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षष्ठ अध्याय
२७४ बाहिक आहार-विहार सम्बन्धमें जैसे बांधा हुआ नियम पालन करना होता है, क्रियाकालमें अन्तरके भीतर भी इसी प्रकार नियम पालन करना होता है; वही कहा जाता है। शरीर पोषणके लिये किसी द्रव्य गलाधःकरण द्वारा उदरस्थ करनेका नाम आहार है; क्रिया के समय एक मात्र वायु ही आहार होता रहता है। वह वायु-आहार अति अधिक अथवा एक दम न होनेसे योग नहीं होता, अर्थात् प्रश्वासके साथ वायुको खूब जोरसे खींच लोगे, उसमें सर्व शरीरमें कम्पन श्रावेगा, इस प्रकार होनेसे योग नहीं होता, रोग होता है। तैसे श्वासको न खींचके किम्बा श्वास न फेंक के एक बारगी दम बन्द करके रहनेसे भी रोग होता है। निश्वास-प्रश्वास सहज प्राण चालन से आपही आप जैसे चलता है, उसीके बशमें रह करके गुरूपदिष्ट कौशल प्रयोग करना पड़ता है, वह होनेसे ही योग होता है, इसीका नाम युक्ताहार है। और यह श्वासके क्रिया यथा समयमें यथा नियममें अनुष्ठान करनेसे ही अर्थात् श्वासको कभी दीर्घ कभी हस्व, कभी बारीक कभी मोटा न करके मन्त्र-समन्वय द्वारा समान प्राकार से उठाने फेंकनेसे ही युक्तविहार तथा युक्तचेष्ट होना होता है। अब स्वप्न और जागरण क्या है ? वह भी कहा जाता है। हम लोग साधारण अवस्थामें दिन रातके भीतर जितने प्रकार की अवस्था पाते हैं, वह समस्त ही योगाशास्त्रके मतमें स्वप्न है, इसलिये कहा हुआ है कि, यह जगत् स्वप्नवत् है; अर्थात् आत्मचिन्ता वा ईश्वर चिन्ता त्याग करके जो विषय-संश्रव होता है, वही स्वप्न है। और साधनामें ऊपर उठके अन्तरतम प्रदेशमें प्रवेश करके जिस अवस्थामें संसारके अनित्यत्व, अकिञ्चित्करत्व और आत्माके नित्यानन्दत्व अपरोक्ष ज्ञानसे अनुभव किया जाता है, उसीको जागरण या "प्रबोध-समय" कहते हैं। इस स्वप्नावस्थामें अर्थात् विषय संश्रवमें अधिक समय रहनेके लिये मन उसीमें आसक्त हो जानेसे भीतर में प्रवेश कर नहीं सकता;