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श्रीमद्भगवद्गीता हैं, और सावधानीसे देखते हैं कि ठीक ठोक उस वाक्यके अनुसार क्रिया होती है या नहीं ( इसको छोड़ मनके भीतर और कोई किसी दूसरे भावको नहीं रखते ) वही साधक निष्काम हैं, सुख-दुःख, रागद्वष प्रभृति द्वन्द्वभाव उनमें नहीं रहता। इस प्रकार साधकके सन्मुख किसी प्रकारका कश्मल पा नहीं सकता, आत्मपथ उनके लिये खुलासा रहता है। इसलिये मुक्ति अर्थात् विष्णुपदमें लीन होना उनके पक्षमें अनायास-साध्य है, इस वास्ते वह नित्यसंन्यासी हैं ॥ ३ ॥
सांख्ययोगौ पृथगबालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविन्दते फलम् ॥ ४ ॥ अन्वयः। सांख्ययोगौ पृथक् (इति) बालाः (अज्ञाः) प्रवदन्ति, न (d) पण्डिताः ; ( अनयोः) एकं अपि सम्यक् आस्थितः ( अनुष्ठितवान् ) उभयो फलं विन्दते ( आप्नोति ) ॥४॥
अनुवाद। अज्ञ मनुष्यगण ही सांख्य एवं योगको पृथक् कहते हैं, लेकिन पण्डित लोग कहते नहीं ; जो इन दोनोंके भीतर, एकको भी सम्यक प्रकारसे अनुष्ठान करते है, वह दोनोंके ही फल प्राप्त करते हैं ॥ ४॥
व्याख्या। जो लोग कानुष्ठान नहीं करते वा कम में प्रवेशाधिकार नहीं पाये हैं, वह लोग बहुशास्त्रविद् होनेसे भी बालक अर्थात् अज्ञ वा कर्मशून्य ज्ञानी हैं। क्योंकि वह लोग तत्त्वको प्रत्यक्ष कर नहीं सकते। वैसे जो लोग कम्मी हैं, उन सबको शास्त्रज्ञान न रहने से भी, वह लोग तत्व तत्व में विचरते विचरते विश्वप्रपंचका आदि कारणको प्रत्यक्ष करते हैं, इस करके पण्डित हैं। वो (कर्मशून्य ज्ञानी) अज्ञजना केवल अनुमानके ऊपर निर्भर करके केवल भाषाके मार पेंच से, इससे उसको, उससे और एकको अलग करता है मात्र, सत्य निर्देश करने वाला दर्शनशक्ति उन सबको नहीं है। परन्तु जो लोग पण्डित हैं वह देखे हैं कि त्रिवेणीकी युक्त-वेणीमें जो जल है मुक्त वेणी