (केवलज्ञान), क्षायिकचारित्र, क्षायिकवीर्य, क्षायिकदान, क्षायिकभोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिकलाभ और क्षायिकदर्शन ( केवलदर्शन ) ये नौ क्षायिकभाव कहे गये हैं।
भावार्थ-क्षायिकसम्यक्त्व आदि भावोंका स्वरूप इस प्रकार है
१ क्षायिकसम्यक्त्व-मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति तथा अनन्तानुबन्धीचतुष्क इन सात प्रकृतियोंके क्षयसे जो सम्यग्दर्शन प्रगट होता है वह क्षायिकसम्यक्त्व कहलाता है। यह कर्मभमिजके ही उत्पन्न होता है। चौथेसे सातवें गुणस्थानके बीच में कभी भी हो सकता है तथा क्षायोपमिक सम्यग्दर्शनपूर्वक होता है । इसका' सद्भाव चारों गतियोंमें पाया जाता है। इस सम्यग्दर्शनका धारक जीव उसो भबमें, तीसरे भवम अथवा चौथे भवमें नियमसे मोक्ष चला जाता है। संसारमें रहनेको अपेक्षा यह चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर चौदहवें गणस्थान तक रहता है उसके बाद सिद्ध अवस्थामें भी अनन्तकाल तक रहता है।
२ क्षायिकज्ञान-ज्ञानावरणकर्मके क्षयसे जो ज्ञान प्रकट होता है वह क्षायिकज्ञान कहलाता है । इसे ही केवलज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानका धारक लोकअलोकके समस्त पदार्थोंको एक साथ जानता है । यह तेरहवें-चौदहवें गुणस्थान में तथा सिद्ध अवस्थामें भी रहता है।
३क्षापिकचारित्र-समस्त चारित्रमोहनीयका क्षय होनेपर जो चारित्र प्रकट होता है उसे क्षायिकचरित्र कहते हैं ! यह बारहवं आदि गुणस्थानोंमें होता है । इसे क्षायिक यथाख्यातचारित्र भी कहते हैं । __ ४ क्षानिकवीर्य-वीर्यान्तरायकर्मका क्षय होनेपर जो वीर्य प्रकट होता है उसे क्षायिकवीर्य कहते हैं। यही अनन्त बल कहलाता है ।
५ क्षायिफवान-दानान्तरायकर्मके क्षायसे जो प्रकट होता है उसे क्षायिकदान कहते हैं। यह अनन्तप्राणियोंके समूहपर अनुग्रह करनेवाले अभयदानरूप होता है।
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द्वितीयाधिकार ६ क्षायिकभोग--भोगान्तरायके क्षयसे जो प्रकट होता है उसे क्षायिकभोग कहते हैं। इससे पुष्पवृष्टि आदि कार्य होते हैं ।
७ क्षायिकउपभोग-उपभोगान्तरायके क्षयसे जो प्रकट होता है उसे क्षायिकउपभोग कहते हैं । इससे सिंहासन, चमर तथा छत्रत्रय आदि विभूति प्राप्त होती है।
८क्षायिकलाभ-लाभान्तरायकर्मके क्षयसे जो प्रकट होता है वह क्षायिकलाभ कहलाता है। इससे शरीरमें बलाधान करनेवाले अनन्त-शुभ-सूक्ष्म-पुद्गल परमाणुओंका सम्बन्ध शरीरके साथ होता रहता है, जिससे आहारके बिना ही देशोनकोटिवर्ष पूर्व तक शरीर स्थिर रहता है।
९ क्षायिकदर्शन-दर्गनावरणकर्मके क्षयसे जो दर्शन प्रकट होता है उसे क्षायिकदर्शन कहते हैं । इसीका नाम केवलदर्शन है। यह केवलज्ञानका सहभावी है अर्थात् केवलज्ञानके साथ उत्पन्न होता है तथा उसीके समान तेरहवें, चौदहवें गणस्थानमें और उसके बाद सिद्धपर्याय में अनन्तकाल तक रहता है। क्षायिकवीर्य आदि पाँच लब्धियाँ भी तेरहवें, चौदहवें गुणस्थानमें तथा उसके बाद सिद्ध अवस्थामें भी रहती हैं। क्षायिकभावके उक्त नौ भेद नौ लब्धियोंके नामसे भी प्रसिद्ध है।।६।।
औषयिकभावके भेद चतस्रो गतयो लेश्याः षट् कषायचतुष्टयम् । वेदा मिथ्यात्वमज्ञानमसिद्धोऽसंयतस्तथा । इत्यौदयिकभावस्य स्युभंदा एकविंशतिः ।। ७ ॥
(षट्पदम् ) अर्थ-चार गतियाँ, छह लेश्याएं, चार कषाय, तीन वेद, मिथ्यात्व, अज्ञान, असिद्धत्व और असंयतत्व ये औदयिकभावके इक्कीस भेद हैं।
भावार्य-गति आदिकका स्वरूप इस प्रकार है। गति–तिनामकर्मके उदयसे जीवकी जो अवस्था विशेष होती है उसे गति कहते हैं। इसके चार भेद हैं-१ नरकगति, २ तिर्यञ्चगति, ३ मनुष्यगति और ४ देवगति ।
लेश्या-कषायके उदयसे अनुरञ्जित योगोंकी प्रवृत्तिको लेश्या कहते हैं। इसके छह भेद हैं-१ कृष्ण, २ नील, ३ कापोत, ४ पीत, ५ पद्म और ६ शुक्ल । इन लेश्यावालोके चिह्न इस प्रकार हैं
कृष्णलेश्या-तीन क्रोध करनेवाला हो, किसीसे बुराई होनेपर दीर्घकालतक बैर न छोड़े, बकनेका जिसका स्वभाव हो, धर्म तथा दयासे रहित हो, स्वभावका दुष्ट हो तथा कषायको तीव्रताके कारण किसीके वशमें न आता हो वह कृष्णलेश्याका धारक है।
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तस्वार्थसार ___ नीललेश्या-जो मन्द हो, निर्बुद्धि हो, विवेकसे रहित हो, विषयोंकी तृष्णा अधिक रखता हो, मानी हो, मायावी हो, आलसी हो, चाहे जिसकी बातोंमें आ जाता हो, निद्रालु हो, दुसरेको ठगने में निपुण हो और धन-धान्यमें अधिक लालसा रखता हो वह नीललेश्याका धारक है ।
कापोतलेण्या-जो दूसरोंपर रोष करता हो, दूसरोंको निन्दा करता हो, दूसरोंको दोष लगाता हो, शोक या भय अधिक करता हो, दूसरेसे ईर्ष्या रखता हो, दूसरेका तिरस्कार करता हो, अपनी प्रशंसा करता हो, अपने ही समान दगावाज समझकर दूसरेकी प्रतीति नहीं करता हो, स्तुतिके वचन सुनकर संतुष्ट होता हो, हानि-लाभको नहीं समझता हो, रणमें मरनेकी इच्छा करता हो, अपनो प्रशंसा सुनकर बहत दान करता हो तथा कार्य और अकार्यको नहीं समझता हो वह कापोतलेश्याका धारक है ।
पोतलेश्या-जो कार्य और अकार्यको समझता हो, सेव्य और असेव्यका विवेक रखता हो, सबके साथ समान व्यवहार रखता हो, दया तथा दानमें तत्पर रहता हो और स्वभावका कोमल हो वह पोसलेश्याका धारक है।
पालेश्या-जो त्यागी हो, भद्र परिणामी हो, उत्कृष्ट कार्य करनेवाला हो, बहुत अपराधोंको क्षमा कर देता हो तथा साधु एवं गुरुओंको पूजामें तत्पर रहता हो वह पालेश्याका धारक है। __शुक्ललेण्या-जो पक्षपात नहीं करता हो, निदान नहीं करता हो, सब जीवापर समान भाव रखता हो तथा जिसके तीव्र राग, द्वेष और स्नेह न हो वह शुक्ललेश्याका धारक है। ___ पहलेसे चौथे गुणस्थान तक छहों लेश्याएं होती हैं, पाँचवेंस मातवें तक पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन लेश्याएँ होती हैं और उसके आगे तेरहवें गुणस्थान तक सिर्फ शुक्ललेश्या होती है। चौदहवें गुणस्थानमें कोई भी लेण्या नहीं होती। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें यद्यपि कपायका सद्भाव नहीं है तो भी भूतपूर्व प्रज्ञापननयकी अपेक्षामात्र योगप्रवृत्तिम लेश्याका व्यवहार किया जाता है । चौदहवें गुणस्थानमें योगप्रवृत्ति भी नहीं है, इसलिये वहाँ लेश्याका सद्भाव नहीं होता। __कषाय--जो आत्माके क्षमा आदि गुणोंका घात करे उसे कपाय कहते हैं। इसके क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे चार भेद होते हैं ।
वेद-स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेदके उदयसे जो रमनेका भाव होता है उसे बेद कहते हैं । इसके तीन भेद हैं-१ स्त्रीवेद, २ पुरुषवेद और ३ नपुं. सकवेद । इन वेदोंका सद्भाव नवम गुणस्थानके पूर्वार्ध तक रहता है।
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द्वितीयाधिकार
३३
मिथ्यात्व - दर्शनमोहके उदयसे जो अतत्त्वश्रद्वान होता है उसे मिथ्यात्व
कहते हैं |
अज्ञान - ज्ञानावरणके उदयसे जो ज्ञान प्रकट नहीं होता है वह अज्ञान कहलाता है । क्षायोपशमिकभावका अज्ञान मिथ्यात्वके उदयसे दूषित रहता है और ओमिकभावका अज्ञान अभावरूप होता है। जैसे अवधिज्ञानावरणका उदय होनेसे अवधिज्ञानका अभाव है ।
असिद्धत्व - आठ कर्मो का उदय रहने से जीवकी जो सिद्धपर्याय प्रकट नहीं होती वह असिद्धत्वभाव है । इस असिद्धत्वभावका सद्भाव चौदहवें गुणस्थान तक रहता है ।
असंयतत्व- चारित्रमोहका उदय होनेसे जो संयमका अभाव है उसे असंयतत्व कहते हैं । इसका सद्भाव प्रथम गुणस्थान से लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक रहता है ॥ ७ ॥
पारिणामिकभावके भेव
जीवत्वं चापि भव्यत्वमभव्यत्वं तथैव च । पारिणामिकभावस्य भेदत्रितयमिष्यते ॥ ८ ॥
अर्थ - पारिणामिकभावके जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ये तीन मेद माने जाते हैं ।
भावार्थ - इनका स्वरूप इस प्रकार है-
जीवस्वभाव-व्यवहारनयसे इन्द्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास इन चार प्राणोसे पहले जीवित रहना, वर्तमानम जीवित रहना और आगे जीवित होना जीवत्वभाव है तथा निश्चयनयसे अपने चैतन्यभावसे युक्त रहना जीवभाव है ।
भव्यत्वभाव---जो सम्यग्दर्शनादिगुणोंसे युक्त हो सकता है उसे भव्य कहते हैं तथा उसकी परिणतिको भव्यत्वभाव कहते हैं ।
अभव्यस्वभाव — जो सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे युक्त न हो सकता हो उसे अभव्य कहते हैं तथा उसकी परिणतिको अभव्यत्वभाव कहते हैं ।
जो भव्य है वह सदा भव्य ही रहता है और जो अभव्य है वह सदा अभव्य ही रहता है । अभव्य जीव सदा मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही रहता है । परन्तु भव्यजीव प्रारम्भसे चौदहवें गुणस्थान तक रहता है। मोक्षमें भव्यत्वभाव नहीं रहता है | अभव्यजीव यद्यपि मोक्षका पात्र नहीं तथापि मिध्यात्वकी मन्दतामें मुनिव्रत धारणकर नवम ग्रैवेयक तक उत्पन्न हो सकता है ॥ ८ ॥
५
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ફ્૪
तस्वार्थसार
जोयका लक्षण
अनन्यभृतस्तस्य स्यादुपयोगो हि लक्षणम् । जीवोऽभिव्यज्यते तस्मादयष्टब्धोऽपि कर्माभः ॥ ५ ॥
अर्थ - तादात्म्यभावको प्राप्त उपयोग हो जीवका लक्षण है। आठ कर्मोसे आच्छादित होनेपर भी जीव उस उपयोग के द्वारा प्रकट होता है - अनुभवमें आता है || २ ||
उपयोगके भेद
साकारश्च निराकारो भवति द्विविधश्च सः । साकारं हि भवेज्ज्ञानं निराकारं तु दर्शनम् ||१०|| कृत्वा विशेषं गृह्णाति वस्तुजातं यतस्ततः । साकारमिष्यते ज्ञानं ज्ञानयाथात्म्यवेदिभिः ||११|| यद्विशेषभकृत्वैव गृह्णीते वस्तुमात्रकम् । निराकारं ततः प्रोक्तं दर्शनं विश्वदर्शिभिः ||१२|| ज्ञानमष्टविधं ज्ञेयं मतिज्ञानादिभेदतः । चक्षुरादिविकल्पाच्च दर्शनं स्याच्चतुविधम् ||१३||
अर्थ- वह उपयोग साकार ( सविकल्पक ) और निराकार निर्विकलाक ) के भेदसे दो प्रकारका है। उनमें ज्ञान साकार है और दर्शन निराकार | क्योंकि ज्ञान वस्तुसमूहको 'यह घट है, यह पद है' इत्यादि रूपमे विशेषको करके जानता है इसलिये ज्ञानकी यथार्थताको जाननेवाले मुनियोंके द्वारा ज्ञान साकार - सविकल्प माना जाता है और दर्शन विशेषताको न कर सामान्यरूपसे वस्तुको ग्रहण करता है इसलिये सर्वदर्शी भगवान्ने दर्शनको निराकार — निर्विकल्प कहा है । मतिज्ञानादि पांच सम्यग्ज्ञान और कुमति आदि तीन मिथ्याज्ञान के भेदसे ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका और चक्षुदर्शन आदिकं भेदसे दर्शनोपयोग चार प्रकारका जानना चाहिये ।। १०-१३ ।।
जीवोंके भेव
संसारिणश्च मुक्ताश्च जीवास्तु द्विविधाः स्मृताः । लक्षणं तत्र मुक्तानामुत्तरत्र प्रचक्ष्यते ||१४|| सांप्रतं तु रूप्यन्ते जीवाः संसारवर्तिनः । जीवस्थान गुणस्थानमार्गणादिषु तत्त्वतः || १५ |
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द्वितीयाधिकार
३५
अर्थ - संसारी और मुक्तके भेदसे जीव दो प्रकारके स्मरण किये गये हैं । उनमें मुक्त जीवोंका लक्षण आगे कहा जावेगा । इस समय जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गगा आदि में विभाजित संसारी जीवोंका यथार्थ वर्णन किया जाता है ।। १४-१५ ।।
गुणस्थानोंके नाम मिथ्यादृक्सासनो मिश्रोऽसंयतो देशसंयतः । प्रमत्त इतरोऽपूर्वानिवृत्तिकरणौ तथा ।। १६ ।। सूक्ष्मोयशान्त संक्षीणकषाया योग्ययोगिनौ । गुणस्थानविकल्पाः स्युरिति सर्वे चतुर्दश || १७||
अर्थ - मिध्यादृष्टि, सासन - सासादन, मिश्र, असंयत, देशसंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मकषाय, उपशान्तकषाय क्षीणकषाय, योगी – सयोगकेवली और अयोगी — अयोगकेवली ये सब मिलाकर चौदह गुणस्थानोंके विकल्प है।
भावार्थ — मोह और योग के निमित्तसे होनेवाले आत्माके गुणोंके तारतम्यको गुणस्थान कहते हैं । वे गुणस्थान मिथ्यादृष्टि आदि के भेदसे चौदह होते हैं । इनमें प्रारम्भके बारह गुणस्थान मोहसे सम्बद्ध हैं और अन्तके दो गुणस्थान योगसे ।। १६-१७ ॥
मिथ्यात्व गुणस्थानका स्वरूप
मिथ्यादृष्टिर्भवे जीवो मिथ्यादर्शन कर्मणः । उदयेन पदार्थानामश्रद्धानं हि यत्कृतम् ||१८||
अर्थ —मिथ्यात्वकर्मके उदयसे जिसे जीवादि पदार्थोंका अश्रद्धान रहता है वह मिथ्यादृष्टिजीव होता है ।
भावार्थ - मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे जहां जीवको मोक्षमार्गके प्रयोजनभूत जीवादि पदार्थों का वास्तविक श्रद्धान नहीं होता वह मिध्यादृष्टि नामका गुणस्थान है || १८ ||
सासन - सासादन गुणस्थानका स्वरूप
मिध्यात्वस्योदयाभावे जीवोऽनन्तानुबन्धिनाम् । उदयेनास्तसम्यक्त्वः स्मृतः सासादनाभिधः || १९|| अर्थ --- मिथ्यात्वप्रकृतिके' उदयका अभाव रहते हुए अनन्तानुबन्धी क्रोष
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३६
तत्वार्थसार
मान-माया - लोभमें से किसी एक प्रकृतिका उदय आनेसे जिसका सम्यक्त्व नष्ट हो गया है वह सासादन गुणस्थानवर्ती जीव कहा गया है।
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भावार्थ - मिथ्यात्वादि तीन तथा अनन्तानुबन्धी सम्बन्धी चार इन सात प्रकृतियों का उपशम कर यह जीव उपशम सम्यग्दृष्टि बनता है। इस उपशम सम्यग्दर्शनका काल ध है। पूर्ण होने के जब उपशम सम्यक्त्वका काल कम-से-कम एक समय और अधिकसे अधिक छह आवली प्रमाण बाकी रह जाता है तब अनन्तानुबन्धी क्रोध- मान-मायालोभसे किसी एकका उदय आ जानेसे जो सम्यक्त्वरूपी रत्नमय पर्वतकी शिखर से नीचे गिर जाता है परन्तु अभी मिथ्यात्वरूपी भूमिमें नहीं पहुँच सका है वह सासन या सासादन गुणस्थानवर्ती कहा जाता है। यह गुणस्थान चतुर्थ गुणस्थानसे नीचे गिरने पर ही होता है ।। १९ ।।
मिश्र गुणस्थानका स्वरूप
सम्यग्मिथ्यात्वसंज्ञायाः प्रकृतेरुदयाद्भवेत् । मिश्रभावतया सम्यग्मिध्यादृष्टिः शरीरवान् ||२०||
अर्थ - सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे मिश्ररूप परिणाम होनेके कारण जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि अथवा मिश्रगुणस्थानवर्ती होता है ।
भावार्थ — दर्शनमोहनीयके तीन भेदोंमें एक सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति नामका भेद है । इस प्रकृतिके उदयसे जीवके ऐसे भाव होते हैं जिन्हें न मिथ्यात्वरूप कहा जा सकता है और न सम्यक्त्वरूप | जिस प्रकार दही और गुड़के मिलनेपर ऐसा स्वाद बनता है कि जिसे न खट्टा ही कहा जा सकता है और न मीठा ही। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके उदय में ऐसा भाव होता है कि जिसे न सम्यक्त्व ही कहा जा सकता है और न मिध्यात्व हो । किन्तु मिश्ररूप भाव होता है ऐसे मिश्रभावको धारण करनेवाले जीवको मिश्रगुणस्थानवर्ती कहते हैं । इस गुणस्थानमें किसी आयुका बन्ध नहीं होता तथा मरण और मारणान्तिक समुद्धात भी नहीं होता । मरणका अवसर आनेपर यह जीव या तो चतुर्थ गुणस्थान में पहुँचकर मरता है या प्रथम गुणस्थानमें आ कर मरता है। यह जीव दूसरे गुणस्थानमें नहीं आता । चतुर्थ गुणस्थानवर्ती जीव मिश्रप्रकृतिका उदय आनेपर इस तृत्तीय गुणस्थानमें आ जाता है । कोई सादि मिध्यादृष्टि जीव भी मिश्र प्रकृतिका उदय आनेपर तृतीय गुणस्थान में पहुँचता है ।। २० ।।
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द्वितीयाकार
असंयत सम्यादृष्टिका स्वरूप वृत्तमोहस्य पाकेन जनिताविरतिर्भवेत् ।
जीवः सम्यक्त्वसंयुक्तः सम्यग्दृष्टिरसंयतः ॥२१॥ अर्थ-चारित्रमोहके उदयसे जिसके अबिरति-असंयमदशा उत्पन्न हुई है ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव असंयत सम्यग्दृष्टि होता है।
भावार्थ-मिथ्यात्वादिनिक तथा अनन्तानुबन्धीचतुष्क इन सात प्रकृतियोंका उपशम, क्षय, क्षयोपशम होनेसे जिसे सम्यक्त्व तो हो गया है परन्तु अप्रत्याख्यानावरणादि चारित्रमोहनीयकी प्रकृतियोंका उदय रहनेसे जो चारित्र धारण करनेके सम्मुख नहीं होता वह असंयतसम्यग्दृष्टिगुणस्थानवी जीव कहलाता है। अनादिमिथ्यादष्टि जीव सम्यक्त्व प्राप्त होनेपर प्रथम गुणस्थानसे इसी गुणस्थानमें आता है । यद्यपि इस जीवके इन्द्रियोंके विषयोंसे तथा प्रस-स्थावर जीवोंके घातसे निवृत्ति नहीं है-त्यागरूप परिणति नहीं है तथापि इसकी परिणति मिथ्यादष्टि जीवकी अपेक्षा बहुत ही शान्त होती है। इसके प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये चार गुण प्रकट हो जाते हैं इसलिये मांसभक्षण आदि निन्दनीय कार्यों में इसकी प्रवृत्ति नहीं होती। इस गुणस्थानमें यदि मनुष्य और तिर्यञ्चके आयुबन्धका अवसर आता है तो नियमसे वैमानिक देवोंकी ही आयुका बन्ध होता है तथा नरक और देवगतिमें आयुबन्धका अवसर आता है तो नियमसे मनुष्यआयुका ही बंध होता है ।। २१ ॥
देशसंयत गुणस्थानका स्वरूप पाकक्षयात्कषायाणामप्रत्याख्यानरोधिनाम् ।
विरताविरतो जीवः संयतासंयतः स्मृतः ।।२२।। अर्थ--अप्रत्याख्यानावरणकषायोंके क्षयोपशमसे जो जीव विरत तथा अविरतदशाको प्राप्त है वह संयतासंयत अथवा देशसंयत गुणस्थानवर्ती माना गया है।
भावार्थ-अ-एकदेश–प्रत्याख्यान-चारित्रको घातनेवाली कपाय अप्रत्यख्यानावरण कहलाती है। सम्यग्दष्टि जीवके जब इस कषायका क्षयोपशम होता है तब वह एकदेशसंयम धारण करता है। एक देशसंयममें त्रसजीबोंकी संकल्पी हिंसा, स्थावरजीवोंका निरर्थक घात, स्थूल असत्य, स्थूल चोरी, परस्त्री या परपुरुष-सेवन तथा असीमित परिग्रहसे निवृत्ति हो जाती है। पर सजीवोंकी आरम्भी, विरोधी तथा उद्यमी हिंसा और स्थावरजीवोंका प्रयोजनानुसार घात, अल्प असत्य, सार्वजनिक जल तथा मिट्टी आदिकी चोरी,स्वस्त्री या स्वपुरुष-सेवन तथा सीमित परिग्रहसे निवृत्ति नहीं होती इसलिये यह एक ही कालमें विरता
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३८
तस्वार्थसार विरत या संयतासंयत कहलाता है । यह गुणस्थान तिर्यञ्च और मनुष्यगतिमें ही होता है । इस गुणस्थान में भी नियमसे देवायुका ही बन्ध होता है। जिस जीवके पहले देवायुको छोड़कर यदि किसी अन्य आयुका बन्ध हो गया हो तो उस जीवके उस पर्यायमें यह गुणस्थान ही नहीं होगा ॥ २२ ॥
प्रमत्तसंयत गुणस्थानका स्वरूप प्रमत्तसंयतो हि स्यात्प्रत्याख्याननिरोधिनाम् ।
उदयक्षयतः प्राप्ता संयमद्धिः प्रमादवान् ॥२३॥ अर्थ-प्रत्याख्यानावरणकषायके क्षयोपशयसे जो संयमरूप संपत्तिको प्राप्त होकर भी प्रमादसे युक्त रहता है वह प्रयत्तसंयत गुणस्थानवतों कहा जाता है।
भावार्थ-प्रत्याख्यान-सकलचारित्रको घातनेवाली' कपाय प्रत्याख्यानावरण कहलाती है। जब इस कषायका क्षयोपशम होता है तब मनुष्य सकलचारित्रको ग्रहण करता है-हिंसादि पाँच पापोंका सर्वदेश त्याग कर देता है । परन्तु संज्खलनकषायका तीव्रोदय होनेसे प्रमादयुक्त रहता है इसलिये इसे प्रमत्तसंयत कहते हैं। चार विकथा, चार कषाय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, निद्रा और स्नेह ये प्रमादके पन्द्रह भेद हैं। इनमें कदाचित् मुनिकी प्रवृत्ति होती है इसलिये छठवें गुणस्थानवर्ती मुनिको प्रमत्तसंयत कहा जाता है। यहाँ प्रमाद उतनी ही मात्रामें होता है जितनी मात्रासे वे अपने गृहीतचरित्रसे पतित नहीं हो पाते। मुनिव्रत धारण करनेपर सर्वप्रथम सप्तम गुणस्थान होता है। पश्चात् वहाँसे गिरकर जीव छठवें गुणस्थानमें आता है। छठवेसे चढ़कर पुन: सातव में जाता है और पुनः वहाँसे गिरकर छठवें गुणस्थानमें आता है। इस तरह यह जीव छठवें सातवें गुणस्थानको भूमिकामें हजारों बार चढ़ता तथा उतरता है। यह गुणस्थान तथा इसके आगेके गुणस्थान मनुष्यमतिमें ही होते हैं । द्रव्यवेदको अपेक्षा पुरुषवेदीके ही यह गुणस्थान होता है परन्तु भाववेदफी अपेक्षा तीनों वेदवालेके हो सकता है। इस गुणस्थानमें यदि आयुबन्धका अवसर आता है तो नियमसे देवायुका ही बंध होता है । देवायुको छोड़कर किसी अन्य आयुका बन्ध होनेपर उस जीवके उस पर्यायमें यह गुणस्थान ही नहीं होगा, ऐसा नियम है ॥ २३ ॥
____ अप्रमससंयतका स्वरूप संयतो ह्यप्रमत्तः स्यात् पूर्ववत्प्राप्तसंयमः ।
प्रमादविरहावृत्तेत्तिमस्खलितां दधत् ॥२४॥ अर्थ-जो छठवें गुणस्थानकी तरह संयमको प्राप्त हुआ है तथा प्रमादका
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द्वितोगाभिमान अभाब हो जानेसे अस्खलित-निर्दोष वृत्तिको धारण कर रहा है वह अप्रमत्तसंयत कहलाता है।
भावार्थ-छठवें गुणस्थानकी अपेक्षा इस गुणस्थानमें संज्वलनका उदय और भी मन्द हो जाता है इसलिये यहाँ प्रमादका अभाव हो जाता है । प्रमादका अभाव हो जानेसे यह अप्रमत्तसंयत कहलाता है। इस गुणस्थानके दो भेद है..१ स्वस्थान अप्रमत्तसंयत और २ सातिशय अप्रमत्तसंयत । जो सातबसे गिरकर छठवें में आता है और फिर सातवेंमें चढ़ता है वह स्वस्थान अप्रमत्त संयत कहलाता है तथा जो श्रेणी माढ़नेके सम्मुख हो अधःकरण परिणामोंको प्राप्त करता है वह सातिशय अप्रमत्तसंयत कहलाता है। जहाँ सम-समयवती तथा भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणाम समान तथा असमान दोनों प्रकारके होते हैं उन्हें अधिकरण कहते हैं। इस गुणस्थान में भी नियमसे देवायका बन्ध होता है ॥ २४ ॥
अपूर्वकरण गुण स्थानका स्वरूप अपूर्वकरणं कुर्वन्नपूर्वकरणो यतिः ।
शमकः क्षपकश्चैव स भवत्युपचारतः ||२५|| अर्थ-अपूर्वकरण-नये-नये परिणामोंको करनेवाला मुनि अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती कहलाता है। यह मुनि उपचारसे शमक और क्षपक दोनों प्रकारका होता है।
भावार्थ-सप्तम गुणस्थानके सातिशय अप्रमत्तसंयतको जो अधःकरणरूप परिणाम प्राप्त होते थे उनमें आगामी समयवर्ती जीवों परिणाम पिछले समयवर्ती जीवोंके परिणामोंसे मिलते-जुलते भी रहते थे, पर अष्ठम गुणस्थानवर्ती जीवके विशद्धताके बढ़ जानेसे प्रत्येक समय अपूर्व-अपूर्व–नये-नये ही करण–परिणाम होते हैं । इस गुणस्थानमें आगामी समयवती जोवाक परिणाम पिछले समयवर्ती जीवोंके परिणामोंसे मिलते-जुलते नहीं है, इसलिये इसका अपूर्वकरण यह सार्थक नाम है। इस गुणस्थानमें समसमयवती जीवोंके परिणाम समान और असमान दोनों प्रकारके होते हैं तथा भिन्न समयवर्ती जीवोके परिणाम नियमसे भिन्न ही होते हैं। इस गुणस्थानसे श्रेणी प्रारम्भ हो जाती है। चारित्रमोहनीयकर्मका उपशम या क्षय करनेके लिये परिणामोंकी जो सन्तति होती है उसे श्रेणी कहते हैं । इसके दो भेद हैं--उपशमश्रेणी और क्षपक श्रेणी ! उपशमश्रेणीको द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि और क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव मांढ़ते हैं परन्तु क्षपकश्रेणीको क्षायिक सम्यग्दृष्टि ही मांढ़ते हैं। उपशमश्रेणीवाले उपशमक और क्षपकश्रेणीवाले क्षपक कहलाते हैं। इसलिये उपचारसे
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तत्वापंसार इस गुणस्थानको ग उप.शपक और पर कहा या है। यहां समा इसके आगे किसी भी आयुका बन्ध नहीं होता। क्षपकणी मांढ़नेवालोंके आयुबन्ध होता ही नहीं है और उपशमश्रेणी वे जीव ही माढ़ते है जिन्हें या तो देवायुका बन्ध हो चुका हैं या किसी आयुका बन्ध नहीं हुआ है। जिन्हें किसी आयुका बन्ध नहीं हुआ है वे पतन कर जब सप्तम या इसके नीचेंके गुणस्थानोंमें आते हैं तब देवायुका बन्ध करते हैं। जिन जीवोंके उसी पर्यायमें उपशमवणीके बाद क्षपकश्रेणो मांदनेका प्रसङ्ग आता है वे भी आयुका बन्ध नहीं करते है ।। ५ ।।
अनिवृतिकरण गुणस्थानका स्वरूप कर्मणां स्थूलभावेन शमकः क्षपकस्तथा ।
अनिवृत्तिरनिवृत्तिः परिणामवशाद्भवेत् ॥२६।। अर्थ-जो कर्मोका स्थूलरूपसे उपशम अथवा क्षय करनेवाला है तथा परिणामोंकी अनिवृत्ति-विभिन्नतासे रहित है वह अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाला है।
भावार्थ-दशम गणस्थानकी अपेक्षा नवम गण स्थानमें कर्मोंका उपशम अथवा क्षय स्थूलरूपसे होता है। तथा इस गुणस्थानवी जीवोंक परिणामोंमें विभिन्नता नहीं रहती। यहाँ एकसमयमै एक जीवके एक ही परिणाम होता हैं अतः समसमयवर्ती जोबोंके परिणाम समान ही रहते और भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम भिन्न रहते हैं। अनिवृत्तिकरणरूप परिणामोंसे आयु कमको छोड़कर शेष सात कर्मोकी गुणश्रेणी निर्जरा, गणसंक्रमण, स्थितिखण्डन तथा अनुभागकाण्डकखण्डन होता है और मोहनीयकर्मको बादरकृष्टि तथा मूक्ष्मकृष्टि आदि होती है। इस गुणस्थानमें भी उपशम और क्षपक दोनों श्रेणियाँ रहती है ॥ २६ ॥
सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानका स्वरूप सूक्ष्मत्वेन कपायाणां शमनाक्षपणात्तथा ।
स्यात्सूक्ष्मसांपरायो हि सूक्ष्मलोभोदयानुगः ।।२७|| अर्थ--जो कषायोंके उपशमन अथवा क्षपण करनेके कारण उनकी सूक्ष्मतासे सहित है बह सूक्ष्मसाम्पराय नामक गुणस्थानवर्ती कहलाता है । इस गुणस्थानमें रहने बाला जीव सिर्फ संज्वलनलोभके सूक्ष्य उदयसे युक्त होता है।
भावार्थ-इस गुणस्थानमें उपशमश्रेणीवाला जीव संज्वलन क्रोध-मानमायाका उपशम कर चुकता है और क्षपकश्रेणीवाला जीव उनका क्षय कर चुकता है, सिर्फ संज्वलनलोभका मंद उदय विद्यमान रहता है इसलिये इसे सूक्ष्मसाम्पराय कहते हैं । २७ ।।
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वितीयाधिकार उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय गुणस्थानका स्वरूप उपशान्तकषायः स्यात्सर्वमोहोपशान्तितः ।
भवेत्क्षीणकषायोऽपि मोहस्यात्यन्तसंक्षयात् ॥२८|| अर्थ-जहाँ सम्पूर्ण मोहनीयकर्मका उपशम हो जाता है वह उपशान्तकपाय गुणस्थान है और जहाँ सम्पूर्ण मोहनीयकर्मका क्षय हो जाता है वह क्षीणकपाय गुणस्थान कहलाता है।
भावार्थ-उपशमश्रेणीवाला जीव दशम गुणस्थानके अन्तमें मोहनीयकर्मका जब उपशम कर चुकता है तब वह उपशान्तकषाय नामक ग्यारहवें गुणस्थानको प्राप्त होता है। इस गुणस्थानमें मोहनीयकर्मके किसी भी भेदका उदय नहीं रहता । यहाँ जीवके परिणाम, शरद् ऋतुके उस सरोवरके जलके समान जिसकी कि कोचड़ नीचे बैठ गई है, बिलकुल निर्मल हो जाते हैं। इस गुणस्थानकी स्थिति सिर्फ अन्तर्मुहूर्तकी है उसके बाद जीव नियमसे गिर जाता है । क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव गिरकर चतुर्थ गुणस्थान तक आ सकता है और उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सम्यग्दर्शनसे भी गिरकर प्रथम गुणस्थान तक आ सकता है। क्षपकश्रेणीवाला जीव दशम गणस्थानके अन्तमें मोहनीयकर्मका सर्वथा क्षयकर वारहवें क्षीणकषाय गुणस्थानमें पहुँचता है। यहाँ कषायका सर्वथा क्षय हो जाता है। इस गुणस्थानमें शुक्लध्यानका दूसरा पाया प्रकट होता है | उसके प्रभावसे जीव शेष बचे हुए ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातियाकर्मोका तथा नामकर्मकी तेरह प्रवृत्तियोंका क्षय करता है। क्षपकवेणीवालं जीवके मवीन आयुका बन्ध होता नहीं है इसलिये वर्तमान-भुज्यमान मनुष्यायुको छोड़कर शेष तीन आयुकर्मोका क्षय करके अपने आप ही रहता है। इस तरह इस गुणस्थानके अन्तम राठ कर्मप्र कृतियोंकी सत्ता नष्ट हो जाती है ।। २८ ।।
सयोगकेवली और अयोगकेवली गुणस्थानोंका स्वरूप उत्पन्न केवलज्ञानो घातिकर्मोदयक्षयात् ।
सयोगश्चाप्ययोगश्च स्यातां केवलिनावुभौ ॥२९।। अर्थ-घातियाकर्मोका क्षय हो जानेसे जिसे केवलज्ञान उत्पन्न हो गया है किन्तु योग विद्यमान है वह सयोगकेवलीगुणस्थानवर्ती कहलाता है और जिसके योगका अभाव हो जाता है वह अयोगकेवलीगुणस्थानवर्ती कहा जाता है। ___ भावार्थ-बारहवें गुणस्थानके अन्तमें ब्रेसठ कर्मप्रकृतियोंका क्षयकर जीव तेरहवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। इसे यहाँ लोकालोकावभासी केवलज्ञान प्राप्त हो जाता है इसलिये इसे केवली कहते हैं। साथमें योग रहने के कारण सयोग
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तरवार्थसार केवली कहलाता है । इस गुणस्थानमें जीव कम-से-कम अन्तर्मुहुर्त और अधिक-सेअधिक आठ वर्ष अन्तर्मुहर्त कम एक करोड़ वर्ष पूर्व रहता है। इस गुणस्थानके
में जटा सा सूफा कारणोग रह जाता है तब शुक्लध्यानके तीसरे पायेके प्रभावसे क्रमप्रकृतियोंकी बहुत भारी निर्जरा होती है । उसके बाद जब सूक्ष्मकाययोग भी नष्ट हो जाता है तब अयोगकेवली नामक चौदहा गुणस्थानमें प्रवेश होता है। इस गुणस्थानका काल 'अ इ उ ऋ तृ' इन पांच लघु अक्षरोके उच्चारणकालके बराबर है। यहाँ शुक्लध्यानका चौथा पाया प्रकट होता हैउसके प्रभावसे समस्त कर्मप्रकृतियोंका क्षयकर जीत्र मोक्षको प्राप्त होता है ।। २९ ।।
चौदह जीवस्थान-जीवसमासोंका वर्णन एकाक्षाः वादराः सूक्ष्मा द्वयक्षाया विकलास्त्रयः । संजिनोऽसंज्ञिनश्चैव द्विधा पञ्चेन्द्रियास्तथा !॥३०॥ पर्याप्ताः सर्व एते सर्वेऽपर्याप्तकास्तथा 1
जीवस्थानविकल्पाः स्युरिति सर्वे चतुर्दश ॥३१।। अर्थ—एकेन्द्रियोंके दो भेद बादर और सुक्ष्म, द्वीन्द्रियको आदि लेकर तीन विकल और संज्ञी-असंज्ञीके भेदसे दो प्रकारके पञ्चेन्द्रिय ये सात प्रकारके सभी जीव पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक दोनों प्रकारके होते हैं। इसलिये सब मिलाकर जीवस्थानके चौदह विकल्प होते हैं। इन्हें चौदह जीवसमास भी कहते हैं ।
भावार्थ-जिनके द्वारा अनेक जीव और उनकी अनेक जातियाँ जानी जावें उन्हें जीवस्थान या जीवसमास कहते हैं। इन जीवसमासोंका आमममें अनेक प्रकारसे वर्णन किया गया है। इनके ५७ भेद भी बताये गये हैं जो इस प्रकार है-पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, नित्यनिमोद और इतर निगोदके बादर-सूक्ष्मकी अपेक्षा छह युगल तथा सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येककी अपेक्षा एक युगल, इन सात युगलोंके चौदह भेदोंमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संज्ञी पञ्चेन्द्रिय और असंज्ञी पञ्चेन्द्रियके भेदसे सोंके पांच भेद मिलानेसे उन्नीस स्थान होते हैं। इन उन्नीस स्थानोंके पर्याप्तक, नित्यपर्याप्तक और लब्ध्यपर्याप्तकको अपेक्षा तीन-तीन भेद होनेसे कुल सत्तावन भेद होते हैं। कहींपर ९८ भेद भी बताये गये हैं जो इस प्रकार हैं-पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, नित्यनिगोद और इतरनिगोदके बादर-सूक्ष्मकी अपेक्षा छह युगल और सप्रतिष्ठित प्रत्येक तथा अप्रतिष्ठित प्रत्येक इन सात युगलोंके चौदह भेद पर्याप्तक, निवृत्त्यपर्याप्तक और लब्ध्यपर्याप्तकके भेदसे तोन-तीन प्रकारके होते हैं, इसलिये एकेन्द्रियोंके
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द्वितीयाधिकार ४२ भेद होते हैं। उनमें विकलत्रयोंके पर्याप्तक, नित्यपर्याप्तक तथा लब्ध्यपर्याप्तकको अपेक्षा नौ भेद मिलानेसे ५१ भेद होते हैं । इनमें कर्मभूमिज पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोंके ३० और भोगभूमिज पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोंके ४, 'मनुष्योंके ९, "देवोंके २ और चारकियोंके २ भेद मिलानेसे सब ९८ जीवसमास होते हैं ॥ ३०-३१।।
छह पर्याप्तियोंके नाम और उनके स्वामी आहारदेहकरणप्राणापानविभेदतः। वचोमनोविभेदाच्च सन्ति पर्याप्तयो हि षट् ॥३२॥ एकाक्षेपु चतस्रः स्युः पूर्वाः शेषेषु पञ्च ताः।
सर्वा अपि भवन्त्येताः संज्ञिपश्चेन्द्रियेषु तत् ॥३३॥ अर्थ--आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मनके भेदसे पर्याप्तियां छह हैं। इनमें एकेन्द्रियोंके प्रारम्भकी चार, द्वीन्द्रियसे लेकर असंज्ञीपञ्चेन्द्रियों तक प्रारमको पाँध और सजी पश्यन्द्रियोंके सनो र्याप्तियाँ होती हैं।
१ कर्मभूमिज पञ्चेन्द्रिय तिर्यन जलचर, स्थलचर और नभचरके भेदसे तीन प्रकारके है ! इनके संज्ञी और असंज्ञो दो भेद होते हैं। इस तरह छह भेद हुए । ये छह भेद गर्भज तथा संमचाईनके भेद दो प्रकारके होते हैं। गर्भ ज जीवोंके पर्याप्तक और नित्यपर्याप्तकके भेदसे दो भेद होते है तथा संमूर्छन जीवोंके पर्याप्सक, निर्वत्यपर्याप्तक और लमध्यगर्याप्तकके भेदसे तीन भेद होते हैं इस तरह गर्मजोंके बारह
और संमुर्छनोंके अठारह दोनों मिलाकर कर्म भूमिज पञ्चेन्द्रिय तियंञ्चोंके ३० भेद होते हैं।
२ भोगभूमिग तियञ्चोंके स्थलचर और नभचरके भेदसे दो भेद होते हैं। इनके पर्याप्तक और नित्यपर्याप्तककी अपेक्षा चार भेद होते है।
३ आयखण्ड और म्लेच्छखण्डके भेदसे कर्मभूमिज मनुज्यके दो भेद है। इनमें आर्यखण्डज मनुष्य के पर्याप्त क, निर्वृत्यपप्तिक और लक्ष्यपर्याप्तकको अपेक्षा तीन भेद तथा म्लेच्छखण्डज मनुष्यके पयप्तिक और नित्यपप्तिकर भेदसे दो इस तरह पांच भेद होते है । भोगभूमिज और कुभोगभूमिज मनुष्यों के पर्याप्तफ और निवृत्यपर्याप्तकको अपेक्षा दो-दो भेद इस तरह चार भेद मिलाने से मनुष्योंके नौ भेद होते हैं । ___४-५ देव और नारकियोंके पर्याप्तक और निवृस्यपर्याप्तकको अपेक्षा दो-दो भैद होते है।
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सस्वार्थसार भावार्य आहारादिपर्याप्तियोंके लक्षण इस प्रकार हैं
१ आहारपर्याग्नि-विग्रहगतिको पारकर जीव नवीन शरीरको रचनामें कारणभूत जिस नौकर्मवर्गणाको ग्रहण करता है उसे खल-रसभागरूप परिणमावनेके लिये जीवको शक्तिके पूर्ण हो जानेको आहारपर्याप्ति कहते हैं।
२ शरीरपर्याग्नि-वल भागको हड्डी आदि कोर अवयस्प तथा रसभागको खून आदि तरल अवयवरूप परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होनेको शरीरपर्याप्ति कहते हैं।
३ इन्द्रियपर्याप्ति-उसी नोकर्मवर्गणाके स्कन्धमेंसे कुछ वर्गणाओंको अपनीअपनी इन्द्रियोंके स्थानपर उस-उस इन्द्रियके आकार परिणमावनेको शक्तिके पूर्ण हो जानेको इन्द्रिय-पर्याप्ति कहते हैं ।
४ श्वासोच्छ्वासपर्याग्नि -कुछ स्कन्धोंको श्वासोच्छ्वासरूप परिणमावनेको जीवकी शक्तिके पूर्ण होनेको श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति कहते हैं।
५ भाषापर्याग्नि-वचनरूप होनेके योग्य भाषावर्गणाको वचनरूप परिणमावनेकी जीवको शक्तिके पूर्ण होनेको भाषापर्याप्ति कहते हैं ।
६ मनःपर्यानि मनोवर्गणाके परमाणुओंको द्रव्यमनरूप परिणभावनेकी जीवकी शक्तिके पूर्ण होनेको मनःपर्याप्ति कहते हैं ।
उक्त छह पर्याप्तियोंमें एकेन्द्रिय जीवके आहार, शरीर, इन्द्रिय और श्वासोच्छवास ये चार पर्याप्तियां होती हैं । दो इन्द्रियसे लेकर असैनी पञ्चेद्रिय तकके जीवोंके भाषापर्याप्ति सहित पाँच पर्याप्तियाँ होती हैं तथा संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीवोंके मनःपर्याप्ति सहित छहों पर्याप्तियाँ होती हैं । जिन जीवोंकी पर्याप्तियां पूर्ण हो जाती हैं उन्हें पर्यातक तथा जिनकी पर्याप्तियाँ पूर्ण नहीं हुई हैं उन्हें अपर्याप्तक कहते हैं । अपर्याप्तक जीवोंके दो भेद हैं--- १ निर्वृत्यपर्याप्तक और २ लब्ध्यपर्याप्तक । जिसकी पर्याप्ति अभी पूर्ण नहीं हुई है किन्तु अन्तर्मुइतके भीतर नियमसे पूर्ण हो जाती है उसे निबृत्यपर्यासना कहते हैं तथा जिसकी पर्याप्ति अभी तक न पूर्ण हुई है और न आगे पूर्ण होगी वह लब्ध्यपर्याप्तक कहलाता है। समस्त पर्याप्तियोंका प्रारम्भ एक-साथ होता है परन्तु पूर्ति क्रम-क्रमसे होती है। सभी पर्याप्तियोंके पूर्ण होनेका काल अन्तर्मुहूर्त है । लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था संमूच्छंन जन्मवाले जीवोंमें होती है, गर्भ और उपपाद जन्मवाले जीवोंमें नहीं। इसी प्रकार लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था सिर्फ मिथ्यादष्टि गुणस्थानमें ही होती है अन्य गुणस्थानों में नहीं । निर्वृत्त्यपर्याप्तक अवस्था पहले, दूसरे और चौथे गुणस्थानमें जन्मकी अपेक्षा होती है। छठवें गुणस्थानमें आहारशरीरको अपेक्षा और तेरहवं गुणस्थानमें लोकपूरणसमुद्घातको अपेक्षा होती है। पर्याप्तक अवस्था सभी
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नितीयाधिकार
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गुणस्थानोंमें होती है । लब्ध्यपर्याप्तक जीव अन्तर्मुहूर्तमें छयासठ हजार तीन सौ छत्तीस बार जन्म-मरण करता है ।। ३२-३३ ॥
___ वश प्राणों के नाम तथा उनके स्वामी पश्चेन्द्रियाणि वाकायमानसानां बलानि च । प्राणापानौ तथायुश्च प्राणाः स्युःप्राणिनां दश ।।३४॥ कायाक्षापि सर्वेषु पर्याप्तेष्वान इष्यते ।
वाग्द्वयक्षादिषु पूर्णेषु मनःपर्याप्तसंशिषु ।।३५|| अर्थ-स्पर्शनादि पाँच इन्द्रियाँ, बचनबल, कायबल, मनोबल, श्वासोच्छ्वास और आयु, जीवोंके ये दश प्राण होते हैं। इनमें कायबल, इन्द्रियों तथा आयु प्राण सभी जीवोंके होते हैं, श्वासोच्छवास पर्याप्सक जीवोंके ही होता है, वचनबल द्वीन्द्रियादिक पर्याप्तक जीवोंके होता है और मनोबल संज्ञोपञ्चेन्द्रिय पर्याप्तकके ही होता है।
भावार्थ-जिनका संयोग होनेपर जीव जीवित और वियोग होनेपर मृत कहलाता है उन्हें प्राण काहते हैं। इनके भावप्राण तथा द्रव्यप्राणके भेदसे दो भेद हैं। आत्माके ज्ञान-दर्शनादि गुणोंको भावप्राण कहते हैं और इन्द्रियादिकको द्रव्य प्राण कहते हैं । द्रव्यप्राणके ऊपर कहे हुए दश भेद हैं। इनमेंसे एकेन्द्रिय जीवके पर्याप्तक अवस्था में स्पर्शनेन्द्रिय, कायबल, आयु और श्वासोच्छ्वास ये चार प्राण तथा अपर्याप्तक अवस्थामें स्वासोच्छ्वासको छोड़कर तीन प्राण होते हैं । द्वीन्द्रिय जीबके पर्याप्तक अवस्था में स्पर्मान और रसना इन्द्रिय, कायबल, आयु, श्वासोच्छवास और वचनबल ये छह प्राण तथा अपर्याप्तक अवस्थाम श्वासोच्छ्वास तथा बचनबलके बिना चार प्राण होते हैं। श्रीन्द्रिय जीवके पर्याप्तक अवस्थामें प्राण इन्द्रिय अधिक होनेसे सात प्राण और अपर्याप्तक अवस्थामें पांच प्राण होते हैं | चतुरिन्द्रिय जीवके पर्याप्तक अवस्था में चक्षुरिन्द्रिय बढ़ जानेसे आठ प्राण तथा अपर्याप्तक अवस्थामें छह प्राण होते हैं। असंज्ञी पञ्चेन्द्रियके पर्याप्तक अवस्थामें कर्णन्द्रिय बढ़ जानेसे नौ प्राण तथा अपर्याप्तक अवस्थामें सात प्राण होते हैं और संजो पञ्चेन्द्रि यके पर्याप्तक अवस्थामें मनोबलके बढ़ जानेसे दश प्राण तथा अपर्याप्तक अवस्थामें सात प्राण होते हैं । तेरहव गुणस्थानमें इन्द्रियों तथा मनका व्यवहार नहीं रहता इसलिये वचनबल, श्वासोच्छास, आयु और कायबल ये चार ही प्राण होते हैं । इसी गुणस्थानमें वचनबलका अभाव होनेपर तीन तथा श्वासोच्छवासका अभाव होनेपर दो प्राण रहते हैं। चौदहवं गुणस्थानमें कायबलका भी अभाव हो जाता है इसलिये सिर्फ आयुप्राण रहता है ।। ३४-३५ ॥
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तत्त्वार्थसार
जार संज्ञाओंके नाम आहारस्य भयस्यापि संज्ञा स्यान्मैथुनस्य च ।
परिग्रहस्य चेत्येवं भवेत्संज्ञा चतुर्विधा ।।३६।। अर्थ आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा और परिग्रहह्मज्ञाके भेदसे संज्ञा चार प्रकारकी होती है। ___ भावार्थ-जिन इच्छाओं के द्वारा पीड़ित हुए जीब इस लोक तथा परलोकमें नाना दुःख उठाते हैं उन्हें संज्ञा कहते हैं। उसके चार भेद हैं-१ आहार, २ भय, ३ मैथुन और ४ परिग्रह | इनका स्वरूप इस प्रकार है___आहारसंज्ञा- अन्तरङ्गमें असातावेदनीयकी उदीरणा होनेसे तथा बहिरङ्गमें आहारके देखने और लम झोप उपयोग जाने से नालो पेटलालं जीवको जो आहारकी इच्छा होती है उसे आहारसंज्ञा कहते हैं। यह संज्ञा पहले गुणस्थानसे लेकर छठवें गुणस्थान तक रहती है।
भयसंज्ञा-अन्तरङ्गमें भय नोकषायको उदीरणा होनेसे तथा बहिरङ्गमें अत्यन्त भयंकर वस्तुके देखने और उस ओर उपयोग जानेसे शक्तिहीन प्राणीको जो भय उत्पन्न होता है उसे भयसंज्ञा कहते हैं। यह संज्ञा आठवें गुणस्थान तक होती है। ___मैथुनसंज्ञा-अन्तरङ्गमें वेद नोकषायकी उदोरणा होनेसे तथा बहिरङ्गमें कामोत्तेजक गरिष्ठ रसयुक्त भोजन करने, मैथुनकी ओर उपयोग जाने तथा कुशील मनुष्योंकी संगति करनेसे जो मैथुनकी इच्छा होती है उसे मैथुनसंज्ञा कहते हैं । यह संज्ञा नवम गुणस्थानके पूर्वार्ध तक होती है।
परिग्रहसंज्ञा-अन्तरङ्गमें लोभकषायकी उदारणा होनेसे तथा बहिरङ्गमें उपकरणोंके देखने, परिग्रहकी ओर उपयोग जाने तथा मूर्छाभाव-ममताभाबके होनेसे जो परिग्रहको इच्छा होती है उसे परिग्रहसंज्ञा कहते हैं। यह संज्ञा दशम गुणस्थान तक होती है। ___ यहाँ सप्तमादि गुणस्थानों में जो भय, मैथुन और परिग्रह संज्ञा बतलाई गई है वे अन्तरङ्गमें उन-उन कर्मोंका उदय विद्यमान रहनेसे बतलाई गई हैं, कार्यरूपमें उनकी परिणति नहीं होती ।। ३६ ।।
चौदह मार्गणाओंके नाम गत्यक्षकाययोगेषु वेदक्रोधादिवित्तिषु । वृत्तदर्शनलेश्यासु भन्यसम्यक्त्वसंजिषु । आहारके च जीयानां मार्गणाः स्युश्चतुर्दश ||३७।।
( षट्पदम् )
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द्वितीयाधिकार अर्थ-.-१ गति, २ इन्द्रिय, ३ काय, ४ योग, ५ वेद, ६ कषाय, ७ ज्ञान, ८ संयम, ९ दर्शन, १० लेश्या, ११ भव्य, १२ सम्यक्त्व, १३ संज्ञी और १४ आहारक जीवोंकी ये चौदह मार्गणाएं होती हैं।
भावार्थ-जिनमें अथवा जिनके द्वारा जीवोंकी खोज होती है उन्हें भागणा कहते हैं। मार्गणाओंके गति आदि चौदह भेद हैं। आगे ग्रन्थकार स्वयं ही इन मार्गणाओंका वर्णन करते हैं ॥३७॥
गतिमार्गणाका स्वरूप और भेद गतिर्भवति जीवानां गतिकर्मविषाकजा ।
श्वभ्रतिर्यग्नरामयंगतिभेदाचतुर्विधा ॥३८|| अर्थ—गति नामकर्मके उदयसे जीवको जो अवस्था होती है उसे गति कहते हैं। इसके चार भेद हैं-१ नरकगति, २ तिर्यञ्चगति, ३ मनुष्यगति और ४ देवगति । इनके लक्षण प्रसिद्ध हैं ।। ३८ [1
इन्द्रिमार्गणा और उसके भेद इन्द्रियं लिङ्गमिन्द्रस्य तच पञ्चविधं भवेत् ।
प्रत्येकं तद् द्विघा द्रव्यमावेन्द्रियविकल्पतः ॥३९।। ___ अर्थ–इन्द्र अर्थात् आत्माका जो लिङ्ग है उसे इन्द्रिय कहते हैं। इन्द्रियके स्पर्शन, रसना, नाण, चक्ष और श्रोत्रके भेदसे पाँच भेद हैं। इन पांचों इन्द्रियोंमें प्रत्येकके द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रियके भेदसे दो-दो भेद हैं ॥ ३९ ॥
द्रव्येन्त्रिपका निरूपण निर्वृत्तिश्चोपकरणं द्रव्येन्द्रियमुदाहृतम् ।
बाह्याभ्यन्तरभेदेन द्वैविध्यमनयोरपि ॥४०॥ अर्थ-निर्वृत्ति और उपकरणको द्रव्येन्द्रिय कहा गया है। निर्वृत्ति और उपकरण दोनोंके बाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे दो-दो भेद होते हैं ।। ४० ।।
अन्तरङ्गनिवृत्तिका लक्षण नेत्रादीन्द्रियसंस्थानावस्थितानां हि वर्तनम् ।
विशुद्धात्मप्रदेशानां तत्र निवेत्तिरान्तरा ॥४१।। अर्थ-नेत्रादि इन्द्रियोंके आकारमें अवस्थित विशुद्ध आत्माके प्रदेशोंका जो इन्द्रियाकार परिणमन है उसे आभ्यन्तरनिवृत्ति कहते हैं ।। ४१ ॥
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तत्वार्थसार
बाह्यनितिका लक्षण तेष्वैवात्मप्रदेशेषु करणव्यपदेशिषु ।
नामकर्मकृतावस्थः पुद्गलपचयोऽयरा ॥४२।। अर्थ--इन्द्रिययावो पास हुए ही आत्मशोपर नागफमक उदयसे इन्द्रियाकार परिणत जो पुद्गलका प्रचय है उसे बानिवृत्ति कहते हैं ।। ४२ ॥
आभ्यन्तर और बाह्य उपकरण आभ्यन्तरं भवेत्कृष्णशुक्लमण्डलकादिकम् ।
बायोपकरणं त्वक्षिपक्ष्मपत्रद्वयादिकम् ।।४३॥ अर्थ-काला तथा सफेद गदेना आदि आभ्यन्तर उपकरण है और नेत्रोंको बरूनी तथा दोनों पलक आदि बाह्य उपकरण हैं ।। ४३ ।।
भावेन्द्रिय और लब्धिका लक्षण लब्धिस्तथोपयोगश्च भावेन्द्रियमुदाहृतम् ।
सा लब्धिोंधरोधस्य यः क्षयोपशमो भवेत् ॥४४॥ अर्थ-लब्धि और उपयोगको भावेन्द्रिय कहा है | ज्ञानावरणकर्मका जो क्षयोपशम है वह लब्धि कहलाती है ।। ४४ ।।
उपयोगका लक्षण और उसके भेद स द्रव्येन्द्रियनितिं प्रति व्याप्रियते यतः । कर्मणो ज्ञानरोधस्य क्षयोपशमहेतुकः ॥४५॥ आत्मनः परिणामो य उपयोगः स कथ्यते |
ज्ञानदर्शनभेदेन द्विधा द्वादशधा पुनः ।।४।। अर्थ-जिसके सन्निधानसे आत्मा द्रव्येन्द्रियकी रचनाके प्रति व्याप्त होता है ऐसा ज्ञानावरणकर्मको क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाला आत्माका परिणाम उपयोग कहलाता है। ज्ञान और दर्शभके भेदसे मुलमें उपयोग दो प्रकार है फिर ज्ञानोपयोगके आठ और दर्शनोपयोगके चार भेद मिलाकर बारह प्रकारका होता
इन्द्रियोंके नाम और क्रम स्पर्शनं रसनं घ्राणं चक्षुः श्रोत्र मतः परम् । इतीन्द्रियाणां पश्चाना संज्ञानुक्रमनिर्णयः ॥४७॥
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A
द्वितीयाधिकार अर्थ-स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये पाँच इन्द्रियोंके नाम तथा उनका क्रम है। इनके लक्षण इस प्रकार हैं
स्पर्शनेन्द्रिय-जो शीत, उष्ण, कोमल, कठोर, स्निग्ध, रूक्ष, लघु और मुरु इन आठ प्रकारके स्पर्शोको जाने उसे स्पर्शन इन्द्रिय कहते हैं। __रसनेन्द्रिय-जो खट्टा, मीठा, कड़आ, कषायला और चिरपिरा इन पांच प्रकारके रसको जाने वह रसनेन्द्रिय है।
घ्राणेन्द्रिय-जो सुगन्ध और दुर्गन्धके भेदसे दो प्रकारको गन्धको जाने उसे नाणेन्द्रिय कहते हैं।
चक्षुरिन्द्रिय-जो काला, पीला, नीला, लाल और सफेद इन पांच भूल रंगोंको तथा इनके सम्बन्धसे निर्मित अनेक उपरंगोंको जानती है उसे चक्षुरिन्द्रिय कहते हैं। __ श्रीन्द्रिय-जो अक्षरात्मक तथा निरक्षरात्मक शब्दोंको जानती है उसे श्रोत्रेन्द्रिय कहते हैं ।। ४७ ।।
पांच इन्द्रियों तथा मनका विषय स्पर्शो रसस्तथा गन्धो वर्णः शब्दो यथाक्रमम् ।
विज्ञेया विषयास्तेषां मनसस्तु मतं श्रुतम् ॥४८॥ अर्थ-स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द ये क्रमस स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय जानना चाहिये । मनका विषय श्रुत-अक्षरात्मक श्रुत है॥४८॥
इन्द्रियाँ अपने विषयको किस प्रकार ग्रहण करती हैं ? रूपं पश्यत्यसंस्पृष्टं स्पृष्टं शब्दं शृणोति तु ।
बद्धं स्पृष्टं च जानाति स्पर्श गन्धं तथा रसम् ।।४।। अर्थ-चक्षु असंस्पृष्ट-दूरवर्ती रूपको देखती है। कान स्पृष्ट-अपनेसे छुए हुए शब्दको सुनता है। स्पर्शन इन्द्रिय, रसना इन्द्रिय और घ्राण इन्द्रिय, बद्ध--अपनेसे संबन्धको प्राप्त तथा स्पृष्ट-छुए हुए अपने-अपने विषयभूत स्पर्श, रस और गन्धको जानती हैं। ___ भावार्थ-चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है इसलिये वह अपनेसे दूरवर्ती रूपको देखती हैं। कणेन्द्रिय प्राप्यकारी होनेके कारण अपनेसे टकराये हुए शब्दको सुनती है । शब्द कानसे टकराकर विलीन हो जाता है, स्पर्श आदिके समान ... १ 'पुट्ट सुणोदि सई अपुष्टुं पुण पस्सदे रुवं । फासं रसं च गंध बर्द्ध पट्ट वियाणादि ।।'
-सर्वार्थसिद्धि ( सोलापुर संस्करण )।
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५०
तत्त्वार्थसार
उससे सम्बद्ध नहीं रहता । परन्तु स्पर्शन, रसना और प्राण ये तीन इन्द्रियाँ प्राप्यकारी होनेके कारण अपनेसे टकराये हुए तथा टकराकर सम्बद्ध रहनेवाले स्पर्श, रस और गन्धको ग्रहण करती हैं। यह एक मान्यता है । दूसरी मान्यता यह है कि श्रोत्र स्पृष्ट शब्दको सुनता है और अस्पृष्ट शब्दको भी सुनता है । नेत्र अस्पृष्ट रूपको ही देखता है 1 तथा घ्राण, रसना और स्पर्शन इन्द्रियाँ क्रमसे स्पृष्ट और अस्पृष्ट गन्ध, रस और स्पर्शको जानती हैं ।। ४९ ।।
हत
यवनालमसूरातिमुक्तन्द्रर्द्धसमाः श्रोत्राक्षिघ्राणजिह्वाः स्युः स्पर्शनं नैकसंस्थिति || ५० ॥
क्रमात् ।
अर्थ – कर्ण इन्द्रिय जौकी नली के समान, चक्षु इन्द्रिय मसूरके समान, घ्राणइन्द्रिय अतिमुक्तक तिलके फूलके समान, जिह्वा इन्द्रिय अर्ध चन्द्रके समान और स्पर्शन इन्द्रिय अनेक आकारवाली है ।। ५० ।।
इन्द्रियोंके स्वामी
भवत्येकमेकैकमभिवर्धयेत् ।
स्थावराणां शम्बूक कुन्धुमधुपमर्त्यादीनां ततः क्रमात् ॥ ५१ ॥
अर्थ-स्थावर जीवोंके एक स्पर्शन इन्द्रिय ही होती है फिर शाम्बूकक्षुद्र शङ्ख, कुन्थुकानखजूरा, भ्रमर और मनुष्यादिकके क्रमसे एक-एक इन्द्रिय अधिक होती जाती है ॥ ५१ ॥
एकेन्द्रिय अथवा स्थावरोंके नाम
स्थावराः स्युः पृथिव्यापस्तेजो वायुर्वनस्पतिः । स्वैः स्वैर्भेदैः समा ह्येते सर्व एकेन्द्रियाः स्मृताः || ५२॥
अर्थ - पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये पाँच स्थावर हैं तथा अपने-अपने भेदोंसे सहित हैं । ये सभी स्थावर एकेन्द्रिय माने गये हैं ।। ५२ ।।
होन्द्रिय जीवोंके नाम
शम्बूकः शुक्की वा गण्डूपदकपर्दकाः । कुक्षिक्रम्यादयश्चैते द्वीन्द्रियाः प्राणिनो मताः ॥ ५३ ॥
1
१ पुहुं सुणेविस अपुष्टुं चैव परसदे रूअं गंध रसं च फासं पुटुमटुं वियाणादि ॥' - सर्वार्थसिद्धि ( भारतीय ज्ञानपीठ संस्करण }
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द्वितीयाधिकार
५१
अर्थ-३
- शम्बूक, शङ्ख, शुक्ति–सीप, गिंडोले, कौंड़ी तथा पेटके कीड़े आदि ये दो इन्द्रिय जीव माने गये हैं ॥ ५३ ॥
श्रीन्द्रिय जीवोंके नाम
कुन्थुः पिपीलिका कुम्भी वृश्चिकश्चेन्द्रगोपकः । घुणमत्कुणयुकाग्रास्त्रीन्द्रियाः सन्ति जन्तवः || ५४ ||
अर्थ - कुन्थु, चिउटी, कुम्भी (?) बिच्छू, वीरबहूटी, घुनका कोड़ा, खटमल, चीलर - जुना आदि तीन इन्द्रिय जीव हैं ||१४||
चतुरिन्द्रिय जीवोंके नाम
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मधुपः कीटको दंशमशकौ मक्षिकास्तथा । वरटी शलभाद्याश्च भवन्ति चतुरिन्द्रियाः || ५५ ।।
अर्थ -- भौंरा, उड़नेवाले कीड़े, डांस, मच्छर, मक्खी, वरं तथा टिड्डी आदि चार इन्द्रिय जीव हैं ॥ ५५ ॥
पञ्चेन्द्रिय जीवोंके नाम
पञ्चेन्द्रियाश्च मर्त्याः स्युर्नारिकास्त्रिदिवौकसः । तिर्यञ्चोऽप्युरगा भोगिपरिसर्प चतुष्पदाः || ५६ ।।
अर्थ - मनुष्य, नारकी, देव, तिर्यञ्च, साँप, फणावाले नाग, सरकनेवाले अजगर आदि तथा चौपाये पाँच इन्द्रिय जीब हैं ॥ ५६ ॥
पृथ्वोकायिक आदि जीवोंका आकार मसूराम्बुपृषत्सूची कलापध्वजसन्निभाः । धराप्तेजोमरुत्काया नानाकारास्तस्त्रसाः ॥५७॥
अर्थ --- पृथिवी, जल, अग्नि और वायुकायिक जीवोंका आकार क्रमसे मसूर, पानीकी बूँद, खड़ी सुइयोंका समूह तथा ध्वजाके समान है। वनस्पतिकायिक और सजीव अनेक आकारके होते हैं ।। ५७ ॥
पृथिवीकायिक जोबोंके छत्तीस भेव
मृत्तिका वालुका चैव शर्करा लवणोऽयस्तथा ताम्रं त्रपुः
चोपलः शिला । सीसकमेव च ॥ ५८ ॥
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५२
तत्वार्थसार
रौप्यं सुवर्णं वज्रं च हरितालं च हिङ्गुलम् | मनःशिला तथा तुत्थमज्जनं सप्रवालकम् ॥५९॥ क्रिरोलका के चैव मणिभेदाश्व वादराः | गोमेदो रुचकाङ्क स्फटिको लोहितप्रभः ॥ ६०॥ वैडूर्य चन्द्रकान्तश्च जलकान्तो रविप्रभः । गैरिकश्चन्दनव वर्चूरी रुचकस्तथा ॥ ६१ ॥ मोठो मसारगन्लब सर्व एते प्रदर्शिताः । पत्रिंशत्पृथिवीभेदा भगवद्भिर्जिनेश्वरः ॥६२॥
t
अर्थ — १ मिट्टी, २ रेत, ३ चुनकंकरी, ४ पत्थर, ७ लोहा, ८ ताँबा, ९ रांगा, १० सीसा, ११ चांदी, १४ हरताल १५ ईंगुर, १६ मैनसिल १७ तूतिया, १८ सुरमा
2
P
२० क्रिरोलक ( ? ), २१ भोड़ल, बड़ी-बड़ी मणियोंके खण्ड २३ रुचकाङ्क, २४ स्फटिक, २५ पद्मराग, २६ वैडूर्य २७ चन्द्रकान्त, २८ जलकान्त, २९ सूर्यकान्त ३० गैरिक, ३१ चन्दन, ३२ वर ३३ रुचक, ३४ मोठ, ३५ मसार और ३६ गल्ल नामक मणि ये सब पृथिवीकायिकके छत्तीस भेद जिनेन्द्र भगवान् कहे हैं । ५८--६२ ।।
1
,
५ शिलाएँ, १२ सोना,
६ नमक, १३ होरा,
१९ मूँगा,
२२ गोमेद,
जलका थिक जीवोंके भेद
अवश्यायो हिम चिन्दुस्तथा शुद्धघनोदके । शीतकाद्याच विज्ञेया जीवाः सलिलकायिकाः ||६३ ॥
अर्थ- ओस, वर्फके कण, शुद्धोदक- चन्द्रकान्तमणिसे निकला पानी, मेघसे तत्काल वर्षा हुआ पानी तथा कुहरा आदि जलकायिक जीव जाननेके योग्य हैं ।। ६३ ।।
अग्निकायिक जीवोंके भेद
ज्वालाङ्गारास्तथार्चिश्व मुर्मुरः शुद्ध एव च ।
अग्निवेत्यादिका ज्ञेया जीवा ज्वलनकायिकाः ||६४ ||
अर्थ — ज्वालाएँ, अंगार, अर्चि-अग्निको किरण, मुर्मुर – अग्निकण ( भस्मके भीतर छिपे हुए अग्निके छोटे-छोटे कण) और शुद्ध अग्नि-सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अग्नि ये सब अग्निकायिक जीव जाननेके योग्य हैं ।। ६४ ।।
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द्वितीयाधिकार
वायुकायिक जीवोंके भेद महान् घनतनुश्चैव गुञ्जामण्डलिरुत्कलिः ।
वातश्चेत्यादयो ज्ञेया जीवाः पवनकायिकाः ॥६५॥॥ अर्थ-वृक्ष वगैरहको उखाड़ देनेवाली महान् वायु अर्थात् आँधी, घनवात, तनुवात, गुञ्जा—गूंजनेवाली वायु, मण्डलि-गोलाकार वायु, उत्कलितिरछी बहनेवाली वायु और वात--सामान्य वायु ये सब पवनकायिक जीव जानननेके योग्य हैं ॥६५॥
बनस्पतिकायिक जीवाफे भद मूलाग्रपर्वकन्दोत्थाः स्कन्धबीजरुहास्तथा ।
संमूच्छिनश्च हरिताः प्रत्येकानन्तकायिकाः ।।६६।। अर्थ-मूलबीज-मूलसे उत्पन्न होनेवाले अदरख, हल्दी आदि. अग्रबोजकलमसे उत्पन्न होनेवाले गुलाब आदि, पर्वबीज-पर्वसे उत्पन्न होनेवाले गन्ना आदि, कन्दबीज-कन्दसे उत्पन्न होनेवाले सूरण आदि, स्कन्धत्रीज-स्कन्धसे उत्पन्न होनेवाले ढाक आदि, बीजरूह-बीजसे उत्पन्न होनेवाले गेहूं, चना आदि तथा संमूच्छिन्–अपने आप उत्पन्न होनेवाली धास आदि वनस्पतिकाय प्रत्येक तथा साधारण दोनों प्रकारके होते हैं। ६६ ।।
योगका लक्षण सति वीर्यान्तरायस्य क्षयोपशमसम्भवे ।
योगो ह्यात्मप्रदेशानां परिस्पन्दो निगद्यते ॥६७|| अर्थ-वीर्यान्तरायकर्मका क्षयोपशम होनेपर आत्मप्रदेशोंका हलन-चलन होना योग कहलाता है ।। ६७ ।।
योगके पन्द्रह भेद चत्वारो हि मनोयोगा वाग्योगानां चतुष्टयम् |
काययोगाश्च सप्तव योगाः पञ्चदशोदिताः ।।६८।। अर्थ-चार मनोयोग, चार वचनयोग और सात काययोग सब मिलाकर पन्द्रह योग कहे गये हैं ॥ ६८ ॥
मनोयोगके चार भेद मनोयोगो भवेत्सत्यो मृषा सत्यमृषा तथा । तथाऽसत्यमृषा चेति मनोयोगश्चतुर्विधः ॥६॥
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तस्वार्थसार अर्थ-सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग, उभय मनोयोग और अनुभय मनोयोना ये मनोयोगके चार भेद हैं॥ ६९ ।।
वचनयोगके चार भैर वचोयोगो भवेत्सत्यो मृषा सत्यमृषा तथा ।
तथाऽसत्यमृषा चेति वचोयोगश्चतुर्विधः ॥७०।। अर्थ सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग और अनुभय वचनयोग ये वचनयोगके चार भेद हैं ।
भावार्थ-सत्यवचनयोग आदिके लक्षण इस प्रकार हैं-गाभ्यान्तानके विषयभूत पदार्थको सत्य कहते हैं, जैसे-जलको जल कहना । मिथ्याज्ञानके विपयभूत पदार्थको असत्य कहते हैं; जैसे-मृगतृष्णाको जल कहना । दोनोंके विषयभूत पदार्थको उभय कहते हैं। जैसे-कमण्डलुको घट कहना। कमण्डलुसे घटका काम लिया जा सकता है इसलिये सत्य है और कमण्डलका आवार घटसे भिन्न है इसलिये असत्य है। जो दोनों ही प्रकारके ज्ञानका विषय न हो उसे अनुभय कहते हैं; जैसे-सामान्यरूपसे यह प्रतिभास होना कि 'यह कुछ है। यहाँ सत्य-असत्यका कुछ भी निर्णय नहीं होता इसलिये अनुभय है। इन चार प्रकारके वचनोंसे आत्माके प्रदेशोंमें जो हलन-चलन होता है वह सत्यवचनयोग आदि कहलाता है ।। ७० ॥
___ काययोगके सात भेव औदारिको क्रियिका कायश्चाहारकश्च ते ।
मिश्राश्च कार्मणं चैव काययोगोऽपि सप्तधा ॥७१।। अर्थ औदारिक, औदारिकमिश्र, बैंक्रियिक, वैक्रियिकमिश्र, आहारक, आहारकमिश्र और कार्मण इस तरह काययोग भी सात प्रकारका होता है ।
भावार्थ-मनुष्य और तिपंञ्चोंके उत्पत्तिके प्रथम अन्तर्मुहूर्तमें औदारिकमिश्र काययोग होता है। उसके बाद जीवनपर्यन्त औदारिक काययोग होता है । देव और नारकियोंके उत्पत्तिके प्रथम अन्तर्मुहूर्तमें वैक्रियिकमित्र काययोग होता है | उसके बाद जीवनपर्यन्त वैक्रियिक काययोग होता है । छठवें गुणस्थानवर्ती मुनिके आहारक शरीरका पुतला निकलनेके पहले आहारकमिश्र काययोग होता है । उसके बाद अन्तर्मुहूर्त तक आहारक काययोग रहता है। विग्रहगतिम सभी जीवोंके कार्मण काययोग होता है । तेरहवें गुणस्थानमें केलिसमुद्घातके समय दण्डभेदमें औदारिक काययोग, कपाटमें औदारिकमिश्र काययोग और
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द्वितीयाधिकार प्रतर तथा लोकपुरणमें कार्मण काययोग होता है। तैजस शरीरके निमित्तसे आत्मप्रदेशोंमें परिस्पन्द नहीं होता, इसलिये तैजसयोग नहीं माना गया है ।। ७१ ।।
