Book Title: Bhagavati Aradhana
Author(s): Shivarya Acharya
Publisher: Jain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur

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Page 30
________________ प्रस्तावना २७ इस तरह इसमें तीन ही आराधना कहीं हैं। इसमें भी गाथा ४४ में पण्डितमरणको कहनेकी सूचना है इत्तो जह करणिज्ज पंडियमरणं तहा सुणह । आगे मरणसमाधिको गा० ६० से ६६ तथा भ० आ० को गाथा १८१ से १८८ समान हैं। आचार्य कैसा होना चाहिये यह दो गाथा ८६-८७ में कहा है और भ०आ० ४१९-४२० गा० में कहा है । ये गाथाएँ समान नहीं है कथनी समान है। मर० स० ९४-९५ में और भ०० ५३३-५३४ में आलोचनाका कथन है। तथा म०स० ९६-१०१ में और भ०आ० ५४०-४२, ५४५, ५४८, ५४९ में शल्योंका कथन है । गाथा ३०१ से आगे कहा है इति सिरिमरणविभत्तिसुए संलेहणसुयं सम्मत्तं । अथ आराहणासुयं लिख्यते । अर्थात् मरणविभक्तिश्रुतके अन्तर्गत सल्लेखना श्रुत समाप्त हुआ। अब आराधनाश्रुत लिखते है। इस तरह इसमें दो विभाग किये हैं। भ० आ० को तरह इसमें भी साधना करनेवालोंके उदाहरण दिये हैं। यथा-कंचनपुरमें श्रेष्ठि जिनधर्म श्रावक (४२३) । मेतार्य मुनि (४२६), चिलाती पुत्र (४२७), गज सुकुमाल (४३१), अवन्ति सुकुमाल (४३५), धन्य शालिभद्र (४४४), सुकोशल (४६६), वइर ऋषि (४६८), वइर स्वामी (४७२), चाणक्य (४७८), इलापुत्र (४८३), क्षमाश्रमण आर्यरक्षित (४८९), स्थूलभद्र ऋषि (४९०), अर्जुन मालाकार (४९४), आसाढ़ मूति आचार्य (५०२) आदि। अन्तिम गाथाओंमें कहा है-एक मरणविभक्ति, दो मरणविशुद्धि, तीसरी मरणसमाधि, ल्लेखनाश्रत, पाँच भक्तप्रतिज्ञा, छठा आतुर प्रत्याख्यान, सातवाँ महाप्रत्याख्यान, आठवाँ आराधना पइण्णा इन आठ श्रुतोंका भाव लेकर मरणविभक्तिकी रचना की है । इसका दूसरा नाम मरणसमाधि है। आतुर प्रत्याख्यानका प्रारम्भ बालपण्डितमरणसे होता है। अतः भ० आ० की २०७२ से २०८१ तककी गाथाएँ इसमें एकसे दसतक वर्तमान हैं। इसमें आगे कुछ ऐसी गाथाएँ भी हैं जो कुन्दकुन्दके प्राभृतोंमें पाई जाती है यथा ममत्तं परिवज्जामि ॥२३॥ आया हु महं नाणे ॥२४॥ एगो मे सासदो अप्पा ।।२६।। संजोगमूला जीवेण ॥२७|| __ भत्तपइण्णामें भी अनेक गाथाएँ भ० आ० के समान हैं। संस्तार पइण्णाका प्रारम्भ क्षपकके लिये आवश्यक संस्तारककी प्रशंसासे होता है। इसकी प्रथम गाथामें संस्तारकी प्रशंसामें वे ही उपमा दी हैं जो भ० आ० में ध्यानकी प्रशंसामें दो हैं । यथा वेरुलिउव्व मणीणं गोसीसं चदंण व गंधाण । जह व रयणेसु वइरं तह संथारो सुविहियाणं ॥५।। वइरं रदणेसु जहा गोसीसं चंदण च गंधेसु ।। वेरुलियं व मणीणं तह ज्झाणं होइ खवयस्स ।।१८९०।। __ इसमें भी भ० आ० की तरह ही सुकौशल मुनि (६३), अवन्ति सुकुमाल (६५), रोहेटक नगरमें कोव क्षत्रिय (६८) पाटलीपुत्रमें चन्द्रगुप्त (७०), कोलपुरमें गृद्धपृष्ठ (७१), पाटलीपुत्र में चाणक्य (७३), काकन्दीपुरीमें अमृतघोष (७६), कौशाम्बीमें ललित घटा (७९), कुरुदत्त (गुरुदत्त) (८५), चिलाती पुत्र (८६), गजसुकुमाल (८७), आदि उदाहरण दिये हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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