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अष्टम अध्याय
३४६ खाद्य नली। खाद्य पानीय आदि जो सब द्रव्य मुख द्वारा शरीरके भीतर दिया जाता है, उसे वह ढेंकी-यन्त्र वायु नलीको बन्द करके जल
और खाद्य जानेवाले नलमें प्रेरण करता है वा चलाय देता है, और जब केवल निश्वास प्रश्वास प्रवाहित होता है, तब वह ढेकी यन्त्र जल
और खाद्य नलका मुख बन्द करके वायुके नलमें वायुको चला देता है। वह वायु बरोबर नीचे मेरुदण्ड-संलग्न सुषुम्नाके ठीक मुखमें पहुंच कर सुषुम्नाके भीतर प्रवेश कर मूलाधार भेद करके, बज्राके भीतर प्रवेश करके, मणिपुर भेद करके, क्रम अनुसार अनाहत-विशुद्धआज्ञा भेद करके सहस्रारके मूल त्रिकोणमें पहुंचता है; पुनः ठीक उसी रास्तामें घुम आकर बहिराकाशमें विश्राम लेता है। यह जो वायुकी गति-ग्रहण और त्याग है, (गुरूपदिष्ठ क्रियाके द्वारा बुद्धि जब यह आकर्षण और विकर्षण यथारीति सम्पादन करती है, उसी अवस्थाको ‘अधियज्ञ' कहते हैं। इस शरीरके भीतर "अहं" ही यह अधियज्ञ है।
'अहं' शब्दमें आत्मा है; और 'अत्र'-(अं ब्रह्मणे स्थूल शरीराय, रजो गुणाय, संकल्प-विकल्पात्मक-मनोधर्मरूप-सृष्टिक्रियाय ) अर्थात् 'अ' शब्दके अर्थमें सृष्टिकर्ता ब्रह्माको समझाता है; स्थूल शरीर जाग्रतावस्था, रजोगुण, संकल्प-विकल्पात्मक मन न होनेसे ब्रह्मा बना जाता नहीं; अतएव यह सब वर्तमान रहते हैं। और 'त्र'-(तृ= तारणे) अर्यात् उन अवस्थाओंका त्राण वा विश्राम जहां होता है। (गुरूपदिष्ट क्रिया करनेवाले साधक लोग इस अवस्थाको जानते हैं
और इस जगहको भी जानते हैं)। अत एव हे देहभृतांवर= देहीश्रेष्ठ ! जो कुछ तुम प्रश्न किये थे, वह सब तुम्हारे इस देह के भीतर है, देख लो, प्रत्यक्ष का प्रमाण आयश्यक नहीं होता ॥३॥४॥ .