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________________ प्रस्तावना देखनेवालेके मुखसे तोसरा प्रश्न यह निकलता है कि पदार्थ कैसे बनता है ? इसका उत्तर साधन देता है । चौथा प्रश्न निकलता है कि यह पदार्थ कहाँ मिलता है ? इसका उत्तर अधिकरण देता है। पांच प्रश्न होता है कि कब तक मिलता है ? इसका उत्तर स्थिति देती है 1 और रात्री प्रश्न होता है कि यह एक ही प्रकारका है या इसके अन्य प्रकार भी है ? इसका असा विधान देता है। इसी तरह कपडाका एक व्यापारी कपड़ा खरोदनेके लिये बाजार जाता है। कपड़े की दूकानपर पहुँचते ही उसका सबसे पहला प्रश्न होता है-कपड़ा है क्या ? (सत्) । दुकानमें नमूनाके लिये रखे हुए दो-चार थानोंको देखकर वह दूसरा प्रश्न करता है-- कितना है ? ( संख्या ) । दुकानदार कहता है--बहुत हैं 1 ब्यापारी पूछता है-कहाँ रक्खा है-कपड़ाका क्षेत्र क्या है ? दुकानदार कपड़ेको गोदाममें जाकर माल दिखाता है (क्षेत्र ) । व्यापारी कपड़ेसे भरी हुई गोदाम देखकर पूछता है - भाई यह इतना माल कहासे आता है और कहां खपता है ? दुकानदार कपड़े आने तथा सपने के स्थान बतलाता है (स्पर्शन) । व्यापारो पूछता है कि माल कब तक मिलता रहेगा-दुकान कब तक खुली रहती है ? दुकानदार दुकानका समय बतलाता है ( काल)। व्यापारी पूछता है यदि अभी माल न उठा सवू तो कितने दिन बाद मिले या ? दुकानदार दूसरे माहका कोटा मिलने का समय बताता है। अन्तर ) । व्यापारी पूछता है--कौन माल किस क्लास का है ? दुकानदार कपड़ेको कलास-विशेषता बतलाता है ? (भाव) । व्यापारी इच्छानुसार माल निकलवाकर अलग रखवाता जाता है, पीछे दुकानदार माल संभालकर परचे पर नूद करता है-कौन कपड़ा कितना कम और अधिक है { अल्पबहुत्व )। इस तरह संसारके प्रत्येक पदार्थ सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहत्यके द्वारा जाने जाते है । वस्तुतः पदार्थोके जानने के उपाय यही है । मोक्षमार्गके प्रकरणमें सद् आदि अनुयोगोंका प्ररूपण मोक्षमार्गके अनुरूप होता है । तत्त्वार्थसारका सामान्य आधार उमास्वामी महराजका तत्त्वार्थ सूत्र है और विशिष्ट आषार जहाँ जो होगा उसको चर्चा इसो स्तम्भमें की जाती रहेगी। (२) द्वितीयाधिकारमें जीवके ओपमिक, क्षायिक, क्षायोपमिक, औदायिक और पारिणामिक इन पाँच स्वतत्वोंका वर्णन जीवका लक्षण बताने के लिये उपयोगका वर्णन किया है। उपयोगके साकार और अनाकारक भेदसे दो भेद बतलाते हुए ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोगका वर्णन किया है। पश्चात् जीवके संसारी और मुक्तके भेदसे दो भेद कर संसारी जीवोंका वर्णन गुणस्थान आदि बीस प्ररूपणाओंके द्वारा किया है। । बान पड़ता है यह सब विषय अमृतचन्द्रसूरिने प्राकृतपश्चसंग्रहसे लिया है क्योंकि संग्रहकी माथाओके गाय तत्त्वार्थसारके श्लोकोंका अत्यन्त भावसादृश्य है । जैसे
SR No.090494
Book TitleTattvarthsar
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
AuthorPannalal Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size5 MB
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