________________ 400 श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्या : भक्ति और श्रद्धाकी आलवाल दे करके “मैं” से अलग करके और एक देवताका भजन करते जानेसे वह देवता भी “मैं" (मुझ ) को छोड़कर कभी अलग हो नहीं सकता; क्योंकि, साधक जब जिस देवताका भजन करेंगे, तब उनका अन्तःकरण उसी देवताके आकारमें मिल जा करके उसी देवताका रूप धारण करेगा; यह विश्वकोष मेरे गर्भ में ही है, और वह देवता भी विश्वातिरिक्त न होनेके कारण तब "मैं" हो जाता है। दूसरे देवताका उपासना करके भी साधक तब मेरा हो उपासना करते हैं; परन्तु भेदज्ञानसे मोहित हो करके अज्ञानताके लिये साधक उस देवताको “मैं” (हम) से पृथक भावसे भजन करते हैं और मनमें सोचते हैं कि वही देवता उनकी कल्याण करेंगे, यह जो भ्रम, वही अविधि है। [इस अविधिके लिये पुनरागमन (पुनर्जन्म ) हाता है; परश्लोक देखो ] // 23 // अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च / न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते // 24 // अन्वयः। हि ( यतः) अहं सर्वयज्ञानां भोका च प्रभुः एव च; तु ( किन्तु ) ते मां तत्त्वेन ( यथावत् ) न अभिजानन्ति, अतः च्यवन्ति (पुनरावर्तन्ते) / / 24 // अनुवाद। क्योंकि, सर्वयज्ञका भोक्ता भी मैं हूँ, प्रभु भी मैं हूँ, परन्तु वे लोग यथार्थ रूपसे मुझको जान नहीं सक्ते, इस कारण करके पुनरावृत्तिको प्राप्त होते हैं // 24 // __ व्याख्या। अग्निमें साकल्यकी आहुतिका नाम यज्ञ है। यह श्रुति-उक्त तथा स्मृति-उक्त विधान है। श्रुति असरीरी वाणीको कहते हैं; कौन कहा तिसका ठौर ठिकाना नहीं है, परन्तु मुझको सुनने में आया, और मैं समझा। और स्मृति पुराकृत (पहले किया हुआ) कार्यके स्मरणको कहते हैं। इन दोनोंके बीच में मैं हूँ। मैं जब सर्वस्वरूप संसाररूप अज्ञानताको 'मैं' में आहुति देनेके लिये जाता हूँ, तब