औदारिक शरीरोंको सूक्ष्मता और प्रदेशोंका वर्णन औदारिको वैक्रियिकस्तथाहारक एव च । तैजसः कार्मणश्चैवं सूक्ष्माः सन्ति यथोत्तरम् ॥७२॥ असंख्येयगुणौ स्यातामायादन्यो प्रदेशतः ।
यथोत्तरं तथानन्तगुणौ तैजसकाणी ॥७३॥ अर्थ-औदारिका, बैक्रियिका, आहारक, तेजस और कार्मण ये पांच शरीर आगे-आगे मूक्ष्म-सूक्ष्म हैं अर्थात् औदारिक शरीरकी अपेक्षा वैक्रियिक, बक्रियिककी अपेक्षा आहारक, आहारकको अपेक्षा तैजस और तैजसको अपेक्षा कार्मणशरोर मूक्ष्म है। प्रदेशों की अपेक्षा औदारिकशरीरसे लेकर क्रियिक और आहारक असंख्यातगुणे हैं और तैजस तथा कार्मण अनन्तगुणे हैं अर्थात् औदारिकशरोरके जितने प्रदेश हैं उनसे असंख्यातगुणे वैक्रियिकके हैं, बैंक्रियिकके जिसने प्रदेश हैं उनसे असंख्यातगुणे आहारकके हैं, आहारकसे अनन्तगुणे तैजसके और उनसे अनन्तगुणे कार्मणशरीरके हैं ।।७२-७३ ।।
तैजस और कार्मणशरीरको विशेषता उभौ निरुपभोगौ तौ प्रतिघातविपर्जितौ । सर्वस्यानादिसम्बन्धौ स्यातां तैजसकार्मणौ ॥७॥ तौ भवेतां क्वचिच्छुद्धौ कचिदौदारिकाधिकौ ।
कचिद्वैक्रिथिकोपेतौ तृतीयाधयुतौ कचित् ।।७।। अर्थ-तैजस और कार्मणशरीर उपभोग-इन्द्रियों द्वारा विषयग्रहणसे रहित हैं, प्रतिघात-रुकावटसे रहित हैं और सामान्यकी अपेक्षा सब जीवोंके साथ अनादि सम्बन्ध रखनेवाले हैं। तेजस और कार्मण ये दो शरीर कहीं तो शुद्ध-अर्थात् अन्य शरीरोंसे रहित होते हैं, कहीं औदारिक शरीरसे अधिक होते हैं, कहीं वैक्रियिकशरीरसे अधिक होते हैं और कहीं आहारकशरीरसे अधिक होते हैं।
भावार्थ-विग्रहगतिमें मात्र तैजस और कामण ये दो शरीर रहते हैं, मनुष्य और तिर्यञ्चगतिमें तैजस कार्मणशरीर औदारिकशरीरके साथ रहते हैं, देव
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तत्त्वार्थसार
और नरकगतिमें वैक्रिटिकके साथ रहते हैं तथा छठवें गुणस्थानवर्ती किसी सुनिकेतला अवस्था में आहारक शरीरके साथ रहते हैं ।।७४-७५ ।।
लब्धिप्रत्यय तैजस और वैक्रियिकशरीरका वर्णन औदारिकशरीरस्थं लब्धिप्रत्ययमिष्यते । अन्यादृक् तैजसं साधोर्व पुर्वक्रियिकं तथा ॥ ७६ ॥
अर्थ — औदारिकशरीरसे युक्त किसी मुनिके लब्धिप्रत्यय ऋद्धि विशेषसे उत्पन्न होनेवाला एक अन्य प्रकारका तेजस तथा वैक्रिविकशरोर माना जाता है ।
भावार्थ - लब्धिप्रत्यय तेजसके दो भेद हैं- शुभ तेजस और अशुभ तेजस | शुभ तेजस चन्द्रमा के समान सफेद रङ्गका होता है तथा मुनिके दाहिने कन्धेस निकलता है । इसके प्रभावसे बारह योजन तक रोग आदि नष्ट हो जाते हैं । अशुभ तैजस सिन्दूरके समान लाल रङ्गका होता है । यह मुनिके चाँयें कन्धे निकलता है तथा बारह योजन तकके क्षेत्रको भस्म कर देता है। मुनि भी भस्म होकर दुर्गतिमें जाते हैं । तैजसशरीरके समान किन्हीं - किन्हीं मुनिके वैक्रिशिरोर भी लब्धिप्रत्यय होता है । इसे विक्रियाऋद्धि कहते हैं ।। ७६ ॥
औदारिक और मैं क्रिधिकशरीर की उत्पत्तिका वर्णन
औदारिकं शरीरं स्याद्गर्भसम्मूर्च्छनोद्भवम् ।
तथा वैक्रियिकाख्यं तु जानीयादोपपादिकम् ॥७७॥
अर्थ — औदारिकशरीर गर्भ और सम्मूर्च्छन जन्मसे उत्पन्न होता है तथा क्रियिकदार उपपाद जन्मसे उत्पन्न होता है । अथवा गर्भ और सम्मूर्च्छन जन्मसे जिसकी उत्पत्ति होती है उसे औदारिक शरीर कहते हैं तथा उपपाद जन्मसे जिसकी उत्पत्ति होती हैं उसे वैक्रियिकशरीर कहते हैं ॥ ७७ ॥
आहारकशरीरका लक्षण
अव्याघाती शुभः शुद्धः प्राप्तः प्रजायते ।
संयतस्य प्रमत्तस्य स खल्वाहारकः स्मृतः ||७८ ||
अर्थ — ऋद्धिधारक प्रमत्तसंयत मुनिके जो व्याघातसे रहित, शुभ तथा
शुद्ध पुतला निकलता है वह आहारकशरीर माना गया है ।। ७८ ।।
वेदमार्गणाका वर्णन
भाववेदस्त्रिभेदः स्यान्नोकषायविपाकजः । नामोदयनिमित्तस्तु द्रव्यवेदः स च त्रिधा ॥७९॥
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द्वितीयाधिकार द्रव्यानपुंसकानि स्युः श्वानाः सम्मृच्छिनस्तथा । पल्यायुषो न देवाश्च त्रिवेदा इतरे पुनः ।।८०॥ उत्यादः खलु देवीनामैशानं यावदिष्यते ।
गमनं त्वच्युतं यावत् पुवेदा हि ततः परम् ||८१|| अर्थ-नोकषायके उदयसे उत्पन्न होनेवाला भाववेद स्त्री पुरुप और गमके भेदसे लीग प्रारला है : शीप्रसार सममके उदयसे होनेवाला द्रव्यवेद भी तीन प्रकारका है। नारकी तथा सम्मूर्छन जन्मसे उत्पन्न होनेवाले जीब द्रव्यवेदको अपेक्षा नपुंसक होते हैं । भोगभूमिज मनुष्य तिर्यञ्च तथा देव नपुंसक नहीं होते अर्थात् स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी ही होते हैं । शेष मनुष्य और तिर्यञ्च तीनों वेदवाले होते हैं अर्थात् तीन वेदोंमेंसे किसी एक वेदके धारक होते हैं । देवियोंका उत्पाद ऐशान स्वर्ग तक होता है परन्तु उनका गमन अच्युत स्वर्ग तक होता है। इस दृष्टिसे अच्युत स्वर्ग तक पुरुषवेद और स्त्रीवेद ये दो वेद पाये जाते हैं। उसके आगे सब देव पुरुषवेदी ही होते हैं।
भावार्थ-भाववेद और द्रव्यवेदकी अपेक्षा वेदके दो भेद हैं । इनमें स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद नामक नोकषायके उदयसे जो रमणकी इच्छा होती है वह भाववेद कहलाता है। इसके स्त्री, पुरुष और नपुंसक इस तरह तीन भेद हैं। तथा अङ्गोपाङ्ग नामक नामकर्मके उदयसे शरीरके अंगोंकी जो रचना होती है उसे द्रव्यर्वेद कहते हैं । इसके भी स्त्री, पुरुष और नपुंसक इस तरह तीन भेद हैं। देव, नारकी और भोगभूमिज मनुष्य, तिर्यञ्च इनके जो द्रव्यवेद होता है वही भाववेद होता है अर्थात् इनके दोनों वेदोंमें समानता रहती है परन्तु शेष जीवाम समानता और असमानता दोनों होती है अर्थात् द्रव्यवेद और भाववेद भिन्नभिन्न होते हैं । यह वेदोंको विभिन्नता जीवनव्यापिनी होती है । क्रोधादि कषायोंकी तरह अन्तर्मुहूर्तमें परिवर्तित नहीं होती है। ऐसे मनुष्य भी जिनके द्रव्यवेद पुरुष और भाववेद स्त्री अथवा नपुंसक है मुनिदीक्षा धारणकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं परन्तु जिनके द्रव्यवेद स्त्री अथवा नपुंसक है और भाववेद पुरुष्प है वे मुनिदीक्षा धारण नहीं कर सकते । ऐसे जीवोंके पञ्चम गुणस्थान तक ही होता है। भाववेदका सम्बन्ध नवम गुणस्थानके पूर्वार्ध तक ही रहता है उसके आगे अवेद अवस्था होती है ।। ७९-८१ ॥
कषायमार्गणाका वर्णन चारित्रपरिणामानां कषायः कपणान्मतः । क्रोधो मानस्तथा माया लोभश्चेति चतुर्विधः ।।८२॥
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तत्त्वार्थसारं अर्थ-जो चारित्ररूप परिणामोंको कषे-घाते उसे कषाय कहते हैं। क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे कषाय चार प्रकारकी हैं। ___ भावार्थ-संक्षेपमें कषायके क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार भेद हैं परन्तु विशेषताकी अपेक्षा ये चारों कषाय अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलनके भेदसे चार-चार प्रकारको होती हैं ।' जो सम्ययत्वाप परिणामोंका घात करतो है उसे अनन्तानुबन्धी कहते हैं, जो एकदेश चारित्रको न होने दे उसे अप्रत्याख्यानाबरण कहते हैं, जिसके उदयसे सकलचारित्र न हो सके उसे प्रत्याख्यानावरण कहते हैं और जो यथाख्यातचारित्रको प्रकट न होने से उसे संज्वलन नहते हैं । हावाबी कपारका उदय दूसरे गुणस्थान तक, अप्रत्याख्यानावरणका उदय चौथे गुणस्थान तक, प्रत्यारन्यानावरणका उदय पांचवें गुणस्थान तक और संज्वलनका उदय दशवें गुणस्थान तक चलता है। उसके आगे ग्यारहवें गुणस्थानमें कषायोंका उपशम रहता है और बारहवें आदि गुणस्थानों में क्षय रहता है । इन सोलह कषायोंके सिवाय हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, और नपुंसकवेद ये नो नोकषाय भी हैं । हास्य, रति आदिके भाव, क्रोधादिके समान चारित्रगुणका पूर्णघात नहीं कर पाते इसलिये इन्हें नोकषाय-किंचित कषाय कहते हैं। इनका उदय यथासंभव नवम गुणस्थान तक रहता है ।। ८२।।
ज्ञानमार्गणाका वर्णन तत्वार्थस्यावबोधो हि ज्ञानं पञ्चविधं भवेत् ।
मिथ्यात्वपाककलुपमज्ञानं विविधं पुनः ।।८३॥ अर्थ-जीवादि तत्त्वोंका यथार्थ बोध होना ज्ञान कहलाता है । यह मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलके भेदसे पांच प्रकारका होता है। जो ज्ञान मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे कलुषित रहता है उसे अज्ञान अथवा मिथ्याशान कहते हैं। इसके मत्यज्ञान, श्रुताशान और विभङ्गके भेदसे तीन भेद होते हैं। इस तरह कुल मिलाकर ज्ञानमार्गणाके आठ भेद हैं ।। ८३ ।।
संयममार्गणाका वर्णन संयमः खलु चारित्रमोहस्योपशमादिभिः । प्राणस्य परिहारः स्यात् पञ्चधा स च वक्ष्यते ।।८४॥
१ पढमादिया कसाया सम्मतं देशसयलचारित्तं ।
जहखावं पादंति य गुणणामा होति सेसा कि ।। ४५ ।।-कर्मकाण्ड सम्मत्तदेससमलचरित्तजहक्खादचरणपरिणामे । धाति वा कसाया घउसोलअसंखलोमिया ।। २८२ १-जीवकाम
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द्वितीयाधिकार
संयमासंयमः
विरताविरतवेन प्राणिघाताक्षविषयभावेन
अर्थ – चारित्रमोहनीय कर्मके उपराम आदिके द्वारा प्राणघातका परित्याग होता है वह निश्चयसे संयम कहलाता है । यह सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यातके भेदसे पाँच प्रकारका कहा जायेगा | एक ही साथ विरत और अविरत अवस्था होनेसे संयमासंयम होता है तथा प्राणिघात और इन्द्रियोंके विषयोंमें प्रवृत्ति होनेसे असंयम होता है ।
।
भावार्थ - चारित्रमोहनीयकर्म के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशमसे आत्मा में जो विशुद्धता प्रकट होती है उसे संयम कहते हैं। यह संयम, सामायिक आदिके भेदसे पाँच प्रकारका होता है तथा छठवें गुणस्थान से प्राप्त होता है । सामायिक और छेदोपस्थापना छठवेंसे नौवें गुणस्थान तक रहते हैं, परिहारविशुद्धि छठवें और सातवें गुणस्थान में होता है सूक्ष्म सांपराय सिर्फ छठवें गुणस्थान में होता है और यथा ग्यारहवें आदि गुणस्थानों में होता है। इन पाँच संयमोंके सिवाय संयममार्गणा के संयमासंयम और असंयम ये दो भेद और भी हैं। संयमासंयम पञ्चम गुणस्थान में होता है और असंयम प्रथम गुणस्थानसे लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक रहता है। सामायिक आदि संयमोंके लक्षण संवरके प्रकरणमें कहे जायेंगे ।। ८४-८५ ॥
स्मृतः । स्यादसंयमः ।। ८५ ।।
५९
दर्शन मार्गेणाका वर्णन दर्शनावरणस्य स्यात् क्षयोपशमसन्निधौ । आलोचनं पदार्थानां दर्शनं तच्चतुर्विधम् ||८६ ॥ चक्षुर्दर्शनमेकं स्यादचक्षुर्दर्शनं तथा । अवधिदर्शनं चैव तथा केवलदर्शनम् ||८७ || अर्थ-दर्शनावरण कर्मका क्षयोपशम ( और क्षय) होनेपर जो पदार्थोकर सामान्य अवलोकन होता है उसे दर्शन कहते हैं । यह चार प्रकारका हैचक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ।
भावार्थ-चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुर्दशनावरण और अवधिदर्शनावरण इन तीन प्रकृतियोंका क्षयोपशम होनेपर क्रमसे चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन तथा अवधिदर्शन प्रकट होते हैं और केवलदर्शनावरणका क्षय होनेपर केवलदर्शन प्रकट होता है । इनके लक्षण पहले कहे जा चुके हैं ॥ ८६-८७ ॥
श्यामार्गणाका वर्णन
योगवृत्तिर्भवेल्लेश्या
कषायोदयरचिता । भायतो द्रव्यतः कायनामोदयकृताङ्गरुक् ||८८||
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तत्त्वार्थसार कृष्णा नीला च कापोता पीता पना तथैव च ।
शुक्ला वेति भवत्येषा द्विविधापि हि षड्विधा ||८|| अर्थ-भावकी अपेक्षा कषायके उदयसे रेंगी हुई योगवृत्ति लेश्या कहलाती है और द्रव्यकी अपेक्षा शरीर-नामकर्मके उदयसे निर्मित शरीरकी कान्ति लेश्या कहलाती है । यह दोनों प्रकारको लेश्या कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पन और शुक्लके भेदसे छह प्रकारको होती है। कृष्णादि लेश्याओंके लक्षण पहले कहे जा चुके हैं ।। ८८-८९ ।।
भव्यत्वमार्गणाका वर्णन भव्याभव्यविभेदेन द्विविधाः सन्ति जन्तवः ।
भव्याः सिद्धत्वयोग्याः स्युर्विपरोतास्तथापरे ॥९०|| अर्थ- भव्य और अभव्यके भेदसे जीद दो प्रकारके हैं। जो सिद्धपर्याय प्राप्त करनेके योग्य हैं वे भव्य कहलाते हैं और जो इनसे विपरीत हैं वे अभव्य कहे जाते हैं ।। ९०॥
सम्यक्त्वमार्गणाका वर्णन सम्यक्त्वं खलु तच्चार्थश्रद्धानं तत्रिधा भवेत् । स्यात्सासादनसम्यक्त्वं पाकेऽनन्तानुबन्धिनाम् ।।११।। सम्यग्मिथ्यात्वपाकेन सम्यग्मिध्यावमिष्यते ।
मिथ्यात्वमुदयेनोक्तं मिथ्यादर्शनकर्मणः ।।९२|| अर्थ-तत्त्वार्थके श्रद्धानको सम्यक्त्व कहते हैं। औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिकके भेदसे वह सम्यक्त्व' तीन प्रकारका होता है। अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभके उदयसे सासादनसम्यक्त्व होता है। सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे सम्यग्मिथ्यात्व होता है तथा मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे मिथ्यात्व होता है। इस तरह सम्यक्त्वमार्गणाके छह भेद हैं। इनके लक्षण पहले कहे जा चुके हैं । मिथ्यात्व पहले गुणस्थानमें, सासादन दूसरे गुणस्थानमें, सम्यग्मिथ्यात्व तीसरे गुणस्थानमें, औपमिकसम्यग्दर्शन चौथेसे ग्यारहवें गुणस्थान तक, क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शन चौथेसे सातवें तक और क्षायिकसम्यग्दर्शन चौथेसे चौदहवें तक तथा सिद्धगर्यायमें भी रहता है ।। ९१-९२ ।।
संज्ञीमागंणाका वर्णन यो हि शिक्षाक्रियात्मार्थग्राही संज्ञी स उच्यते । अतस्तु विपरीतो यः सोऽसंज्ञी कथितो जिनैः ॥२३॥
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द्वितीयाधिकार अर्थ-जो जीव शिक्षा, क्रिया तथा आत्माके प्रयोजनको ग्रहण करता है वह संजो कहलाता है । इससे जो विपरीत है उसे जिनेन्द्र भगवानने असंज्ञी कहा है। इस तरह संज्ञी और असंजीके भेदसे संज्ञीमागंणाके दो भेद हैं। ___ भावार्थ-असंही जीवके सिर्फ प्रथम गुणस्थान रहता है और संज्ञी जीवके पहलेसे लेकर बारह तक गुणस्थान होते हैं। तेरहवें और चौदहवें गुणस्थानमें रहनेवाला जीव न संज्ञी हैं और न असंज्ञी है ।। २३ ॥
___ आहारमार्गणाका वर्णन गृह्णाति देहपर्याप्तियोग्यान् यः खलु पुद्गलान् ।
आहारका स विज्ञेयस्ततोऽनाहारकोऽन्यथा ॥९४|| अर्थ-जो औदारिकादि शरीर तथा पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है उसे आहारक जानना चाहिये और जो इससे विपरीत है उसे अनाहारक समझना चाहिए ॥ ९४ ।।
अनाहारक कौन होते हैं ? अस्त्यनाहारकोऽयोगः समुद्घातगतः परः ।
सासनो विग्रहगतौ मिथ्यादृष्टिस्तथाव्रतः ।।१५।। अर्थ--अयोगकेवली, लोकपूरण समुद्धात करनेवाले सयोगकेवली, तथा विग्रहगतिमें स्थित मिथ्यादृष्टि; सासादन और अविरत सम्यग्दृष्टि जीव अनाहारक होते हैं ।। ९५ ॥
विग्रहगतिका लक्षण और उसको विशेषता विग्रहो हि शरीरं स्यात्तदर्थ या गतिर्भवेत् । विशीर्णपूर्वदेहस्य सा विग्रहगतिः स्मृता ॥१६॥ जीवस्य विग्रहगती कर्मयोग जिनेश्वराः । पाहुदेहान्तरप्राप्तिकर्मग्रहणकारणम् ॥९७। जीवानां पश्चताकाले यो भवान्तरसंक्रमः । मुक्तानां चोद्धर्वगमनमनुश्रेणिगतिस्तयोः ।।१८।। सविग्रहाऽविग्रहा च सा विग्रहगतिर्द्विधा । अविग्रहैव मुक्तस्य शेषस्यानियमः पुनः ।।१९।।
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तस्वार्थसार अविग्रहकसमया कथितेषु गतिर्जिनः । अन्या द्विसमया प्रोक्ता पाणिमुक्तकविग्रहा ||१००|| द्विविग्रहां त्रिसमयां प्राहुर्लाङ्गलिकां जिनाः । गोमूत्रिका तु समयैश्चतुर्भिः स्यान्त्रिविग्रहा ।।१०१।। समयं पाणिमुक्ताया मन्यस्यां समयद्वयम् |
तथा गोमूत्रिकायां त्रीननाहारक इष्यते ॥१०२|| अर्थ-निश्चयसे विग्रहका अर्थ शरीर है। जिसका पूर्व शरीर नष्ट हो गया है ऐसे जीवकी नवीन शरीरके लिये जो गति ( गमन ) होती है वह विग्रहगति मानी गई है । जिनेन्द्र भगवान्ने विग्रहगतिमें जीवके कार्मण काययोग कहा है । यह कार्मण काययो शरीरको शामिला नवीन फर्म प्रहाका कारण है। मत्यु होने पर जीवोंका जो अन्य भवमें गमन होता है तथा मुक्त जीवोंका जो ऊर्ध्वगमन होता है उन दोनोंमें जीवोंकी गति श्रेणीके अनुसार ही होती है। सबिनहा-मोड़ सहित और अविग्रहा-मोड़ रहितके भेद से वह विग्रहगति दो प्रकारकी होती है । मुक्त जीवकी गति अविग्रहा--मोड़ रहित हो होती है। शेष जीवोंको गतिका कोई नियम नहीं है अर्थात् उनको गति दोनों प्रकारको होती है । जिस गतिमें विग्रह-मोड़ नहीं होता उसमें एक समय लगता है तथा जिनेन्द्र भगवान्ने उसका इषुगति नाम कहा है । जिसमें एक मोड़ लेना पड़ता है उसमें दो समय लगते हैं तथा इसका पाणिमुक्ता नाम है। जिसमें दो मोड़ लेना पड़ते हैं उसमें तीन समय लगते हैं तथा उसे जिनेन्द्र भगवान् लाङ्गलिकागति कहते हैं । जिसमें तीन मोड़ लेना पड़ते हैं उसमें चार समय लगते हैं और उसे गोमूत्रिका कहते हैं। पाणिमुक्तागतिमें जीव एक समय तक, लाङ्गलिकागतिमें दो समय तक और गोमूत्रिकागतिमें तीन समय तक अनाहारक रहता है। इषुगतिमें जीव अनाहारक नहीं होता ॥ ९६-१०२ ।।
जन्मके भेव और उनके स्वामी त्रिविघं जन्म जीवानां सर्वः परिभाषितम् । सम्मूर्च्छनात्तथा गर्भादुपषादात्तथैव च ॥१०३।। भवन्ति गर्भजन्मानः पोताण्डजजरायुजाः । तथोपपादजन्मानो नारकास्त्रिदिवौकसः ।।१०४|| स्यः सम्मुर्छनजन्मानः परिशिष्टास्तथापरे ।
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द्वितीयाधिकार अर्थ-सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपादके भेदसे सर्वज्ञ भगवान्ने जीवोंका जन्म तीन प्रकारका कहा है। पोत, अण्डज और जरायुज जीव गर्भजन्म वाले हैं, नारकी और देव उपपाद जन्मवाले हैं और शेष जीव सम्मूर्छन जन्मवाले हैं।
भावार्थ-सम्मूर्च्छनादि जन्मोंके लक्षण इस प्रकार है।
सम्मूच्र्छन जन्म–इधर-उधरके परमाणुओंके मिलनेसे जो जन्म होता है उसे सम्मूच्र्छन जन्म करते हैं।
गर्भजन्म---रतिक्रियाके बाद स्त्री-पुरुषके रज और वीर्यके संयोगसे जो जन्म होता है उसे गर्भजन्म कहते हैं।
उपपादजन्म-निस्चित उपपाद शय्याओं पर जो जन्म होता है उसे उपपाद जन्म कहते हैं।
जिनके शरीरके साथ गर्भ में कोई थैली आदिका आवरण नहीं रहता तथा उत्पन्न होते ही जो चलने लगते हैं ऐसे सिंह, व्याघ्र आदि जीब पांत कहलाते हैं। अण्डेसे जिनका जन्म होता है ऐसे पक्षी अण्डज कहलाते हैं। जिनक शरीरके साथ एक प्रकारको मांसकी थैलीका आवरण रहता है ऐसे मनुष्य तथा गाय भैंस आदि जरायुज कहलाते हैं। इन तीनों प्रकारके जीवोंके गर्भजन्म होता है। देव और नारकियों की उपपाद शय्याएं निश्चित हैं उनपर आत्माके प्रदश जव पहुँचते हैं तब अन्तर्महर्त में पूर्ण शरीरकी रचना अपने आप हो जाती है। इनके सिवाय अन्य जितने जीव हैं उन सबका संमूछन जन्म होता है ॥ १०३-१०४ ।।
नौ योनियों तथा उनके स्वामियोंका वर्णन योनयो नव निर्दिष्टास्त्रि विधस्यापि जन्मनः ॥१०॥ सचित्तशीतविधृता अचित्ताशीतसंवृताः । सचित्ताचित्तशीतोष्णौ तथा विकृतसंवृतः ॥१०६।। योनिनारकदेवानामचित्तः कथितो जिनैः । गर्भजानां पुनर्मिश्रः शेषाणां त्रिविधो भवेत् ॥१०७॥ उष्णः शीतच देवानां नारकाणां च कीर्तितः। उष्णोऽग्नि कायिकानां तु शेषाणां त्रिविधो भवेत् ॥१०८।। नारकैकाक्षदेवानां योनिर्भवति संवृतः । विकृतो विकलाक्षाणां मिश्रः स्याद्गर्भजन्मनाम् ।।१०१।।
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६४
तत्त्वार्थसार ___ अर्थ-उक्त तीनों प्रकारके जन्मोंकी सचित्त, अचित्त, सचित्ताचित्त, शीत, उष्ण, शीतोष्ण, विवृत, संवृत और विवृतसंवृत ये नौ योनियां कही गई हैं। जिनेन्द्र भगवान्ने नारकी और देवोंकी अचित्त योनि कही है। गर्भजन्मवालोंकी सचित्ताचित्त धोनि तथा शेष जीवों की तीनों प्रकारकी अर्थात किसीकी सचित्त, किसीकी अचित्त और किसीकी सचित्ताचित्त योनि बतलाई है । देव-नारकियोंमें किन्हीं की शीत तथा किन्हीं की उष्ण योनि, अग्निकायिक जीवोंको उष्ण योनि और शेष जीवोंकी तीनों प्रकारको योनियां हैं। नारकी, एकेन्द्रिय और देवों की संवृत, विकलत्रयोंकी विवृत तथा गर्भजन्मवालोंकी मिश्र-विवृतसंवृत योनि होती है ।। १०५-१०९ ॥
चौरासीलाख योनियोंका विवरण 'नित्येतरनिगोदानां भूभ्यम्भोवाततेजसाम् । सप्त सप्त भवन्त्येषां लक्षाणि दश शाखिनाम् ।।११०॥ षट् तथा विकलाक्षाणां मनुष्याणां चतुर्दश । तिर्यग्नारकदेवानामेकैकस्य चतुष्टयम् । एवं परमाधिः स्वाल्लक्षाणां जीवयोनयः ।।१११॥
(षट्पदम् ) अर्थ-नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिबीकायिक, जलकायिक वायुकायिक और अग्निकायिक इन छहकी सात-सात लाख, वनस्पतिकायिककी दश लाख, विकलत्रयोंकी छह लाज, मनुष्योंकी चौदह लाख, तिर्यञ्च, नारकी और देवोंमें प्रत्येककी चार-चार लाख "इस तरह सब मिलाकर चौरासी लाख जोवयोनियां होती हैं ।। ११०-१११ ॥
कुलकोटियोंका विवरण द्वाविंशतिस्तथा सप्त त्रीणि सप्त यथाक्रमम् । कोटी लक्षाणि भूभ्यम्भस्तेजोऽनिल शरीरिणाम् ||११२।। वनस्पतिशरीराणां वान्यष्टाविंशतिः स्मृताः । स्युिित्रचतुरक्षाणां सप्लाष्ट नव च क्रमात् ॥११३।।
१ णिच्चिदरघासत्त य तरुदस विलिदिएसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरियचउरो चोदस मणुएसु सदसहस्सा ।।
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६५
वितीयाधिकार तानि द्वादश सार्दानि भवन्ति जलचारिणाम् | नवाहिपरिसाणां गवादीनां तथा दश ॥११॥ चीनां द्वादश तानि म्युश्चतुर्दश नृणामपि | षड्विंशतिः सुराणां तु श्वाभ्राणां पञ्चविंशतिः ।।११५॥ कुलाना कोटिलक्षाणि नवतिर्नवभिस्तथा ।
पञ्चायुतानि कोटीना कोटिकोटी च मीलनात् ॥११६॥ अर्थ-पृथिवीकायिकके बाईस लाख, जलकायिकके सात लाख, अग्निकायिकके तीन लाख, वायुकायिकके सात लाख, वनस्पतिकायिकके अट्ठाईस लाख, द्वीन्द्रियोंके सात लाख, त्रीन्द्रियोंके आठ लाख, चतुरिन्द्रियोंके नौ लाख, जलचरोंके साढ़े बारह लाख, सर्प तथा छातीसे सरकनेवाले अजगर आदिके नौ लाख, गाय आदि चौपायोंके दश लाख, पक्षियोंके बारह लाख मनुष्योंके चौदह लाख, देवोंके छब्बीस लाख और नारकियोंके पच्चीस लाख कुलोंकी कोटियां हैं। सब मिलाकर कुलोको संख्या एक करोड़ निन्यानवे लाख पचास हजारको एक करोड़से गुणा करनेपर जितना लब्ध आवे उतनी हैं अर्थात् १९९५००००००००००० प्रमाण है।
भावार्थ-शरोरके भेदकी कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदको कुल कहते है अर्थात् जिन पुद्गलोंसे जीवोंके शरीरकी रचना होती है वे इतने प्रकारके हैं ॥ ११२-११६ ।।
लियंचों तथा मनुष्योंको उत्कृष्ट आयुका वर्णन द्वाविंशति वां सप्त पयसां दश शाखिनाम् । नभस्वतां पुनस्त्रीणि वीनां द्वासप्ततिस्तथा ॥११७॥ उरगाणां द्विसंयुक्ता चत्वारिंशत्प्रकर्षतः । आयुर्वर्षसहस्राणि सर्वेषां परिभाषितम् ॥११८॥ दिनान्येकोनपञ्चाशत्त्यक्षाणां त्रीणि तेजसः । घण्मासाश्चतुरक्षाणां भवत्यायुः प्रकर्षतः ॥११९॥ नवायुः परिसणां पूर्वाङ्गानि प्रकर्षतः । द्वयक्षाणां द्वादशान्दानि जीवितं स्यात्प्रकर्षतः ॥१२०॥
१. गोम्मदसार-जीवकाण्डमें मनुष्यों की कुलकोटियां बारह लाख करोड़ बतलाई है।
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तत्त्वार्थसार असंशिनस्तथा मत्स्थाः कर्मभूजाश्चतुष्पदाः । मनुष्याश्चैव जीवन्ति पूर्वकोटि प्रकर्पतः ।।१२।। एक द्वे त्रीणि पल्यानि नृ-तिरश्चां यथाक्रमम् । जघन्यमध्यमोत्कृष्टभोगभूमिषु जीवितम् । कुमोगभूमिजानां तु पल्यमेकं तु जीवितम् ॥१२२।।
(षट्पदम् ) अर्थ-पृथिवीकायिकजीवोंकी उत्कृष्ट आयु बाईस हजार वर्ष, जलकायिकजीवोंकी सात हजार वर्ष, बनस्पतिकायिकजीवोंकी दश हजार वर्ष, वायुकाधिकजीवोंकी तीन हजार वर्ष, पक्षियोंकी वहत्तर हजार वर्ष, सर्पोकी व्यालीस हजार वर्ष, तीन इन्द्रिय जीवोंकी उनचास दिन, अग्निकायिकको तीन दिन, चौइन्द्रिय जीवोंकी छह माह, छातीसे सरकनेवाले अजगर आदिको नो पूर्वाल, दो इन्द्रियोंकी बारह वर्ष, असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय तियंञ्च, मच्छ, कर्मभूमिज चौपाये और मनुष्योंकी एक करोड़ पूर्व वर्ष, जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट भोगभूमिके मनुष्य तथा तिर्मञ्चोंकी क्रामसे एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य तथा कुभोगभूमिज मनुष्य और तिर्यञ्चोंकी एक पल्य प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति है ।। ११७-१२२६॥
नारकियोंको उत्कृष्ट और जघन्य आयुका वर्णन एक त्रीणि तथा सप्त दश सप्तदशेति च । द्वाविंशतिस्त्रयस्त्रिंशद् घर्मादिषु यथाक्रमम् ॥१२३।। स्यात्सागरोपमाण्यायु रकाणां प्रकर्षतः । दशवर्षसहस्राणि घम्मायां तु जघन्यतः ॥१२४।। वंशादिषु तु तान्येकं त्रीणि सप्त तथा दश ।
तथा सप्तदश द्वथना विंशतिश्च यथोत्तरम् ॥१२५।। अर्थ-धर्मा, वंशा, मेघा, अञ्जना, अरिष्टा, मघवी और माघवी इन सात पृथिवियोंमें रहनेवाले नारकियोंकी उत्कृष्ट आयु क्रमसे एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सत्तरह सागर, बाईस सागर और तेतीस सागर प्रमाण है। घर्मा पृथिवीमें जघन्य आय दश हजार वर्ष है तथा वंशा आदि पृथिवियोंमें क्रमसे एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सत्तरह सागर और बाईस सागर प्रमाण है ॥ १२२-१२५ ।।।
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द्वितीयाधिकार
भवनवासी देवोंकी उत्कृष्ट तया जघन्य आयु भावनानां भवत्यायुः प्रकृष्टं सागरोपमम् ।
दशवर्षसहस्रं तु जघन्यं परिभाषितम् ॥१२६।। अर्थ-भवनवासी देवोंकी उत्कृष्ट आयु एकसागर प्रमाण तथा जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण कही गई है ।। १२६ ।।
___अन्तर देवोंको उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु पल्योपमं भवत्यायुः सातिरेकं प्रकर्षतः ।
दशवर्षसहस्रं तु व्यन्तराणां जघन्यतः ॥१२७॥ अर्थ-व्यन्तर देवोंकी उत्कृष्ट आयु कुछ अधिक एकपल्य प्रमाण और जघन्य आयु दश हजार वर्ष प्रमाण है ।। १२७ ।।
ज्योतिष्कदेवोंको उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु पन्योपमं भवत्यायुः सातिरेकं प्रकर्षतः ।
पल्योपमाष्टभागस्तु ज्योतिष्काणां जयन्यतः ॥१२८।। अर्थ-ज्योतिष्कदेवोंकी उत्कृष्ट आयु कुछ अधिक एक पल्य और जघन्य आयु पल्यके आठवें भाग प्रमाण है।
भावार्थ-ज्योतिष्कदेवोंमें पल्यसे कुछ अधिक आयुका विवरण इस प्रकार है-पन्द्रमाकी एक लाख वर्ष अधिक पल्य, सूर्यको एक हजार वर्ष अधिक एकपल्य, शुक्रकी सौ वर्ष अधिक एकपल्य, बृहस्पतिकी पूर्ण एकपल्य, शेप ग्रहोंकी आधा पल्य, नक्षत्रोंकी आधा पल्य और ताराओंकी चौथाई पल्य उत्कृष्ट स्थिति है १२८ ॥
वैमानिक देवोंको उत्कृष्ट और अधन्य आयु द्वयोद्धयोरुभी सप्त दश चैव चतुर्दश | षोडशाष्टादशाप्येते सातिरेकाः पयोधयः ॥१२९।। समुद्रा विंशतिश्चैव तेषां द्वाविंशतिस्तथा । सौधर्मादिषु देवानां भवत्यायुः प्रकर्पतः ॥१३०॥ एकैकं वर्द्धयेदब्धि नवगैरेय केम्वतः । नवस्वनुदिशेषु स्याद् द्वात्रिंशदविशेषतः ।।१३।।
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तस्वार्थसार त्रयस्त्रिंशत्समुद्राणां विजयादिषु पञ्चसु । साधिकं पन्यमायुः स्यात्सौधर्मशानयोयोः ।।१३२।। परतः परतः पूर्व शेषेषु च जघन्यतः।
आयुः सर्वार्थसिद्धौ तु जघन्यं नैव विद्यते ॥१३३॥ अर्थ-सौधर्म-ऐशान, सानत्कुमार-माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ट, शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार इन छह युगलोंमें क्रमसे कुछ अधिक दो सागर, सात सागर, दश सागर, चौदह सागर, सोलह सागर और अठारह सागर को उत्कृष्ट आयु है। आमत-प्राणत युगलमें बीस सागर तथा आरण-अच्युत युगलमें बाईस सागरकी उत्कृष्ट आयु है। इसके आगे नौग्नवेयकोंमें प्रत्येक प्रैवेयकके अनुसार एक-एक सागरकी आयु बढ़ाना चाहिये । इस तरह प्रथम मेवेयकमें तेईस सागर और मौवें वेयकमें इकतीस सागरकी उत्कृष्ट आयु है । इसके आगे नौ अनुदिशोंमें सामान्यरूपसे एक सामरकी वृद्धि होकर बत्तीस सागरको उत्कृष्ट आयु है। इसके ऊपर विजय आदि पाँच अनुत्तर विमानों में एक सागर बढ़कर तेतीस सागरकी उत्कृष्ट आयु है। सौधर्म और ऐशान स्वर्गमें जघन्य आयु कुछ अधिक एक पल्य प्रमाण है । इसके आगे पिछले युगलोंकी उत्कृष्ट स्थिति आगेके युगलों में जघन्य आयु हो जाती है। सर्वार्थसिद्धिमें जघन्य आयु नहीं होती है ॥ १२९-१३३ ।।
तिर्यश्च और मनुष्योंकी जघन्य आयुका सामान्यवर्णन अन्यत्रानपमृत्युभ्यः सर्वेषामपि देहिनाम् ।
अन्तर्मुहूर्तमित्येषां जघन्येनायुरिष्यते ॥१३४|| अर्थ-जिनकी अपमृत्यु नहीं होती उन्हें छोड़कर अन्य सभी तिर्यञ्च और मनुष्योंकी जघन्य मायु अन्तर्मुहूर्त मानी गई है ।। १३४ ॥
अपमृत्यु किनको नहीं होती ? असंख्येयसमायुष्काश्चरमोचममूर्तयः ।
देवाश्च नारकाश्चैयामपमृत्युन विद्यते ॥१३॥ १ कुछ अधिकका सम्बन्ध बातायुष्क जीवोंसे है, जो जीव पहले ऊपरके स्वर्गाकी आयुका बंध करते हैं, पीछे संक्लेशपरिणामोंके कारण बद्धनाथुम अपकर्षण कर, नोनले स्वोंमें उत्पन्न होते है ये घातायुष्क कहलाते हैं। ऐसे जीवोंकी आयु उस स्वाकी निश्चित आयुके आघा सागर अधिक होती है । घातायुष्क जीव बारहवें स्वर्ग तक ही उत्पन्न होते हैं।
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द्वितीयाधिकार अर्थ असंख्यातवर्षकी आयुवाले भोगभूमिके मनुष्य और तिर्यञ्च, चरमोतमदेहके धारक मनुष्य, देव और नारको इनकी अपमृत्यु नहीं होती ।। १३५ ।।
भावार्थ-विष, वेदना, रक्तक्षय, शस्त्राघात, संक्लेश, श्वासनिरोध तथा अन्नपाननिरोध आदि कारण मिलनेपर आयुकर्मके निषेकोंका युगपत् खिर जाना अपमृत्यु कहलाती है। यह अपमृत्यु भोगभूमिके मनुष्य, तिर्यञ्च, देव, नारको और चरमशरीरी जीवोंकी नहीं होती। शेष जीवोंकी अपमृत्यु हो सकती है॥१३५ ।।
नरकोंमें शरीरकी ऊँचाईका वर्णन धम्मायां सप्त चापानि सपादं च करत्रयम् ।
उत्सेधः स्यात्ततोऽन्यासु द्विगुणो द्विगुणो हि सः॥१३६॥ अर्थ वर्मा पृथिवीमें नारकियोंकी ऊँचाई सात धनुष सवा तीन हाथ है और उससे नीचे अन्य पृथिवियोंमें दूनी-दुनी है । ( इस तरह दूनी होती होती सातवीं पृथिवीमें पांचसौ धनुषकी ऊँचाई हो जाती है । ) ।। १३६ ॥
मनुष्योंके शरीरको ऊँचाईका वर्णन शतानि पञ्च चापानां पञ्चविंशतिरेव च । प्रकर्षेण मनुष्याणामुन्सेधः कर्मभूमिषु ॥१३७॥ एकाक्रोशोजघन्यासु द्वौ कोशौ मध्यमासु च ।
क्रोशत्रयं प्रकृष्टासु भोगभूषु समुन्नतिः ।।१३८।। अर्थ-कर्मभूमिमें मनुष्योंकी ऊँचाई उत्कृष्टरूपसे पाँचसौ पच्चीस धनुप है। जघन्य भोगभूमिमें एक कोश, मध्यम भोगभूमिमें दो कोश और उत्तम भोगभूमिमें तीन कोश है ।। १३७-१३८ ।।
व्यन्तर, ज्योतिष्क और भवनवासी देवोंको अंधाई ज्योतिष्काणां स्मृताः सप्तासराणां पञ्चविंशतिः ।
शेषभावनभौमानां कोदण्डानि दशोमतिः ॥१३९॥ अर्थ-ज्योतिष्कदेवोंको सात धनुष, भवनवासियोंमें असुरकुमारोंकी पच्चीस धनुष और शेष भवनवासी तथा व्यन्तरदेवोंकी ऊँचाई दश धनुष है ।। १३९॥
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तस्वार्थसार बैमानिक देवोंको ऊँचाईका वर्णन द्वयो सप्त द्वयोः षट् च हस्ताः पञ्च चतुर्वतः। ततश्चतुषु चच्चारः सार्दाश्चातो द्वयोस्त्रयः ॥१४॥ द्वयोस्त्रयश्च कल्पेषु समुत्सेधः सुधांशिनाम् | अधोवेयकेषु स्यात्सार्द्ध हस्तद्वयं यथा ॥१४१॥ हस्तद्वितयसत्सेधो मध्यग्रेवेयकेषत! अन्त्यवेयकेषु स्याद्धस्तोऽप्यसमुन्नतिः । एकहस्तसमुत्सेधो विजयादिषु पञ्चसु ॥१४२॥
(षट्पवम् ) अर्थ-सौधर्म और ऐशान इन दो स्वर्गों में देवोंको ऊँचाई सात हाथ, सानकुमार और माहेन्द्र इन दो स्वर्गोमें छह हाथ, ब्रह्मा-ब्रह्मोक्तर-लान्तर और कापिष्ट इन चार स्वर्गों में पांच हाथ, शुक्र-महाशुक्र-शतार और सहस्रार इन चार स्वर्गोंमें चार हाथः आनत और प्राणत इन दो स्वर्गोमें साढ़े तीन हाथ, आरण और अच्युत इन दो स्वर्गों में तीन हाथ, अधोगवेयकके तीन विमानोंमें अढ़ाई हाथ, मध्यम अवेयकके तीन विमानोंमें दो हाथ, अन्तिम ग्रंवेयकके तीन विमानों तथा अनुदिशोंमें डेढ़ हाथ और विजयादिक पाँच अनुत्तरविमानोंमें एक हाथकी ऊँचाई है ॥ १४०-१४२ ।।
एकेन्द्रियादि तियनोंको उत्कृष्ट अवगाहना योजनानां सहस्रं तु सातिरेकं प्रकर्पतः । एकेन्द्रियस्य देहः स्याद्विज्ञेयः स च पमिनि ॥१४३॥ त्रिकोशः कथितः कुम्भी शङ्खो द्वादशयोजनः।
सहस्रयोजनो मत्स्यो मधुपश्चैकयोजनः ॥१४४॥ अर्थ–एकेन्द्रियजीबका शरीर उत्कृष्टतासे कुछ अधिक एकहजार योजन विस्तारवाला है। एकेन्द्रियजीवकी यह उत्कृष्ट अवगाहना कमलकी जानना चाहिये। दो इन्द्रिय जीवोंमें शङ्ख बारह योजन विस्तारवाला है, तीन इन्द्रिय जीवोंमें कुम्भी--चिंउटी तीन कोश विस्तारवाली है, चार इन्द्रिय जीवोंमें भौंरा एक योजन-चार कोश विस्तारवाला है और पाँच इन्द्रिय जीवोंमें महामच्छ एकहजार योजन विस्तार वाला है।
भावार्थ-ये उत्कृष्ट अवगाहनाके धारक जीव स्वयंभूरमण द्वीपके बीचमें
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द्वितीयाधिकार
पड़े हुए स्वयंप्रभ पर्वतके आगेके भागमें होते हैं। मच्छ स्वयंभूरमणसमुद्रमें रहता है ।। १४३-१४४ ॥
एकेन्द्रियाविक जीवोंको अघन्य अवगाहना असंख्याततमो भागो यावानस्त्यनुलस्य तु ।
एकाक्षादि सर्व देवतावान् जायतः ॥१४५॥ ___ अर्थ–एकेन्द्रियादिक सभी जीवोंका शरीर जघन्यरूपसे घनामुलके असंख्यात भाग प्रमाण है।
भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवोंमें सर्व जघन्य शरीर सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके तीसरे समयमें होता है तथा उसका प्रमाण घनाङ्गलके असंख्यात भाग प्रमाण है । द्वौन्द्रियोंमें सर्वजघन्य शरीर अनुंघरोका, त्रीन्द्रियोंमें कुन्युका, चतुरिन्द्रियोंमें क्रणमकाशिकाका और पञ्चेन्द्रियोंमें तण्डलमच्छका होता है । यद्यपि इन सबका प्रमाण सामान्य रूपसे धनाङ्गलके असंख्यातवें भाग बराबर है तथापि वह आगे आगे संख्यात गुणा संख्यात मुणा है ॥ १४५ ।।
कौन जीव नरकमें कहाँ तक जाते हैं ? धर्मामसंजिनो यान्ति वंशान्ताश्च सरीसृपाः । मेघान्ताश्च विहङ्गाश्च अञ्जनान्ताश्च भोगिनः ॥१४६॥ तामरिष्टां च सिंहास्तु मघव्यन्तास्तु योषितः ।
नरा मत्स्याश्च गच्छन्ति माधवीं ताश्च पापिनः ॥१४७॥ अर्थ-असंज्ञो पञ्चेन्द्रिय धर्मानामक पहली पृथिवी तक, सरीसृप वंशा नामक दूसरी पृथिवी तक, पक्षी मेधा नामक तीसरी पृथिवी तक, सर्प अञ्जना नामक चौथौ पृथिवी तक, सिंह अरिष्टा नामक पाँचवीं पृथिवी तक, स्त्रियाँ मधवी नामक छठवीं पृथिवी तक, पापी मच्छ तथा मनुष्य माघवी नामक सातवीं पृथिवी तक जाते हैं ॥ १४६-१४७ ।।
नरफोंसे निकले हुए जीव क्या होते हैं ? न लभन्ते मणुष्यत्वं सप्तम्या निर्गताः क्षितेः । तिर्यक्त्वे च समुत्पद्य नरकं यान्ति ते पुनः ॥१४८|| मच्या मनुष्यलाभेन षष्ठया भूमेर्विनिर्गताः । संयमं तु पुनः पुण्यं नाप्नुवन्तीति निश्चयः ॥१४९||
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तस्वार्थसार
निर्गताः खलु पञ्चम्या लभन्ते केचन व्रतम् | प्रयान्ति न पुनर्मुक्ति भावसंक्लेशयोगतः ॥१५॥ लभन्ते निति केचिच्चतुर्थ्या निर्गताः क्षितेः । न पुनः प्राप्नुवन्त्येव पवित्रां तीर्थकताम् ॥१५१।। लभन्ते तीर्थकर्तृत्वं ततोऽन्याभ्यो विनिर्गताः ।
निर्गत्य नरकान्न स्युर्चलकेशवचक्रिणः ॥१५२॥ अर्थ-सातवीं पृथिवीसे निकले हुए नारकी मनुष्यपर्याय प्राप्त नहीं करते । वे तिर्यञ्चोंमें उत्पन्न होकर फिरसे नरक जाते हैं । मध्वी नामक छठवीं पृधिबीसे निकले हुए नारकी मनुष्य तो होते हैं पर वे पवित्र संयमको प्राप्त नहीं होते. यह निश्चय है । पाँचकों पृथिवीसे निकले हुए कोई नारका मुनिव्रत तो धारण कर लेते हैं परन्तु भावोंकी संक्लेशताके कारण मुक्तिको प्राप्त नहीं होते | चौथी पृथिवीसे निकले हुए कितने ही नारकी मुक्ति तो प्राप्त कर लेते हैं परन्तु पवित्र तीर्थंकरका पद प्राप्त नहीं करते हैं। इनके सिवाय अन्य पृथिवियोंसे अर्थात् पहली, दूसरी और तीसरी पृथिवीसे निकले हुए नारकी तीर्थकर पद प्राप्त कर सकते हैं। नरकसे निकल कर नारकी बलभद्र, नारायण और चक्रवर्ती नहीं होते ॥ १४८-१५२ ।।
___ किसका जन्म कहाँ होता है ? सर्वेऽपर्याप्तका जीवाः सूक्ष्मकायाश्च तैजसाः । वायवोऽसंजिनश्चेषां न तिर्यग्भ्यो विनिर्गमः ॥१५३।। त्रयाणां खलु कायानां विकलानामसंजिनाम् । मानवानां तिरश्चां वाऽविरुद्धः संक्रमो मिथः ॥१५४॥ नारकाणां सुराणां च विरुद्धः संक्रमो मिथः । नारको न हि देवः स्यान देवो नारको भवेत् ॥१५५।। भूम्यापः स्थूलपर्याप्ताः प्रत्येकाशवनस्पतिः । तिर्यग्मानुषदेवानां जन्मेषां परिकीर्तितम् ॥१५६।। सर्वेऽपि तेजसा जीवाः सर्वे चानिलकायिकाः । मनुजेषु न जायन्ते ध्रुवं जन्मन्यनन्तरे ॥१५७।।
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द्वितीयाधिकार
सर्वतः || १५८ ।।
पूर्णासंज्ञितिरश्चामविरुद्धं जन्म जातुचित् । नारकामरतिर्यक्षु नृषु वा न तु संख्यातीतायुषां मर्त्यतिरश्चां तेभ्य एव तु । संख्यातवर्षजीविभ्यः संज्ञिभ्यो जन्म संस्मृतम् ॥ १५९ ॥ संख्यातीतायुषां नूनं देवेष्वेवास्ति संक्रमः । निसर्गेण भवेत्तेषां यतो मन्दकषायता ॥ १६०॥ शलाकापुरुषा नैव सन्त्यनन्तरजन्मनि । तिर्यचो मानुपाश्चैव भाज्याः सिद्धगतौ तु ते ।। १६१ ॥
મ
अर्थ – सब लब्ध्यपर्याप्तक जीव, सूक्ष्मकाय, अग्निकायिक, वायुकायिक और असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय इनका तिर्यङचोंसे ( अन्य गतिमें ) निकलना नहीं होता अर्थात् ये मर कर पुनः तियंच गतिमें ही उत्पन्न होते हैं । पृथिवीकायिक, जलकायिक और वनस्पतिकायिक इन तीन कायिकोंका, विकलत्रयोंका तथा असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय मनुष्य और शिर्य बोंगें र उत्पन्न होना विरुद्ध नहीं है अर्थात् मनुष्य मर कर इनमें उत्पन्न हो सकते हैं और ये मर कर मनुष्यों में उत्पन्न हो सकते हैं। नारकी और देवोंका परस्पर संक्रमण विरुद्ध है अर्थात् नारकी देब नहीं हो सकता और देव नारकी नहीं हो सकता | स्थूलपर्याप्तक पृथिवीकायिक, जलकायिक, और प्रत्येक वनस्पति इनमें तिर्यञ्च मनुष्य तथा देवोंका जन्म कहा गया है। सभी अग्निकायिक और सभी वायुकायिक जीव अनन्तर जन्ममें मनुष्यों में उत्पन्न नहीं होते हैं, यह नियम है। पर्याप्तक असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों का जन्म कदाचित् नारकियों, देवों, तिर्यञ्चों और मनुष्योंमें विरुद्ध नहीं है अर्थात् कभी किसी जीवका जन्म होता है सबका सर्वदा नहीं । असंख्यातवर्षकी आयुवाले मनुष्य और तिर्यञ्चका जन्म संख्यातवर्षकी आयुबाले संज्ञी मनुष्य और तिर्यञ्चोंसे माना गया है अर्थात् भोगभूमिके मनुष्य और तिर्यञ्च कर्मभूमिके मनुष्य और तिर्यञ्चोंसे आकर उत्पन्न होते हैं। नारकी और देवोंका जन्म भोगभूमिमें नहीं होता। इसी तरह भोगभूमिके मनुष्य और तिर्यञ्च भी मर कर भोगभूमि मनुष्य और तिर्यञ्च नहीं होते हैं । असंख्यातवर्षको आयुवाले - भोगभूमिज मनुष्य और तिर्यथ्चों का जन्म नियमसे देवों में ही होता है क्योंकि उनके स्वभावसे मन्दकषाय रहती हैं। शलाकापुरुष अनन्तर जन्ममें तिर्यञ्च और मनुष्य नियमसे नहीं होते अर्थात् नरक और देवगतिमें उत्पन्न होते हैं। कितने ही शलाकापुरुष सिद्धगतिको भी प्राप्त होते हैं ।
A
भावार्थ - - २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलभद्र, ९ नारायण और १ प्रतिनारायण ये ६३ शलाकापुरुष कहलाते हैं । इनमें तीर्थंकर नियमसे मोक्ष जाते
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७४
वस्वार्मसार हैं । चक्रवतियोंमें कोई नरक जाते हैं, कोई देव होते हैं और कोई मोक्ष जाते हैं। बलभद्रों में कोई स्वर्ग जाते हैं और कोई मोक्ष जाते हैं। परन्तु नारायण और प्रतिनारायण नियमसे नरक ही जाते हैं ।। १५३-१६१||
देवों में कौन उत्पन्न होते हैं ? ये मिथ्यादृष्टयो जीवाः संजिनीऽसंजिनोऽधया । व्यन्तरास्ते प्रजायन्ते तथा भवनवासिनः ।।१६२|| संख्यातीतायुषो मास्तिर्पश्चाप्यसदृशः । उत्कृष्टास्तापसाश्चैव यान्ति ज्योतिष्कदेवताम् ।।१६३॥ ब्रह्मलोके प्रजायन्ते परिव्राजः प्रकर्षतः । आजीवास्तु सहस्रारं प्रकण प्रयान्ति हि ॥१६४॥ उत्पबन्ते सहस्रारे तिर्यञ्चो व्रतसंयुताः । अत्रैव हि प्रजायन्ते सम्यक्त्वाराधका नराः ॥१६५|| न विद्यते परं यस्मादुपपादोऽन्यलिङ्गिनाम् । निर्ग्रन्थश्रावका ये ते जायन्ते यावदच्युतम् ॥१६६।। धृत्वा निग्रन्थलिङ्ग ये प्रकृष्टं कुर्वते तपः । अन्त्य ग्रेवेयकं यावदभक्ष्याः खलु यान्ति ते॥१६७|| यावत्सर्वार्थसिद्धि तु निर्ग्रन्था हि ततः परम् ।
उत्पद्यन्ते तयोयुक्ता रत्नत्रयपवित्रिताः ॥१६८॥ अर्थ-जो मिथ्यादृष्टि जीव संज्ञी अथवा असंज्ञो पञ्चेन्द्रिय हैं, वे व्यन्तर तथा भवनवासी होते हैं। मिथ्यादृष्टि भोगभूमिज मनुष्य और तिर्यञ्च तथा उत्कृष्ट तापस ये ज्योतिष्क देवोंमें उत्पत्तिको प्राप्त होते हैं। परिव्राजक अधिकसे अधिक ब्रह्मलोक अर्थात् पांचवें स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। आजीवक अधिकसे अधिक सहस्रार नामक बारहवें स्वर्ग तक जाते हैं। प्रती तिर्यञ्च और अविरत सम्यग्दृष्टि भी यहीं तक उत्पन्न होते हैं। इसके आगे अन्य लिङ्गके धारकोंको उत्पत्ति नहीं है। जो निष्परिग्रह श्रावक हैं वे अच्युत स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। जो अभव्य निर्ग्रन्थलिङ्ग अर्थात् दिगम्बर मुनिका वेप धारणकर उत्कृष्ट तप करते हैं वे अन्तिम अवेयक तक जाते हैं। और जो रत्नत्रयसे पवित्र निर्ग्रन्थ तपस्वी हैं वे सर्वार्थसिद्धि तक उत्पन्न होते हैं ।। १६२-१६८ ।।
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द्वितीयाधिकार
देवगतिसे आकर जीव क्या क्या होते हैं ? भाज्या एकेन्द्रियत्वेन देवा ऐशानतश्च्युताः । तियक्त्वमानुषत्वाभ्यामासहस्रारतः पुनः ।।१६९।। ततः परं तु ये देवास्ते सर्वेऽनन्तरे भवे । उत्पअन्ते मनुष्येषु न हि तिर्यक्षु जातुचित् ॥१७॥ शलाकापुरुषा न स्युभीमज्योतिष्कभावनाः । अनन्तरभवे तेषां भाज्या भवति नितिः ॥१७॥ ततः परं विकल्प्यन्ते यावद्ग्रेवेयक सुराः । शलाकापुरुषत्वेन निर्वाणगमनेन च ॥१२॥ तीर्थेशरामचक्रित्वे निर्वाणगमनेन च । च्युताः सन्तो विकल्प्यन्तेऽनुदिशानुत्तरामरः ॥१७३॥ भाज्यास्तीर्थेशचक्रित्वे च्युताः सर्वार्थसिद्धितः । विकल्प्या रामभावेऽपि सिद्धयन्ति नियमात्पुनः ॥१७४।। दक्षिणेन्द्रोस्तथा लोकपाला लौकान्तिकाः शची ।
शक्रश्च नियमाच्च्युत्वा सर्वे ते यान्ति नितिम् ॥१७॥ अर्थ-ऐशान स्वर्ग तकसे च्युत देव एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो सकते हैं। सहस्रार स्वर्ग तकसे च्युत देव तिर्यञ्च और मनुष्य दोनोंमें उत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु इसके आगेके देव अनन्तरभवमें नियमसे मनुष्योंमें ही उत्पन्न होते हैं। तिर्यञ्चोंमें कभी नहीं उत्पन्न होते । व्यन्तर, ज्योतिष्क और भवनवासी देव अनन्तरभवमें शलाका पुरुष नहीं होते । वहाँसे आये हुए मनुष्योंको निर्वाण भी प्राप्त हो सकता है । वेषक तकसे आये हुए देव शलाकापुरुष हो सकते हैं और मोक्ष भी जा सकते हैं 1 अनुदिश और अनुत्तरवासी देव वहाँसे च्युत होकर तीर्थकर, बलभद्र और चक्रवर्ती हो सकते हैं और निर्वाणको भी प्राप्त हो सकते हैं। सर्वार्थसिद्धिसे च्युत देव तीर्थकर चक्रवती और बलभद्र भी हो सकते हैं तथा नियमसे मोक्ष प्राप्त करते हैं। दक्षिण दिशाके इन्द्र, लोकपाल, लोकान्तिकदेव, शची और सौधर्मेन्द्र ये सभी स्वर्गसे च्युत हो, नियमसे मनुष्य होकर उसो भवसे मोक्ष प्राप्त करते हैं ॥ १६९-१७५ ॥
लोकका वर्णन धर्माधर्मास्तिकायाभ्यां व्याप्तः कालाणुभिस्तथा । व्योम्नि पुद्गलसंछन्नो लोकः स्यात्क्षेत्रमात्मनाम्॥१७६॥
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वस्वार्थसार . अर्थ-आकाशके बीचमें धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, तथा कालाणुओंसे व्याप्त और पुद्गलद्रव्यसे युक्त लोक है। यह लोक ही जीवोंका क्षेत्र–आधार है।
भावार्थ-सब ओरसे अनन्त अलोकाकाशके ठीक बीचमें लोक है। यह लोक छहों द्रव्यसे व्याप्त है। यही लोक जीवोंका क्षेत्र अर्थात् आधार कहा गया है।
लोकके भेद और आकार अघो वेत्रासनाकारो मध्येऽसौ झल्लरीसमः ।
ऊवं मृदङ्गसंस्थानो लोकः सर्वज्ञवर्णितः ।।१७७॥ अर्थ-सर्वज्ञदेवके द्वारा कहा हुआ यह लोक, अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोकके भेदसे तीन प्रकारका है । यह लोक नीचे वेत्रासनके आकारका है, मध्यमें झालरके समान है और ऊपर भृदङ्गके सदृश है ।। १७७ ।।
लोकका विभाग सर्वसामान्यतो लोकस्तिरश्चां क्षेत्रमिष्यते ।
श्वाभ्रमानुशदेवानामथातस्तद्विभज्यते ॥१७॥ अर्थ-सर्वसामान्यरूपसे यह लोक तिर्यञ्चोंका क्षेत्र माना जाता है। अब नरक, मनुष्य और देवोंके क्षेत्रका विभाग किया जाता है ।। १७८ ।।
____ अधोलोकका वर्णन अधो भागे हि लोकस्य सन्ति रत्नप्रभादयः । धनाम्बुपवनाकाशे प्रतिष्ठाः सप्त भूमयः ॥१७९॥ रत्नप्रभादिमा भूमिस्ततोऽधः शर्कराप्रभा । स्याद्वालुकाप्रभातोऽस्धततः पङ्कप्रभा मता ॥१८॥ ततो धूमप्रभाधस्तात्ततोऽधस्तात्तमःप्रभा ।
तमस्तमःप्रभातोऽधो भुवामित्थं व्यवस्थितिः ॥१८॥ अर्थ-लोकके अधोभागमें रत्नप्रभा आदि सात भूमियाँ हैं जो घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुबातवलय और आकाशके आधार हैं। उन भूमियों में रत्नप्रभा पहली भूमि है, उसके नीचे शर्कराप्रभा हैं, उसके नीचे बालुकाप्रभा है; उसके नीचे पप्रभा है, उसके नोचे धमप्रभा है, उसके नीचे तमःप्रभा है, और उसके नीचे तमस्तमःप्रभा है। इस प्रकार सात भूमियोंकी स्थिति है॥ १६९-१८१॥
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द्वितीयाधिकार
उक्त पृथिवियोंमें बिलोंकी संख्या विशन्नरकलक्षाणि भवन्त्युपरिक्षिती । अधः पञ्चकृतिस्तस्यास्ततोऽधो दशपश्च च ।।१८२।। ततोऽधो दशलक्षाणि त्रीणि लक्षाण्यवस्ततः ।
पञ्चोनं लक्षमेकं तु ततोऽधः पञ्च तान्यतः ॥१८३॥ अर्थ सबसे ऊपरको भूमिमें तीस लाख, उससे नीचेकी भूमिमे पच्चीस लाख, उससे नीचेकी भूमिमें पन्द्रह लाख, उससे नीचेकी भूमिमें दश लाख, उससे नीचेकी भूमिमें तीन लाख, उससे नीचेकी भूमिमें पांच कम एक लाख और उससे नीचेकी भूमिमें सिर्फ पांच विल हैं। ये विल नरक कहलाते हैं ।। १८२-१८३॥
__नरकोंके वुःखोंका वर्णन परिणामवपुर्लेश्यावेदनाविक्रियादिभिः । अत्यन्तमशुभैर्जीवा भवन्त्येतेषु नारकाः ।।१८४॥ अन्योन्योदीरितासह्य दुःखमाजो भवन्ति ते । संक्लिष्टासुरनिर्वृत्त दुःखाश्चोद्धर्वक्षितित्रये ॥१८५॥ पाकान्नरकगत्यास्ते तथा च नरकायुपः ।
भुञ्जते दुःकृतं घोरं चिरं सप्ततितिस्थिताः ॥१८६॥ अर्थ-इन नरकोंमें नारकी जीव, अत्यन्त अशुभ परिणाम, शरीर, लेश्या, वेदना और विक्रिया आदिसे युक्त रहते हैं। परस्परमें दिये हुए असह्य दुःखको भोगते हैं। ऊपरकी तीन पथिवियोंमें संक्लेश परिणामोंके घारक असुरकुमारके देव उन्हें दुःखी करते हैं। इस तरह सातों भूमियोंमें रहनेवाले नारकी जोव नरकगति उदयसे नरकायु पर्यन्त चिरकाल तक घोर पापका फल भोगते हैं।
भावार्थ-स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और गन्दको परिणाम कहते हैं। नरकोंके स्पादिक अत्यन्त भयावह हैं । वहाँको भूमिका स्पर्श होते हो उतना दुःस्व होता है जितना कि हजार बिच्छुओंके एक साथ काटनेपर भी नहीं होता | यही दशा वहाँके रस आदिको है। नरकों में कृष्ण, नील और कापोत ये तीन अशुभ लेल्याएँ ही होती हैं । पहली और दूसरी भूमिमें कपोत लेश्या है, तीसरी भूमिम अपरके पटलोंमें कापोत लेश्या और नीचेके पटलोंमें नील लक्ष्या है। चौथी भूमिमें नील लेश्या है, पाँचवी भूमिमें ऊपरके पटलोंमें नील लेण्या है और
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तत्त्वार्थसार नीचेके पटलोंमें कृष्ण लेश्या है। छठवी भूमिमें कृष्ण लेश्या है और सातवों भूमिमें परम कृष्णलेश्या है। इन नारकियोंका शरीर अत्यन्त विरूप आकृति तथा हुण्डकसंस्थानसे युक्त होता है। देखनेमें भी भयंकर होता है । प्रथम भूमिके नारकियोंका शरीर सात धनुष तीन हाथ छह अंगुल ऊँचा रहता है और नीचेमोचेकी पृथिवियोंमें दूना-दुना हो जाता है। नरकोंकी वेदनाओंको शब्दोंद्वारा नहीं गिनाया जा सकता। वहाँ पहली, दुसरी, तीसरी और चौथी भमिमें उष्णवेदना है, पांचवीं भूमिमें ऊपरके दो लाख दिलोंमें उष्णबेदना है और नीचेक एक लाख विलोंमें तथा छठवों और सातवी भमिमें शीनवेदना है। जिन नरकोंमें उष्णवेदना है उनमें मेरुपर्वतके बराबर लोहेका गोला यदि पहँच सके तो वह क्षणमात्रमें गलकर पानी हो जावेगा और जिनमें शोतवेदना है उनमें मेरुपर्वतके बराबर लोहेका गोला शोतवायुके स्पर्शसे फटकर क्षार-क्षार हो जायगा। वहाँकी विक्रिया भी अत्यन्त अशुभ होती है। नारकियोंके अपृथक् विक्रिया होती है अर्थात् अपने शरीरमें ही वे परिणमन कर सकते हैं। हे अतविमिमा करना चाहते हैं पर अशुभ विक्रिया ही होती है । इन उपर्युक्त दुःखोंसे ही उनका कष्ट शान्त नहीं होता, ऊपरकी तीन पृथिवियों तक असुरकुमार जातिके देव जाकर उन् नारकियोंको पूर्व वैरका स्मरण दिलाकर परस्परमें लड़ाते हैं। उन्हें लड़ते देखके स्वयं सुखी होते हैं। उन असुरकुमारोंके इसी जातिके संक्लेश परिणाम रहते हैं। इस तरह उन भूमियोंमें नारकी, भूमि सम्बन्धी दुःखोंको, परस्पर उपजाये दुःखोंको और असुरकुमार देवोंके द्वारा उदीरित दुःखोंको आयुपर्यन्त भोगते हैं, असमयमें वहाँसे निकलना नहीं होता ।। १८४-१८६ ।।
मध्यलोकका वर्णन मध्यभागे तु लोकस्य तिर्यक्प्रचयवद्धिनः । असंख्याः शुभनामानो भवन्ति द्वीपसागराः ॥१८७।। जम्बूद्वीपोऽस्ति तन्मध्ये लक्षयोजनविस्तारः । आदित्यमण्डलाकारो बहुमध्यस्थमन्दरः ।।१८८।। द्विगुणद्विगुणेनातो विष्कम्भेणार्णवादयः । पूर्व पूर्व परिक्षिप्य वलयाकृतयः स्थिताः ॥१८॥ जम्बूद्वीयं परिक्षिप्य लवणोदः स्थितोऽर्णवः । द्वीपस्तु धातकीखण्डस्तं परिक्षिप्य संस्थितः ॥१९॥ आवेष्टय धातकीखण्डं स्थितः कालोदसागरः । आवेष्टय पुष्करद्वीपः स्थितः कालोदसागरम् ।।१९१॥
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द्वितीयाधिकार परिपाटयानया ज्ञेयाः स्वयंभरमणोदधिम् ।
यावज्जिनाज्ञया भव्यैरसंख्या द्वीपसागराः ॥१९२।। अर्थ-लोकके मध्यभागमें तिर्यकरूपसे ( समानधरातलपर । बढ़ते हुए शुभ नामवाले असंख्यात द्वी और समुद्र हैं। उन सब चार योजा विस्तारवाला जम्बूद्वीप है । यह जम्बूद्वीप सूर्यमण्डलके समान आकारवाला है तथा इसके ठोक बीचमें मेरु पर्वस स्थित है ! इसके आगे दुने-दूने विस्तारवाले समुद्र तथा हीप हैं । वे समुद्र और द्वीप पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रको घेरे हुए चूड़ीके आकार स्थित हैं 1 जैसे जम्बूद्वीपको घेरकर लवणसमुद्र स्थित है। उसे घेरकर धातकी खण्डद्वीप स्थित है। धातकीखण्डद्वीपको घेरकर कालोदधिसमुद्र स्थित है। और कालोदधिसमुद्रको घेरकर पुष्करद्वीप स्थित है। इसी परिपाटोसे स्वयंभूरमणसमुद्रपर्यन्त असंख्यात द्वीप और समुद्र जिनेन्द्र भगवान्को आज्ञासे भव्यजोवों के द्वारा जानने योग्य हैं ।। १८७-१९२ ।।
अन्बूद्रोपके सात क्षेत्रों के नाम सप्त क्षेत्राणि भरतस्तथा हैमवतो हरिः। विदेहो रम्यकश्चैव हरण्यवत एव च । ऐरावतश्च तिष्ठन्ति जम्बुद्वीपे यथाक्रमम् ॥१९३॥
(षट्पदम् ) अर्थ-जम्बूद्वीपमें क्रमसे भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत, और ऐरावत ये सात क्षेत्र स्थित है ।। १९३ ॥
जम्बूद्वीपके कुलाचलोंका वर्णन पार्वेषु मणिभिश्चित्रा ऊर्वाधस्तुल्यविस्तराः । तद्विभागकराः षट् स्युः शैलाः पूर्वापरायताः ॥१४॥ हिमवान्महाहिमवानिपधो नीलरुक्मिणी । शिखरी चेति संचिन्त्या एते वर्षधराद्रयः ।।१९५|| कनकार्जुनकन्लाणवार्जुनकाञ्चनैः ।।
यथाक्रमेण निवृत्ताश्चिन्त्यास्ते पण्महीधराः ।।१९६।। अर्थ-उपर्युक्त सात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह पर्वत हैं । ये चर्वत किनारों में मणियोंसे चित्र-विचित्र हैं, कपर, नीचे और मध्यमे तुल्य विस्तारवाले हैं तथा
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तत्वार्थसार
पूर्व से पश्चिम तक लम्बे हैं। इनके नाम हैं - १ हिमवान् २ महाहिमवान् ३ निव ४ तील ५ रुक्मी और ६ शिखरी । ये पर्वत वर्षधर पर्वत अर्थात् कुलाल क जाते हैं। ये छहों पर्वत क्रमसे सुवर्ण, चाँदी, सुवणं, नीलमणि, चाँदी तथा सुवर्णसे निर्मित हैं अर्थात् उनके समान वर्णवाले हैं ।। १९४-१९६ ।।
कुलाचलोंपर स्थित सरोवरोंका वर्णन
पद्मस्तथा महापद्मस्तिगिञ्छः केशरी तथा । पुण्डरीको महान् क्षुद्रो हृदा वर्षधराद्रिषु ॥ १९७॥ सहस्र योजनायाम आग्रस्तस्यार्द्धविस्तरः | द्वितीयो द्विगुणस्तस्मात्तृतीयो द्विगुणस्ततः ।। १२८|| उत्तरा दक्षिणैस्तुल्या निम्नास्ते दशयोजनीम् । प्रथमे परिमाणेन योजनं पुष्करं हृदे ॥ १९९॥ द्विचतुर्योजनं ज्ञेयं तद् द्वितीयतृतीययोः । अपाच्यवदुदीच्यानां पुष्कराणां प्रमाश्रिताः || २००|| श्रीश्च ह्रीश्च धृतिः कीर्तिर्बुद्धिलक्ष्मीश्च देवताः । पल्योपमायुषस्तेषु पर्वत्सामानि कान्विताः || २०१ ॥
अर्थ -- उन कुलाचलोंपर क्रमसे पद्म, महापद्म, तिमिञ्छ, केशरी, महापुण्डरोक और पुण्डरीक नामके छह सरोवर हैं। पहला सरोवर एक हजार योजन लम्बा और पाँच सौ योजन चौड़ा है। दूसरा सरोवर इससे दूना है और तीसरा सरोवर दूसरेसे दूना है। उत्तरके तीन सरोवर दक्षिण के सरोवरीके समान विस्तारवाले हैं। ये सभी सरोबर दश योजन गहरे हैं। पहले सरोबरमें एक योजन विस्तारवाला कमल है । दूसरे सरोवरमें दो योजन विस्तारवाला और तीसरे सरोवरमें चार योजन विस्तारवाला कमल है । उत्तरके कमलोंका प्रमाण दक्षिणके कमलोंके समान है । उन कमलोंपर क्रमसे श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि, और लक्ष्मी नामकी देवियाँ रहती हैं। ये देवियां एक पल्यकी आयुवाली हैं तथा पारिषत्क और सामानिक जाति के देवोंसे सहित है ।। १९७- २०१ ।।
चौदह महानवियोंका वर्णन
गङ्गा सिन्धू उभे रोहिद्रोहितास्ये तथैव च । ततो हरिद्धरिकान्ते च शीताशीतोदके तथा ॥ २०२ ॥
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द्वितीयाधिकार
स्तो नारीनरकान्ते च सुवर्णार्जुनकूलिके । रक्तारतोदके च स्तो द्वे द्वे क्षेत्रे च निम्नगे ॥ २०३ ॥ पूर्व सागरगामिन्यः पूर्वा नद्यो द्वयोर्द्वयोः । परिमार्णवगामिन्यः परिचास्तुनयोर्मताः ॥ २०४॥ गङ्गासिन्धुपरीवारः सहस्राणि चतुर्दश । नदीनां द्विगुणास्तिस्रस्तितोऽर्द्धार्द्धहापनम् || २०५ ||
ረ
अर्थ — गङ्गा सिन्धु, रोहित रोहितास्या, हरित् हरिकान्ता, शीता शीतोदा, नारी नरकान्ता सुवर्णकूला रूप्यकूला और खता रक्तोदा इन सात युगलोंकी चौदह महानदियाँ हैं। जम्बूद्वीप के सात क्षेत्रों में प्रत्येक क्षेत्र में दो-दो नदियाँ बहती हैं । दो-दो नदियोंके युगलमें पहली नदी पूर्व समुद्रकी ओर जाती है और दूसरी नदी पश्चिम समुद्रकी ओर गमन करती हैं। गङ्गा-सिन्धुका सहायक परिवार चौदह हजार नदियां हैं। इसके आगे तीन युगलोंकी सहायक नदियोंका परिवार दूना चुना है और उसके आगे तीन घुगलोंका परिवार आधा-आधा होता जाता है ।। २०२ - २०५ ।।
क्षेत्र तथा पर्वतोंके विस्तारका वर्णन दशोन द्विशतीभक्तो जम्बूद्वीपस्य विस्तरः | विस्तारो भरतस्यासौ दक्षिणोत्तरतः स्मृतः ॥ २०६ ॥ द्विगुणद्विगुणा वर्षधरवर्षास्वतो मताः । आविदेद्दात्ततस्तु स्युरुत्तरा दक्षिणैः समाः ॥ २०७॥
अर्थ — जम्बूद्वीपके विस्तार अर्थात् एक लाख योजन में एकसी नब्बे योजनका भाग देनेपर जो लब्ध आता है उतना अर्थात् ५२६६ योजन भरत क्षेत्रका दक्षिणसे उत्तर तक विस्तार माना गया है । आगेके कुलाचल और क्षेत्र दूने-दूने विस्तार वाले हैं | यह दूने-ने विस्तारका क्रम विदेह क्षेत्र तक ही है । उत्तरके कुलाचल और क्षेत्र दक्षिणके कुलाचल और क्षेत्रोंके समान हैं ।। २०६ -२०७ ।। कालचक्रका परिवर्तन कहाँ होता है ?
