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पंचम अध्याय
इहैव तेजितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्मात् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १६ ॥
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अन्वयः । येषां मनः ( अन्तःकरणं ) साम्ये स्थितं, तैः इह एव सर्गः ( जन्म, संसारः) जि: ( वशीकृतः निरस्तः ), हि ( यस्मात् ) निर्दोषं यत् समं तत् ब्रह्म, तस्मात् ते ब्रह्मणि स्थिताः ॥ १९ ॥
अनुवाद | वहो समदर्शी पण्डितगण -- जिनका मन समतामें स्थित है, वह लोग जीवदशा हो संसारको निरस्त करते हैं। वह लोग ब्रह्ममें ही अवस्थित हैं, क्योंकि दोषशून्य समभाव जो ब्रह्म भी वही है ॥ १९ ॥
व्याख्या । जब प्राण स्थिर हो जाता है, मन भी स्थिर होता है, तब ही "सम" होता है; जब साधक उस सममें रहते हैं उस रहनेका नाम तब उनकी समाधि कहते हैं । उस खमताका निर्दोष भाव ही ब्रह्म है। शास्त्रमें राग द्वेष मोहको दोष कहते हैं; शब्द-स्पर्शादि विषय ही उस दोषका विषय है; इसलिये विषय ही दोष, - ब्रह्मसे विषयका पृथक् ज्ञान ही दोष है। साधक जब मनको लय करके समाधि लेने जाते हैं, उस समय यदि विकर्म्मसे आक्रान्त न होय तो उनका मन चैतन्यमें लय हो जाता है; यह लय होना ही - यह समता ही निर्दोष है। किन्तु उस समय यदि विकर्म कर उनको आक्रमण कर सके तो, उनके मनमें शब्द - स्पर्शादि कोई एक विषय जाग उठता है; तब उनका मन उसी विषयको लक्ष्य करके ही लय होता है, इसलिये वह समाधि ( सममें स्थिति ) निर्दोष न होयके सदोष होता है । यह सदोष समाधि ब्रह्मत्व नहीं है । जो लोग तत्वदर्शी हैं, उनका समाधि निर्दोष है; इसलिये वह लोग ब्रह्ममें स्थित अर्थात् ब्रह्मभाव प्राप्त है; वह लोग प्रारब्ध वश करके विषय में आने से भी विषयको ब्रह्मसे पृथक् भावसे देखते नहीं, उनके लिये सबही ब्रह्म है; इस करके जीवदशामें ही वह लोग सर्गजित् है । जीवका शरीर ही