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________________ प्राक्कथन समय तत्त्वार्थसारमें आचार्य अमृतचन्द्रने अकर्सफदेयके तत्वार्थवातिकका विशेष उपयोग किया है। उसके वातिकोंको श्लोकरूपसे निवद्ध करके तत्त्वार्थसारका महत्त्व बहाया है। तस्वार्थवातिककी ख्याति तत्त्वार्थभाष्यके रूपमें भी रही है 1 आचार्य वीरसेन स्वामीने, अपनी धवला टीकाराम | पु. १, ५, ५) 'उक्त च तत्त्वार्थभाष्ये'। लिखकर तत्त्वार्थबार्तिकका उद्धरण दिया है। उत्तरकालीन आचार्य भास्करनन्दिने अपनी टीका विशेष विस्तारके लिये जिम भाष्यको देखने की प्रेरणा की है वह भाष्य भो अकलंकदेव. मृत तत्त्वार्थवातिक ही है । इसी तरह धर्मभूषणने न्यायदीपिका भाष्यके नामसे जो वाक्य उद्धृत किये है वे भी तत्त्वार्थवातिकके ही वाक्य है। आचार्य समन्तभद्ररचित महाभाष्य था, भाष्य नहीं। किन्तु उसकी स्थितिपर पं. जगलकिशोरजी मुख्तार अच्छा और सप्रमाण प्रकाश डाल गये हैं। अतः उसे विस्मृत कर देना ही ऐतिहासिक दृष्टि से उचित प्रतीत होता है । अस्तु । अतः यह सुनिश्चित है कि अमृतचन्द्र अकलंकदेवके पश्चात् हुए है। किन्तु उनके तत्त्वार्थसारपर आचार्य विद्यानन्दके तत्त्वार्थरलोकवातिकका कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होला । आचार्य जयसेनके धर्मरत्नाकरमें पुरुषार्थसिञ्चयुपायके लोक ऊद्धृत होनेसे यह भी सुनिश्चित है कि अमृत चन्द्र वि. सं. १०५५ से पूर्व हुए है क्योंकि धर्मरत्नाकरम उसका रचनाकाल १०५५ दिया हुआ है । आचार्य अमितगति द्वितीयने सुमाषित रन. सन्दोहको वि० सं० १०५० में, पंचसंग्रहको १०७३ और धर्मपरीक्षाको १०७० सं० में पूरा किया था । इनके दादा गुरु नेमिषेणाचार्य के भी गुरु अमितगति प्रथमने योगसारको रचना की थी 1 यह योगसार एक तरह कुन्दकुन्दाचार्य के प्राकृत भाषानिवद्ध समयसारका संस्कृत रूपान्तर है। इसमें भी पुण्य और पापमै भेदाभेद तत्वार्थसारका अनुकरण करते हुए कहा है । यथा सुखासुखविधानेन विशेषः पुण्यपापयोः । निस्यसौख्यमपश्यद्भिर्मन्यते -मुग्धयि भिः ।। पश्यन्तो जन्मकान्तारे प्रवेशं पुण्यपापतः । विशेष प्रतिपद्यन्ते न तयोः शुद्ध बुद्धयः ॥ सत्त्वार्थसारके उन दोनों श्लोकोंके ही अभिप्रायको प्रकारान्तरसे दोहराया गया हैस्व. पं० जुगलकिशोरजी मुख्तारने भी तत्वानुशासनको अपनी प्रस्तावनाम (१. ३४) इस बातको स्वीकार किया है कि 'अमितगति प्रथमके योगसारप्राभूतपर भी अमृतचन्द्र के तत्त्वार्थ सार तथा समयसारादि टीकाओंका प्रभाव लक्षित होता है जिनके समय अमितगति द्वितीयसे कोई ४०-५० वर्ष पूर्वका जान पड़ता है। ऐसी स्थिठिमें अमृतचन्द्र सूरिका समय विक्रमको १० बों शताब्दीका प्रायः तृतीय चरण है ।'
SR No.090494
Book TitleTattvarthsar
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
AuthorPannalal Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size5 MB
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