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श्रीमद्भगवद्गीता श्रीकृष्णरूप परं अक्षर ब्रह्ममें चित्त विनिवेश करके, ४० से ४४ वां पर्य्यन्त श्लोकमें योगभ्रष्टकी गति निरूपण करते हैं ॥ ३ ॥
श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।।
न हि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गति तात गच्छति ।। ४०॥ अन्वयः। श्रीभगवान् उवाच। हे पाथं । न एष इह (इहलोके ) न अमुत्र. (परलोके ) तस्य ( थोगभ्रष्टस्य ) विनाशः विद्यते ( नाशो नाम पूर्वस्मात् होनजन्म प्राप्ति: न अस्तीत्यर्थः ); हि ( यस्मात् कारणात् ) हे तात ! कल्याणकृत् (शुभानुष्ठाता) कश्चित् ( जनः ) दुर्गतिं न गच्छति । ४० ॥
अनुवाद। श्रीभगवान् कहते हैं । हे पार्थ! क्या परलोकमें और क्या इहलोक में उनका विनाश नहीं है; क्योंकि हे ताल ! कल्याणकृत् कोई कभी दुर्गतिको प्राप्त नहीं होते ॥ ४०॥
व्याख्या। यदि योगी अयति हो परन्तु आस्तिक्य बुद्धियुक्त रहे, . किम्बा यदि योगभ्रष्ट ही हो, तो भी उनका और विनाश नहीं, इहलोकमें तो है ही नहीं, परलोकमें भी नहीं; क्योंकि, जो कल्याणकमके अनुष्ठान करते हैं अर्थात् आत्मप्रतिष्ठा वा ब्राह्मीस्थिति लाम के लिये चित्तशुद्धिकी उपायभूत क्रियानुष्ठान करते हैं; उनको और दुर्गति प्राप्त नहीं होती।
इहलोकमें विनाश नहीं है, उसका कारण यह है कि, एकदफे अखण्डमण्डलाकार गुरुपद दर्शन होनेके पश्चात् आस्तिक्य-बुद्धिका उदय होनेसे, आत्म-विस्मरण नहीं होता; इसलिये क्रियायोगमें यत्नशील न रहनेसे भी गुरुपद दर्शन-जनित सत्-संस्कार-शक्ति करके किसी प्रकार बुरे कर्ममें मति गति नहीं होती। परलोकमें भी विनाश नहीं है, इसका कारण यह कि उस सत-संस्कार-शक्तिसे हीन जन्मकी प्राप्ति नहीं होती। (परवत्ती दो श्लोक देखो)।