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उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ पट्स मे वृद्धिहानिदे । भरतैरावतौ मुक्त्वा नान्यत्र भवतः क्वचित् ॥२०८॥ अर्थ-छह कालोंसे युक्त तथा वृद्धि और हानिको देनेवाली उत्सर्पिणी और
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८२
नजाभार अवसर्पिणी भरत' और ऐरावत क्षेत्रको छोड़कर अन्यत्र किसी क्षेत्रमें नहीं होती हैं।
भावार्थ-बीस कोडाकोड़ी सागरका एक कल्पकाल होता है। उसके उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीकी अपेक्षा दो भेद होते हैं। जिसमें मनुष्योंके बल, बुद्धि, आयु आदिकी वृद्धि होती है उसे उत्सर्पिणी पाहते हैं और जिसमें उक्त चीजोंकी हानि होती है उसे अवसर्पिणी कहते हैं | दोनोंके सुषमासुषमा, सुषमा, सुषमादुःषमा, दुःषमासुषमा, दुःषमा और दुःपमादुःषमा ये छह भेद होते हैं । ऊपर लिखा हा क्रम अवसर्पिणीका है | उपिणीका क्रम इसके विपरीत होता है। सुषमासुषमा ४ कोडाकोड़ी सागरका होता है। इसमें उत्तम भोगभूमिकी रचना होती है। सुषमा ३ कोडाकोड़ी सागरका होता है। इसमें मध्यम भोगभूमिको रचना होती है। सुषमादुःषमा २ कोडाकोड़ी सागरका होता है। इसमें जघन्य भोगभूमिको रचना होती है। पर जब पल्यका आठवां भाग बाकी रह जाता है तबसे कर्मभूमिकी रचना होती है। दुःषमासुषमा ब्यालोस हजार वर्ष कम एक कोडाकोड़ी सागरका होता है । इसमें कर्मभूमिकी रचना होती है । दुःषमा इक्कीस हजार वर्षका होता है । इसी प्रकार दुःपमादुःषमा भी इक्कीस हजार वर्षका होता है। इन दोनों कालोंमें भी कर्मभूमिकी रचना रहती है। इस तरह अवसर्पिणीके छह काल व्यतीत हो चुकनेपर उत्सपिणोके दुःषमादुःषमा आदि छह काल क्रमसे प्रवर्तते हैं। भरत और ऐरावत क्षेत्रमें उत्सर्पिणी और अबसपिणीके छह कालोंका चक्र क्रमसे चलता रहता है। इन दो क्षेत्रोंको छोड़कर अन्य क्षेत्रोंमें कालचक्रका परिवर्तन नहीं होता। जहां जो काल होता है वही अनाद्यनन्त काल तक रहता है। जैसे हैमवत और हैरण्यवतमें सुषमादुःषमा नामका तीसरा काल, हरि और रम्यक क्षेत्रमें सुषमा नामका दूसरा काल और विदेहक्षेत्रमें दुःषमासुषमा नामका चौथा काल सदा रहता है। विदेह क्षेत्रके अन्तर्गत जो देवकुरु और उत्तरकुरु नामके प्रदेश हैं उनमें सुषमासुषमा नामका पहला काल सदा रहता है। भरत और ऐरावत क्षेत्रके पांच म्लेच्छ खण्डों तथा विजया पर्वतपर चौथे कालके आदि अन्तरूप परिवर्तन होता है, उनमें छह कालोंका परिवर्तन नहीं होता ।। २०८ ॥
पातकोखण्ड और पुष्करद्वीपका वर्णन जम्बुद्वीपोक्तसंख्याभ्यो वर्षा वर्षधरा अपि । द्विगुणा धातकोखण्डे पुष्कराद्धे च निश्चिताः॥२०१|| पुष्करद्वीपमध्यस्थो मानुषोत्तरपर्वतः । श्रूयते वलयाकारस्तस्य प्रागेव मानुषाः ॥२१०॥
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८३
द्वितीयाधिकार द्वीपेवर्धतृतीयेषु द्वयोश्चापि समुद्रयोः ।
निवासोऽत्र मनुष्याणामत एव नियम्यते ॥२११॥ अर्थ-जम्बूद्वीपमें क्षेत्र और कुलाचलोंकी जो संख्या कही गई है, धातकीखंड और पुष्कराधमें उससे दूनी संख्या निश्चित है अर्थात् इन दो खण्डोंमें चौदहचौदह क्षेत्र और बारह-बारह कुलाचल हैं । पुष्करद्वीपके मध्यमें चूड़ीके आकार वाला मानुषोत्तर पर्वत सुना जाता है । उसके पहले पहले ही मनुष्योंका सद्भाव कहा है । इसीलिये अढ़ाई द्वीप और दो समुद्रोंमें मनुष्योंका निवास नियमित किया जाता है ।। २०९-२११ ।।
मनुष्योंके भेद आर्यम्लेच्छविभेदेन द्विविधास्ते तु मानुषाः । आर्यखण्डोद्भवा आर्या म्लेच्छाः केचिच्छकादयः ।। म्लेच्छखण्डोद्भवा म्लेच्छा अन्तरद्वीपजा अपि ॥२१२।।
(षट्पदम् ) अर्थ-आर्य और म्लेच्छोंके भेदसे मनुष्य दो प्रकारके हैं। जो आर्यखण्डमें उत्पन्न हैं वे आर्य कहलाते हैं। आर्य खण्डमें उत्पन्न होनेवाले कितने ही शक, यवन, शबर आदि म्लेच्छ भी कहलाते हैं। म्लेच्छखण्डों तथा अन्तरद्वीपोंमें उत्पन्न हुए मनुष्य म्लेच्छ कहलाते हैं।
भावार्थ-अड़तालीस लषण समुद्र में और अड़तालीस कालोदधि समुद्र में, दोनोंके मिलाकर छियानवे अन्तरद्वीप हैं। इनमें रहनेवाले म्लेच्छ अन्तरद्वीपज म्लेच्छ कहलाते हैं और म्लेच्छखण्डोंमें उत्पन्न होनेवाले म्लेच्छखण्डज म्लेच्छ कहलाते हैं । इस तरह म्लेच्छखण्डज और अन्तरद्वीपजके भेदसे म्लेच्छ दो प्रकार हैं। इन क्षेत्रोंके सिवाय आर्यस्खण्डमें रहनेवाले शक, यवन, शबर आदि भी म्लेच्छ कहे जाते हैं ।। २१२॥
देषलोकका वर्णन, वेवोंके चार निकाय भावनध्यन्तरज्योतिर्वैमानिकपिमेदतः ।
देवाश्चतुर्णिकायाः स्युर्नामकमेविशेषतः ॥२१३॥ अर्थ-भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकके मेदसे देवोंके चार निकाय है। ये मेद नामकर्मकी विशेषतासे होते हैं ।। २१३ ॥
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तत्त्वार्थसार
देवोंके अवान्तर भेद
दशधा भावना देवा अष्टधा व्यन्तराः स्मृताः । ज्योतिष्काः पञ्चधा ज्ञेयाः सर्वे वैमानिका द्विधा ॥ २१४॥
अर्थ - भवनवासी दश प्रकारके, व्यन्तर आठ प्रकारके, ज्योतिष्क पाँच प्रकारके और सभी वैमानिक दो प्रकारके जानना चाहिये ।। २१४ ।।
वश प्रकारके भवनवासी देव
नागासुरसुपर्णाग्निदिग्वातस्तनितोदधिः
द्वीपविद्युत्कुमारख्या दशधा भावनाः स्मृताः ॥ २१५ ॥
अर्थ - नागकुमार, असुरकुमार, सुपर्णकुमार, अग्निकुमार, दिक्कुमार, वातकुमार, स्तनितकुमार, उदधिकुमार, द्वीपकुमार और विद्युत्कुमार ये दश प्रकार के भवनवासी देव माने गये हैं || २१५ ||
आठ प्रकारके व्यन्तर देव
किन्नराः किम्पुरुषाश्च गन्धर्वाश्च महोरगाः । यक्षराक्षसभूताश्च पिशाचा व्यन्तराः स्मृताः ॥ २१६ ॥
अर्थ — किन्नर, किम्पुरुष, गन्धर्व, महोरग, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच ये आठ प्रकारके व्यत्तर स्मरण किये गये हैं ॥ २१६ ॥
ज्योतिष्क देवोंके पाँच भेव
सूर्याचन्द्रमसौ चैव ग्रहनक्षत्रतारकाः ।
ज्योतिष्काः पञ्चधा ज्ञेया ते चलाचलभेदतः ॥ २१७॥
अर्थ - सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और ताराके भेदसे ज्योतिष्कदेव पाँच प्रकार के जानना चाहिये । ये ज्योतिष्क देव चल और अचलके भेदसे दो प्रकारके हैं । अढ़ाई देवके ज्योतिष्क द्वीप चल हैं और उसके बाहरके अचल - अवस्थित हैं ।। २१७ ॥
वैमानिक देवोंके दो भेद
कम्पोपपन्नास्तथा कल्पातीता ते वैमानिका द्विधा ।
अर्थ- कल्पोपपन्न और कल्पातीतके भेदसे वैमानिक देव दो प्रकारके हैं । सोलहवें स्वर्ग तक्के देव कल्पोपपत्र और उसके आगेके कल्पातीत कहलाते हैं ।
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द्वितीयाधिकार देवोंमें इन्द्र आदि भेयोंका वर्णन इन्द्राः सामानिकाश्चैव त्रायस्त्रिंशाश्च पार्षदाः ॥२१॥
आत्मरक्षास्तथा लोकपालानीकप्रकीर्णकाः । निसामाभियोगार मेटाः प्रतिनिकायकाः ॥२१॥ त्रायस्त्रिशैस्तथा लोकपालविरहिताः परे ।
व्यन्तरज्योतिषामष्टौ भेदाः सन्तीति निश्चिताः ।।२२०॥ अर्थ-इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिश, पार्षद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, किल्विष और अभियोग्य ये दश भेद प्रत्येक निकाय में होते हैं । परन्तु व्यन्तर और ज्योतिष्क देव प्रायस्त्रिश और लोकपाल भेदसे रहित हैं अर्थात् उनके आठ ही भेद होते हैं।
भावार्थ इन्द्रादिक भेदोंके लक्षण इस प्रकार हैं
इन्द्र जो अन्य देवोंमें न पाये जानेवाले अणिमा, महिमा आदि मुणोंसे उत्कृष्ट ऐश्वर्यका अनुभव करते हैं उन्हें इन्द्र कहते हैं। ये राजाके तुल्य माने गये हैं।
सामानिक-जिनका वैभव तो इन्द्रके समान हो परन्तु आज्ञारूपी ऐश्वर्यसे रहित हों वे सामानिक कहलाते हैं । ये पिता तथा गुरु आदिके तुल्य होते हैं । __ वार्यास्त्रशा-जो मन्त्री तथा पुरोहित आदिके तुल्य हों उन्हें प्रायस्त्रिश कहते हैं । ये एक इन्द्रको सभामें गिनतीके तेतीस ही होते हैं।
पार्षदजो इन्द्रको सभामें बैठनेवाले सदस्य हैं उन्हें पार्षद या पारिषद कहते हैं । ये मित्र तथा पोठमर्द के समान होते हैं ।
आत्मरक्ष-जो अङ्गरक्षकके समान होते हैं उन्हें आत्मरक्ष कहते हैं। लोकपाल–जो आरक्षक-पुलिसके समान होते हैं वे लोकपाल कहलाते हैं। अनोक-जो सेनाके स्थानापन्न होते हैं उन्हें अनोक कहते हैं । प्रकीर्णक-जो नगरवासियोंके समान होते उन्हें प्रकीर्णक कहते हैं ।
किस्विषिक-जो चाण्डाल 'आदिके समान होते हैं उन्हें किल्विषिक कहते हैं।
आभियोग्य-जो वाहनके काम आते हैं उन्हें आभियोग्य कहते हैं । __ इन दश भेदोंमेंसे त्रायस्त्रिश और लोकपाल भेद व्यन्तर और ज्योतिष्क देवोंमें नहीं होते हैं । अतः उनमें आठ हो भेद होते हैं ॥२१८-२२०।।
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८६
वस्वार्थसार
येवोंमें कामसुखका वर्णन पूर्वे कायप्रवीचारा व्याप्यैशानं सुराः स्मृताः । स्पर्शरूपध्वनिस्वान्तप्रवीचागस्ततः परे ।। ततः परेऽप्रवीचाराः कामक्लेशाल्पमावतः ॥२२१।।
. (षट्पदम् ) अर्य-भवनवासी, न्यन्तर, ज्योतिष्प और सीबों ऐशान वर्ग तकक देव कायप्रवीचार हैं। उसके आगे तीसरे चौथे स्वर्गके देव स्पर्मप्रवीचार, पांचवेसे आठवें स्वर्ग तकके देव रूपप्रवीचार नौवेसे बारहवें तक शब्दप्रवीचार और तेरहवेसे सोलहवें स्वर्ग तकके देव मनःप्रवीचार होते हैं। उसके आगेके देव प्रवाचाम् गहन होत है क्योंकि उनके काम-बाधा अत्यन्त अल्प रहती है।
भावार्थ-प्रवीचारका अर्थ कामसेवन है। सांसारिक सुखोंमें कामसेवन जन्य सूखकी प्रधानता है। इसलिये देवोंके इसी सुखका वर्णन किया गया है। भवनत्रिक देव तथा दूसरे स्वर्ग तकके कल्पवासी देव मनुष्योंके समान शरीरसे कामसेवन करते हैं 1 उसके आगे तीसरे चौथे स्वर्गके देव, देवियोंके स्पर्शमात्रसे संतुष्ट हो जाते हैं । पाँचवेंसे आठवें स्वर्ग तकके देव, देवियोंका रूप देखने मात्रसे संतुष्ट हो जाते हैं । नौवेंसे बारहवें स्वर्ग तफके देव, देवियोंके शब्द सुनने मात्रसे संतुष्ट हो जाते हैं और तेरहवेसे सोलहवें स्वर्ग तकके देव, देवियोंफा मनमें स्मरण आने मात्रसे संतुष्ट हो जाते हैं । यही हाल देवियोंका रहता है । सोलहवें स्वर्गके आगेके देव कामसेवनसे सर्वथा रहित हैं। यहाँ देवाङ्गनाओंका सद्भाव भी नहीं है। इन सबके कामवाधा अत्यन्त अल्प रहती है। इसलिये उन्हें कभी कामसुखकी इच्छा ही नहीं होती ।।२२।।
भवनन्त्रिक देवोंका भिवास कहाँ है ? धर्मायाः प्रथमे भागे द्वितीयेऽपि च कानिचित् । भवनानि प्रसिद्धानि वसन्त्येतेषु भावनाः ॥२२२।। रत्नप्रमाभुवो मध्ये सथोपरितलेऽपि च । विविधेष्वन्तरेष्वत्र व्यन्तरा निवसन्ति ते ॥२२३॥ उपरिष्टान्महीभागात पटलेषु नमोऽङ्गणे ।
तिर्यग्लोकं समाच्छाध ज्योतिष्का निवसन्ति ते ||२२४|| अर्थ-वर्मा-रत्नप्रभा पृथिवीके पहले और दूसरे भागमै कुछ भवन प्रसिद्ध
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विसीयाधिकार हैं उनमें भवनवासी देव रहते हैं। रत्नप्रभा पृथिवीके मध्यभागमें उपरितन भागमें और मध्यमलोकके नाना स्थानोंमें व्यन्तर देव निवास करते हैं । पृथिवीसे ऊपर चलकर आकाशमें ज्योतिष्क निवास करते हैं। ये ज्योतिष्क देव समस्त मध्यम लोकके आकाशको व्याप्तकर स्थित हैं।
भावार्थ-पहली रत्नप्रभा पृथिवीके खरभाग, पङ्कबहुलभाग और अब्बहुलभागके भेदसे जो तीन भाग हैं उनमें तीसरे अब्बहुलभागमें प्रथम नरककी रचना है। दूसरे पकबहुल भागमें असुरकुमार भवनवासियोंके भवन हैं तथा खर भागमें ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन छोड़कर शेष नो भवनवासियोंका निवास है। इस जम्बूद्वीपसे असंख्यात द्वीप-समुद्रोंका उल्लंघनकर रत्नप्रभा पृथिवीके खरभागमें राक्षसोंको छोड़कर शेष सात प्रकारके व्यन्तरोंका निवास है और पशबहुलभागमें राक्षसोंका निवास है। इसके सिवाय मध्यमलोकमें भी नाना स्थानोंपर व्यन्तरोका निवास है। मानुषोत्तर पर्वतके आगे और स्वयंभुरमण द्वीपके मध्यमें स्थित स्वयंप्रभ पर्वतके पहले जो असंख्यात द्वीप समुद्र हैं उनमें व्यन्तर देवों तथा तिर्यञ्चोंका ही निवास है। समान धरातलसे ऊपर आकाशमें सात सौ नब्बे योजनकी ऊँचाईसे लेकर नौसी योजनको ऊँचाई तक एकसौ दश योजनके पटलमें ज्योतिष्क देवोंका निवास है। सबसे नीचे तारा विचरते हैं, उनसे दश योजन ऊपर चलकर सूर्य विचरते हैं, उससे अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमा विचरते हैं, उससे चार योजन ऊपर चलकर नक्षत्र विचरते हैं, उससे चार योजन ऊपर चलकर बुध, उससे तीन योजन ऊपर चलकर शुक्र, उससे तीन योजन ऊपर चलकर बृहस्पति, उससे तीन योजन ऊपर चलकर मङ्गल, और उससे तीन योजन ऊपर चलकर शनि ग्रह विचरते हैं । ये ज्योतिष्क देव मध्यलोकमें चमोदधि दातवलय तक फैले हुए हैं ।।२२२-२२॥
बैमानिक देयोंके निवासका वर्णन ये तु वैमानिका देवा ऊर्ध्वलोके वसन्ति ते । उपर्युपरि तिष्ठत्सु विमानप्रतरेष्विह ॥२२॥ अर्द्धभागे हि लोकस्य विषष्टिः प्रतराः स्मृताः । विमानैरिन्द्र कर्युक्ताः श्रेणीबद्धः प्रकीर्णकः ॥२२६॥ सौधर्मेशानकल्पौ द्वौ तथा सानत्कुमारकः । माहेन्द्रश्च प्रसिद्धौ द्वौ ब्रमब्रह्मोत्तरावुभौ ।।२२७॥ उभौ लान्तवकापिष्टौ शुक्रशुक्रौ महास्वनौ । द्वौ सतारसहस्रारावानतप्राणतावुभौ ।।२२८॥
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तत्वार्थसार आरणाच्युतनामानौ द्वौ कल्पाश्चेति षोडश । अवेयाणि नवातोऽतो नवानुदिशचक्रकम् ।।२२९॥ विजयं वैजयन्तं च जयन्तमपराजितम् । सर्वार्थसिद्धिरित्वेषां पश्चानां प्रतरोऽन्तिमः ।।२३०॥ एषु वैमानिका देवा जायमानाः स्वकर्मभिः । युतिलेश्याविशुद्धयायुरिन्द्रियावधिगोचरैः ॥२३१॥ तथा सुखप्रभावाभ्यामुपर्युपरितोऽधिकाः । हीनास्तथैव ते मानगतिदेहपरिग्रहः ॥२३२॥ इति संसारिणां क्षेत्रं सर्वलोकः प्रकीर्तितः ।
सिद्धानां तु पुनः क्षेत्रमूर्वलोकान्त इष्यते ॥२३३॥ अर्थ-जो वैमानिक देव हैं वे ऊर्ध्वलोकमें ऊपर-ऊपर स्थित विमानोंके पटलोंमें निवास करते हैं 1 लोकमें वेशठ पटल हैं जो कि इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक इन तीन प्रकारके पटलोंसे युक्त हैं | सौधर्म-ऐशान, सानत्कुमार. माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ट, शुक्र-महामुक्र, सतार-सहस्रार, आनतप्राणत और आरण-अच्युत इन आठ युगलोंके सोलह कल्प हैं । इनके आगे ऊपरऊपर नौ ग्रंवेयकोंके नौ पटल हैं, उनके ऊपर नौ अनुदिश विमानोंका एक पटल है, और इसके ऊपर विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि इन पाँच अनुत्तर विमानोंका एक पटल है। अपने-अपने कर्मों के अनुसार वैमानिक देव इनमें उत्पन्न होते हैं। ये वैमानिक देव द्युति, लेश्याकी विशुद्धता, आयु, इन्द्रिय तथा अवधिज्ञानका विषय, सुख और प्रभावसे ऊपर-ऊपर अधिकताको लिये हुए हैं और मान, गति, देह तथा परिग्रहकी अपेक्षा ऊपर-ऊपर हीनताको लिये हए हैं। इस तरह यह समस्त लोक संसारी जीवोंका क्षेत्र कहा गया है। सिद्ध जोवोंका क्षेत्र लोकका अन्तभाग माना गया है।
भावार्थ-जिनमें रहनेवाले अपने आपको विशिष्ट पुण्यवान् मान वे विमान कहलाते हैं, इन विमानों में जिनका निवास है वे वैमानिक कहलाते हैं। वैमानिक देवोंके कल्पवासी और कल्पातीतकी अपेक्षा दो भेद हैं। जिनमें इन्द्र आदि भेदोंकी कल्पना होती है ऐसे सोलह स्वर्ग कल्प कहलाते हैं तथा जिनमें इन्द्र आदिको कल्पना नहीं होती--सब एक समान होते हैं वे ग्रेवेयकों, अनुदिशों और अनुत्तरों के विमान कल्पातीत कहलाते हैं। सोलह स्वर्गोंके देव कल्पोपपन्न और उनके आगेके कल्पातीत कहलाते हैं | सोलह स्वर्ग, सौधर्म-ऐशान, सानत्कुमार-माहेन्द्र,
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द्वितीयाषिकार इत्यादि है। इन सोलह स्वर्गोके ५२ पटल हैं। उनके आगे कपर-ऊपर नौ ग्रेवेयकोंके नौ पा , उपके अपर नौ अनुशिका एक गटर है और उसके ऊपर पांच अनुत्तर विमानोंका एक पटल है। इन सबके मिलाकर अंशठ पटल हैं-उनमें इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और विप्रकीर्णकके भेदसे तीन प्रकारके विमान हैं। बीचके इन्द्रक विमान कहलाते हैं, उनके उत्तर, दक्षिण और पूर्व, पश्चिममें पंक्तिबद्ध विमान श्रेणीबद्ध कहलाते हैं और उनके बीचमें प्रक्षिप्त पुष्पोंके समान स्थित विमान प्रकीर्णक कहलाते हैं। पूर्व भवमें जो जीव जैसा कर्म करते हैं उसीके अनुसार वे इन विमानोंमें उत्पन्न होते हैं। सामान्यरूपसे कल्पोपपन्न और कल्पनातीत देवोंको वैमानिक देव कहते हैं। इन वैमानिक देवोंको कान्ति, लेश्याकी विशुद्धता, आयु, इन्द्रिय तथा अबधिज्ञानका विषय, सुख और प्रभाव ऊपर-ऊपर अधिक होता जाता है तथा अभिमान, गति, देह और परिग्रह ऊपर-ऊपर कम होता जाता है। नीचेके स्वर्गामें रहनेवाले देवोंको जितना अभिमान है उपरितन स्वर्गाके देवोंका अभिमान उससे कम होता जाता है। गति भी उत्तरोत्तर कम होती जाती है, यहाँ तक कि सोलह स्वर्गके आगेके देव अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र गमन नहीं करते । शरीरको ऊंचाई भी ऊपरऊपर कम होती जाती है। देवोंकी आयु और शरीरकी अवगाहनाका वर्णन पहले आ चुका है। परिग्रह भी उत्तरोत्तर कम होता जाता है। यह समस्त लोक संसारी जीवोंका क्षेत्र कहलाता है । सिद्ध जीवोंका क्षेत्र ऊर्ध्वलोकके अन्तमें है अर्थात् लोकान्तमें तीन कोशका धनोदधिवातवलय, दो कोशका घनवातवलय
और पन्द्रहसौ पचहत्तर धनुषका तनुवातवलय है। इस तनुवात वलयके अन्तिम पाँचसौ पच्चीस योजनका क्षेत्र सिद्धक्षेत्र कहलाता है। इसीमें सिद्धोंका निवास है ॥ २२५-२३३ ॥
जीवोंके भेद सामान्यादेकधा जीवो बद्धो मुक्तस्ततो द्विधा । स एवासिद्धनोसिद्धसिद्धत्वात् कीय॑ते त्रिधा ॥२३४॥ श्वाभ्रतियंग्नरोमर्त्य विकल्पात् स चतुर्विधः । प्रशमक्षयतद्वन्द्वपरिणामोदयोद्भवात् ।।२३५।। भावात्पञ्चविधत्वात् स पञ्चभेदः प्ररूप्यते । षड़मार्गगमनात्योढा सप्तधा सप्तभङ्गतः ॥२३६।। अष्टधाष्टगुणात्मत्वादष्टकर्मवृतोऽपि च ।
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तरमा मन पदार्थनवकात्मत्वानवधा दशधा तु सः । दशजीवभिदात्मत्त्वादिति चिन्त्यं यथागमम् ॥२३७।।
(षट्पदम् ) अर्थ-सामान्यकी अपेक्षा जीव एक प्रकारका है, बद्ध और मुक्तकी अपेक्षा दो प्रकारका है, असिद्ध, नोसिद्ध-जीवन्मुक्त—अरहंत और सिद्धकी अपेक्षा तीन प्रकारका है, नारकी, तिर्यच, मनुष्य और देवके भेदसे चार प्रकारका है, उपशम, क्षय, क्षयोपशम, परिणाम और उदयसे होनेवाले भाबोंसे पञ्चरूप होनेके कारण पाँच प्रकारका है, चार दिशाओं और ऊपर, नीचे इस तरह छह दिशाओंमें गमन करनेके कारण छह प्रकारका है, स्यादस्ति, स्यात् नास्ति, स्यादस्ति नास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्तिवक्तव्य, स्याद्नास्तिअवक्तव्य और स्यादस्तिनास्तिअवक्तव्य इन सात भङ्गरूप होनेसे सात प्रकारका है, ज्ञानादि आठगुणोंसे तन्मय होनेके कारण आठ प्रकारका है, जीव, अजीब, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप इन नौ पदार्थरूप होनेसे नौ प्रकारका है तथा जीवसमासके प्रकरणमें कहे गये दश भेदरूप होनेसे दश प्रकारका है । इस तरह आगमके अनुसार और भी भेदोंका विचार किया जा सकता है ।। २३४-२३७ ॥
जीवतत्त्वको श्रद्धा आविसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन इत्येतज्जीवतवं यः श्रद्धत्ते वेत्युपेक्षते ।
शेषतत्वैः समं पद्भिः म हि निर्वाणभाग्भवेत् ॥२३८॥ अर्थ-इस तरह शेष छह तत्त्वोंके साथ जो जीवतत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जानता है और उससे उपेक्षा कर चारित्र धारण करता है वह निश्चयसे निर्वाणको प्राप्त होता है ।। २३८ ॥
इस तरह श्रीअमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित तत्वार्थसारमें जीवतत्त्वका
वर्णन करनेवाला दूसरा अधिकार पूर्ण हुआ ।
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तृतीयाधिकार ( अजीवाधिकार )
मङ्गलाचरण और प्रतिभावाक्य अनन्तकेवलज्योति प्रकाशितजगत्त्रयान् ।
प्रणिपत्य जिनान् सर्वानजीवः संप्रचल्यते ॥१॥ अर्थ-अनन्तकेवलज्ञानरूपी ज्योतिके द्वारा तीनों जगत्को प्रकाशित करनेवाले समस्त अरहन्तोंको नमस्कार कर अजीवतत्त्वका वर्णन किया जाता है ।। १॥
___ पांच अजीवोंके नाम धर्माधर्मावथाकाशं तथा कालश्च पुद्गलाः ।
अजीवाः खलु पञ्चैते निर्दिष्टाः सर्वदशिभिः ॥२॥ अर्थ-धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल, ये पाँच अजीव सर्वज्ञ भगवान्के द्वारा कहे गये हैं ॥२॥
___ छह ब्रव्योंका निरूपण एते धर्मादयः पञ्च जीवाश्च प्रोतलक्षणाः । ___ षड् द्रव्याणि निगद्यन्ते द्रव्ययाथात्म्यवेदिभिः ॥३॥ अर्थ-ये धर्मादिक पांच अजीव और जिनका लक्षण पहले कहा जा चुका है ऐसे जीव ये छह, द्रव्य के यथार्थस्वरूपको जाननेवाले जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा द्रव्य कहे जाते हैं ॥ ३ ॥
__पश्चास्तिकायका वर्णन विना कालेन शेषाणि द्रव्याणि जिनपुङ्गवैः ।
पञ्चास्तिकायाः कथिताः प्रदेशानां बहुत्त्वतः ॥४॥ अर्थ कालके विना शेष पाँच द्रव्य, प्रदेशोंकी अधिकताके कारण जिनेन्द्र भगवानके द्वारा अस्तिकाय कहे गये हैं। ४ ।।
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९२
तस्वार्थसार
द्रव्यका लक्षण समुत्पादव्ययधौव्यलक्षणं क्षीणकल्मषाः ।
गुणपर्ययवद्र्व्यं वदन्ति जिनपुङ्गवाः ॥५॥ अर्थ-वीतराग जिनेन्द्र भगबान, उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त अथवा गुण और पर्यायोंसे युक्त पदार्थको द्रव्य कहते हैं ॥ ५॥
उत्पावका लक्षण द्रव्यस्य स्यात्समुत्पादश्चेतनस्येतरस्य च ।
भावान्तरपरिप्राप्तिर्निजां जातिमनुजातः ।।६।। अर्थ-अपनी जातिको नहीं छोड़ते हुए चेतन तथा अचेतन द्रव्यको जो अन्य पर्यायकी प्राप्ति होती है वह उत्पाद कहलाता है ।। ६ ।।
व्ययका लक्षण स्वजातरावरीधेन द्रव्यस्य विविधस्य हि ।
विगमः पूर्वभावस्य व्यय इत्यभिधीयते ॥७॥ अर्थ-अपनी जातिका विरोध न करते हुए चेतन अचेतन द्रव्यको पूर्व पर्यायका जो नाश है वह व्यय कहलाता है ।1 ७ ॥
प्रोग्यका लक्षण समुत्पादव्ययाभावो यो हि द्रव्यस्य दृश्यते ।
अनादिना स्वभावेन तद् ध्रौव्यं त्रुबत्ते जिनाः ||८|| अर्थ-अनादि स्वभावके कारण द्रव्यमें जो उत्पाद और व्ययका अभाव है उसे जिनेन्द्रभगवान् घीव्य कहते हैं ।। ८ ।।
गुण और पर्यायका लक्षण गुणो द्रव्यविधानं स्थात् पर्यायो द्रव्यविक्रिया।
द्रव्यं ह्ययुतसिद्ध स्यात्समुदायस्तयोर्द्वयोः ॥९॥ अर्थ-द्रव्यको जो विशेषता है उसे गुण कहते हैं और द्रध्यका जो बिकार है वह पर्याय कहलाता है। द्रव्य उन दोनों गुणपर्यायोंका अपृथक् सिद्ध समुदाय है ।।९।।
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तृतीयाधिकार गुण और पर्यायके पर्यायवाचक शब्द सामान्यमन्त्रयोत्सर्गौ शब्दाः स्युर्गुणवाचकाः।
व्यतिरेको विशेषश्च भेदः पर्यायवाचकाः ॥१०॥ अर्थ- सामान्य, अन्वय और उत्सर्ग ये मणवाचक शब्द है तथा वर्गातरेक, विशेष और भेद ये पर्याय शब्द कहे गये हैं ॥ १० ॥
गुण और द्रव्यमें अभेद है. गुणविना न च द्रव्यं विना द्रव्याच्च नो गुणाः।
द्रच्यस्य च गुणानां च तस्मादव्यतिरिक्तता ॥११॥ अर्थ-गुणोंके बिना द्रव्य और द्रध्यके विना गुण नहीं होते, इसलिये द्रव्य और गुणोंमें अभेद है ।। ११ ॥
द्रव्य और पर्यायको अभिन्नता न पर्यायाद्विना द्रव्यं विना द्रव्यान्न पर्ययः ।
वदन्त्यनन्यभूतत्वं द्वयोरपि महर्षयः ॥१२॥ अर्थ-पर्यायके विना द्रव्य और द्रव्यके विना पर्याय नहीं होती, इसलिये महर्षि दोनों में अभिन्नता कहते हैं ॥ १२ ॥
पर्याय ही उत्पाद तथा व्ययके करनेवाले हैं न च नाशोऽस्ति भावस्य न चाभावस्य सम्भवः ।
भावाः कुर्युव्येयोत्पादौ पर्यायेषु गुणेषु च ॥१३॥ अर्थ-सत्का नाश और असत्की उत्पत्ति नहीं होती, इलिये पर्याय ही पर्यायों और गुणोंमें व्यय तथा उत्पादको करते हैं।
भावार्थ-द्रव्यदृष्टिसे किसी पदार्थका न नाश होता है और न किसी पदार्थ की उत्पत्ति होती है, सिर्फ पर्याय ही नष्ट होती तथा उत्पन्न होती है, इस तरह उत्पाद और व्ययका कर्ता पर्याय ही है ।। १३ ।।
द्रव्योंकी नित्यताका वर्णन द्रव्याण्येतानि नित्यानि तद्भावाब व्ययन्ति यत् । ...... प्रत्यभिज्ञानहेतुत्वं तद्रावस्तु निगद्यते ॥१४॥
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सत्त्वायंसार अर्थ-ये द्रव्य नित्य हैं क्योंकि अपने स्वभावसे नष्ट नहीं होते। अपना स्वभाव ही प्रत्यभिज्ञानका कारण कहा जाता है !
भावार्थ—'यह वही है जो पहले था' इस प्रकारके ज्ञानको प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। द्रव्योंकी पर्यायोंके बदल जानेपर भी उनमें प्रत्यभिज्ञान होता रहता है इसलिये द्रव्य नित्य कहलाती है। 'नित्यं तदेवेदमिति प्रतीते:' द्रव्य नित्य है क्योंकि उसमें 'यह वही है, ऐसी प्रतीति होती रहती है, ऐसा समन्तभद्रस्वामीने भी कहा है ।। १४।।
ध्योंके अवस्थितपनेका वर्णन इयत्तां नातिवर्तन्ते यतः पडिति जातुचित् ।
अवस्थितत्त्वमेतेषां कथयन्ति ततो जिनाः ॥१६॥ अर्थ-क्योंकि ये द्रव्य कभी भी 'छह हैं' इस सीमाका उल्लङ्घन नहीं करते इसलिये जिनेन्द्र भगवान् उनके अवस्थितपनेको कहते हैं ।। १५ ।।
ब्रव्योंके रूपी और अरूपोपनेका वर्णन शब्दरूपरसस्पर्शगन्धात्यन्तव्युदासतः ।
पश्च द्रव्याण्यरूयाणि रूपिणः पुद्गलाः पुनः॥१६॥ अयं-शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्धका अत्यन्त अभाव होनेसे पांच द्रव्य अरूपी हैं और उनके सद्भावसे पुद्गल द्रव्य रूपी है ।। १६ ।।
द्रव्योंको संख्याका वर्णन धर्माधर्मान्तरिक्षाणां द्रव्यमेकत्यमिष्यते ।
कालपुद्गलजीवानामनेकद्रव्यता मता ॥१७॥ अर्थ-धर्म, अधर्म और आकाश ये तीन द्रव्य एक-एक हैं तथा काल, पुद्गल और जीवद्रव्योंमें अनेकता मानी गई है। ___ भावार्थ-कालद्रव्य असंख्यात हैं, जीव अनन्त हैं और पुद्गल उनसे अनन्त हैं। धर्म, अधर्म तथा आकाश एक-एफ द्रव्य हैं ।। १७ ॥
द्रव्योंमें सक्रिय और निष्क्रियपनेका विभाग धर्माधर्मो नमः कालश्चत्वारः सन्ति निःक्रियाः । जीवाश्च पुलाश्चैव भवन्त्येतेषु सक्रियाः ॥१८॥
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तृतीयाधिकार
९५ अर्थ-इन द्रव्योंमें धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चार द्रव्य निष्क्रिय हैं तथा जीव और पुद्गल ये दो द्रश्य सक्रिय हैं ।। १८ ॥
बच्यों के प्रवेशोंका वर्णन एकस्य जीवद्रव्यस्य धर्माधर्मास्तिकाययोः । असंख्येयप्रदेशत्वमेतेषां कथितं पृथक् ॥१९॥ संख्येयाश्चाप्यसंख्येया अनन्ता यदि वा पुनः । पुद्गलानां प्रदेशाः स्युरनन्ता चियतस्तु ते ॥२०॥ कालस्य परमाणोस्तु द्वयोरप्येतयोः किल ।
एकप्रदेशमात्रमादागुत्वमिष्पदे २१!! अर्थ-एक जीवद्रव्य, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय इनमें प्रत्येकके असंख्यात-असंख्यात प्रदेश हैं। पूदगल द्रव्य के प्रदेश संख्यात, असंख्यात और अनन्त भी होते हैं। आकाशके प्रदेश अनन्त हैं। काल द्रव्य और परमाणु ये दोनों एकप्रदेशो हैं अतः इन्हें प्रदेशरहित माना जाता है।
भावार्थ---पुद्गलका एक परमाणु आकाशके जितने भागको रोकता है उसे प्रदेश कहते हैं ॥ १९-२१ ॥
द्रव्योंके अवगाहका वर्णन लोकाकाशेऽवगाहः स्याद् द्रव्याणां न पुनर्वहिः । लोकालोकविभागः स्यादत एवाम्बरस्य हि ॥२२॥ लोकाकाशे समस्तेऽपि धर्माधर्मास्तिकाययोः । तिलेषु तैलवत्प्राहुरवगाई महर्षयः ॥२३॥ संहाराच्च विसाच्च प्रदेशानां प्रदीपवत् । जीवस्तु तदसंख्येयभागादीनवगाहते ॥२४॥ लोकाकाशस्य तस्यैकप्रदेशादींस्तथा पुनः । पुद्गला अवगाहन्ते इति सर्वज्ञशासनम् ॥२५॥ अवगाहनसामर्थ्यात्सूक्ष्मस्वपरिणामिनः । तिष्ठन्त्येकप्रदेशेऽपि बहवोऽपि हि पुद्गलाः ॥२६॥ एकापवरकेऽनेकप्रकाशस्थितिदर्शनात् । न च क्षेत्रविभागः स्यान्न चैक्यमवगाहिनाम् ॥२७॥
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तत्त्वार्थसार अपेधिकरणे द्रव्यं महीयो नावतिष्ठते । इदं न क्षमते युक्ति दुःशिक्षितकृतं वचः ॥२८॥ अन्पक्षेत्रे स्थितिर्दृष्टा प्रचयस्य विशेषतः ।
पुद्गलानां बहूनां हि करीपपटलादिषु ॥२९॥ अर्थ-द्रव्योंका अवगाह लोकाकाशमें है, बाहर नहीं है। इसीसे आकाशमें लोक और अलोकका विभाग होता है। जितने आकाशमें सब द्रव्योंका अवगाह है उतना आकाश लोक कहलाता है और शेष अलोक कहलाता है। महर्षि, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायका अवगाह तिलोंमें तैलके समान समस्त लोकाकाशमें कहते हैं। प्रदीपके समान प्रदेशोंमें संकोच और विस्तार होनेके कारण जीव, लोकके असंख्येय भागको आदि लेकर समस्त लोकमें रहता है। पुद्गल द्रव्य, लोकाकाशके एक प्रदेशसे लेकर समस्त लोकाकाशमें स्थित हैं ऐसा सर्वज्ञ भगवानका कथन है। दूसरे प्रदेशोंके लिये स्थान देनेकी सामर्थ्य होनेसे सूक्ष्म परिणमन करनेवाले बहुत पुद्गल लोकाकाशके एक प्रदेशमें रह जाते हैं। एक घरमें अनेक दीपकोंके प्रकाशकी स्थिति देखी जाती है इसलिये अवगाहन करनेवाले द्रव्योंका क्षेत्र जुदा-जुदा नहीं होता और न उन द्रव्योंमें एकरूपता आती है। "छोटे अधिकरणमें बहुत बड़ा द्रव्य नहीं रह सकता" ऐसा अज्ञानी जनोंका कहना युक्तिको प्राप्त नहीं है क्योंकि छोटे क्षेत्रमें भी सप्निवेशको विशेषतासे बहुतसे पुद्गलोंकी स्थिति देखी जाती है | जैसे गोबरके उपला आदिमें घूमके बहुतसे प्रदेशोंकी स्थिति देखी जाती है ॥ २२-२९ ॥
द्रव्योंके उपकारका वर्णन धर्मस्य गतिस्त्र स्थादधर्मस्य स्थितिभवेत् । उपकारोऽवगाहस्तु नभसः परिकीर्तितः ॥३०॥ पुद्गलानां शरीरं वाक्प्राणापानौ तथा मनः। उपकारः सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा ॥३१।। परस्परस्य जीवानामुपकारो निगद्यते ।
उपकारस्तु कालस्य वर्तना परिकीर्तिता ।।३।। अर्थ-इन द्रव्योंमें धर्मद्रव्यका उपकार गति है, अधर्मद्रव्यका उपकार स्थिति है, आकाशद्रव्यका उपकार अवमाह-स्थान देना है, पुद्गल द्रव्यका उपकार शरीर, वचन, श्वासोच्छ्वास, मन, सुख, दुःख, जीवन तथा मरण है,
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तृवीयाधिकार जीवोंका उपकार परस्पर एक दूसरेका उपकार करना है और काल-द्रव्यका उपकार वर्तना-द्रव्योको वर्ताना है ।। ३०-३२ ।।
बद्रश्यका लक्षण क्रियापरिणतानां य: स्वयमेव क्रियावताम् । आदधाति सहायत्वं स धर्मः परिगीयते ॥३३॥ जीवानां पुद्गलानां च कर्तव्ये गत्युपग्रहे ।
जलवन्मत्स्यगमने धर्मः साधारणाश्रयः ॥३४॥ अर्ध-स्वयं क्रियारूप परिणमन करनेवाले क्रियावान्—जीव और पुद्गलोंको जो सहायता देता है बह धर्मद्रव्य कहलाता है। जिस प्रकार मछलीके चलने में जल साधारण निमित्त हैं उसी प्रकार जीव और पुद्गलोंके चलने में धर्मद्रव्य साधारण निमित्त है ॥ ३३-३४ ।।
अधर्मनल्यका लक्षण स्थित्या परिणतानां तु सचिवत्वं दधाति यः । तमधर्म जिनाः प्रादुर्निरावरणदर्शनाः ॥३५।। जीवानां पुद्गलानां च कर्तव्ये स्थित्युपग्रहे ।
साधारणाश्रयोऽधर्मः पृथिवीव गवां स्थितौ ॥३६।। अर्थ-स्थितिरूप परिणमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंके लिये जो सहायता देता है उसे प्रत्यक्षज्ञानी जिनेन्द्र भगवान अधर्मद्रव्य कहते हैं। जिस प्रकार गायोंके ठहरनेम पथिवी साधारण निमित्त है। उसी प्रकार स्वयं ठहरते हुए जीव और पुद्गलोंके लिये अधर्म द्रव्य साधारण निमित्त है। यहाँ साधारण निमित्तका अभिप्राय यह है कि धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य प्रेरक निमित्त नहीं हैं॥३६-३६ ॥
आकाशद्रष्यका लक्षण आकाशन्तेऽत्र द्रव्याणि स्वयमाकाशतेऽथवा । द्रव्याणामवकाशं वा करोत्याकाशमस्त्यतः ।।३७॥ जीवानां पुद्गलानां च कालस्याधर्मधर्मयोः ।
अवगाहनहेतुत्वं तदिदं प्रतिपद्यते ॥३८॥ अर्थ-जिसमें सब द्रव्य अवकाशको प्राप्त हैं, अथवा जो स्वयं अवकाशरूप
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तस्वार्थसार हो, अथवा जो सब द्रव्योंको अवकाश देता है उसे आकाश कहते हैं। यह आकाश जोव, पुद्गल, काल, धर्म और अधर्म द्रव्योंके अवगाहनमें हेतुपनेको प्राप्त होता है अर्थात् उन्हें अवगाहन में सहायता करता है ।। ३७-३८ ॥
धर्म, अधर्म और आकाश स्वयं निक्रिय होकर भी क्रिया हेतु हैं क्रियाहेतुत्वमेतेषां निष्क्रियाणां न हीयते ।
यतः खलु बलाधानमात्रमत्र विवक्षितम् ॥३९॥ अर्थ-ये धर्म, अधर्म और आकाशद्रव्य स्वयं निष्क्रिय हैं फिर भी गति, स्थिति और अवगाहनमें हेतु पड़ते हैं इसमें बाधा नहीं आती, क्योंकि यहाँपर इन द्रव्योंमें बलाधान मात्रकी विवक्षा है अर्थात् गति, स्थिति तथा अवगाहरूप परिणमन पदार्थ स्वयं करते हैं, धर्मादिद्रव्य उनमें सिर्फ सहायता करते हैं। तात्पर्य यह है कि गति, स्थिति आदिके उपादान कारण जीव और पुद्गल स्वयं हैं, धर्मादिद्रव्य उनमें निमित्तकारण पड़ते हैं ॥ ३९ ॥
कालव्यका लक्षण स कालो यन्निमिसाः स्युः परिणामादिवृत्तयः ।
वर्तनांलक्षणं तस्य कथयन्ति विपश्चितः ॥४०॥ अर्थ---काल वह कहलाता है जिसके निमित्तसे परिणाम, क्रिया, परस्त्र तथा अपरत्व होते हैं । विद्वान् लोग वर्तनाको कालका लक्षण कहते हैं ॥ ४० ।।
वर्तनाका लक्षण अन्तींकसमया प्रतिद्रव्यविपर्ययम् ।
अनुभूतिः स्वसत्तायाः स्मृता सा खलु वर्तना ॥४१॥ अर्थ-प्रत्येक द्रव्यके एक-एक समयवर्ती परिणमनमें जो स्वसत्ताको अनुभूति होती है उसे वर्तना कहते हैं ॥४१||
___कालव्यको हेतुकताका वर्णन आत्मना वर्तमानानां द्रव्याणां निजपर्ययैः ।
वर्तनाकरणात्कालो भजते हेतुकर्तृताम् ।।४२॥ अर्थ-सब द्रव्ये, अपनी-अपनी पर्यायोंरूप परिणमन स्वयं करती हैं फिर भी वर्तनाका करण होनेसे काल द्रव्य हेतुकर्तृताको प्राप्त होता है। __भावार्थ-यद्यपि अपने-अपने परिणमनका उपादान कारण सब द्रव्य स्वयं हैं तथापि कालद्रव्य उसमें सहायक होनेसे हेतुकर्ता कहलाता है ॥ ४२ ॥
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द्वितीयाधिकार कालव्यको हेतुकताका समर्थन न चास्य हेतुकर्तृत्त्वं निःक्रियस्य विरुध्यते ।
यतो निमित्तमात्रेऽपि हेतुकत्त्वमिष्यते ॥४३॥ अर्थ यद्यपि कालद्रव्य स्वयं निष्क्रिय है तथापि इसकी हेतुकर्तृता विरुद्ध नहीं है क्योंकि निमित्तमात्रमें भी हेतुकर्तृता मानी जाती है।
भावार्थ-जिस प्रकार 'कारीषोऽग्निरध्यापयति' कण्डेको आग पढ़ाती है, यहाँ अग्नि स्वयं निष्क्रिय होकर भी गढ़ानेमें निमित्त मानी जाती है उसी प्रकार कालद्रव्य स्वयं निष्क्रिय होकर भी पदार्थोके परिणमनमें निमित्त हेतुकर्ता माना जाता है । ४३ ।।
कालाणु किस प्रकार कहाँ स्थित हैं ? एकैकवृत्या प्रत्येकमणवस्तस्य निष्क्रियाः ।
लोकाकाशप्रदेशेषु रत्नसशिरिष स्थिताः ।।४४।। अर्थ-उस काल द्रश्यके क्रियारहित प्रत्येक अणु रत्नोंकी राशिके समान लोकाकाशके प्रदेशोंपर एक-एक कर स्थित हैं।
भावार्थ- कालद्रव्य एकप्रदेशी है इसलिये उसे अणुरूप कहा जाता है । उन अणुरूप कालद्रव्योंकी संख्या असंख्यात है। आगममें लोकाकाशके प्रदेशोंकी संख्या भी असंख्यात बतलाई गई है। इस तरह लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर एक-एक कालद्रव्य अवस्थित है, यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है। इसके लिये रत्नराशिका दृष्टान्त दिया जाता है। जिस प्रकार राशिमें स्थित रत्न एक दूसरे रत्नोंसे स्पृष्ट होनेपर भी स्वतन्त्र हैं उसी प्रकार कालद्रव्य भी परस्पर एक दूसरे कालद्रव्यसे स्पृष्ट होनेपर भी स्वतन्त्र हैं। कालाणुको स्वतन्त्र इसलिये कहा जाता है कि वह जितना भी है उतना अपना कार्य करने में समर्थ रहता है उसके लिये दुसरे कालद्रव्यकी सहायता अपेक्षित नहीं रहती। मनुष्यके हाथमें पांच अगुलियाँ हैं परन्तु भोजनका ग्रास उठानेमें पाँचों अंगुलियो एक-एक कर समर्थ नहीं है उसके लिये पाँचों अंगुलियोंका मिलना आवश्यक रहता है इसलिये हाथ अवयवी है और अंगुलियाँ अवयव कहलाती हैं । अवयवोका एक अवयव कार्य करनेमें असमर्थ रहता है। यह बात कालद्रव्यमें नहीं है क्योंकि वह अपना कार्य करने में अलग रहकर भी समर्थ है। यही कारण है कि कालद्रव्यको बहुप्रदेशी नहीं माना गया है ।। ४४ ॥
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तस्वार्थसार ध्यवहारकालके परिचायक लिङ्ग व्यावहारिककालस्य परिणामस्तथा क्रिया ।
परत्वं चापरत्वं च लिङ्गान्याहुमहर्षयः ॥४५॥ __ अर्थ-परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्वको मर्पियोंने व्यावहारिक कालका लिङ्ग-परिचायक चिह्न कहा है।
भावार्थ-कालद्रव्य अरूपी द्रव्य है अतः उसका बोध पुद्गलद्रव्यके माध्यमसे होता है। पुद्गल द्रव्यमें परिणाम, क्रिया तथा परत्व और अपरत्वका जो व्यवहार होता है वह मूर्तिक होनेके कारण सबको दृष्टिमें आता है इसलिये आचार्योने इन्हींके द्वारा व्यवहारकालका बोध कराया है । यह परिणाम तथा क्रिया आदिरूप परिणमन वास्तवमें पुद्गलद्रव्यका है परन्तु उसमें कालद्रव्य निमित्त होता है इसलिये परिणाम आदिको कालद्रव्यका लिङ्ग बतलाया गया है ।।४५॥
परिणामका लक्षण स्वजातेरविरोधेन विकारो यो हि वस्तुनः ।
परिणामः स निर्दिष्टोऽपरिस्पन्दात्मको जिनैः ॥४६॥ अर्थ-अपनी जातिका विरोध न करते हुए वस्तुका जो विकार है-परिणमन है उसे जिनेन्द्र भगवान्ने परिणाम कहा है। यह परिणाम हलन-चलनरूप नहीं होता।
भावार्थ-जो पदार्थ जिस रूप है उसका उसी रूप जो परिणमम होता है वह परिणाम कहलाता है | इस परिणाममें हलन-बलनरूप क्रियाकी विवक्षा नहीं है। उसका वर्णन पृथक् किया जाता है। वास्तवमें क्रियारूप परिणमन जीव और पुद्गल इन दो द्रव्योंमें ही होता है परन्तु परिणामरूप परिणमन सभी द्रव्योंमें होता है ।। ४६ ।।
क्रियाका लक्षण प्रयोगविलसाम्यां या निमित्ताभ्यां प्रजायते ।
द्रव्यस्य सा परिक्षेया परिस्पन्दात्मिका क्रिया ॥४७॥ अर्थ-प्रेरणा और स्वभाव इन दो निमित्तोंसे द्रव्यमें जो हलन-चलनरूप परिणति होती है उसे क्रिया जानना चाहिये ।
भावार्थ-क्रियाके दो भेद हैं-१ प्रायोगिकी और २ वैस्रासिकी । मनुष्यादिके प्रयत्नसे रेल, मोटर आदिमें जो क्रिया होती है उसे प्रायोगिकी क्रिया कहते हैं
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तृतीयाधिकार
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और मेघ आदिमें जो अपने आप क्रिया होती है उसे वैस्रसिकी क्रिया कहते हैं। यह क्रिया यद्यपि जीव और पुद्गल इन दो द्रव्योंमें होती है अतः उन्हींका परिणमन है परन्तु उस परिणमनमें जो क्रम है वह कालद्रव्यकृत है इसलिये क्रियाको कालद्रव्यका कार्य बतलाया है । यहाँ प्रश्न हो सकता है कि क्रिया तो धर्मद्रव्यका कार्य है न कि कालद्रव्यका । उसका उत्तर यह है कि एक स्थानसे अन्य स्थानकी प्राप्तिरूप जो क्रिया है वह धर्मद्रव्यका कार्य है परन्तु उस क्रियामें जो क्रमबद्धता है वह कालका कार्य है ॥ ४७ ॥३
परत्य और अपरश्वका लक्षण
परत्वं
विप्रकृष्टत्वमितरत्सन्निकृष्टता । ते च कालकृते ग्राह्ये कालप्रकरणादिह || ४८ ॥
अर्थ- दूरीको परत्व और निकटताको भाव कहते है। कहाँ कद्रव्यका प्रकरण होनेसे दूरी और निकटता कालकृत ही ग्रहण करना चाहिये ।
भावार्थ- जम्बूद्वीपसे घातकीखण्ड द्वीप निकट है और नन्दीश्वर द्वीप दूर है इसलिये धातकीखण्ड द्वीप अपर है तथा नन्दीश्वर द्वीप पर है। इस प्रकार क्षेत्रकृत परत्व अपरत्व भी होते हैं । परन्तु उनकी यहाँ विवक्षा नहीं है । यहाँ कालद्रव्यका प्रकरण होनेसे कालकृत परत्व और अपरत्वको लिया गया है । जैसे यज्ञदत्त बीस वर्षका है, और जिनदत्त पन्द्रह वर्षका है । यहाँ जिनदत्तको अपेक्षा यज्ञदत्तमें परत्व है और जिनदत्तमें अपरत्व है । यज्ञदत्त बड़ा कहा जाता है और जिनदत्त छोटा । यह व्यवहार कालद्रव्यकृत है ॥ ४८ ॥
व्यवहारकालका विभाग मनुष्यक्षेत्र में होता है
ज्योतिर्गति परिच्छिन्नो मनुष्यक्षेत्रवर्त्यौ । यतो न हि बहिस्तस्माज्ज्योतिषां गतिरिष्यते ॥ ४९ ॥
अर्थ – ज्योतिष्क देवोंको गतिसे विभक्त होनेवाला यह व्यवहारकाल मनुष्यक्षेत्र में ही होता है क्योंकि उससे बाहर ज्योतिष्क देवोंमें गति नहीं मानी जाती है ।
भावार्थ - घड़ी, घंटा, दिन, पक्ष, माह, वर्ष आदिका व्यवहार सूर्य की गति से होता है । सूर्यको गति मनुष्यक्षेत्र में हो होती है । इसलिए घड़ी, घंटा आदिका व्यवहार भी मनुष्यक्षेत्र में ही माना जाता है । मनुष्यक्षेत्रके आगे असंख्यात द्वीप, समुद्रों तथा स्वर्ग नरक आदिमें कालद्रव्यकृत जो परिणमन है उसमें घड़ी, घंटा आदिका व्यवहार नहीं होता है । देवों तथा नारकियों आदिकी आयुका
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तस्वार्थसार
जो वर्णन है वह मनुष्यक्षेत्रमें होनेवाले व्यवहारकालपर अवलम्बित माना
जाता है ।। ४९ ।।
कालके भेव
भूतश्च वर्तमानश्च भविष्यमिति च त्रिधा । परस्परव्यपेक्षत्वाद् व्यपदेशो द्यनेकशः ॥ ५०॥
अर्थ — वह काल भूत, वर्तमान और भविष्यतके भेदसे तीन प्रकारका होता है क्योंकि परस्परकी अपेक्षासे होनेवाला व्यवहार अनेक प्रकारका होता है ||५०॥ दृष्टांतद्वारा कालके तीन भेदका समर्थन
यथानुसरतः पङ्क्ति बहूनामिह शाखिनाम् । क्रमेण कस्यचित् पुंस एकैकानोकहं प्रति ॥ ५१ ॥ संप्राप्तः प्राप्नुवन् प्राप्स्यन् व्यपदेश प्रजायते । द्रव्याणामणि काला ॥५ पर्यायं चानुभवतां वर्तनाया यथाक्रमम् । भूतादिव्यवहारस्य गुरुभिः सिद्धिरिष्यते || ५३ ॥ भूतादिव्यपदेशोऽसौ मुख्यो गौणो नेहसि । व्यवहारिककालोऽपि मुख्यतामादधात्यसौ ||५४ ||
अर्थ - जैसे बहुतसे वृक्षोंकी पङ्क्ति लगी हुई है । कोई मनुष्य एक-एक वृक्षके प्रति क्रमसे गमन करता हुआ उस पङ्क्तिको पार कर रहा है। वह मनुष्य किसी वृक्षके पास पहुँचता है, किसीको छोड़कर आया है और किसीको आगे प्राप्त करनेवाला है । इस तरह क्रमपूर्वक गति होनेसे उन वृक्षोंमें भूत, वर्तमान और भविष्यत्का व्यवहार जिस प्रकार होता है उसी प्रकार कालाणुओंका अनुसरण करने तथा पर्यायोंका अनुभव करनेवाली द्रव्योंमें क्रमपूर्वक वर्तना होनेसे भूत आदि व्यवहारकी सिद्धि गुरुजनों द्वारा मानी जाती है। चूँकि यह भूत आदिका व्यपदेश निश्चयकालद्रव्यमें मुख्य और गौण होता है इसलिए यह व्यवहार काल भी मुख्यता और गोणताको धारण करता है ।
भावार्थ -- जिस प्रकार पङ्क्तिबद्ध वृक्षोंको क्रम-क्रमसे पार करनेवाला मनुष्य जिस वृक्ष के पास पहुँचता है उसमें वर्तमानका, जिसे छोड़कर आया है उसमें भूतका और जिसे आगामी कालमें प्राप्त करेगा उसमें भविष्यतुका व्यवहार होता है । उसी प्रकार क्रम-क्रमसे परिणमन करनेवाले द्रव्य जिस कालाणुका
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द्वितीयाधिकार
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वर्तमान में अवलम्बन, ले रहे हैं. उसमें वर्तमानका जिनका अवलम्बन ले चुके हैं उनमें भूतका और जिनका अवलम्बन आगे लेवेंगे उनमें भविष्यत्का व्यवहार होता है । कालाणु अपने-अपने स्थानोंपर स्थित हैं उनका निमित्त पाकर संसारके पदार्थों में परिणमन चल रहा है। जो कालाणु किसी द्रव्यके परिणमनमें निमित्त हो चुकनेसे भूतका व्यवहार प्राप्त करता है वही का किसी अन्य द्रव्यके परिणमन में आगे निमित्त होनेके कारण भविष्यत्का व्यवहार प्राप्त करता है तथा किसी अन्य द्रव्यके वर्तमान परिणमनमें निमित्त होने के कारण वही वर्तमानका व्यवहार करता है । इस प्रकार कालाणुमें यह भूत, भविष्यत् और वर्तमानका व्यवहार मुख्य तथा गौणरूपसे चलता रहता है । जब निश्चयकालद्रव्य में यह मुख्य गौणसे भूतादिका व्यपदेश चलता है तब उसके आश्रयसे होनेवाले व्यवहार कालमें भी मुख्य गौणका व्यपदेश अनायास सिद्ध हो जाता है ।। ५१-५४ ॥
पुदुगलका लक्षण
भेदादिभ्यो निमित्तेभ्यः पूरणाद्गलनादपि । पुद्गलानां स्वभावज्ञः कथ्यन्ते पुद्गला इति || ५५ ||
अर्थ-भेद आदिके निमित्तसे जिनमें पूरण-नये परमाणुओं का संयोग और गलन — संयुक्त परमाणुओंका वियोग होता है उन्हें पुद्गलोंके स्वभावके ज्ञाता पुरुष पुद्गल कहते हैं ।। ५५ ॥
पुद्गलोंके भेद
अणुस्कन्धविमेदेन द्विविधाः खलु पुद्गलाः ।
स्कन्धो देशः प्रदेशश्च स्कन्धस्तु त्रिविधो भवेत् ॥ ५६ ।।
अर्थ - अणु और स्कन्धके भेदसे पुद्गल दो प्रकार के हैं। और स्कन्ध, देश तथा प्रदेश के भेद स्कन्ध तीन प्रकारका है ॥ ५६ ॥
स्कन्ध, देश और प्रदेशके लक्षण
"अनन्तपरमाणूनां संघातः स्कन्ध इष्यते ।
देशस्तस्यार्द्धर्द्धार्द्ध प्रदेशः परिकीर्तितः || ५७ ||
अर्थ —– अनन्त परमाणुओं का समूह स्कन्ध कहलाता है । स्कन्धका आधा देश और देशका आधा प्रदेश कहा गया है ।। ५७ ॥
१ बंधं सल्यसमत्थं तस्स व अद्धं भति देसो त्ति ।
अद्धद्धं च पदेसो अविभागी चैव परमाणू ।। ६०३ || गोम्मटसार जीवकाण्ड
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तत्वार्थसार
स्कन्ध और अणुकी उत्पत्तिके कारण भेदात्तथा च संघातात्तथा तदुभयादपि । उत्पद्यन्ते खलु स्कन्धा भेदादेवाणवः पुनः || ५८ ||
अर्थ - मेदसे, संघातसे, और भेद संघात - दोनोसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं । परन्तु अणु भेदसे ही उत्पन्न होते हैं ।
भावार्थ - कितने हो स्कन्धोंकी उत्पत्ति मेदसे होती है। जैसे १०० परमाणु वाले स्कन्धसे १० परमाणु निकल जानेपर ९० परमाणु वाले स्कत्वकी उत्पत्ति हुई। कितने ही स्कन्धों को उत्पत्ति संघातसे होती है । जैसे १०० परमाणुवाले स्कन्धमें १० परमाणु मिल जानेसे ११० परमाणुवाले स्कन्धकी उत्पत्ति हुई । और कितने हो स्कन्धोंको उत्पत्ति भेद तथा संघात दोनोंसे होती है । जैसे १०० परमाणुवाले स्कन्धमेंसे १० परमाणु निकल जाने और १५ परमाणु मिल जानेसे १०५ परमाणुवाले स्कन्धकी उत्पत्ति होती है । परमाणुकी उत्पत्ति संघातसे न होकर भेदसे ही होती है। जैसे दो परमाणुवाले स्कन्धमें भेद होनेसे दो परमाणुओं की उत्पत्ति हुई ॥ ५८ ॥
