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पंचम अध्याय
२३६ वह साधक जिस प्रणालीमें क्रिया करेंगे, इस श्लोकमें वही उपदेश कहा हुआ; अर्थात् उनको संगत्याग पूर्वक ब्रह्ममें कर्म समर्पण करके साधन करना होवेगा ॥
___ मूलाधारसे प्रारम्भ करके सुषम्ना वना चित्राके भीतरे भीतर सहस्रार पर्य्यन्त जो आकाशमय छिद्र विस्तृत है, उसीका नाम ब्रह्मनाड़ी है *। इडा पिङ्गलाके भीतर वाले श्राकाशमय छिद्रको भी ब्रह्मनाड़ी कहते हैं। उस ब्रह्मनाडीका आश्रय करके प्राण और अपान प्रति कमलमें खेलता फिरता है। चित्तशुद्धिके लिये श्रीगुरुदेव शिष्य को ( जिसको जैसे ) जितने प्रकारकी क्रिया देते हैं, वह सब उस ब्रह्माझाशको अवलम्बन करके प्राणचालनके द्वारा अनुष्ठान करना पड़ता है। इसीका नाम है ब्रह्म में कर्म समर्पण करना। उस प्रकार उसी उपायसे उर्द्ध में जाते जाते इन तीनों नाडीके भीतर, विशेषतः सुषुम्नाके भीतरमें चित्र विचित्र रूप दर्शन होता है, और विविध स्थानमें विविध शक्ति प्रबुद्ध होके साधकको भोग दानसे आबद्ध करने के लिये आश्रय करने आती है; उन सब रूपमें मोहित होना वा उन सब शक्तिके किसीको श्राश्रय देना दूरकी बात, उन सबकी ही उपेक्षा करके केवल मात्र कूटस्य लक्ष्य करके "मामनुस्मरन्” करते करते सीधा
* ब्रह्मनाड़ी सुषुम्नाके वज्रा चित्राके भीतर देकर उठके समुदय कमलको भेद किया है। इसके भीतर मनको प्रवेश करानेका नाम ही कुल कुण्डलिनी शक्तिको जगाना है। इसके भीतर मन प्रवेश करनेसे शुद्धबुद्धिका विकाश होता है, जाननेका जो कुछ है सब जाना भी जाता है; इसलिये इसको ज्ञाननाड़ी भी कहते हैं । इस ब्रह्मनाडीका एक मुख मूलाधारमैं, और एक मुख दोनों तरफसे सहस्रारकी ब्रह्मरन्ध्र में है (द्वितीय चित्र देखो); मूलाधारका मुख हुआ है, सहस्रारके मुख बन्द है। सिद्ध पुरुषोंके देहत्यागके समय सहस्रारका मुख खुल जाता है, उसीको कहते हैं ब्रह्मरन्ध्र फट जाना। ब्रह्मरन्ध्र फटनेसे ही विदेह मुक्ति होती है। इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्नाकी तीन मुख ही मूलाधरमें एक है ॥ १० ॥