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________________ प्रकाशकीय सात माह पूर्व सितम्बर १९६९ में 'समयसार-प्रनयन'का और दिसम्बर १९६९ में मेरी जीवनगाथा प्रथम भाग ले सुर्य संस्करगामी नागोकाप्रसाद मर्गी गन्यमाला तारा प्रकाशन हुआ था। आज महावीर-जयन्तीके पुण्यावसरपर 'सस्वायंसार' प्रकट हो रहा है, यह अत्यन्त हर्ष की बात है। ___मूल 'तत्त्वार्थसार' उन्हीं आचार्य अमृतपन्द्रको कृति है जिन्होंने आचार्य कुन्दकुन्दके समयसार, प्रचनसार और पंचास्तिकाय इन ग्रन्धोंपर मार्मिक टीकाएं लिखी हैं तथा 'पुरुपार्थसिद्धधुपाय' जैसा महनीय स्वतंत्र सैद्धान्तिक अनमोल ग्रन्थ रचकर जैन वाङ्मयको समुद्ध बनाया है। श्री पं० पन्नालालजी साहित्याचार्यने प्रस्तुत 'तरवार्थसार' पर अपना मूलानुगामी हिन्दी-रूपान्तर लिखा है । 'तत्त्वार्थसार' स्वयं ही बहुत सरल रचना है । साहित्याचार्यजोने सुबोध हिन्दी रूपान्तर द्वारा उसे और अधिक सरल बना दिया है। निस्सन्देह इसमें तस्वार्थ-सम्बन्धी सभी विषम सुगमतासे प्रतिपादित हैं। यह स्वाध्यायिओं के लिए ही उपयोगी नहीं है, अपितु जैन तत्त्व-जिज्ञासु जनेतर विद्वानों और छात्रों के लिए भी अतीव लाभप्रद है। कालेजों, विद्यालयों और पाठशालाओंके पाठ्यक्रम में इसका सहायक अन्धके रूपमें अपवा स्वतंत्र रूपमें समावेश किया जा सकता है। ____ आवरणीय अ. राजारामजी भोपाल वाङ्मयके प्रचार और प्रसारके लिए सदा उधत रहते हैं। उनका वाङ्मयानुराग निश्चय ही स्तुत्य है। आपने इस ग्रन्थ के प्रकाशनमें १०००) की सहायता भिजायी है। इतना ही नहीं, कितने ही महानुभावोंको प्रेरित करके ग्रन्थमालाका संरक्षक-सदस्य भी बनाया है और स्वयं बने है। इस अवसरपर हम उनका आदर पूर्वक आभार प्रकट करते हैं। श्रीमान् पं० कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्री वाराणसोके भी आभारी है जिन्होंने प्राक-कथन लिखनेकी कृपा की है। साहित्याचार्यजी को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रह (सकते। उनके द्वारा सम्पादित अनुवादित यह चौथा अन्य ग्रन्थमालासे प्रकाशम था रहा है। इससे पूर्व 'मेरी जीवन-गाथा' ( दोनों भाग ) और 'समयसार-प्रवचन' उनके द्वारा सम्पादित होकर प्रत्यमालासे प्रकाशित हो चुके है। अपने समस्त संरक्षक-सदस्योंको भी धन्यवाद है जिनके आर्थिक एवं नैतिक सहयोगमनपर अन्यमाला निरन्तर प्रगति के पथपर आरुद्ध है। ___ महावीर प्रेसके संचालक श्री बाबूलालजी फागुल्ल और उनका परिकर भी ग्रन्थको सुन्दर और आकर्षक छपाईके लिए धन्यवाघाह है। डा. नेमिचन्द्र शास्त्री डा० दरबारोलाल कोठिया संयुक्त मंत्री मंत्री चैत्रशुक्ला १३, वि० सं० २०२५ वी. नि. २४९६ १९ अप्रैल, १९५०
SR No.090494
Book TitleTattvarthsar
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
AuthorPannalal Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size5 MB
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