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षष्ठ अध्याय
. २६६ बाहर में जैसे निर्जन गुप्त स्थानको रहस कहते हैं, शरीरके भीतर तैसे सुषुम्नाके अभ्यन्तर ही रहस है। वहाँ जानेसे मन बहिर्लक्ष्य विहीन होता है, बाहरके विषय तब मनको और स्पर्श नहीं कर सकते। देह संयत करना, गुरूपदिष्ट नियममें आसन करके बैठनेसे ही होता है, और मन संयत करना, गुरूपदिष्ट नियमसे लक्ष्य स्थिर रखनेसे ही होता है ॥ १०॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तत्रैकाग्र मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युज्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ अन्ववः। तत्र ( रहसि ) शुचौ देशे ( शुद्धस्थाने ) नात्युच्छ्रितं ( नात्युच्चं) नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरं ( चलाजिनकुशानां उत्तरं उपरिस्थं, कुशानामुपरि चर्म तदुपरि वस्त्रं तदुपरि स्थितमित्यर्थः ) स्थिरं ( निश्चलं) आत्मनः ( स्वायत्तीकृतं स्वस्तिकासनादिकं ) आसनं प्रतिष्ठाप्य, तत्र आसने उपविश्य मनः एकाग्रं कृत्वा, यतचित्तन्द्रिक्रियः ( सन् ) अात्मविशुद्धये ( अन्तःकरणस्य शुद्धयर्थ ) योगं युज्यात् (अभ्यसेत् ) ॥ ११ ॥ १२ ॥
अनुवाद। उस 'निर्जन गुप्त प्रदेशमें ( गोमयादि लेपन द्वारा) पवित्र स्थानमें अपना ( अभ्यस्त ) प्रासन स्थापन करना चाहिये; वह श्रासन अति उच्च अथवा अति नीचा होना न चाहिये-हेलता डोलता न रहे-और पहले कुश, उसके ऊपर ( लोमयुक्त मृगचर्म वा विड़ाल जातीय चम) उसके ऊपर ( अरञ्जित) पडवस्त्र ( रेशमी कपड़ा) बिछायके उसके उपर बैठने होता है; इस प्रकार आसन पर बैठके मनको एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियोंके क्रिया संयत करके श्रात्मशुद्धिके लिये योगाभ्यास करने पड़ता है ॥ ११ ॥ १२ ॥ ___ व्याख्या। क्या करता हूँ, क्या नहीं करता हूँ, कोई जानने न पावे ऐसे गुप्तस्थानमें गौके गोबरसे मार्जन करके अपना-आसन ( स्वस्तिकासन, सिद्धासन प्रभृति जो कोई आसन अपना आयत्त