Book Title: Pranav Gita Part 01
Author(s): Gyanendranath Mukhopadhyaya
Publisher: Ramendranath Mukhopadhyaya

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Page 418
________________ नवम अध्याय 376 व्याख्या। जैसे दर्पणमें मुख है, और गोष्पद के जलमें आकाश है, वैसे ही चित्तमें प्रतिविम्बित "मैं” हूं। इस "मैं" में बहु मैंको सृष्टि कर लेता हूँ। जैसे सहस्र पलवाले कांचके दुरबीनमें अांख लगाकर देखनेसे एक वस्तुको सहस्र देखा जाता है, तैसे मैं अपने मायाको विस्तार करके एक मैंको अनन्त प्रकार व अनन्त श्राकारसे सृष्टि कर चुका हूँ। कांचके दुरबीनको घुमानेसे जैसे वह एक वस्तु बदलते बदलते और प्रत्येक पलमें नये नये आकार धरते धरते अन्तमें पूर्वसदृश ठीक आकारमें देखा जाता है, तिसमें वह वस्तु जसे जड़ तैसे ही ठीक एक स्थानमें रहता है, हिलता डोलता नहीं, अथच दुरबीनकी टेढ़ी-सीधी फिराईमें भ्रममय बहुतेरे आकारका दृश्य दिखला देता है। वैसेही मेरे मायाकी चक्करवाले खेलके गुणसे बारंबार मेरा जन्म, बारंबार मेरा संक्षय सरीखे भ्रम दिखला देता है। यह भी उसी कांचके वशीभूत दृश्यके सदृश मायाके वशमें भूतोंके प्राम अर्थात् शरीर-समूह इन्द्रजालकी क्रियाका दृश्य है। इसका एक भी सत्य नहीं है॥८॥ न च मा तानि कानि निबध्नन्ति धनब्जय। उदासीन वदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु // 6 // अन्वयः। हे धनञ्जय / तेषु कर्मसु असक्त उदासीनवत् आसीनं मा तानि कर्माणि न च निवघ्नन्ति // 9 // अनुवाद। हे धनञ्जय ! मैं उन सब कर्म में अनासक्त तथा उदासीन सदृश अवस्थित हूँ, इसलिये वह कर्म समूह मुझको आबद्ध नहीं कर सकता // 9 // व्याख्या। कर्म (गुरूपदिष्ट मार्ग में प्राण चालन) जबतक किया जा सके, तबतक ही रजोगुणकी क्रिया है। जैसे जैसे रजोगुणकी क्रियाका अवसान होता रहे, तैसे तैसे सत्त्वगुणका प्रकाश आरम्भ भी होता रहे। इस सत्वगुणका प्रकाश जबतक होता रहे, तबतक रजो

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