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· · तृतीय अध्याय
१२५ है; यह भी फिर योगप्राप्त अवस्था ( २य अः ५३ श्लोक) तथा योगसिद्धअवस्था (२य अः ७१ श्लोक ) इन दो अंशोंमें अन्तविभक्त है । इस कर्म-उपासना-ज्ञानके शेषमें ही शरीरत्याग करनेसे ब्रह्म निर्वाणकी प्राप्ति होती है ( २य अः ७२ श्लोक)। ये समस्त ही साधन-मार्गके क्रम विभाग हैं, इसलिये परस्पर सम्वद्ध हैं। किन्तु जब जिस क्रमको क्रिया होती है, तब वही प्रधान है, अतएव जब कर्म होता रहता है, तब कर्म ही प्रधान है ; फिर जब कर्मको अतिक्रम करके बुद्धियोगमें निश्चयात्मिका वृत्तिकी स्फुरण करके योग प्राप्ति होती है, तब कर्म "दूरेण अवरं"। असल बात यह है कि, कमसे ही बुद्धिका स्फुरण होता है, इस करके कर्म श्रेष्ठ है, तथा बुद्धि वा झानसे ही "अनामय पद” (“शान्ति” वा “ब्राहीस्थिति") प्राप्ति होती है, इस करके बुद्धि "ज्यायसी"-अधिकतर श्रेष्ठा है। सर्वज्ञ श्री गुरुदेव ये विषय समूह कहनेके पश्चात् स्वल्पज्ञ शिष्यने (साधक ) धारणा करली कि जब बुद्धिही श्रेष्ठतरा है तब कर्मसे प्रयोजन क्या ! अच्छा तो है चुपचाप कूटस्थ लक्ष्य करके बैठके स्थितिपदमें "श्रवणमनन-निदिध्यासन" करना, प्राणचालनसे एतना कष्ट उठानेका और क्या प्रयोजन है !! बुद्धिका जो स्फुरण है वह कर्म बिना होता ही नहीं तथा कर्म न रहनेसे बुद्धिकी क्रिया भी धीरे-धीरे छूट जाती है, फिर बाहर के विषयमें भी लपट जाना पड़ता है, वह समझे नहीं ; इसलिये कर्मको घोर विपाक * कह करके सिद्धान्त कर लिया। इसीलिये जगद्गरुको कहते हैं-आपही तो "जनाईन" (जन= उत्पत्ति, अईन = नाश ) पुनर्जन्म नाशके कर्ता तथा "केशव" ( क सृष्टिकर्ता, ईश =
* साधक मात्रको हा आसन-प्राणायामादि के कष्ट मालूम , वैसे क्रियाके परावस्थामें कूटस्थ लक्ष्य करके चुपचाप रह करके अन्तर्जगत्के समस्त विषय प्रत्यक्ष होते रहनेसे जो आनन्द-आवेश होना है, वह भी मालूम है; वह अपस्या मनमें याद होनेसे कर्मको घोर विपाक फरके ही मन मान लेता है ।। १॥