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जैब-दर्शन
'दुर्गतिप्रपतत्प्राणिधारणाद् धर्म उच्यते " ।
भावार्थ - जो दुर्गतिमें पड़ते हुए प्राणियोंको धारण करता प्राणियों को दुर्गतिमें पड़ने से बचाता है, वह धर्म है ।
वास्तवमें तो धर्म, आत्माकी स्वानुभवगम्य - अनुभवसे ही समझमें आनेवाली वस्तु है । क्लिष्ट कर्मोंके संस्कार दूर होने पर, राग-द्वेष की वृत्तियाँ घटने पर, अन्तःकरणकी जो शुद्धि होती है, वही वास्तविक धर्म है । इस वास्तविक धर्मको संपादन करने के लिए दान-पुण्य आदि जो क्रियाएँ की जाती हैं, वे भी धर्म ही कहलाती हैं; क्योंकि वे भी धर्म राजाकी ही परिवार होती हैं।
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जो गृहस्थ उक्त बारह व्रतोंको सम्यक्त्वसहित पालते हैं उनकी आत्मिकशक्तिका क्रमशः विकास होता है; और अन्तमें उनकी आत्मा के सारे गुण प्रकट हो जाते हैं । अब यह विचार किया जायगा कि, आत्मशक्तिका विकास कैसे होता है ।
गुणश्रेणी अथवा गुणस्थान
जैनशास्त्रों में चौदह श्रेणियाँ बताई गई हैं । ये गुणस्थान की श्रेणियाँ हैं । गुणस्थानका अर्थ है गुणोंका विकास । आत्मिक गुणका विकास यथायोग्य क्रमशः चौदह श्रेणियों में होता है ।
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प्रथम श्रेणी-पंक्तिके जीवोंकी अपेक्षा दूसरी और तीसरी श्रेणीके जीवोंके आत्मिक गुण कुछ विशेष रूपसे विकसित होते हैं। चौथी श्रेणी के आत्मिक गुण इन तीनों से अधिक होते हैं । इसी प्रकार उत्तरोत्तर श्रेणियोंके जीव यथासम्भव पूर्व पूर्व श्रेणियों के जीवों की
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