________________ नवम अध्याय 366 व्याख्या। चित्तका धर्म चिन्ता है; वह चित्त जब “मैं” बिना और किसीका चिन्ता न करे, अनन्य होकर “मैं” का चिन्ता तबही होता है। इस प्रकारसे जो साधक "मैं" के ऊपर गिरकर, संसारको भूलकर स्थिर रहे, वह नित्यमें ( “मैं” में ) अभियुक्त (अभि =निर्भय, युक्त = मिलकर एक हो जाना; जैसे कलमी पेड़ ) होता है अर्थात् 'मैं' में युक्त होकर निर्भय हो जाता है, कारण 'मैं' में परिणाम नहीं है; किन्तु साधकका संसार अवस्थामें केवलही परिणमनता है। इसलिये, हममें स्थिर रहनेसे साधकका वह परिणमनता त्याग हो जाकर अपरिणामित्व प्राप्ति होता है;-भय केवल मरनेका है, वह मिट जाता है। इस प्रकार बराबर रहनेसे, भगवान् स्वयं साधकका योग और क्षेम बहन करते हैं। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति योग है। अब “मत्संस्था शान्ति” ही साधकके पानेकी वस्तु है; इससे बढ़के पानेकी वस्तु और कुछ नहीं है (६ष्ठ अः १५वां और २२वां श्लोककी व्याख्या देसो)। अतएव मत्संस्था शान्ति ही योग है। अनन्य होकर "मां" चिन्ता कर सकनेसे और साधकका कोई भावना नहीं रहता, वह मत्संस्था शान्ति (आत्मभावावस्था ) पानेके लिये चेष्टा भी नहीं करने होता, और प्राप्त हो जानेसे उसकी रक्षा करनेका भी चेष्टा नहीं करने होता। क्योंकि, तब साधक भाग्यवान होते हैं, इसलिये भगवान् साधकका बोझ ढोवते हैं // 22 // येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूकम् // 23 // अन्वयः। हे कौन्तेय ! ये आप भक्ताः श्रद्धयान्विताः ( सन्तः ) अन्य देवताः यजन्ते, ते अपि मा एव अविधिपूर्वकम् यजन्ति // 23 // अनुवाद। हे कौन्तेय! जो लोग भक्त तथा श्रद्धायुक्त हो करके दूसरे दूसरे देवोंको भी भजते रहते हैं, वह लोग मुझकोहो आवधि पूर्वक भजते रहते है।॥ 23 //