परमाणुका लक्षण
आत्मादिरात्ममभ्यश्च तथात्मान्तश्च नेन्द्रियैः । गृह्यते योऽविभागीच परमाणुः स उच्यते ॥ ५९ ॥
अर्थ - - वही जिसका आदि है, वही जिसका मध्य है, वही जिसका अन्त है, इन्द्रियोंसे जिसका ग्रहण नहीं होता तथा जिसके अन्य विभाग नहीं हो सकते वह परमाणु कहा जाता है ।
भावार्थ - एकप्रदेशी होनेसे जिसमें आदि, मध्य और अन्तका विभाग नहीं हो सकता, जिसके द्वितीयादिक विभाग नहीं हो सकते और जो इतना सूक्ष्म है कि इन्द्रियोंके द्वारा नहीं जाना जा सकता वह परमाणु कहलाता है ।। ५९ ॥
परमाणुकी अन्य विशेषता
सूक्ष्मो नित्यस्तथान्तश्च कार्यलिङ्गस्य कारणम् । एकगन्धरसश्चैकवर्णो द्विस्पर्शकश्च
सः ॥ ६० ॥
१ अत्तादि अत्तमज्यं अतंतं शेव इंदिये गे ।
जं दध्वं अविभागी तं परमाणुं विभाणाहि । ( पञ्चास्तिकाय )
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तृतीयाधिकार
१०५ वर्णगन्धरसस्पर्शसंयुक्ताः परमाणवः ।
स्कन्धा अपि भवन्त्येते वर्णादिभिरनुज्झिताः ॥६१॥ ___ अर्थ-वह परमाणु सूक्ष्म होता है, नित्य होता है, अन्तिम होता है, कार्यलिङ्गका कारण होता है, एक गन्ध, एक रस, एक वर्ण और दो स्पोंसे युक्त होता है। परमाणु, वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श युक्त स्कन्ध भी बन जाते हैं अथवा भेद अवस्थाको पाकर स्कन्ध भी परमाणुरूप हो जाते हैं। ____ भावार्थ-परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म होता है । इतना सूक्ष्म कि मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके द्वारा उसका साक्षात् अवलोकन नहीं हो सकता। परमाणुका कभी नाश नहीं होता इसलिये वह नित्य कहलाता है । स्वन्त्रके भेद होते होते अन्त में परमाणुरूप ही अवस्था होती है इसलिये उसे अन्त्य कहा है। दो परमाणु मिलकर यणुक स्कन्धके कारण होते हैं, इसलिए इसे कार्यलिङ्गका कारण कहा जाता है । एकप्रदेशी होने से परमाणुमें एक गन्ध, एक रस और एक वर्ण होता है। आठ स्पर्शोमेसे कोमल, कड़ा, हलका और भारी ये चार स्पर्श परमाणुमें सर्वथा नहीं होते, किन्तु शीत और उष्णमेसे कोई एक तथा स्निग्ध और रूक्ष में से कोई एक इस प्रकार दो स्पर्श होते हैं। परमाणु, वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्शसे सहित हैं इसलिए उनसे जब स्कन्धको उत्पत्ति होती है तब वे भी वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्शसे सहित होते हैं और चूँकि स्कन्ध वर्णादिसे सहित हैं इसलिए जब स्कन्ध वियुक्त होकर परमाणुरूप होते हैं तब वे भी वर्णादिसे सहित होते हैं ।। ६०-६१ ॥
पुदगलको पर्यायोंका वर्णन . शब्द-संस्थान-सूक्ष्मत्व-स्थौन्य-बन्ध-समन्विता ।
तमश्छायातपोयोतमेदवन्तश्च सन्ति ते ॥६२।। - अर्थ-वे पुद्गल शब्द, संस्थान, सूक्ष्मत्व, स्थौल्य, बन्ध, तम, छाया, आतप, उद्योत और भेदसे युक्त होते हैं ।। ६२ ।।
शब्दके भेद साक्षरोऽनक्षरश्चैव शब्दो भाषात्मको द्विधा ।
प्रायोगिको वैससिको द्विधाऽभाषात्मकोऽपि च ॥६॥ अर्थ-शब्द भाषात्मक और अभाषात्मकके भेदसे दो प्रकारका है। उनमें भाषात्मक शब्द साक्षर और अनक्षरके भेदसे दो प्रकारका है । संस्कृत, प्राकृतादिभाषारूप जो शब्द हैं वे साक्षर शब्द कहलाते हैं तथा द्वीन्द्रियादिक जीवोंके
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तत्वार्थसार
जो शब्द हैं वे अनक्षर शब्द हैं। अभाषात्मक शब्द भी प्रायोगिक और वैखसिक के मेदसे दो प्रकारका होता है । मनुष्यके प्रयत्नसे उत्पन्न मेरी, वीणा, तथा घंटा आदिका जो शब्द है वह वैस्रसिक है ॥ ६३ ॥
वांसुरी
संस्थानके व
संस्थानं कलशादीनामित्यलक्षणमिष्यते ।
ज्ञेयमम्भोधरादीनामनित्थंलक्षणं
तथा ॥ ६४ ॥
अर्थ -- संस्थानका अर्थ आकृति है । इसके दो भेद हैं- १ इत्थंलक्षण और दो अनित्थं लक्षण | कलश आदि पदार्थोंका जो आकार कहा जा सकता है वह इत्थंलक्षण संस्थान है और मेघ आदिका जो आकार कहा नहीं जा सकता वह अनित्यंलक्षण संस्थान है ।। ६४ ।।
सूक्ष्मत्यके भेद अन्त्यमापेक्षिकश्चेति सूक्ष्मत्वं द्विविधं भवेत् । परमाणुषु तत्रान्त्यमन्यद्विन्यामलकादिषु || ६५ ॥
अर्थ- सूक्ष्मत्व दो प्रकारका होता है - १ अन्त्य और २ आपेक्षिक । इनमेंसे अन्त्य सूक्ष्मत्व परमाणुओंमें होता है और दूसरा आपेक्षिक सूक्ष्मत्व बेल तथा आंवला आदिमें पाया जाता है ।। ६५ ।।
स्थौल्यके भेद
अन्त्यापेक्षिकभेदेन ज्ञेयं स्थान्यमपि द्विधा ।
महास्कन्धेऽन्त्यमन्यच्च वदरामलकादिषु ॥ ६६॥
अर्थ — अन्त्य और आपेक्षिकके भेदसे स्थौल्य भी दो प्रकारका जानना चाहिये ! अन्त्य स्थौल्य लोकरूप महास्कन्धमें होता है और आपेक्षिक स्थौल्य र तथा आंवला आदिमें होता है ।
बन्धके भेव
तत्र
द्विधा वैसिको बन्धस्तथा प्रायोगिकोऽपि च । वैस्रसिको वह्निविद्युदम्भोधरादिषु । बन्धः प्रायोगिको यो जतुकाष्ठादिलक्षणः || ६७॥
कर्मनो कर्मबन्धो यः सोऽपि प्रायोगिको भवेत् ।
( षट्पवम् )
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जानकार
Las
अर्थ —सिक और प्रायोगिकके भेदसे बन्ध दो प्रकारका है। उनमेंसे मेघ आदिमें जो विजलीरूप अग्निका बन्ध है वह बेसिक बन्ध है और लाख तथा लकड़ी आदिका जो बन्ध है वह प्रायोगिक बन्ध जानने के योग्य है । इसके सिवाय कर्म और नोकर्मका जो बन्ध है वह भी प्रायोगिक बन्ध कहलाता है ॥ ६७ ॥
तमका लक्षण
तमो दृक्प्रतिबन्धः स्यात् प्रकाशस्य विरोधि च ||६८||
अथं – जो नेत्रोंको रोकनेवाला तथा प्रकाशका विरोधी है वह तमअन्धकार कहलाता है ॥ ६८ ॥
छायाका लक्षण
प्रकाशावरणं यत्स्यान्निमित्तं वपुरादिकम् । छायेति सा परिज्ञेया द्विविधा सा च जायते ||६९ || तत्रैका स्खलु वर्णादिविकारपरिणामिनी । स्यात्प्रतिविम्वमात्रान्या जिनानामिति शासनम् ॥ ७० ॥
अर्थ - शरीर आदि निमित्तोंके कारण जो प्रकाशका रुकना है उसे छाया जानना चाहिये । वह छाया दो प्रकारकी होती है । उनमें एक छाया वर्णादिविकाररूप परिणमने वाली है अर्थात् पदार्थ जिसरूप तथा जिस आकारवाला है उसका उसी रूप परिणमन होना जैसे दर्पण या पानी आदिमें प्रतिबिम्ब पड़ता है । और दूसरी छाया मात्र प्रतिबिम्बरूप होती है । जैसे धूप या चांदनी आदिमें मनुष्यको छाया पड़ती है। ऐसा जिनेन्द्र भगवान्का कथन है ||६९-७०।। आतप और उद्योतका लक्षण
आतपोऽपि प्रकाशः स्यादुष्णश्चादित्यकारणः । उद्योतश्चन्द्ररत्नादिप्रकाशः
परिकीर्तितः ॥ ७१ ॥
अर्थ- सूर्यके कारण जो उष्ण प्रकाश होता है वह आतप है और रत्न आदिका जो प्रकाश है वह उद्योत कहा गया है ।। ७१ ।।
तथा चन्द्रमा
भेदके भेद
उत्करश्चूर्णिका चूर्णः खण्डोऽणुचटनं तथा । प्रतरश्चेति षड्मेदा मेदस्योक्ता महर्षिभिः ||७२ ||
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तत्वार्थसार
अर्थ - उत्कर, चूर्णिका, चूर्णं, खण्ड, अणुचटन और प्रतरके भेदसे महर्षियोंने भेदके छह भेद कहे हैं |
भावार्थं – करोत आदिके द्वारा लकड़ी आदिके चीरनेपर जो बुरादा निकलता है वह उत्कर कहलाता है । उड़द तथा मूंग आदिको जो चुनी है उसे चूर्णिका कहते हैं । जो तथा गेहू आदिका जो माटा है उसे चूणं कहते हैं । घट आदिके टुकड़ोंको खण्ड कहते हैं । तपाये हुए लोहेपर घन पटकनेपर जो अग्नि कण निकलते हैं उन्हें अणुचटन कहते हैं । और मेघपटल आदिका विखरना प्रतर कहलाता है ॥ ७२ ॥
किन परमाणुओं का परस्परमें बन्त्र होता है ? विसदृक्षाः सदृक्षा वा ये जघन्यगुणा न हि । प्रयान्ति स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धं ते परमाणवः ॥७३॥ संयुक्ता ये खलु स्वस्माद् द्वयाधिकगुणैर्गुणैः । बन्धः स्यात्परमाणूनां तैरेव परमाणुभिः ||७४ ॥ वन्धेऽधिकगुणो यः स्यात्सोऽन्यस्य परिणामकः । रेणोरधिकमाधुर्यो दृष्टः क्लिन्नगुडो यथा ॥ ७५ ॥
अर्थ — जो परमाणु तुल्यजातीय हों, चाहे अतुल्यजातीय, किन्तु जघन्य गुणवाले नहीं हैं वे स्निग्ध और रुक्षता के कारण बन्धको प्राप्त होते हैं। जो परमाणु अपनेसे दो अधिक गुणोंसे संयुक्त है उन्हीं परमाणुओंके साथ परमाणुओंका बन्ध
+
होता है । बन्ध होनेपर जो अधिक गुणवाला परमाणु है वह होनगुणवाले परमाणु को अपने रूप परिणमा लेता है । जैसे अधिक मिठाससे युक्त गीला गुड़ धूलिको अपने रूप परिणमाता हुआ देखा गया है ।
भावार्थ --- परमाणुओं का जो परस्पर बन्ध होता है उसमें उनका स्निग्धता और रूक्षता गुण कारण पड़ता है। परमाणुमें जो स्निग्ध और रूक्षगुण है उसके अनन्त तक अविभाग प्रतिक्छेद या शक्तिके अंश होते हैं । उन शक्तिके अंशोंमें हानि-वृद्धिका क्रम चलता रहता है। हानि होते-होते जब एक ही शक्तिका अंश रह जाता है तब वह परमाणु जघन्यगुणवाला परमाणु कहलाने लगता है । ऐसे परमाणुका दूसरे परमाणुके साथ बन्ध नहीं होता। इसी प्रकार जिन दो परमाणुओं में अविभाग प्रतिच्छेद समान संख्याको लिये हुए हैं उनका भी बन्ध नहीं होता | वृद्धिका क्रम चलने पर जब जघन्यगुणवाले परमाणु के अविभाग प्रतिच्छेदों में पुनः वृद्धि हो जाती है तब वह फिर बन्ध कोटिमें आ जाता है । इसी प्रकार जिन दो परमाणुओं में अविभागप्रतिच्छेदोंकी समानता के कारण बन्ध नहीं हो रहा था उनमें किसी एक परमाणुके अविभागप्रतिच्छेदोंमें वृद्धि होकर
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तत्त्वार्थसार अथवा किसी एक परमाणुके अविभागप्रतिच्छेदोंमें ह्रास होकर यदि दो गुणोंको होनाधिकता हो जाती है तो नो बन्ध काटिन भाजाते हैं । परमाणु ओंका यह बन्ध अपनेसे दो अधिक गुणवालोंके साथ बतलाया है। जैसे दो गुणवालेका चार गुणवालेके साथ और तीन गुणवालेका पांच गुणवालेके साथ बन्ध होता है। यह बन्ध स्निग्ध-स्निग्धका तथा रूक्ष-रूक्षका और स्निग्ध-रूक्षका भी होता है । बन्धके लिये सदश जातीय ही हो ऐसा नियम नहीं है। किन्तु गुणोंकी अपेक्षा दो का अन्तर होना आवश्यक है। दोका अन्तर होनेपर भी एकगुणवाले और तीन गुणवाले परमाणुओंका वन्ध नहीं होगा, क्योंकि उनमें एकगुणवाला परमाणु बन्धकी योग्यतासे रहित होगया है। बन्ध हो चुकनेपर अधिक गुणवाला परमाणु हीन गुणवाले परमाणुको अपनेरूप परिणमा लेता है। जैसे कि गीला गुड़ अपने साथ मिली हुई धूलिको अपनेरूप परिणमा लेता है ।। ७३-७५ 11
पुद्गलको बन्धपर्यायें अनन्त हैं। द्वथणुकाद्याः किलानन्ताः पुद्गलानामनेकधा ।
सन्त्यचित्तमहास्कन्धपर्यन्ता बन्धपर्ययाः ॥७६॥ अथ-इस प्रकार द्वचणुकको आदि लेकर जड़ महास्कन्ध पर्यन्त पुद्गलोंको अनेक प्रकारकी अनन्त बन्ध-पर्याय हैं ॥ ७६ ।।
अजीव तत्त्वके श्रद्धानाविका फल इतीहाजीवतत्वं यः श्रद्धत्ते वेन्युपेक्षते ।
शेषतः समं षड्भिः स हि निर्वाणभाग्भवेत् ॥७७॥ अर्थ-इस प्रकार इस लोकमें जो छह अन्य तत्त्वोंके साथ अजीव तत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जानता है और उसकी उपेक्षा करता है अर्थात् उसकी इष्टानिष्ट परिणतिमें राग-द्वेष नहीं करता है वह निर्वाणको प्राप्त होता है ।। ७७॥
इस प्रकार श्रीअमृतचन्द्राचार्यद्वारा विरचित तत्त्वार्थसारमें अजीवतत्त्वका
वर्णन करनेवाला तोसरा अधिकार पूर्ण हुआ ।
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चतुर्थ अधिकार ( आस्रवतत्त्ववर्णनम् )
मङ्गलाचरण और प्रतिज्ञा अनन्तकेवलज्योतिःप्रकाशितजगत्त्रयान् ।
प्रणिपत्य जिनान् सर्वानासवः परिचक्ष्यते ॥१॥ अर्थ-जिन्होंने अनन्त केवलज्ञानरूपी ज्योतिके द्वारा तीनों जगत्को प्रकाशित किया है उन समस्त अरहन्तोंको नमस्कारकर आस्रवका कथन किया जाता है ॥१॥
आस्लवका लक्षण कायवाङ्मनसां कर्म स्मृतो योगः स आस्रवः । शुभः पुण्यस्य विज्ञेयो विपरीतश्च पाप्मनः ।।२।। सरसः सलिलावाहिद्वारमत्र जनैर्यथा । तदास्त्रवणहेतुत्वादानवो व्ययदिश्यते ॥३॥ आत्मनोऽपि तथैवैषा जिनोगप्रणालिका ।
कर्मास्रवस्य हेतुत्वादास्रवो व्यपदिश्यते ।।४।। अर्थ-काय, वचन और मनकी जो क्रिया है वह योग कहलाती है। जो योग है वहीं आस्रव है। शुभ और अशुभके भेदसे योगके दो भेद हैं | शुभयोग पुण्य कर्मका आस्रव है और अशुभ योग पाप कर्मका आस्रव है। जिस प्रकार तालाबमें पानी लानेवाला द्वार पानी आनेका कारण होनेसे मनुष्योंके द्वारा आस्रव कहा जाता है उसी प्रकार आत्माकी यह योगरूप प्रणाली भी कर्मास्रवका हेतु होने से जिनेन्द्रभगवानके द्वारा आस्रव कही जाती है ।। २-४ ॥
आस्रवके सांपरायिक और ईर्यापथ भेद जन्तवः सकषाया ये कर्म ते साम्परायिकम् । अजेयन्त्युपशान्ताया ईर्यापथमथापरे ॥५॥
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चतुर्षाधिकार
साम्परायिकमेतत्स्यादार्द्रचर्मस्थ रेणुवत् । सकषायस्य यत्कर्मयोगानीतं तु मूच्छति ॥ ६ ॥ ॥ ईर्यापथ तु तच्छुष्ककुडप्रक्षिप्तलोष्टवद । अकषायस्य यत्कर्म योगानीतं न मूर्च्छति ॥७॥
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अर्थ - जो जीव कषाय सहित हैं वे साम्परायिक कर्मका आस्रव करते हैं और जो उपशान्त कषाय आदि गुणस्थानवर्ती जीव हैं वे ईर्यापथ कर्मका आसव करते हैं । यह साम्परायिक आस्रव गीले चमड़ेपर स्थित धूलिके समान है । कषाय सहित जीवके योगोंके कारण जो कर्म आते हैं वे बृद्धिको प्राप्त होते हैं अर्थात् स्थिति और अनुभाग बन्ध पड़नेके कारण वे कर्म विस्तारको प्राप्त होते हैं । और जो ईयपिथ आस्रव है यह सूखी दीवालपर फेंके हुए ढेलेके समान है । कषाय रहित जीबोंके योगोंके कारण जो कर्म आते हैं वे वृद्धिको प्राप्त नहीं होते अर्थात् स्थिति और अनुभागबन्धके अभाव में वे विस्तारको प्राप्त नहीं होते । समयमात्रमें निर्जीर्ण हो जाते हैं ।
भावार्थ--- साम्परायिक और ईर्ष्यापथके भेदसे आसवके दो भेद हैं । कषाय सहित जीवके आयको साम्परायिक आस्रव कहते हैं और कषाय रहित जीवके आस्रवको ईयपथ आस्रव कहते हैं । जिस प्रकार गीले चमड़ेपर धूलि जमकर बैठती है उसी प्रकार काय सहित जीवके कर्म जमकर बैठते हैं अर्थात् उनका स्थिति और अनुभाग बन्ध अधिक होता है और सूखी दीवालपर फेंका हुआ हेला जिस प्रकार दीवालका स्पर्श कर तत्काल उससे अलग हो जाता है उसी प्रकार कषाय रहित जीवके कर्म आत्मा के साथ सम्बन्ध करते ही एक समयके भीतर अलग हो जाते हैं, उनमें स्थिति और अनुभागबन्ध नहीं पड़ता । प्रारम्भसे लेकर दशम गुणस्थान तकके जीव कषाय सहित है इसलिये इनके साम्परायिक आस्रव होता है और ग्यारहवेंसे लेकर तेरहवें गुणस्थान तक्के जीब कषाय रहित हैं इसलिये उनके ईथपथ आस्रव होता है । यद्यपि चौदहवें गुणस्थानके जीव भी कषाय रहित हैं तो भी योगोंके न होनेसे उनके किसी भी कर्मका आस्त्रच नहीं होता ॥ ५–७ ॥
साम्परायिक आवका कारण
चतुः कषायपञ्चाक्षैस्तथा पञ्चभिरवतैः । क्रियाभिः पञ्चविंशत्या साम्परायिकमास्त्रवेत् ||८||
अर्थ - चार कषाय, पांच इन्द्रिय, पाँच अनत और पच्चीस क्रियाओंके द्वारा यह जीव साम्परायिक आस्रव करता है ।
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११२
तस्वार्थसार भावार्थ-क्रोधादि चार कषायों, स्पर्शनादि पांच इन्द्रियों, हिंसा, झूठ आदि पाँच अव्रतों तथा सम्यक्त्व क्रिया आदि पच्चीस क्रियाओंके द्वारा साम्परायिक आस्रव होता है । यहाँ पच्चीस क्रियाओंका स्वरूप लिखते हैं
(१) सम्यक्त्व क्रिया--चैत्य, मुई और शास्त्रको पूजा आदिरूप सम्यक्त्वको बढ़ाने वाली क्रिया सम्यक्त्व क्रिया है।
(२) मिथ्यात्व क्रिया-अन्य देवताओंको नमस्कारादिरूप मिथ्यात्वको बढ़ानेवाली क्रिया मिथ्यात्व क्रिया है। . (३) प्रयोग क्रिया-शरीर आदिके द्वारा गमनागमनादि रूप प्रवृत्ति करना प्रयोग किया है।
(४) समावान क्रिया--संयमी जीवका फिरसे असंयमकी ओर सम्मुख होना समादान क्रिया है।
(५) ईयर्यापथ क्रिया-पिथकी कारणभूत क्रिया ईपिथ क्रिया है।
(६) प्रादोषिकी क्रिया-क्रोधके आवेशसे होनेवाली क्रिया प्रादोषिकी क्रिया है।
(१७) कायिको क्रिया-दुष्टभाव युक्त होकर उद्यम करना कायिकी क्रिया है।
(८) आधिकरणिकी 'क्रिया–हिंसाके उपकरण आदिको उठाना आधिकरणिकी क्रिया है।
(९) पारितापिकी क्रिया-ऐसे शब्दादि कहना जिससे दूसरेको संताप हो पारितापिको क्रिया है।
(१०) प्राणातिपातिको क्रिया-प्राणघातरूप प्रवृत्ति करना प्राणातिपातिकी क्रिया है।
(११) वर्शन क्रिया-रागसे आर्द्र चित्त हो स्त्री आदिके रमणीयरूपको देखनेका अभिप्राय होना दर्शन क्रिया है।
{१२) स्पर्शन शिया---प्रमादके वशीभूत होकर स्त्री आदिके स्पर्श करनेका भाव होना स्पर्शन क्रिया है ।
(१३) प्रात्ययिकी क्रिया-नये नये अधिकरणोंसे स्त्री आदिके हृदयमें अपने ऊपर प्रत्यय-विश्वास उत्पन्न करना प्रात्ययिकी क्रिया है।
(१४) समन्तानुपात ब्रिन्या--स्त्री-पुरुषोंके आने-जाने आदिके स्थानमें मलोत्सर्ग करना समन्तानुपात क्रिया है।
(१५) अनाभोग क्रिया-बिना देखी, विना शोधो हुई भूमिपर शरीरादिको रखना-उठना बैठना आदि अनाभोग क्रिया है।
(१६। स्वहस्त क्रिया-दूसरेफे द्वारा करने योग्य कार्यको लोभके वशीभूत होकर स्वयं करना स्वहस्त क्रिया है !
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चतुर्याधिकार (१७) निसर्ग क्रिया-पापादिमें प्रवृत्ति करनेके लिये सम्मति देना निसर्ग क्रिया है।
(१८) विदारण क्रिया-दूसरेके पापकार्यको प्रकाशित करना विदारण क्रिया है।
(१९) आज्ञान्यापादिको किया अपनी असमर्थताके कारण आगमकी आज्ञाका अन्यथा निरूपण करना आज्ञाव्यापादिकी क्रिया है।
(२०) अनाकांक्षा क्रिया-धूर्तता और आलस्यके कारण आगम प्रतिपादित क्रियाओंके प्रति अनादर करना अनाकांक्षा क्रिया है।
(२१) प्रारम्भ क्रिया-छेदना, भेदना आदि क्रियाओं में स्वयं तत्पर होना और दूसरेके करमेपर हर्षित होना प्रारम्भ किया है।
(२२) पारिग्राहिकी क्रिया-परिग्नहकी रक्षा आदिके लिये जो क्रिया होती है वह पारिदिको क्रिया है।
(२३) माया क्रिया-ज्ञान दर्शन आदिके विषयमें छलरूप प्रवृत्ति करना माया क्रिया है।
(२४) मिथ्यावर्शन क्रिया-मिथ्यादर्शनके साधनोंसे युक्त पुरुषको प्रशंसा कर उसे मिथ्यात्वमें दृढ़ करना मिथ्यादर्शन क्रिया है ।
(२५) अप्रत्याख्यान क्रिया-संयमघाती कर्मका उदय होनेसे त्यागरूप परिणाम नहीं होना अप्रत्याख्यान क्रिया है।
आस्त्रयमें होनेवाली विशेषताके कारण तीव्रमन्दपरिज्ञातभावेभ्योऽज्ञातभावतः ।
वीर्याधिकरणाभ्यां च तद्विशेष विदुर्जिनाः ॥९॥ अर्थ तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, वीर्य और अधिकरणके द्वारा आस्रवकी विशेषताको जिनेन्द्रभगवान् जानते हैं ।। ९ ॥
अधिकरणके भेव तत्राधिकरणं द्वधा जीवाजीबविभेदतः । त्रिःसंरम्भसमारम्भारम्भैयोगैस्तथा त्रिभिः ॥१०॥ कृतादिभिस्त्रिभिश्चैव चतुर्भिश्च क्रुधादिभिः । जीवाधिकरणस्येति मेदादष्टोत्तरं शतम् ॥११॥ संयोगो द्वौ निसर्गास्त्रीनिक्षेपाणां चतुष्टयम् । निर्वर्तनाद्वयं चाहुभेदानित्यपरस्य तु ॥१२॥
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तत्त्वार्थसार
अर्थ-उन तीवादिक भावोंमें अधिकरणके दो भेद है-(१) जीवाधिकरण और (२) अजीवाधिकरण । जीवाधिकरण आस्रब संरम्भ, समारम्भ, आरम्भ ये तीन, मनोयोग, बचनयोग, काययोग ये तीन, कृत्त, कारित अनुमोदना ये तीन तथा क्रोधादि चार कषायके मेदसे एक सौ आठ प्रकारका है। और अजीवाधिकरण आस्रवके दो प्रयोग, नीन निसर्ग, जार निभेप और दो निर्वर्तना इस तरह ग्यारह भेद हैं। ___ भावार्थ-जीवाधित प्रवृत्तिकी विशेषतासे जो आस्रव होता है उसे जीवाधिकरण आस्रव कहते हैं। इसके एक सौ आठ भेद हैं, जो इस प्रकार सिद्ध होते हैं-संरम्भ-किसी कार्यके करनेका संकल्प करना, समारम्भ-कार्यके अनुकूल सामग्री जुटाना और आरम्भ-कार्य करने लगना ये तीन कार्य: मनोयोग, वचनयोग तथा काययोग इन तीनोंसे होते हैं, इसलिये तीनमें तीनका गुणा करनेसे नौ भेद होते हैं। ये नौ कार्य; कृत-स्वयं करना, कारित-दुसरेसे कराना, अनुमोदन-किये हुएका समर्थन करना इन तीन कार्योंसे होते हैं, इसलिये नौमें तीनका गुणा करनेपर सत्ताईस भेद होते हैं। ये सत्ताईस भेद क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायोंसे होते हैं इसलिये सत्ताईसमें चारका गुणा करनेपर एक सौ आठ भेद होते हैं । अजीवाश्रित प्रवृत्तिसे आस्रवमें जो विशेषता होती है उसे अजीवाधिकरण आस्रव कहते हैं | इसके ग्यारह भेद हैं जो इस प्रकार हैं-संयोगके दो भेद हैं-[१] भक्तपानसंयोग-गर्म भोजनमें ढण्डा पानी आदि मिलाना, [२] उपकरण संयोग-धूपसे तपे हुए कमण्डलु आदिका शीतल पिछीसे परिमार्जन करना । निसर्गक तीन भेद हैं—[१] मनो निसर्ग-मनको विषयोंमें स्वच्छन्द प्रवर्ताना, [२] वचो निसर्ग–अप्रिय कटक
आदि वचन बोलना [३] काय निसर्ग--ज्ञरीरकी प्रमादपूर्ण प्रवृत्ति करना । निक्षेपके चार भेद हैं-[१] अप्रत्यवेक्षित निक्षेपाधिकारण-विना देखो हुई भूमिपर किसी वस्तुको रखना, [२] दुःप्रमष्टनिक्षेपाधिकरण-दुष्टतापूर्ण विधिसे प्रभाजित भूमिमें किसी वस्तुको रखना, [३] सहसानिक्षेपाधिकरण--शीघ्रता पूर्वक किसी वस्तुको रखना और ]४] अनाभोगनिक्षेपाधिकरण-किसी वस्तुको उसके रखने योग्य स्थानपर न रखकर प्रमादवश इधर-उधर रखना । निवर्तनाके दो भेद हैं---[१] मूलगुणनिर्वर्तमा-शरीर, वचन, मन और श्वासोच्छवासकी प्रमादपूर्ण प्रवृत्ति करना [२] उत्तरगुणनिर्वर्तना-लकड़ी तथा मिट्टी आदिके खिलौने तथा चित्र आदिकी रचना करना ॥ १०-१२ ॥
___झानावरण कर्मके आस्रवके हेतु मात्सर्यमन्तरायश्च प्रदोषो निलवस्तथा ।
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चतुर्थाधिकार
११५ आसादनोपघातौ च ज्ञानस्योत्सूत्रचोदितौ ॥१३॥ अनादरार्थश्रवणमालस्यं शास्त्रविक्रयः । बहुश्रुताभिमानेन तथा मिथ्योपदेशनम् ॥१४॥ अकालाधीतिराचार्योपाध्यायप्रत्यनीकता। श्रद्धाभावोऽप्यनम्यासस्तथा तीर्थोपरोधनम् ॥१५|| बहुश्रुतावमानश्च ज्ञानाधीतेश्च शाठयता ।
इत्येते ज्ञानरोधस्य भवन्त्यास्त्रबहेतवः ॥१६॥ अर्थ-मात्सर्य, अन्तराय, प्रदोष, निह्नव, ज्ञानका आसादन, उपघात, आगमविरुद्ध बोलना, अनादरपूर्वक अर्थका मुनना, आलस्य, शास्त्र वेचना, अपनेको बहुज्ञानी मानकर मिथ्या उपदेश देना, अकालमें अध्ययन करना, आचार्य और उपाध्यायके प्रतिकूल चलना, धर्मकी आम्नायमें रुकावट डालना, बहुजानी औका तिरस्कार करना और सामाध्ययनो कुशलतासे धूर्तताका का व्यवहार करना ये सब ज्ञानावरण कर्मके आस्रवके हेतु हैं।
भावार्थ:--मात्सर्य आदिके लक्षण इस प्रकार हैं
मात्सर्य—किसी कारणसे जिसका अभ्यास भी किया है तथा जो देनेके योग्य भी है ऐसे विज्ञानका ईर्ष्यावश दूसरेको न देना मात्सर्य है। __ अन्तराय-ज्ञानका विच्छेद करना अन्तराय है।
प्रदोष-मोक्षके साधनस्वरूप तत्त्वज्ञानका उपदेश होनेपर मुखसे विरोध न करनेपर भी अन्तरङ्गमैं उस ओर दुष्टताका भाव होना प्रदोष कहलाता है।
निलव-किसी कारणसे 'ऐसा नहीं है', 'मैं नहीं जानता हूं' ऐसा कहकर ज्ञानको छिपाना निलव है।
आसायन-दूसरेके द्वारा प्रकाशमें आनेवाले ज्ञानका शरीर और वचनसे निषेध करना आसादन है।
उपघात-निर्दोष शानमें दूषण लगाना उपघात है। शेष शब्दोंके अर्थ स्पष्ट हैं ।। १३-१६ ॥
दर्शनावरण कर्मके आस्त्रवके हेतु दर्शनस्थान्तरायश्च प्रदोषो नियोऽपि च । मात्सर्यमुपधातश्च तस्यैवासादनं तथा ॥१७॥ नयनोत्पाटनं दीर्घस्वापिता शयनं दिवा ।
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११६
तत्त्वार्थसार
नास्तिक्यवासना सम्यग्दृष्टिसंदूषणम् तथा ॥ १८ ॥ कुतीर्थानां प्रशंसा च जुगुप्सा च तपस्विनाम् | दर्शना
तहेतवः ॥१९॥
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अर्थ — दर्शनके विषय में अन्तराय, प्रदोष, निह्नव मात्सर्व, उपघात और आसादन करना, नेत्रोंका उखाड़ना, बहुत काल तक सोना, दिनमें सोना, नास्तिकताका भाव रखना, सम्यग्दृष्टि जीव में दूषण लगाना, कुगुरुओं की प्रशंसा करना और समीचीन तपस्वी- गुरुओं से ग्लानि करना दर्शनावरण कर्मके आस्रव हैं ।। १७-१९ ॥
असातावेदनीय कर्मके आस्रवके हेतु
दुःखं शोको वधस्तापः क्रन्दनं परात्माद्वितयस्थानि तथा च
परिदेवनम् । परपैशुनम् ॥ २० ॥ दमनं तथा ।
छेदनं भेदनं चैव ताडनं तर्जनं भर्त्सनं चैव सद्यो विशंसनं तथा ॥ २१॥ पापकर्मोपजीवित्वं वक्रशीलत्वमेव च ।
शस्त्रप्रदानं विश्रम्भघातनं विषमिश्रणम् || २२ ॥ शृङ्खलावागुरापाशरज्जुजालादिसर्जनम् ।
तथा ॥ २३ ॥
धर्मप्रव्यूह करणं शीलवत प्रच्यावनं तथा । भवन्त्या स्रवहेतवः ||२४||
धर्मविध्वंसनं
तपस्विगर्हणं इत्य सदनीयस्य
अर्थ - पराये अपने तथा दोनोंमें स्थित दुःख, शोक, वध, ताप, क्रन्दन और परिदेवन तथा दूसरेकी चुगली, छेदना, भेदना, ताड़ना, दमन करना, डाँटना, झिड़कना, शीघ्रता से ( अपराधका विचार किये बिना हो । घात करना, पापकासे जोविका करना, कुटिल स्वभाव रखना, शस्त्र देना, विश्वासघात करना, विष मिलाना, सांकल, जाल, पाश, रस्सी तथा जाल आदिका बनाना. धर्मका विध्वंस करना, धर्मके कार्यों में विघ्न करना, तबस्विजनोंको निन्दा करना और शीलव्रतसे च्युत करना ये सब असातावेदनीयके आस्रवके हेतु हैं ।
१. सद्यो विश्वसनं तथा इत्यपि पाठः ।
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चतुर्थाधिकार
भाषार्थ -- दुःख आदि लक्षण इस प्रकार हैं---
दुःख पीडारूप परिणामको दुःख कहते हैं ।
शोक -- उपकारी जनोंका सम्बन्ध विच्छेद हो जानेपर जो विकलता होती हैं उसे शोक कहते हैं ।
वध - - आयु, इन्द्रिय तथा बल आदि प्राणोंका वियोग करना वध कहलाता है ।
ताप - निन्दा आदिके निमित्तसे जो पश्चात्ताप होता है उसे ताप कहते हैं। क्रन्वन -- अश्रुपात करते हुए रोना कन्दन कहलाता है |
परिवेदन - इस प्रकार विलाप करना जिससे दूसरोंको दया उत्पन्न हो जाये परिदेवन कहलाता है ।
यद्यपि ये सब दुःखके हो भेद हैं इसलिये एक दुःखके ग्रहण से सबका ग्रहण हो जाता है तथापि दुःखको जातियाँ बतलानेके लिए पृथक् पृथक् ग्रहण किया गया है ।। २०-२४ ।।
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सातावेदनीयके आस्त्रयके हेतु
दया दानं तपः शीलं सत्यं शौचं दमः क्षमा | वैयावृत्यं विनीतिश्च जिनपूजार्जचं तथा ॥ २५ ॥
सरागसंयमश्चैव
संयमासंयमस्तथा ।
भूतत्रत्यनुकम्पा
च सद्वेद्यास्रवहेतवः ॥ २६॥
अर्थ - दया, दान, तप, शील, सत्य, शौच, इन्द्रियदमन, क्षमा, वैयावृत्य, विनय, जिनपूजा, सरलता, सरागसंयम, संयमासंयम भूतानुकम्पा और व्रत्यनुकम्पा ये सातावेदनीयके आस्रवके हेतु हैं ।। २५-२६ ।।
दर्शनमोहनीयके आवके हेतु
केवलिश्रुतसंघानां धर्मस्य त्रिदिवौकसाम् । अवर्णवादग्रहणं तथा तीर्थकृतामपि ||२७|| मार्गसंदूषणं चैव तथैवोन्मार्गदेशनम् । इति दर्शन मोहस्य भवन्त्याय हेतवः ||२८||
अर्थ - केवली, श्रुत, संघ, धर्म, देव तथा तीर्थंकरोंका भी अवर्णवाद करना, मार्ग में दोष लगाना तथा उन्मार्ग – मिथ्यामार्गका उपदेश देना ये दर्शनमोहके आसवके हेतु हैं 1
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तत्त्वार्थसार भावार्थ-अविद्यमान दोषोंका कहना अवर्णवाद है। केवली कवलाहार करते हैं इत्यादि कहना केवलीका अवर्णवाद है। शास्त्रोंमें मांस खाना लिखा है इत्यादि कहना श्रुतका अवर्णवाद है । ये नग्न हैं, म्लेच्छ हैं, आदि शब्दोंद्वारा ऋषि, अति, मुनि और अनगार इन चार प्रकारके मुनिसमूहकी निन्दा करना संघका अवर्णवाद है । जैनधर्ममें कुछ नहीं हैं, इसके धारण करनेवाले नास्तिक हैं तथा मरकर असुर होते हैं इत्यादि कहना धर्मका अवणंवाद है । देव मांस खाते हैं, सुरा पीते हैं, बलिदानसे प्रसन्न होते हैं आदि काहना देवोंका अवर्णवाद है। तीर्थकरोंके अकल्पित दोषोंका कहना तीर्थंकरोंका अवर्णवाद है ।। २७-२८॥
चारित्रमोहनीय कर्मके आस्रवके हेतु स्यात्तीत्रपरिणामो यः कषायाणां वियाकतः ।
चारित्र मोहनीयस्य स एवावकारणम् ॥२९॥ अर्थ-कषायोंके उदयसे जो तीब परिणाम होता है वही चारित्रमोहनीय कर्मक आस्रवका कारण है।
भावार्थ-क्रोधादि कारणोंके तीन सदसमें से हिला आदि पाने प्रवृत्ति होती हैं उससे चारित्रमोहनीय कर्मका आस्रव होता है ।। २९ ।।
नरकायुके आनधके कारण उत्कृष्टमानता शैलराजीसदशरोषता ! मिथ्यात्वं तीव्रलोभत्वं नित्यं निरनुकम्पता ॥३०॥ अजस्त्रं जीवघातित्वं सततानृतवादिता । परस्वहरणं नित्यं नित्यं मैथुनसेवनम् ॥३१॥ कामभोगाभिलाषा नित्यं चातिप्रवृद्धता । जिनस्यासादनं साधुसमयस्य च भेदनम् ॥३२॥ मार्जारताम्रचूडादिपापीयःप्राणिपोषणम् । नैःशीन्यं च महारम्भयरिग्रहतया सह ।।३३।। कृष्णलेश्यापरिणतं रौद्रध्यानं चतुर्विधम् ।
आयुषो नारकस्येति भवन्त्यास्रबहेतवः ॥३४॥ अर्थ-तीन मान करना, पाषाणरेखाके समान तीव्र क्रोध करना, मिथ्यात्वधारण करना, तीव्र लोभ करना, निरन्तर निर्दयताके भाव रखना, सदा
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चतुर्थाधिकार
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जीवघात करना, निरन्तर झूठ बोलना, सदा परवन हरण करना, निरन्तर मैथुन सेवन करना, हमेशा कामभोग सम्बन्धी अभिलाषाओं को अत्यधिक बढ़ाना, जिनेन्द्रभगवान् में दोष लगाना, जिनागमका खण्डन करना, बिलाव, मुर्गा आदि पापी जीवों का पोषण करना, शील रहित होना, बहुत आरंभ और बहुत परिग्रह रखना, कृष्णलेश्यारूप परिणति करना तथा चार प्रकारका हिंसानन्द, मृषानन्द, स्तेयानन्द, परिग्रहानन्द ) रौद्रध्यान करना ये सब नरकायुके आस्रवके हेतु हैं ।। ३०-३४ ।।
तियंआयुके आलवके कारण
नैः शील्यं निर्व्रतत्वं च मिध्यात्वं परवचनम् । मिथ्यात्व समवेतानामधर्माणां
देशनम् ||३५||
तथा ।
कृत्रिमागुरुकर्पूरकुङ्कुमोत्पादनं तथा भानतुलादीनां कूटादीनां प्रवर्तनम् ||३६|| सुवर्ण मौक्तिकादीनां प्रतिरूपकनिर्मितिः । वर्णगन्धरसादीनामन्यथापादनं तथा ||३७|| तक्रक्षीरघृतादीनामन्यद्रव्यविमिश्रणम् । वाचान्यदुत्काकरणमन्यस्य क्रियया तथा ||३८|| कापोतनीललेश्यात्वमार्त्तध्यानं च दारुणम् । तैर्यग्योनायुषो ज्ञेया माया चात्रवहेतवः || ३९ ।।
अर्थ - शीलरहित होना, व्रतरहित होना, मिथ्यात्व धारण करना, दूसरोंको ठगना, मिध्यात्वसे सहित अधर्मो का उपदेश देना, कृत्रिम अगुरु, कपूर और केशरका बनाना, झूठे नापतौलके बाँट तराजू तथा कूट आदिका चलाना, नकली सुवर्ण तथा मोती आदिका बनाना, वर्ण, गन्ध रस आदिको बदलकर अन्यरूप देना, छाँच, दूध तथा घी आदिमें अन्य पदार्थोका मिलाना, वाणी तथा क्रिया द्वारा दूसरोंकी विपयाभिलाषाको उत्पन्न करना, कापोत और लेश्यासे युक्त होना, तीव्र आर्तध्यान करना और मायाचार करना ये सब तिर्यञ्च आयुके आस्रवके हेतु जानना चाहिये || ३५-३९ ।।
मनुष्य आयुके आवके कारण
ऋजुत्वमीपदारम्भपरिग्रहतया स्वभाव मार्दवं
चैव
सद | गुरुपूजनशीलता ॥४०॥
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तत्वार्थसार
अल्पसंक्लेशता दानं विरतिः प्राणिनः । आयुषो मानुषस्येति भवन्त्या स्रवहेतवः ॥ ४१॥
अर्थ - अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहके साथ परिणामोंमें सरलता रखना, स्वभावसे कोमल होना, गुरुपूजनका स्वभाव होना, अल्प संक्लेशका होना, दान देना और प्राणिघात से दूर रहना ये सब मनुष्यायुके आसवके कारण हैं ।। ४०-४१ ।।
१२०
देवायुके आत्र व हेतु
मन्दकषायता | तथायतनसेवनम् ॥४२॥
अकामनिर्जरा बालतपो सुधमंश्रवणं दानं सरागसंयमश्चैव सम्यक्त्वं देशसंयमः । इति देवायुषो ह्येते भवन्त्यास्रवहेतवः || ४३ ॥
अर्थ — अकामनिर्जरा, बालतप, मन्दकषायता, समीचीन धर्मका सुनना, दान देना, देव गुरुधर्म तथा इनके सेवक इन छह आयतनोंकी सेवा करना, सरागसंयम, सम्यक्त्व और देशसंयम ये सब देवायुके आसव के कारण हैं ।
भावार्थ --- यहाँ सरागसंयम, सम्यक्त्व और देशसंयमको जो देवायुका आसव बतलाया है उसका अभिप्राय उनके कालमें पाये जानेवाले रामसे है, क्योंकि संयम या सम्यक्त्व बन्धके कारण नहीं हैं। उनके कालमें पाया जानेवाला रागांश ही बन्धका कारण है ।। ४२-४३ ।
अशुभ नामकर्मके आलवके हेतु मनोवाक्कायवक्रत्वं
विसंवादनशीलता ।
मिथ्यात्वं कूटसाक्षित्वं पिशुनास्थिरचित्तता ||४४|| विषक्रियेष्टका पाकदावाग्नीनां प्रतिमायतनोद्यानप्रतिश्रयविनाशनम्
प्रवर्तनम् ।
॥४५॥
चैत्यस्य च तथा गन्धमान्यधूपादिमोषणम् । अतितोत्रकषायत्वं
परुपासावादित्वं सौभाग्यकारणं तथा । अशुभस्येति निर्दिष्टा नाम्न आस्रवहेतवः ॥४७॥
अर्थ- मन, वचन, कायकी कुटिलता, विसंवाद करनेका स्वभाव, मिथ्यात्व,
पापकर्मोपजीवनम् ॥४६॥
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चतुर्थाधिकार
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झूठी गवाही देना, चुगली करना, चित्तका अस्थिर रखना, विषके प्रयोग, ईंट पकाना तथा दावाग्नि-वन में आग लगानेकी प्रवृत्ति चलाना, मन्दिर सम्बन्धी उद्यानके भवनका विनाश करना, प्रतिमाको चढ़ाने योग्य गन्ध, माला तथा धूप आदिकी चोरी करना, अत्यन्त तीव्र कषाय करना, पाप कार्योंसे जीविका करना, कठोर और असह्य वचन बोलना तथा सौभाग्यवृद्धिके लिये वशीकरण आदि उपायोंको मिलाना ये सब अशुभ नामकर्मके आस्रवके हेतु हैं ।। ४४-४७ ॥ शुभनामकर्मके अस्त्र के हेतु
तथा ।
संसारभीरुता नित्यमविसंवादनं योगानां चार्जवं नाम्नः शुभावहेतवः || ४८ ||
अर्थ — निरन्तर संसारसे भयभीत रहना, सहधर्मीजनोंके साथ विसंवादविरोध नहीं करना और योगोंकी सरलता रखना ये शुभनामकर्मके आलवके हेतु हैं ॥ ४८ ॥
तीर्थंकर नामकर्मके आस्त्र बके हेतु विशुद्धि दर्शनस्योच्चैस्तपस्त्यागौ च शक्तितः । मार्गप्रभावना चैव सम्पत्तिर्विनयस्य च ॥४९॥ शीलवतानती चारो नित्यं संवेगशीलता । ज्ञानोपयुक्तताभीक्ष्णं समाधिश्च तपस्विनः || ५० ॥ वैयावृच्यमनिर्हाणिः षड्विधावश्यकस्य च । भक्तिः प्रवचनाचार्यजिन प्रवचनेषु च ॥ ५१ ॥ वात्सल्यं च प्रवचने घोडशैते यथोदिताः । arretatioरत्वस्य भवन्त्यासहेतवः ||५२॥
अर्थ — सम्यग्दर्शनकी उत्कृष्ट विशुद्धता, शक्तिके अनुसार किये हुए तप और त्याग, मार्गप्रभावना, विनयसंपन्नता, शील और व्रतोंमें अतिचार नहीं लगाना, निरन्तर संसार सम्बन्धी दुःखोंसे भयभीत रहना, निरन्तर ज्ञानमय उपयोग रखना, साधुसमाधि — मुनियोंके तपश्चरण में बाधा आनेपर उसे दूर करना, वैयावृत्त्य, छह आवश्यकोंके करनेमें न्यूनता नहीं करना, प्रवचनभक्ति, आचार्यभक्ति, अर्हद्भक्ति, बहुश्रुतभक्ति, और प्रवचनवात्सल्य - सहधर्मीजनों के साथ स्नेहभाव रखना ये सालह, तीर्थंकर नामकर्मके आस्रवके कारण हैं ।
भावार्थ -- ऊपर तीर्थंकर नामकर्मके आस्रव के जो सोलह हेतु बतलाये गये १६
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तस्वार्थसार हैं वे जिनागममें सोलहकारण भावनाओं के नाम से प्रसिद्ध हैं ! इन सोलहकारण भावनाओंमें सम्यग्दर्शनकी विशुद्धता सबसे प्रमुख कारण है क्योंकि इसके विना शेष पन्द्रह भावनाएं होनेपर भी तीर्थकरप्रकृतिका आस्रव नहीं होता है और इसके रहते हुए शेष भावनाओंमें कमी होनेपर भी तीर्थंकरप्रवृतिका आस्रव हो जाता है। सम्यग्दर्शनको विशुद्धताका अर्थ निःशङ्कित आदि आठ अङ्गरूप सम्यग्दर्शनका धारण करना है। तत्त्वदष्टिसे सम्यग्दर्शको बिशुद्धता बन्धका कारण नहीं है क्योंकि सम्यग्दर्शन तो मोक्षका कारण हैं बह बन्धका कारण कैसे हो सकता है। यहाँ सम्यग्दर्शनके काल में जो लोककल्याणका शुभराग होता है वही बन्धका कारण है। इस शुभरागके अभाव में क्षायिक सम्यग्दष्टि जीवके तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध नहीं होता जब कि उसको विशुद्धता सब सम्यग्दर्शनोंमें सर्वश्रेष्ठ होती है और उक्त शुभरागके सद्भावमें क्षायोपमिक सम्यग्दृष्टि जीवको भी. लीर्थकरप्रवृतिका बन्ध हो जाता है जब कि उसके सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय रहनेसे चल-मल तथा अगाढ़ दोष लगा करते हैं | तीर्थकरप्रकृतिका आस्रव प्रथमोपशम, द्वितीयोपशम. क्षायोपमिक और क्षायिक इन चारों सम्यग्यदर्शनोंके कालमें होता है। इसके लिये श्रुतकवली या प्रत्यक्षकेवलीके सन्निधानरूप बाह्य निमित्तकी भी आवश्यकता रहती है। कर्मभूमिज मनुष्यके चतुर्थगुणस्थानसे लेकर आठवें गुणस्थानके छटवें भाग तक ही इसके आस्रवका प्रारम्भ होता है । तीर्थकरप्रकृतिका आनन करनेवाला जीव या तो उसो भवसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है या फिर नरक या देवगतिमें जाता है वहाँसे आकर मोक्ष प्राप्त करता है। तीर्थंकरप्रकृतिका आस्रव करनेवाला जीव भोगभूमिका मनुष्य या तियंञ्च भी नहीं होता ।। ४९-५२॥
नीचगोत्रकर्मके आस्रवके हेतु असद्गुणानामाख्यानं सद्गुणाच्छादनं तथा ।
स्वप्रशंसान्यनिन्दा च नोचैगोत्रस्य हेतवः ॥५३॥ अर्थ-अपने अविद्यमान गुणोंका कथन करना, दुसरेके विद्यमान गुणोंको छिपाना, अपनी प्रशंसा करना तथा दूसरेको निन्दा करना ये नीच गोत्र के आनद हैं ।। ५३ ।।
उच्चगोत्र कर्मके आलधके हेतु नीचैर्वृत्तिरनुत्सेका पूर्वस्य च विपर्ययः ।
उच्चैगोत्रस्य सर्वः प्रोक्ता आस्रवहेतवः ॥५४॥ अर्थ-नम्रवृत्ति, अहंकारका अभाव और पूर्व श्लोकमें कहे हुए कारणोसे
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चतुर्थाधिकार
१२३ विपरीत कारण, ये सर्वज्ञ भगवानके द्वारा उच्चगोत्रकर्मके आस्रव कहे गये है ।। ५४ ।।
अन्तरायकर्मक आस्रवके हेतु तपस्विगुरुचैत्यानां पूजालोयप्रवर्तनम् । अनाथदीनकृपणभिक्षादिप्रतिषेधनम् ॥५५॥ वधबन्धनिरोधैश्च नासिकाच्छेदकर्तनम् । प्रमादाद्देवतादत्तनैवेद्यग्रहणं तथा ॥५६॥ निरबद्योपकरणपरित्यागो षधोऽङ्गिनाम् । दानभोगोपभोगादिप्रत्यूहकरणं तथा ॥५७|| ज्ञानस्य प्रतिषेधश्च धर्मविश्नकृतिस्तथा ।
इत्येवमन्तराग्य भवन्यास बहवः ।। अर्थ-तपस्वी, गुरु और प्रतिमाओंकी पूजा न करनेकी प्रवृत्ति चलाना, अनाथ, दोन तथा कृपण मनुष्योंको भिक्षा आदि देनेका निषेध करना, वधबन्धन तथा अन्य प्रकारको रुकावटोंके साथ पशुओंकी नासिका आदिका छेद करना, देवताओंको चढ़ाये हुए नैवेद्यका प्रमादसे ग्रहण करना, निर्दोष उपकरणोंका परित्याग करना { जिन पीछी या कमण्डल आदि उपकरणों में कोई खराबी नहीं आई है उन्हें छोड़कर नये ग्रहण करना ), जीवोंका घात करना, दान-भोग-उपभोग आदिमें विध्न करना, ज्ञानका प्रतिषेध करना-स्वाध्याय या पठन-पाठनका निषेध करना, तथा धर्मकार्यो में विश्न करना ये सब अन्तरायकर्मके आस्रवके हेतु हैं ।। ५५-५८॥
व्रत और अनतके निरूपणको प्रतिज्ञा व्रतात् किलासवेत्पुण्यं पापं तु पुनरवतात् ।
संक्षिप्यास्त्रवमित्येवं चिन्त्यतेऽतो बतायतम् ।।५।। अर्थ-व्रतसे पुण्यकर्मका और अवत्तसे पापकर्मका आस्रव होता है इसलिये पूर्वोक्त आस्नवको संक्षिप्तकर अब आगे व्रत और अव्रतका विचार किया जाता है ।। ५९ ।।
वतका लक्षण हिंसाया अनृताच्चैव स्तेयादब्रह्मतस्तथा । परिग्रहाच्च विरतिः कथयन्ति व्रतं जिनाः ॥६॥
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तत्वार्थसार
अर्थ - - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहसे निवृत्ति होनेको जिनेन्द्रभगवान् व्रत कहते हैं || ६० ॥
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महाव्रत और अणुव्रत के लक्षण
कार्त्स्न्येन विरतिः पुंसां हिंसादिभ्यो महाव्रतम् । विरतिर्विजानीयादणुव्रतम्
एकदेशेन
॥६१॥ अर्थ- हिंसादि पाँच पापोंसे पुरुषोंकी सर्वदेश निवृत्ति होने को महाव्रत और एकदेश निवृति होनेको अणुव्रत जानना चाहिये ॥ ६१ ॥
व्रतोंकी पांच-पांच भावना कहने की प्रतिज्ञा व्रतानां स्थैर्यसिद्धयर्थं पञ्च पञ्च प्रतिव्रतम् । भावनाः सम्प्रतीयन्ते मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ६२ ॥
अर्थ — आत्मस्वरूपकी भावना करनेवाले मुनियोंके लिये उक्त व्रतोंकी स्थिरता के अर्थ प्रत्येक व्रतकी पाँच-पाँच भावनाएँ कही जाती हैं ॥ ६२ ॥
अहिंसाव्रतकी पाँच भावनाएँ
च ।
चोगुप्तिर्मनोगुप्तिरीय समिति रेव ग्रहनिक्षेपसमितिः पानामभवलोकितम् || ६३ ॥ इत्येताः परिकीर्त्यन्ते प्रथमे पञ्च भावनाः ।
अर्थ- वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकित पान - भोजन ये पाँच प्रथम व्रत अहिंसावतकी भावनाएं कही जाती हैं ।
भावार्थ – मनुष्यसे, वाचनिक, मानसिक, चलने फिरने सम्बन्धी, किसो बस्तुके रखने उठाने सम्बन्धी और भोजन सम्बन्धी यह पांच प्रकारको हिसा होती है । अन्य सभी हिंसाओं का समावेश इन्हीं पाँच हिंसाओं में हो जाता है । आचार्यने वाचनिक - वचन सम्बन्धी हिंसासे बचनेके लिये वचनगुप्तिकर, मानसिक - मनसम्बन्धी हिंसासे बचने के लिये मनोगुप्तिका चलने फिरने सम्बन्धी हिंसा से बचने के लिये ईयसमितिका रखने उठाने सम्बन्धी हिंसासे बचनेके लिये आदाननिक्षेपण समितिका और भोजन सम्बन्धी हिंसासे बचनेके लिये आलोकिस पान - भोजन --- देखते हुए भोजनपान के ग्रहण करनेका उपदेश दिया है । इनका पालन करनेसे मनुष्य हिंसापापसे सुरक्षित रह सकता है ।। ६३ ।।
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चतुर्थाधिकार सत्यवतको पाँच भावनाएँ क्रोधलोमपरित्यागौ हास्यभीरुत्ववर्जने ॥६॥
अनुवीचिवचश्चेति द्वितीये पञ्च भावनाः । अर्थ-क्रोधत्याग, लोभत्याग, हास्यत्याग, भयत्याग और अनुवीचि भाषणआचार्य परम्पराके अनुसार भाषण करना ये पाँच सत्यव्रतको भावनाएँ हैं ।
भावार्थ-मनुष्य कषाय और अज्ञान इन दो कारणोंसे असत्य बोलता है । कषायसम्बन्धी असत्य क्रोध, लोभ, हास्य और भयके भेदसे चार प्रकारका होता है अतः इन चारों कषायोंके त्यागका उपदेश देकर आचार्यने मनुष्यको कषायजन्य असत्यसे बचनेका उपाय बतलाया है। आगमका ज्ञान न होने अज्ञानजन्य असत्य बोला जाता है उससे बचनेके लिये आचार्यने अनुवीचि भाषण-आज सम्परा 'अपना सन माप करनेकी बात कही है। जो आगमके अनुकूल भाषण करना चाहेगा उसे आगमका अभ्यास अवश्य करना होगा और आगमका अभ्यास करनेसे अज्ञानजन्य असत्यसे सुरक्षाअनायास हो जावेगी 11 ६४ ।।
अौर्यवतकी पांच भावनाएं शून्यागारेषु वसनं विमोचितगृहेषु च ।।६।। उपरोधाविधानं च भैत्यशुद्धिर्यथोदिता ।
ससधर्माविसंवादस्तृतीये पञ्च भावनाः ॥६६॥ अर्थ--शून्यागारवास-वृक्षोंको कोटर तथा पर्वतोंकी गुफा आदि प्राकृतिक निर्जनस्थानोंमें रहना, बिमोचितगृहावास-जिन गृहोपर उनके स्वामियोंने अपना आधिपत्य छोड़ दिया है ऐसे गृहोंमें निवास करना, उपरोधाविधानअपने स्थानपर किसी अन्य मुनिके ठहर जानेगर बाधा नहीं करना, यथोदित भैक्ष्यशुद्धि-चरणानुयोगमें निरूपित विधिके अनुसार भिक्षाको शुद्धि रखना और ससधर्माविसंवाद-किसी उपकरणको लेकर सहधर्मा बन्धुओंके साथ विवाद नहीं करना ये पाँच अचौर्मवतकी भावनाएं हैं। __भावार्थ-मनुष्य तीन प्रकारकी चोरी करता है-१ स्थान सम्बन्धी २ भोजन सम्बन्धी और ३ उपकरण सम्बन्धी। इनमें स्थान सम्बन्धी चोरोसे बचनेके लिये तीन भावनाएं बतलाई हैं. शून्यागारावास, विमोचिताबास और परोपरोधाकरण। इन भावनाओंका. पालन करनेसे स्थान सम्बन्धी चोरीसे रक्षा हो सकती है। भोजन सम्बन्धी चोरीसे बचने के लिये आगमानुकूल भैक्ष्य
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तस्वार्थसार शुद्धिका उपदेश दिया गया है। भैक्ष्यशुद्धिके अनुसार भोजन ग्रहण करनेवाले मुनि, भ्रामरी, गोचरी, अक्षम्रक्षण, उदराग्नि प्रशमन, तथा गर्तपूरणी इन पाँच वृत्तियोंका ध्यान रखते हुए आदत्तादानके दोषसे निर्मुक्त रहते हैं। उपकरण सम्बन्धी चोरोसे बचनेके लिये ससघर्माविसंवाद नामकी भावना कही है। प्रथम तो प्रत्येक मुनिको अपोनने पीछी, कतारमा गायक गोर काम लेना चाहिये फिर कदाचित् अज्ञानवश कोई मुनि यदि किसी अन्य मुनिके उपकरणको ले लेता है तो उसके पीछे विवाद नहीं करना चाहिये। आखिर उपकरण, निर्वाहके ही साधन हैं ममत्वभाव बढ़ानेके नहीं ।। ६५-६६ ॥
ब्रह्मचर्यप्रतको पाँच भावनाएं स्त्रीणां रागकथाश्रावोऽरमणीयाङ्गवीक्षणम् । पूर्वरत्यस्मृतिश्चैव वृष्येष्टरसवर्जनम् ॥६॥
शरीरसंस्क्रियात्यागश्चतुर्थे पञ्च भावनाः । अर्थ-स्त्रियोंमें राग बढ़ानेवाली कथाओंके सुननेका त्याग करना, स्त्रियोंके रमणीय अङ्गोंके देखने का त्याग करना, पूर्वकालमें भोगी हुई रतिके स्मरणका त्याग करना, कामोत्तेजक गरिष्ठ रसोंका त्याग करना और शरीरके संस्कारका त्याग करना ये पांच ब्रह्मचर्य व्रतको भावनाएं हैं।
भावार्थ:-ऊपर कही हुईं पांच बातें मनुष्यको ब्रह्मचर्यसे च्युत करने में सहायक हैं । इसलिये आचार्य ने उपदेश दिया है कि कभी ऐसी कथाएँ या गीत आदि न सुनो, जिनसे स्त्रीविषयफ रागको वृद्धि हो । कभी स्त्रियोंके स्तन, नितम्ब, कुक्षि आदि अङ्गोंको ओर न देखो, जिनसे उनकी ओर आकर्षण बढ़े। कभी पहले भोगे हुए भोगोंका स्मरण न करो जिनसे स्त्रीको आवश्यकता अनुभवमें आवे । सदा ऐसा सात्विक आहार करो जिससे इन्द्रियों में उत्तेजना उत्पन्न न हो और शरीरका ऐसा संस्कार न करो जिससे स्त्रियाँ तेरी ओर आकृष्ट हों। इन पाँच बातोंकी ओर सजग दृष्टि रखनेसे ही ब्रह्मचर्य की रक्षा हो सकती है ।। ६७ ॥
अपरिग्रह व्रतको पाँच भावनाएं मनोज्ञा अमनोज्ञाश्च ये पञ्चेन्द्रियगोचराः ॥६८॥
रागद्वेषोज्झनान्येषु पञ्चमे पञ्च भावनाः । अर्थ-स्पर्शनादि पाँच इन्द्रियोंके जो इष्ट और अनिष्ट विषय हैं उनमें रागद्वेषका त्याग करना अपरिग्रहवतकी पांच भावनाएँ हैं ।
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चतुर्थाधिकार भावार्थ—मनुष्यके पास जितना परिग्रह है वह स्पर्शनादि पांच इन्द्रियोंके विषयोंमें ही गभित है। जिन पदार्थोंको मनुष्य इष्ट मानता है उनका संग्रह करता है और जिन्हें अनिष्ट मानता है उन्हें दूर करता है । अपरिग्रह या परिग्रह त्यागयतकी रक्षाके लिये यह आवश्यक है कि किसी वस्तुको इष्ट और अनिष्ट म माना जाय । जब इट औ: अनिकी बुद्धि का जावेगी तब रागद्वेषकी उत्पत्ति स्वयं दूर हो जायेगी और रागद्वेषकी उत्पत्तिके दूर हो जानेपर परिग्रह रखनेका भाव ही नहीं रहेगा क्योंकि रागद्वेष ही तो परिग्रहके रक्षक हैं ।। ६८।।
हिंसादि पापोंके विषयमें कैसा विचार करना चाहिये ?
