Book Title: Pranav Gita Part 01
Author(s): Gyanendranath Mukhopadhyaya
Publisher: Ramendranath Mukhopadhyaya

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Page 448
________________ नवम अध्याय 406 दूसरा कुछ प्रहण नहीं करता, इसलिये यह अवस्था शाश्वत शान्तिका निवास भूमि है। भक्त होनेसे-अनन्यभाक होनेसे इस शाश्वत शान्तिकी निवास-भूमिमें जाना ही पड़ता है, विनाशको प्राप्त होता नहीं, अर्थात् विषयासक्तिमें मोहित होकर बारंबार जन्म-मरण भोग नहीं करने पड़ता। साधक ! अब तुम श्रामा चक्रमें उठ करके उपासनासे प्रत्यक्ष ज्ञान में ज्ञान विज्ञानका आकर्षण करनेमें समर्थ हो करके "कौन्तेय" पदवाच्य हुए हो; अब तुम प्रतिज्ञा करके यह बात (प्रति+ ज्ञ=जाननेका वस्तु "मैं" + आ-आसक्ति) अर्थात् जाननेका वस्तु जो "मैं", उसी "मैं” के प्रति श्रासक्ति देकरके “मैं” के भाव अनुभव करके कह सकते हो कि, 'मैं' का भक्त होनेसे और विनाशको नहीं प्राप्त होता // 31 // मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। लियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् // 32 // अन्वयः। हि (यस्मात् ) पापयोनयः (पापजन्मान:) स्त्रियः वश्याः तथा शूद्राः ये अपि मां (परमात्मानं ) व्यपाश्रित्य ( आश्रयत्वेन गृहीत्वा, संसेन्य इत्यर्थः ) स्युः (भवेयुः ), ते अपि परमां गतिं यान्ति // 32 // ___ अनुवाद। पापजन्मा स्त्री, वश्य, और शूद्र जो कोई मुझको विशेष प्रकारसे आश्रय करके रहते हैं, वे लोगही परमागतिको प्राप्त होते है / 32 // व्याख्या। हे विषयासक्त सापक ! यदि तुम उस ऊपरवाले "मैं" को निश्चय रूपसे आश्रय कर रह सको, तो तुम्हारा स्त्रीभाव (अन्तःकरणमें जब अष्ट गुण कामरस-भोगलालसा बढ़ता है, वहीं अवस्था), तुम्हारा वैश्यभाव ( क्रिया करके क्रियामें प्राप्त जो अलौकिक विभूति है, उसे दिखलानेके लिये-लोगोंके पास बड़े होनेके लिये अन्तःकरण की जो आतुरता है वही ), और तुम्हारा शूद्रभाव (श-श्वास+= स्थिति+द-योनि+रं-प्रकाश अर्थात् जिस अवस्था में, प्रकि

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