________________ 384 श्रीमद्भगवद्गीता और निर्मलता “मैं” में है। एक बार निर्मलतामें लक्ष्य, फिर मलिनतामें आना, फिर निर्मलतामें लक्ष्य, फिर मलिनतामें आना-यह जो ऊंचे नीचे करना अब आकर खड़ा हुआ, इसीको ही नमस्कार कहते हैं। यह गुरु वाक्यमें अटल विश्वासका पल है। इस गुरु वाक्यमें अटल विश्वासका नाम 'भक्ति' है। इस प्रकार जाना आना करते करते प्रकृतिकी अनित्यता "मैं" के संयोगसे घटती रहती है। "मैं" नित्य हूँ, प्रकृति क्रम अनुसार “मैं” में युक्त होकर मेरे सेवामें मिल जाती है, जैसे स्फटिकमें निकटस्थ जवाफूळ (अढ़ौल) के लाल रंगका संक्रमण है। जवाफूल पृथक है स्फटिक भी पृथक् है। स्फटिक अत्यन्त स्वच्छ है, जवाफूलके रंगको अपनेमें धरकर जैसे जवाफे रंगमें रंगीला हो जाता है, प्रकृतिकी 'मैं' --उपासना भी तद्र प है // 14 // ज्ञानयज्ञेन चाप्य ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् // 15 / / अन्वयः। अन्ये अपि च विश्वतोमुखं ( सर्वात्मक) मां ज्ञानयज्ञेन एकत्वेन ( अभेदभावेन ) पृथक्त्वेन (पृथक्भावेन ) बहुधा ( बहुभावेन ) यजन्तः ( पूजयन्तः सन्तः ) उपासते // 15 // अनुवाद। दूसरे लोग भी सर्वात्मक मुझको ज्ञान यज्ञसे ( एकव्व ) अभेद भावसे, ( पृथकत्व ) पृथक भावसे, और ( बहुधा ) बहु भाषसे पूजा करके उपासना करते हैं // 15 // व्याख्या। एकको और एकमें आहुति देनेका नाम यज्ञ है-जैसे विल्वपत्रमें घी लगाकर अग्निमें फेंककर हवन करना। तैसे साधनाके शेषमें जैसे जैसे निजबोधरूप ज्ञानका प्रकाश होता रहता है, वैसे वैसे उस ज्ञानाग्निमें अज्ञानता श्रापही पाप आहुतिकी सदृश पड़ करके जलकर चिर दिनके लिये भस्म हो जाता है, और स्वरूप में स्थिति भी हो जाती है। यह ज्ञानयज्ञ हुआ; यह उदार है। इसमें समझाय