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श्रीमद्भगवद्गीता पड़ता है। इसी प्रकार बार बार करते करते, स्मृति-संस्कार निस्तेज हो जावेगा, मन भी चंचलभाव त्याग करके स्थिरत्वको लेवेगे ॥ २६ ॥ - प्रशान्तमनसं ह्यनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपेति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ।। २७ ।। अन्वयः। एनं (एवं प्रत्याहारादिभिः पुनः पुनः मनो वशीकुर्वन्तं ) शान्तरजसं (प्रक्षीणमोहादिक्ल शरजसं ) प्रशान्तमनसं अकल्मवं ( धर्माधादिवजितं ) ब्रह्मभूतं ( जीवन्मुक्त) योगिन हि ( एव ) उत्तमं सुखं ( समाधिसुख स्वयमेव ) उपेति (गच्छति ) ॥ २७॥
अनुवाद। इस प्रकार करते करते मन जब समस्त रजोगुणके मलिनतासे विमुक्त होकर प्रशान्त भाव ग्रहण करता है, तबही ब्रह्म भावापन्न उस योगीको उत्तम सुख प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥
व्याख्या। मनको पुनः पुनः पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्याहार द्वारा आत्मामें लाकर वश करनेसे, योगी प्रशान्तमना होते हैं, अर्थात उनका मन चंचलताको त्याग करके स्थिर होता है; पश्चात उनके रजोगुणकी क्रिया भी शान्त होती है, तब उनके अन्तःकरणमें मोह आदि क्लेश समूह क्षीणसे क्षीणतम हो जानेसे वह पुरुष शान्तरजस होते हैं; तत्पश्चात् ब्रह्मभूत वा जीवन्मुक्त होते हैं, तब और उनमें भेदज्ञान रूप दोष नहीं रहता। इस कारण करके उत्तम सुख जो ब्रह्मानन्द-जो वाणीसे प्रकाश हो नहीं सकता,-जिसके सादृश्य नहीं,-जो एकमात्र बुद्धिग्राह्य ---नित्य-अतीन्द्रिय है, वह निरतिशय सुख उनमें आपही आप उपस्थित होता है ॥२७॥
युञ्जन्नेव सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥ . अन्वयः। एवं (अनेन प्रकारेण ) सदा ( सर्वदा ) आत्मानं ( मनः ) युञ्जन् ( वशीकुर्वन् ) योगो विगतकल्मषः (विध तपापः सन् ) ब्रह्मसंस्पर्श अत्यन्तं (सर्वोत्तम) सुखं अश्नुते (भुत ) ॥ २८ ॥