इह व्यपायहेतुत्वममुत्रावद्य हेतुताम् ॥६९।। हिंसादिषु विपक्षेषु भावयेञ्च समन्ततः । स्वयं दुःखस्वरूपत्वादुःखहेतुत्वतोऽपि च ||७०॥ हेतुत्वाद्दुःखहेतूनामिति तत्त्वपरायणः ।
हिंसादीन्यथया नित्यं दुःखमेवेति भावयेत् ।।७१॥ अर्थ-हिंसादि पापोंक विषयमें ऐसा विचार करना चाहिये कि ये इस लोकमें अनेक प्रकारके दुःखोंके कारण हैं तथा परलोकमें पापबन्धके हेतु है । अथवा ऐसा विचार करे कि ये हिंसादिक स्वयं दुःखरूप हैं, दुःखोंके कारण हैं, और दुःखोंके कारणोंके कारण हैं इसलिये दुःख ही हैं ॥ ६९-७१ ।।
मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्यभावना सत्वेषु भावयेन्मैत्री मुदितां गुणशालिषु ।
क्लिश्यमानेषु करुणामुपेक्षा वामदृष्टिषु ।।७२।। अर्थ संसारके समस्त प्राणियोंमें मैत्री भावना, गुणी मनुष्यों में प्रमोदभावना, दुःखी जीवोंमें करुणाभावना और विपरीत मनुष्यों में माध्यस्थ्यभावनाका चिन्तन करना चाहिये ॥ ७२ ।।
संसार और शारीरके स्वभावका विचार संवेगसिद्धये लोकस्वभावं सुष्ठ भावयेत् ।
वैराग्याथं शरीरस्य स्वभावं चापि चिन्तयेत् ।।७३।। अर्थ---संवेग-संसारसे भोरताकी सिद्धिके लिए अच्छी तरह संसारके स्वरूपकी भावना करना चाहिये और वैराग्यके लिये शरीरके स्वभावका विचार करना चाहिये ॥ ७३ 11
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तत्त्वार्थसारं
हिंसा पापका लक्षण द्रव्यभावस्वभावानां प्राणानां व्यपरोपणम् ।
प्रमत्तयोगतो यत्स्यात् सा हिंसा संप्रकीर्तिता ||७४।। अर्थ--प्रमादके योगसे द्रव्य और भावप्राणोंका जो विधात करना है वह हिंसा कही गई है।
भावार्थ-हिंसाका प्रमुख कारण प्रमादका योग है क्योंकि प्रमादका योग रहते हुए बाह्म में हिंसा न होनेपर भी हिंसा मानी जाती है और प्रमादका योग न होनेपर बाह्यमें हिंसा होनेपर भी हिंसा नहीं मानी जाती ।। ७४ ।।
असत्य पापका लक्षण प्रमत्तधोगतो या स्वादत्तदर्थाभिभाषणम् ।
समस्तमपि विज्ञेयमनृतं तत्समासतः ॥७५।। अर्थ--प्रमादके योगसे जो असत् पदार्थका कयन होता है संक्षेपसे उस सभीको असत्य जानना चाहिये ।। ७५ ।।
चोरी पापका लक्षण प्रमत्तयोगात् यत्स्याददत्तार्थपरिग्रहः ।
प्रत्येयं तत्खलु स्तेयं सर्व संक्षेपयोगतः ।।६।। अर्थ-प्रमादके योगसे जो बिना दिये हुए पदार्थका ग्रहण करना है संक्षेपसे उस सभीको चोरी जानना चाहिये ।। ७६ ।।
मैथुन पापका लक्षण मैथुनं मदनोद्रेकादब्रह्म परिकीर्तितम् । अर्थ-कामके तोन्नोदयसे जो अब्रह्मका सेवन होता है वह मैथुन कहलाता है।
परिग्रहपापका लक्षण ममेदमिति संकल्परूपा मूर्छा परिग्रहः ॥७७।। अर्थ-'यह मेरा है' इस प्रकारके संकल्परूप मूर्खाको परिग्रह कहते हैं ॥७७॥
व्रतीका लक्षण मायानिदानमिथ्यात्वशल्याभाचविशेषतः। अहिंसादिवतोपेतो व्रतीति व्यपदिश्यते ।।७८।।
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चतुर्थाधिकार
१२९ अर्थ-माया निदान और मिथ्यात्य इन तीन शल्योंके अभावसे विशिष्ट होता हुआ जो अहिंसा आदि प्रतोंसे सहित है वह व्रती कहलाता है। ___ भावार्थ-जो अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पांच व्रतोंसे सहित है वह व्रती कहलाता है। ब्रती मनुष्यको माया, निदान' और मिथ्यात्व इन तीन शल्पोंसे रहित ही होना चाहिये। भोतरको निर्बलताको छिपानेके लिये कितने ही मनुष्य भीतर कुछ हैं और बाह्यमें कुछ आचरण करते हैं। ऐसे मनुष्योंको कांटेकी तरह यह चुभती रहती है कि कोई हमारी भीतरको निर्बलताको जान न जावे। यही माया शल्य है। प्रती मनुष्यको इस शल्यसे रहित होना चाहिये । भीतर जिस व्रतको धारण करने की शक्ति है उसी व्रतको धारण करना चाहिये तथा भीतर बाहर एक-सा आचरण रखना चाहिये। किसी फलकी अभिलाषा रखना निदान कहलाता है। जो मनुष्य किसी सांसारिक फलकी अभिलाषा रखकर चत धारण करता है वह उस सांसारिक फल की प्राप्तिमें विलम्ब देख व्रतकी श्रद्धासे च्युत हो जाता है और वेगार समझकर ग्लानिपूर्वक व्रतका आचरण करता है। इसलिये 'पाप हेय हैं। इतना ही अभिप्राय रखकर पापका त्याग करते हुए व्रत धारण करना चाहिये । विपरीत श्रद्धाको मिथ्यात्व कहते हैं। कूदेव, कुशास्त्र और कूगरकी श्रद्धारूप स्थूल मिथ्यात्व तो नतीके होता ही नहीं है परन्तु कितने ही व्रती शुभोपयोगरूप व्रतको संवर और निर्जराका कारण मानते हैं जब कि वह शुभास्रवका कारण है । उनकी यह विपरीत श्रद्धा उन्हें मिथ्यात्वरूप शल्यसे युक्त बनाये रखती है। व्रती मनुष्यको शुभोपयोगको भूमिकामें शुभोपयोगका आचरण करते हुए भी उसे मोक्षका साक्षात् कारण नहीं मानना चाहिये ।। ७८ ।।
प्रतीके भेव अनगारस्तथागारी स द्विधा परिकथ्यते ।
महाव्रतोऽनगारः स्यादगारी स्यादणुव्रतः ॥७९।। अर्थ-अनगार और अगारीके भेदसे वह व्रती दो प्रकारका कहा जाता है। महाव्रतका धारी अनगार कहलाता है और अणुव्रतका धारक अगारी कहा जाता है ।। ७९ ॥
बारह व्रतोंके नाम दिग्देशानर्थदण्डेभ्यो विरतिः समता तथा । सप्रोषधोपवासश्च संख्या भोगोपभोगयोः ॥८॥
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तत्त्वार्थसार अतिथेः संविभागश्च व्रतानीमानि गेहिनः ।
अपरायपि सप्त स्युरित्यमी द्वादशव्रताः ॥८१॥ अर्थ-ऊपर कहे हुए पाँच अणुब्रतोंके सिवाय गृहस्थके दिग्वत, देशवत, अनर्थदण्डवत, सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोगभोगपरिमाण, और अतिथिसंविभाग ये सात और भी व्रत होते हैं । इस तरह गृहस्थके पाँच अणुव्रत, तीन गुणग्नत और चार शिक्षाबत सब मिलाकर बारह व्रत होते हैं। ____ भावार्थ-जिस प्रकार खेतकी रक्षाके लिये वाड़ी होती है उसी प्रकार व्रतोंकी रक्षाकं लिये सात शील होते हैं। तीन गुणनत और चार शिक्षात्रत इन सातको शील काहते हैं। इनसे अहिंसादि व्रतोंकी रक्षा होती है। गुणवतके तीन भेद है- दिग्द्रत, २ देशव्रत और ३ अनर्थदण्डव्रत । हिंसा तथा आरम्भ आदिको कम करनेके अभिप्रायसे जीवनपर्यन्तके लिये दशों दिशाओंमें आवागमनकी सीमा निश्चित करना दिग्व्रत है। दिग्वतके भीतर समयकी मर्यादाके साथ छोटी सीमा निश्चित करना देशयत है । और मन, बचन, कायके निरर्थक व्यापारका त्याग करना अनर्थदण्डवत है। ये अणुनतोंका गुण अर्थात् उपकार करते हैं इसलिये गुणवत कहे जाते हैं। प्रात:काल, मध्याह्नकाल और सायंकाल कम-से-कम दो घड़ी तक समताभाव रखते हुए सामायिक करना सामायिक कहलाता है। प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशीको धारणा और पारणाके दिनके एकाशनके साथ उपवास करना प्रोषधोपवासवत है। प्रोषधका अर्थएकाशन, उपवासका अर्थ-चारों प्रकारके आहारका त्याग और प्रोषधोपवासका अर्थ-एकाशनके साथ उपवास करना है । अथवा प्रोषधका अर्थ पर्व–अष्टमी चतुर्दशी है, पर्वके दिन उपवास करना ही प्रोषधोपवास है । भोग और उपभोग में आनेवाली वस्तुओंकी संख्या निदिचत करना भोगोपभोगपरिमाण है। जो वस्तु एकबार भोगने में आती है उसे भोग कहते हैं। जैसे भोजन तथा माला आदि । और जो बार-बार भोगने में आती है उसे उपभोग कहते हैं । जैसे—वस्त्र, आभूषण आदि । इनका परिमाण यम और नियम दोनों रूपसे होता है । असेय वस्तुओंका त्याग तो यमरूप ही होता है और सेव्य वस्तुओंका त्याग यम तथा नियम दोनों रूप होता है। जीवनपर्यन्तके लिये त्याग वारना यम है और समयकी मर्यादाके साथ त्याग करना नियम है। अतिथि-योग्य पात्रके लिये चार प्रकारका दान देना अतिथिसंविभाग कहलाता है। सामायिक, प्रोषधोपबास, भोगोपभोगपरिमाण और अतिथिसंविभाग ये चार शिक्षाव्रत कहलाते हैं क्योंकि इनसे मुनिव्रतके अभ्यासकी शिक्षा मिलती है । पाँच अणुन्नत तीन गुणवत और चार शिक्षाप्रतके भेदसे गृहस्थके बारड् व्रत होते हैं। इनका पालन करनेवाला अगारी, गृहस्थ या श्रावक कहलाता है ।। ८०-८१ ।।
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चतुर्थाधिकार
सल्लेखनावमा मर्मत अपरं च व्रतं तेषामपश्चिममिहेष्यते ।
अन्ते सल्लेखनादेव्याः प्रीत्या संसेवनं च यत् ॥८२॥ अर्थ-अन्तमें सल्लेखनादेवीकी जो प्रीतिपूर्वक सेवा' करता है वह भी उन बारह व्रतों से एक अन्य श्रेष्ठ व्रत माना जाता है ।
भावार्थ-जीवनके अन्तमें प्रीतिपूर्वक सल्लेखना धारण करना यह भी एक उत्तम श्रत है। समताभावसे कषायोंको कृश करते हुए मरण करना सल्लेखना है । इसे ही समाधिमरण या सन्यासमरण कहते हैं । कुन्दकुन्दस्वामीने इसे चार शिक्षाबतोंमें शामिल किया है । पर पीछे चलकर उमास्वामी आदि आचार्योंने इसका बारह व्रतोंके अतिरिक्त वर्णन किया है। ऐसा करनेमें इनका अभिप्राय यह रहा मालूम होता है कि मरण तो अन्तिम समयमें होता है उसका पहलेसे पालन किस प्रकार हो सकता है ? शिक्षाव्रतोंमें इसे सम्मिलित करने में कुन्दकुन्दस्वामीका यह अभिप्राय था कि गृहस्थको निरन्तर ऐसी भावना रखना चाहिये कि मैं सल्लेखना द्वारा ही मरण करूँ। जिस जीवकी भावना सल्लेखना द्वारा मरण करनेकी रहती है वही अन्तमें सल्लेखना कर सकता है। जिसका प्रतीकार न हो सके ऐसा उपसर्ग, दुर्भिक्ष, तथा बुढ़ापा प्राप्त होनेपर धर्म-रक्षाको भावनासे सल्लेखना की जाती है। सल्लेखनाको उल्लासपूर्वक धारण करना चाहिए, संक्लेशपूर्वक नहीं 1 इसके भक्तप्रत्याख्यान, इंगिनीमरण और प्रायोपगमनके भेदसे तीन भेद होते हैं । जिसमें क्रम-क्रमसे या एक-साथ आहार-पानीका त्याग किया जाता है, परन्तु शरीरको टहल स्वयं भी की जा सकती है और दूसरेसे भी कराई जा सकती है उसे भक्तप्रत्याख्यान कहते हैं। जिसमें आहारपानीके त्यागके साथ शरीरकी टहल स्वयं तो की जा सकती है पर दूसरेसे नहीं कराई जाती उसे इंगिनीमरण कहते हैं । और जिसमें इतनी निःस्पृहता बढ़ जाती है कि आहारपानीके त्यागके साथ शरीरकी टहल न स्वयं की जाती है और न दूसरेसे कराई जाती है उसे प्रायोपगमन कहते हैं। ८२ ॥
अतिचारोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा सम्यक्त्यव्रतशीलेषु तथा सन्लेखनाविधौ ।
अतीचाराः प्रवक्ष्यन्ते पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ।। ८३॥ अर्य--अब इनके आगे सम्यक्त्व, पाँच नत, सात शील और सल्लेखनाविधिमें प्रत्येकके पांच-पाँच अतिचार क्रमसे कहे जावेंगे।
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तत्त्वार्थसार भावार्थ-व्रतोके एकदेश भङ्ग करनेको अतिचार कहते हैं। यह अतिचार प्रमाद या अज्ञानदशामें कदाचित् लगते हैं। बुद्धिपूर्वक बार-बार अतिचार लगानेसे बतभङ्ग हो जाता है ।। ८३ ।।
सम्यक्रवके पांच अतिवार शङ्कनं काक्षणं चैव तथा च विचिकित्सनम् ।
प्रशंसा परदृष्टीनां संस्तवश्चेति पञ्च ते ॥८॥ अर्थ-शङ्का-सूक्ष्म अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थोंमें शङ्का करना अथवा सप्त भयरूप प्रवृत्ति करना, काङ्क्षा-सांसारिक फलोंकी इच्छा करना, विचिकित्सा-धर्मात्माजनोंके मलिन शरीरमें ग्लानि करना, परदृष्टिप्रशंसाअन्य मिथ्यादृष्टियोंको मनमें अच्छा समझना और परदृष्टिसंस्तव-अन्य मिथ्यादृष्टियोंको वचन द्वारा स्तुति करना ये पाँच सम्यक्त्वके अतिचार हैं ॥८४ ।।
अहिंसाणुव्रतके पांच अतिचार बन्धी वधस्तथा छेदो गुरुभाराधिरोपणम् ।
अन्नपाननिषेधश्च प्रत्येया इति पञ्च ते ॥८॥ अर्थ- बन्ध–स्रोटे अभिप्रायसे किसी जीव-जन्तुको रस्सी आदिसे बाँधना, वध--लायो, चाबुवा आदिसे किसीको पीटना, छेद-नाक, कान, मूंछ आदि अंगोंका छेदना, 'गुरुभारारोपण--शत्तिसे अधिक भार लादना और अन्नपाननिरोध-समय पर आहार-पानी नहीं देना अथवा अल्पमात्रामें देना ये पाँच अहिंसाणुयतके अतिचार हैं ॥ ८५ ॥
सत्याणुव्रतके पाँच अतिधार कूटलेखो रहोभ्याख्या न्यासापहरणं तथा ।
मिथ्योपदेशसाकारमन्त्रभेदौ च पञ्च ते ॥४६॥ अर्थ-कूटलेख–बनावटी लेख लिखना, रहोण्याख्या-स्त्री-पुरुषको एकान्त चेष्टाको उनकी हँसी उड़ानेकी भावनासे प्रकट करना, न्यासापहरणधरोहरको हड्प करनेवाले वचन कहना, मिथ्योपवेश--आगमके शब्दोंका अन्यथा व्याख्यान करना और साकारमन्त्रभेद–किसी चेष्टासे दुसरेको गुप्त मन्त्रणाको जानकर प्रकट कर देना ये पाँच सत्याणुव्रतके अतिचार हैं ।। ८६ ।।
अचौर्थाणुव्रतके पाँच अतिचार स्तेनाहतस्य ग्रहणं तथा स्तेनप्रयोजनम् । व्यवहारः प्रतिच्छन्दैर्मानोन्मानोनपद्धता ॥८७।।
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चतुर्थाधिकार
अतिक्रमो विरुद्धे च राज्ये सन्तीति पञ्च ते ।
अर्थ- स्तेनाहुतग्रहण - बोरके द्वारा चुराकर लाई हुई वस्तुओंको जानबूझकर ग्रहण करना, स्तेनप्रयोजन - स्वयं चोरी न करते हुए भी चोरके लिये चोरीकी प्रेरणा करना, प्रतिछत्व व्यवहार - असली वस्तुओंमें नकली वस्तुएँ मिलाकर बेचना, मानोन्मानोन वृद्धता - नापने तौलनेके वाट तथा गज वगैरहको कम बढ़ रखना और विरुद्धराज्यातिक्रम — राज्य में गड़बड़ी होनेपर मर्यादाका उलङ्घन करना अर्थात् सस्तो वस्तुओंको अधिक मूल्यपर बेंचना या अधिक मूल्यवाली वस्तुओंकी सस्ते भावसे खरीदना अथवा राजकीय आशाका उल्ल नकर विरोधी राजाके राज्यसे वस्तुओंका आयात-निर्यात करना ये पांच अचौर्याणुव्रत अतिचार हैं ।। ८७ ।।
ब्रह्मचर्या के पाँच अतिचार
अनङ्गक्रीडितं तीव्रोऽभिनिवेशो मनोभ्रुवः ||८८|| इत्वयोर्गमनं चैत्र संगृहीतागृहीतयोः । तथा परविवाहस्य करणं चेति पञ्च ते ॥८९॥
अर्थ —– अनङ्गक्रीडा -- कामसेवनके लिये निश्चित अङ्गोंके सिवाय अन्य असे अप्राकृतिक क्रीडा करना, कामतीवाभिनिवेश - काम सेवनकी तो लालसा रखना, संगृहीतेत्यरिकागमन- दूसरेके द्वारा ग्रहण की हुई कुलटा स्त्रियों के साथ संपर्क रखना और गृहोतेत्वरिकागमन - दूसरे के द्वारा ग्रहण न की हुई कुलटा स्त्रियोंसे संपर्क रखना, और परविवाहकरण - अपने आश्रित पुत्र-पुत्रियोंके सिवाय दूसरोंका विवाह करना ये पाँच ब्रह्मचर्याणुव्रतके अतिचार हैं ।। ८८-८९ ।।
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परिग्रहपरिमाणाव्रतको अतिचार हिरण्यस्वर्णयोः क्षेत्र वास्तुनोर्धनधान्योः | दासीदासस्य कुप्यस्य मानाधिक्यानि पञ्च ते ॥९०॥
अर्थ- सोना-चांदी, खेत- मकान, धन-धान्य, दासी दास और कुप्य - वर्तन तथा वस्त्र के प्रमाणका उल्लंघन करना ये पाँच परिग्रहपरिमाणुव्रत के अतिचार हैं ।
भाषार्थ - सोना चाँदी आदिके परिमाणके उल्लंघन करनेका प्रकार ऐसा है - जैसा कि किसीने नियम लिया कि मैं दो आभूषण हायके और एक गलेके लिए रक्खूँगा । पीछे लोभको मात्रा में वृद्धि होने पर कम तौलसे बने हुए
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तत्त्वार्थसार आभूषणोंमें कुछ और सोना-चाँदी आदि मिलवा कर दूसरे आभुषण बनवा लिये । ऐसा करनेपर आभूषणोंकी संख्या तो पहलेके ही समान रक्खी परन्तु उनकी मात्रामें वृद्धि कर ली। इस तरह भड-अभङ्गकी अपेक्षा व्रतमें अतिचार उत्पन्न हुआ । यही बात खेत और मकानके विषयमें समझना चाहिये 1 जैसे किसीने नियम लिया कि मैं अपने निर्वाह के लिये दो मकान और दो खेत रक्तूंगा। पीछे उनसे लगे हुए दूसरे मकान या खेत लेकर उन्हीं मकानों और खेतोंकी सीमामें वृद्धि कर ली। गिनती पहले के समान खखी परन्तु परिमाणमें वृद्धि हो गई। इस तरह भङ्ग-अभङ्गकी अपेक्षा अतिचार उत्पन्न हआ। गाय, भैंस आदि पशुओंको धन तथा गेहूँ, चना आदि अनाजको धान्य कहते हैं । प्रत धारण करते समय किसीने नियम लिया कि मैं चार गायें, उनके बछड़े और पचास मन धान्य रक्तूंगा 1 पोछे कोई अच्छी गाय दिखी अथवा आगे चलकर धान्यका भाव बढ़नेको संभावना दिखी इसलिये इस प्रकारके बँधानके साथ दूसरी माय या अधिक धान्यका सौदा करना कि हमारा सौदा पक्का रहा परन्तु इतने समय बाद हम लेंगे। पीछे पासके बछड़ों आदिको अलग कर नवीन गायको लेना और अपने पासका धान्य स्वच कर दुसरा धान्य खरीदना इस तरह भङ्गाभङ्गको अपेक्षा अतिचार हुआ। कम कीमतके दासी-दासको बदलकर उसी संख्याके भीतर अधिक कोमलके दासी-दासको लेना दासी-दासप्रमाणातिक्रम नामका अतिचार है। वर्तन और वस्त्रके विषयमें भी इसी विधिसे वृद्धि करने पर कुप्य प्रमाणातिक्रम नामका अतिचार होता है ।। ९०॥
विग्नतके पाँच अतिचार तिर्यव्यतिक्रमस्तद्वदध ऊर्चमतिक्रमौ ।
तथा स्मृत्यन्तराधानं क्षेत्रवृद्धिश्च पञ्च ते ॥११॥ अर्थ-तिर्यग्व्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, कर्द्धव्यतिक्रम, स्मृत्यन्तराधान और क्षेत्रवृद्धि ये पाँच दिग्वतके अतिचार हैं।
भावार्थ-समान धरातलको सीमाका उल्लंघन करना तिर्यग्थ्यतिक्रम है । नीचे-कुआ, बावड़ी आदिमें उतरते समय गृहीत सीमाका उल्लंघन करना अधोव्यतिक्रम है। ऊपर किसी पर्वत आदिपर चढ़ते समय गृहीत्त सीमाका उल्लङ्घन करना ऊर्ध्वव्यतिक्रम है। व्रत धारण करते समय किसीने पचास कोश तक जानेका नियम लिया, पीछे मैंने पचास कोश तक जानेका नियम लिया था या चालीस कोश तक, इस प्रकार स्मृतिमें विकल्प आ जानेपर चालीस कोशसे आगे जाना स्मृत्यन्त राधान नामका अतिचार है। व्रत लेते समय किसीने चारों दिशाओंमें सौ-सौ कोश तक आने-जानेका नियम लिया, पीछे चलकर पूर्वदिशामें १२५ कोशपर एक कारखाना खुल गया वहाँसे माल
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चतुर्थाधिकार लाने पर अधिक लाभ दिखने लगा तथा पश्चिम दिशामें मौ कोला तक आने जाने में कोई लाभकी संभावना नहीं रही इसलिये पश्चिम दिशाकी सीमा २५ कोशकी कमीकर पूर्वदिशाको सीमामें २५ कोशको वृद्धि कर ली । इस तरह क्षेत्रवृद्धि नामका अतिचार होता है ।।९१ ॥
वेशनतके पांच अतिधार अस्मिन्नानयनं देशे शब्दरूपानुपातनम् ।
प्रेष्यप्रयोजन क्षेपः पुद्गलानां च पञ्च ते ॥१२॥ अर्थ-आनयन-सीमाके बाहर क्षेत्रसे किसी वस्तुको बुलाना, शब्बानुपात-सीमाके बाहर काम करनेवाले लोगोंको अपने शब्दोंसे सचेत करना, रूपानुपात-सीमाके बाहर काम करनेवाले लोगोंको अपनी सूरत दिखलाकर काममें सावधान करना, प्रेष्यप्रयोग-सीमाके बाहर स्वयं न जाकर नौकरके द्वारा काम कराना और पुद्गलक्षेप-सीमाके बाहर कङ्कड़ पत्थर वगैरह फेंकना, पत्र भेजना या फोन करना आदि देशवत्तके पांच अतिचार है ॥ ९ ॥
__ अनर्थदण्डव्रतके पाँच अतिचार असमीक्ष्याधिकरणं भोगानर्थक्यमेव च ।
तथा कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्याणि च पञ्च ते ॥१३॥ अर्थ-असममीक्ष्याधिकरण—निजका प्रयोजन अल्प होनेपर भी अधिक आरम्भ करना, भोगानथंक्य-भोगोपभोगको निरर्थक बस्तुओंका संग्रह करना, कन्दर्प-रागसे मिश्रित अशिष्ट वचन बोलना, कौत्कुच्य-अशिष्ट बचन बोलते हुए हाथ आदि अङ्गोंकी कुत्सित चेष्टा करना–खोटे संकेत करना और मौखर्य आवश्यकतासे अधिक बोलना-निरर्थक गप्प मारना ये पाँच अन्र्थदण्डव्रतके अतिचार हैं ।। ९३ ॥
सामायिक शिक्षाप्रतके पांच अतिचार त्रीणि दुःप्रणिधानानि बालमनःकायकर्मणाम् ।
अनादरोऽनुपस्थानं स्मरणस्येति पञ्च ते ॥१४॥ अर्थ--बधनदुःप्रणिधान—मन्त्र या पाठ आदिका अशुद्ध उच्चारण करना, मनोदुःप्रणिधान-मनको स्थिर नहीं रखना, कायदुःप्रणिधान---शरीरको हिलाना-डुलाना इधर-उधर देखना, तथा आसन बदलना आदि, अनावर-- मित्रोंकी गोष्टी छोड़कर अनादरपूर्वक सामायिक करना तथा स्मरणानुपस्थान
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सस्वार्थसार पाठ वगैरहकी स्मृति नहीं रखना ये पांच सामायिक शिक्षा तके अतिचार हैं।॥ १४ ॥
प्रोषधोपवास शिक्षाबतके अतिचार संस्तरोत्सर्जनादानमसंदृष्टाप्रमार्जितम् ।
अनादरोऽनुपस्थानं स्मरणस्येति पञ्च ते ॥१५।। अर्थ-भूखसे व्याकुल होकर विना देखे तथा विना शोधे हुए स्थानपर विस्तर आदिका बिछाना, मलमूत्रका छोड़ना, किसी वस्तुका रखना उठाना, अनादरके साथ उपवास करना और उपवासके दिनका स्मरण भूल जाना अथवा विधिका स्मरण नहीं रखना ये प्रोषधोपचास शिक्षाबतके अतिचार हैं ।। ९५ ॥
भोगोपभोगपरिमाणवतके अतिचार सचित्तस्तेन सम्बन्धस्तेन सम्मिश्रितस्तथा ।
दुःपक्वोऽभिषवश्वमाहाराः पञ्च पञ्च ते ॥१६॥ अर्थ सचित्ताहार, सचित्त सम्बन्धाहार, सचित्तरांमिश्रिताहार, दुःपक्वाहार और अभिषयाहार ये पांच भोगोपभोगपरिमाणवतके अतिचार हैं। ___ भावार्थ-भोग और उपभोगकी अनेक वस्तुएँ हैं ! अतः उन सबसे सम्बन्ध रखनेवाले अतिचारोंका वर्णन करना अशक्य है यह विचारकर आचार्यने भोजनको प्रधानता देते हुए उसके अतिचारोंका वर्णन किया है। शेष वस्तुओंसे सम्बन्ध रखनेवाले अतिचार उपलक्षणसे समझ लेना चाहिये । अति चारोंका खुलासा इस प्रकार है-जैसे—किसीने नियम लिया कि आज मैं सचित्त भोजन नहीं करूंगा। पश्चात् भोजनके समय आई हुई सचित्त वस्तुके प्रमाद' या अज्ञानके कारण ग्रहण करना सचित्ताहार है। अथवा क्षुधा-तृषासे आतुर होनेके कारण शीघ्रता करनेवाले व्यक्तिकी सचित्त वस्तुओंके खाने-पीने अनुलोपन करने अथवा गीले वस्त्र आदिके धारण करने में प्रवृत्ति होना सचित्ताहार है। हरे पत्ते आदिमें रखे हुए अचित्ताहारको लेना सविससम्बन्धाहार है, हरे घना आदि सचित्तवस्तुओंसे मिली हुई दाल आदि अचित्त वस्तुओंको लेना सचित्तसंमिश्रिताहार है, अधजला या अधपका अचित्त भोजन ग्रहण करना दुःपक्याहार है और गरिष्ठ भोजन करना अभिषधाहार है ।। ९६ ।। १. कथमस्य सचित्तादिषु वृत्तिः ? प्रमादसंमोहाभ्यां सचित्तादिषु वृत्तिः । क्षुत्पिपासा
तुरत्वात् त्वरमाणस्य सचित्तादिषु अशनाय पानायानुलेपनाम परिधानाय वा बुत्तिर्भवति ।
( राजवातिक )
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चतुर्थाधिकार
अतिथि संविभागात के अतिचार
कालव्यतिक्रमोऽन्यस्य व्यपदेशोऽथ मत्सरः । सचित्ते स्थापनं तेन पिधानं चेति पञ्च ते ॥ ९७ ॥
अर्थ -- कालव्यतिक्रम --- दान देने योग्य समयका उलङ्घनकर विलम्बसे दान देना, अन्यथ्यपदेश - दूसरे दात्ताके द्वारा देने योग्य बस्तुका देना अथवा प्रमादवश स्वयं आहारादि न देकर दूसरेसे दिलाना, मत्सर - दूसरे दातारों के यहाँ आहार हो जानेपर ईर्ष्याभाव करना, सचित्तस्थापन- हरे पत्ते आदिसे निर्मित पात्र में रखा हुआ पदार्थ देना और सचित्तविधान – हरे पत्ते आदि सचित्त वस्तुओंसे ढके हुए आहारका देना ये पाँच अतिथिसंविभागव्रत के अतिचार हें ॥ ९७ ॥ सल्लेखनाके पाँच अतिर
पञ्चत्वजीविताशंसे तथा मित्रानुरञ्जनम् । सुखानुबन्धनं चैव निदानं चेति पञ्च ते ॥ ९८ ॥
अर्थ--पञ्चताशंसा---क्रष्ट अधिक होनेपर जल्दी मरनेकी इच्छा रखना, जीविताशंसा --- जीवित होनेकी इच्छा करना, मित्रानुरज्जन--- मित्रोंसे राग करना, सुखानुबन्ध --- पहले भोगे हुए सुखका स्मरण करना और निदानआगामी भोगोंकी इच्छा करना ये पाँच सल्लेखना के अतिचार है ॥ ९८ ॥
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बानका लक्षण
परात्मनोरनुग्राहिधर्मवृद्धिकरत्वतः ।
स्वस्योत्सर्जन मिच्छन्ति दानं नाम गृहिव्रतम् ॥ ९९ ॥
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अर्थ --- निज और परका उपकार करनेवाले धर्मकी वृद्धिका कारण होनेसे आत्मीय वस्तुका देना दान है, यह दान गृहस्थका व्रत है ॥ ९९ ॥
दान में विशेषताके कारण
विधिद्रव्यविशेषाभ्यां ज्ञेयो दानविशेषस्तु
अर्थ - विधि, द्रव्य, दाता और पात्रको विशेषतासे दान में विशेषता जानना चाहिये । दानकी विशेषता विशिष्ट पुण्यास्रवको करनेवाली है ॥ १०० ॥
दातृ पात्र विशेषतः । पुण्यास्रवविशेषकृत् ॥ १०० ॥
पुण्यावका कारण
हिंसानृतचुराब्रह्मसङ्गसंन्यासलक्षणम् ।
व्रतं पुण्यासवोत्थानं भावेनेति प्रपश्चितम् ॥ १०१ ॥
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तत्वार्थसार अर्थ--हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन और परिग्रहका त्याग करना जिसका लक्षण है ऐसे प्रतको भावपूर्वक धारण करना पुण्यास्त्रबको बढ़ानेवाला है ।। १०१॥
पापासबका कारण हिंसानृतचुराब्रह्मसङ्गासन्यासलक्षणम् ।
चिन्त्यं पापासवोत्थानं भावेन स्वयमव्रतम् ॥१०२॥ अर्थ--हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन और परिग्रहका त्याग नहीं करना जिसका लक्षण है ऐसा अव्रत अपने भावसे स्वयं पापास्रवको बढ़ानेवाला है।
भावार्थ-पाँच पापोंका त्याग करना नत है और पांच पापोंका त्याग नहीं करना अव्रत है। वससे पुण्यकर्मोका आस्रव होता है और अग्रतसे पापकर्मीका आस्रव वृद्धिको प्राप्त होता है ।। १०२ ॥
पुण्य-पापको विशेषता हेतुकार्यविशेषाभ्यां विशेषः पुण्ययापयोः ।
हेतू शुभाशुभी भावौ कायें चैव सुखासुखे ॥१३॥ अर्थ--हेतु और कार्यकी विशेषतासे पुण्य और पापको विशेषता होती है। शुभ-अशुभभाव पुण्य-पापके हेतु हैं और सुख तथा दुःख पुण्य-पापके कार्य हैं ।। १०३॥
पुण्य और पापको समानता संसारकारणत्वस्य द्वयोरप्यविशेषतः ।
न नाम निश्चयेनास्ति विशेषः पुण्यपापयोः ॥१०४॥ अर्थ-पुण्य और पाप दोनों ही समानरूपसे संसारके कारण हैं इसलिये निश्चयनयसे उनमें विशेषता नहीं है ।
भावार्थ-जिस प्रकार सुवर्ण और लोहेको बेड़ी समान रूपसे बन्धनका कारण है उसी प्रकार पुण्य और पाप दोनों ही संसारके कारण हैं इसलिये निश्चयनयसे इन दोनों में विशेषता नहीं है, दोनों हेय हैं । परन्तु व्यवहारमें पुण्य स्वर्गादिके सुखका कारण है और पाप नरकादिके दुःखका कारण है । जब तक मोक्ष प्रास होनेका अवसर नहीं आया है तब तक इतके द्वारा स्वर्गादिकका प्राप्त करना अच्छा है परन्तु अव्रतके द्वारा नरकादिका प्राप्त करना अच्छा नहीं है।' १. वरं व्रतः पदं देवं नावतर्वत नारकम् ।
छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥३॥ इटोपदेशे पूज्यपादस्य ।
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चतुर्थाधिकार
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इतना अवश्य है कि सम्यग्दृष्टि - ज्ञानी जीव पुण्यकार्यों को करता हुआ भी उन्हें सर्वथा उपादेय नहीं मानता। जो भाव, आस्त्रव और बन्धके कारण हैं उन्हें संसारका कारण मानता है और भाव, संवर तथा निर्जराके कारण हैं उन्हें मोक्षका कारण मानता है ।। १०४ ॥
आनयतस्त्रको जाननेका फल
वैश्यपेक्षते ।
इतीsaarवं यः श्रहने शेषतः समं षभिः स हि निर्वाणमाग्भवेत् ॥ १०५ ॥
अर्थ – इस तरह शेष छह तत्त्वोंके साथ जो आस्रव तत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जागता है तथा उसकी उपेक्षा करता है वह निश्चयसे निर्वाणको प्राप्त होता है ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्री अमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित तत्त्वार्थसार में आम्रवतत्वका वर्णन करनेवाला चतुर्थ अधिकार पूर्ण हुआ ।
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पञ्चमाधिकार (वन्धतच्चवर्णन )
मङ्गलाचरण अनन्तकेवलज्योति:काशितजगत्त्रयान् ।
प्रणिपत्य जिनान्मूनां बन्धतत्त्वं निरूप्यते ॥ १॥ अर्थ अनन्त केवलज्ञानरूप ज्योतिके द्वारा तीनों जगत्को प्रकाशित करनेवाले जिनेन्द्र भगवानको शिरसे प्रणाम कर बन्ध तत्त्वका निरूपण किया जाता है ।। १॥
बन्धके पाँच हेतु बन्धस्य हेतवः पञ्च स्युमिथ्यात्वमसंयमः ।
प्रमादश्च कषायश्च योगश्चेति जिनोदिताः ॥२॥ अर्थ-मिथ्यात्व, असंयम, प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके पाँच हेतु जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गये हैं ।। २ ।।
मिथ्यात्वके पाँच भेद ऐकान्तिकं सांशयिकं विपरीतं तथैव च ।
आज्ञानिकं च मिथ्यात्वं तथा वैनयिकं भवेत् ॥ ३॥ अर्थ---ऐकान्तिक, सांशयिक, विपरीत, आज्ञानिक और वैनयिक ये मिथ्यात्वके पाँच भेद हैं ॥३॥
ऐकान्तिकामिथ्यात्वका लक्षण यत्राभिसन्निवेशः स्यादत्यन्तं धर्मिधर्मयोः ।
इदमेवेत्थमेवेति तदैकान्तिकमुच्यते ॥४॥ अर्थ-जिसमें धर्म और धर्मीक विषयमें 'यह ऐसा ही हैं। इस प्रकारका एकान्त अभिप्राय होता है वह ऐकान्तिक मिथ्यात्व कहा जाता है ॥४॥
सांशयिफमिथ्यात्वको लक्षण किं वा भवेन्न वा जैनो धर्मोऽहिंसादिलक्षणः । इति यत्र मतिद्वैधं भवेत्सांशयिक हि तत् ॥ ५ ॥
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पश्यमाधिकार अर्थ-'जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ अहिंसादि लक्षण धर्म है या नहीं' इस प्रकार जिसमें बुद्धिका भ्रम रहता है वह सांशयिकमिथ्यात्व है ॥५॥
विपरीतमिथ्यात्वका लक्षण सग्रन्थोऽपि च निर्ग्रन्थो ग्रासाहारी च केवली ।
रुचिरेवंविधा यत्र विपरीतं हि तत्स्मृतम् ॥ ६ ॥ अर्थ-परिग्रह सहित भी गुरु होता है और केवली कवलाहारी होता है इस प्रकारकी जिसमें श्रद्धा होती है वह विपरीतमिथ्यात्व है ॥ ६ ॥
आज्ञानिकमिथ्यात्वका लक्षण हिताहितविवेकस्य यत्रात्यन्तमदर्शनम् ।
यथा पशुवधो धर्मस्तदाज्ञानिकमुच्यते ॥ ७ ॥ अर्थ-जिसमें हित और अहितके विवेकका अत्यन्त अभाव होता है, जैसे पशुवध धर्म है, वह आज्ञानिकमिथ्यात्व कहा जाता है ।। ७ ॥
वैनयिकमिथ्यात्वका लक्षण सर्वेषामपि देवानां समयानां च तथैव च ।
यत्र स्यात्समदर्शित्वं ज्ञेयं वैनयिकं हि तत् ।। ८॥ अर्थ-जिसमें सभी देवों और सभी धर्मोंको समान देखा जाता है उसे वेनयिकमिथ्यात्व जानना चाहिये ॥८॥
बारह मकारका असंयम घड्जीवकायपश्चाक्षमनोविषयभेदतः ।
कथितो द्वादशविधः सर्वविद्भिरसंयमः ॥९॥ अर्थ-छहकायके जीव तथा पाँच इन्द्रिय और मनसम्बन्धी विषयके भेदसे सर्वज्ञ भगवान्ने बारह प्रकारका असंयम कहा है।
भावार्थ-पृथिवीकायिक आदि पाँच प्रकारके स्थावर तथा अस इन छह कायके जीवोंका घात करना तथा स्पर्शनादि पांच इन्द्रियों और मनके विषयों में प्रवृत्ति करना इस तरह बारह प्रकारका असंयम होता है ॥ ९॥
प्रमावका लक्षण शुद्धयष्टके तथा धर्म क्षान्त्यादिदशलक्षणे । योऽनुत्साहः स सर्वतः प्रमादः परिकीर्तितः ॥१०॥
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तत्वार्थसार अर्थ-आठ शुद्धि तथा क्षमा आदि दश लक्षणोंसे युक धर्मके विषयमें जो अनुत्साह है वह सर्वज्ञ भगवानके द्वारा प्रमाद कहा गया है।
भावार्थ भाव, काय, विनय, ईपिथ, भैक्ष्य, शयनासन, प्रतिष्ठापन, और वाक्यके भेदसे शुद्धिके आठ भेद हैं । तया उत्तमक्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्यके भेदसे धर्मके दश भेद है। इन आठ प्रकारको शुद्धियों तथा दश प्रकारके धर्मोमें उत्साहका न होना प्रमाद कहलाता है ।।१०।।
पच्चीस कषाय पोडशैव कषायाः स्युनॊकपाया नवेरिताः ।
ईषद्धेदो न भेदोत्र कषायाः पञ्चविंशतिः ।।११।। अर्थ-सोलह कषाय और नौ नोकषाय कही गई हैं। इनमें जो थोड़ा भेद है वह नहीं लिया जाता है इसलिये दोनों मिलाकर पच्चीस कषाय पाहलाती है ।॥ ११ ॥
पग्रह योग चत्वारो हि मनोयोगा याग्योगानां चतुष्टयम् ।
पञ्च द्वौ च वपुर्योगा योगाः पञ्चदशोदिताः ॥१२॥ अर्थ-चार मनोयोग, चार वचनयोग और सात काययोग इस प्रकार सब मिलाकर पन्द्रह योग कहे गये हैं ।। १२ ।।
बन्धका लक्षण यज्जीवः सकषायत्वाकर्मणो योग्यपुद्गलान् ।
आदचे सर्वतो योगात् स बन्धः कथितो जिनः ।।१३।। अर्थ-जीब कषायसे सहित होनेके कारण कर्मोके योग्य पुद्गलोंको योगवश जो सब ओरसे ग्रहण करता है वह जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा बन्ध कहा गया है।
भावार्थ-रलोकमें जो 'कर्मणः' पद आया है वह पञ्चमी और षष्ठी दोनों विभक्तियोंमें बनता है। पञ्चमी विभक्तिके पक्षमें श्लोकका यह अर्थ होता है कि जीव कर्मसे सकषाय होता है अर्थात् पूर्वाबद्ध कर्मको उदयावस्था होनेपर जीव कषायसे सहित होता है और षष्टी विभक्तिके पक्षमें यह अर्थ होता है कि जोव कषाय सहित होनेके कारण कर्मोक योग्य' अर्थात् कर्मरूप परिणमन करने वाले कार्मणवर्गणात्मक पुद्गलोंको ग्रहण करता है । तात्पर्य यह है कि कर्मका उपादानकारण पुद्गलद्रव्य है क्योंकि पुद्गलद्रव्य ही कर्मरूप परिणत होता है
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पञ्चमाधिकार
१४३ परन्तु उस परिणमनमें आत्माको सकषाय दशा अर्थात् रागादिकभाव निमित्तकारण हैं। इसी तरह आत्माकी जो सकषाय दशा है उसका उपादानकारण आत्मा है और द्रव्यकर्मका उदय उसका निमित्तकारण है । आत्माके असंख्यात प्रदेश हैं एक-एक प्रदेशके साथ अनन्त-अनन्त कर्मपरमाणु लग रहे हैं और एक-एक कर्मपरमाणु के साथ अनन्त-अनन्त कार्मणवर्गणाके परमाणु लग रहे हैं। जब आत्मामें योग और कषायरूप परिणति होती है तब वे कार्मणवर्गणाके परमाणु प्रकृति, प्रदेश, स्थिति और अनुभागरूप परिणत होकर बन्ध अवस्थाको प्राप्त हो जाते हैं तथा उन्हें कार्मणवर्गणाके बाद कर्मसंज्ञा प्राप्त हो जाती है। सामान्यरूपसे यह बन्धकी परम्परा अनादिकालसे चलो आ रही है तथा अभव्य जीव और दूरानुदूर भव्यके अनन्तकाल तक चली जावेगी । परन्तु भव्यजीवके समय पाकर नष्ट हो जावेगी, इसलिये आत्मा और कौका सम्बन्ध अभव्य तथा दूरानुदूर भन्यकी अपेक्षा अनादि अनन्त है, भव्य जीवकी अपेक्षा अनादि और सान्त है तथा विशिष्ट कर्मकी अपेक्षा सादि और सान्त है । आत्माके साथ जो कर्मोका सम्बन्ध होता है वह किसी एक स्थानके प्रदेशोंके साथ होता हो, ऐसी बात नहीं है किन्तु सर्वतः-समन्तात् सब ओरसे होता है।॥ १३ ॥
कर्म आत्माका गुण नहीं है न कर्मात्मगुणोऽमूर्तेस्तस्य बन्धाप्रसिद्धितः । ___ अनुग्रहोपघातौ हिं नामूर्तः कर्तुमर्हति ॥१४॥ अर्थ-कर्म, आत्माका गुण नहीं है क्योंकि आत्माका गुण होनेसे वह अमूर्तिक होता और अमूर्तिकका बन्ध नहीं हो पाता। अमूर्तिक कर्म, अमूर्तिक आत्माका अनुग्रह और निग्रह--उपकार और अपकार करने में समर्थ नहीं होता ॥ १४ ।।
कर्मोंका मूर्तिकपना किस तरह है ? । औदारिकादिकार्याणां कारणं कर्म मूर्तिमत् ।
न ह्यमूर्तेन मूर्तानामारम्भः क्वापि दृश्यते ॥१५॥ अर्थ-औदारिक आदि कार्योंका कारण जो कर्म है वह मूर्तिमान् है क्योंकि अमूर्तिमान् पदार्थके द्वारा मूर्तिमान् पदार्थोंका आरम्भ कहीं भी दिखाई नहीं देता। ___ भावार्थ---यद्यपि कर्म सूक्ष्म होनेके कारण दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि वह मूर्तिक है क्योंकि उसका कार्य जो औदारिक आदि शरीर है वह मूर्तिक है। मूर्तिकको रचना मूर्तिसे ही हो सकती है इसलिये दृश्यमान औदारिकादि शरोरोंसे अदृश्यमान कर्ममें मूर्तिपना सिद्ध होता है ॥ १५ ॥
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तत्त्वार्थसार मूर्तिककर्मके साथ आत्माका बन्ध किस प्रकार होता है इसका समाधान
न च बन्धाप्रसिद्धिः स्यान्मृतः कर्मभिरात्मनः । अमृतरित्यनेकान्तात्तस्य मूर्तित्वसिद्धितः ।।१६।। अनादिनित्यसम्बन्धात्सह कर्मभिरात्मनः । अमूर्तस्यापि सत्यैक्ये मूर्तत्वमवसीयते ॥१७॥ बन्धं प्रति भवत्यैक्यमन्योन्यानुपवेशतः । युगपद् द्रावितस्वर्णरौप्यवज्जीवकर्मणोः ॥१८॥ तथा च मूर्तिमानात्मा सुराभिभवदर्शनात् । न अमूर्तस्य नमसो मदिरा मदकारिणी ॥१९॥ गुणस्य गुणिनश्चैव न च वन्धः प्रसज्यते ।
निर्मुक्तस्य गुणत्यागे वस्तुत्वानुपपत्तितः ॥२०॥ अर्थ-अमुर्तिक आत्माका मूर्तिक कर्मोंके साथ बन्ध असिद्ध नहीं है क्योंकि अनेकान्तसे आत्मामे मतिकपना सिद्ध हैं। कांके साथ अनादिकालीन नित्य सम्बन्ध होनेसे आत्मा और कर्मोमें एकत्व हो रहा है इसी एकत्वके कारण अमूर्तिक आत्मामें भी मूर्तिकपना माना जाता है। जिस प्रकार एक साथ पिधलाये हुए सुवर्ण और चाँदीका एक पिण्ड बनाये जानेपर परस्पर प्रदेशोंके मिलनेसे दोनोंमें एकरूपता मालूम होती है उसी प्रकार बन्धको अपेक्षा जीव और कर्मों के प्रदेशोंके परस्पर मिलनेसे दोनों में एकरूपता मालूम होती है। आत्माके मूर्तिक ‘मानने में एक युक्ति यह भी है कि उसपर मदिराका प्रभाव देखा जाता है इसलिये आत्मा मूर्तिक है क्योंकि मदिरा अमूर्तिक आकाशमें मदको उत्पन्न नहीं करती। कर्मको यदि आत्माका गुण माना जावे तो आत्मा गुणी कलावेगा और गुण तथा गुणीका बन्ध होता नहीं है। इस तरह आत्माका कर्मके साथ बन्ध नहीं हो सकेगा। मोक्ष अवस्थामें आत्मा कर्मसे निर्मुक्त होता है इसका अर्थ यह होगा कि आत्मा अपने ही गुणसे निर्मुक्त हो गया, इस दशामें आत्माका आत्मपना ही नष्ट हो जायगा क्योंकि गुणके अस्तित्वसे ही वस्तुका अस्तित्व रहता है गुणके नष्ट हो जानेपर वस्तुका वस्तुत्व नहीं रहता।
भावार्थ-निश्चय नयसे आत्मा और कर्म दोनों द्रव्य स्वतन्त्र स्वतन्त्र द्रव्य हैं इसलिये इनमें बन्ध नहीं है परन्तु व्यवहार नयसे कर्मक अस्तित्व कालमें
(. बंधं पडि एमत्त लक्खणदो हवा तस्स णाणसं ।
सम्हा अमुत्तिभावोऽयंतो होइ जीवस्स ।।
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पञ्चमाधिकार
१४५ आत्मा स्वतन्त्र नहीं है इसलिये दोनोंमें बन्ध माना जाता है। व्यवहारनयसे आत्मा और कर्मों में एकताका अनुभव होता है इसलिये आत्माको मूर्तिक माना जाता है। मूर्तिक आत्माका मूर्तिक कर्मों के साथ बन्ध होनेमें आपत्ति नहीं है ।। १६-२०॥
बन्द नार भेद प्रकृतिस्थितिबन्धौ द्वौ बन्धश्चानुभवाभिधः ।
तथा प्रदेशवन्धश्च ज्ञेयो बन्धश्चतुर्विधः ।।२१।। अर्थ-प्रकृति, स्थिति, अनुभव और प्रदेशबन्धके भेदसे बन्ध चार प्रकारका जानना चाहिये। ___ भावार्थ-ज्ञानावरणादि कर्मोके स्वभावको प्रकृतिबन्ध कहते हैं । अस्तित्वके तारतम्यको स्थितिवन्ध कहते हैं। फलशक्तिकी हीनाधिकताको अनुभव या अनुभागबन्ध कहते हैं तथा कमोके प्रदेशोंकी हीनाधिकताको प्रदेशबन्ध कहते हैं । इन चार प्रकारके बन्धोंमें प्रकृति और प्रदेशबन्ध योगके निमित्तसे होते हैं और स्थिति तथा अनुभवबन्ध कषायके निमित्तसे होते हैं । यहाँ मिथ्यात्व, अविरति और प्रमादको कषायके अन्तर्गत किया गया है। प्रारम्भसे लेकर दशम गुणस्थान तक चारों बन्ध होते हैं । उसके बाद ग्यारहवें गुणस्थानसे लेकर तेरहवें गुणस्थान तक मात्र प्रकृति और प्रदेशबन्ध होते हैं। चौदहवें गुणस्थानमें कोई बन्ध नहीं होता ।। २१ ।।
कर्मोको पाठ मूलप्रकृतियों ज्ञानदर्शनयो रोधौ वेद्यं मोहायुषी तथा ।
नामगोत्रान्तरायाश्च मूलप्रकृतयः स्मृताः ॥२२॥ अर्थ-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये आठ मूलप्रकृतियाँ मानी गई हैं।
भावार्थ-प्रकृतिबन्धके मूलमें उपर्युक्त आठ भेद हैं इनके लक्षण इस प्रकार हैं
जो आत्माके ज्ञानगुणको प्रकट न होने दे उसे ज्ञानावरण कहते हैं। जो दर्शनगुणको आवृत करे उसे वर्शनावरण कहते हैं। जो सुख-दुःखका कारण हो उसे वेदनीय कहते हैं। जिसके उदयसे जीव अपने स्वरूपको भुलकर परपदार्थोमें अहंवार तथा ममकार करे उसे मोहनीय कहते हैं । जिसके उदयसे जीव नरकादि योनियोंमें परतन्त्र हो उसे आयुकर्म कहते हैं । जिसके उदयसे शरीरादिको रचना
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૪૬
तत्वार्थसार
हो वह नामकर्म है । जिसके उदयसे उच्च-नीच कुलमें जन्म हो उसे गोत्रकर्म कहते हैं और जिसके द्वारा दान, लाभ आदिमें बाधा प्राप्त हो उसे अन्तराय कर्म कहते हैं ॥ २२ ॥
कर्मोकी एकसौ अड़तालीस उत्तरप्रकृतियाँ
अन्याः पञ्च नव द्वे च तथाष्टाविंशतिः क्रमात् ।
aar त्रिसंयुक्ता नवतिद्वै च पञ्च च ॥ २३॥
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J
अर्थ – ज्ञानावरणको पाँच, दर्शनावरणको नो वेदनीयकी दो मोहनीयकी अट्ठाईस, आयुकी चार नामको तेरानवे, गोत्रकी दो और अन्तरायको पाँच इस प्रकार सब मिलाकर एक सौ अड़तालीस उत्तरप्रकृतियाँ हैं ।। २३ ।।
ज्ञानावरणको पांच प्रकृतियो
मतिः श्रुतावधी चैब मनः पर्यवले | एषामावृत्तयो ज्ञानरोधप्रकृतयः स्मृताः ||२४||
अर्थ — मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मन:पर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण ये पाँच ज्ञानावरणकी प्रकृतियां हैं । ये क्रमसे आत्मा के मतिज्ञान आदि गुणोंको घातती हैं ।। २४ ।।
बर्शनावरणको नौ प्रकृतियाँ
चतुर्णां चक्षुरादीनां दर्शनानां निरोधतः । दर्शनावरणाभिख्यं प्रकृतीनां चतुष्टयम् ॥ २५ ॥ निद्रानिद्रा तथा निद्रा प्रचलाप्रचला तथा ।
प्रचला स्थानगृद्धिश्च दृग्रोधस्य नव स्मृताः ||२६|
अर्थ-चक्षुर्दर्शन आदि चार दर्शनोंको रोकनेसे चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदंर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण ये चार तथा निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पांच निद्राएँ सब मिलाकर दर्शनावरणकर्मको नी प्रकृतियां स्मरणकी गई हैं।
भावार्थ - आत्मा के दर्शनगुणको घातनेवाला कर्म दर्शनावरणकर्म कहलाता है । दर्शनगुणके चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन के भेदसे चार भेद हैं इनको आवृत्त करनेवाले चक्षुदर्शनावरण आदि चार भेद दर्शनावरणकर्मके मूल भेद हैं । इनके सिवाय निद्रा आदि पाँच प्रकारको निद्राएँ
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पचमाधिकार
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भी सामान्यरूपसे दर्शनगुणका घात करती हैं इसलिये उन्हें भी दर्शनावरण कर्मकी प्रकृतियों में शामिल किया गया है। दोनों मिलाकर दर्शनावरणको नौ प्रकृतियाँ होती हैं । चक्षुदर्शनावरण आदिके लक्षण नामसे ही स्पष्ट हैं शेष पाँच निद्राओंके लक्षण इस प्रकार हैं
निद्रा---मद, खेद तथा थकावटको दूर करनेके लिये जो सोया जाता है वह निद्रा है ।
निद्रानिद्रा - निद्राको गहरी अवस्थाको निद्रानिद्रा कहते हैं । प्रचला -- जिससे बैठे-बैठे ऑंख मित्र जावे उसे प्रचला कहते हैं । प्रचलाप्रचला — प्रचलाकी जो तीव्ररूपता है उसे प्रचलाप्रचला कहते हैं इस निद्रा में मुखसे लार बहने लगती है तथा भङ्गोपाङ्ग चलने लगते हैं।
स्त्यानगृद्धि – जिसके उदयसे आत्मा सोते समय भयंकर कार्य कर ले परन्तु जागने पर उनका स्मरण न रहे उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं ।। २५-२६ || dattaकर्मको दो प्रकृतियाँ
द्विधा वैद्यसद्वेद्यं सद्वेद्यं च प्रकीर्तितम् |
अर्थ - असद्वेद्य और सद्वेद्यको अपेक्षा वेदनीयकर्म की दो प्रकृतियाँ हैं। जिसके उदयसे यह जीव देवादि गतियों में प्राप्त सामग्री में सुखका अनुभव करे उसे सद्वेद्य कहते हैं और जिसके उदयसे नरकादि गतियोंमें प्राप्त सामग्री में दुःखका अनुभव करे उसे असद्वेद्य कहते हैं ।
मोहनीय कर्मको अट्ठाईस प्रकृतियाँ
त्रयः सम्यक्त्वमिथ्यात्व सम्यग्भिध्यात्वभेदतः ॥ २७ ॥ क्रोधो मानस्तथा माया लोभोऽनन्तानुबन्धिनः । तथा त एवं चाप्रत्याख्यानावरणसंज्ञिकाः ||२८|| प्रत्याख्यान रुश्चैव तथा संज्वलनाभिधाः | हास्यं रत्परती शोको भयं सह जुगुप्सया ||२९|| नारी पुंषण्ढवेदाश्च मोहप्रकृतयः स्मृताः ।
अर्थ - मोहनीयकर्मको मूलमें २ प्रकृतियां हैं - १ दर्शनमोहनीय और २ चारित्रमोहनीय दर्शनमोहनीयके तीन भेद हैं-१ मिथ्यात्वप्रकृति, २ सम्यacaप्रकृति और ३ सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति | चारित्रमोहनीयके भी कषायवेदनीय और नोकषाय वेदनीयको अपेक्षा दो भेद है । कषायवेदनीयके अनन्तानुबन्धी क्रोध मान-माया लोभ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध मान-माया-लोभ;
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तरवार्थसार प्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभ और संज्वलन क्रोध-मान-माया-लोभके भेदसे सोलह भेद हैं और नोकषायके हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्री, पुरुषभेद र नसकी अपेक्षा नो भेद है। सब मिलाकर मोहनीयकर्मके अट्ठाईस भेद होते हैं।
भावार्य-उक्त भेदोंके लक्षण इस प्रकार है
मिथ्यात्वप्रकृति-जिसके उदयसे तत्त्वार्थका श्रद्धान नहीं हो पाता उसे मिथ्यात्वप्रकृति कहते हैं।
सम्यक्स्वप्रकृति -- जिसके उदयसे सम्यग्दर्शनमें चल, मलिन और अगाढ़ नामक दोष लगते हैं उसे सम्यक्त्वप्रकृति कहते हैं।
सम्पङिमध्यात्वप्रकृति-जिसके उदयसे सम्यवत्व और मिथ्यात्वरूप मिश्रित परिणाम हों उस सम्यङ्मिथ्यात्वप्रकृति कहते हैं । ___ अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ-अनन्त संसारका कारण होनेसे मिथ्यात्वको अनन्त कहते हैं उस अनन्त-मिथ्यात्वसे जिसका सम्बन्ध हो उसे अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं । ___ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ-जिसके उदयसे एकदेशचारित्र प्रकट न हो सके उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं।
प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ-जिसके उदयसे सकलचारित्र न हो सके उसे प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं। ___ संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ-एकदेशघाती होनेके कारण जो सम् अर्थात् संयमके साथ भी ज्वलित कार्यशील रहे उसे संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं । इसके उदयसे यथाख्यातचारित्र प्रकट नहीं हो पाता है ।
हास्य-जिसके उदयसे हँसी आवे उसे हास्य कहते हैं।
रति...जिसके उदयसे स्त्री-पुत्र आदिमें रागरूप परिणाम हों उसे रति कहते हैं।
अरति--जिसके उदयसे अनिष्ट पदार्थोंमें द्वेषरूप परिणाम हों उसे अरति कहते हैं।
शोक-जिसके उदयसे सुपुत्र आदिका वियोग होनेपर दुःखरूप परिणाम होता है उसे शोक कहते हैं।
भय · जिसके उदयसे भय उत्पन्न होता है उसे भय कहते हैं।
जुगुप्सा-जिसके उदयसे घृणित पदार्थोंके देखने पर ग्लानिका भाव उत्पन्न हो उसे जुगुप्सा कहते हैं।
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राधिकार
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स्त्रीवेद — जिसके उदयसे पुरुषके साथ रमनेका भाव उत्पन्न हो उसे स्त्रीवेद कहते हैं ।
पुरुषवेद - जिसके उदयसे स्त्री के साथ रमनेका भाव उत्पन्न हो उसे पुरुषवेद कहते हैं ।
नपुंसक वेद — जिसके उदयसे दोनोंके साथ रमनेका भाव हो उसे नपुंसकवेद कहते हैं ।। २७ - २९ ।।
आयुकर्मको चार प्रकृतियाँ श्वातिर्यमनृदेवायुर्भेदाश्चतुविधम्
॥३०॥
अर्थ - - नरकायु, तिर्यगायु, मनुष्यायु और देवायुके भेदसे आयुकर्मके चार भेद हैं । इनके उदयसे आत्मा नारकी आदिके शरीरमें कैद रहती है ॥ ३० ॥ नामकर्मको तेरानवे प्रकृतियाँ
चतस्रो गतयः पञ्च जातयः काययञ्चकम् | अङ्गोपाङ्गत्रयं चैत्र निर्माणप्रकृतिस्तथा ॥ ३१ ॥ पञ्चधा बन्धनं चैव सङ्घातोऽपि च पञ्चधा । समादिचतुरस्रं तु न्यग्रोधं स्वातिकुब्जकम् ॥ ३२॥ वामनं हुण्डसंज्ञं च संस्थानमपि षड्विधम् | स्याद्वज्रपेभनाराचं वचनाराजमेन च ॥३३॥ नाराचमर्द्धनाराचं कीलकं च ततः परम् । तथा संहनन षष्टमसंप्राप्पाटिका ॥ ३४ ॥ अष्टधा स्पर्शनामापि कर्कशं मृदुलध्वपि । गुरु स्निग्धं तथा रूक्षं श्रीतमुष्णं तथैव च ॥३५॥ मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायः पञ्चधा रसः । वर्णाः शुक्लादयः पश्च द्वौ गन्धौ सुरभीतरी || ३६ ॥ श्वभ्रादिगतिभेदात्स्यादानुपूर्वीचतुष्टयम् 1
परघातस्तथागुरुलघुर्भवेत् ||३७||
उपघातः
उच्छ्वास आतपोद्योती शस्तास्ते नभोगती । प्रत्येकत्र सपर्यासवादराणि
शुभं स्थिरम् ||३८||
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तत्त्वार्थसार
सहेतरैः ।
सुस्वरं सुभगादेयं यशःकीर्तिः तथा तीर्थकरत्वं च नामप्रकृतयः स्मृताः ||३९||
अर्थ-चार गतियाँ, पाँच जातियाँ, पाँच शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात, समचतुरस्रसंस्थान, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान, स्वातिसंस्थान, कुञ्जकसंस्थान, वामनसंस्थान और हुण्डकसंस्थान के भेदसे छह प्रकारका संस्थान वज्रर्षभनाराच, वज्रनाराच, नाराच, अर्द्धनाराच कीलक और असंप्राप्तस्पाटिकाके भेदसे छह प्रकारका संहनन कर्कश, मृदु, लघु, गुरु, स्निग्ध, रूक्ष, शीत और उष्णके भेदसे आठ प्रकारका स्पर्श, मधुर, अम्ल, कटुक, तिक्त और कषायके भेदसे पाँच प्रकारका रस, शुक्ल आदि के भेदसे पाँच प्रकारका बर्णं सुगन्ध दुर्गन्ध के भेदसे दो प्रकारका गन्ध; नरकगत्यानुपूर्वी आदिके भेदसे चार प्रकारका आनुपूर्वी उपघात, परघात, अगुरुलघु, उच्छ्वास, आतप, उद्योत प्रशस्त विहायोगति, अप्रशस्त विहायोगति, प्रत्येक शरीर, साधारण शरीर, उस, स्थावर पर्याप्तक, अपर्याप्तक, बादर, सूक्ष्म, शुभ, अशुभ, स्थिर, अस्थिर, सुस्वर, दुःस्वर, सुभग, दुभंग, आदेय, अनादेय, यशः कीर्ति, अयशः कीर्ति और तीर्थंकरत्व ये नामकर्मको तेरानचे प्रकृतियाँ हैं ।
भावार्थ - इन प्रकृतियोंके लक्षण इस प्रकार है
गति - जिस कर्म के उदयसे जीव नरक, तिर्यञ्च मनुष्य या देव अवस्थाको प्राप्त होता है उसे गतिनामकर्म कहते हैं इसके नरकगति आदि चार भेद हैं ।
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जाति - जिस कर्म के उदयसे जीव एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पञ्चेन्द्रिय इन पाँच जातियों में उत्पन्न हो उसे जातिनामकर्म कहते हैं । इसके एकेन्द्रिय जाति आदि पांच भेद हैं ।
शरीर - जिस कर्म के उदयसे औदारिक, बेक्रियिक, आहारक, तेजस और कार्मण इन शरीरोंको रचनाके योग्य परमाणुओंकी प्राप्ति हो उसे शरीरनामकर्म कहते हैं इसके औदारिक शरीर आदि पाँच भेद हैं ।
अङ्गोपाङ्ग - जिस कर्मके उदयसे अङ्गों तथा उनके अवयवभूत उपाङ्गों की रचना हो उसे अङ्गोपाङ्गनामकर्म कहते हैं। इसके औदारिक शरीराङ्गोपाङ्ग, वैकिक शरीराङ्गोपाङ्गके भेदसे तीन भेद है । इनके लक्षण स्पष्ट हैं ।
निर्माण -- जिसके उदयसे अङ्गोपाङ्गोंकी रचना यथास्थान तथा यथाप्रमाण हो उसे निर्माणनामकर्म कहते हैं ।
बन्धन - जिस कर्मके उदयसे औदारिक आदि शरीरोके परमाणु परस्पर बन्धको प्राप्त हो उसे बन्धननामकर्म कहते हैं । इसके औदारिक बन्धन आदि पांच भेद है ।
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पञ्चमाधिकार संघात-जिस कर्मके उदयसे औदारिक आदि शरीरोंके परमाणु परस्पर छिद्र रहित सम्बन्धको प्राप्त हों उसे संघातनामकर्म कहते हैं। इसके औदारिक संघात आदि पाँच भेद हैं ।
संस्थान—जिसके उदयसे शरीरको आकृति विशेषकी रचना होती है उसे संस्थाननामकर्म कहते हैं इसके समचतुरस्र आदि छह भेद हैं । इनके लक्षण इस प्रकार है
समचतुरस्त्रसंस्थान—जिसके उदयसे शरीरकी आकृति सुडौल हो उसे समचतुरस्रसंस्थान कहते हैं।
न्यग्नोधपरिमण्डलसंस्थान-जिसके उदयसे शरीरकी आकृति न्यग्रोधबट बक्षके समान हो अर्थात नाभिनीनेका भाग छोटा और ऊपरका भाग बड़ा हो उसे न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान कहते हैं।
स्वातिसंस्थान-जिसके उदयसे शरीरकी आकृति स्वाति--साँपकी वामीके समान हो अर्थात् नाभिसे नीचेका भाग बड़ा और ऊपरका भाग छोटा हो उसे स्वातिसंस्थान कहते हैं। ___ कुब्जकसंस्थान-जिसके उदयसे शरीर कुबड़ा हो उसे कुब्जकसंस्थाननामकर्म कहते हैं।
वामनसंस्थान-जिस कर्मके उदयसे शरीर बौना हो उसे वामनसंस्थान कहते हैं। ___हुण्डकसंस्थान-जिस कर्मके उदयसे शरीरको रचना किसी निश्चित आकारकी नहीं होती उसे हुण्डकसंस्थाननामकर्म कहते हैं । ____ संहनन—जिस कर्मके उदयसे संहनन-हड्डियोंकी रचना होती है उसे संहनननामकर्म कहते हैं। इसके वर्षभनाराच आदि छह भेद हैं। इनके लक्षण इस प्रकार है
वज्रर्षभनाराचसंहनन-जिसके उदयसे घनके हाड, वनके वेष्टन और बज्रकी कोलें हों उसे वर्षभनाराचसंहनननामकर्म कहते हैं।
वनाराचसंहनन—जिसके उदयसे वज्रके हाड़ और बचको कीलें होती हैं परन्तु वेष्टन वज्रके नहीं होते उसे वज्रनाराचसंहनन कहते हैं।
नाराषसंहनन--जिस कर्मके उदयसे वनरहित वेष्टन और कीलोंसे सहित हाड़ हों उसे नाराचसंहनननामकर्म कहते हैं ! ____ अर्द्धनाराचसंहनन-जिस कर्मके उदयसे हाड़ोंकी संधियाँ आधी कोलित हों उसे अर्द्धनाराचसंहननकर्म कहते हैं । ___ कीलकसंहनन-जिस कर्मके उदयसे हाड़ परस्पर कीलित हों उसे कोलक संहनन कहते हैं।
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१५२
तत्त्वापार असंप्रामसपाटिकासंहनन-जिस कर्मके उदयसे हाड़ नसों से बँधे हों, कीलों से युक्त न हों उसे असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन कहते हैं। ___स्पर्श—जिसके उदयसे शरीरमें स्पर्शकी रचना हो उसे स्पर्शनामकर्म कहते हैं इसके कर्कश, मद्, लघु, गुरु, स्निग्य, रूक्ष, शीत और उष्ण ये आठ भेद हैं।
रस-जिसके उदयसे शरीरमें रसकी रचना हों उसे रसनामकर्म कहते हैं इसके मधर, अम्ल, कट, तिक्त और कषाय ये पांच भेद हैं।
वर्ण-जिसके उदयसे शरीरमें वर्णकी रचना हो उसे वर्णनामकर्म कहते हैं इसके शुक्ल, कृष्ण, नील, लाल और पोला ये पाँच भेद हैं ।
गन्ध-जिसको उदयसे शरीरमें गन्धकी रचना हो उसे गन्धनामकर्म कहते हैं इसके सुगन्ध और दुर्गन्ध थे दो भेद हैं। _____ आनुपूर्वी--जिसके उदयसे विग्रहगतिमें जीवके प्रदेशोंका आकार पूर्व शरीरके समान रहता है उसे आनुपूर्वीनामकर्म कहते हैं। इसके नरकगत्यानुपूर्वो, तिर्यम्गत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और देवगत्यानुपूर्वी ये चार भेद हैं।
उपधात-जिसके उदयसे अपना ही घात करनेवाले अङ्गोपाङ्गोंकी रचना हो उसे उपधातनामकर्म कहते हैं। ___ परघात–जिसके उदयसे दूसरोंका घात करनेवाले अङ्गोपाङ्गोंकी रचना हो उसे परघातनामकर्म कहते हैं । ___ अगुरुलघु–जिसके उदयसे ऐसे अङ्गोपाङ्ग हों जो न भारी हों और न लघु हों उसे अगुरुलघुनामकर्म कहते हैं।
उसछ्यास-जिस कर्मके उदय श्वासोच्छ्वास होता है उसे उच्छ्वासनामकर्म कहते हैं।
आतप-जिस कर्मके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसका मूल तो शीत रहे परन्तु प्रभा उष्ण हो उसे आतपनामकर्म कहते हैं ।
उद्योत--जिसके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसका मूल और प्रभा दोनों ही शीतल रहें उसे उद्योतनामकर्म कहते हैं।
विहायोगति-जिसके उदयसे आकाशमें गति हो उसे विहायोगतिनामकर्म कहते हैं, इसके प्रशस्तविहायोगति और अप्रशस्तविहायोगति ये दो भेद हैं।
प्रत्येकशरीर-जिसके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसका एक जीव ही स्वामी हो उसे प्रत्येकशरीरनामकर्म कहते हैं ।
साधारणशरीर-जिसके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसके अनेक जीव स्वामी हों उसे साधारणशरीरनामकर्म कहते हैं।
प्रस-जिसके उदयसे इस जीवका द्वीन्द्रियादि जीवोंमें जन्म होता है उसे असनामकर्म कहते हैं।
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पचमाधिकार
१५३
स्थावर - जिसके उदयसे एकेन्द्रिय जीवों में जन्म हो उसे स्थावर नामकर्म
कहते हैं ।
पर्याप्त - जिस कर्म के उदयसे आहार आदि पर्याप्तियोंकी पूर्णता होती है उसे पर्याप्त नामकर्म कहते हैं ।
अपर्याप्त-जिसके उदयसे एक भी पर्याप्त पूर्ण न हो उसे अपर्याप्त नामकर्म कहते हैं ।
बादर - जिसके उदयसे बादर – दूसरोंको रोकनेवाला तथा दूसरोंसे रुकने वाला शरीर प्राप्त हो उसे बादर नामकर्म कहते हैं ।
सूक्ष्म-जिसके उदयसे सूक्ष्म - दूसरोंको नहीं रोकनेवाला तथा दूसरोंसे नहीं रुकनेवाला शरीर प्राप्त हो उसे सूक्ष्म नामकर्म कहते हैं ।
शुभ --जिसके उदयसे शरीरके अवयव शुभ हों उसे शुभ नामकर्म कहते हैं । अशुभ -जिसके उदयसे शरीर के अवयब अशुभ हों उसे अशुभ नामकर्म कहते हैं ।
स्थिर-जिसके उदयसे शरीरको धातुएँ तथा उपधातुएं अपने-अपने स्थान पर स्थिर रहें उसे स्थिर नामकर्म कहते हैं ।
अस्थिर - जिसके उदयसे शरीरकी धातुएँ और उपधातुएं अपने-अपने स्थान पर स्थिर न रहें उसे अस्थिर नामकर्म कहते हैं ।
सुस्वर - जिसके उदयसे अच्छा स्वर प्राप्त हो उसे सुस्वर नामकर्म कहते हैं।
दुःस्वर-जिसके उदयसे अच्छा स्वर प्राप्त न हो उसे दुःस्वर नामकर्म कहते हैं ।
सुभग-जिसके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जो अन्य लोगोंको प्रीति उत्पन्न करनेवाला हो उसे सुभग नामकर्म कहते हैं ।
दुभंग-जिसके उदयसे ऐसा शरीर प्राप्त हो जो रूपादिगुणोंसे युक्त होनेपर भी दूसरोंके लिये प्रीति उत्पन्न करनेवाला न हो उसे दुभंग नामकर्म कहते हैं ।
आवेब---जिसके उदयसे शरीर एक विशिष्ट प्रकारकी प्रभासे सहित हो उसे आदेय नामकर्म कहते हैं ।
अनादेय-जिसके उदयसे शरीर विशिष्ट प्रभासे सहित न हो उसे अनादेय नामकर्म कहते हैं ।
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१५४
तस्वार्थसार __यश.कोति-जिसके उदयसे यशकी प्राप्ति हो उसे यशःकोति नामकर्म कहते हैं ।
अयशःकोलि-जिसके उदयसे अपयशकी प्राप्ति हो उसे अयशःकीति नामकर्म कहते हैं !
