________________ श्रीमद्भगवद्गीता अनन्यचेताः सततं यो मा स्मरति नित्यशः। तग्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः // 14 // अन्वयः। हे पार्थ! अनन्यचेताः ( सन् ) यः नित्यशः (प्रतिदिनं ) सततं (निरन्तरं ) मा स्मरति, नित्ययुक्तस्य तस्य योगिनः अहं सुलभः // 14 / / अनुवाद। हे पार्थ! अनन्यचित्त होकर चिरदिन निरन्तर जो मुझको स्मरण करता है, उसी नित्ययुक्त योगीके पक्षमें मैं सुलभ हूँ // 14 // व्याख्या। योग-अभ्यास कालमें जो कदापि चैतन्यको छोड़कर जरासा भी इधर उधर न होता हो, उसीसे ही 'मैं' का स्मरण होता है। मैं भी जैसे अनन्त हूँ, वह भी तैसे अनन्त हो जाता है। वही योगी है; उसीका ही “मैं” सुलभ है, ऐसे जो नित्य "मैं" वह इस "मैं" में युक्त होकर नित्ययुक्त हो जाता है। साधक ! अब तुम समझ कर देखो, तुम्हारे क्रियाके पूर्वावस्था, क्रियावस्था, क्रियाका परावस्था, और क्रियाका परावस्थाका परावस्था, सब इस श्लोकमें कहे हुए हैं // 14 // मामुपेत्य पनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् / नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः // 15 // अन्वयः। महात्मानः माम् उपेत्य (प्राप्य ) परमा संसिद्धिं ( मोक्ष ) गताः (प्राप्ताः सन्तः ) दुःखालयं अशाश्वतं जन्म पुनः न आप्नुवन्ति // 15 // अनुवाद। महात्मागण मुझको प्राप्त होकर, परमासिद्धि ( मोक्ष ) को प्राप्त होनेसे, पुनः-दुखके आलय स्वरूप अनित्य जन्मको नहीं प्राप्त होते // 15 // व्याख्या। जो सब साधक योगानुष्ठानसे अन्तःकरणको परमात्मामें मिलाने सीखे हैं, वही सब साधक महात्मा हैं; वे लोग ही "परमासिद्धि”-नैष्कर्म्यावस्थाको प्राप्त हो करके “मैं” को पाते हैं, अर्थात् आत्मस्वरूप लाभ करते हैं। सुतरां उनलोगोंको और पुनः दुःखका आलय स्वरूप अनित्य जन्म लेने नहीं होता ; अर्थात् वह