________________ 364 श्रीमद्भगद्गीता विपद है। 'मैं' में चिरन्तनत्व चिर विद्यमान कह करके, इस जगतका विपदसे परित्राण कर्ता भी 'मैं हूँ। 'सुहृत्'-इस जगतसे किसी प्रत्युपकारका प्रयोजन मेरा नहीं है, अथच सर्वदा मैं जगतका कल्याण करता हूँ। इसलिये मैं जगतका सुहृत् हूं, अर्थात् जीवरूपसे नाचता हुआ मैं जगतका अस्तित्व सम्पादन कर रहा हूँ। अर्थात् 'मैं' जगतके मतामें मत मिला रहा हूँ'सदैकानुमतः सुहृत' जीते रहनेके नाम कल्याण है और मृत्युके नाम अकल्याण है। प्रभव'-महामाया हमको जगतरूपसे प्रसव करती है कह करके, और मैं जगतरूपसे उत्पन्न होता हूँ इस करके प्रभव भी 'मैं' हूँ। 'प्रलय'-यह विश्व ब्रह्माण्ड जगत कल्पान्त होनेसे हमही में विश्राम करता है, इस करके "मैं" ही प्रलय हूँ। 'स्थान'--शब्दमें आधार है। यह जगत् हमहीमें भासमान है। इस हेतु करके 'मैं' ही स्थान हूँ। ____ निधान'-अर्थमें सर्व कार्यके परिसमाप्तिमें जहां जाना होता है। इस जगतका कार्य शेष होनेसे एकमात्र 'मैं' ही 'मैं' रहता हूँ। 'वीज'-जिससे इस जगतकी उत्पत्ति होती है। वह भी 'मैं हूँ। और संच्चे 'मैं' को लिंग-संख्या-कारक देकर कोई नहीं समझा सकता है इसलिये 'मैं' 'अव्यय' अर्थात् विकार-विहीन हूँ // 18 // तपाम्यहमहं वर्ष निगृहाम्युतसुजामि च / अमृतञ्चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन // 16 // अन्वयः / हे अर्जुन ! अहं तपामि, अहं वर्षे उन्मुजामि निगृह्णामि च; अमृतं च मृत्युः च, सत् असत् च, अहं एव // 19 // अनुवाद / हे अर्जुन! मैं ही ताप प्रदान करता हूँ ; मैं ही वृष्टि धारा उत्पन्न फरता हूँ फिर आकर्षण करता हूं; मैं ही अमृत, मृत्यु, सत् और असत् हूँ // 19 //