तीर्थकरत्व-जिसके उदयने अपहन्त अवस्थाको प्राप्ति होकर अष्ट प्रातिहार्यादि विभूति प्राप्त होती है उसे तीर्थकरत्व नामकर्म कहते हैं ॥३१-३९।।
गोत्रकमको दो प्रकृतियाँ गोत्रकर्म द्विधा ज्ञेयमुच्चनीचविभेदतः। अर्थ---उच्च और नीचके भेदसे गोत्रकर्म दो प्रकारका जानना चाहिये।
भावार्थ-जिसके उदयसे लोकमान्य एवं मोक्षमार्ग प्रचलनके योग्य कुलमें जन्म हो उसे उच्चगोत्र कर्म कहते हैं और जिसके उदयसे लोकनिन्द्य एवं मोक्षमार्ग प्रचलनके अयोग्य कुलमें जन्म हो उसे नौयगोत्र कर्म कहते हैं ।
____ अन्तरायकर्मके पाँच भेद स्यादानलाभवीर्याणां परिभोगोपभोगयोः ॥४०॥
अन्तरायस्य वैचित्र्यादन्तरायोऽपि पञ्चधा । अर्थ-दान, लाभ, वीर्य, परिभोग और उपभोग सम्बन्धी अन्तरायकी विचित्रतासे अन्तरायकर्म भी पांच प्रकारका होता है।
भावार्थ-जो दान में बाधा डाले उसे चानान्तराय, जो लाभमें बाधा डाले उसे लाभान्तराय, जो वीर्य में बाधा डाले उसे बीर्यान्तराय, जो परिभोग । उपभोग ) में बाधा डाले उसे परिभोगान्तराय और जो उपभोग ( भोग ) में बाधा डाले उसे उपभोगान्तराय कहते हैं। जो वस्तु एक बार भोगने में आती है उसे उपभोग तथा जो वस्तु बार-बार भोगने में आती है उसे परिभोग कहते हैं। लोकमें उपभोगके लिये भोग और परिभोगके लिये उपभोग शब्द प्रचलित हैं। पर तत्त्वार्थसूत्रकार उमास्वामीने इनके लिये उपभोग और परिभोग शब्दोंका प्रयोग किया है तदनुसार इस ग्रन्थमें भी उन्हीं शब्दोंका प्रयोग हुआ है ॥४०॥
बन्ध योग्य प्रकृतियाँ द्वे त्यक्त्वा मोहनीयस्थ नाम्नः पविशतिस्तथा ॥४१॥ सर्वेषां कर्मणां शेषा बन्धप्रकृतयः स्मृताः । अबन्धा मिश्रसम्यक्त्वे बन्धसंघातयोदंश ॥४२॥
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पचमाधिकार
स्वर्थे सप्त तथैका च गन्धेऽष्टौ रसवर्णयोः ।
अर्थ -- मोहनीयको दो और नामकर्मकी छब्बीस प्रकृतियोंको छोड़कर समस्त कर्मो की शेष प्रकृतियां बन्धके योग्य मानी गई हैं। मोहनीयकी सम्यङ् मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति तथा नामकर्मको बन्धन और संघात सम्बन्धी दश एवं स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण सम्बन्धी सोलह इस तरह छब्बीस प्रकृतियाँ अबन्धप्रकृतियाँ कही गई हैं ।
भावार्थ- दर्शनीय मोहनीयकर्मके तीन भेदोंमें मात्र मिथ्यात्वका बन्ध होता है । पीछे सम्यग्दर्शन होनेपर उसके प्रभावसे उसके तीन खण्ड हो जाते हैं१ मिध्यात्व २ सम्यग्मिथ्यात्व और ३ सम्यक्त्व प्रकृति । नामकर्ममें पांच बन्धन और पाँच संचात इन दश प्रकृतियों का पांच शरीरमें हो अन्तभाव हो जाता है। और स्पर्शादिककी बीस प्रकृतियोंको बन्ध तथा उदयके प्रकरणमें भेदरूप न लेकर अभेदरूप लिया जाता है इसलिये सोलह प्रकृतियाँ इनकी कम हो जाती हैं, इस तरह सब मिलाकर नामकर्मकी छन्नीस प्रकृतियाँ अबन्धरूप हैं। एक्सी अड़तालीस प्रकृतियोंमें अभेद विवक्षा में सामान्यरूपसे एक सौ बीस प्रकृतियां बन्धके योग्य और अट्ठाईस प्रकृतियाँ अबन्धके योग्य मानी गई हैं। उदयकी अपेक्षा एक सौ बाईस प्रकृतियाँ उदयके योग्य और लध्बोस प्रकृतियाँ उदयके अयोग्य मानी गई हैं। सत्त्वका वर्णन आचार्योंने भेदविवक्षासे ही किया है । इसलिये सभी प्रकृतियाँ सत्त्वके योग्य हैं असत्त्वके योग्य कोई भी प्रकृति नहीं है ।। ४१-४२ ॥ कर्मोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध
वेद्यान्तराययोर्ज्ञानदृगावरणयोस्तथा ||४३||
कोटी कोटयः स्मृतास्त्रित्सागराणां परा स्थितिः । मोहस्य सप्ततिस्ताः स्युविंशतिर्नामगोत्रयोः ॥ ४४ ॥ आयुषस्तु त्रयस्त्रिंशत्सागराणां परा स्थितिः ।
१५५
अर्थ -- वेदनीय, अन्तराय, ज्ञानावरण और दर्शनावरणकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ा - कोड़ी सागर, मोहनीयकी सत्तर कोड़ा कोड़ी सागर, नाम और गोत्रकी बीस कोड़ा कोड़ी सागर तथा आयुकी तेतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।। ४३-४४ ॥ कर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध
मुहूर्ता द्वादश ज्ञेया वेद्येऽष्टौ नामगोत्र योः ॥ ४५ ॥ स्थितिरन्तर्मुहूर्तस्तु
जघन्या
शेषकर्मसु ।
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१५६
तत्वार्थसार
अर्थ - वेदनीयको बारह मुहूर्त, नाम और गोत्रकी आठ मुहूर्त तथा शेष समस्त कर्मों की अन्तर्मुहूर्त जघन्यस्थिति है ।
भावार्थ — ऊपर मूल प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बताया गया है । परन्तु उत्तर प्रकृतियोक स्थितिबन्धमें विशेषता है जो कि इस प्रकार है—असाता वेदनीय एक और ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तरायकी उन्नीस सब मिलकर बोस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तीस कोड़ा कोड़ी सागरका है । सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति, और मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन चार प्रकृतियोंका पन्द्रह कोड़ा कीड़ी सागर, दर्शनमोहनीयके भेदरूप मिथ्यात्व प्रकृतिका सत्तर कोड़ा कोड़ी सागर और चारित्रमोहनीयके भेदरूप सोलह कषायोंका चालीस कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है । हुण्डक संस्थान और असंप्राप्त पाटिका संहननका बीस कोड़ाकोड़ो सागर, वामनसंस्थान और कीलित संहननका अठारह कोड़ाकोड़ी सागर, कुब्जसंस्थान और सोल्ह कोड़ाकोड़ीसागर, स्वातिसंस्थान और नाराच संहननका चौदह कोड़ाकोड़ी सागर, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराच संहननका बारह कोड़ाकोड़ी सागर तथा समचतुरस्रसंस्थान और वज्रर्षभनाराच संहननका दश कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति और सूक्ष्म, अपर्याप्त तथा साधारण इन छह प्रकृतियोंका अठारह कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है । अरति, शोक, नपुंसक वेद तथा तियंञ्च, भय, नरक, तेजस और औदारिक इन पाँचका जोड़ा, वैक्रियिक और आतप इन दोका जोड़ा, नीचगोत्र तथा श्रसवर्ण और अगुरुलघु इन तीनकी चौकड़ी, एकेन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय, स्थावर, निर्माण, अप्रशस्त विहायोगति, और अस्थिर आदि छह इन इकतालीस प्रकृतियोंका बीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है । हास्य, रति, उच्चगोत्र, पुरुषवेद, स्थिर आदिक छह प्रशस्त विहायोगति और देवगति देवयानुपूर्वी इन तेरह प्रकृतियोंका दश कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है | आहारक शरीर, आहारक शरीराङ्गोपाङ्ग और तीर्थंकर प्रकृति इन तीनों का अन्तः कोड़ाकोड़ी अर्थात् कोड़िसे ऊपर और कोड़ाकोड़ीसे नीचे सागरप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बन्ध है । देवायु और नरकायुका तेत्तीससागर, मनुष्यायु तथा नियंगायुका तीन पल्य प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बन्ध है। किस जीवके कितनी स्थितिका बन्ध होता है आदि विषय गोम्मटसारादि ग्रन्थोंसे जानना चाहिये ।। ४५ ।।
अनुभवबन्धका लक्षण
विपाकः प्रागुपात्तानां यः शुभाशुभकर्मणाम् ॥४६॥
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पञ्चमाधिकार
१५७
असावनुभयो शेयो यथानाम भषेप सः । अर्थ—पहले कहे हुए शुभ अशुभ कर्मोंका जो विपाक है उसे अनुभव या अनुभाग जानना चाहिये । जिस कर्मका जैसा नाम है उसका वैसा ही अनुभव होता है।
भावार्थ-पिछली गाथाओंमें कर्मों की स्थिति बतलाई गई है । स्थितिबन्धके अनुरूप आबाधा' भी उसी समय पड़ती है। आयुकर्मको छोड़कर शेष सात कर्मोंकी आबाधाका सामान्य नियम यह है कि एक कोडाकोड़ी सागरकी स्थितिपर सौ वर्षकी आबाधा पड़ती है। सब कर्मोंकी जघन्य स्थितियोंपर उससे संख्यातगुणो कम आबाधा होती है। आयुकर्मकी आबाधा कोटिवर्ष पूर्वके तृतीय भागसे लेकर असंक्षेपाडा अर्थात् जिससे थोड़ा काल कोई न हो ऐसे आवलोके असंख्यातवें भाग प्रमाण तक है । उदीरणाकी अपेक्षा सात कर्मोंकी आबाधा एक आवलीमात्र है आयुकर्ममें परभवसम्बन्धी आयुको उदीरणा नियमसे नहीं होती। जिस कर्मको जितनी स्थिति है उसमेंसे आबाथाकालको घटा देनेपर जो समय बचता है उसमें निषेक रचनाके अनुसार कर्मप्रदेशोंका खिरना शुरू होता है। प्रथम निषेकमें सबसे अधिक कर्मप्रदेश खिरते हैं फिर आगे-आगे उनकी संख्या गुणहानिके अनुसार कम-कम होती जाती है। इस तरह फल देते हुए पुराने कर्म क्रम-क्रमसे खिरते जाते हैं और नये-नये कर्मोंका बन्ध होता जाता है । यह क्रम अनादिकालसे चला आरहा है। प्रत्येक समय, समयप्रबद्ध प्रमाण-सिद्धोंके अनन्तवें भाग और अभव्य राशिसे अनन्तगुणे कर्मपरमाणु आत्माके साथ बन्धको प्राप्त होते हैं और इतने ही कर्मपरमाणुओंकी प्रत्येक समय निर्जरा होती है फिर भी डेढ़ गुणहानि प्रमाण कर्मपरमाणुओंकी सत्ता विद्यमान रहती है। ज्ञानावरणादि कौका जैसा नाम है वैसा ही उनके उदयमें फल प्राप्त होता है। यह जीव अपने कषायरूप परिणामोंकी जिस तीव्र, मध्यम या मन्द अवस्थामें जैसा तीव्र, मध्यम या मन्द अनुभाग बन्ध करता है उसीके अनुसार उसे फल प्राप्त होता है । सातावेदनीय आदि पुण्यप्रकृतियों का अनुभागबन्ध विशुद्ध परिणामोंसे उत्कृष्ट होता है तथा असातावेदनीय आदि अशुभप्रकृतियोंका अनुभागबन्ध संक्लेशरूप परिणामोंसे उत्कृष्ट होता है और विपरीत परिणामोंसे जघन्य अनुभागबन्ध होता है। घातियाकर्मोकी अनुभागशक्तिको लता, दारु, अस्थि और शिलाकी उपमा देकर, अधातियाकर्मों में पुण्यप्रकृतियोंकी अनुभागशक्तिको गुड़, खाँड़, शर्करा और अमृतकी उपमा देकर, पापप्रकृतियोंकी अनुभागशक्तिको निम्ब, कांजरि, बिष और १. कर्मरूप होकर आया हुआ द्रव्य जब तक उदय या उदोरणाके रूपमें नहीं आता
तब तकके. कालको आवाधा कहते हैं ।
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१५८
तत्वार्थसार
हलाहलको उपमा देकर चार भागोंमें विभक्त किया नाया है ।। ४६ ।।
प्रदेशबन्धका स्वरूप घनाङ्गुलस्यासंख्येयभागक्षेत्रावगाहिनः ॥४७॥ एकद्विन्यायसंख्येय समयस्थितिकांस्तथा । उष्णरूक्षहिमस्निग्धान्सर्ववर्णरसान्वितान् ॥४८॥ सर्वकर्मप्रकृत्यान् सर्वेष्वपि भवेषु यत् । द्विविधान् पुद्गलस्कन्धान सूक्ष्मान् योगविशेषतः ।।४९।। सर्वेष्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशकान् ।
आत्मसारकुरुते जीवः स प्रदेशोऽभिधीयते ॥५०॥ अर्थ-जो धनाङ्गलके असंख्यातवें भागप्रमाण एक क्षेत्रमें स्थित हैं, जिनकी एक, दो, तीन आदि असंख्यात समयोंकी स्थिति है, जो उष्ण, रूक्ष, शीत और स्निग्ध स्पर्शसे सहित हैं, समस्त वर्गों और समस्त रसोंसे सहित हैं, समस्त कर्मप्रकृतियोंके योग्य है, पुण्य और पापके भेदसे दो प्रकारके हैं, सूक्ष्म हैं, समस्त भवोंमें जिनका बन्ध होता है तथा जो समस्त आत्मप्रदेशोंमें अनन्तानन्तप्रदेशोंको लिये हुए हैं ऐसे पुद्गलस्कन्धोंको-कार्मणवर्गणाके परमाणुसमूहको यह जीव जो अपने आधीन करता है वह प्रदेशबन्ध कहलाता है ॥ ४७-५० ।।
कर्मोमें पुण्य और पापकर्मका भेव शुभाशुभोपयोगात्यनिमित्तो द्विविधस्तथा ।
पुण्यपापतया द्वधा सर्व कर्म अभिद्यते ॥५१॥ अर्थ-शुभोपयोग और अशुभोपयोगके भेदसे निमित्त दो प्रकारका है। इसलिये निमित्तकी द्विविधतासे समस्त कर्म पुण्य और पापके भेदसे दो भेदोंमें विभक्त हो जाते हैं।
भावार्थ-शुभोपयोगरूप निमित्तसे जो कर्म बंधते हैं वे पुण्यकर्म तथा अशुभोपयोगरूप निमित्तसे जो कर्म बंधते हैं वे पापकर्म कहलाते हैं। इस प्रकार निमित्तकी अपेक्षा कर्मोके दो भेद हैं ।। ५१ ॥
पुण्यकर्म कौन कौन हैं ? उचैर्गोत्रं शुभाषि सद्वेद्यं शुभनाम च । द्विचत्वारिंशदित्येवं पुण्यप्रकृतयः स्मृताः ।।५२॥
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पश्चमाधिकार अर्थ-उच्चगोत्र, शुभआयु, सातावेदनीय और शुभनामकर्म इस तरह व्यालीस पुण्यप्रकृतियां मानी गई हैं।
भावार्थ--साताबेदनीय, मरकायुको छोड़कर तीन शुभआयु, उच्चगोत्र, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, पञ्चेन्द्रिय जाति, औदारिकादि पांच शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात, तीन अङ्गोपाङ्ग, वर्णादिक चारके बोस, समचतुरस्रसंस्थान, वचर्षभनाराचसंहनन, उपघातको छोड़कर अगुरुलघु आदि छह ( अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत ), प्रशस्तविहायोगति और अस आदि बारह ( अस, वादर, पर्याप्तक, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीति, निर्माण, तीर्थंकर ) ये अड़सठ मेदविवक्षामें और ब्यालीस अभेदविवक्षामें पुण्यप्रकृति कहलाती हैं ।। ५२ ॥
पापप्रकृतियों कौन कौन हैं ? नीचैर्गोत्रमसद्वेद्यं श्वभ्रायुनाम चाशुभम् ।
द्वथशीतिर्धातिभिः सार्धं पापप्रकृतयः स्मृताः ॥५३॥ अर्थ-नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, अशुभनाम तथा घातियाकर्मोंकी सैंतालीस प्रकृतियाँ सब मिलाकर ब्यालीस पापप्रकृतियाँ मानी गई हैं । ___ भावार्थ-घातियाकर्मोंकी सैंतालीस प्रकृतियों ( ५ +९+ २८ + ५ - ४७ ), नीचगोत्र, असातावेदनोय, नरकायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादिक चार जातियाँ, समचतुरस्रको छोड़कर पाँच. संस्थान, बज्रर्षभनाराचसंहननको छोड़कर पाँच संहनन, अशुभवर्ण, रस, गन्ध
और स्पर्शके बीस ( अभेदविपक्षामें चार ) उपघात, अप्रशस्त बिहायोगति और स्थावरादिक दश ( स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशःकीर्ति ) इसप्रकार ये बन्धकी अपेक्षा भेदविवक्षामें अंठानवे और अभेदविवक्षामें व्यासी तथा उदयकी अपेक्षा भेदविवक्षामें सौ और अभेदविवक्षामें चौरासी पापप्रकृतियाँ हैं। वर्णादिककी बीस प्रकृतियाँ पुण्य और पाप दोनों में सम्मिलित होती हैं क्योंकि एक ही वर्णादि किसीके लिये शुभरूप और किसीके लिये अशुभरूप होते हैं ॥ ५३ ॥
बन्धतश्वका उपसंहार इत्येतद्वन्धतत्त्वं यः श्रद्धत्ते वेन्युपेक्षते । शेषतत्वैः समं पड्मिः स हि निर्वाणभाग्भवेत् ।।५४॥
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तत्वार्थसार
अर्थ - इसप्रकार शेष छह तत्त्वोंके साथ जो बन्धतत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जानता है और उसकी उपेक्षा करता है अर्थात् उसके प्रति रागद्वेषका त्याग करता है वह निर्वाणको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रोअमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित तवार्थसारमें बतत्वका वर्णन करनेवाला पञ्चम अधिकार पूर्ण हुआ ।
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षष्ठअधिकार (संवरतच्च वर्णन )
मङ्गलाचरण अनन्तकेवलज्योतिःप्रकाशितजगत्त्रयान् ।
प्रणिपत्य जिनान्मृधर्ना संवरः संप्रचक्ष्यते ॥ १ ॥ अर्थ अनन्तकेवलज्ञानरूपी ज्योत्तिके द्वारा जिन्होंने तीनों लोकोंको प्रकाशित किया है ऐसे जिनेन्द्र भगवालको शिस गुमान कर सर सस्पका निरूपण किया जाता है ॥ १ ॥
संवरका लक्षण यथोक्तानां हि हेतूनामात्मनः सति सम्भवे ।
आस्रवस्य निरोधोयः स जिनः संवरः स्मृतः ॥ २ ॥ अर्थ – संवरके जो हेतु कहे गये हैं उनके संभव होनेपर आत्मामें जो आस्त्रव का निरोध होता है वह जिनेन्द्र भगवान के द्वारा संवर माना गया है ॥ २॥
संवरके हेतु गुप्तिः समितयो धर्मः परीषहजयस्तयः ।
अनुप्रेक्षाश्च चारित्रं सन्ति संवरहेतवः ।। ३ ।। अर्थ—गुप्ति, समिति, धर्म, परीषहजय, तप, अनुप्रेक्षा और चारित्र ये संवरके हेतु हैं ॥ ३ ॥
गुमिका लक्षण योगानां निग्रहः सम्यग्गुप्तिरित्यभिधीयते ।
मनोगुप्तिर्वचोगुप्तिः कायगुप्तिश्च सा विधा ।। ४ ।। अर्थ—योगोंका अच्छी तरह निग्रह करना गुप्ति कहलाता है। वह गुति मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्तिके भेदसे तीन प्रकारको है ।। ४ ।।
गुप्तिसे शीघ्र ही संघर होता है तत्र प्रवर्तमानस्य योगानां निग्रहे सति । तनिमित्तात्रवाभावात्सयो भवति संवरः ॥५॥
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१६२
तत्वार्यसार अर्थ-गुप्तिमें प्रवृत्ति करनेवाले मुनिके योगोंका निग्रह हो जाता है, इसलिये योगनिमित्तक आस्लवका अभाव होनेस शीघ्र ही संवर होता है ।। ५ ॥
समितियों के नाम ईर्याभाषणादाननिक्षेपोत्सर्गभेदतः ।
पश्च गुप्तावशशक्तस्य साधोः समितयः स्मृताः ॥६॥ अर्थ-जो साधु गुप्तियोंके धारण करनेमें असमर्थ है उसके ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण और उत्सर्गके भेदसे पाँच समितियाँ मानी गई हैं ॥६॥
ईर्यासमितिका लक्षण मागोंधोतोययोगानामालम्ब्यस्य च शुद्धिभिः ।
गच्छतः सूत्रमार्गेण स्मृतेयां समितियतेः ॥ ७ ॥ अर्थ—मार्ग, प्रकाश, उपयोग तथा उद्देश्यकी शुद्धिपूर्वक आगमोक्त विधिसे गमन करनेवाले मुनिके ईर्यासमिति मानी गई है ।
भावार्थ-तीर्थवन्दना तथा सद्गुरुके उपदेश श्रवण आदिके उद्देश्यसे मुनिका गमन होता है वह भी उस मार्गमें होता है जो सूक्ष्म तथा स्थूल जीवोंसे रहित हो तथा सुर्यके प्रकाशसे अच्छी तरह प्रकाशित हो । चलते समय मुनिका उपयोग मार्गके अवलोकनमें स्थिर होना चाहिये, क्योंकि अन्यमनस्क होकर चलने में जीवरक्षामें प्रमादका होना संभव है। आगममें मुनिको चलते समय चार हाथ प्रमाण भूमि देखकर चलनेकी आज्ञा है। इसी विधिसे जो चल रहा है ऐसे मुनिके ईर्यासमिति होती है ।। ७ ।।
भाषासमितिका लक्षण व्यलीकादिविनिर्मुक्तं सत्यासत्यामृषाद्वयम् ।
बदतः सूत्रमार्गण भाषासमितिरिष्यते ॥ ८ ॥ अर्थ-जो मुनि असत्यादिसे रहित, सत्य तथा अनुभव वचनोंको आगमके कहे अनुसार बोलता है उसके भाषासमिति मानी जाती है ।
भावार्थ-सत्य, असत्य, उभय और अनुभयके भेदसे वचनके चार भेद हैं । इनमें असत्य और उभयवचन मुनिके लिये त्याज्य हैं, शेष दो बचन ग्राह्य हैं। इन दो प्रकारके वचनोंको भी जो आगमके अनुसार अर्थात् हित, मित और प्रिय रूपसे बोलना है उसके भाषासमिति होती है ॥ ८॥
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षष्ठाधिकार
१६३
एषणासमितिका लक्षण पिण्डं तथोपथिं शय्यामुद्गमोत्पादनादिना।
साधोः शोधयतः शुद्धा घेषणा समितिभवेत् ॥ ९ ॥ अर्थ-जो उद्गम तथा उत्पादन आदि दोषोंका बचाव करते हुए भोजन, पोछी, कमण्डलु आदि उपकरण और शय्याको शुद्धि रखते हैं ऐसे मुनिके निर्दोष एषणासमिति होती है ॥ ९ ॥
___ आदाननिक्षेपणसमितिका लक्षण सहसादृष्टदुप॑ष्टाप्रत्यवेक्षणदूषणम् ।
त्यजतः समितियादाननिक्षेपगोचरा ॥१०॥ अर्थ–सहसादृष्ट–जल्दो देखना, दुर्मष्ट-बुरी तरह परिमार्जन करना और अनत्यवेक्षण-- देवना ही नहीं। इस दोधाला त्या करनेवाले मुनिके आदाननिक्षेपणसमितिका जानना चाहिये ॥१०॥
उत्सर्गसमितिका लक्षण समितिदर्शितानेन प्रतिष्ठापनगोचरा ।
त्याज्यं मूत्रादिकं द्रव्यं स्थण्डिले त्यजतो यतेः ॥११॥ अर्थ-इसी विधिसे अर्थात् सहसादष्ट, दुर्मष्ट और अप्रत्यवेक्षण दोषोंको बचाते हुए प्रासुक भूमिपर छोड़ने योग्य मूत्र आदि पदार्थोंको छोड़नेवाले साधुके प्रतिष्ठापन अथवा उत्सर्गसमिति दिखलाई गई है ॥ ११ ॥
समितिका फल इत्थं प्रवर्तमानस्य न कर्माण्यावन्ति हि ।
असंयमनिमित्तानि ततो भवति संवरः ॥१२॥ __ अर्थ--इस तरह समितिपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले मुनिके असंयमके निमित्तसे आनेवाले कर्मोका आस्रव नहीं होता, अतः उनका संवर हो जाता है ।। १२॥
वश धोके नाम क्षमा मृघृजुते शौचं ससत्यं संयमस्तपः ।
त्यागोऽकिञ्चनता ब्रह्म धर्मो दशविधः स्मृतः ॥१३।। अर्थ-क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याम, आकिञ्चनता और ब्रह्मचर्य यह दश प्रकारका धर्म माना गया है ।। १३ ।।
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१६४
तत्त्वार्थसार
क्षमा धर्मका लक्षण क्रोधोत्पत्तिनिमित्तानामत्यन्तं सति संभवे |
आक्रोशताडनादीनां कालुष्योपरमः क्षमा ॥१४॥ अर्भ-गाली देना तथा मारना आदिक क्रोधकी उत्पत्तिके बहुत भारी निमित्तोंके रहते हुए भी कलुषताका अभाव होना क्षमा है।
भावार्थ-क्रोधोत्पत्तिके निमित्त मिलनेपर भी हृदयमें क्रोधका उत्पन्न नहीं होना सो क्षमा धर्म है ॥ १४ ॥
मार्दव धर्मका लक्षण अभावो योऽभिमानस्य परैः परिभवे कृते ।
जात्यादीनामनातेशान्मदानां मादेवं हि हद ॥१५॥ अर्थ-दूसरोंके द्वारा अनादर किये जानेपर भी जाति आदिक मदोंका आवेश न होनेसे जो अभिमानका भाव है वह मार्दव धर्म है।
भावार्थ-ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर इन आठ वस्तुओंका अहंकार मनुष्यको हुआ करता है । जब किसी अन्यके द्वारा तिरस्कार होता है तब वह अहंकार स्पष्टरूप में दिखाई देने लगता है | जब ऐसी स्थिति हो जाने कि दूसरों के द्वारा तिरस्कार किये जानेपर भी ज्ञान आदिका अहंकार प्रकट न हो तब मार्दवधर्म होता है। संक्षेपमें मानकषायके अभावसे आत्मामें नम्रता आती है वही मार्दव धर्म कहलाती है ।। १५ ॥
आजवधर्मका लक्षण वाङ्मनःकाययोगानामवक्रत्वं तदार्जवम् । अर्थ-वचन, मन और काय योगोंको जो अवक्रता है वह आर्जव धर्म है ।
भावार्थ-मन, वचन और काय इन तीन योगोंको सरलताका होना अर्थात् मनसे जिस बातका विचार किया जावे वही वचनसे कही जावे तथा बचनसे जो कही जावे उसीका कायसे आचरण किया जावे, आर्जव धर्म है । मायाकषायका अभाव होनेपर हो इसकी प्राप्ति होती है।
शौचधर्मका लक्षण परिभोगोपभोगत्वं जीवितेन्द्रिय भेदतः ॥१६॥
चतुर्विधस्य लोभस्य निवृत्तिः शौचमुच्यते । अर्थ-प्राणीसम्बन्धी परिभोग और उपभोग तथा इन्द्रियसम्बन्धी परिभोग
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षष्ठाधिकार
१६५
और उपभोगके मेदसे लोभ चार प्रकारका होता है उसका अभाव होना शौच धर्म कहलाता है ॥ १६ ॥
सत्यधर्मका लक्षण शानचारित्रशिक्षादौ स धर्मः सुनिगद्यते । धर्मोपबृंहणार्थं यत्साधु सत्यं तदुच्यते ॥१७॥
(षट्पदम् ) अर्थ-ज्ञान और चारित्रकी शिक्षा आदिके विषयमें धर्मवृद्धिके अभिप्रायसे जो निर्दोष वचन कहे जाते हैं वह सत्यधर्म कहलाता है ॥ १७ ।।
संयमधर्मका लक्षण इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं प्राणिनां वघवर्जनम् ।
समिती वर्तमानस्य मुनेर्भवति संयमः ॥१८॥ अर्थ समितियोंका पालन करनेवाले मुनिका इन्द्रियविषयोंमें विरक्त होना तथा जीवोंके वधका त्याग करना संयमधर्म है।
भावार्थ-प्राणिसंयम और इन्द्रियसंयमकी अपेक्षा संयमके दो भेद हैं। छह कायके जीवोंका घात नहीं करना प्राणिसंयम है और पांच इन्द्रियों तथा मनके विषयोसे विरक्त होना इन्द्रियसंयम है । यह संयम समितियोंका पालन करनेवाले मुनिके होता है ॥ १८ ॥
तपधर्मका लक्षण परं कर्मक्षयार्थ यत्तप्यते तत्तपः स्मृतम् । अर्थ-कर्मोका क्षय करनेके लिये जो तपा जावे वह तप कहलाता है।
त्यागधर्मका लक्षण त्यागस्तु धर्मशास्त्रादिविश्राणनमुदाहृतम् ॥१९|| अर्थ-धर्मशास्त्र आदिका देना त्यागधर्म कहा गया है ॥ १९ ॥
आकिञ्चन्यधर्मका लक्षण ममेदमित्युपात्तेषु शरीरादिषु केषुचित ।
अभिसन्धिनित्तिर्या तदाकिश्चन्यमुच्यते ॥२०॥ अर्थ-ग्रहण किये हुए शरीर आदि किन्हीं पदार्थोंमें 'यह मेरा है। इस प्रकारके अभिप्रायका जो अभाव है वह आकिञ्चन्यधर्म कहलाता है।
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तत्त्वार्थसार
भावार्थ-मुनियोंके पास शरीर तथा पीछी, कमण्डलु और शास्त्ररूप उपकरण ही रहते हैं सो इनमें भी ममत्वभावका अभाव होना आकिञ्चन्य धर्मं हे ॥ २० ॥
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ब्रह्मचर्य धर्मका लक्षण
स्त्री संसक्तस्य
शय्यादेरनुभृताङ्गनास्मृतेः । तत्कथायाः श्रुतेश्च स्याद्ब्रह्मचर्यं हि वर्जनात् ||२१||
अर्थ — स्त्री से सम्बन्ध रखनेवाले शय्या आदिक पदार्थ, पूर्वकालमें भोगो हुई स्त्रीका स्मरण तथा स्त्रीसन्बन्धी कथाका सुनना इनके त्याग करनेसे ब्रह्मचर्य - धर्म होता है।
भाषार्थ — ब्रह्मचयं धर्मका निर्दोष पालन करनेके लिये ऐसे आसन आदिपर नहीं बैठना चाहिये जिसपर स्त्री बैठी हो, नुन स्त्रीका स्मरण नहीं करना चाहिये तथा स्त्रीसम्बन्धी कथा वार्ताको भी नहीं सुनना चाहिये ॥ २१ ॥ धर्मसे संवरकी सिद्धि
इति प्रवर्तमानस्य धर्मे भवति तद्विपक्षनिमित्तस्य कर्मणो नाखवे
संचरः ।
सति ||२२||
अर्थ - इस प्रकार धर्म में प्रवृति करनेवाले मुनिके अधर्म निमित्तक कर्मोंका आस्रव रुक जाता है इसलिये संबर होता है || २२ ॥
बाईस परिषहोंके नाम
क्षुत्पिपासा च शीतोष्णदंश मत्कुणनग्नते । अरतिः स्त्री च चर्या च निषद्या शयनं तथा ||२३|| आक्रोशश्च वधश्चैव याचनालाभयोर्द्वयम् । रोगश्च तृणसंस्पर्शस्तथा च मलधारणम् ॥ २४ ॥ असत्कार पुरस्कारं प्रज्ञाज्ञानमदर्शनम् । इति द्वाविंशतिः सम्यक सोढव्याः स्युः परीषदाः ||२५||
अर्थ-- क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमत्कुष्ण, नग्नता, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शयन, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्धा, मलधारण, असत्कार-पुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन ये बाईस परिवह अच्छी तरह सहन करने योग्य हैं ।
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বালিকা भावार्थ-गृहीत मार्गसे च्युत न हों तथा कमौकी निर्जरा हो इस उद्देश्यसे परिषह सहन किये जाते हैं। इन परिषहोम कितनी हो प्राकृतिक बाधाएँ हैं और कितनी ही दूसरोंके द्वारा की हुई हैं। समताभावसे इनका सहन करना चाहिये । संक्षेपसे इनका स्वरूप इस प्रकार है
१ क्षुधापरिषह जय-धुद्धिपूर्वक उपवास करने तथा अन्तराय आदिके कारण आहार न मिलने पर क्षुधाकी बाधा उत्पन्न हो रही है फिर भी आत्मस्वरूपके ध्यानमें लीन होनेसे उस ओर जिनका लक्ष्य नहीं जाता ऐसे मुनिके क्षुधाकी बाधा जीतना क्षुधापरिषहजय है।
२तषापरिषह जय-अन्तरङ्गमें पित्त आदि दोषोंका प्रकोप तथा बहिरङ्गमें प्रतिकूल आहारके मिलनेसे तृषाकी बाधा उत्पन्न होनेपर भी जो धैर्यरूपी शीतल जलके द्वारा उस तृषाकी बाधाको सहन करते हैं ऐसे मुनिके तृषाकी बाधाको सहन करना तृषापरीषह जय है।
३ शीतपरिषह जय-हाड़ोंको कम्पित करनेवाली शीतको तीव्र बाधाको समताभावसे सहन करना शीतपरिषह जय है।
४ उष्णपरिषह जय-गर्मीके तीव्र दुःखको समताभावसे सहन करना उष्णपरिपह जय है।
५ दंशमत्कुण परिषह जय-डांस तथा खटमल आदिके काटनेकी बाधाको सहन करना दंशमत्वृण परीषह जय है । कहीं पर इस परीषहको दंशमशक परिषह भी कहा है।
६ नग्नतापरिषह जय-नग्न रहते हुए भी बालकोंके समान किसी विकार भावका अनुभव नहीं करना नग्नतापरिषह जय है।
७ अरतिपरिषह जय-अनिष्ट पदार्थोका संयोग होनेपर भी अप्रीतिका अनुभव नहीं करना अरतिपरिषह जय है।
८ स्त्रोपरीषह जय-स्त्रियोंके द्वारा अनेक प्रकारका हावभाव आदिके दिस्खलाने पर भी अपने मनमें किसी प्रकारके विकारका अनुभव नहीं करना स्त्रीपरीषह जय है।
९ पर्यापरीषह जय-पैदल चलनेका दुःख सहना चर्यापरिषह जय है ।
१० निषद्यापरिषह जय-बहुत समय तक एक ही आसनसे बैठनेका दुःख सहन करना निषद्यापरिषह जय है।
११ शय्यापरिषह जय-कैंकरोली पथरीली जमीनमें शयन करते हुए अन्तर्मुहूर्तव्यापिनी निद्राका अनुभव करना शय्यापरिषह जय है।
१२ आक्रोशपरिषह जय--दुर्जनोंके द्वारा कुवचन कहे जानेपर भी दुःखका अनुभव नहीं करना आकोशपरिषह जय है।
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રેટ
तत्वार्थसार
१३ वत्रपरिषह जय - दुर्जनोंके द्वारा किये हुए ताडन मारण आदिका दुःख सहन करना वधपरिषह जय है ।
१४ याचनापरिषह जय - - आहार तथा औषध आदिकी याचना नहीं करना याचनापरिषह जय है ।
१५ अलाभपरिषह जय आहारकी प्राप्ति न होनेपर अन्तरायकर्मको प्रबलताका विचार करते हुए समताभावको सुरक्षित रखना अलाभपरिषह् जय है ।
१६ रोगपरिषह जय - शरीरमें उत्पन्न हुए अनेक रोगोंका दुःख सहन करना रोगपरिषद् जय है ।
१७ तृणसंस्पर्शपरिषद् जय - कांटा आदिके चुभ जानेका दुःख सहन करना तृणसंस्पर्शपरिषद् जय है ।
१८ मलधारणपरिवह जय - यावज्जीवन स्नानका त्याग होनेसे शरीर में मल लग जाता है उसका दुःख सहन करना मलधारणपरिषह जय है ।
१९ असत्कार-पुरस्कारपरिषह जय - उठकर तथा आगे बढ़कर आदर करना सरकार कहलाता है तथा किसी कार्यको किसोको अग्रसर ( अगुआ ) बनाना पुरस्कार कहलाता है। इन दोनोंके न होनेपर भी खेदका अनुभव नहीं करना असत्कारपुरस्कारपरिषद् जप है ।
२० प्रज्ञापरिषह जय अपने में क्षायोपशमिक ज्ञानकी अधिकता होनेपर उसका गर्व नहीं करना प्रज्ञापरिषह जय है ।
२१ अज्ञानपरिषद् जय - ज्ञानावरणके उदयकी तीव्रताके कारण ज्ञानकी मन्दता होनेपर अन्य ज्ञानीजनोंके द्वारा जो उपहास या तिरस्कार प्राप्त होता है उसमें समताभाव रखना अज्ञानपरिषह जय है ।
२२ अदर्शनपरिषद् जय -- कठिन तपश्चरण करने पर भी उपसर्ग आदिके समय देवोंके द्वारा रक्षाके न होने अथवा ऋद्धि आदिके प्रकट न होनेपर ऐसी अश्रद्धा नहीं होना कि यह सब कथाएँ तो मिथ्या है सरल मनुष्योंको आकृष्ट करनेके लिये गढ़ ली गई हैं, अदर्शन परिषद् जय है ।
इन बाइस परिषहोंमें एक साथ उन्नीस तक परिषह हो सकते है क्योंकि शीत और उष्ण इन दोमेंसे एक कालमें एक ही होगा तथा चर्या, निषद्या और शय्या इन तीनमेंसे एक ही होगा । प्रज्ञा और अज्ञान परिषहकी उत्पत्ति ज्ञानावरण कर्मसे होती है | अदर्शनपरिषद् दर्शनमोहनीयके उदयमें तथा अलाभपरिषद् अन्तरायकर्मके उदयमें होता है। नग्नता, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश,
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षष्ठाधिकार याचना और असत्कार पुरस्कार ये सात परिपह चारित्रमोहनीयकमके उदयमें होते हैं तथा शेष परिषह वेदनीयकर्मके उदयमें होते हैं। सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थान और हम बोतरा ना ह यारह रहये गुण में क्षुधा, तृषा, शीत,उष्ण, दंशमत्कुण, चर्या, शय्या, वध, अलाभ, रोग, तृणसंस्पर्श, मलधारण, प्रज्ञा और अज्ञान ये चौदह परिषह होते हैं तथा जिनेन्द्र भगवान्के क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमत्कुण, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मलघारण ये ग्यारह परिषह होते हैं। तथा छठवेसे नवम गुणस्थान तक सभी परिषह होते हैं । यहाँ जिनेन्द्र भगवान्के जो ग्यारह परिषह कहे गये हैं बे उन परिषहोंके मूल कारण वेदनीयकर्मका उदय रहने मानसे कहे गये हैं। कार्यरूपमें उनकी परिणति नहीं होती। जिनेन्द्र भगवान्के मोहनीयकर्मका सर्वथा अभाव हो जाता है इसलिये उन्हें वेदनीयके उदयमें होनेवाले दुःखका लेशमात्र भी अनुभव नहीं होता। उनका असातावेदनीय सातावेदनीयरूप होकर निजीर्ण होता है ।। २३-२५ ।।
परिषहजय संवरका कारण है संवरो हि भवत्येतानसंक्लिष्टेन चेतसा ।
सहमानस्य रागादिनिमित्तानवरोधतः ॥२६॥ अर्थ-इन परिषहोंको संक्लेश रहित चित्तसे सहन करनेवाले मुनिके रागादिके निमित्तसे होने वाला आस्रव रुक जाता है इसलिये संवर होता है ।। २६॥
__तप संवर और निर्जरा वोनोंका कारण है तपो हि निर्जराहेतुरुत्तरत्र प्रचक्ष्यते । संवरस्यापि विद्वांसो विदुस्तन्मुख्यकारणम् ।।२७।। अनेककार्यकारित्वं न चैकस्य विरुध्यते ।
दाहपाकादिहेतुत्वं दृश्यते हि विभावसोः ।।२८।। अर्थ-तप निर्जराका कारण है ऐमा आगे कहा जावेगा । परन्तु विद्वान् लोग उसे संवरका भी मुख्य कारण जानते हैं। एक ही वस्तु अनेक कार्योंको करनेवाली हो, इसमें विरोध नहीं है क्योंकि एक ही अग्नि गर्मी तथा भोलन पाना आदि कार्योंका कारण देखी जाती है ।।२७-२८।।
बारह अनुप्रेक्षाओं के नाम । अनित्यं शरणाभावो भवरचैकत्वमन्यता । अशौचमानवश्चैव संवरो निर्जरा तथा ॥२९॥
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१७०
तत्वार्थसार
लोको दुर्लभता वोधः स्वाख्यातच्चं वृषस्य च | अनुचिन्तनमेतेषामनुप्रेक्षा: प्रकीर्तिताः ||३०|
अर्थ ----अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव संवर, निर्जरा, लोक, और उनका बारबार निम्तन करना
बारह अनुप्रेक्षाएँ कही गई हैं ||२१-३०।।
अनित्यभावनाका लक्षण
कोडीकरोति
प्रथमं जातजन्तुभनित्यता । धात्री च जननी पश्चाद् धिग्मानुष्यमसारकम् ॥ ३१ ॥
अर्थ - उत्पन्न हुए जीवको सबसे पहले अनित्यता ही अपनी गोद में लेती है पृथिवी और माता पीछे 1 सार रहित मनुष्यपर्यायको चित्रकार हो ||३१|
अशरणभावना
उपघातस्य धीरेण मृत्युव्याघ्रेण देहिनः ।
देवा अपि न जायन्ते शरणं किमु मानवाः ||३२||
अर्थ - मृत्युरूपी भयंकर व्यात्र के द्वारा सूंघे हुए इस जीवको देव भी शरण नहीं हैं फिर मनुष्यों को तो बात ही क्या है ॥ ३२ ॥
संसारभावना
घटीमिव ।
चतुर्गतिघटीयन्त्रे सन्निवेश्य आत्मानं भ्रमत्ये हा कष्टं कर्मकच्छिकः ||३३||
अर्थ-बड़े दुःखकी बात है कि यह कर्मरूपी काछो इस जीवको चतुर्गतिरूपी हमें घरिया के समान लगाकर घुमाता रहता है ॥ ३३ ॥
एकत्व भावना
कस्यापत्यं पिता कस्य कस्याम्वा कस्य गेहिनी ।
एक एव भवाम्भोधौ जीवो भ्रमति दुस्तरे || ३४॥
अर्थ - किसका पुत्र, किसका पिता, किसकी माता और किसकी स्त्री। इस
दुस्तर संसारसागर में यह जीव अकेला ही घूमता है || ३४ ||
अन्यस्वभावना
अन्यः सचेतनो जीवो वपुरन्यदचेतनम् |
हा तथापि न मन्यन्ते नानात्वमनयोर्जनाः ||३५||
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অদ্ভাধিকাং अर्थ-यद्यपि सचेतन जीव जुदा है और अचेतन शरीर जुदा है तथापि दुःखको बात है कि मनुष्य इन दोनोंकी जुदाईको नहीं मानते हैं ।। ३५ ॥
अशुचित्वभावना नानाकृमिशताकीर्णे दुर्गन्धे मलपूरिते ।
आत्मनश्च परेषां च क्व शुचित्वं शरीरके ।।३६।। अर्थ-नाना प्रकारके सैकड़ों की डोंसे व्याप्त, दुर्गन्धित तथा मलसे भरे हुए अपने और दूसरोंके शरीरमें पवित्रता कहाँ है ? ।। ३६ ॥
आस्त्रवभावना कर्माम्भोभिः प्रपूर्णोऽसौ योगरन्ध्रसमाहतैः ।
हा दुरन्ते भवाम्भोधौ जीयो मज्जति पोतवत् ॥३७|| अर्थ-बड़े खेदकी बात है कि योगरूपी छिद्रोंसे आये हुए कर्मरूप जलसे भरा हुआ यह जीव जहाजकी तरह संसाररूपी दुःखदायक समुद्र में डूब रहा है ॥ ३७॥
__ संघरभावना योगद्वाराणि रुन्धन्तः कपाटरिव गुप्तिभिः ।
आपतद्रि ने बाध्यन्ते धन्याः कर्मभिरुत्कटः ॥३८॥ अर्थ-किवाड़ोंके समान गुप्तियोंके द्वारा योगरूपी द्वारोंको चन्द करनेवाले भाग्यशाली जोव चारों ओरसे आनेवाले भयंकर कोंके द्वारा बाधित नहीं होते ।। ३८ ॥
निर्जराभावना माढोऽपजीर्यते यद्वदामदोषो विसर्पणात् ।
तद्वनिर्जीयते कर्म तपसा पूर्वसञ्चितम् ॥३९॥ अर्थ-जिस प्रकार विरेचक औषधिसे बहुत भारी अजीर्णका दोष नष्ट हो जाता है उसीप्रकार तपके द्वारा पूर्वसंचित कर्म नष्ट हो जाता है ।। ३९ ॥
लोकभावना नित्याध्वगेन जीवेन भ्रमता लोकवत्मनि । यसतिस्थानवत् कानि कुलान्यध्युषितानि न ॥४०॥
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स्वार्थसार
अर्थ - लोकके मार्ग में भ्रमण करनेवाले नित्य पथिकस्वरूप इस जीवने वसतिकाओंके स्थानके समान कौन-कौन कुलोंमें निवास नहीं किया है ।
भावार्थ - जिस प्रकार निरन्तर भ्रमण करनेवाला पथिक विश्राम करने के लिये किन्हीं वसतिकाओं में ठहरता है उसी प्रकार संसारके मार्ग में निरन्तर भ्रमण करता हुआ यह जीव नाना कुलोंमें ठहरता है— जन्म लेता है ॥ ४० ॥ बोधिदुर्लभ भावना
मोक्षारोहणनिश्रेणिः कल्याणानां परम्परा । अहो कष्टं भवाम्भोधौ बोधिर्जीवस्य दुर्लभा ॥ ४१ ॥
अर्थ - मोक्षरूपी महलपर चढ़ने के लिये नसैनी तथा कल्याणोंकी परम्परा स्वरूप रत्नत्रयको प्राप्ति इस जीवको संसाररूपी सागरमें बहुत दुर्लभ है ।
भावार्थ- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रको बोधि कहते हैं । यह बोधि मोक्षरूपी महलपर चढ़नेके लिये नसैनीके समान है तथा अनेक कल्याणों-सांसारिक सुखोंको प्राप्त करानेवाली है । अनादिकालसे संसाररूपी सागर में मज्जनोन्मज्जनको करनेवाले इस जीवको रत्नत्रयकी प्राप्ति बड़ी कठिनाई होती है ऐसा विचार करना बोधिदुर्लभभावना है ॥ ४१ ॥
धर्मस्वाख्यातत्त्वभावना
क्षान्त्यादिलक्षणो धर्मः स्वाख्यातो जिनपुङ्गवैः । अयमालम्बनस्तम्भो भवाम्भोधौ निमज्जताम् ॥४२॥
अर्थ — जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा सम्यक् प्रकारसे कहा हुआ यह क्षमादि लक्षणवाला धर्म संसाररूपी समुद्रमें डूबते हुए प्राणियोंके लिये आधारस्तम्भके समान है ॥ ४२ ॥
अनुप्रेक्षा से संवरको सिद्धि साधोर्भवेद्धर्ममहोद्यमः ।
एवं भावयतः
ततो हि निःप्रमादस्य महान् भवति संवरः ॥४३॥
अर्थ - इस प्रकारकी भावना करनेवाले सानुका धर्ममें महान पुरुषार्थं प्रकट होता है और उससे प्रमादरहित साधुके बहुत भारी संवर होता है ।। ४३ ।
पाँच प्रकारका चरित्र
वृत्तं सामायिकं ज्ञेयं छेदोपस्थापनं तथा ।
परिहारं च सूक्ष्मं च यथाख्यातं च पश्चमम् ॥४४॥
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षष्ठाधिकार
१७३ अर्थ-सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात यह पाँच प्रकारका चारित्र जानना चाहिये ।। ४४ ॥
सामायिकचारित्रका लक्षण प्रत्याख्यानमभेदेन सर्वसावद्यकर्मणः ।
नित्यं नियतकालं वा वृत्तं सामायिकं स्मृतम् ॥४५॥ अर्थ-सदाके लिये अथवा किसी निश्चित काल तक के लिये अभेदरूपसे समस्त पापकार्योंका त्याग करना सामायिक नामका चारित्र है ।। ४५ ।।
__छेदोपस्थापनाचारित्रका लक्षण पत्र हिंसादिभेदेन त्यागः सावधकर्मणः ।
व्रतलोपे विशुद्धिर्वा छेदोपस्थापनं हि तत् ॥४६॥ अर्थ-जिसमें हिंसा आदिके भेदपूर्वक पापकार्योंका त्याग होता है वह छेदोपस्थाना चारित्र है । अथवा ब्रतमें बाबा मानेपर गुन्न' उसको शुद्धि करनेको छेदोपस्थापना कहते हैं।
भावार्थ-छेदोपस्थापना शब्दका समास दो प्रकारसे होता है-'छेदेन उपस्थापनं छेदोपस्थापनम्' और 'छेदे सति उपस्थापनं छेदोषस्थापनम् । प्रथम पक्षमें छेदोपस्थापनाका अर्थ है छेद अर्थात् भेदपूर्वक पापकार्यका त्याग करना, जैसे मेरे हिंसाका त्याग है, असत्यका त्याग है आदि । और दूसरे पक्षमें अर्थ है कि गृहीत ब्रतमें छेद-दोष लगनेपर पुनः प्रायश्चित्तविधिसे उसे शुद्ध करना ।। ४६ ॥
__ परिहारविशुद्धिसंयमका लक्षण विशिष्टपरिहारेण प्राणिघातस्य यत्र हि ।
शुद्धिर्भवति चारित्रं परिहारविशुद्धि तत् ॥४७|| अर्थ-जिसमें प्राणिघातके एक विशिष्ट प्रकारके त्यागसे शुद्धि होती हैपरिणामोंमें निर्मलता आती है वह परिहारविशुद्धि नामका संयम है । __ भावार्य-जो मनुष्य तीस वर्षको अवस्था तक घरमें सुखसे रहकर समय व्यतीत करता है, अनन्तर दीक्षा लेकर तीर्थङ्करके पादमूलमें रहकर आठ वर्ष तक प्रत्याख्यानपूर्वका अध्ययन करता है उसके तपस्याके प्रभावसे ऐसी विशिष्ट ऋद्धि होती है कि जीवराशिपर चलनेपर भी उसके शरीरसे किसी जीवका घात नहीं होता । इस संयमके धारी मुनि आवश्यक क्रियाओंके करने के बाद प्रतिदिन
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१७४
तत्वार्थसार
दो कोश प्रमाण बिहार करते हैं। चातुर्मास के समय विहार करनेका नियम नहीं है । यह संयम छठवें और सातवें गुणस्थान में होता है ॥ ४७ ॥
सूक्ष्मसाम्परायसंयमका लक्षण
कषायेषु प्रशान्तेषु प्रक्षीणेष्वखिलेषु वा । स्यात्सूक्ष्मसाम्परायाख्यं सूक्ष्मलोभवतो मुनेः ॥४८||
अर्थ--- --- समस्त कषायों के उपशान्त अथवा क्षीण हो जानेपर जिस मुनिके मात्र सूक्ष्म लोभका सद्भाव रह जाता है उसके सूक्ष्मसाम्पराय नामका संयम होता है ।
भावार्थ - उपशमश्रेणीवाले मुनिके नवम गुणस्थानके जब समस्त स्थूल कषायों का उपशम हो जाता है तथा क्षपकश्रेणीवालेके समस्त स्थूल कषायोंका क्षय हो चुकता है तब वह दशम गुणस्थान में प्रवेश करता है उस समय उसके संज्वलन सम्बन्धी सूक्ष्म लोभका ही उशेष म्ह जाता है। उसी उसके सूक्षमसाम्पराय नामका चारित्र प्रकट होता है। यह संयम सिर्फ दशम गुणस्थानमें ही होता है ।। ४८ ।।
यथाख्यात चारित्रका स्वरूप
क्षयाच्चारित्र मोहस्य कात्स्न्येनोपशमात्तथा | यथाख्यातमथाख्यातं चारित्रं पञ्चमं जिनैः ॥ ४९ ॥
अर्थ - - चारित्रमोहनीयकर्मके सम्पूर्णरूपसे क्षय अथवा उपशम हो जानेसे जो चारित्र प्रकट होता है उसे जिनेन्द्र भगवान ने यथाख्यात नामका पञ्चम
चारित्र कहा है ।
भावार्थ - चारित्रमोहनीयके उपशमसे जो यथाख्यातचारित्र होता है वह औपशमिक यथाख्यात चारित्र कहलाता है । यह मात्र ग्यारहवें गुणस्थानमें होता है । और जो चारित्रमोहके क्षयसे होता है उसे क्षायिक यथाख्यात कहते हैं । यह बारहवें आदि गुणस्थानोंमें होता है ।। ४९ ।।
1
सम्यकुचारित्रसे संवर होता है
सम्यक् चारित्रमित्येतद्यथास्वं चरतो यतेः । सर्वास्त्रनिरोधः स्यात्ततो भवति संवरः ||५०||
अर्थ — इस प्रकार इस सम्यक् चारित्रका जो मुनि यथायोग्य आचरण करता है उसके समस्त आस्रवोंका निरोध हो जाता है और आस्रवोंका निरोध होनेसे संबर होता है ॥ ५० ॥
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षष्ठाधिकार
तप भी संवरका कारण है तपस्तु वक्ष्यते तद्धि मुम्यम्भावयतो यतेः ।
स्नेहक्षयात्तथा योगरोधाद्भवति संवरः ॥५१॥ अर्थ-तपका वर्णन आगेके अधिकारमें किया जावेगा। जो मुनि उस तपकी अच्छी तरह भावना रखता है उसके स्नेह-कषायका क्षय होने तथा योगोंका निरोध होनेसे संवर होता है ।। ५१ ।।
संबर तत्त्वका उपसंहार इति संवरतत्वं यः श्रद्धत्ते वेत्युपेक्ष्यते ।
शेषतत्त्वः समं षभिः स हि निर्वाणभाग्भवेत् ।।५२।। अर्थ-इस प्रकार जो शेष छह तत्त्वोंके साथ संवर तत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जानता है और उसकी उपेक्षा करता है वह निश्चयसे निवाणको प्राप्त होता है ।। ५२॥
इस प्रकार श्रीअमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित तत्वार्थसारमें संवरतत्वका
वर्णन करनेवाला पष्ठ अधिकार पूर्ण हुआ।
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सप्तम अधिकार (निर्जरा तत्त्वका वर्णन )
मङ्गलाचरण अनन्तकेवलज्योति प्रकाशितजगत्यत्रान् ।
प्राणिपत्य जिनान्मूर्ना निर्जरातत्वमुच्यते ॥ १ ॥ अर्थ--अनन्त केवलज्ञानरूपी ज्योतिके द्वारा जिन्होंने तीनों लोकोंको प्रकाशित कर दिया है ऐसे जिनेन्द्र भगवान्को शिरसे नमस्कारकर निर्जरतत्त्वका कथन किया जाता है ।।१॥
निर्जराका लक्षण और उसके भेद उपात्तकर्मणः पातो निर्जरा द्विविधा च सा ।
आद्या विपाकजा तत्र द्वितीया चाविपाकजा ॥२॥ अर्थ-ग्रहण किये हुए कर्मका खिरना निर्जरा है। वह निर्जरा दो प्रकारको __ है—पहली विपाकजा और दूसरी अविपाकजा ॥ २ ॥
विपाकजा निर्जराका लक्षण अनादिबन्धनोपाधिविपाकवशवर्तिनः ।
कारब्धफलं यत्र क्षीयते सा विपाकजा ॥ ३ ।। अर्थ-अनादि बन्धरूप उपाधिके उदयवशवर्ती जीवका कर्म जिसमें अपना फल देता हुआ खिरता है वह विपाकाजा निर्जरा है।
भावार्थ-अनादि कालसे बँधे हुए कर्मोका निषेकरचनाके अनुसार अपना फल देते हुए खिरना विपाकजा निर्जरा है ।। ३ ॥
अविपाकजा निर्जराका लक्षण और दृष्टान्त अनुदीणं तपःशक्त्या यत्रोदीर्णोदयावलीम् । प्रवेश्य वेद्यते कर्म सा भवत्यविपाकजा ।। ४ ।। यथाम्रपनसादीनि परिपाकमुपायतः । अकालेऽपि प्रपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनाम् ॥ ५ ॥
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षष्ठाधिकार
१७७ अर्थ-अनुदीर्ण-उदयावली में अप्राप्त कर्मको तपकी शक्तिके द्वारा उदीर्ण कर्मोकी उदयावली में प्रविष्ट कराकर जिसमें वेदा जाता है वह अविपाकजा निर्जरा है। जिस प्रकार आम तथा कटल आदि फल उपाय द्वारा असमयमें ही पका लिये जाते हैं उसी प्रकार प्राणियोंके कर्म भी तपश्चरणरूप उपायके द्वारा असमयमें पका लिये जाते हैं-उदयावली में लाकर खिरा दिये जाते हैं ।। ४-५ ।।
विपाकजा और अविपाकजा निर्जराके स्वामी अनुभृय क्रमात्कर्म विपाकप्राप्तमुज्झताम् ।
प्रथमास्त्येव सर्वेषां द्वितीया तु तपस्विनाम् ॥६॥ . अ---महली मिस क्रम-नाना उदलो पापा कर्मका फल भोगकर उसका त्याग करनेवाले समस्त जीवोंके नियमसे होती है परन्तु दुसरी निर्जरा तपस्वी-मुनियोंके ही होती है ।। ६ ।।
सपके भेद तपस्तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्याभ्यन्तरमेदतः ।
प्रत्येकं पविधं तच्च सर्व द्वादशधा भवेत् ॥७॥ अर्थ-बाह्य और आभ्यन्तरने भेदसे तप दो प्रकारका कहा गया है। दोनों ही प्रकारके तप छह-छह प्रकारके हैं तथा सब मिलाकर तप बारह प्रकारका होता है॥७॥
बाह्य तपके छह भेद बाह्यं तनावमौदर्यमुपवासो रसोझनम् ।
वृत्तिसंख्या वपुःक्लेशो विविक्तशयनासनम् ।।८।। अर्थ-उनमें बाह्य तपके छह भेद निम्न प्रकार हैं-अवमौदर्य, उपवास, रसपरित्याग, वृत्तिपरिसंख्यान, कायक्लेश और विवित्तशय्यासन ॥ ८॥
अवमौदर्य तपका लक्षण सर्व तदवमौदर्यमाहारं यत्र हापयेत् ।
एकद्विन्यादिभिग्रासैराग्रासं समयान्मुनिः ॥९॥ अर्थ-वह सब अवौदर्य नामका तप है जिसमें मुनि समयका नियम लेकर एक दो तीन आदि ग्रासोंके द्वारा आहारको एक ग्रास तक घटा देते हैंकम कर देते हैं।
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१७८
तस्वार्थसार भावार्थ-कवल चान्द्रायण आदि व्रतोंको अवौदर्य तप कहते हैं। इसमें मुनि एक दो तीन आदि ग्रासके क्रमसे आहारको घटाते हुए एक ग्रास तक ले जाते हैं ॥ २॥
उपवासतपका लक्षण मोक्षार्थं त्यज्यते यस्मिन्नाहारोऽपि चतुर्विधः ।
उपवासः स तद्भेदाः सन्ति षष्ठाण्टमादयः ॥१०॥ अर्थ-जिसमें मोक्ष के लिये चारों प्रकारके आहारका त्याग किया जाता है वह उपवास कहलाता है। उसके पष्ठ--वेला तथा अष्टम-तेला आदि भेद हैं ।। १० ।।
रसपरित्याग तपका लक्षण रसत्यागो भवे लक्षीरेक्षुदधिसर्पिषाम् ।
एकद्वित्रीणि चत्वारि पजतस्तानि पञ्चधा ॥११॥ अर्थ-तैल, दूध, इक्षुरस ( गुड़ शक्कर आदि ), दही और धी इन पाँच प्रकारके रसोंमें एक दो तीन चार या पांचों रसोंका त्याग करनेवाले मुनिके रसपरित्याग नामका तप होता है ॥११॥
वृत्तिपरिसंख्यान तपका लक्षण एकवास्तुदशागारमानमुद्गादिगोचरः ।
सङ्कल्पः क्रियते यत्र धृत्तिसंख्या हि तत्तपः ॥१२॥ अर्थ-जिससे एक मकान, दश मकान आदि तक जाना अथवा पेयपदार्थ और मूंग आदि अन्नोंका संकल्प किया जाता है वह वृत्तिपरिसंख्यान नामका तप है।
भावार्थ-वृत्तिका अर्थ आहार होता है। आहारसे सम्बन्ध रखनेवाले नाना प्रकारके नियम जिसमें किये जाते हैं वह वृत्तिपरिसंख्यान नामका तप है । इस तपमें जब मुनि आहारके लिये निकलते हैं तब नियम लेकर निकलते हैं कि आज मैं एक घर तक, दो घर तक, तीन घर तक अथवा दश घर तक जाऊँगा। इनमें आहार मिलेगा तो लूंगा, अन्यथा नहीं लूंगा । अथवा आज पेयपदार्थ हो तूंगा या मुंग आदि अन्नसे निर्मित आहार मिलेगा तो लगा, अन्यथा नहीं लूंगा ॥ १२॥
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षष्ठाधिकार
कायक्लेश तपका लक्षण
मौनं शीतसहिष्णुता |
अनेकप्रतिमास्थानं आतपस्थानमित्यादिकायक्लेशो मतं तपः || १३ ||
अर्थ – अनेक प्रकारके प्रतिमायोग धारण करना, नाना आसनोंसे ध्यानस्थ होना, मौन रहना, शीतकी बाधा सहना तथा धूपमें बैठना इत्यादि कायक्लेश तप माना गया है || १३ ॥
विविशय्यासन सपका लक्षण
जन्तुपीडाविमुक्तायां वसतौ शयनासनम् । सेवमानस्य
अर्थ -- जहाँ जीवोंको पीड़ा न हो ऐसी वसतिका में शयन आसन करनेवाले मुनिके विविकशय्यासन नामक तप होता है ।
भावार्थ - जीवजन्तुओंकी वाघासे रहित एकान्त स्थानमें सोना बैठना विविकशय्यासन तप है ।। १४ ।।
विज्ञेयं विविक्तशयनासम् ||१४||
आभ्यन्तर तपके छह भेद
स्वाध्यायः शोधनं चैव वैrयं तथैव च ।
व्युत्सर्गो विनयश्चैव ध्यानमाभ्यन्तरं तपः || १५ ।।
tor
अर्थ – स्वाध्याय, प्रायश्चित्त, बेयावृत्य, व्युत्सर्ग, विनय और ध्यान ये छह आभ्यन्तर तप हैं ।। १५ ।।
स्वाध्याय तपके भेव
वाचना ग्रच्छनाम्नायस्तथा धर्मस्य देशना |
अनुप्रेक्षा च निर्दिष्टः स्वाध्यायः पञ्चधा जिनैः ॥ १६॥
अर्थ- वाचना, प्रच्छना, आम्नाय धर्मोपदेश और अनुप्रेक्षा के भेदसे जिनेन्द्र भगवान्ने पाँच प्रकार स्वाध्याय कहा है ।। १६ ॥
याचना स्वाध्यायका लक्षण
वाचनासा परिज्ञेया यत्पात्रे प्रतिपादनम् ।
गद्यस्य वा पद्यस्य तच्चार्थस्योभयस्य वा ॥१७॥
अर्थ – गद्य-पद्यरूप ग्रन्थका, उसके द्वारा प्रतिपाद्य अर्थका अथवा दोनोंका पात्र के लिये जो देना है— वांचकर सुनाता है उसे वाचना जानना चाहिये ॥ १७ ॥
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१८०
तत्त्वार्थसार
प्रच्छना स्वाध्यायका लक्षण
तत्संशयापनोदाय तन्निश्चयवलाय वा । परं प्रत्यनुयोगो यः प्रच्छनां तद्विदुर्जिनाः ॥ १८ ॥
अर्थ - शास्त्रविषयक संशयको दूर करनेके लिये, अथवा उसका निश्चय दृढ करने के लिये दूसरे से जो प्रश्न करना है उसे जिनेन्द्र भगवान् प्रच्छना नामका स्वाध्याय कहते हैं ॥ १८ ॥
आम्नाय स्वाध्यायका लक्षण
आम्नायः कथ्यते घोषो विशुद्धं परिवर्तनम् ।
अर्थ - निर्दोष उच्चारण करते हुए पाठ करना आम्नाय नामका स्वाध्याय कहलाता है ।
धर्मोपदेश स्वाध्यायका लक्षण विज्ञेया
कथाधर्माद्यनुष्ठानं
धर्मदेशना ॥१९॥
अर्थ-धर्मकथा आदिका करना धर्मदेशना — धर्मोपदेश नामका स्वाध्याय जानना चाहिये ।। १९ ।
अनुप्रेक्षास्वाध्यायका लक्षण
साधोरधिगतार्थस्य योऽभ्यासो मनसा भवेत् । अनुप्रेक्षेति निर्दिष्टः स्वाध्यायः स जिनेशिभिः ||२०|| अर्थ---पदार्थको जाननेवाले साधुका जो मनसे अभ्यास - चिन्तन आदि होता है उसे जिनेन्द्र भगवान्ने अनुप्रेक्षा' नामका स्वाध्याय कहा है || २० ॥ प्रायश्चित तपके नौ भेद
आलोचनं प्रतिक्रान्तिस्तथा तदुभयं तपः ।
व्युत्सर्गश्च विवेकश्च तथोपस्थापना मता ॥२१॥ परिहारस्तथाच्छेदः प्रायश्चित्तभिदा नव ।
अर्थ -- आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, तप, व्युत्सर्ग, विवेक, उपस्थापना, परिहार और छेद ये प्रायश्चित्त तपके नौ भेद हैं ॥ २१ ॥
आलोचनाका लक्षण
आलोचनं प्रमादस्य गुरवे विनिवेदनम् ||२२||
अर्थ- गुरुके लिये अपने प्रसादका निवेदन करना आलोचना है || २२ ||
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মামিদা
१८१ प्रतिक्रमण और तनुभयका लक्षण अभिव्यक्तप्रतीकार मिथ्या मे दुष्कृतादिभिः ।
प्रतिकान्तिस्तदुभयं संसर्गे सति शोधनात् ।।२३।। अर्थ-'मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु' आदि शब्दोंके द्वारा जिसमें प्रतिकार प्रकट किया जाता है उसे प्रतिक्रमण कहते हैं ! स्वयं प्रतिक्रमण करना तथा गुरुजनोंसे संसर्ग होनेपर अालोचना करना नदभय कहलाता है !! २३ ॥
तप और व्युत्सर्गका लक्षण भवेत्तयोऽवमौदर्य वृत्तिसङ्ख्यादिलक्षणम् ।
कायोत्सर्गादिकरणं व्युत्सर्ग: परिभाषितः ॥२४॥ अर्थ-अवमौदर्य तथा वृत्तिपरिसंख्यान आदि तप हैं। और कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग कहा गया है ॥ २४ ॥
विवेक और उपस्थापनाका लक्षण अन्नपानौपधीनां तु विवेकः स्याद्विवेचनम् ।
पुनर्दीमाप्रदानं यत्सा घुपस्थापना भवेत् ॥२५॥ अर्थ अन्न, पान तथा औषध आदिका पृथक् करना विवेक है और फिरसे नई दीक्षा देना उपस्थापना है ।। २५ ।।
परिहार और छेदका लक्षण परिहारस्तु मासादिविभागेन विवर्जनम् ।
प्रव्रज्याहापनं छेदो मासपक्षदिनादिना ॥२६॥ अर्थ---एक महीना आदिके लिये संघसे अलग कर देना परिहार है और एक मास, एक पक्ष. एक दिन आदिको दीक्षा कम कर देना छेद नामका प्रायश्चित्त है ॥२६॥
__ वैयावृत्त्य तपका लक्षण सू[पाध्यायसाधूनां शैत्यग्लानतपस्विनाम् । कुलसङ्घमनोज्ञानां वैयावृत्त्यं गणस्य च ॥२७॥ व्याध्याद्युपनिपातेऽपि तेषां सम्यग् विधीयते ।
स्वशक्त्या यत्प्रतीकारो वैशावृत्त्यं तदुच्यते ॥२८॥ अर्थ—आचार्य, उपाध्याय, साधु, बौक्ष्य, म्लान, तपस्वी, कुल, सङ्घ, मनोज्ञ
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१८२
तत्त्वार्थसार और गण इन दश प्रकारके मुनियोंको बीमारी आदिके उपस्थित होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार जो उनका प्रतीकार किया जाता है वह वैयावृत्त्य कहलाता है।
भावार्थ-'व्यावृत्तिः दुःस्त्रनिवृत्तिः प्रयोजनं यस्य तद् वैयावृत्य' अर्थात् दु:खनिवृत्ति जिसका प्रयोजन है उसे वैयावृत्त्य कहते हैं । यह वैयावृत्त्य आचार्य आदि दश प्रकारके मुनियोंका होता है इसलिये आश्रयके भेदसे वैयावृत्पतप भी दश प्रकारका माना गया है । आचार्य आदिके लक्षण इसप्रकार है
आचार्य-संघके अधिपतिको आचार्य कहते हैं। यह नवीन शिष्योंको दीक्षा तथा पुराने शिष्योंको प्रायश्चित्त आदि देकर पंचाचारका पालन करते कराते हैं।
उपाध्याय—जो संघमं पढ़ानेका काम करते हैं उन्हें उपाध्याय कहते हैं। साधु-जो संघमें रहकर अपना हित साधन करते हैं उन्हें साधु कहते हैं । शेषय-प्रमुखरूपसे विद्याध्ययन करनेवाले मुनि शंक्ष्य कहलाते हैं। ग्लान-रोगी मुनियोंको ग्लान कहते हैं ।
तपस्वी-पक्षोपवास तथा मासोपचास आदि करनेवाले मुनि तपस्वी कहलाते हैं।
कुल-दीक्षा देनेवाले आचार्योके शिष्य समूहको कुल कहते हैं।
सङ्घ-ऋषि, यति, मुनि और अनगार इन चार प्रकारके मुनियोंके समूहको सङ्घ कहते हैं।
मनोज-लोकप्रिय साधुओंको मनोज्ञ कहते हैं। गण-वृद्ध मुनियोंकी सन्ततिको गण कहते हैं ।। २७-२८ ॥
___ व्युत्सर्ग तपके दो भेद बाह्यान्तरोपवित्यागाद् व्युत्सगों द्विविधो भवेत् ।
क्षेत्रादिरुपधिर्वाह्यः क्रोधादिरपरः पुनः ।।२९।। अर्थ-बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहके त्यागसे व्युत्सर्गलप दो प्रकारका होता है । खेत आदिक वाह्य परिग्रह है और क्रोध आदिक आभ्यन्तर परिग्रह है ।। २२ ।।
विनय तपके चार भेद दर्शनज्ञानविनयौ चारित्रविनयोऽपि च ।
तथोपचारविनयो विनयः स्याच्चतुर्विधः ॥३०॥ अर्थ-दर्शनविनय, ज्ञानविनय, चारित्रविनय और उपचारविनयके भेदसे विनयतप चार प्रकारका होता है ।। ३० ।।
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षष्ठाधिकार
वर्शनविनयका लक्षण
भवेत् ।
यत्र निःशङ्कितवादिलक्षणोपेतता श्रद्धाने सप्त तच्चानां सम्यक्त्वविनयः स हि ॥ ३१ ॥
अर्थ- सप्त तत्वोंके श्रद्धानके विषयमें जहाँ निःशङ्कता आदि लक्षणोंसे सहितपना होता है वह सम्यक्त्वबिनय अथवा दर्शनविनय है ॥ ३१ ॥
ज्ञानविनयका लक्षण
ज्ञानस्य ग्रहणाभ्यासस्मरणादीनि कुर्वतः । बहुमानादिभिः सार्द्ध ज्ञानस्य विनयो भवेत् ॥ ३२ ॥
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अर्थ- जो मुनि बहुत सम्मान आदिके साथ ज्ञानका ग्रहण, अभ्यास तथा स्मरण आदि करता है उसके ज्ञानविनय होता है ।। ३२ ।।
चारित्रविनयका लक्षण
दर्शनज्ञानयुक्तस्य या समीहितचित्तता । चारित्रं प्रति जायेत चारित्रविनयो हि सः ॥ ३३ ॥
अर्थ - दर्शन – सम्यक्त्व और ज्ञानसे युक्त पुरुषको चारित्रके प्रति जो उत्सुकता है— चारित्र धारण करनेकी जो लगन है वह चारित्रविनय है ॥ ३३ ॥ उपचार विनयका लक्षण
अभ्युत्थानानुगमनं चन्दनादीनि कुर्वतः । आचार्यादिषु पूज्येषु विनयो औपचारिकः || ३४ ॥
अर्थ – आचार्य आदि पूज्य पुरुषोंके विषय में अभ्युत्थान—– उनके आनेपर आगे जाकर ले आना, अनुगमन - जानेपर पीछे चलकर पहुँचाना तथा बन्दना - नमस्कार आदि करनेवाले मुनिके उपचार विनय होती है ॥ ३४ ॥
ध्यानके चार भेद
आत्तं रौद्रं च धर्म्यं च शुक्लं चेति चतुर्विधम् । ध्यानमुक्तं परं तत्र तपोऽभयं भवेत् || ३५ ।।
अर्थ- आर्त, रौद्र, धम्यं और शुक्ल के भेदसे ध्यान चार प्रकारका कहा गया है । इनमें अन्तके दो ध्यान तपके अङ्ग हैं || ३५ ॥
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ܫܪ
तत्वार्थसार
आर्तध्यानका लक्षण और उसके भेद प्रियभ्रंशेऽप्रियप्राप्तौ निदाने वेदनोदये | आर्त्तं कषायसंयुक्तं ध्यानमुक्तं समासतः || ३६ ||
अर्थ - इष्टका वियोग, अनिष्टका संयोग, निदान और वेदनाका उदय होनेपर जो कषाय से युक्त ध्यान होता है वह संक्षेपसे आर्त्तध्यान कहा गया है ।
भावार्थ-- आतिका अर्थ दुःख हैं, उस आति अर्थात् दुःखके समय जो होता है वह आर्त कहलाता है। इसके इटवियोगज, अनिष्टसंयोगज, निदान और वेदनाजके भेदसे चार भेद हैं । स्त्री-पुत्र आदि इष्ट जनोंके वियोगजन्य दुःखके समय जो होता है वह इष्टवियोगज आर्त्तध्यान है । शत्रु, सिंह, सर्प आदि अनिष्ट पदार्थोके संयोगजन्य दुःख के समय जो होता है वह अनिष्टसंयोगज आर्त्तध्यान है । आगामी भोगाकाङ्क्षाको निदान कहते हैं उस निदान सम्बन्धी दुःखके समय होनेवाला ध्यान निदानज आलंध्यान है। और उदरपीड़ा आदि वेदनाओंके दुःखके समय होनेवाला ध्यान वेदनाज आर्त्तध्यान कहलाता है || ३६ ||
ध्यानका लक्षण और भेद
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हिंसायामनृते स्वेये तथा विपयरक्षणे । रौद्रं कषायसंयुक्तं ध्यानमुक्तं समासतः ||३७||
अर्थ- हिंसा, झूठ, चोरी और विषय संरक्षणके समय कषायसे युक्त जो ध्यान होता है वह संक्षेपसे रौद्रध्यान कहा गया है ।
भावार्थ - 'रुद्रस्य कार्य रौद्र' रुद्र अर्थात् क्रूर परिणामवाले जीवका जो कार्य है वह रौद्र कहलाता है । 'हिंसा, झूठ, चोरी और विषयसंरक्षण ये क्रूर कार्य हैं । इनमें आनन्द माननेकी अपेक्षा रोद्रध्यानके निम्नलिखित चार भेद हैं१ हिंसानन्द, २ मृषानन्द, ३ स्तेयानन्द और ४ परिग्रहानन्द । इनका अर्थ शब्दोंसे हृी स्पष्ट हैं ।। ३७ ।।
ध्यानका लक्षण
एकाग्रत्वेऽतिचिन्ताया निरोधो ध्यानमिष्यते । अन्तर्मुहूर्ततस्तच्च भवत्युत्तम संहतेः ||३८||
अर्थ --- तीव्र चिन्ताका किसी एक पदार्थ में रुक जाना ध्यान कहलाता है । यह ध्यान अन्तर्मुहुर्त तक होता है और उत्तमसंहननवाले जीवके होता है ॥ ३८ ॥
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समाधिकार
arisarai लक्षण और भेब
आज्ञापायविपाकानां विवेकाय च संस्थितेः । मनसः प्रणिधानं यद् धर्म्यध्यानं तदुच्यते ||३५||
अर्थ --- आज्ञाविचय, अपायश्विय, विपाकविवय और संस्थानविचपके लिये मनकी जो स्थिरता है वह धर्म्यंध्यान कहलाता है । यही इसके चार भेद हैं ॥ ३९ ॥
आज्ञावित्र्य घध्यानका लक्षण
प्रमाणीकृत्य सार्वज्ञीमाज्ञामर्थावधारणम् । पदार्थानामाज्ञाविचयमुच्यते ||४०||
गहनानां
१८५
अर्थ-- सर्वज्ञ भगवान्को आज्ञाको प्रमाण मानकर गहन सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थोंका निर्धार करना आज्ञाविचय नामका धयंध्यान कहलाता है || ४० ||
अपायवित्रय धर्म्यष्यानका लक्षण
कथं मार्ग प्रपद्येरन्नमी उन्मार्गतो जनाः । अपायमिति या चिन्ता तदपायविचारणम् ।।४१ ॥
अर्थ - ये प्राणी उन्मार्गको छोड़कर समीचीन मार्गको किस तरह प्राप्त हो सकेंगे, इस प्रकारका विचार करना अथवा चतुर्गतिके दुःखोंका चिन्तन करना सो अपायविचय नामका धर्म्यध्यान है ॥ ४१ ॥
विपाकfrer अध्यानका लक्षण
द्रव्यादिप्रत्ययं कर्मफलानुभवनं प्रति । भवति प्रणिधानं यद् विपाकविचयस्तु सः || ४२॥
अर्थ- द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका कारण पाकर किस कर्मका किस प्रकारका फल भोगना पड़ता है ऐसा जो मनका प्रणिधान है वह विपाकविचय नामका धर्मध्यान है ।
भावार्थ - कर्मोकी आठ मूल तथा एक सौ अड़तालीस उत्तर प्रकृतियोंका उदय कब, कैसा और किसके होता है ऐसा विचार करना विपाकविचय धर्म्य - ध्यान है || ४२ ॥
૨૪
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तत्त्वार्यसार संस्थानविचय धर्मध्यानका लक्षण लोकसंस्थानपर्यायस्वभावस्य विचारणम् ।
लोकानुयोगमार्गेण संस्थानविचयो भवेत् ।।४३॥ अर्थ-लोकानुयोग-लोकका वर्णन करनेवाले शास्त्रोंके अनुसार लोकके आकार, पर्याय और स्वभावका जो विचार है यह संस्थानविचय नामका धर्म्यध्यान है॥ ४३ ॥
शुक्लथ्यानके चार भेद शुक्लं पृथक्त्वमाद्यं स्यादेकत्वं त द्वितीयकम् ।
सूक्ष्म क्रियं तृतीयं तु तुर्य व्युपरक्रियम् ॥४४॥ अर्थ-शुक्लध्यानके चार भेद हैं--यहला पृथक्त्व, दूसरा एकत्व, तीसरा सूक्ष्मक्रिया और चौथा व्युपरक्रिया ॥ ४४ ॥
पृथक्त्वशुक्लध्यानका लक्षण द्रव्याण्यनेकमेदानि योगैर्यायति यत्रिभिः ।
शान्तमोहस्ततो ह्येतत्पृथक्त्वमिति कीर्तितम् ॥४५|| अर्थशान्तमोह अर्थात् ग्यारहवें गुणस्थानवी जीव, तीन योगोंके द्वारा अनेक भेदोंसे युक्त द्रव्योंका जो ध्यान करता है वह पृषकत्व नामका शुक्लथ्यान कहा गया है ॥ ४५ ॥
पृथक्त्वशुक्लध्यानको विशेषता श्रुतं यतो वितकः स्याद्यतः पूर्वार्थशिक्षितः । पृथक्त्वं ध्यायति ध्यानं सवितकं ततो हि तत् ॥४६।। अर्थव्यञ्जनयोगानां विचारः संक्रमो मतः ।
वीचारस्य हि सद्भावात् सवीचारमिदं भवेत् ॥४७॥ अर्थ--चूँकि वितर्फका अर्थ श्रुत है और चौदह पूर्वोमें प्रतिपादित अर्थको शिक्षासे युक्त मुनि इसका ध्यान करता है इसलिये यह ध्यान सवितर्क कहलाता है। अर्थ, शब्द और योगोंका संक्रमण परिवर्तन वीचार माना गया है। इस ध्यानमें उक्त लक्षणवाला वीचार रहता है। इसलिये यह ध्यान सवीचार होता है ॥ ४६-४७ ।।
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सप्तमाधिकार
१८७
एकत्वशुक्लध्यानका लक्षण द्रव्यमेकं तथैकेन योगेनान्यतरेण च ।
ध्यायति क्षीणमोहो यत्तदेकत्वमिदं भवेत् ॥४८॥ अर्थ-क्षीणमोह अर्थात् बारहवें गुणस्थानमें रहनेवाला मुनि तीनमेसे किसी एक योगको द्वारा एकद्रव्यका जो ध्यान करता है वह एकत्व नामका दूसरा शुक्लध्यान है ।। ४८ ॥
एकत्वशुक्लध्यानको विशेषता श्रुतं यतो वितर्कः स्यायतः पूर्वार्थशिक्षितः । एकत्वं ध्यायति ध्यानं सवितर्क ततो हि तत् ।।४९॥ अर्थव्यञ्जनयोगानां वीचारः संक्रमो मतः ।
वीचारस्य सद्भावादवीचारमिदं भवेत् ॥५०॥ अर्थ-कि वितर्कका अर्थ श्रुत है और चौदहपूर्वो में प्रतिपादित अर्थको शिक्षासे युक्त मुनि एकत्वका ध्यान करता है इसलिये यह ध्यान सवितर्क होता है । अर्थ, शन्द और योगोंका संक्रमण वीचार माना गया है। ऐसे दोचारका सद्भाव इस ध्यानमें नहीं रहता इसलिये यह अर्वीचार होता है ।। ४९-५० ॥
सूक्ष्मक्रियशुक्लध्यानका लक्षण अवितर्कमवीचारं मूक्ष्मकायावलम्बनम् । भूक्ष्मक्रियं भवेद् ध्यानं सर्वभावगतं हि तत् ॥५१॥ काययोगेऽतिमूक्ष्मे तद् वर्तमानो हि केवली ।
शुक्लं ध्यायति संगेद्ध काययोग तथाविधम् ।।५२॥ अर्थ—जो ध्यान वितर्क और वीचारसे रहित है तथा सूक्ष्मकाययोगके अवलम्बनसे होता है वह सूक्ष्मक्रिय नामका शुक्लध्यान है । यह समस्त पदार्थोको विषय करनेवाला है । अत्यन्त सूक्ष्म काययोगमें विद्यमान केवली भगवान उस प्रकारके काययोगको रोकनेके लिये इस शुक्लध्यानका ध्यान करते हैं ॥५१-५२|| .
