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श्रीमद्भगवद्गीता अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशकः ॥ ५॥ अन्वयः। अन्तकाले च मां एव स्मरन् कलेवरं मुक्त्वा यः प्रयाति, सः मद्भाव याति, अत्र संशयः न अस्ति ॥ ५ ॥
अनुवाद । अन्तकालमें जो मुझको स्मरण करते करते देह त्याग करे वह हमारे भावकोही प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं ॥ ५॥
व्याख्या। 8-१० श्लोकही अर्जुनके सप्तम प्रश्नका उत्तर है; अर्थात जिस उपायसे भगवान् प्रयाणकालमें ज्ञेय होते हैं वह उन दो श्लोकमेंही कहा हुआ है। परन्तु वह उपाय अभ्यास-सापेक्ष है। इसलिये भगवान्ने ५-८ श्लोकमें मृत्युकालके मानसिक अवस्थाका फल कह करके अभ्यास-प्रकरण कहा है। ५म श्लोकमें कहा है, अन्तकाल में मुझको स्मरण करके शरीर त्याग करनेसे, मद्भावको प्राप्त होता है; इसका कारण स्वरूप ईष्ठ श्लोकमें कहा है-जिस हेतु शरीर त्याग करनेके समय जो भाव स्मरण होता है, वही भाव प्राप्त होता है । इसीलिये ७म श्लोकमें सर्वकालमें 'मामनुस्मरन' और युद्ध (प्राणायामादि ) करनेको कहा है। तत्पश्चात् ८म श्लोकमें कहा है-इस प्रकारके अभ्यासयोगसे चित्त जब अनन्यगामी होता है, तब ही परमपुरुष प्राप्त होता है। यह सब बचन पूर्व सूचना स्वरूप कह करके, पश्चात हम-१०म श्लोकमें भगवान प्रयाणकालमें कौन उपाय और किस प्रकारसे ज्ञेय होते हैं कह कहा। इन श्लोकोंको क्रमान्वय पढ़नेसे सब समझमें आ जायगा।] ४. अब देख लो, उस अक्षर ब्रह्मसे लेकर इस अधियज्ञ पर्य्यन्त सब कुछ मेरे ही आश्रय करके रहता है, इसलिये मैं वासुदेव हूँ ( जिसके शरीरमें सब कुछ वास करे, जो सबका आश्रय है, इस जगत्के समस्त जीव जिनके शरीरका अङ्ग-प्रत्यङ्ग है, अथच जो शरीर वा शरीरी नहीं