________________
मृलाराधना
आश्वासः
१५४९
मूलारा-सध्यसोक्खाई मनःषष्चक्षुराविविषयानुभवप्रभवानि देवमानुपतियसंबंधीनि वा सुखानि । ठाणाणि इंद्रत्वादिपदानि प्रामपुरपननादीनि वा।
प्राणिओंको सबसे बड़ा द्रव्यहीका लोभ है. द्रव्य लोभसे इंद्रिय सुख की प्राप्ति होती है. द्रन्यके निमित्त प्राणोंको भी त्यामते हैं इस लिए द्रव्यकी अनित्यताका साथमतः दिपन कर .इस दिग्दर्शनसे द्रध्यमे आत्मा निःसंग होता है
अर्थ-सब प्रकारके सुख विजलाके समान दीखकर नष्ट हो जाते हैं. इष्ट रूपादिक पांच प्रकारके विपयोंके सानिध्यसे मनसे मनुष्य तिर्यंच और देवाकै मुखमें प्राणी सुखलंपट होकर लुब्ध होता है. इस मुखके लिये हजारों क्लश देनेवाली आपत्ति भी भोगने के लिये जीव तयार होते हैं. परंतु ये सुख जलसे नम्र और गंभीर गर्जना करनेवाले नलि मेत्रों में चमकनेवाली बिजलकि समान चंनल हैं, जहां जीव निवास करता है ऐसे ग्राम, नगर, पत्तन वगैरह स्थान अधुव अर्थात् नाशवंत हैं. यह मेरा स्थान है, मैं यहां रहता हूं ऐमा मनमें तू संकल्प करना छोटद क्यों कि य स्थान अनित्य है परंतु इनमें नित्यपनाका संकल्प करके स्वीकार करनेपर उनका नाश होनेसे सैकडो सक्लेश परिणाम उत्पन्न होते हैं. अथवा इस जगतमें अपन किय हुए विचित्र कर्मके उदयसे जीवीको इंद्रपना, चक्रवर्तिपना, गणधरत्व ऐसे स्थानोंकी प्राप्ति होती हैं परंतु इन स्थानोंकी अनित्यता ही है.
णावागदाब बहुगइपधाविदा हुंति सन्वसंबंधी ।। सम्वेसिमासया वि अजिच्चा जह अब्मसंधाया ॥ १७१८॥ नानादेशागताः पांथा नौगता इव बांधवाः ।।
गत्वरा आश्रयाःसर्वे शारदा इब नीरदाः ॥ १७८५ ।। विजयोदया–णाचामवाय जलयानपात्रारुदा इध बहुगदिएधाविदा हुँति सव्यसंबंधी: पिचित्रशुभाशुभपरिपामोगासगनिः कर्मवशात्तदुपनीयमानदेवमानधनारकत्तियंघाख्यगतिपर्यायग्नडणाय कृतप्रथाणबंधयः सर्वेऽपि । पतेन बंधुताया अनित्यतोका | उपात्तगत्यपरित्यागे बंधुता स्थिरा भवति, उपात्ता चेत् स्यक्तान्या च गृहीता पितृपुत्रादीनां गत्य. तरमुपगतानामपि बंधुस्वे स्वजनपरजनविवेक एव ने स्यादिति मन्यते । जयसिमासया पि सर्वेषामाश्रया अपि यानाधिस्य प्राणिनो जीवितुमुत्सहते तेप्याश्रयाः स्वामी मृत्यः पुत्रोभ्रातस्येवमादयोऽनित्या यथा अंब्भसंघादा अभ्रसंघाव।
मलारा-णाबागदाव यानपात्रारूदा इव । बहुगदिपघाविदा विचित्रशुभाशुभपरिणामोपात्तगतिकर्मवशात्तदुपनी
-