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सप्तम अध्याय
३२७ . परितृप्त हो गये, केवल अपनेमें आप रहते हैं; वह ज्ञानी हैं। ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकि, ज्ञानीमें आकांक्षा कुछ भी नहीं है ( आगेका श्लोक देखो) ॥१६॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ अन्वयः। तेषां ( मध्ये ) ज्ञानी नित्ययुक्तः ( सदा मनिष्ठः ) एकभक्तिः (एकस्मिन् मय्येव भक्ति युक्तः ) ( अतएव ) विशिष्यते ( विशिष्ट इत्यर्थः) अहं हि ज्ञानिनः अत्यथं ( अत्यन्त ) प्रियः स च मम प्रियः ॥ १७ ।।
अनुवाद । उन सबके भीतर ज्ञानी नित्ययुक्त और एकभक्ति कह करके श्रेष्ठ है; मैं ज्ञानोका अत्यन्त प्रिय हूं, ज्ञानी भो मेरे अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥
व्याख्या। जिनके अन्तःकरणमें मैं ही सर्व भूतात्म-भूतात्मा "मैं” हूँ इस प्रकार ज्ञानका उदय (स्थिर निश्चय ) हो चुका, वही ज्ञानी हैं। ज्ञानीकी दृष्टिमें सब ही ब्रह्म है। इसलिये उनमें देहाभिमान भी नहीं, चित्त-विक्षेप भी नहीं है। इस कारण करके वह नित्ययुक्त अर्थात् नित्य वस्तुमें युक्त है। और उनके भक्ति तथा अन्तःकरणके स्थिति एक बिना दो में नहीं होता; कारण यह है कि, एक श्रात्मा ही उनका अवलम्बन, आत्मा बिना किसीकी पृथक सत्वा उनके दृष्टिगोचर नहीं होती। इसलिये वह “एकभक्ति" है। दूसरे दूसरे सुकृत्गण एकभक्ति नहीं हैं, क्योंकि उन सबकी भक्ति 'दो' में-एक है उद्देश्य में, अर्थात् आकांक्षित वस्तुमें, और एक है उद्देश्यसाधन करनेवाला वा आकांक्षाका पूरण करनेवाला भगवानमें । झानीका भगवान् ही सब है, भगवान् बिना और कोई उद्देश्य नहीं है। इसलिये कहा हुआ है कि मैं * (अक्षर ब्रह्म ) अत्यन्त करके
* असल बात यह है कि "मैं" वा आत्मा सबका ही प्रिय है। सब कोई ही अपनेको सुखा करनेके लिये मैं मैं"-"मेरे मेरे" करके पागल हो रहे हैं। साधारण लोग अज्ञानान्धकारसे अपना "मैं" का स्वरूप न समझ करके विषय-सुखमें