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श्रीमद्भगवद्गीता (फिर निग्रह करनेसे भी नहीं होता) जीवके परम शिवमें अटक रहने से, चेतना भी उसी स्थानमें सिमट आती है, शरीरमें नहीं रहती; इस करके इन्द्रिय सकल निष्क्रिय होती हैं ॥ ३३ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वषो व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ अन्वयः । इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य अर्थ रागद्वषो व्यवस्थिते; तयोः (रागद्वेषयोः ) वर्श न आगच्छेत् , हि ( यतः ) तौ अस्य ( मुमुक्षौ परिपन्थिनौ ( विघ्नौ ) ॥३४॥
अनुवाद। शब्दस्पर्शादि अर्थ में प्रत्येक इन्द्रियोंका राग (अनुराग) तथा द्वेष है; यह राग द्वषके वशमें नहीं आता, क्योंकि राग द्वष मुमुक्षुके प्रतिरोधक अर्थात् विघ्न स्वरूप हैं ।। ३४ ॥
व्याख्या। प्रथम प्रथम प्रतिदिन क्रियामें समान सुविस्ता नहीं होता। कोई कोई दिन हो तो “श्रवण, मनन, कीर्तन, दर्शन"
आदि होता ही नहीं। कोई कोई दिन एक हुआ, और एक नहीं हुआ। इस प्रकार होनेसे राग द्वष प्रकाश पाता है, अर्थात् क्रिया भलीभांती होनेसे क्रियाके प्रति अनुराग, न होनेसे क्रियाके प्रति विद्वष होता है; किन्तु उस प्रकार राग द्वषके वशमें आनेसे प्रकृति वश नहीं होता, ऐसा न होनेसे मुक्ति भी नहीं होता। उस सुविधा तथा असुविधामें अनुरक्त वा विरक्त न होके कर्त्तव्य पालन करनेसे जो आत्मप्रीति होती है वही मात्र लेके श्रीगुरुदेवके ऊपर निर्भर करनेसे, कमी प्राकृतिक चंचलता तथा वातपित्त कफादियोंके प्रकोप करके कोई विघ्न भी विनकर नहीं होता ॥ ३४ ॥
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५॥ अन्वयः। स्वनुष्ठितात् ( साद्गुण्येन सम्पादितात् परधात् सकाशात् ) विगुणः स्वधर्मः श्रेयान् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मः भयावहः ।। ३५ ।।