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मालदीता
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श्रीमद्भगवद्रोता व्याख्या। पूर्व लोकके उपदेश अनुसार योगानुष्ठान करनेसे श्रात्मविशुद्धि होती है। तब अन्तःकरण प्रशान्त होता है अर्थात् विक्षेप-वर्जित होके कूटस्थमें स्थिर होता है, भय रहता नहीं, विक्षेप न रहनेसे विच्युत होने की सम्भावना दूर होके निर्भय होती है। इस अवस्थामें, प्राकृतिक संग त्याग हो जानेसे अन्तर्देशमें जो नाद-ब्रह्मका उत्थान होता है, साधक उखीको अनुसरण करते रहते हैं; और दूसरी कोई क्रिया ही नहीं करते; कर्मत्यागी होते हैं; सहस्रारमें उठ जाते हैं। इस समय केवल नाद-ब्रह्म मात्र अवलम्बन रहनेसे वह ब्रह्मचारी होते हैं, और उनके मन की संकल्प-विकल्प क्रिया आपही आप सिमट जाती है कह करके संयतमना होते हैं; और चित्त भी क्रम अनुसार उसी नादके अभ्यतरमें प्रवेश करते रहनेसे एक अपूर्व ज्योति लक्ष्य होता है; पश्चात् उस ज्योतिके भीतर प्रवेश भी करता है। अन्तमें वह अन्तरनुसरण वृत्ति मिट कर जो अवस्था आती है, उसीको मत्पर (मनिष्ठ ) अवस्था कहते हैं । इसके बाद और चित्तवृत्ति नहीं रहती, उसी ज्योतिमें मिलकर युक्त हो जाती है-इसीको वृत्तिविस्मरण वा चित्त-वृत्तिका निरोध वा समाधान अवस्था-युक्त (योगप्राप्त) समाहित अवस्था कहा जाता है। इस अवस्थामें शरीर एक जलसे भरा हुआ कुम्भ सदृश मात्र बैठा रहता है ।। १४॥
युजन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्ति निर्वाणपरमा मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
अन्वयः। एवं ( यथोकन विधानेन ) सदा आत्मानं ( अन्त:करणं ) युज्जन् ( समाहितं कुर्वन् ) नियतमानसः ( संयतचित्तः ) योगी निर्बाणपरमां (निर्वाणं मोक्षः, तत् परमा निष्ठा यस्याः तो) मत्संस्था ( मद्रु पेणावस्थिति ) शान्ति ( संसारोपरति ) अधिगच्छति ( प्राप्नोति) ॥ १५॥