________________
३०२
श्रीमद्भगवद्गीता हैं, अपने कर्मफलसे उन सब लोकमें कुछ काल वास करके अविच्छिन्न भावसे सुख भोग करते हैं; पश्चात् भोग क्षय होनेसे कर्मभूमि मर्त्यलोकमें प्रवेश करते हैं; अर्थात् पुनराय जन्म ग्रहण करते हैं। यह जन्म, उन लोगोंकी विषय भोग-वासनाके पूरण होनेके लिये जैसे लक्ष्मीमन्तके घर में होता है, तैसे उन लोगोंकी आध्यात्मिक उन्नति के लिये उस लक्ष्मीमन्तके घर शुची अर्थात् सदाचार सम्पन्न होता है । जिस संसार ( घर ) में उदार भावका भगवत् प्रेम वर्तमान है, वही संसार शुची है ॥ ४१ ॥
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः। अथवा धीमता (व्यवसायात्मिकाबुद्धिमतां ) योगिनां ( योगनिष्ठानां ) एव कुले भवति (जायते), जन्म यत् ईदृशं एतत् हि लोके दुर्लभतरं ॥४२॥ ___ अनुवाद। अथवा वो भ्रष्ट योगी धोमान् योगियों के कुल में जन्म ग्रहण करते हैं। ऐसे जो जन्म हैं, इस जगत्में वही दुर्लभ है ॥ ४२ ॥
व्याख्या। द्वितीय प्रकारका भ्रष्टयोगी श्रेष्ठ है। व्यवसात्मिका बुद्धियुक्त योगीके घरमें वह जन्म ग्रहण करता है; इह जगतमें इस प्रकारका जन्म बड़ा दुर्लभ है-अति सौभाग्यका फल है। इस प्रकार जन्मप्राप्ति होनेसे जीव जैसे जन्म-सिद्ध शक्ति प्राप्त होता है, क्योंकि, कुलाचार प्रथा करके बिना प्रयाससे ही उनकी भगवत् प्राप्तिका दरवाजा खुल जाता है । (४४ वा श्लोक देखो)॥ ४२ ॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिएम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥ अन्वयः। ( सः ) तत्र ( शुचीनां श्रीमता गेहे धीमतां योगीनो कुले वा जातः -सन् ) पौवदेहिक ( पूर्वदेहभव ) तं बुद्धिसंयोग ( ब्रह्मविषयया बुध्या संयोग ) लभते;