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प्रथम अध्याय
अतिमान भी कहते हैं । मनोवृत्तियोंमें यह कामना प्रधान और प्रबल है, इसीसे इसको धृतराष्ट्र (मन) का ज्येष्ठ पुत्र कहा गया, और इसीके वशमें मन अविरत चालित होनेसे, तथा शरीरका सर्वत्र इसका प्रभाव विस्तृत रहनेसे राजा यही है।
"व्यूढं पाण्डवानीकं दृष्ट्वा" पाण्डवव्यूह' धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रके पश्चिम ओर पूर्वमुखी होकर उदीयमान ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलको देखता हुआ युद्धके लिये प्रस्तुत है, और कौरवगण पूर्व दिशामें खड़े होकर पश्चिमाभिमुखी अर्थात् विषयमुखी होनेसे सूर्यज्योतिको पश्चात् भागमें लिये हुए अवस्थित हैं । ___ शरीर-कोषके सम्मुख भागका नाम पूर्व, पश्चाद्भाग का नाम पश्चिम, दाहिने भागका नाम दक्षिण और वामभागका नाम उत्तर दिक है। इस कोषको पूर्व दिशामें ही सवितृमण्डल देख पड़ता है; साधक मात्र इस विषयको जानते हैं। विवेक वैराग्य-शम-दमादि साधन चतुष्टय सम्पन्न होनेके पश्चात्, साधन-मार्गमें आकर सामने अर्थात् पूर्व दिशामें सूर्य-ज्योति लक्ष्य करनेसे ही अतिमानाश्रित संसारानुकूल वृत्तिसमूह सम्मुख खड़े होकर साधकको विमुख करनेकी चेष्टा करता है; इसलिये विवेक वैराग्य का दल पूर्व मुखी श्रार अतिमानी महामोहका दल पश्चिममुखी है। इन दोनों दलों
• साधन चतुष्टय यथा(१) “नित्यानित्य वस्तुविवेकः" अर्थात् नित्यवस्तु एक ब्रह्म ही है उसको छोड़कर और जो कुछ है सब अनित्य है; यह निश्चय ज्ञान । (२) "इहामुत्रार्थ फलभोग विरागः" अर्थात् इह काल का सुख और पर कालमें स्वर्ग भोगकी इच्छा परित्याग। (३) “शमादि षट् सम्पत्तिः" अर्थात् शम = मनोनिग्रह, दम= चक्षुरादि वाद्य न्द्रियकी वृत्तिका निग्रह, तितिक्षा-शीतोष्ण सुख दुःखादि कष्ट सहिष्णुता, उपरति स्वधर्मानुष्ठान, श्रद्धा - गुरुवाक्यमें विश्वास, समाधान - चित्तकी एकाग्रता। (४) "मुमुक्षुत्व" अर्थात् हे विधे ! मेरा मोक्ष ( मुक्ति) हो जाना चाहिये-यही दृढ़ इच्छा रहना।