________________
षष्ठ अध्याय
२०१ उनका आसन है; शरीरके भीतर ही वह उस प्रकार आसन स्थिर कर लेते हैं। सुषुम्नाके अभ्यन्तर ही उनका रहस अर्थात् गुप्तस्थान है। यहां जो ब्रह्मनाड़ी है, वह "महापापविमोचनी महापुण्यमयी नित्या" है, इस कारण शुचि ( पवित्र ) है। गुरूपदिष्ट नियम अनुसार बाहर के आसनमें यथारीति उपवेशन करके सुषुम्नाके उस शुचिस्थानके नअति उचे न-अति नीचे, मध्यस्थानमें, अर्थात् सात चक्रके मध्य चक्र हृदयस्थ अनाहत चक्रमें, ( वायु आकर्षण द्वारा) शरीरके अधोगामी वेगका भार अर्पण करना होता है; इसोका नाम आत्म-आसन प्रतिष्ठा करना * है। क्रम अनुसार अभ्यास द्वारा उस वेग धारण करनेमें जब श्रायास न होवेगा, अंग-कम्पनादिकी चेष्टा भी न रहेगी, तब ही वह आसन स्थिर होवेगा। फिर अनाहतमें स्थापन करनेसे वह आसन 'चैलाजिनकुशोत्तरम्” अर्थात् चैल, अजिन, और कुशाके ऊपर स्थापित होता है। क्योंकि, ब्रह्माजीकी प्रथम सृष्टि कुश ब्राह्मी- . शक्ति-पृथ्वीतत्त्व है, इनका स्थान मूलाधार; अजिन वैष्णवी शक्ति है, इनका स्थान स्वाधिष्ठान; चैल रौद्री शक्ति है, इनका स्थान मणिपुर; इन तीन शक्तिके ऊपर हृत्कमलमें आत्मशक्तिकी प्रतिष्ठा करने से ही आत्मासन चैलाजिनकुशोत्तर होता है। बाहर जैसे कुशके ऊपर लोमश चर्म, उसके ऊपर रेशमी वस्त्र बिछाकर श्रासनमें बैठके क्रिया करनेसे शरीरमें जो वैद्यु तिक तेज और शक्ति संचार होती है
___ * प्रश्वास सम्पूर्ण रूप खींच लेका शरीर शिथिल न रखके संकुचित वा संयत करके छातीमें जोर लगाके बैठनेसे हो शरीरके अधोगामी वेग हृत्कमलमें धारण करना होता है। वायु खींचकर छातीमें जोर देनेके समय जैसे हृत् पिंड और फुसफुसमें वाय का धक्का न लगने पावे; वायुका धक्का मेरुदण्डके भीतर अनाहत चक्र वायुस्थानमें (हृत्कमलमें ) फेंकना होवेगा ( क्रिया गुरूपदेशसे बोधगम्य होता है। इस प्रकार सावधान होके गुरूपदेश क्रम अनुसार सहज क्रियामें प्राणचालन करनेसे ही योग सिद्ध होता है; नहीं तो नाना प्रकार विघ्न होनेकी सम्भावना है ॥ ११ ॥ १२ ॥