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प्रथम अध्याय व्याख्या। “जनाईन"-जन-जन्म, अईन=पीड़न; जन्मको जो पीड़ित करते हैं अर्थात् जो मुक्ति देते हैं, उन्हींको जनाईन कहा जाता है। यहाँ कूटस्थ-चैतन्यको ही लक्ष्य करके कहा जाता है किहे जनाईन! सुननेमें आता है कि जिन लोगोंके मनोधर्म हैं, अगर चे उन सबका तमाम शरीर-धर्म दूषित होकर उनके शरीरपातका उपक्रम होवे, तो उन सबके मनमें ऊच्च चिन्ता-अभिलाषादि और नहीं आती, किसी प्रकार प्रायश्चित्त करने वाली ( क्रिया विशेषके द्वारा चित्तकी शुद्धि-सम्पादित करने की) शक्ति नहीं रहती; वो सब निरन्तर निदारुण कष्ट भोगते हुये नीच-चिन्तासे शरीर पात करते हैं ॥४३॥
अहो बत महत् पापं कत्तु व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४४॥
अन्धयः। अहोवत ( महत् कष्टं ) यत् राज्यसुखलोभेन स्वजनं हन्तं उद्यताः ( सन्तः ) वयं महत् पापं कत्त व्यवसिताः अध्यवसायं कृतवन्तः ) ॥४४॥
अनुवाद। अहो क्या सर्वनाश है। राज्यसुखके लोभके मारे स्वजनका विनाश करनेके लिये उद्यत होकर हमलोग महत् पाप करनेका उद्योग करते हैं ॥ ४४ ॥
व्याख्या। हरि ! हरि ! मैं योगके कुहक जालमें पड़कर अपने सहजात शरीरको नष्ट कर योग-राज्य पानेके लिये हाथ बढ़ाता हूँ। हाय ! हाय ! हाय ! क्या महापाप करता हूं ; अपने शरीरको
आपही नष्ट करता हूँ, आत्महत्या करता हूँ। कैसा सुखका लोभ है, छि ! छि !! छि !!!
पहिले पहिले साधक योगमें प्रवृत्त होकर अज्ञानताके मारे योगका तत्त्व न समझके जब अवसन्न तथा हताश हो पड़ते हैं, तब मनके भीतर इस प्रकार प्रापही श्राप धिक्कार आता है ॥४४॥