व्युपरकिय शुक्लध्यानका लक्षण अवितर्कमवीचारं ध्यानं व्युपरतक्रियम् । परं निरुद्धयोग हि तच्छलेश्यमपश्चिमम् ॥५३॥
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१८८
सत्यार्यसार तत्पुना रुद्धयोगः सन् कुर्वन् कायत्रयासनम् ।
सर्वज्ञः परमं शुक्लं ध्यायत्यप्रतिपत्ति तत् ॥५४॥ अर्थ-जो वितर्क और वीचारसे रहित है तथा जिसमें योगोंका बिलकुल निरोध हो चुका है वह ध्युपरतक्रिय नामका चौथा शुक्लध्यान है। यह ध्यान सर्वश्रेष्ठ शोलोंके स्वामित्वको प्राप्त होता है अर्थात् यह अठारह हजार शीलके भेदोंसे सहित होता है। जिसके सब योग रुक गये हैं तथा जो सत्तामें स्थित औदारिक, तैजस और कामण इन तीन शरीरोंका त्याग कर रहे हैं ऐसे सर्वज्ञ भगवान् इस उत्कृष्ट शुक्लध्यानका ध्यान करते हैं। यह ध्यान प्रतिपत्तिसे रहित है ।। ५२-५४ ॥ ___ भावार्थ--मोहजनित कलुपतासे रहित ध्यान शुक्लध्यान कहलाता है। इसके ऊपर कहे अनुसार चार भेद होते हैं। इनमें पहला पृथक्त्वशुक्लध्यान ग्यारहवें मुणस्थानमें होता है । यद्यपि अन्य ग्नन्थों में यह ध्यान अष्टम गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक बतलाया गया है तथापि यहाँ वीरसेनस्वामीके कथनानुसार दशम गुणस्थान तक धर्म्यध्यान और उसके बाद ग्यारहवें गुणस्थानसे शुक्लध्यान माना गया है। इस प्रथम ध्यानमें तीनों योगोंका आलम्बन रहता है तथा श्रुतके शब्द और अर्थमें परिवर्तन होता रहता है इसलिये यह वितर्क और बोचार दोनोंसे सहित होता है। दूसरा एकत्व नामका शक्लध्यान बारहवें गुणस्थानमें होता है तथा तीन योगोंमेंसे किसी एक योगके आलम्बनसे होता है। इसमें श्रतके अर्थ तथा शब्दोंका परिवर्तन नहीं होता। जिस अर्थ, श्रत या योगके आलम्बनसे शुरू होता है अन्तर्मुहूर्त तक उसीपर स्थिर रहता है इसलिये यह वीचाररे रहित होता है । उत्कृष्टताकी अपेक्षा ये दोनों ध्यान पूर्वविद् पूर्वोके ज्ञाता मुनिके होते हैं । तीसरा सूक्ष्मक्रिय नामका शुक्लध्यान तेरहवें गुणस्थानके अन्त समयमें होता है। इसमें मात्र सुक्ष्मकाययोगका आलम्बन रहता है। श्रुतका आलम्बन छूट जाता है इसलिये यह ध्यान वितर्क और वीचार दोनोंसे रहित होता है | चौथा शुक्लध्यान चौदहवें गुणस्थानमें होता है। इस व्यानमें सूक्ष्मकाययोगका भी आलम्बन नहीं रहता । वितर्क और वीचार तो पहले ही छूट जाते हैं इसलिये यह ध्यान व्युपरतक्रिय कहलाता है ।। ५३-५४ ।।
गुणश्रेणीनिर्जराके वश स्थान सम्यग्दर्शनसम्पन्नः संयतासंयतस्ततः । संयतस्तु ततोऽनन्तानुबन्धिप्रवियोजकः ।।५५।। दृग्मोहक्षपकस्तस्मात्तथोपशमकस्ततः । उपशान्तकषायोऽतस्ततस्तु क्षपको मतः ॥५६॥
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१८९
त
দাদাগিদাৰ ततः क्षीणकषायस्तु घातिमुक्तस्ततो जिनः ।
दौते क्रमशः सन्त्यसंख्येयगुणनिर्जराः ॥१७॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, संयत, अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवाला, दर्शनमोहका क्षय करनेवाला, उपशमश्रेणीवाला, उपशान्तमोहग्यारहवें गुणस्थानवर्ती, क्षपकश्रेणीवाला, क्षीणकषाय-बारहवें गुणस्थानवर्ती और घातियाकर्मोसे रहित जिनेन्द्र भगवान ये दश क्रमसे असंख्यातगुणी निर्जरा करनेवाले हैं ।। ५५-५७ ॥
पाँच प्रकारके निर्ग्रन्थ मुनि पुलाको वकुशो द्वेधा कुशीलो द्विविधस्तथा ।
निग्रन्थः स्नातकश्चैव निग्रन्थाः पञ्च कीर्तिताः ॥५८॥ अर्थ–पुलाक, दो प्रकारके वकुश, दो प्रकारके कुशील, निर्ग्रन्थ, और स्नातक ये पांच प्रकारके निर्ग्रन्थ-मुनि कहे गये हैं ।
भावार्थ-जो उत्तरगुणोंकी भावनासे रहित हैं तथा कहीं कभी व्रतोंमें भी पूर्णताको प्राप्त नहीं होते ने तुच्छ धान्यो समान पुलाक कहलाते हैं। जो उत्तरगुणोंको भावनासे रहित है परन्तु व्रतोंकी पूर्णताको प्राप्त है अर्थात् जिनके मूलनतोंमें कभी दोष नहीं लगते वे वकुश कहलाते हैं। इनके शरीर वकुश और उपकरण वकुशकी अपेक्षा दो भेद हैं। जो शरीरको धूलि आदिसे रहित रखनेका राग रखते हैं बे शरीर वकुश हैं और जो अपने पीछी, कमण्डलु आदि उपकरणोंको उत्तम रखना चाहते हैं वे उपकरण बकुश हैं। ये दोनों प्रकारके मुनि शिष्यपरिवारसे सहित रहते हैं । कुशीलके दो भेद हैं-प्रतिसेवनाकुशील और कषायकुशील ! जो शिष्यरूप परिग्रहसे सहित हैं तथा मूलगुण और उत्तरगुणोंसे युक्त होनेपर उत्तरगुणोंकी किसी तरह विराधना कर बैठते हैं वे प्रतिसेवनाकुशील हैं और जो मात्र संज्वलनकषायसे युक्त हैं वे कषायकुशील हैं। जिन्होंने मोहकर्मका सर्वथा क्षय कर दिया है और जो अन्तर्मुहूर्तके अनन्तर नियमसे केवली बननेवाले हैं ऐसे बारहवें गुणस्थानवर्ती मुनि निर्गन्य कहलाते हैं। जिन्हें घातियाकर्मोके नष्ट होनेसे केवलज्ञान प्राप्त हो गया है ऐसे सयोग और अयोगके भेदसे दोनों प्रकारके केवली स्नातक कहलाते हैं ।।५८॥
पांच प्रकारके मुनियोंमें संपमादिका विकल्प संयमश्रुतलेश्याभिलिङ्गेन प्रतिसेवया । तीर्थस्थानोपपादैश्च विकल्प्यास्ते यथागमम् ॥१९॥
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सत्त्वार्थसार अर्थ-संयम, श्रुत, लेश्या, लिङ्ग, प्रतिसेवना, तीर्थ, स्थान और उपपाद' इन आठ अनुयोगों के द्वारा ऊपर कहे हुए मुनि आममके अनुसार विकल्प करमेके योग्य हैं।
भावार्थ-संयम-पुलाक, वकुश और प्रतिसेवनाकुशील, सामाधिक तथा छेदोपस्थापना संयममें रहते हैं तथा कषाय कुशील सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाधराय इन चार सयभीमें ह्ते हैं । निगन्थ और स्नातक एक यथाख्यातसंयममें ही होते हैं।
श्रुत-पुलाक, वकुश और प्रतिसेवनाकुलीश उत्कृष्टतासे पूर्ण दशपूर्वके धारक होते हैं। कपायकुशील और निर्ग्रन्थ चौदहपूर्वके धारका हैं। जघन्यसे पुलाकका श्रुत आचारवस्तु प्रमाण होता है। बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थ मुनियोंका जघन्य श्रुत अष्टप्रवचनमातृका मात्र होता है अर्थात् पाँच समिति तथा तीन गुप्तियोंके ज्ञानमात्र होता है । स्नातक श्रुतसे रहित केवली होते हैं। __लेश्या-पुलाकमुनिके पीत, पन और शक्ल ये तीन लेश्याएँ होती हैं। वकुश और प्रतिसेवनाकुशीलके छहों लेश्याएँ हो सकती हैं । यद्यपि चतुर्थसे सप्तम गुणस्थान तक सामान्यरूपसे तीन शुभ लेश्याएं हो आगममें बताई हैं तथापि वकुश और प्रतिसेवनाकुशील मुनियोंके उपकरणविषयक आराक्ति होनेसे कदाचित् किञ्चित् आर्तध्यान भी संभव है। उस आर्तध्यानके कालमें कुष्णादि तीन लेश्याएँ भी संभव होती हैं । छठवें गुणस्थामें निदानको छोड़कर शेष तीन प्रकारके आर्तध्यानोका सद्भाव आगममें प्रतिपादित है हो। सूक्ष्मसाम्पराय तथा निग्नन्थ और स्नातक मुनियोंके एक शुक्ललेश्या ही होती है । अयोगकेवली स्नातकोंके कोई भी लेश्या नहीं होती।
लिङ्ग-द्रयलिङ्ग और भावलिङ्गकी अपेक्षा लिङ्ग दो प्रकारका है। इनमें भावलिङ्गको अपेक्षा पाँचों हो प्रकारके मुनि निर्ग्रन्थ-दिगम्वरमुद्राके धारक होते हैं और द्रब्यलिङ्ग-शरोरको अवगाहना, रङ्ग और पीछी आदिको अपेक्षा भाज्य हैं अर्थात् उनमें विशेषता होती है । अथवा लिङ्गका अर्थ वेद है । द्रव्यवेदकी अपेक्षा पाँचों प्रकारके मुनि पुरुषवेदी ही होते हैं परन्तु भाववेद की अपेक्षा छठवेसे नवम गुणस्थान तक रहनेवाले पुलाक, वकुश और कुशोल मुनियोंके तीनों वेद संभव हैं। निर्मन्थ और स्नातक मुनियोंके कोई भी वेद नहीं रहता।
प्रतिसेवना-प्रतिसेवनाका अर्थ विराधना है। पाँच मलगुण-पाँच महाव्रत और रात्रिभोजनत्यागमेंस किसी एककी विराधना कदाचित् दूसरोंको जबर्दस्तीसे पुलाक मुनिके हो सकती है वह भी कारित और अनुमोदनाको अपेक्षा होती है कृतकी अपेक्षा नहीं। बकुश दो प्रकारके कहे गये हैं उपकरणवकुश और शरीरबकुश । जो बहुत प्रकारकी विशेषताओंसे युक्त उपकरणोंको इच्छा रखता है वह उपकरणवकुश है और जो शरीरका संस्कार करनेवाला है वह शरीरवकुश
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सप्तमाधिकार होता है। प्रतिसेवनाकुशोल मूलगुणोंको विराधना न करता हुआ कदाचित् उत्तरगुणों को विराधना करता है। परन्तु कषायकुशील, निम्रन्थ और स्नातकोंके किसी प्रकारकी विराधना नहीं होती है। ___ तीर्थ-तीर्थंकरोंकी आम्नाय-धर्मप्रवर्तनको तीर्थ कहते हैं। सभी मुनि, सभी तीर्थकरोंके तीर्थ में होते हैं।
स्थान—कषायके निमित्तसे संबममें जो अवान्तर तारतम्य होता है उसे स्थान कहते हैं । सामान्यरूपसे ये स्थान असंख्यात्त होते हैं। इनमें पुलाक और कषायकुशीलके सर्वजघन्य लधिस्थान होते हैं। ये दोनों असंख्यात स्थानों तक एक साथ जाते हैं । इसके बाद पुलाक रह जाता है-आगे नहीं बढ़ पाता है । आगे कषायकुशील असंख्यात स्थानों तक अकेला जाता है। इससे आगे कषायकुशोल, प्रतिसेवनाकुशील और वकुश असंख्यात स्थानों तक एक साथ जाते हैं। वहाँ वकुश विछड़ जाता है--आगे जानेसे रुक जाता है। इससे भी आगे असंख्यात स्थान जाकर प्रतिसेवनाकुशील विड़ जाता है। इससे भी आगे असंख्यात स्थान जाकर कषायकुशील विछुड़ जाता है। इसके आगे कषायनिमित्तक स्थान नहीं है अकषाय स्थान हैं उन्हें निर्ग्रन्थ प्राप्त करता है। वह असंख्यात स्थानों तक जाकर विछुड़ जाता है। इसके आगे एक स्थान जाकर स्नातक निर्वाणको प्राप्त होता है।
उपपाद उपपादका अर्थ जन्म है । पुलाकमुनिका उत्कृष्ट उपपाद सहस्रार नामक बारहव स्वर्गके उत्कृष्ट स्थितिवाले देवोंमें होता है । वकुश और प्रतिसेवनाकृशीलका उत्कृष्ट उपपाद आरण और अच्युत स्वर्ग में बाईस सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है । कषायकुशील और निर्ग्रन्थ (ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती मुनि ) का उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धिमें तेतीस सागरकी स्थितिवाले देवोंमें होता है। इन सभीका जघन्य उपपाद सौधर्म स्वर्ग में दो सागरकी स्थितिवाले देवों में होता है । बारहवें गुणस्थानवर्ती निर्गन्ध तथा स्नातक केवली भगवानका निर्वाण ही होता है ।। ५९ ।।।
निर्जरातत्वका उपसंहार इति यो निर्जरातत्त्वं श्रद्धत्ते घेन्युपेक्षते ।
शेषतः समं षड्भिः स हि निर्माणमाग्भवेत् ॥६०॥ अर्थ-इस प्रकार शेष छह तत्त्वोंके साथ जो निर्जरातत्त्वकी श्रद्धा करता है उसे जानता है और उसकी उपेक्षा करता है वह निर्वाणको प्राप्त होता है । ६० ।। इस प्रकार श्रीअमृतचन्द्राचार्य द्वारा विरचित तस्वार्थसारमें निर्जरातत्त्वका
वर्णन करनेवाला सप्तम अधिकार पूर्ण हुमा ।
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अष्टम अधिकार ( मोक्षतका वर्णन )
मङ्गलाचरण
अनन्त केवल ज्योतिःप्रकाशितजगत्त्रयान् प्रणिपत्य जिनान्मूर्ध्ना मोक्षतचं प्ररूप्यते ॥ १ ॥
अर्थ - अनन्त केवलज्ञानरूपी ज्योतिके द्वारा तीनों जगत्को प्रकाशित करनेवाले अरहन्तोंको शिरसे नमस्कारकर मोक्षतत्त्वका निरूपण किया जाता है ॥ १ ॥
मोक्षका लक्षण अभावादन्धहेतूनां बद्धनिर्जरया तथा । कृत्स्नकर्मप्रमोक्षो हि मोक्ष इत्यभिधीयते ॥ २ ॥
अर्थ - बन्धके कारणोंका अभाव तथा पूर्वबद्धकर्मोकी निर्जरासे समस्त कमका सदा के लिये छूट जाना मोक्ष कहलाता है ॥ २ ॥
मोक्ष किस प्रकार होता है ?
बध्नाति कर्म सद्वेद्यं सयोगः केवली विदुः । योगाभावादयोगस्य कर्मबन्धो न विद्यते ॥ ३ ॥ निजीर्ण निःशेष पूर्व सश्चितकर्मणः ।
ततो
आत्मनः स्वात्मसंप्राप्तिर्मोक्षः सद्योऽवसीयते ॥ ४ ॥
अर्थ - ऐसा जानना चाहिये कि सयोगकेवली सातावेदनीयकर्मका बन्ध करते हैं परन्तु योगका अभाव हो जानेसे आगे आयोग केबलीके कर्मबन्ध नहीं होता है । तदनन्तर जिसके पूर्व संचित समस्त कर्मोकी निर्जरा हो चुकी है ऐसे जीवके स्वात्मोपलब्धिरूप मोक्ष शीघ्र हो जाता है । ३-४ ॥
मोक्षमें किन किन भावोंका अभाव तथा सद्भाव रहता है ? तथौपशमिकादीनां भव्यत्वस्य च संक्षयात् । मोक्षः सिद्धस्वसम्यक्त्वज्ञानदर्शनशालिनः ॥ ५ ॥
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अष्टमाधिकार अर्थ-औपशमिक आदि भाव तथा भव्यत्वभावके क्षयसे सिद्धत्व, सम्य. कत्व, ज्ञान और दर्शनसे सुशोभित आत्माका मोक्ष होता है।
भावार्थ-मोक्षमें औपशमिक, क्षायोपमिक तथा औदयिकभाव और पारिणामित मागे भव्याज भाव हो शाता है : निन्नु क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन तथा सिद्धत्व भावका सद्भाव रहता है। क्षायिकज्ञानके सहभाबो क्षायिक दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्यका सद्भाव भी रहता है।। ५॥
कर्मबन्धका अन्त होता है आधभावान्न भावस्य कर्मबन्धनसन्ततेः ।
अन्ताभावः प्रसज्येत दृष्टत्वादन्त्यबीजवत् ॥ ६॥ अर्थ-कर्मबन्धन सन्तति सम्बन्धी सद्भावकी आदिका अभाव होनेसे उसके अन्तके अभावका प्रसङ्ग नहीं आसकता, क्योंकि अन्तिम बीजके समान अनादि बस्तुका भी अन्त देखा जाता है ।
भावार्थ-यदि यहाँ कोई यह प्रश्न करे कि कर्मबन्धनकी सन्ततिकी जब आदि नहीं है तो उसका अन्त भी नहीं हो सकता तो उसका उत्तर यह है कि अनादि बस्तुका भी अन्त होता है। जैसे बीज अनादि कालसे चला आरहा है फिर भी उसके अन्तिम बीजका अभाव देखा जाता है ॥ ६ ॥
इसीको स्पष्ट करते हैं दग्धे बीजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः ।
कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्करः ।। ७॥ अर्थ-जिस प्रकार बीजके अत्यन्त जल जानेपर अङ्कर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार कर्मरूपी बीजके अत्यन्त जल जानेपर संसाररूपी अङ्कर उत्पन्न नहीं होता ॥ ७॥
पुनः बन्धकी आशङ्का नहीं है अव्यवस्था न बन्धस्य गवादीनामिवात्मनः ।
कार्यकारणविच्छेदान्मिथ्यात्वादिपरिक्षये ॥८॥ अर्थ-गाय आदिके समान आत्माके बन्धकी अव्यवस्था नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्व आदिका क्षय हो जानेपर बन्धरूप कार्यके कारणोंका विच्छेद हो जाता है।
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तत्त्वार्थसार
भावार्थ- कोई यह कहे कि जिस प्रकार गाय आदिको बन्धनसे छोड़ा जाता है और फिर भी लिया जाता है उसे प्रकार आत्मा बन्धन से मुक्त होता है और फिर भी बन्धनको प्राप्त हो जाता है सो ऐसी बात नहीं है क्योंकि कर्मबन्धके कारण मिथ्यात्व अविरति, प्रमाद, कषाय और योग हैं, इनका अभाव हो जाने से मुक्त जीवके फिर बन्ध नहीं होता है ॥ ८ ॥
जानना देखता बन्धका कारण नहीं है
૧૪
जानतः पश्यतथोर्द्ध जगत्कारुण्यतः पुनः । तस्य बन्धप्रसङ्गो न सर्वास्रवपरिक्षयात् ॥ ९॥
अर्थ - - मुक्त जीव, मुक्त होने के बाद भी करणापूर्वक जगत्को जानते तथा देखते हैं पर इससे उनके बन्धका प्रसङ्ग नहीं आता, क्योंकि उनके सब प्रकारके आस्रवोंका पूर्णरूपसे क्षय हो चुकता है ।
भावार्थ - जिस जीवके जानने, देखने के साथ मोह तथा राग-द्वेष आदिके विकल्प रहा करते हैं उसीके कर्मोका आस्रव और बन्ध हुआ करता है परन्तु मुक्त जीवके ऐसे कोई विकल्प नहीं रहते, इसलिये उनके जगत्को जानने देखनेपर भी बन्ध नहीं होता है ॥ ९ ॥
कारणके विना बन्ध संभव नहीं है
अकस्माच्च न बन्धः स्यादनिक्षिप्रसङ्गतः । बन्धोपपत्तिस्तत्र स्यान्मुक्ति प्राप्तेरनन्तरम् ॥ १० ॥
अर्थ - अकस्मात् विना कारण, मुक्त जीवके बन्ध नहीं होता, क्योंकि दिना कारण बन्ध माननेपर कभी मुक्त होनेका प्रसङ्ग ही नहीं आवेगा । मुक्तिप्राप्तिके बाद भी उनके चन्ध हो जावेगा ॥ १० ॥
स्थान से युक्त होनेके कारण मुफ्त जोवका पतन नहीं होता । पातोऽपि स्थानवत्वान्न तस्य नास्रवतच्चतः । आस्रवाद्यानपात्रस्य प्रपातोऽधो ध्रुवं भवेत् ॥ ११॥
अर्थ - मुक्त जीव स्थानवान् हैं इसलिये उनका पतन होना चाहिये, यह बात भी नहीं है क्योंकि उनके आसव तत्त्वका अभाव हो चुका है। लोकमें जहाजका आसव - जल आदिके आगमनके कारण हो नीचेको ओर निश्चितरूपसे पतन होता है ! भावार्थ -- जिस प्रकार घट, पट आदि पदार्द स्थानवान् है अर्थात् किसी स्थानपर स्थित हैं अतः कदाचित् उस स्थानसे उनका पतन भी हो जाता है
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अष्टमाधिकार
इसीप्रकार मुक्त जीव भी स्थानवान हैं अर्थात् लोकाग्ररूप स्थानपर स्थित हैं अतः कदाचित् उनका भी नोचेकी ओर पतन हो सकता है, यह आशङ्का उठाना ठीक नहीं है क्योंकि स्थानसे युक्त होनेपर भी उनके आस्रवतत्त्वका अभाव हो चुका है इसलिये उनका पतन नहीं हो सकता। लोकमें किसी जहाजमें पानीका आस्रव-आगमन होनेपर ही उसका नीचेको ओर पतन होता है अन्यथा नहीं ॥ ११ ॥
गौरवका अभाव होनेसे भी मुक्त जीवका पतन नहीं होता है तथापि गौरवाभावान्न पातोऽस्य प्रसज्यते ।
घृन्तसम्बन्धविच्छेदे पतत्याम्रफलं गुरु ॥१२॥ अर्थ-स्थानवान होनेपर भी गुरुत्वका अभाव होनेके कारण मुक्त जीवके पतनका प्रसङ्ग नहीं आता क्योंकि ठण्डलसे सम्बन्ध विच्छेद होनेपर गुरुबजनदार आमका फल नीचे गिरता है।
भावार्थ-आमके दृष्टान्तसे स्पष्ट है कि गुरु-बजनदार वस्तुका ही नीचेकी ओर पतन होता है। गुरुत्व पुद्गलका स्वभाव है आत्माका नहीं, इसलिये मुक्त हो जानेपर आत्माका मोक्षस्थानसे पतन नहीं होता ॥ १२ ।।
___सिद्धोंमें परस्पर उपरोध-रुकावट नहीं है अल्पक्षेत्रे तु सिद्धानामनन्तानां प्रसज्यते | परस्परोपरोधोऽपि नावगाहनशक्तितः ।।१३।। नानादीपप्रकाशेषु मूर्तिमत्स्वपि दृश्यते |
न विरोधः प्रदेशेऽल्पे हन्तामूर्तेषु किं पुनः ॥१४॥ अर्थ—अल्पस्थानमें अनन्त सिद्ध रहते हैं परन्तु उनमें परस्पर उपरोध नहीं होता क्योंकि उनके अवगाहन शक्ति विद्यमान है। एक छोटेसे स्थानमें जब मूर्तिमान नाना दोपोंके प्रकाशमें भी परस्पर घात करनेवाला विरोध नहीं देखा जाता तब अमूर्तिक सिद्धोंमें तो हो ही कैसे सकता है ।। ५३-१४ ।।
आकारका अभाव होनेसे मुक्त जीवोंका अभाव नहीं होता आकाराभाक्तोऽभावो न च तस्य प्रसज्यते ।
अनन्तरपरित्यक्तशरीराकारधारिणः ॥१५॥ अर्थ-आकारका अभाव होनेसे मुक्त जीवके अभावका प्रसङ्ग नहीं आता क्योंकि मुक्तजीव, मुक्त होनेसे निकट पूर्वकालमें छोड़े हुए शरीरका आकार धारण करते हैं।
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स्वार्थसार
भावार्थ - मुक्त जीव में आकारका अभाव नहीं है क्योंकि वे अन्तिम शरीरका आकार धारण करनेवाले हैं ! इस स्थितिमें अनाकार मानकर उनका अभाव नहीं माना जा सकता है ।। १५ ।।
१९६
शरीरका अभाव होनेपर आत्मा सर्वत्र फैलता नहीं है शरीरानुविधायित्वे लोकाकाशप्रमाणस्य
ततदभावाद्विसर्पणम् ।
तावन्नाकारणत्वतः ॥ १६ ॥
अर्थ - यदि आत्माका आकार शरीरके अनुरूप होता है तो शरीर अभाव होनेपर लोकाकाशप्रमाण मात्माको सर्वत्र फैल जाना चाहिये, यह बात नहीं है, क्योंकि फैलने का कोई कारण नहीं है ।
भाषार्थ - शरीर नामकर्मके सम्बन्धसे आत्मामें संकोच और विस्तार होता हैं मुक्त जीवके उसका अभाव हो चुकता है इसलिये उसके सर्वत्र फैलनेका प्रसङ्ग नहीं आता है || १६ |
दृष्टान्तद्वारा समर्थन
I
शरावचन्द्र शालादिद्रव्यावष्टम्भयोगतः अल्पो महांश्च दीपस्य प्रकाशो जायते यथा ॥१७॥ संहारेच विसर्पे च तथात्मानात्मयोगतः । तदभावात्तु मुक्तस्य न संहारविसर्पणे || १८ ||
अर्थ — जिसप्रकार शकोरा - मिट्टीका वर्तन और चन्द्रशाला --- उपरितनगृह आदि पदार्थरूप आलम्बनों के योगसे दीपकका प्रकाश छोटा और बड़ा होता है। उसी प्रकार आत्मा, अनात्मा - अर्थात् शरीरके योग से संकोच और विस्तारके समय छोटा और बड़ा मालूम होता है। चूँकि मुक्त जीवके शरीरका अभाव हो चुकता है इसलिये संकोच और विस्तार दोनों ही नहीं होते हैं ।
भावार्थ - यदि दीपकको मिट्टी के शकोरामें रखते हैं तो उसका प्रकाश संकुचित होकर उसी में समा जाता है और किसी बड़े घरमें रखते हैं तो विस्तृत होकर उसमें समा जाता है । वास्तव में प्रकाशके प्रदेश जितने हैं उतने ही हैं। परन्तु बाह्य आलम्बनके योगसे संकोच और विस्ताररूप होनेसे छोटे-बड़े मालूम होते हैं। इसी प्रकार आत्मा के प्रदेश परिमाणकी अपेक्षा लोकाकाशके बराबर हैं अर्थात् आकाशके एक प्रदेशके ऊपर आत्माका एक प्रदेश स्थित हो तो आत्मा समस्त लोकाकाशमें फैल सकता है परन्तु आत्माका संकुचित और विस्तृत होना शरीर के परिमाणपर निर्भर है। मुक्त जीवके शरीरका अभाव हो जाता है इसलिये
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अटमाधिकार उसका संकुचित और विस्तृत होना बन्द हो जाता है ! मुक्त जीवका परिमाण अन्तिम शरीरसे कुछ न्यून रहता है। प्रश्न यह था कि जिस प्रकार शकोरा आदि बाह्य पदार्थका आलम्बन हटनेपर दीपकका प्रकाश फैल जाता है इसी प्रकार शरीरका आलम्बन हटने पर आत्मा लोकाकाशमें क्यों नहीं फैल जाता है। उसका उत्तर यह दिया गया है कि आत्मामें यद्यपि संकुचित और विस्तृत होनेको शक्ति है तथापि शरीर नामकर्मका अस्तित्व रहते ही वह शक्ति अपना कार्य कर सकती है उसके अभावमें नहीं। मुक्त जीवक चूंकि शरीरनामकर्मका अस्तित्व नहीं है इसलिये उनकी आत्माका लोकाकाशके बराबर फैल जाना संभव नहीं होता है ॥ १७-१८॥ मुक्तजीव, मुक्त होने के स्थानपर अवस्थित नहीं रहकर अध्वंगमन करते हैं
कस्यचिच्छसलामोक्षे तत्रावस्थानदर्शनात् । ___ अवस्थानं न मुक्तानामूवव्रज्यात्मकत्वतः ।।१९।। अर्थ-किसी जीवकी, सांकलसे छुटकारा होनेपर उसी स्थानपर स्थिति देखी जाती है परन्तु मुक्त जीवका चूँकि ऊवंगमन स्वभाव है इसलिये कर्मबन्धनसे छुटकारा मिलनेपर उसी स्थानपर स्थिति नहीं रहती ।। १९ ।। ___भावार्थ-मुक्त जीवका ऊध्र्वगमन स्वभाव है इसलिये वह कर्मोसे मुक्त होते ही ऊपरको ओर गमन करता है । इसका यह गमन लोकके अन्त भाग तक होता है ! एक समयमें वहाँ पहुँच जाता है और उसके बाद अनन्त कालके लिये वहीं स्थिर हो जाता है ।। १९ ।।
कर्मक्षयका क्रम सम्यक्त्वज्ञानचारिसंयुक्तस्यात्मनो भृशम् । निरास्रवत्वाच्छिमायां नवायां कर्मसन्ततौ ॥२०॥ पूर्वार्जितं क्षपयतो यथोक्तैः क्षयहेतुभिः । संसारत्रीजं कात्स्त्येन मोहनीयं प्रहीयते ॥२१॥ ततोऽन्तरायज्ञानघ्नदर्शनधनान्धनन्तरम् । प्रहीन्तेऽस्य युगपत्त्रीणि कर्माण्यशेषतः ॥२२॥ गर्भसूच्यां विनष्टायां यथा बालो विनश्यति । तथा कर्म क्षयं याति मोहनीये क्षयं गते ॥२३।। ततः क्षीणचतु:कर्मा प्राप्तोऽथाख्यांतसंयमम् । बीजबन्धननिर्मुक्तः स्नातकः परमेश्वरः ॥२४॥
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१९८
तत्त्वार्थसार
शेषकर्म फलापेक्षः शुद्धो बुद्धो निरामयः । सर्वज्ञः सर्वदर्शी च जिनो भवति केवली || २५ || निर्वाणमधिगच्छति । यथा दग्धेन्धनो वह्निर्निरुपादानसन्ततिः ||२६||
कृत्स्नकर्मक्षयादूर्ध्वं
अर्थ - जब यह आत्मा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र से अत्यन्त युक्त होता है, आस्रवसे रहित होने के कारण नवीन कर्मोंको सन्तति कट जाती है तथा यह आत्मा पहले कहे हुए क्षयके कारणोंके द्वारा पूर्वबद्ध कर्मोंका क्षय करने लगता है तब संसारका बीजभूत मोहनीय कर्म सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है । तदनन्तर अन्तराय, ज्ञानावरण और दर्शनावरण ये तीन कर्म एक साथ सम्पूर्ण रूपसे नष्ट होते हैं । जिसप्रकार गर्भसूचोके नष्ट होनेपर बालक मर जाता है उसी प्रकार मोहनीय कर्मके नष्ट होनेपर उक्त कर्म नष्ट हो जाते हैं । तदनन्तर जिसके चार घातिया कर्म नष्ट हो चुके हैं, जो अथाख्यात – अथवा यथाख्यात चारित्रको प्राप्त है जो बीजबन्ध निर्मुक्त है, स्नातक है, परमेश्वर है, शेष बचे हुए चार अघातिया कर्मोंको अपेक्षासे सहित है अर्थात् उनका फल भोग रहा हैं, शुद्ध है, बुद्ध है, नोरोग है, सर्वज्ञ है और सर्वदर्शी है ऐसा आत्मा केवलो जिन - केवलज्ञानी अरहन्त होता है । उसके बाद जिसने प्राप्त इन्धनको जला दिया है तथा जिसके नवीन इन्धनको सन्तति नष्ट हो चुकी है ऐसी अग्नि जिसप्रकार निर्वाणको प्राप्त होती है-बुझ जाती है उसी प्रकार उक्त आत्मा समस्त कर्मीका क्षय होनेसे निर्वाणको प्राप्त होता है - मोक्षको प्राप्तकर लेता है ॥। २०-२६ ॥
मुक्तजीवोंके ऊर्ध्वगमनस्वभावका दृष्टान्तों द्वारा समर्थन तदनन्तरमेवोद्र्ध्वमालोकान्तात्स गच्छति । पूर्वप्रयोगासङ्गत्वादुबन्धच्छेदोर्ध्व गौरवैः ||२७|| कुलालचक्रे डोलायामिषौ चापि यथेष्यते । पूर्वप्रयोगात्कर्मेह तथा सिद्धगतिः स्मृता ॥ २८ ॥ मृल्लेपसङ्गनिर्मोक्षाद्यथा दृष्टास्वलाम्बुनः | कर्मबन्धविनिर्मोक्षात्तथा सिद्धगतिः स्मृता ॥ २९॥
।
एरण्डस्फुटदेलासु बन्धच्छेदाद्यथा गतिः । कर्मबन्धन विकछेदाज्जीवस्यापि
तथेष्यते ||३०||
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अष्टमाधिकार यथास्तिर्यगूधं च लोष्टवाम्बग्निवोचयः । स्वभावतः प्रवर्तन्ते तथोक्गतिरात्मनाम् ॥३१॥ ऊध्वंगौरवधर्माणी जीवा इति जिनोत्तमः । अधोगौरवधर्माणः पुद्गला इति चोदितम् ॥३२॥ अतस्तु गतिवैकृत्यं तेषां यदुपलभ्यते । कर्मणः प्रणिधान प्रयोगशान नदिध्यते ॥३३॥ अवस्तियक्तथोद्ध्वं च जीवानां कर्मजागतिः ।
ऊध्र्वमेव स्वभावेन भवति क्षीणकर्मणाम् ॥३४॥ अर्थ-समस्त कर्मोंका क्षय होनेके बाद वह जीव पूर्वप्रयोग, असङ्गत्व, बन्धच्छेद तथा ऊर्ध्वगौरव स्वभाब इन चार कारणोंसे लोकके अंत तक गमन करता है । जिस प्रकार कुम्भकारके चक्र, हिंडोला और बाणमें पूर्वप्रयोगसेपहलेके संस्कारसे आर्म-क्रिया होती है उसी प्रकार पूर्वप्रयोगसे सिद्धजीवोंकी मति मानी गई है। जिस प्रकार मिट्टीके लेपका सङ्ग छूट जानेसे पानीमें तूमड़ी की ऊध्वगति मानी गई है। जिस प्रकार चोंडीका बन्धन नष्ट होने पर चटकती हुई एरण्डकी बिजी में कर्ध्वगति होती है उसी प्रकार कर्मवन्धनके नष्ट होनेसे मुक्तजीवको ऊर्ध्वगति मानी जाती है। जिस प्रकार पत्थरके टेलोंको गति मोचेकी ओर, बायुको गति तिरछी-चारों ओर और अग्निकी ज्वालाओंकी गति ऊपर की ओर स्वभावसे होती है उसी तरह मुक्तजीवोंकी गति ऊपरकी ओर स्वभावसे होती है । जीच कर्ध्वगति स्वभाव वाले हैं और पुद्गल अधोगति स्वभाववाले हैं ऐसा जिनेन्द्र भगवानने कहा है। उन जीव और पुद्गलोंमें जो गतिकी विकृति--विभिन्नता पाई जाती है वह कर्मों के कारण, किसी अन्य वस्तुके प्रतिघातसे अथवा प्रयोगविशेषसे मानी जाती है। संसारी जीवोंकी कर्मजन्य गति नोचे, तिरछी और ऊपरकी ओर होती है परन्तु कमरहित जीवोंकी गति स्वभावसे ऊपरकी ओर ही होती है ।। २७-३४ ।।
कर्मक्षय और ऊथ्वंगमन साप हो साथ होती है द्रव्यस्य कर्मणो यद्वदुत्पत्त्यारम्भवीतयः । समं तथैव सिद्धस्य गतिर्मोक्षे भवक्षयात् ।।३५।। उत्पत्तिश्च विनाशश्च प्रकाशतमसोरिह । युगपद्भवतो यद्वत्तभिर्वाणकर्मणोः ॥३६॥
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सस्वार्थसार अर्थ-जिस प्रकार द्रव्यकर्मकी उत्पत्तिका प्रारम्भ और विनाश साथ ही साथ होते हैं उसी प्रकार सिद्ध भगवान्की मोक्षविषयक गति संसारका क्षय होते ही साथ-ही-साथ होती है 1 जिम प्रकार प्रकाशकी उत्पत्ति और अन्धकारका विनाश एक साथ होता है उसी प्रकार निर्वाणको उत्पत्ति और कर्मका विनाश एक साथ होता है ।। ३५-३६ ॥ सिद्ध भगवान्के किस कर्मके अभावमें कौन गुण प्रकट होता है ?
