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श्रीमद्भगवङ्गीता
है कि, उनको बाध्य करके योगमें प्रवृत्त करता है। योगजं संस्कार कुछ कालके लिये दूसरे संस्कार से अभिभूत हो सकता है, परन्तु यह न सबको क्षय करके आपही अपनी क्रियाको प्रकाश करता है; योगज संस्कार विनष्ट नहीं होता । यह साधारण नियम है। किन्तु जो "योगात् चलितमानसः” अर्थात् द्वितीय प्रकारका योगभ्रष्ट है, उनको और किसी दूसरे संस्कार के उदयमें अवश होना नहीं होता; वह भ्रष्ट योगी जब पूर्वयोग-संस्कार द्वारा हित अर्थात् आकृष्ट होकर योग जिज्ञासु होते हैं अर्थात् योगका स्वरूप जानने के लिये योग में प्रवृत्त होते हैं; तत्क्षणात् बिना प्रयाससे ही पूर्व अभ्यास- गुण करके शब्दब्रह्म वा वेदको अतिक्रम करते हैं अर्थात् एकदम नादके अन्तर्गत ज्योतिके भीतर मनको विलीन करके विष्णुके परम पदमें स्थित होते हैं। अनाहतध्वनि वा प्रणव- नाद ही आदि है; उसीसे ही कर्म्मका क्रम विकाश कर के सहस्रारादि सात चक्र में अथर्व, खाम, यजु और ऋक्की उत्पत्ति है, (द्वितीय अध्याय ४५ वां श्लोककी व्याख्या देखो ) इसलिये इन सबको ही शब्दब्रह्म * कहते हैं ॥ ४४ ॥
प्रयत्नाद् यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥
अन्वयः । तु ( वस्तुतः ) योगी प्रयस्नात् यतमानः ( पूर्वप्रयत्नाद् उत्तरोत्तरं अधिकं यत्नं कुर्वन् ) संशुद्धकिल्विषः ( विधूतपाप: ) अनेकजन्मसंसिद्ध: ( अनेकेषु जन्मसु उपचितेन योगेन सम्यक ज्ञानो भूत्वा ) ततः (पश्चात् ) परां गतिं याति ( प्राप्नोति ) ॥ ४५ ॥
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* ऋगादि चतुर्वेद जब मूलाधारादि सप्त स्वर्ग में क्रियाका विकाश करते हैं, तब ही शरीर की उत्पत्ति होता है | शरीरको काय्यं ब्रह्म कहते हैं काय्यं ब्रह्म कर्म है, शब्दब्रह्म-ज्ञान है ॥ ४४ ॥
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