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३१६ .. श्रीमद्भगवद्गीता - व्याख्या। परमेश्वर “एकमेवाद्वितीयम्”–अर्थात् वह एक ही एक, दो नहीं। उनके शक्तिका नाम माया है। उनकी वह माया जब उनमें लीन रहती है अर्थात् विकाशको प्राप्त नहीं होती, तब वह ब्रह्म, और जब मायाका विकाश होता है, तबही वह परमेश्वर बनते हैं। उनकी यह माया त्रिगुणमयी है। यह माया विकाश प्राप्त होते मात्र ही दो रूप धारण करती है-एक रूपसे चैतन्यरूपिणी, और एक रूपसे जड़रूपिणी है। पश्चात् तीन गुगके विकारमें जड़-चैतन्यके घात-प्रतिघात करके उत्थान-स्थिति-पतन यह तीन क्रिया चलते रहते हैं। उन तीन क्रियाओंसे ही जगतका सृष्टि-स्थिति-लय होता है। जगतके साथ ही साथ जीवका भी सृष्टि-स्थिति-लय प्रारम्भ होता है। अब परमेश्वर एक होनेसे भी जगत के सृष्टिमें उनको दो भावसे देखा जाता है; वस्तुतः ऐसा नहीं, वह तो मायाका भ्रम है। जैसे जल अपना कारण तेज सहयोगसे कठिन, तरल और वाष्प्य श्राकार धारण करके तीन होता है, वस्तुतः तीन-तीन नहीं, एकही एक है, केवल अवस्था भेद मात्र; तैसे माया, निज कारण परमेश्वरके सहयोग से नाना तत्त्रमें परिणता होती है। पुनः जल जैसे तेजसे उत्पन्न होने के लिये तेज बिना और कुछ नहीं, केवल तेजका रूपान्तर मात्र वैसे माया भी ब्रह्म बिना दूसरा कुछ नहीं है। इसीलिये, एक रसतत्त्वमें ही कठिन. तरल, वाष्प्य ये तीन रूप सदृश, एक ब्रह्ममें हो जगतके नाना रूप प्रतिभात है। इस कारण काके इस श्लोकका "सूत्रे मणिगणा इव' इस उपमा द्वारा सूत और मणिका प्रभेद देखाकर परमेश्वर का द्वैतभाव ग्रहण नहीं होता, माया द्वारा जगतको नेत्रसे बहु दिखाता है कह करके ही, मणि और सूत दोनों पृथक् पदार्थका उल्लेख करके उपमामात्र दिया हुआ है मात्र । इस उपमाकी और भी थोड़ीसी सार्थकता है। परमेश्वर परमात्मा जो "मैं" रूपसे जगतको धारण कर रक्खे हैं, इस उपमा द्वारा वही बात समझाया हुआ है।