ज्ञानावरणहानात्ते केवलज्ञानशालिनः । दर्शनावरणच्छेदादुद्यत्केवलदर्शनाः ॥३७॥ वेदनीयसमुच्छेदादव्यावाधत्वमाश्रिताः । मोहनीयसमुच्छेदात्सम्यक्त्वमचलं श्रिताः ॥३८॥ आयुःकर्मसमुच्छेदादवगाहनशालिनः । नामकर्मसमुच्छेदात्परमं सौम्यमाश्रिताः ॥३९॥ गोत्रकर्मसमुन्छेदात्सदाऽगौरवलाघवाः ।
अन्तरायसमुच्छेदादनन्तवीर्यामाश्रिताः ॥४०॥ अर्थ-वे सिद्ध भगवान् झानावरण कर्मका क्षय होनेसे केवलज्ञानसे सुशोभित रहते हैं, दर्शनावरण कर्मका क्षय होनेसे केवलदर्शनसे सहित होते हैं, वेदनीय कर्मका क्षय होनेसे अन्यावाधत्वगुणको प्राप्त होते हैं, मोहनीय कर्मका विनाश होनेसे अविनाशी सम्यक्त्वको प्राप्त होते हैं, आयुकर्मका बिच्छेद होनेसे अवगाहना को प्राप्त होते हैं, नामकर्मका उच्छेद होनेसे सूक्ष्मत्वगुणको प्राप्त हैं, गोत्रकर्मका विनाश होनेसे सदा अगुरुलघुगुणसे सहित होते हैं और अन्तरायका नाश होनेसे अनन्तवीर्यको प्राप्त होते हैं ॥ ३७-४० ॥
सिद्धों में विशेषताके कारण क्या हैं ? काललिङ्गगतिक्षेत्रतीर्थज्ञानावगाहनः । बुद्धयोधितचारित्रसङ्ग्याल्पबहुतान्तरैः ॥४१॥ प्रत्युत्पन्ननयादेशात्ततः प्रज्ञापनादपि ।
अप्रमत्तैर्बुधैः सिद्धाः साधनीया यथागमम् ॥४२।। अर्थ-प्रमादरहित विद्वानों द्वारा वर्तमान नय तथा भूतपूर्व प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा काल, लिङ्ग, गति, क्षेत्र, तीर्थ, ज्ञान, अवगाहना, बुद्धबोधित,
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सष्टमाधिकार चारित्र, संख्या, अल्पबहुत्व और अन्तर इन बारह अनुयोगोंसे सिद्ध भगवान् आगमके अनुसार साधनीय हैं-विचार करने योग्य हैं।
भावार्थ-जो नय वर्तमानपर्यायको ग्रहण करता है वह प्रत्युत्पन्न नय है और जो भूतपर्यायको ग्रहण करता है वह प्रज्ञापन नय है। इन दोनों नयोंकी अपेक्षा सिद्ध भगवानको विशेषताका विचार काल आदि अनुयोगोंसे आगममें किया गया है । जैसे___ काल-कालकी अपेक्षा यह जीव एक समयमें और उत्सपिणी तथा अवसर्पिणी में सामान्यरूपसे सिद्ध होता हुआ सिद्ध होता है-मुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है और भूतपूर्वप्रज्ञापन नयको अपेक्षा दो तरहसे सिद्ध होता है—एक जन्मकी अपेक्षा और दूसरा संहरणको अपेक्षा । जन्मकी अपेक्षा सामान्यरूपसे उत्सपिणी और अवसर्पिणी दोनाम उत्पन्न हुला जीव सिद्ध होता है । विशेषरूपसे अवसर्पिणीके सुपमादुःषमा नामक तृतीयकालके अन्तिम भाग तथा दुःषमसुःषमा नामक चतुर्थकालमें उत्पन्न हुआ जीव सिद्ध होता है। दुःपमासुपमा नामक चतुर्थकालमें उत्पन्न हुआ जीव दुःषमा नामक पञ्चमकालमै सिद्ध हो सकता है परन्तु पञ्चमकालमें उत्पन्न हुआ जोव सिद्ध नहीं होता। संहरणकी अपेक्षा उत्सपिणी अवसर्पिणीके सब कालोंमें सिद्ध होता है अर्थात् तृतीयकालके अन्तिम भाग और चतुर्थकालके सम्पूर्ण समयमें उत्पन्न हुए मनुष्यको यदि कोई व्यन्सरादि देव उठाकर जहाँ प्रथमादिकाल वर्त रहा है ऐसे भोगभूमिके या जहाँ पञ्चम या षष्ठ काल वर्त रहा है ऐसे कर्मभूमिके क्षेत्रमें रख देवे तो यहाँसे भी वह सिद्ध हो सकता है। ___लिङ्ग-लिङ्गका अर्थ बेद है । वेदके स्त्री, पुरुष और नपुंसकको अपेक्षा तीन भेद हैं । ये तीनों बेद भाव और द्रव्यकी अपेक्षा दो-दो प्रकारके हैं । द्रव्यवेद की अपेक्षा सिर्फ पुरुषवेदसे ही यह जीव सिद्ध होता है परन्तु भाववेदकी अपेक्षा तीनों वेदोंसे सिद्ध हो सकता है। प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा अवेदसे ही सिद्ध होता है क्योंकि वेदका सद्भाव नवम गुणस्थान तक रहता है और मोक्ष चौदहवें गुणस्थानके अन्त समयमें होता है। किन्तु भूतपूर्वप्रज्ञापन नयकी अपेक्षा तीनों वेदोंसे सिद्ध हो सकता है । अथवा लिङ्गका दूसरा अर्थ मुद्रा अथवा वेष भी भी है । उस अपेक्षा लिङ्ग के दो भेद है--एक निर्ग्रन्थलिङ्ग और दूसरा सग्रन्थ लिङ्ग । इनमें प्रत्युत्पन्न नयको अपेक्षा निर्गन्ध लिङ्ग-दिगम्बर मुद्रासे हो सिद्ध होता है और भूतपूर्वप्रज्ञापन नयको अपेक्षा सग्रन्थ लिङ्गसे भी सिद्ध होता है।
गति-प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा सिद्धिगतिमें ही सिद्ध होता है अर्थात् इस जीवमें सिद्धत्वको व्यवहार तभी होता है जब यह चारों गतियोंसे निर्मुक्त हो
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२०२
तत्वार्थसार
जाता है । भूतपूर्व प्रज्ञापन नयको अपेक्षा अनन्तर गति और एकान्तर गतिसे चर्चा होती है । अनन्तर गतिकी अपेक्षा सिर्फ मनुष्यगतिसे सिद्ध होता है और एकान्तर गतिकी अपेक्षा चारों गतियोंमें उत्पन्न हुआ जीव सिद्ध होता है ।
क्षेत्र - प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा सिद्धिक्षेत्र अथवा स्वकीय आत्म- प्रदेशों में सिद्ध होता है और भूतपूर्वप्रज्ञापन नयको अपेक्षा पन्द्रह कर्मभूमियां में उत्पन्न हुआ मनुष्य सिद्ध होता है । संहरणकी अपेक्षा समस्त अढ़ाई द्वीपसे सिद्ध होता है।
तीर्थ -- कोई जीव तीर्थंकर होकर सिद्ध होता है और कोई तीर्थंकर हुए विना ही सिद्ध होता है। जो तीर्थंकर हुए विना सिद्ध होता है वह भी दो प्रकारका है— कोई तो तीर्थकरके रहते हुए सिद्ध होता है और कोई तीर्थंकरके मुक्त हो जाने के वाद सिद्ध होता है ।
ज्ञान - प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा सिर्फ केवलज्ञान से हो जीव सिद्ध होता है और भूतपूर्व प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा मति, श्रुत इन दो ज्ञानोंसे, मति, श्रुत, अवधि अथवा मत, श्रुत, मन:पर्यय इन तीन ज्ञानोंसे और मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय इन चार ज्ञानोसे सिद्ध होता है ।
अवगाहन - अवगाहनाके उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्यको अपेक्षा तीन भेद हैं । उत्कृष्ट अवगाहनाकी अपेक्षा पाँचसी पच्चीस धनुषकी अवगाहनावाला मनुष्य और जघन्य अवगाहनाकी अपेक्षा साड़े तीन हाथको अवगाहनावाला मनुष्य सिद्ध होता है इससे अधिक और कम अवगाहनावाला मनुष्य सिद्ध नहीं होता । मध्यम अवगाहना के अनेक विकल्प हैं ।
बुद्धबोधित - कोई मनुष्य पूर्वभवसम्बन्धी संस्कारकी प्रबलतासे स्वयं हो विरक्त होकर मुनिदीक्षा धारण कर सिद्ध होता है और कोई मनुष्य दूसरेके समज्ञानेपर विरक्त हो मुनिदीक्षा धारण कर सिद्ध होता है। जो स्वयं विरक्त होता है उसे बुद्ध अथवा प्रत्येकबुद्ध या स्वयंबुद्ध कहते हैं और जो दूसरेके समझानेपर विरक्त होता है वह बोधितबुद्ध कहलाता है ।
चारित्र - प्रत्युत्पन्न नयको अपेक्षा न चारित्रसे और न अचारित्रसे सिद्ध होता है किन्तु ऐसे भाव से सिद्ध होता है जिसे चारित्र या अचारित्र कुछ भी नहीं कहते हैं। भूतपूर्वप्रज्ञापन नयकी अपेक्षा अनन्तर और व्यवहित के भेदसे दो प्रकारकी चर्चा होती है । अनन्तर भेदकी अपेक्षा सिर्फ यथाख्यातचारित्र से मनुष्य सिद्ध होता है और व्यवहितकी अपेक्षा सामायिक, छेदोपस्थापना, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात इन चार प्रकारके चारित्रोंसे अथवा जिस जीव के परिहारविशुद्धि नामका चारित्र होता है उसकी अपेक्षा सामायिक आदि पांचों चारित्रोंसे सिद्ध होता है।
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अष्टमाधिकार
२०३
संख्या - जघन्यकी अपेक्षा एक समय में एक और उत्कृष्टको अपेक्षा एक्सो आठ जीव सिद्ध होते हैं ।
अल्पबहुत्व - क्षेत्र आदिके भेदसे विशेषताको प्राप्त हुए सिद्ध जीवोंमें जो संख्या की अपेक्षा होनाधिकता होती है उसे अल्पबहुत्व कहते हैं । प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा सब जोव सिद्धिक्षेत्र में ही सिद्ध होते हैं इसलिये उनमें किसी प्रकारका अल्पबहुत्व नहीं है । परन्तु जब भूतपूर्व नयकी अपेक्षा चर्चा होती है तब अल्पबहुत्व सिद्ध होता है । जैसे क्षेत्रसिद्ध जन्म और संहरणकी अपेक्षा दो प्रकारके हैं । उनमें संहरणसिद्ध अल्प हैं और जन्मसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं । संहरण भी स्वकृत और परकृतकी अपेक्षा दो प्रकारका होता है । देव या विद्याधरोंके द्वारा किया हुआ संहरण परकृत संहरण है और चारण ऋद्धिके धारक कोई मुनि स्वयं ही जब किसी भोगभूमि आदिके क्षेत्र में जाकर विराजमान होते हैं तब स्वकृतसंहरण कहलाता है | क्षेत्रोंके कर्मभूमि, अकर्मभूमि, समुद्र, द्वीप, ऊर्ध्व अधस्तात् और नियंकुके भेदसे अनेक भेद हैं। इनमें ऊर्ध्वलोक - आकाशसे सिद्ध होनेवाले सबसे कम हैं, अधोलोक --- गुफा आदि निम्नप्रदेशोंसे सिद्ध होनेवाले उनकी अपेक्षा संख्यातगुणे हैं तिर्यक्लोक - समान धरातलपर स्थित द्वीप समुद्रोंसे सिद्ध होनेवाले उनकी अपेक्षा गुने हैं । समुद्रसिद्ध सबसे भय हैं, द्वीपसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं । यह सामान्यको अपेक्षा चर्चा है। विशेषताकी अपेक्षा लवणसमुद्रसे सिद्ध होनेवाले सबसे थोड़े हैं, कालोदधि से सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यातगुणे हैं, जम्बूद्वीपसे सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यातगुणे हैं, धातकीखण्डसे सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यातगुणे हैं, और पुष्करार्थसे सिद्ध होनेवाले उनसे भी संख्यातगुणे है | अकर्मभूमि से सिद्ध होनेवाले अल्प हैं और कर्मभूमिसे सिद्ध होनेवाले उनके संख्यातगुणे हैं । कालके उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी और अनुत्सर्पिण्य
सर्पिणीकी अपेक्षा तीन भेद हैं। इनमें उत्सर्पिणीसिद्ध सबसे थोड़े हैं, अवसर्पिणी सिद्ध उनकी अपेक्षा विशेष अधिक हैं और अनुत्सर्पिण्यनवसपणीसिद्ध उनसे संख्यातगुण हैं । यह भूतपूर्व प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा चर्चा है । प्रत्युत्पन्न नयकी अपेक्षा एक समय में ही सिद्ध होते हैं इसलिये उनमें अल्पबहुत्का विचार नहीं होता है । गति अनुयोगकी अपेक्षा प्रत्युत्पन्न नयको विवक्षासे सब सिद्धिगतिमें ही सिद्ध होते हैं इसलिये अल्पबहुत नहीं है । तथा भूतपूर्वनयकी अपेक्षा अनन्तर गतिकी अपेक्षा सब मनुष्यगति में सिद्ध होते हैं इसलिये उनमें भी अल्पबहुत्व नहीं है किन्तु एकान्तर गतिकी अपेक्षा अल्पबहुत्व होता है । जैसे तियंग अनन्तर गतिसे सिद्ध होनेवाले सबसे थोड़े हैं, मनुष्य अनन्तर गति से सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यातगुणे हैं, नरक अनन्तरगतिसे सिद्ध होनेवाले उनसे असंख्यातगुणे हैं और देव अनन्तर गति से सिद्ध होनेवाले उनसे असंख्यातगुणे हैं । लिङ्गकी अपेक्षा चर्चा
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२०४
तत्वार्थसार करनेपर प्रत्युत्पन्न नयकी विवक्षासे सब जीव अवेद अवस्थामें ही सिद्ध होते हैं इसलिये कोई अल्पबहुत्व नहीं है परन्तु भूतपूर्वप्रज्ञापन नयको विवक्षासे नपुंसक वेदसिद्ध सबसे थोड़े हैं, स्त्रीवेदसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं और वेदसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं | तीर्थानुयोगकी अपेक्षा तीर्थकरसिद्ध थोड़े हैं और सामान्यसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं । चारित्रानुयोगकी अपेक्षा प्रत्युत्पन्न नबकी विवक्षासे चर्चा करनेपर चूंकि सब अव्यपदेशभावसे सिद्ध होते हैं इसलिये कोई अल्पबहुत्व नहीं है। भूतपूर्वप्रज्ञापन नयकी विवक्षासे भी यथाख्यातचारित्र नामक अनन्तर चारित्रकोई अल्पवहत्व नहीं है । व्यवधानको अपेक्षा सानायिकादि पांचों चारित्रके समूहसे सिद्ध होनेवाले अल्प हैं और परिहारविशुद्धि रहित चार चारित्रोंके समूहसे सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यात्तगुणे हैं 1 बुद्धबोधित अनुयोगको अपेक्षा प्रत्येकावुद्ध थोड़े हैं और बोधितबुद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं। ज्ञानानुयोगकी अपेक्षा प्रत्युत्पन्न नयकी विवक्षामें सब केवलज्ञानसे सिद्ध होते हैं इसलिये अल्पबहुत्व नहीं है। किन्तु भूतपूर्वप्रज्ञापन नयको अपेक्षा द्विज्ञानसिद्ध सबसे अल्प हैं, चतुर्ज्ञानसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं और विज्ञानसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं ! यह सामान्यकी अपेक्षा चर्चा है। विशेषकी अपेक्षा मतिश्रुतमनःपर्ययज्ञानसिद्ध सबसे थोड़े हैं, मतिश्रुतज्ञानसिद्ध उनके संख्यातगुणे हैं, मतिश्रुतावधिमनःपर्पयज्ञानसिद्ध उनसे संख्यातगुण हैं और मतिश्रुतावधिज्ञानसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं। अवगाहनानुयोगको अपेक्षा अनन्तर अवगाहनाकी विवक्षासे चर्चा करनेपर जघन्य अवगाहनासे सिद्ध होनेवाले सबसे थोड़े हैं, उत्कृष्ट अवगाहनासे सिद्ध होनेवाले उनसे संख्यातगुण हैं, यवमध्यसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं, अधस्ताद्यवमध्यसिद्ध उनसे संख्यातगुणे हैं और अर्ध्वं यत्रमध्मसिद्ध उनसे कुछ विशेष अधिक है 1 अनन्तर अनुयोगकी अपेक्षा अष्टसमयानन्तर सिद्ध सबसे थोड़े हैं, सप्तसमयानन्तरसिद्ध उनसे संख्यातगणे हैं, इस तरह हिसमयानन्तर सिद्धों तक असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे हैं। संख्यानुयोगको अपेक्षा अष्टोत्तरशतसिद्ध सबसे थोड़े हैं, अष्टोत्तरशतसिद्धोंसे लेकर पञ्चाशत् सिद्धों तक अनन्तगुणे-अनन्तगुणे हैं, एकोनपञ्चाशत् सिद्धोसे लेकर पञ्चविंशति सिद्धों तक असंख्यातगुणे हैं और चतुर्विशति सिद्धोंसे लेकर एकसिद्धों तक उत्तरोत्तर संख्यातगुणे-संख्यातगुणे हैं।
अन्तर-जघन्यसे एक समय और उत्कृष्ठको अपेक्षा छहमासका अन्तर जानना चाहिये ॥ ४१-४२ ।।
सिद्धोंको अन्य विशेषता तादात्म्यादुपयुक्तास्ते केवलज्ञानदर्शने । सम्यक्त्वसिद्धतावस्था हेत्वभावाच्च निःक्रियाः ॥४॥
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अष्टमाधिकार
ततोऽप्यूर्ध्वगतिस्तेषां कस्मानास्तीति चेन्मतिः । धर्मास्तिकायस्याभावात्स हि हेतुर्गतेः परः || ४४ ||
२०५
अर्थ - बे सिद्ध भगवान् तादात्म्यसम्बन्ध होने के कारण केवलज्ञान और केवलदर्शन के विषय में सदा उपयुक्त रहते हैं तथा सम्यवत्व और सिद्धता अवस्थाको प्राप्त हैं । हेतुका अभाव होनेसे वे निःक्रिया - क्रियासे रहित हैं । यहाँ कोई ऐसा विचार करे कि लोकान्त के आगे भी सिद्धों की गति क्यों नहीं होती है तो उसका उत्तर यह है कि लोकान्तके आगे धर्मास्तिकायका अभाव है । वास्तवमें धर्मास्तिकाय गतिका परम कारण है ।
भावार्थ – सिद्धों के औपशमिक आदि भावोंका तो अभाव हो जाता है परन्तु सम्यग्दर्शन, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्वगुण उनमें सदा विद्यमान रहते हैं। सिद्धों का केवलज्ञान और केवलदर्शन सदा उपयोगरूप ही होता है । उनमें लब्धि अवस्था नहीं रहती । सिद्ध होने के बाद ही वे ऊर्ध्वगति स्वभाववाले होने से उर्ध्वगमनके द्वारा लोकके अन्तमें पहुँच जाते हैं । लोक्के अन्त में पन्द्रहसौ पचहत्तर धनुष प्रमाण विस्तार से युक्त तनुवात वलय है। उसके उपरितन भाग के पांच सौ पच्चीस धनुषका क्षेत्र सिद्धक्षेत्र कहलाता है । उसी में सिद्धोंका निवास है । सब सिद्धोंके शिर समान स्थानपर हैं और नीचेका भाग अपनी-अपनी अवगाहना अनुसार नीचा रहता है। जिनकी अवगाहना पांचसौ पच्चीस धनुषकी होती है वे पूरे सिद्धक्षेत्र में ऊपरसे नीचे तक स्थित रहते हैं । एक समयकी क्रिया के बाद सिद्ध भगवान् सदाके लिये निष्क्रिय हो जाते हैं । यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि जब सिद्धोंका कर्ध्वगमन स्वभाव है तब वे लोकान्तके आगे आलोकाकाशमें भी क्यों नहीं चले जाते ? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि गमनका सहकारी कारण धर्मास्तिकाय है उसका सद्भाव लोकान्त तक ही है, आगे नहीं, इसलिये कारण के अभाव में आगे गमन नहीं होता है ॥४३-४४|| सिद्धोंके सुखका वर्णन
संसारविषयातीतं सिद्धानामव्ययं सुखम् ।
अव्याबाधमिति प्रोक्तं परमं परमर्षिभिः ॥ ४५ ॥
अर्थ -- सिद्धों का सुख संसारके विषयोंसे अतीत, अविनाशी, अन्याबाध तथा परमोत्कृष्ट है ऐसा परमऋषियोंने कहा है ।। ४५ ।
शरीररहित सिद्धों के सुख किस प्रकार हो सकता है ? जन्तोर्नष्टाष्टकर्मणः । कथं भवति मुक्तस्य सुखमित्युत्तरं शृणु ॥ ४६ ॥
स्यादेतदशरीरस्य
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तस्वार्थसार
लोके चतुविदार्थेषु सुखशब्दः प्रयुज्यते । विपरो वेदनामाने विपाके सोक्ष एवं च ॥४७॥ सुखो वह्निः सुखो वायुर्विषयेष्विह कथ्यते । दुःखाभावे च पुरुषः सुखितोऽस्मीति भाषते ||४८|| पुण्यकर्मविपाकाच्च सुखमिष्टेन्द्रियार्थजम् । कर्मक्लेश विमोक्षाच मोक्षे सुखमनुत्तमम् ||४९||
|
अर्थ --- यदि कोई यह प्रश्न करे कि शरीररहित एवं अष्टकर्मो को नष्ट करने वाले मुक्तजीब के सुख कैसे हो सकता है तो उसका उत्तर यह हैं, सुनो। इस लोक विषय, बेदनाका अभाव, विपाक और मोक्ष इन चार अर्थों में सुख शब्दका प्रयोग होता है । जैसे अग्नि सुखरूप है, वायु सुखरूप है, यहां विषय अर्थ में सुखशब्द कहा जाता है । दुःखका अभाव होनेपर पुरुष कहता है कि मैं सुखी हूँ यहाँ वेदनाके अभाव में सुखशब्द प्रयुक्त हुआ है। पुण्यकर्मके उदय से इन्द्रियों के इट पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ सुख होता है । यहाँ विपाक - कर्मोदयमें सुखशब्दका प्रयोग है । और कर्मजन्यक्लेशसे छुटकारा मिलनेसे मोक्षमें उत्कृष्ट सुख होता है । यहाँ मोक्ष अर्थ में सुखका प्रयोग है।
भावार्थ - मोक्षमें मुक्तजीवके यद्यपि शरीर नहीं है और न किसी कर्मका उदय है तथापि कर्मजन्यक्लेशोंसे छुटकारा मिल जानेके कारण उन्हें सर्वश्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। सुख आत्माका स्वाभाविक गुण है परन्तु मोहादि कमौके उदयकाल में उसका स्वाभाविक परिणमन न होकर दुःखरूप वैभाविक परिणमन होता है। मुक्तजीवके इन मोहादि कर्मो का सर्वथा अभाव हो जाता है, इसीलिये उनके सुखगुणका स्वाभाविक परिणमन होता है। यही कारण है कि उनके समान सुख संसारमें किसी अन्य प्राणी के नहीं होता है ।। ४६-४९ ।।
मुक्तजीवोंका सुख सुषुप्त अवस्थाके समान नहीं हैं सुप्तावस्थथा तुल्यां केचिदिच्छन्ति निर्वृतिम् । तदयुक्तं क्रियावच्चात्सुखातिशयतस्तथा ॥ ५०||
श्रमक्लेममदव्याधिमदनेभ्यश्च संभवात् । मोहोत्पत्तिर्विपाका दर्शनघ्नस्य कर्मणः ॥ ५१ ॥
अर्थ- कोई कहते हैं कि निर्वाण सुषुप्त अवस्थाके तुल्य है परन्तु उनका वैसा कहना अयुक्त है-टोक नहीं है क्योंकि मुक्तजीव क्रियावान् हैं जब कि सुषुप्तावस्था में कोई क्रिया नहीं होती तथा मुक्तजीवके सुखको अधिकता है जबकि सुषुप्त अवस्थामें सुखका रञ्चमात्र भी अनुभव नहीं होता । सुषुप्तावस्था
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अपमात्रिकार
२०७ को उत्पत्ति श्नम, स्वेद, नशा, बीमारी और कामसेवनसे होती है तथा उसमें दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे मोहकी उत्पत्ति होती रहती है जबकि मुक्तजीवके यह सब संभव नहीं है ॥ ५०-५१ ।।
मुक्तजीयका सुख निरुपम है लोके तत्सदृशो ह्यर्थः कृत्स्नेऽप्यन्यो न विद्यते । उपमीयेत तयेन तस्मानिरुपमं स्मृतम् ।।५।। लिङ्गप्रसिद्धेः प्रामाण्यमनुमानोपमानयोः ।
अलिङ्गं चाप्रसिद्धं यत्तेनानुपमं स्मृतम् ।।५३।। अर्थ-समस्त संसारमें उसके समान अन्य पदार्थ नहीं है जिससे कि मुक्तजीवोंके सुखको उपमा दी जा सके, इसलिये वह निरुपम माना गया है । लिङ्ग अर्थात् हेतुसे अनुमानमें और प्रसिद्धिसे उपमानमें प्रामाणिकता आती है परन्तु मुक्तजीवोंका सुख अलिङ्ग है-हेतुरहित है तथा अप्रसिद्ध है इसलिये वह अनुमान और उपमान प्रमाणका विषय न होकर अनुपम माना गया
अर्हन्त भगवान्को आज्ञासे मुक्तजीवोंका सुख माना जाता है।
प्रत्यक्षं तद्भगवतामईतां से प्रभाषितम् ।
गृह्यतेऽस्तीत्यतः प्राज्ञेन च छमस्थपरीक्षया ।।४।। अर्थ- मुक्तजीवोंका वह मुख अर्हन्त भगवानके प्रत्यक्ष है तथा उन्हीके द्वारा उसका कथन किया गया है इसलिये 'वह है' इस तरह विद्वज्जनोंके द्वारा स्वीकृत किया जाता है, अज्ञानी जीवोंकी परीक्षासे वह स्वीकृत नहीं किया जाता।
भावार्थ-अर्हन्त भगवान्ने प्रत्यक्ष अनुभव कर मुक्त, जीवोंके सुखका निरूपण किया है इसलिये उसका सद्भाव माना जाता है ।। ५४ !|
मोक्षतत्त्वका उपसंहार इत्येतन्मोक्षतत्वं यः श्रद्धत्ते वेत्युपेक्षते ।
शेषतचैः समं पभिः स हि निर्वाणभाग्भवेत् ।।५।। अर्थ-इस प्रकार शेष छह तत्वोंके साथ जो मोक्षतत्त्वकी श्रद्धा करता है, उसे जानता है तथा उसकी उपेक्षा करता है अर्थात् रागद्वेषरहित प्रवृत्ति करता है वह नियमसे निर्वाणको प्राप्त होता है !! ५५।। इस प्रकार श्रीअमृतवन्द्रानार्य द्वारा विरचित तत्वार्थसारमें मोक्षतत्त्वका
वर्णन करनेवाला अपम अधिकार पूर्ण हुआ।
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उपसंहार प्रमाणनयनिक्षेपनिर्देशादिसदादिभिः ।
सप्ततचीमिति ज्ञात्वा मोक्षमार्ग समाश्रयेत् ।।१।। अर्थ-::: प्रमः ।, प, निलेप, निदि स. संख्या आदि उपायोंसे सात तत्त्वोंके समूहको जानकर मोक्षमार्गका आश्रय लेना चाहिये ॥१॥
मोक्षमार्गको द्विविधता निश्चयव्यवहाराभ्यां मोक्षमार्गो द्विधा स्थितः ।
तत्रायः साध्य रूपः स्याद् द्वितीयस्तस्य साधनम् ।।२।। अर्थ-निश्चय और व्यवहारको अपेक्षा मोक्षमार्ग दो प्रकारका है। उनमें पहला अर्थात् निश्चय मोक्षमार्ग साध्यरूप है और दूसरा अर्थात् व्यवहार मोक्षमार्ग उसका साधन है ।। २॥
निश्चयमोक्षमार्गका कथन श्रद्धानाधिगमोपेक्षाः शुद्धस्य स्वात्मनो हि याः ।
सम्यक्त्वज्ञानवृत्तात्मा मोक्षमार्गः स निश्चयः ।। ३ ।। अर्थ-अपने शुद्ध आत्माका जो श्रद्धान, ज्ञान और उपेक्षाभाव है वही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र है। यह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ही निश्चय' मोक्षमार्ग है ।। ३ ।।।
व्यवहारमोक्षमार्गका निरूपण श्रद्धानाधिगमोपेक्षा याः पुनः स्युः परात्मनाम् ।
सम्यक्त्वज्ञानवृत्तात्मा स मार्गो व्यवहारतः ।।४।। अर्थ-और जो परपदार्थोंका नद्धान, ज्ञान तथा उपेक्षाभाव है वह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। यह सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र व्यवहारमोक्षमार्ग है ।। ४ ।
व्यवहारी मुनिका लक्षण श्रद्दधानः परद्रव्यं बुध्यमानस्तदेव हि । तदेवोपेक्षमाणश्च व्यवहारी स्मृतो मुनिः ।।५।।
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उपसंहार
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अर्थ — को परद्रव्यकी श्रद्धा करता है, परद्रव्यको ही जानता है और परद्रव्यके प्रति उपेक्षाभाव रखता है वह व्यवहारी मुनि माना गया है || || ५ ॥ निश्चयी मुनिका लक्षण
स्वद्रव्यं श्रद्दधानस्तु बुध्यमानस्तदेव हि । तदेवोपेक्षमाणश्च निश्चयान्मुनिसत्तमः ।। ६ ।।
अर्थ --- जो स्वद्रव्यकी श्रद्धा करता है, स्वद्रव्यको जानता है और स्वद्रव्यके प्रति उपेक्षाभाव रखता है वह निश्चयनयसे श्रेष्ठ मुनि है ॥ ६ ॥
अभेदविवक्षासे षट्कारकोंका वर्णन
आत्मा ज्ञातृतया ज्ञानं सम्यक्त्वं चरितं हि सः । स्वस्थो दर्शनचारित्र मोहाभ्यामनुपप्लुतः ॥ ७ ॥
अर्थ — जो दर्शनमोह और चारित्रमोहके उपद्रवसे रहित होने के कारण स्वस्थ है- अपने आपमें स्थिर है ऐसा आत्मा ही ज्ञायक होनेसे ज्ञान, सम्यक्त्व और चारित्र है ।
भावार्थ — यहाँ अभेदन की अपेक्षा गुणगुणीके भेदको गीणकर आत्माको ही सम्यक्त्वादिगुणरूप कहा गया है ॥ ७ ॥
पश्यति स्वस्वरूपं यो जानाति च चरत्यपि । दर्शन ज्ञान चारित्रत्रयमात्मैव स
२७
स्मृतः ॥ ८ ॥
अर्थ- जो आत्मा स्वरूपको देखता है, जानता है और उसीमें चरण करता है वह आत्मा ही दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीनों रूप है अथवा ये तीनों आत्मा ही हैं ॥ ८ ॥
पश्यति स्वस्वरूपं यं जानाति च चरत्यपि । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव
तन्मयः ।। ९ ।।
अर्थ - आत्मा अपने जिस स्वरूपको देखता है, जानता है और जिसका आचरण करता है वह दर्शन, ज्ञान और चारित्र है, आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ ९ ॥
दृश्यते येन रूपेण ज्ञायते चर्यतेऽपि च । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव
तन्मयः ||१०||
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स्वार्थसार
अर्थ — आत्मा जिस रूपसे देखा जाता है, जाना जाता है और आचरण किया जाता है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है । आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ १० ॥
२१०
यस्मै पश्यति जानाति स्वरूयाय चरत्ययि । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव तन्मयः || ११||
अर्थ - आत्मा अपने जिस स्वरूपके लिये देखता है, जानता है और आचरण करता है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है। आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ ११ ॥ यस्मात्पश्यति जानाति स्वं स्वरूपाच्चरत्यपि । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैच
तन्मयः ||१२||
अर्थ - आत्मा जिस स्वरूपसे अपने आपको देखता है, जानता है, और आचरण करता है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है। आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ १२ ॥
यस्य पश्यति जानाति स्वरूपस्य चरत्यपि । दर्शनज्ञानचरित्रत्रयमात्मैव तन्मयः ||१३||
अर्थ -- आत्मा अपने जिस स्वरूपका दर्शन करता है, ज्ञान करता है और आचरण करता है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है। आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ १३ ॥
यस्मिन् पश्यति जानाति स्वस्वरूपे चरित्यपि । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव
तन्मयः ||१४||
अर्थ - आत्मा अपने जिस स्वरूप में श्रद्धा करता है, जानता है और आचरण करता है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है। आत्मा ही इन तीनों रूप है ॥ १४ ॥ ये स्वभावाद् दृशिज्ञप्तिचर्या रूपक्रियात्मकाः । दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव तन्मयः ||१५||
अर्थ -- जो स्वभाव से दर्शन, ज्ञान और आचरणरूप क्रियासे तन्मय हैं वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है । आत्मा ही इन तीनों रूप है ।। १५ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रगुणानां दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमात्मैव
य इदाश्रयः ।
स्मृतः ||१६||
स अर्थ - जो दर्शन, ज्ञान और चारित्रगुणों का आश्रय है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है, उन तीनों रूप आत्मा ही माना गया है ।। १६ ।।
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उपसंहार दर्शनज्ञानचारित्रपर्यायाणां य आश्रयः ।
दर्शनशानचारित्रत्रयमात्मैव स स्मृतः ॥१७॥ अर्थ- पनि, ज्ञान और बारिक पयिका जो आश्रय है वही दर्शन, ज्ञान और चारित्र है । आत्मा ही इन तीनों रूप स्मरण किया गया है ।। १७ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रप्रदेशा ये प्ररूपिताः 1
दर्शनज्ञानचारित्रमयस्थात्मन एव ते ।।१८।। अर्थ-दर्शन, ज्ञान और चारित्रके जो प्रदेश वाहे गये हैं वे दर्शन, ज्ञान और चारिशरूप आत्माके ही प्रदेश हैं ।। १८ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रागुरुलध्वाह्वया गुणाः ।
दर्शनज्ञानचारित्रमयस्यात्मन एव ते ।।१९।। अर्थ-दर्शन, ज्ञान और चारित्रके जो अगुरुलघु नामक गुण हैं वे दर्शन, ज्ञान चारित्ररूप आत्माके ही गुण हैं ।। १९ ।।
दर्शनज्ञानचारित्रध्रौव्योत्पादव्ययास्तु ते ।
दर्शनज्ञानचारित्रमयस्यात्मन एव ते ।।२०।। अर्थ-दर्शन, ज्ञान और चारित्रके जा ध्रौव्य, उत्पाद और व्यय हैं वे दर्शन, ज्ञान और चारिशरूप आत्माके ही हैं ॥ २० ॥ पर्यायाधिक और निश्चयनयसे मोक्षमार्गका कथन
शालिनीछन्दः स्यात्सम्यक्त्वज्ञानचारित्ररूपः
पर्यायार्थादेशतो मुक्तिमार्गः । एको ज्ञाता सर्वदेवाद्वितीयः
___ स्याद् द्रव्यार्थादेशतो मुक्तिमार्गः ॥२१॥ अर्थ-यार्थिक नयको अपेक्षा मोक्षमार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्प है और द्रव्याथिक नयकी अपेक्षा सदा अद्वितीय रहनेवाला एक ज्ञानी आत्मा ही मोक्षमार्ग है ।। २१ ।।
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तत्त्वार्थसार तत्त्वार्थसारप्रन्थका फल
वसन्ततिलकाछन्द तत्वार्थसारमिति यः समधीविदित्वा
निर्वाणमार्गमधितिष्ठति निःप्रकम्पः । संसारबन्धमवधूप स धृतमोह
श्चैतन्यरूपमचलं शिवतत्वमेति ॥२२॥ अर्थ-मध्यस्थ बुद्धिको धारण करनेवाला जो पुरुष इस तरह तत्त्वार्थसारको जानकर निश्चल चित होता हुआ मोक्षमागका आश्रय लेता है वह निर्मोह संसारबन्धको दूर कर चैतन्यस्वरूप अविनाशी मोक्षतत्त्वको प्राप्त होता है ||२२।।
ग्रन्थकर्ताको निरभिमानता वर्णाः पदानां कर्तारो वाक्यानां तु पदावलिः ।
वाक्यानि चास्य शास्त्रस्य कणि न पुनर्वयम् ।।२३॥ अर्थ-वर्ण-अक्षर, पदोंके कर्ता है, पदोंका समूह वाक्योंका कर्ता है और वाक्य इस शास्त्रके कर्ता हैं, हम-अमृतचन्द्राचार्य नहीं हैं ।। २३ ।।
इति श्रीमद्मृत चन्द्रसूरीणां कृतिः तत्त्वार्थसारो नाम मोक्षशास्त्रं समाप्तम् । इस प्रकार श्री अमृतचन्द्राचार्यको कृति तत्वार्थसार नामका मोक्षशास्त्र समाप्त हुआ ।
टोकाकर्तृनिवेदनम् अमृतेन्दुमहासूरि नानयविशारदः । ग्रन्थं तत्त्वार्थसारं यं रचयामास सत्कृपः ॥ १॥ तस्येमां सरला टीका राष्ट्रभषामयी सुधीः । गल्लीलालतनुजातो जानक्युदरसंभवः ॥ २॥ पन्नालालो महाबालो विदधी सागरस्थितः । पञ्चनवचतुर्युग्मवर्षे वीराब्दसंज्ञिते ॥ ३ ॥ ज्येष्ठस्य कृष्णपक्षस्य नवम्यां सत्तिथौ शुभा। पुणेषा विदुषामस्तु ज्ञानवर्धनतत्परा ॥ ४ ॥ आज्ञानेन प्रमादेन दोषा ये विहिता मया । बुधः संशोधनीयास्ते ज्ञानभूषाविभूषितः ।। ५ । अज्ञोऽहमल्पविद्योऽहं विविधद्वन्द्वतत्परः । अमतेन्दुं क्षमा याचे कृते दोषस्य सन्ततेः ॥ ६॥ कृतिरेशा प्रयासो मे दिनानामेकविंशतेः । पूर्णा निर्विघ्नरूपेण हृदयं मोदते ततः ।। ७ ॥
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१
१७७ १२५
६८
१७०
७६
पश्चानुक्रमणी अकस्माच्च न बन्धः स्याद् __१९४ अनुदीर्ण तपःशक्त्या अकामनिर्जरा बाल- १२० अनुप्रवृतिः सामान्य अकालाधीनिराचार्यो ११५ अनुभूय क्रमाकर्म अजस्रं जीवाचातित्वं ११८ अनुवीचिचचश्चेति अणुस्कन्धविभेदेन
१०३ अनेक कार्यकारित्वं अतस्तु गतिवैकृत्यं
१९९ अनेकप्राणिमास्थानं अतिक्रमो विरुद्ध च १३३ अन्तनींकसमया अतियः संविमागश्च १३. अन्तरायस्य वैचित्र्याद् अथ तत्वार्थसारोऽयं
१ अन्त्यमापेक्षिक चेति अब सत्संख्याक्षेत्र
२४ अन्यत्रानपमृत्युभ्यः अधस्तिर्यकतयोच घ १९९ अन्यः सचेतनो जोवों अधोभागे हि लोकस्य
अन्याः पञ्च नव द्वे च मधो वेत्रासनाकारो
७६ अन्या साधारणा भावा अनगारस्तथागारो
अन्योन्योदीरितासह्यअनन्त केवलज्योतिः
अपरं च व्रतं तेषां अनन्स केवलज्योति: ११. अपूर्वकरणं कुर्वन् अनन्त केवलज्योतिः
अभावाद् बन्धहेतून अनन्लकेवलज्योतिः
अभावो योऽभिमानस्य अनन्तकेवलज्योतिः
अभिव्यकप्रतिकार अनन्त केवलज्योतिः १९२ अभ्युत्थानानुगमन অনলহমাদ্ৰাহ্
१०३ अर्थव्यञ्जनयोगाना अनन्तानन्तजोवानाम्
२६ अर्थव्यञ्जनयोगाना वीचारः अनन्तभूतस्तस्य स्याद् ३४ अर्थसंकल्पमात्रस्य अनादरार्थश्रवण
११५ अर्द्धभागे हि लोकक्ष्य अनादिनित्यसम्बन्धात् १४४ अल्पक्षेत्रं तु सिद्धानाअनादिबन्धनोपाधि- १७६ अल्मक्षेत्रे स्पितिर्दष्टा अनित्यं शरणाभावो १६९ अल्पसंक्लेशणादानं अनुक्तस्य ध्रुवस्येति
७ अल्पेऽधिकरण द्रव्यं अनुगोजानुगामी च
१२ अवगाहनसामर्थ्यात्
१९२
१६१
१६४
१८३
८७
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--------------------------------------------------------------------------
________________
तत्त्वार्थसार
१८० २००
१५
८८
८३
१८३ १८० ७८
१७५
७१
८८
अवग्रहस्ततस्वीहा अवश्यायो हिमविन्दुस् अविग्रहकसमया अवितर्कमविचारं अधितकमबीचारं अविशेषात्सदसतोअध्यवस्था न बन्धस्म अव्याघाती शुभः वृद्धः अष्टधाष्टगुणात्मत्वाअष्टया स्पर्शनामापि असत्कारपुरस्कार असद्गुणानामाख्यानं असमीक्ष्याधिकरणं असर्वपर्ययेष्वत्र असंख्याततमो भागो असंख्येयगुणौ स्याताअसंख्येयसमायुष्काः असंजिनस्तथा मत्स्याः असावनुभवी ज्ञेयो अस्त्यनाहारको योगः अस्मिन्नानयन देशे आकाराभावतोऽभावों आकाश्यन्तेऽत्र द्रव्याणि आक्रोशश्व बधश्चैव आजापायविपाकानां आतपोऽपि प्रकाशः स्याद् आत्मनः परिणामो यः आत्मनोऽपि तथैवेषा आत्मरक्षास्तथा लोकआत्मना वर्तमानानां आत्मा ज्ञातृतया ज्ञान आत्माविरात्ममध्यश्च आधभादान मावस्य
७ याभ्यन्तरं भवेत्वृष्ण५२ आम्नायः कथ्यते घोषो ६२ आयु: कर्मसमुच्छेदाद १८७ ___ आयुषस्तु त्रयस्त्रिशत् १८७ मारणाच्युसचामानौ
आर्यम्लेच्छविभेदेन आतै रोनं घ घयं च
आलोचनं प्रतिक्रान्तिस ८९-९०
आवष्टय घातको खण्डं १४९ आहारदेहकरण
आहारस्य भयस्यापि इति प्रपसनानस्थ इति यो निर्जरासत्त्वं इति संवरतत्त्वं यः इति संसारिणां क्षेत्र इतीहाजीवतत्त्वं यः इतीहानवतत्त्वं यः
इत्येतज्जीवतत्त्वं यः १५८ इत्येतद्वन्धतत्वं यः
६१ इत्येतन्मोक्षतस्वं यः १३५ इत्येता: परिकीर्त्यन्त
इत्थं प्रवर्तमानस्य ९७ इत्वोर्गमनं चैव १६६ इन्द्रियं लिङ्गमिन्द्रस्य १८५ इन्द्रियार्थेषु वैराग्य १०७ इन्द्रियानिन्द्रियापेक्षा
इयत्ता नातिवर्तन्ते ११० ईपियं तु तच्छुक
ईर्या भाषणादान
उच्चैर्गोत्रं शुभायूंषि २०९ उच्छ्वास पातपोद्योतो १०४ उत्करकचूर्णिका चूर्णः १९३ उत्कृष्तामानता शैल
६८
ताहार
१३९
२०७
१२५
४७
४८
१०७ ११८
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--------------------------------------------------------------------------
________________
उत्तरा दक्षिणस्या
उत्पत्तिश्व विनाशश्च
उत्पद्यन्ते सहस्रारे
उत्पन्न केवलज्ञानो
उत्पाद: खलु देवोना
उदयप
उपास्य वीरेण
उपरिष्टान्महीभागात्
उपरोधाविधानं च
उपशान्तकषायः स्यात्
उपात्तकर्मणः पातो
उपादेयतया जीवो
उभौ निरूपभोगी तो
उभी लान्तवकापिष्टी
उरगाणां द्विसंयुक्ता उष्णः शीतच देवानां
ऊर्ध्वगौरवधर्माणो
ऋजुत्वमीषदारम्भ
ऋजुसूत्रः स विज्ञेयो
एक: क्रोशो जघन्यासु
एकद्विश्याद्यसंस्थेय एकस्य जीवद्रव्यस्य
एकवास्तुदशागार—
एकत्री तथा सप्त
एक द्वे त्रीणिपत्यानि
एकाक्षाः वावराः सूक्ष्मा
एकाक्षेषु चतस्रः स्युः एकाग्रत्वेऽतिचिन्ताया एक परकेने क
एकवृत्या प्रत्येक एकैकं वर्द्धये
एते धर्मादयः पच एसे परस्परेक्षाः
पद्यानुक्रमणिका
८०
१९९
७४
४१
पाक
८१
१७०
८६
१२५
४१
१३६
३
५५
८७
६५
६३
१९२
११९
२०
६९
१५८
१५
१७८
६६
६६
एरण्डस्टला
एवं भावयतः साधी
एषु वैमानिका देवा
ऐकान्तिकं सांशयिक
औरिकापत
९५
९९
६७
९१
२१
औदारिकं शरीरं स्याद्
मारिकादिकार्याणां
दारिको वैकखिकः
औदारिको वैक्रियिकस्तथा
कथं मार्ग प्रपद्येरन्
कथं मार्ग प्रापोच्छन्
कनकार्जुन कल्याण
कर्मणां स्थूलभावेन
कर्मनो कर्मबन्धो यः
कर्माम्भोभिः प्रपूर्णोऽसौ
कल्पोपन्नास्तथा
कषायेषु प्रशान्तेषु
कस्यचिच्छृङ्खला मोक्षे कस्यापत्यं पिता कस्य
कारस्येन विरतिः पुंसां
कापोतोललेश्यात्व
कामभोगाभिलाषाणं
काययोगेऽतिसूक्ष्मे तद्
कायवाङ्मनसां कर्म काया मंषि सर्वेषु
४२ काललिङ्गगतिक्षेत्र
४३
कालव्यातिक्रमोऽन्यस्य
१८४
कालस्य परमाणोस्तु किन्नराः किम्पुरुत्राश्च
किरोलका के चंद
किं वा भवेन्न वा जनो
कुतीर्थानां प्रशंसा च कुन्थुः पिपीलिका कुम्भी
२१५
१९८
१७२
८८
१४०
५६
५६
१४३
५४
५५
१८५
१८५
९
४०
१०७
१७१
८४-८५
१७४
१९७
१७०
१२४
११९
११८
१८७
११०
૪૧
२००
१३७
९५
८४
५२
१५०
११६
५१
Page #269
--------------------------------------------------------------------------
________________
२१६
तस्वार्थसार
१
९७
५३
११
कुलामों कोटिलक्षाणि फुलालचक्रे डोलामाफूटलेलो रहोम्याख्याकृतादिभिस्त्रिभिश्चैत्र कृत्वा विशेष गलाति कृत्रिकागुरूकर्पूर कृष्णलेश्यापरिणतं कृष्णा नीला च कापोता कृत्स्नकर्मक्षयादुवं फेवलिश्रुतसंघाना कोटीकोटयः स्मृतास्त्रिशत् क्रिया परिणतानां यः क्रियाहेतुत्वमेतेषां क्रोडोकरोति प्रथम क्रोधोत्पत्तिनिमित्तानाम् क्रोधो मानस्तथा माया क्षान्मादिलक्षणो धर्मः क्षमामृते क्षयाच्चारित्रमोहस्य क्षुत्पिपासा च शीतोष्णगंगासिन्धुपरीवार: गङ्गासिन्धू उभे रोहिद् गतिर्भवति जीनामा गत्यक्षकाययोगेषु गर्भसूच्यां विनष्टायां गादोऽयजीर्यते पहद् गुणस्य गुणिनाचष गुणो द्रश्यनिधानं स्यात् गुविना न च त्र्यं गुतिः समितियो धर्मः गृह्णाति देहपर्याप्तिगोत्रकर्म द्विधा ज्ञेयगोत्रकर्मसमुच्छेदात्
६५ घम्मायां सप्त चापानि १९८ धर्मामसंज्ञिनो यान्ति १३२ घर्माया, प्रथमे भागे
घातिकर्मक्षयोत्पन्न ३४ चक्षुदर्शनमेकं स्याद् ११९ चतस्रो गतयो लण्या: ११८ चतस्त्रो मतयः पश्च १४९ ६. चतुर्गतिघटीमन्त्रे १९८ चतुर्णां चक्षुरादीनां
चतुर्धा पर्यायार्थः १५५ चतुभिरिन्द्रियैरन्यः
८-९ चतुविधस्य लोभस्य ९८ चतुःकषायपश्चास् १७० चत्वारो हि मनोयोगा १६४ चत्वारो हि मनोयोगा १५७ चत्वारोऽर्थनया आद्यास १७२ चारित्रपरिणामानां १६२ चैत्यस्य च तथा गन्ध
१२० १७४ छेदनं वेदनं चैव
११६ १६६ जन्तवः सकषाया ये ८१ जन्तुपीड़ा विमुक्तायां १७९
जम्बूद्रोपं परिक्षिप्य ४७ जम्बूद्वीपोक्तसंख्याम्यो
जम्बूद्रोपोऽस्ति तन्मध्ये जयत्यशेषतत्त्वार्थ
जानतः पश्यतश्चोवं १४४ जीवत्वं चापि भव्यत्व
जीवस्य विग्रहगतो ९३ जीवानां पञ्चताकाले १६१ जीवानां पुयलानां च
६१ जीवानां पुद्गलानां च कर्तव्ये १५४ जीवानां पुद्गलानां च कालस्य २०० जोवे युगपदेकस्मिन्
७८
८३
१९७
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--------------------------------------------------------------------------
________________
पद्यानुक्रमणिका
२१७
१९८
१७७
१७५
~
१२३
~
६५
११३
४८
५५
जीवोऽत्रीवास्तवी अन्य ज्योतिर्गतिपरिच्छिन्नो ज्योतिष्माणां स्मृताः सप्ता ज्वालाङ्गारास्तथाचिश्च ज्ञानदानयो रोयो ज्ञानमष्टवि ज्ञेयं ज्ञानस्य ग्रहणाभ्यास ज्ञानस्य प्रतिवेधश्च शानावरणहानान्ते ज्ञेयः समभिरुहोसी तीरघृतादीनाम् ततः क्षीणकषायस्तु ततः परं तु मे देवास ततः परं विकल्प्यन्ते ततो चूमनभाद्यस्तात् सतोऽधो दशलक्षागि ततो निजीणतिःशेषः ततोऽप्यूईगतिस्तेषा ततोऽन्तरायज्ञानध्न सत्पुना रुद्घयोग: सन् तस्वार्थसारमिति यः तत्वार्थस्थावबोधी हि तत्त्वार्थाः सन्त्यमी नाम तत्वार्थाः सर्व एवैते सत्संशयापनोदाय तत्र प्रवर्तमानस्य ताधिकरणं द्विधा तत्रका खलु वर्णादितथा क्षीणचतुःकर्मा तयान्यः मूर्तिमानात्मा तथापि गौरवामानात तया सुखप्रभावाभ्याम् सोपशमिकादीनां
२ तदनन्तरवोद्ध१०१ तपस्तु विविध प्रोक्तं ६९ तपस्तु, वक्ष्यते तद्धि ५२ तपस्विगहण शील१४५ लपस्वि गवत्यानां
३४ तपो हि निर्जराहेतु १८३ तादात्म्याधुपयुक्तास्ते १२३ तानि द्वादश सार्द्धानि २०० तारिष्टां च सिंहास्तु २१ तिर्यग्ज्यतिक्रमश्चव
तीर्थशराम चक्रित्वे १८९ तीशमन्दपरिज्ञान
तवेवात्मप्रदेशेषु ७५ तो भवेतां क्वचिच्छुसी ७६ त्रयस्त्रिंशत्समुद्राणां ७७ प्रयाणां खलु कामानां १९२ पायस्त्रिंशस्तथा लोक२०५ त्रिकोशः कथितः कुम्भी १९७ त्रिविधं जन्मजोचानां १८८ विशनरकलक्षाणि २१२ त्रीणि दुःप्रणिधानानि ५८ दक्षिणेन्द्रास्तथा लोक--
दग्धे बीजे यथात्पन्त ५ दया दानं तपः शीलं १८. दर्शनज्ञान चारित्र १६१ दर्शनज्ञानचारित्र ११३ दर्शनज्ञान चारित्रध्रौव्यो१०७ दर्शनज्ञानचारित्रप्रदेशा १६७ दर्शनज्ञानचारित्रागुरु १४४ दर्शनज्ञानविनयौ १९५ दर्शन ज्ञानयुक्तस्य
८८ दर्शनस्यान्तरायश्च १९२ दर्शनावरणस्य स्यात्
६२
७७
१३५
२१०
१८२ १८
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--------------------------------------------------------------------------
________________
२१८
तत्त्वार्थसार
२४
१४३
१४४
९३
७४
८
१७१
दश्या भावना देवा दशोन द्विशतोभको दिग्देशानर्थदण्डेभ्यो दिनान्कोन्पञ्चाशत् दुःखं शोको वधस्तापः दृग्मोह क्षपकस्तस्मात दश्यते येन रूपेण देवानां नारकाणांच देशसंयमसम्यक्त्वे द्रव्यपर्यायरूपस्य द्रव्यभावस्वभावना द्रव्य मेकं तथैकेन द्रश्यस्य कर्मणो मद् द्रव्यस्य स्यात्समुत्पादश् द्रव्याण्यनेकभेदानि द्रव्यान्येतानि नित्यानि ट्रव्यादिप्रत्ययं कर्मद्रव्यानपंसकानि स्यु : द्वयणुकाद्याः किलानन्ताः द्वयोयोकभी सप्त दयोस्त्रयश्च कल्पेषु द्वयोः सप्त दयोः पट च द्वाविंशति वा सप्त द्वाविंशतिस्तथा सप्त द्विगुण द्विगुणा वर्ष द्विगुण द्विगुणेनातो द्विचतुर्यो न ज्ञेयं द्विधा वेद्यमसदेचं द्विधा वैससिको बन्धस् विविग्रहां विस मयां द्वीपेहवर्धतृतीयेषु धर्मस्म गतिरत्र स्याद धर्माधर्मान्तरिक्षाणां
८४ धर्माधर्मावथाकार्श ८१ धर्माधर्मास्तिकायाम्यां १२९ धर्यावर्मोनभः कालश
६५ श्रुत्वा निर्यालङ्गं ये ११६ न कर्मात्मगुणोऽमूर्तेस् १४८ न च बन्धाप्रसिद्धिः स्यात् २१० न च माशोऽस्ति भावस्य १२ न चास्म हेतु कर्तृत्वं २८ न पर्यायाट्रिना द्रव्यं
नयनोत्पादनं दीर्घ१२८ न लभन्ते मनुष्यत्वं १८७ नवायुः परिसणां १९१ न विद्यते परं झस्माद् ९२ नागासुरसुपर्णाबिन १८६ नानाकृमिशताकीर्ण
९३ नानादीपप्रकाशे १८५ नारकाणां सुराणां च ५७ मारकैकाक्षदेवानां १०९ नाराचमर्द्धनाराचं ६७ नारी पुंषधेदाश्च ७० नित्याध्वगेन जीवेन ७० नित्यवरनिगोदाना
निद्रानिद्रा तथा निद्रा ६४ निरषद्योपकरण
निर्गताः खलुपश्चाभ्या ७८ निर्देशः स्वामित्वं
निर्वृत्तिश्चोपकरणं निश्चयव्यवहाराम्यां
नीचैर्गोत्रमसद्वे ६२ नोवत्यनुल्सेक:
नेत्रादीन्द्रियसंस्थाना९६ न:गोल्प निर्वतत्वं च ९४ पञ्चत्व जोषिताशंसे
७२
५
१४७
१४६ १२३
१४७
२०८
१०६
१२२
११९
१३७
Page #272
--------------------------------------------------------------------------
________________
पञ्चधा बन्धनं चैव
पञ्चेन्द्रियाणि वाक्काय
पञ्चेन्द्रियाश्च मर्या
पद्मस्तथा महापद्मसू
परकीयमनः स्थार्थ
परतः परतः पूर्व
परत्वं विप्रकृष्टत्वम्
परस्परस्य जीवानाम्
परं कर्मक्षयार्थं यत्
परात्मि परिणाम वपुर्लेश्या
परिपाटयानमा ज्ञेया:
परिहारस्तथाच्छेदः
परिहारस्तु मासादि
परुषासावादित्वं
पर्याय चानुभर्वतो
पल्मोपमं भवत्यायुः पल्योपमं भवत्यायुः साति-
पश्यति स्व स्वरूपं यं
पश्पति स्व स्वरूपं यो
पाकक्षयात्कषायाणा
पाकान्तरगत्यास्तै
पातोऽपि स्थानवत्त्वान्न पापकर्मोपजीवित्वं
पार्येषु मणिभिचित्रा
पिण्डं तयोपधि शय्या
पुण्यकर्म विपाकाच्च
पुद्गलानां शरीरं वाक्
पुलाको कुशो देवा पुष्करद्वीप मध्यस्थो
पूर्णासंशितिरक्षा
पूर्वसागरगामिन्यः
पूर्वाजितं क्षपयतो
पानुक्रमणिका
१४९
४५
५१
८०
१३
६८
१०१
९६
१६५
०७
७७
७९
१८०
१८१
१२०
१०२
६७
६७
२०९
२०९
÷७
७७
१९४
११६
७९
१६३
२०६
९६
१८९
८२
७३
८१
१९७
पूर्वे काय प्रत्रीवारा प्रकृतिस्थितिबन्धी हो
प्रकाशावरणं यत् स्यात्
प्रत्यक्षं तद्भगवतां
प्रत्याख्यानमभेदेन
प्रत्याख्यान वचैव
प्रत्युत्पन्नतया देशात्
प्रमत्तयोगता यत्स्याद्
प्रमत्तयोगाद् यत्स्यात्
ਸਰਸਰੀ ਨੇ ਸਾ
प्रमाणनय निक्षेप
प्रमाणीकृत्य सार्वज्ञो
प्रमाणीकृत्य सर्वज्ञो प्रयोगबिनाभ्यां या प्रियभ्रंशेऽप्रियप्रासी
बध्नाति कर्म स
बन्धस्य हेतवः पच
बन्धं प्रति भवत्यैक्य
वन्वेऽधिकगुणो यः स्यात्
बोधस्तथा छेदो
बहुधुलानमानश्च बाह्यं तावदयं बाह्यान्तरोपधित्यागद् बुद्धिधाय याच
ब्रह्मलोके प्रजायन्ते
भवन्ति गर्भजन्मान
FL
भवेत्तपोऽयमर्य
भव्या भव्य विभेदेन
भाज्या एकेन्द्रियत्वेन
भाज्यास्तीर्येशच क्रित्वें
भावनव्यन्तरज्योतिर्
मादनो भवत्यायुः भाववदेस्त्रिभेदः स्यात्
२१९
८६
૪૧
१०७
२०७
१७३
१४७
२००
१२८
१२८
ሪ
२०८
१८५
१८५
१००
१८४
१९२
१४०
१४४
१०८
१३२
११७
१७७
१८२
७
७४
६२
१८१
६०
७५
'ક્
८३
૬ ૭
५७
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--------------------------------------------------------------------------
________________
२२०
तत्त्वार्थसार
१७२
१७८
५२
१४.
१०२
२१०
२१०
भावात्पञ्च विषत्वात स ८९ मोक्षारोहणनिश्रेणि: भाषिनः परिणामस्य
५ मोक्षार्थ त्यज्यते यस्मिन भूतष वर्तमानश्च
१०२ मोठो मसारमल्लएन भूतादिव्यपदेशोसी
१०२ यजीवः सकलायात्वात भूम्यापः स्थूलपर्याप्ताः ७२ यत्र निःशङ्कितस्वादि भेदात्तथा च संघासात् १०४ या हिंसादिभेदेन मेदादिभ्यो निमित्तम्यः १०३ यत्राभिसन्निवंशः स्याद् भेदेनैक्यमुपानीय
यथास्तिर्यगर्मच भेदी सम्यक्त्वनारित्रे २५-२८ यथानुसरतः परि मळ्या मनुष्यलाभेन __५१ यथाम्रपनसादीनि भक्तिपूर्व श्रुतं प्रोक्त- ९-१२ यथोक्तानां हि हेतूनाम् मतिः थुलावधी पत्र
१६ यदि शेषमकृत्वैव मतिःश्रुतावधी चैव
१४६ यवनालमसूराति मधुप: कीटको दंश
यस्मात् पश्यति जानाति मधुरोऽप्ल: कटुस्तिक्तः
१४९ यस्मिन् पश्यति जानाति मध्यभागे तु लोकस्य
७८ पस्य पश्यति जानाति मनोयोगो भवेत्सत्यो
५३ यस्य पश्यति जानाति मनोवाक्कायवक्रत्वं
१२० या निमित्तान्तरं किञ्चिद्ममेदमित्युपात्तेषु
१६५ यावत्सवार्थ सिद्धि तु मसूराम्बुपुषत्सूची
५१ ये तु वैमानिकी देवा महान् घनत्तनुश्र्चव
५३ ये मिथ्यादृष्टयो जीवा मात्सर्यमन्तरामश्न ११४-११५ ये स्वभावात् दशितिमाया निदान मिथ्यात्व १२८ योगद्वाराणि इन्धन्त: मार्ग संदूषणं चैव
१७ योगयत्तिभवेल्लेश्या मार्गोद्योतोपयोगानाम् १६२ यांगानां निग्रहः सम्यम् मारिताम्रचूडादि
११८ योजनान सहस्रं तु मिथ्यात्वस्योदयाभावे ३५ योनिरिकदेवानामिथ्यादक सासनी
३५ यो हि शिक्षाक्रियात्माचं--- मिश्यादृष्टिभ वेज्जीवी
३५ रत्वप्रमादिमा भूमिस मूलाग्रपर्वकन्दोत्थाः
५३ रत्नप्रभाभुवे मध्ये मृत्तिका बालुका चैव ५१ रसत्यागो भवेत्तल मृल्लेपसङ्गनिर्मोक्षाद् १९८ रागद्वेषोशनान्येषु मधुन मदनीकाद्-- १२८ रूपं पश्यत्यसंस्पृष्टं
८७
२१० १७१
७६
८६
१७८
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--------------------------------------------------------------------------
________________
१३
१२०
१.८
१७२
२००
५२
१२१
१८१
१२४
रौप्य सुर्घणं वनं घ लब्धिस्तथोपयोगश्च लभन्ते तीर्थकर्तृत्वं लभन्ते निर्वृति केचिच् लिङ्गप्रसिद्घः प्रामाण्यलिङ्गसाधनसंख्यामा लोकसंस्थानपर्यायलोकाकाशस्य तस्यकलोकाकाशे समस्तेऽपि लोकाकाशेवगाहः स्याद् लोफे पतुध्विहार्थेषु लोके तत्सदृशो ह्यर्थः लोके दुर्लभता बोधः बचोगुप्तिर्मनोगुप्तिवचोयोगो भवेत्सत्यो वषबन्धनिरोघश्च वनस्पतिशरीराणां वर्णगन्धरसस्पर्शवर्णाः पदाना कारो वर्तमानेन यत्नेन वस्तुनोऽनन्तधर्मस्य वंशाविषु तु तान्येक वाङ्मनःकाययोगानाम् वाचना प्रच्छनाम्नायः वाचना सा परिशेया वात्सल्य च प्रवचने यामनं हुण्डसंशं च विग्रहो हि शरीरं स्यात् विजयं वैजयन्तं प विधिद्रव्यविशेषाभ्यां बिना कालेन शेषाणि विरताविरतत्वेन विशिष्टपरिहारेण
पद्यानुक्रमणिका ५२ विशुद्धिदर्शनस्योच्च४८ विशुद्धघप्रतिपाताभ्यां ७२ विषक्रियेष्टकापाक७२ विमवृक्षाः सदृक्षा या २०७ वीनां द्वादश तानि स्युः
वृत्तमोहाग पन् १८६ वृत्त सामामिर्फ ज्ञेयं ९५ वेदनीयसमुच्छेदा९५ वडूयं चन्द्रकान्तश्च
वैयावृत्यमनिहाणिः २०६ व्यञ्जनस्य तु नेहाद्या २०७ व्यलीकादिविनिर्मुक्तं १७० व्याघाद्यपनिपातेऽपि
व्यावहारिककालस्य
ब्यावृत्तिश्च विशेषश्च १२३ तात् किलालवेत्पुण्य
६४ प्रतानां स्थर्यसिम्यर्थ १०५ शङ्कन फासणं चैव २१२ शतानि पञ्च चापानां
५ शब्दरूपरसस्पर्श१७ शम्दरांस्थानसूक्ष्मत्व
शब्दो येनात्मना भूतम्
शम्बूकः शङ्खशुक्ती वा १७९ शरावचन्द्रशालादि १७९ शरीरसस्क्रियात्यागर
शरीरानुविधायित्वे १४९ शलाकापुरुषा न स्यु६१ शलाकापुरुषा नव ८८ शीलवतानतोचारो१३७ शुक्लं पृथक्रबमाचं ९१ शुद्धाशुद्धार्थसंग्रही ५९ शुद्धयष्टके तथा धर्म १७३ शुभाशुभोपयोगाख्य
१२३ १२४ १३२
१०५
७५
१८६
Page #275
--------------------------------------------------------------------------
________________
२२२
तत्त्वार्थसार
१८८
१६३
७२
७२
श्रृङ्खलावागुरापाश
सम्यग्ज्ञानात्मकं तत्र शेषकर्मफलापेक्ष:
१९८ सम्यग्दर्शनसम्पन्न: श्वभ्रादिगतिभेदात्स्याद १४९ सम्यग्मिथ्यात्वपाकेन श्वनतिर्यग्नरामयं.
८९ सम्यग्मिथ्यात्वसंज्ञायाः श्रद्दधानः परद्रय २०८ सम्यग्योगो मोक्षमागं प्रपित्सु- २५ श्रयानं दर्शनं सम्यग
२ समितिर्दर्शितानेन वसामाधिगमोपेक्षा
समुत्पादव्ययभौब्य. श्रद्धानाधिगमोपेक्षाः
२०८
समुत्पादययाभावो श्रद्धानाधिगमोपेक्षा याः पुनः २०८
समुपातपत्तिस्य श्रुतं यतो वितर्कः स्याद् १८६
सरस: सलिलावाहि
११० श्रुतं यतो वितर्कः स्याद्यतः १८७
सरायसंयमश्चैव श्रमक्लेममदव्याधि
सरागसंयमश्चैव
१२० श्रोश्य ह्रीश्च धुतिः कीतिः
सर्वकर्मप्रकृत्यहन्ि
१५८ षट् वषा विकलाक्षाणां
सर्वसामान्यतो लोकस्
७६ षड्जीवकायपञ्चाक्ष १४१ सर्व तदव मौदर्यषोडशव कषायाः स्युर्
सर्वेऽपर्याप्तका जीवाः सकालो यनिमित्ताः स्युः
सर्वेऽपि तेजसा जीवाः सग्रन्थोऽपि च निग्रंथो १४१ सर्वेष्वात्मप्रदेशेष्व
१५८ सचित्तशीतविवृत्ता
सर्वेषामपि देवानां सचित्तस्तेन सम्बन्धस्
सर्वेषां कर्मणां शेषा १५४ सति वीर्यान्तरायस्थ
सविग्रहाऽविग्रहा व सस्वेषु भाक्येन्मैत्री १२७ सहसा दुष्टमाबार स द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्ति
४८ सहस्रयोजनायामसप्तक्षेत्राणि भरतस्
७९ संख्याततायुषां मर्त्यस मनःपर्ययस्यष्टो
१५ संख्यांतोतायुषां नूनं । समयं पाणिमुक्ताया
संख्यातीतायुषो मास् समुद्री विशतिश्चैव
संख्येयाश्चाप्यसंख्येया सम्मक्वारित्रमित्येतद् १७४ संग्रहेण गृहीतानासम्यक्त्व-ज्ञान-नारित्र.
३० संप्राप्त : प्राप्नुवन् प्राप्स्यन् । १०२ सम्यक्त्व-ज्ञान-चारित्र
संयतो ह्यप्रमत्तः स्यात् सम्मनस्वनतशीलेषु
संयमः खल चारित्रसम्यक्त्वं खलु तत्त्वार्थ
संयमश्रुतलेश्याभि- १८९ सम्यग्ज्ञानं पुनः स्वार्थ
६ संयुका ये खस्लु स्वस्मात
६१
८०
७३
२०
१९७
५८
Page #276
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________________
संयोगौ द्वौ निसर्गानु
संबरी हि भवत्येतान्
संग सिद्धये लोक
संसारकारणत्वस्य संसारभोरुतानित्य
संसारविषयातीतं
संसारिणा मुक्ताश्च
संस्तत्सर्जनादान
संस्थानं कलादीनाम् संहाराच्च विसर्पाच
संहारे च विस च
साकारश्च निराकारो
साक्षरोऽनक्षरश्चैव
सामोरधिगतार्थस्य
सामान्य मन्चयोत्सर्गी
सामान्यादेकधा जीवो
साम्परायिकमेतत् स्याद्
सांप्रतं सुप्ररूप्यन्ते
सुखो वह्निः सुखो वायुः सुवर्णमौक्तिकादीनां
सुषु सावस्था तुल्यां
स्वरं सुभगादे
सूक्ष्मदेन कषायाणां
सूक्ष्मो नित्यस्वान्तश्च
सूक्ष्मोपशांतसंक्षीण
सूर्याचन्द्रमस चैन
सूर्युपाध्याय साधूनां
सोऽयमित्यक्षकाष्ठादे:
सोर्मेशान कल्पो दो
स्तेनाहुतस्य ग्रहणं स्तो नारीनरकान्ते च
स्त्रीणां रागकथाभावो
स्त्रीसं शक्तस्य शय्यादे
पद्यानुक्रमणिका
११३ स्थावराणां भवत्येक
१६९
१२७
१३८
१२१
२०५
३४
३४
१०५
१८०
९३
८९
१११
३४
२०६
११९
२०६
१५०
४०
१०४
३५
८४
૮
१३६
१०६
९५ स्यात्सम्यग्दर्शनज्ञान
१९६
४
स्थावराः स्युः पृथिव्यापस्
स्थितिरन्तर्मुहूर्तस्तु
१२६
स्थित्या परिणतानां तु
स्पर्शनं रसनं प्राणं
१६६
स्पर्श यप्त तक च
स्पर्शो रसस्तथा गन्धो
स्यात्तीयपरिणामो म
स्यात्सम्यक्त्वज्ञानचारित्ररूपा
स्यात्सागरोपमाष्यायुदेशस्थ
स्यादीनामिको भावः
स्याद्विशेषोऽवविज्ञान
स्य॒ सम्मूर्च्छनजन्गानः
स्वजातरविरोधेन
स्वजातेर विरोधेन
स्वद्रव्यं श्रद्दधानस्तु
स्वसंवेदन मसोत्थं
स्वाध्यायः शोधनं चैव
हस्तद्वितयमुत्सेधो हिताहित विवेकस्य हिमवान्महाहिमवान्
हिरण्यस्वर्णयोः क्षेत्र
हिंसादिषु विपक्षेषु
हिसानृतचुराब्रह्महिसानृतचुब्रह्म
-
८७
१३२ हेतुकार्यविशेषा म्य
८१
हिंसाया अनृताच्चैव
हिंसायाम
हेतुत्वाद्दुःखहेतुनाम् हेयस्यादानरूपेण
२२३
५०
५०
१५५
९७
४८
१५५
४९
११८
२११
२
६६
२०५
२६
१३-१५
६२-६३
९२
१००
२०१
७
१७९
७०
१४१
७९
१३३
१२७
१३७
१३८
१२३
१८४
१३८
१२७
Page #277
--------------------------------------------------------------------------
________________
शब्दानुक्रमणी
१६६
१०
१४५
७-८
११५
११
अकामनिर्जरा अङ्गोपाङ्ग अगुरुलघु अजीव अजोबाधिकरणानव अज्ञान अज्ञानपरिषद अक्षरश्रुतज्ञान अक्षरसमासश्रुतज्ञान অধিস अक्षोत्यविज्ञान अणुचटन अणुवत अतिथिसंविभाग अदर्शनपरिषह अधर्मद्रव्य अधिकरण अध्रुव अनन्तानुबंधी अनर्थदण्डनत अननुगामी अवधि ज्ञान अनवस्थित अवधिज्ञान अनाकांक्षानिया अनादेय अनाभोगक्रिया मनाभोगनिक्षेपाधिकरण अनिःसृत अनिवृत्तिकरणगुणस्थान अनित्यानुप्रेक्षा
१२० अनीक १४९ अनुगामी अवधिज्ञान १४९ अनुक्त
अनुत्तरोपपादिकदशाङ्ग ११३ अनुयोगयुतज्ञान
अनुयोगसमासश्रुतज्ञान अनुप्रेक्षास्वाध्याय अनुभवबन्ध अनुभागबन्ध अन्तराय
अन्तराय १०७ अन्तकृद्दशान १२४ अन्तरङ्गानिवृति १३० अन्तर
अन्यत्वानुप्रेक्षा अपरत्व
अपर्याप्त ७.८ अपर्याप्तक
अपायविचयवध्यान १२९ अपूर्वकरण
अप्रमससंगत
अप्रत्याख्यानक्रिया ११३ अप्रत्याख्यानावरण १.० अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण ११२ अभव्यत्व ११४ अयशःकीति ७-८ अयोगकेवली
मरतिपरिवह १७० अर्थावग्रह
२४-२५ १७०
१४९
१४८
३८
११३
४०
१६६
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--------------------------------------------------------------------------
________________
अर्द्धनाराचसंहनन अलाभपरिषद्
अल्पबहुत्व
अवग्रह
अवधिज्ञान
मौदर्य तप
raणवाद
अवसर्पिणी
अवाय
अविपाकजानिर्जरा
अशरणानुप्रेक्षा अशुचित्वानुप्रेक्षा
अशुभ
असत्कारपूरस्कारपरिवह
असत्य
असंयम
असंप्रापाटिका हमन
असद्वेद्य
असत्यमृषावचनयोग
असंयतत्व
असंगत गुणस्थान
असिद्धत्व
अस्ति नास्तिप्रवाद
अस्थिर
आकाशद्रव्य
यकिश्चन्यष
आक्रोशपरिषद्
आग्रायणीयपूर्व
आचाराङ्ग
माज्ञाव्यापादिकक्रिया
आशाविच यत्रम्यंध्यान
आज्ञानिकमिध्यात्व
आसप
शब्दानुक्रमणी
१४९
१६६
२४-२५
७-८
१२
१७७
११७
८१
७-८
१७६
१७०
१७१
१४९
धातप
आत्म प्रवाद
आत्मरक्ष
आदाननिक्षेपणसमिति
आदेय
अधिकरणिक क्रिया
आनुपूर्वी
अभियोग्य
आभ्यन्तर उपकरण
आम्नायस्वाध्यायतप
आयु
आरम्भ
आर्जव
आर्तध्यान
आर्य
१६६
१२८
१४१
मोत
१४९
आसादन
૪૭
आसव
५४
आसव
३३
बखवानुप्रेक्षा
३७ आहारकशरीर
३३
आहारपर्याप्त
आहारमार्गणा
आहारसंज्ञा
इन्द्र
११
१४९
९७
१६५
१६६
११
११
११३
१८५ ईहा
१४१ उक्त
१४९
इन्द्रियपर्याति
इन्द्रियमार्गणा
पिक्रिया
पथ आसव
ईर्यासमिति
उच्चैर्गोत्र
२२५
१०७
११
८५
१६३
१५०
११२
१४९
८५
४८
૮૦
१४५
११३
१६४
१८४
८३
̈ *
११५
११०
३
१७१
५६
४४
६१
४६
८५
४४
૪૭
११२
१११
१६२
७-८
७-८
१५४
Page #279
--------------------------------------------------------------------------
________________
२२६
तत्त्वार्थसार
२६-२७
८४-८५ ८४-८५
१८३
str
३२ १७१
उच्छ्वास उरकर उत्तरगुणनिवर्तमा उत्तराध्ययन उत्पाव उत्पादपूर्व उत्सर्गसमिति उत्सपिणी उद्योत उद्योत उपकरणसंयोग उपपात सपघात उपचारविनय उपभोगान्तराय उपयोग उपयोग उपपादजन्म उपवासतप उपशान्तकषाय उपशमश्रेणी उपासकाध्ययनात उष्णपरिषह उह काजुमतिमनःपर्यज्ञान बजुसूत्रनय एक एकत्वशुक्लध्यान एकत्वानुप्रेशा एकविध एवंभूतनय एषणासमिति ऐकान्तिकमिथ्यात्व
१४६ मोदयिकभाव १७ औदारिकारीर ११४ औपसमिकचारित्र
औपमिकभाव ९२ औपमिकसम्यक्त्व ११ कर्मप्रवाद १६३ कल्पव्यवहार
कल्पाकल्प्य
कल्पातीत १०७
कल्पोपपन्न कल्याणवाद
कषाय १४९ कपायचतुष्टय
कषायमार्गणा १५४ कापोतलेश्या
कार्यलेशतप कायनिसर्ग कायिकी क्रिया काल कालद्रव्य क्रिल्षिप कोलकासंहनन कुअवधि कुजकसंस्थान कुमतिः कुश्रुत
केवलज्ञान १८७ कृतिकर्म
कृपालेश्या
क्रन्दन २१ क्रिया
क्रियाविशाल १४० क्षपकश्रेणी
६२-६३ १७८
२४-२५
८५
२८
२८
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--------------------------------------------------------------------------
________________
क्षायिक उपभोग
धर्म
क्षयोपशम हेतु विज्ञान
मायिकदर्शन
क्षायिकदर्शन
क्षायिकज्ञान
क्षायिक चारित्र
क्षायिकान
क्षायिकभाव
क्षायिकसम्यक्त्व
क्षायिकभोग
क्षायिकलाम
rforat
क्षायोपशमिकचारित्र
क्षायोपशमिकभाव
चायोपशमिकसम्यक्त्व
क्षिप्र
क्षीणकषायगुणस्थान क्षुत्परिषह
क्षेत्र
सुण्ड
गति
गति
गतिमार्गणा
गन्ध
गर्भजन्म
गुण
गुणस्थान
गुप्ति
गोत्र
चतुविशस्तव
चर्यापरिवह
चारित्रविनय
पदानुक्रमणी
तूर्णं
चूर्णिका
चोरी
छाया
छेदोपस्थापना चारित्र
जाति
जीव
जोवत्व
३०-३१
१
१२
३०-३१
३०
३०
३०
३०
२६-२७
३०
३०-३१
३०-३१
३०
२८-२९
२६-२७
२८-२९
2-67
जीवत्रिकरण | सव
ज्ञानत्रतुष्क
ज्ञानप्रवाद
ज्ञानमार्गणा
ज्ञानविनम
१६६
१८३
ज्ञानावरण
तदवस्य अवधिज्ञान
तप व्युत्सर्ग तपोध
४१ तम
१६६
ताप
२४-२५
१०७
३१
१४९
४७
१४९
६२-६३
९२
३५
१६१
१४५
११
तार्थकत्व
तृणस्पर्श परिषद्
त्यागधर्म
श्रश
वायस्त्रिंश
कालिक
दर्शनक्रिया
दर्शनत्रय
दर्शन मागंणा
दर्शन विनय
दर्शनावरण
दंश मत्कुण
दान
दानान्तराय
२२७
१०७
१०७
१२८
१०७
१७३
१४९
३
३३
११४
२८
११
५८
१८३
१४५
१२
१८१
१६५
१०७
११७
१५०
१६६
१६५
१४९
ረሃ
११
११२
२८-२९
५९
१८३
૪૧
१६६
१३७
१५४
Page #281
--------------------------------------------------------------------------
________________
२२८
तत्त्वार्थसार
दिग्नत दुःख दुःप्रमुष्टनिक्षेपाधिकरण दुःस्बर
दुर्भग
निद्रानिमा ११७ निराकारोपयोग
निर्देश
निर्जरा १५० निर्जरा
निर्जरानुप्रेक्षा
निर्माण १२९ नित्यपर्याप्तक
निश्चयीमुनि २८ निषद्यापरिषह १२ निषिद्धिका ५ निसर्गक्रिया
१७१
१३
१५
४७
नीचाँव नीललेश्या
१५४
૨૭
दुष्टिवादात देश देशात देशसंयतगुणस्थान देशसंयम द्रव्य द्रव्यनिक्षेप वक्ष्याथिकनय द्रन्मिय द्वितीयोपशमसम्यग्दर्शन धर्मकथाङ्ग धर्मद्रव्य धर्मस्वास्यातस्त्रानुप्रेक्षा धर्मोपदेशस्वाध्याय धर्मध्यान धारणा ध्यान ध्रुव धौम्य नग्नतापरिषह नभोगति ( विहायोगति )
नंगमनय
१९
१४१
२८
१७२ १८. १८५
१०१
न्यमोघपरिमण्डलसंस्थान पश्चलब्धि पश्चास्तिकाम पदश्रुतज्ञान
पदसमासश्रुतज्ञान १८४ पद्मलेश्या
परत्व परघात परमाणु परिग्रहमाप परिग्रहसंज्ञा परिणाम परिदेवन
परिभोगान्त राय ७-८ परिहारछेद
४ परिहारविशुद्धिचारित्र १४७ परोक्षप्रमाण
१२८
मय
नाम नामनिक्षेप नाराचसंहनन निःसृत
११७
१५४
१८१
निक्षेप
१७३
निद्रा
६
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--------------------------------------------------------------------------
________________
शब्दानुक्रमणी
२२९
पर्याप्त
१०३
३८
८५
१४९ प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन ४४ प्रदेश ९२ प्रदेशबन्ध
९ प्रदेशाबन्न १० प्रदोष १७ प्रमत्तसंयतगुणस्थान
प्रमाण २६-२७
प्रमाद प्रयोगक्रिया
प्रश्नध्याकरणा १६६
प्राणवाद प्राणातिपातिकी क्रिया प्रात्यागिकी क्रिया प्राभृतनाभृतश्रुतशान प्राभृलप्राभूतसमासश्रुतज्ञान प्राभृतश्रुतज्ञान प्राभृतसमासश्रुतज्ञान प्रादोषिकोक्रिया
प्रारम्भक्रिया १४७ प्रोपषोपवास १४७
११
र
पर्याप्तक पर्याय पर्यायश्चतज्ञान पर्यायसमासश्रुतज्ञान पर्यायाधिकनय पारिवाहिकी क्रिया पारिणामिकमाव पारितापिकी क्रिया पार्षद पिपासा (तुषा) परिषह पीतलेश्या पुण्डरीक पुद्गल पूर्वश्रुसशान पूर्वसमास तज्ञान पृथक्त्वक्लध्यान प्रकीर्णक प्रकृतिबन्ध प्रश्चला प्रचलनचला प्रच्छनास्वाध्यायतप प्रशापरिषह प्रतर प्रतिक्रमण प्रतिक्रमणतदुभय प्रतिपत्तिकश्रुतज्ञान प्रतिपत्तिकसमासश्रुतज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण प्रत्यभिज्ञान प्रत्याख्यानपूर्व प्रत्याख्यानाबरण प्रत्येक
८
१३०
बन्ध
१८.
बन्ध
१४२
१०७
बहु
१८१
बहुविध बामनिव॒ति वाजपकरण
४८
६ बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा
ब्रह्मचर्यधर्म ११ भक्तपान संयोग १४८ भयसंज्ञा १४९ भवप्रत्ययअवधिज्ञान
१२
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--------------------------------------------------------------------------
________________
सत्यार्थसार
३३ मोहनीय-मोह
८३
१७४
१७८
१८४
४८
४४
भव्यत्व भब्यत्वमार्गणा भाब भावनिक्षेप भावेन्द्रिय भाषापर्याप्ति भाषासमिति भोगोपभोगपरिमाण मति मनःपर्ययज्ञाच मनःपर्याप्ति मनोनिसर्ग मलधारणपरिपह महाकल्प महापुण्डरीक महावत मात्सर्य मायाक्रिया मार्दव मिथ्यात्व मिथ्यात्वक्रिया मिथ्यात्वप्रकृति मिथ्यादर्शनक्रिया मिथ्यादृकगुणस्थान मिश्रगुणस्थान मुक्तजीव मूलगुणनिर्वर्तना मृषावचनयोग
३१
२४-२५ यथाख्यातवारिण
यशाकीति ४८ याचनापरिषह ४४ योग १६२ रस १२९ रसपरित्यागतप ७ रूपीद्रव्य
रोगपरिषह रौद्रध्यान
लब्धि १६६ लयपर्याप्तक
लाभान्तराय ११ लेश्यामागंणा १२४ लेण्याषट्क ११५ लोकपाल ११३ लोकबिन्दुसार
लोकानुप्रेक्षा ___ वचनाराबसंहनन ११२ वर्षभनाराचरांहनन १४७ वध
वधपरिषह वन्दना वर्तना
वष्णुिर्धमानअवभिशान ११४ वस्सुथुतज्ञान ५४ वस्तुसमासश्रुतमान
७ वाङ निसर्ग १२८ वाचनास्वाध्यायतप ४६ वादर
वामनसंस्थान १९२ विग्रहगति
१४९ १४९
१६६
मेधा
मैथुन
मैथुनसंज्ञा मोक्ष मोक्ष
१७९ १४९ १४१
B
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--------------------------------------------------------------------------
________________
शब्दानुक्रमणी
२३१
६
१६४
२४
१६५
५४
मिवारणक्रिया विधान विपरीतमिथ्यात्व विपाकविचयधर्म्यध्यान विपाकजा निर्जरा विपाफसूचाङ्ग विपुलमतिमनःपर्ययज्ञान विविक्तशय्यासनतर विवेक + उपस्थापन विसंयोजना वीर्यप्रवाद वीर्यान्तराय वीर्यानुवाद वृत्तिपरिसंख्यानतप वेद वंदनीय-वैद्य बैंक्रियिकशरीर बैनयिक धननिकमिथ्यात्व वैयावृत्यसप व्यवनावग्रह व्यवहारतय व्यवहारी मुनि व्यय व्याख्याप्रशप्ति व्युपरतक्रियशुक्लष्यान प्रत
१४७
११३ शीतपरिषह २२ शुक्ललेश्या १४१ शुभ
शोक १७६ शौयधर्म ११ श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति १३ श्रृत ज्ञान १७९ सत्रात १८१ सत २७ सत्यधर्म ११ सत्यप्रवाद १५४ रात्यभूषावचनयोग
सत्यवचनयोग १८ सदेद्य
३२ समचतुरस्रसंस्थान १४५ समन्तानुपातक्रिया
समभिरूढ़नय समवायाङ्ग
समादानक्रिया १८१ समारम्भ
सम्यक्त्वक्रिया
सम्यक्त्वप्रकृति २०७ सम्यक्त्वमार्गणा
सम्यक्चारित्र
सम्यग्ज्ञान १८७ सम्यग्झान १२३ सम्यग्दर्शन १२८ सम्मग्मिथ्यात्वप्रकृति
सयोगकेवली सल्लेखना
सइसानिक्षेपाधिकरण ४४ संख्या ७३ संग्रहनय
११
११२
११३
११२
१४७
६.
प्रती
२०
शब्दनय शयनपरिषह शरीर ( कायपञ्चक) शरोपर्याप्ति शलाकापुरुष
१३१
११४ २४-२५
Page #285
--------------------------------------------------------------------------
________________ 232 तत्त्वार्थसार 187 174 166 147 161 41 स्थिर संघातश्रुतज्ञान संघातसमास संज्ञाचतुष्टय संजीमार्गणा संमई नजन्म संयमधर्म संयममार्गणा संरम्भ संवर संघर संबरानुप्रेक्षा संसारिजोव संस्थान संस्थान विचयवर्थध्यान साकारोपयोग साधन साधारण सामानिक सामायिक सामायिकचारित्र মামান্ধিজিম্বার साम्परायिकासव सासनगुणस्थान सांशमिवामिथ्यात्व सुभग सुस्वर सूक्ष्म सूक्ष्म क्रियशुक्लष्यान सूक्ष्मसाम्पराय सूक्षमसाम्परायचारित्र सूत्रकृताङ्ग 62-63 स्कन्म स्त्रीपरिषह 58 स्त्यानगुद्धि 113 स्थानाङ्ग / स्थापनानिक्षेप स्थावर 171 स्थिति 34 स्थितिबन्ध 106 स्पर्श स्पर्शन स्पर्शनक्रिया 149 स्मरण स्वतत्त्व स्वसंवेदनज्ञान 173 स्वहस्त्रक्रिया स्वातिसंस्थान स्वामित्व 35 स्वार्थानुमिति हिंसा होयमानअवधिज्ञान हुण्डका संस्थान 149 24-25 112 112 149 128 142