________________
सप्तम अध्याय
३३५
उन सब मूर्तियों को साधारण जीवके न्याय समझते हैं । इसलिये उसको एकभावमें लेकर आदर-सत्कार न करके, विविध मूर्त्तिमें देवत की आराधना करते हैं; वह सब देवता भी जो उसी प्रभुके स्वरूप हैं उसे वह लोग अभेद भावसे ग्रहण नहीं कर सकते । अतएव श्रपातरमणीय भोगमें मोहित होकर के अन्तवत् फल प्राप्त होते हैं, अनन्त फल नहीं पाते ।। २४ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५ ॥
अन्वयः । अहं सर्वस्य ( लोकस्य ) प्रकाशः न ( भवामीत्यर्थः ) यतः योगमायासमात्रतः ( योगः गुणानां युक्तिर्घटनं सैव माया, तया समावृतः संछन्नः ) ( अतएव ) मूढ़: अयं लोकः अजं अव्ययं मां न अभिजानाति ) ।। २५ ।।
अनुवाद | मैं सबके पास प्रकाशित नहीं हूँ; कारण कि यह जगत्, योगमाया द्वारा सम्यक् आवृत होकर मूढ़ता प्राप्त होनेसे, अज और अव्यय मुझको जान नहीं सकते ।। २५ ।।
व्याख्या | योगमायाका आवरण रहनेसे ही बुद्धिहीन मनुष्य "मैं" के परम भावको नहीं जान सकते। योगमाया अर्थ में वासना है । भगवान्का जिस अचिन्त्य प्रज्ञाविलास द्वारा अघटन घटन होता है, उसीको ही योगमाया कहते हैं । यह भागवतीय अनिच्छाकी इच्छा वा लालसारूपा महाशक्ति है, जो जीव भावके अनुभवमें नहीं आता । यह शक्ति त्रिगुणके संयोगसे ही उत्पन्न हुई है इसीलिये इसका नाम योगमाया है । यह इच्छाही जगत् को छाय (घेर) रक्खी है। यह सूर्य और पृथिवीकी मध्यस्थ मेघावरणके सदृश परमात्मा और जीवके मध्यभागमें वर्त्तमान रह करके परमात्माको
* या सा नाहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपातिलालसा ।
व्योमसंज्ञा पराकाष्टा सैषा हैमवती सती ।। २५ ॥