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________________ प्राक्कथन आचार्य अमृतचन्द्रका वैशिष्ट्य ___जहां तक आचार्य कुन्दकुन्दके ग्रन्थों को व्याख्याका प्रश्न है, हमें तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुन्दकुन्दने ही अमृतचन्द्र के रूपमें पुनर्जन्म धारण किया था। समयसारको उनकी टौका सचमुच में उसपर कलशारोहण है। अध्यात्मका बीज कुन्दकुन्दनै बोया किन्तु उसे अंकुरित, पुष्पित और फलित करने का श्रेय आचार्य अमृतचन्द्रको ही है। जिस तरह वेदान्तदर्शनके सूत्रोंपर वाचस्पति मिश्रने भामती रची उसी प्रकार आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारपर आत्मख्यातिकी रचना की। दोनोंकी शैली और भाषाकी प्राञ्जलतामें समानता है। पुरुषार्थसिद्धयुपाय और तत्त्वार्थसार इन टीकाओंके अतिरिक्त आचार्य अमृतचन्द्र की दो रचनायें उपलब्ध है---[क पुरुषार्थसिद्धयुपाय और दूसरा तस्वार्थसार । दोनों रचनाओं में अध्यात्मी अमरचन्द्र के वैशिष्यको स्पष्ट छाप है। तुर्थगिका सामानारका गन्थ है। रत्नकरण्डश्रावकाचारके बाद उसफा नम्बर माता है। उसके नाम तो वैशिष्टय है ही, आद्यन्त वर्णनमें भी अपना वैशिष्टय है। उसके आदिमें जो निश्चय और व्यवहार नयको चर्चा है तथा अन्नमें जो रत्नत्रयको मोक्षका ही उपाय कहा है वह सब कथन श्रावकाचारोंको दृष्टि से अछूता है। पुण्यानवको शुभोपयोगका अपराय बतलाना अध्यात्मी अमृतचन्द्रकी अमृतमयो वाणीका निस्यन्द है । उनके कुछ श्लोक तो समस्त जिनशासनको समझनेको कुंजी है । इसी तरह उनका तत्त्वार्थसार भी तत्त्वार्थ मूत्रके समग्र सारको लिए हुए होने पर भी अपना पृथक वैशिष्टय रखता है जिसका स्पष्टीकरण अपनी प्रस्तावनामें पं० पन्नालालजीने किया है। उसके अन्त में भी उन्होंने निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्गकी पर्वा की है । वह चर्चा सूक्ष्म ईक्षिकासे चिन्तनीय है। कुछ विशिष्ट पद्य प्राचार्य अमृतचन्द्र के इन दोनों ग्रन्थरस्नों में कुछ ऐसे सूत्र हैं जो वर्तमान में प्रचलित सैद्धान्तिक विवादोंको सुलझाने में सहायक हो सकते हैं। नीचे उन्हें हम दे देना उचित समझते हैं मुख्योपचारविवरणनिरस्तदुस्तरविनेयदुर्बोषाः । ध्यवहारनिश्चयशाः प्रवर्तयन्ते जगति तीर्थम् ।। ४ ।। मुख्य और उपचार कथनके विवेचन द्वारा शिष्योंके दुनिवार अमानभावको नष्ट करनेवाले तथा व्यवहार-निश्चयके ज्ञाता आचार्य ही जगसमें धर्मतीर्थका प्रवर्तन करते हैं ।। निश्चर्यामह भूतापं व्यवहारं वर्णयन्त्यभूतार्थम् । भूतार्षबोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि संसारः ॥ ५ ॥ यहाँ निपचयनयको भूतार्थ और व्यवहारनयको अभूतार्थ कहते है । प्रायः सारा हो संसार भूतार्यके ज्ञानसे विमुख है। अथवा भूतार्थ के ज्ञानसे विमुख जो अभिप्राय है वह सभी संसाररूप है।
SR No.090494
Book TitleTattvarthsar
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
AuthorPannalal Jain
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size5 MB
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