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श्रीमद्भगवद्गीता सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ।। १२ ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देह स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
अन्वयः। यः सर्वद्वाराणि संयम्य मनः च हृदि निरुध्य आत्मनः प्राणं मूनि आधाय योगधारणां आस्थितः ( सन् ) ॐ इति एकाक्षरं ब्रह्म व्यहारन् ( उच्चारयन् ) मां अनुस्मरन् देहं त्यजन् प्रयाति, सः परमां गतिं याति ॥ १२ ॥ १३ ॥
अनुवाद। जो समुदय इन्द्रियद्वार संयत कर मनको हृदय में निरुद्ध करके थोगधारणा अवलम्बन कर निज प्राणको मस्तकमें स्थापन करके, "ऊँ" इस एकाक्षर ब्रह्ममन्त्रका उच्चारण करते करते तथा मुझको स्मरण करते करते देह त्याग कर जाता है, वह परमागतिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ १३ ॥
व्याख्या। जब साधक मुमुक्षु होकर आत्मामें आत्मा योग करने जाय, तब उनको शरीरका नवद्वार संयत करना पड़ता है।
आसन मारकर बैठनेके समय दोनों पगके एड़ियों द्वारा गुह्य और लिंगको निपीड़ित करना होता है, दोनों हाथ के अंगूठेसे दोनों कान को, तर्जनी द्वयसे दोनों चक्षुको, अनामिकाद्वयसे दोनों ओष्ठको, मध्यमाद्वयसे नासारन्ध्र दोनोंको हद अाक्रमण करने पड़ता है ; ऐसा होनेसे ही सर्वद्वार संयम करना होता है (क्रिया गुरूपदेशगम्य है )। इस अवस्थामें मन प्राणके साथ हृदयमें अटक पड़ता है ; सुतरां अपने उत्पत्तिस्थान बुद्धिको लक्ष्य कर भ्रमध्यमें उठ बैठता है, प्राण भी चलच्छक्तिरहित हो जाता है। इस प्रकारसे सर्वद्वारका संयम करके 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्म अर्थात् प्रणवको अवलम्बन करने होगा। (प्रणव-प्र+णक्+वं ; प्रशब्दमें प्रकृष्ट पूर्वक, णक् शब्दमें आत्मा,
और वं शब्दमें शून्य है ; अर्थात् प्रकृष्ट पूर्वक देहात्माभिमान जिससे शुन्य हो जाता है उसीका नाम प्रणव है )। तत्पश्चात् इस एकाक्षर