________________ 375 नवम अध्याय मया ततमिदं सर्व जगदव्यक्तमूत्तिना / मतस्थानि सर्वभूतानि न चाहे तेष्ववस्थितः // 4 // अन्वयः। मया अव्यक्तमूत्तिना ( करणागोचरस्वरूपेण ) इदं सर्वं जगत् ततम् ( व्याप्त), सर्वभूतानि मतस्थानि, अहं च तेषु न अवस्थितः // 4 // अनुवाद / मैं अव्यक्तरूप करके इस समस्त जगत्में व्यापनशील हो रहा हूं, सकल भूत हमही में अवस्थित है, परन्तु मैं उन सबमें अवस्थित नहीं हूँ // 4 // व्याख्या। वह जो मैं ब्राह्मीस्थितिसे जगत्के ऊपर लक्ष्य कर रहा हूं, यह ठीक जैसे सूर्य और पृथिवी है;-पृथिवी अप्रकाश है, और सूर्य स्वप्रकाश, यह दोनों ही अलग और परस्परसे अनेक दूरमें हैं। परन्तु सूर्यको किरण पृथिवीमें पड़ करके जिस जिसमें जितना अधिक मेलजोल करती है, उसीके जेसे तितना अधिक प्रकाश होता है, अथच मेलजोल हो करके भी परस्पर लिप्त नहीं होते; तैसे मैं परिणामी प्रकृति के भूतादियोंके साथ श्रोतःप्रोत भावमें मिल करके भी नहीं मिलता; इसलिये हममें भूतादि रह करके भी “मैं” के ऊपर वह सब लक्ष्य नहीं करते इस करके "मैं" नहीं हो सकते। 'मैं' जो ऐसा व्यक्त हूँ, मेरी न्योति लेकरके ही वह अव्यक्त वा अप्रकाश परिणामी लोग अपना अपना जो कुछ जड़त्व है उसे त्याग करके जैसे चैतन्य सरीखे अभिनय दिखा देते हैं, जैसे वह सब अव्यक्त वा जड़ नहीं, व्यक्त चैतन्य है। परन्तु 'मैं' बिना जो कुछ है, वह समस्त अप्रकाशअव्यक्त है // 4 // न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् / भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः // 2 // अन्वयः। में ऐश्वरं योगं (अपाधारणं माहात्म्यं ) पश्य,-भूतानि न च मत्स्थानि मम आत्मा ( अहं ) भूतमृत भूतभावनः ( सन्नपि ) न च भूतस्थः // 5 //