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श्रीमहामवदगीता उतके मोक्ष मार्गमें वाया दे नहीं सकता। क्या शरीर धारण अवस्था में, क्या शरीरान्तमें, वह योगो 'मैं' हो करकेही रहते हैं ॥ ३१ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥३२॥ अन्धयः। हे अर्जुन ! यः आत्मौपम्येन ( आत्मतुलनया ) सुखं पा यदि था दुःख सर्वत्र ( सर्वदेशकालपात्रषु ) सभं पश्यति, सः योगी परमः ( उत्कृष्ठः ) मतः ॥ ३२॥
अनुवाद। हे अजुन ! जो पुरुष आत्म तुलनामें सुख किम्बा दुःखको सर्वत्र समान दृष्टिसे दर्शन करते हैं, हमारे मतामें वही पुरुष परम योगी है ॥ ३२ ।।
व्याख्या। योगीगण साधन-फल करके दो अवस्था भोग करते हैं-एक आत्मभावावस्था और दूसरा जीवभावावस्था है। जब वह लोग बाहर वाले विषयको त्याग करके अन्तर ( भीतर ) में चरण करते हैं, तब उन लोगोंका प्रात्मभावावस्था और जब बाहरके विषयमें रहते हैं, तब जीवभावावस्था है। आत्मभावमें सर्वज्ञत्व हेतु निर्विकार साम्यावस्थाकी प्राप्ति होती है, स्थिर आनन्द-प्रवाह बहता रहता है, तथा विषय-संस्पर्शमें आनेसे भी जिस प्रकार वृत्तिका उदय हो करके मनमें सुख दुःखका विकाश करता था, उस प्रकार (विषय मतवारा)
और नहीं होता। इस आत्मभावसे जीवभावमें उतर आके विषयसंस्पर्शमें आनेसे, पहिले पहल “संगात् संजायते कामः"-इस वाक्यके अनुसार विषयवृत्तिका उदय होता है। परन्तु जब अभ्यास सिद्ध हो करके अन्तर्बहिः समान होता है, तब जीवभावमें विषयसंग होनेसे भी, विषयाकारा वृत्तिका उदय न होके अन्तःकरणमें समान आत्मानन्द-प्रवाह बहता रहता है, सुख, दुःख सबही एक चिद्-विलास बिना दूसरे भावसे लक्ष्य नहीं होता, इसलिये समान आकार धारण करता है। इस आत्माभावके सादृश्यमें बाह्यभावको गठन करना ही