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चतुर्थ अध्याय
२२१ सबको नहीं मिलता। इसलिये उन सबका इह लोक * भी नहीं है। इहलोक न रहनेसे साधनसापेक्ष दूसरा लोक कैसे रहेगा ? शरीर त्यागके पश्चात् सत्कम्मके फलसे स्वर्गादि के जिस जिस लोककी प्राप्ति होती है वह सब ही दूसरे लोक हैं। वह खब लोक क्रमोन्नत हैं । उसी क्रमके चरम ऊर्द्ध में जो लोक है, वह लोक ही गोलोक-चैकुण्ठ वा अपुनरावृत्तिगति है। यज्ञानुष्ठान न करनेसे आत्मदर्शन नहीं होता, इसलिये इहलोक अशान्तिमय रहता है, श्रात्मदर्शन न होनेसे भी परागतिकी प्राप्ति नहीं होती, इस करके जन्म मृत्युके बालोड़नमें रहना पड़ता है। अतएव, साधक ! यज्ञानुष्ठान करो। यज्ञानुष्ठान करनेमें तुम्हारी शक्ति है, क्योंकि तुम कुरुसत्तम अर्थात् समर्थवान (कृति ) हो ॥ ३१ ॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान् विद्धि तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।। ३२ ॥ अन्वयः। एवं ( यथोक्ताः) बहुविधा: यज्ञाः ब्रह्मणः मुखे, ( सृष्टिकारिणः मुखे, वेदे इत्यर्थः) वितताः ( उच्यन्ते ), तान् सर्वान् , कर्मजान् (कायिकवाचिकमानसकम्मोद्भवान् ) विद्धिः एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे (संसारबन्धनात् विमुक्तो भविष्यसि ) ॥ ३२ ॥
अनुवाद। इस प्रकार बहुविध यज्ञ ब्रह्ममुख करके ( वेदमें ) कथित है; वह समस्त ही कर्मज, जानों; इस प्रकार जाननेसे हो मुक्तिलाभ कर सकोगे ) ॥ ३२ ॥
व्याख्या। मूलाधारमें पृथिवीबीजके भीतर सृष्टिकारि वेदवाहु (चतुर्भुज) ब्रह्मा बेठे हैं; इनहींके मुख पद्मसे वेद उच्चारण हो रहे
* इ = ह्रस्वशक्ति, ह= त्याग करना, लोक = दर्शनीय जो कुछ; अर्थात् अर्द्धमुखी साधन क्रममें ह्रस्वशक्तिकी त्याग और दीर्घशक्तिको प्रारम्भसे जो जो दर्शनमें
आता है, उसीकोहो इहलोक कहते हैं। नवौन साधकों भी ये सब प्रत्यक्ष करते रहते हैं ॥ ३१॥