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________________ ६५ वितीयाधिकार तानि द्वादश सार्दानि भवन्ति जलचारिणाम् | नवाहिपरिसाणां गवादीनां तथा दश ॥११॥ चीनां द्वादश तानि म्युश्चतुर्दश नृणामपि | षड्विंशतिः सुराणां तु श्वाभ्राणां पञ्चविंशतिः ।।११५॥ कुलाना कोटिलक्षाणि नवतिर्नवभिस्तथा । पञ्चायुतानि कोटीना कोटिकोटी च मीलनात् ॥११६॥ अर्थ-पृथिवीकायिकके बाईस लाख, जलकायिकके सात लाख, अग्निकायिकके तीन लाख, वायुकायिकके सात लाख, वनस्पतिकायिकके अट्ठाईस लाख, द्वीन्द्रियोंके सात लाख, त्रीन्द्रियोंके आठ लाख, चतुरिन्द्रियोंके नौ लाख, जलचरोंके साढ़े बारह लाख, सर्प तथा छातीसे सरकनेवाले अजगर आदिके नौ लाख, गाय आदि चौपायोंके दश लाख, पक्षियोंके बारह लाख मनुष्योंके चौदह लाख, देवोंके छब्बीस लाख और नारकियोंके पच्चीस लाख कुलोंकी कोटियां हैं। सब मिलाकर कुलोको संख्या एक करोड़ निन्यानवे लाख पचास हजारको एक करोड़से गुणा करनेपर जितना लब्ध आवे उतनी हैं अर्थात् १९९५००००००००००० प्रमाण है। भावार्थ-शरोरके भेदकी कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदको कुल कहते है अर्थात् जिन पुद्गलोंसे जीवोंके शरीरकी रचना होती है वे इतने प्रकारके हैं ॥ ११२-११६ ।। लियंचों तथा मनुष्योंको उत्कृष्ट आयुका वर्णन द्वाविंशति वां सप्त पयसां दश शाखिनाम् । नभस्वतां पुनस्त्रीणि वीनां द्वासप्ततिस्तथा ॥११७॥ उरगाणां द्विसंयुक्ता चत्वारिंशत्प्रकर्षतः । आयुर्वर्षसहस्राणि सर्वेषां परिभाषितम् ॥११८॥ दिनान्येकोनपञ्चाशत्त्यक्षाणां त्रीणि तेजसः । घण्मासाश्चतुरक्षाणां भवत्यायुः प्रकर्षतः ॥११९॥ नवायुः परिसणां पूर्वाङ्गानि प्रकर्षतः । द्वयक्षाणां द्वादशान्दानि जीवितं स्यात्प्रकर्षतः ॥१२०॥ १. गोम्मदसार-जीवकाण्डमें मनुष्यों की कुलकोटियां बारह लाख करोड़ बतलाई है।
SR No.090494
Book TitleTattvarthsar
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
AuthorPannalal Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size5 MB
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